छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
चतुर्थ खण्ड
—: ० :—
आदित्यकी उत्तरदिक्सम्बन्धिनी किरणोंमें मधुनाड्यादि-दृष्टि
अथ येऽस्योदञ्चो रश्मयस्ता एवास्योदीच्यो मधुनाड्योऽथर्वाङ्गिरस एव मधुकृत इतिहासपुराणं पुष्पं ता अमृता आपः ॥ १ ॥
तथा इसकी जो उत्तर दिशाकी किरणें हैं वे ही इसकी उत्तरदिशाकी मधुनाडियाँ हैं। अथर्वाङ्गिरस श्रुतियाँ ही मधुकर हैं, इतिहास-पुराण ही पुष्प हैं तथा वह [ सोमादिरूप ] अमृत ही आप है ॥ १ ॥
ते वा एतेऽथर्वाङ्गिरस एतदितिहासपुराणमभ्यतपंस्तस्याभितप्तस्य यशस्तेज इन्द्रियं वीर्यमन्नाद्यꣳरसोऽजायत ॥ २ ॥
उन इन अथर्वाङ्गिरस श्रुतियोंने ही इस इतिहास-पुराणको अभितप्त किया। उस अभितप्त हुए [ इतिहास-पुराणरूप पुष्प ] से ही यश, तेज, इन्द्रिय, वीर्य और अन्नाद्यरूप रसकी उत्पत्ति हुई ॥ २ ॥
तद्व्यक्षरत्तदादित्यमभितोऽश्रयत्तद्वा एतद्यदेतदादित्यस्य परं कृष्णꣳरूपम् ॥ ३ ॥
उस रसने विशेषरूपसे गमन किया और आदित्यके निकट [ उत्तर ] भागमें आश्रय लिया। यह जो आदित्यका अत्यन्त कृष्ण रूप है यह वही है ॥ ३ ॥
खण्ड ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ २५३
| अथ येऽस्योदञ्चो रश्मय इत्यादि समानम् । अथर्वाङ्गिरसोऽथर्वाङ्गिरसा च दृष्टा मन्त्रा अथर्वाङ्गिरसः कर्माणि प्रयुक्ता मधुकृतः । इतिहासपुराणं पुष्पम् । तयोश्चेतिहासपुराणयोरश्वमेधे पारिप्लवासु रात्रिषु कर्माङ्गत्वेन विनियोगः सिद्धः । मध्वेवेदादित्यस्य परं कृष्णं रूपमतिशयेन कृष्णमित्यर्थः ॥ १-३ ॥ | ‘अथ येऽस्योदञ्चो रश्मयः’ इत्यादि मन्त्रोंका अर्थ पूर्ववत् है । अथर्वाङ्गिरसः—अथर्वा और अङ्गिरा ऋषियोंके प्रत्यक्ष किये हुए मन्त्र अथर्वाङ्गिरस कहलाते हैं; कर्ममें प्रयुक्त हुए वे ही मन्त्र मधुकर हैं। इतिहास-पुराण ही पुष्प हैं। उन इतिहास और पुराणोंका अश्वमेध यज्ञमें पारिप्लवा रात्रियोंमें* कर्माङ्गरूपसे विनियोग प्रसिद्ध ही है। इस आदित्यका जो परम कृष्ण अर्थात् अतिशय कृष्ण रूप है वही मधु है ॥ १-३ ॥ |
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इतिच्छान्दोग्योपनिषदि तृतीयाध्याये चतुर्थखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ ४ ॥
</div>* अश्वमेधयज्ञ बहुत दिनोंमें समाप्त होता है। उसके अनुष्ठानमें चुपचाप बैठे-बैठे यज्ञकर्ताओंको आलस्य आने लगता है। उसकी निवृत्तिके लिये श्रुतिने रात्रिके समय इतिहास-पुराणादिश्रवणका विधान किया है। विविध उपाख्यानादिके समुदायका नाम ‘पारिप्लव’ है; जिन रात्रियोंमें उनके श्रवणका विधान है वे ‘पारिप्लवा रात्रियाँ’ कहलाती हैं।
पञ्चम
आदित्यकी ऊर्ध्वदिक्सम्बन्धिनी किरणोंमें मधुनाड्यादि-दृष्टि
अथ येऽस्योध्र्वा रश्मयस्ता एवास्योर्ध्वा मधुनाड्यो गुह्या एवादेशा मधुकृतो ब्रह्मैव पुष्पं ता अमृता आपः ॥ १ ॥
तथा इसकी जो ऊर्ध्वरश्मियाँ हैं वे ही इसकी ऊपरकी ओरकी मधुनाडियाँ हैं। गुह्य आदेश ही मधुकर हैं; [ प्रणवरूप ] ब्रह्म ही पुष्प है तथा वह [ सोमादिरूप ] अमृत ही आप है ॥ १ ॥
ते वा एते गुह्या आदेशा एतद्ब्रह्माभ्यतपंस्तस्याभि-तप्तस्य यशस्तेज इन्द्रियं वीर्यमन्नाद्यꣳरसोऽजायत ॥ २ ॥
उन इन गुह्य आदेशोंने ही इस [ प्रणवसंज्ञक ] ब्रह्मको अभितप्त किया। उस अभितप्त ब्रह्मसे ही यश, तेज, इन्द्रिय, वीर्य और अन्नाद्यरूप रस उत्पन्न हुआ ॥ २ ॥
तद्व्यक्षरत्तदादित्यमभितोऽश्रयत्तद्वा एतद्यदेतदा-दित्यस्य मध्ये क्षोभत इव ॥ ३ ॥
उस रसने विशेषरूपसे गमन किया और वह आदित्यके निकट [ ऊर्ध्व ] भागमें आश्रित हुआ। यह जो आदित्यके मध्यमें क्षुब्ध-सा होता है यही वह (मधु) है ॥ ३ ॥
| अथ येऽस्योध्र्वा रश्मय इत्यादि पूर्ववत् । गुह्या गोप्य रहस्या एवादेशा लोकद्वारीयादिविधय | 'अथ येऽस्योध्र्वा रश्मयः' इत्यादि मन्त्रोंका अर्थ पूर्ववत् है। गुह्य—गोपनीय अर्थात् रहस्यभूत जो आदेश हैं यानी जो लोकद्वारीयादि* |
* 'लोकद्वारमपावृणु पश्येम त्वा वयम्' (लोकका द्वार खोल दे; जिससे हम तुझे देखें) इत्यादि ही 'लोकद्वारीयादि विधियाँ' हैं।
खण्ड ५] शाङ्करभाष्यार्थ ३५५
| उपासनानि च कर्माङ्गविषयाणि मधुकृतः । ब्रह्मैव शब्दाधिकारात् प्रणवाख्यं पुष्पं समानमन्यत् । मध्वेतदादित्यस्य मध्ये क्षोभत इव समाहितदृष्टैर्दृश्यते सञ्चलतीव ॥ १-३ ॥ | विधियाँ और कर्माङ्गसम्बन्धिनी उपासनाएँ हैं वे ही मधुकर हैं। ब्रह्म शब्दका अधिकार होनेसे प्रणवसंज्ञक ब्रह्म ही पुष्प है। शेष अर्थ पूर्ववत् है। समाहितदृष्टि पुरुषको इस आदित्यके मध्यमें जो क्षुभित अर्थात् संचलित-सा होता दिखायी देता है वही मधु है॥१-३॥ |
ते वा एते रसानाꣳरसा वेदा हि रसास्तेषामेते रसास्तानि वा एतान्यमृतानाममृतानि वेदा ह्यमृतास्तेषामेतान्यमृतानि ॥ ४ ॥
वे ये [ पूर्वोक्त लोहितादि रूप ] ही रसोंके रस हैं, वेद ही रस हैं और ये उनके भी रस हैं। वे ही ये अमृतोंके अमृत हैं—वेद ही अमृत हैं और ये उनके भी अमृत हैं ॥ ४ ॥
| ते वा एते यथोक्ता रोहितादिरूपविशेषा रसानां रसाः । केषां रसानाम् ? इत्याह—वेदा हि यस्माल्लोकनिष्यन्दत्वात्सारा इति रसास्तेषां रसानां कर्मभावमापन्नानामप्येते रोहितादिविशेषा रसा अत्यन्तसारभूता इत्यर्थः । | वे ये पूर्वोक्त रोहितादि रूप विशेष ही रसोंके रस हैं। किन रसोंके रस हैं ? ऐसा प्रश्न होनेपर श्रुति कहती है—क्योंकि लोकोंके सारभूत होनेके कारण वेद ही सार अर्थात् रस हैं और कर्मभावको प्राप्त हुए उन रसोंके भी वे रोहितादि रूप-विशेष रस यानी अत्यन्त सारभूत हैं। |
२५६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ३
| २५६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ३ |
|---|
| तथामृतानाममृतानि वेदा ह्यमृताः नित्यत्वात्, तेषामेतानि रोहितादीनि रूपाण्यमृतानि । रसानां रसा इत्यादि कर्मस्तुतिरेषा—यस्यैवंविशिष्टान्यमृतानि फलमिति ॥ ४ ॥ | तथा ये अमृर्तोंके भी अमृत हैं, क्योंकि वेद ही नित्य होनेके कारण अमृत हैं, उनके भी ये रोहितादि रूप अमृत हैं । 'रसानां रसाः' (रसोंके रस) इत्यादि वाक्य कर्मकी स्तुति है; अर्थात् इस वाक्यका ऐसा तात्पर्य है कि जिस रसरूप कर्मके ऐसे अमृतरूप फल हैं [उसके माहात्म्यका कहाँतक वर्णन किया जाय ?] ॥ ४ ॥ |
—: ० :—
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि तृतीयाध्याये पञ्चमखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ ५ ॥
षष्ठ खण्ड
वसुओंके जीवनाश्रयभूत प्रथम अमृतकी उपासना
तद्यत्प्रथमममृतं तद्वसव उपजीवन्त्यग्निना मुखेन न वै देवा अश्नन्ति न पिबन्त्येतदेवामृतं दृष्ट्वा तृप्यन्ति ॥ १॥
इनमें जो पहला अमृत है, उससे वसुगण अग्निप्रधान होकर जीवन धारण करते हैं। देवगण न तो खाते हैं और न पीते ही हैं, वे इस अमृतको देखकर ही तृप्त हो जाते हैं ॥ १ ॥
| संस्कृत भाष्य | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| तत्तत्र यत्प्रथमममृतं रोहितरूपलक्षणं तद्वसवः प्रातःसवनेशाना उपजीवन्त्यग्निना मुखेनाग्निना प्रधानभूतेनाग्निप्रधानाः सन्त उपजीवन्तीत्यर्थः। अन्नाद्यं रसोऽजायतेतिवचनात्कवलग्राहमश्नन्तीति प्राप्तम्, तत्प्रतिषिध्यते न वै देवा अश्नन्ति न पिबन्तीति। <br><br> कथं तर्ह्युपजीवन्ति ? इत्युच्यते— <br><br> एतदेव हि यथोक्तममृतं रोहितं रूपं दृष्ट्वोपलभ्य सर्वकरणैरनुभूय | वहाँ इनमें जो रोहितरूपवाला पहला अमृत है उसके उपजीवी प्रातःसवनाधिकारी वसुगण हैं। वे अग्निमुखसे—प्रधानभूत अग्निसे अर्थात् अग्निप्रधान होकर इसके उपजीवी होते हैं। 'अन्नाद्यरूप रस उत्पन्न हुआ' इस वाक्यसे सिद्ध होता है कि वे उसे एक-एक ग्रास लेकर खाते हैं। इसीका 'देवगण न तो खाते हैं और न पीते ही हैं'—इस वाक्यद्वारा प्रतिषेध किया जाता है। <br><br> तो फिर वे किस प्रकार उसके उपजीवी होते हैं ? ऐसा प्रश्न होने-पर कहा जाता है—वे इस उपर्युक्त अमृत अर्थात् रोहितरूपको देखकर—उपलब्ध कर यानी समस्त इन्द्रियों-से इसका अनुभव कर तृप्त हो जाते |
२५८ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ३
| २५८ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ३ |
|---|
| तृप्यन्ति, दृशेः सर्वकरणद्वारोपलब्ध्यर्थत्वात् । | हैं, क्योंकि 'दृश्' धातु समस्त इन्द्रियोंद्वारा उपलब्धि (ज्ञान) होनेके अर्थमें प्रयुक्त होनेवाला है। | | ननु रोहितं रूपं दृष्ट्वेत्युक्तम्, कथमन्येन्द्रियविषयत्वं रूपस्येति? | किंतु यहाँ तो कहा गया है कि रोहितरूपको देखकर [अर्थात् सम्पूर्ण इन्द्रियोंसे उसका अनुभव कर<sup>१</sup>] फिर रूप अन्य इन्द्रियोंका विषय कैसे हो सकता है? | | न; यशआदीनां श्रोत्रादिगम्यत्वात् । श्रोत्रग्राह्यं यशः। तेजोरूपं चाक्षुषम् । इन्द्रियं विषयग्रहणकार्यानुमेयं करणसामर्थ्यम्। | [इसपर कहते हैं—] ऐसी बात नहीं है, क्योंकि श्रोत्रादि अन्य इन्द्रियोंके विषय तो यश आदि हैं। यश श्रोत्रग्राह्य है, चक्षु इन्द्रियका विषय तेजोरूप है। विषयग्रहणरूप कार्यसे अनुमित होनेवाले करणोंके सामर्थ्यका नाम 'इन्द्रिय' है, | | वीर्यं बलं देहगत उत्साहः प्राणवत्ता अन्नाद्यं प्रत्यहमुपजीव्यमानं शरीरस्थितिकरं यद्भवति । | 'वीर्य' का अर्थ है बल-देहगत उत्साह यानी प्राणवत्ता। तथा 'अन्नाद्य' जिसके आश्रित होकर प्राणादि प्रतिदिन जीवित रहते हैं और जो शरीरकी स्थिति करनेवाला है, वह है। | | रसो ह्येवमात्मकः सर्वः। यं दृष्ट्वा तृप्यन्ति सर्वे । देवा दृष्ट्वा तृप्यन्तीत्येतत्सर्वं स्वकरणैरनुभूय तृप्यन्तीत्यर्थः। आदित्यसंश्रयाः सन्तो वैगन्ध्यादिदेहकरणदोषरहिताश्च ॥ १ ॥ | इस प्रकार यह सब कुछ रस है, जिसे देखकर सब देवता तृप्त होते हैं। 'देवगण देखकर तृप्त होते हैं—' इसका आशय यह है कि इन सबका अपनी इन्द्रियोंसे अनुभव करके वे तृप्त हो जाते हैं। तथा आदित्यके आश्रित होनेसे वे दुर्गन्ध आदि देह और इन्द्रियोंके दोषोंसे रहित भी हैं ॥ १ ॥ |
१. क्योंकि भाष्यमें 'दृश्' धातुका ऐसा ही अर्थ कहा गया है।
खण्ड ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ २५९
| किं ते निरुद्यमा अमृतमुपजीवन्ति ? न; कथं तर्हि ? | तो क्या वे उद्यमहीन रहकर ही इस अमृतके उपजीवी होते हैं ? नहीं, तो फिर किस प्रकार होते हैं ?— |
|---|
त एतदेव रूपमभिसंविशन्त्येतस्माद्रूपादुद्यन्ति ॥२॥
वे देवगण इस रूपको लक्षित करके ही उदासीन हो जाते हैं और फिर इसीसे उत्साहित होते हैं ॥ २ ॥
| एतदेव रूपमभिलक्ष्याधुना भोगावसरो नास्माकमिति बुद्ध्वा भिसंविशन्त्युदासते । यदा वै तस्यामृतस्य भोगावसरो भवेत्तदैतस्मादमृतभोगनिमित्तमित्यर्थः । एतस्माद्रूपादुद्यन्त्युत्साहवन्तो भवन्तीत्यर्थः । न ह्यनुत्साहवतामननुतिष्ठतामलसानां भोगप्राप्तिर्लोके दृष्टा ॥ २ ॥ | इस रूपको ही लक्षित कर अर्थात् अभी हमारे भोगका अवसर नहीं है-ऐसा जानकर वे उदासीन हो जाते हैं । और जब उस अमृतके भोगका अवसर उपस्थित होता है तब इस अमृतसे अर्थात् इस अमृतके भोगके लिये इस रूपसे ही उत्साहयुक्त हो जाते हैं, क्योंकि जो अनुत्साही, अनुष्ठानहीन और आलसी हैं, उन्हें लोकमें भोगोंकी प्राप्ति होती नहीं देखी जाती ॥ २ ॥ |
|---|
—: ० :—
स य एतदेवममृतं वेद वसूनामेवैको भूत्वाग्निनैव मुखेनैतदेवामृतं दृष्ट्वा तृप्यति स एतदेव रूपमभिसंविशत्येतस्माद्रूपादुदेति ॥ ३ ॥
वह, जो इस प्रकार इस अमृतको जानता है वह वसुओंमेंसे ही कोई एक होकर अग्निकी ही प्रधानतासे इसे देखकर तृप्त हो जाता है । वह इस रूपको लक्ष्य करके ही उदासीन होता है और इस रूपसे ही उत्साहित होता है ॥ ३ ॥
छा० उ० ९—
२६० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ३
| २६० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ३ |
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| स यः कश्चिदेतदेवं यथोदितमृङ् मधुकरतापरससंक्षरणमृग्वेदविहितकर्मपुष्पात्तस्य चादित्यसंश्रयणं रोहितरूपत्वं चामृतस्य प्राचीदिग्गतरश्मिनाडीसंस्थतां वसुदेवभोग्यतां तद्विदश्च वसुभिः सहैकतां गत्वाग्निना मुखेनोपजीवनं दर्शनमात्रेण तृप्तिं स्वभोगावसर उद्यमनं तत्कालापाये च संवेशनं वेद सोऽपि वसुवत्सर्वं तथैवानुभवति ॥ ३ ॥ | जो कोई पुरुष इस यथोक्त अमृतको इस प्रकार [ जानता है ] अर्थात् ऋग्वेदविहित कर्मरूप पुष्पसे ऋक्-श्रुतिरूप मधुकरोंके अभितापद्वारा रसका संक्षरण होना, उसका आदित्यके आश्रित होना, रोहितरूप होना, अमृतका पूर्वदिग्वर्तिनी रश्मिनाडियोंमें स्थित होना, वसुनामक देवोंका भोग्य होना, उसे जाननेवालोंका वसुगणके साथ एकताको प्राप्त होकर अग्निप्रधानतासे उसके आश्रित जीवन धारण करना, उसके दर्शनमात्रसे उनका ( उसे जाननेवालोंका ) तृप्त होना, अपने भोगके समय उनका उससे उत्साहित होना और भोगावसरकी समाप्तिपर उदासीन हो जाना जानता है वह भी वसुओंके समान इन सब बातोंका उसी प्रकार अनुभव करता है ॥ ३ ॥ |
| कियन्तं कालं विदांस्तदमृतमुपजीवति ? इत्युच्यते— | विद्वान् कितने समयतक उस अमृतके आश्रित होकर जीवन धारण करता है, यह बतलाया जाता है— |
स यावदादित्यः पुरस्तादुदेता पश्चादस्तमता वसूनामेव तावदाधिपत्यꣳस्वाराज्यं पर्येता ॥ ४ ॥
जबतक आदित्य पूर्व दिशासे उदित होता है और पश्चिम दिशामें अस्त होता है तबतक वह [ विद्वान् ] वसुओंके आधिपत्य और स्वाराज्यको प्राप्त होता है ॥ ४ ॥
खण्ड ६ ] शाङ्करभाष्यं २६१
| संस्कृत भाष्य | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| स विद्वान्यावदादित्यः पुरस्तात्प्राच्यां दिश्युदेता पश्चात्प्रतीच्यामस्तमेता तावद्वसूनां भोगकालस्तावन्तमेव कालं वसूनामाधिपत्यं स्वाराज्यं पर्येता परितो गन्ता भवतीत्यर्थः । न यथा चन्द्रमण्डलस्थः केवलकर्मी परतन्त्रो देवानामनभूतः । किं तर्हि ? अयमाधिपत्यं स्वराड्भावं चाधिगच्छति ॥ ४ ॥ | जबतक आदित्य पूर्वकी ओर—पूर्वदिशामें उदित होता और पश्चिमकी ओर अस्त होता है तबतक वसुओंका भोगकाल है; वह विद्वान् उतने ही समयतक वसुओंके आधिपत्य और स्वाराज्यको 'पर्येता'—सब ओरसे प्राप्त होता है—ऐसा इसका भावार्थ है । जिस प्रकार चन्द्रमण्डलमें स्थित केवल कर्मपरायण पुरुष देवताओंका भोग्य होकर परतन्त्र रहता है उस प्रकार यह नहीं रहता । तो फिर किस प्रकार रहता है ? [ इसपर कहते हैं— ] यह तो आधिपत्य और स्वाराज्य—स्वराड्भावको प्राप्त हो जाता है ॥४॥ |
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इतिच्छान्दोग्योपनिषदि तृतीयाध्याये
षष्ठखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ ६ ॥
सप्तम खण्ड
रुद्रोंके जीवनाश्रयभूत द्वितीय अमृतकी उपासना
अथ यद्द्वितीयममृतं तद्रुद्रा उपजीवन्तीन्द्रेण मुखेन न वै देवा अश्नन्ति न पिबन्त्येतदेवामृतं दृष्ट्वा तृप्यन्ति ॥ १ ॥
अब, जो दूसरा अमृत है, रुद्रगण इन्द्रप्रधान होकर उसके आश्रित जीवन धारण करते हैं। देवगण न तो खाते हैं और न पीते हैं, वे इस अमृतको देखकर ही तृप्त हो जाते हैं ॥ १ ॥
त एतदेव रूपमभिसंविशन्त्येतस्माद्रूपादुद्यन्ति ॥२॥
वे इस रूपको लक्षित करके ही उदासीन हो जाते हैं और इसीसे उद्यमशील होते हैं ॥ २ ॥
स य एतदेवममृतं वेद रुद्राणामेवैको भूत्वेन्द्रेणैव मुखेनैतदेवामृतं दृष्ट्वा तृप्यति स एतदेव रूपमभिसंविशत्येतस्माद्रूपादुदेति ॥ ३ ॥
वह, जो इस प्रकार इस अमृतको जानता है, रुद्रोंमेंसे ही कोई एक होकर इन्द्रकी ही प्रधानतासे इस अमृतको ही देखकर तृप्त हो जाता है। वह इस रूपसे ही उदासीन हो जाता है और इस रूपसे ही उद्यमशील होता है ॥ ३ ॥
| अथ यद्द्वितीयममृतं तद्रुद्रा <br> उपजीवन्तीत्यादिसमानम् ।१-३। | ‘अथ यद्द्वितीयममृतं तद्रुद्रा उपजीवन्ति’ इत्यादि श्रुतियोंका अर्थ पूर्ववत् है ॥ १-३ ॥ |
—: ० :—
खण्ड ७ ] शाङ्करभाष्यार्थ २६३
स यावदादित्यः पुरस्तादुदेता पश्चादस्तमेता द्विस्तावद्दक्षिणत उदेतोत्तरतोऽस्तमेता रुद्राणामेव तावदाधिपत्यꣳस्वाराज्यं पर्येता ॥ ४ ॥
जबतक आदित्य पूर्वसे उदित होता और पश्चिममें अस्त होता है उससे दुगुने समयतक वह दक्षिणसे उदित होता है और उत्तरमें अस्त होता है। इतने समयपर्यन्त वह रुद्रोंके ही आधिपत्य एवं स्वाराज्यको प्राप्त होता है ॥ ४ ॥
| स यावदादित्यः पुरस्तादु-<br>देता पश्चादस्तमेता द्विस्ताव-<br>त्ततो द्विगुणं कालं दक्षिणत<br>उदेतोत्तरतोऽस्तमेता रुद्राणां<br>तावद्भोगकालः ॥ ४ ॥ | वह आदित्य जबतक पूर्वसे उदित होता और पश्चिममें अस्त होता है उससे दूने समयतक दक्षिणसे उदित होता और उत्तरमें अस्त होता रहता है। इतना समय रुद्रोंका भोगकाल है [अर्थात् वसुओंकी अपेक्षा रुद्रोंका भोगकाल दूना है] ॥ ४ ॥ |
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि तृतीयाध्याये
सप्तमखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ ६ ॥
अष्टम खण्ड
आदित्योंके जीवनाश्रयभूत तृतीय अमृतकी उपासना
अथ यत्तृतीयममृतं तदादित्या उपजीवन्ति वरुणेन मुखेन न वै देवा अश्नन्ति न पिबन्त्येतदेवामृतं दृष्ट्वा तृप्यन्ति ॥ १ ॥
तदनन्तर जो तीसरा अमृत है, आदित्यगण वरुणप्रधान होकर उसके आश्रित जीवन धारण करते हैं। देवगण न तो खाते हैं और न पीते हैं; वे इस अमृतको देखकर ही तृप्त हो जाते हैं ॥ १ ॥
त एतदेव रूपमभिसंविशन्त्येतस्माद्रूपादुद्यन्ति ॥ २ ॥
वे इस रूपको ही लक्षित करके उदासीन होते हैं और इसीसे उद्यमशील हो जाते हैं ॥ २ ॥
स य एतदेवममृतं वेदादित्यानामेवैको भूत्वा वरुणेनैव मुखेनैतदेवामृतं दृष्ट्वा तृप्यति स एतदेव रूपमभिसंविशत्येतस्माद्रूपादुदेति ॥ ३ ॥
वह, जो इस प्रकार इस अमृतको जानता है, आदित्योंमेंसे ही कोई एक होकर वरुणकी ही प्रधानतासे इस अमृतको देखकर तृप्त हो जाता है। वह इस रूपसे ही उदासीन होता है और इसीसे उद्योगी हो जाता है ॥ ३ ॥
स यावदादित्यो दक्षिणत उदेतोत्तरतोऽस्तमेता द्विस्तावत्पश्चादुदेता पुरस्तादस्तमेतादित्यानामेव तावदाधिपत्यँस्वाराज्यं पर्येता ॥ ४ ॥
खण्ड ८ ] शाङ्करभाष्यार्थं २६५
वह आदित्य जितने समयतक दक्षिणसे उदित होता और उत्तरमें अस्त होता है उससे दूने समयतक पश्चिमसे उदित होता और पूर्वमें अस्त होता रहता है । इतने समयतक वह आदित्योंके ही आधिपत्य और स्वाराज्यको प्राप्त होता है ॥ ४ ॥
| शाङ्करभाष्यम् | भाष्यार्थ |
|---|---|
| तथा पश्चादुत्तरत ऊर्ध्वमुदेता विपर्ययेणास्तमेता ।<br><br>(उत्तरोत्तरेण द्विगुणकालात्यये आक्षेपः)<br>पूर्वस्मात्पूर्वस्माद् द्विगुणोत्तरोत्तरेण कालेनेत्यपौराणं दर्शनम् । सवितुश्चतुर्दिशमिन्द्रयमवरुणसोमपुरीषूदयास्तमयकालस्य तुल्यत्वं हि पौराणिकैरुक्तम् । मानसोत्तरस्य मूर्धनि मेरोः प्रदक्षिणावृत्तेस्तुल्यत्वादिति । | इसी प्रकार पूर्व-पूर्वकी अपेक्षा उत्तरोत्तर दूने समयतक पश्चिम, उत्तर और ऊपरकी ओर सूर्य उदित होता है और इनसे विपरीत दिशाओंमें अस्त होता है । किंतु यह तो पुराणदृष्टिके विरुद्ध है; क्योंकि पौराणिकोंने चारों दिशाओंमें इन्द्र, यम, वरुण और सोमकी पुरियोंमें सूर्यके उदय और अस्तके काल समान ही बतलाये हैं, कारण कि मानसोत्तर पर्वतके शिखर-पर जो सूर्यका सुमेरुके चारों ओर घूमनेका मार्ग है वह सर्वत्र समान है । |
| (उक्ताक्षेप-निरसनम्)<br>अत्रोक्तः परिहार आचार्यैः । अमरावत्यादीनां पुरीणां द्विगुणोत्तरोत्तरेण कालेनोद्वासः स्यात् । उदयश्च नाम सवितुस्तन्निवासिनां प्राणिनां चक्षुर्गोचरापत्तिस्तदत्ययश्चास्तमनं न परमार्थत | यहाँ आचार्योंने (श्रीद्रविडाचार्य-ने) इस प्रकार इस (आक्षेप) का परिहार किया है—अमरावती आदि पुरियोंका उत्तरोत्तर दूने समयमें उद्वास (नाश) होता है। उन पुरियोंके निवासियोंकी दृष्टिमें आना ही सूर्यका उदय है और उनकी दृष्टिसे छिप जाना ही सूर्यका अस्त है। वस्तुतः सूर्यके |
२६६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ३
| २६६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ३ |
|---|
| संस्कृत-भाष्य | हिन्दी-अनुवाद |
|---|---|
| उदयास्तमने स्तः। तन्निवासिनां च प्राणिनामभावे तान्प्रति तेनैव मार्गेण गच्छन्नपि नैवोदेता नास्तमेतेति चक्षुर्गोचरापत्तेस्तदत्ययस्य चाभावात्। | उदय और अस्त हैं ही नहीं। उन पुरियोंमें निवास करनेवाले प्राणियोंका अभाव हो जानेपर उनके लिये सूर्यदेव उसी मार्गसे जाते हुए भी न तो उदित होते हैं और न अस्त ही होते हैं, क्योंकि उस समय सूर्यका किसीकी दृष्टिका विषय होना अथवा न होना समाप्त हो जाता है। |
| तथामरावत्याः सकाशाद् द्विगुणं कालं संयमनी पुरी वस्यतस्तन्निवासिनः प्राणिनः प्रति दक्षिणत इवोदेत्युत्तरतोऽस्तमेतीत्युच्यतेऽस्मद्बुद्धिंचापेक्ष्य; तथोत्तरास्वपि पुरीषु योजना। सर्वेषां च मेरुत्तरतो भवति। | तथा अमरावती पुरीकी अपेक्षा दूने समय संयमनी पुरी रहती है। अतः उसमें रहनेवाले प्राणियोंके लिये सूर्य मानो दक्षिणकी ओरसे उदित होता है और उत्तरमें अस्त हो जाता है—यह बात हमलोगोंकी दृष्टिको लेकर कही गयी है। इसी प्रकार आगेकी अन्य पुरियोंमें भी योजना कर लेनी चाहिये। तथा मेरु इन सभीके उत्तरकी ओर है। |
| यदामरावत्यां मध्याह्नगतः सविता तदा संयमन्यामुद्यन् दृश्यते, तत्र मध्याह्नगतो वारुण्यामुद्यन्दृश्यते, तथोत्तरस्याम्; प्रदक्षिणावृत्तेस्तुल्यत्वात्। इलावृतवासिनां सर्वतः पर्वतप्राकारनि- | जिस समय अमरावती पुरीमें सूर्य मध्याह्नमें स्थित होता है उस समय संयमनी पुरीमें वह उदित होता देखा जाता है, और वहाँपर मध्याह्नमें स्थित होनेपर वरुणकी पुरीमें उदित होता दिखायी देता है। इसी प्रकार उत्तरदिशावर्तिनी पुरीके विषयमें समझना चाहिये; क्योंकि उसकी प्रदक्षिणाका चक्र सर्वत्र समान है। सूर्यरश्मियोंके |
| खण्ड ८ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | २६७ |
|---|
| वारितादित्यरश्मीनां सवितोर्ध्व इवोदेतावागस्तमेता दृश्यते । पर्वतोर्ध्वच्छिद्रप्रवेशात्सवितृप्रकाशस्य । | सब ओरसे पर्वतरूप परकोटेद्वारा रोक लिये जानेके कारण इलावृतखण्डमें रहनेवालोंको वह मानो ऊपरकी ओर उदित होता और नीचेकी ओर अस्त होता दिखायी देता है, क्योंकि वहाँ सूर्यका प्रकाश पर्वतोंके ऊपरी छिद्रद्वारा ही प्रवेश करता है । | | तथर्गाद्यमृतोपजीविनाममृतानां च द्विगुणोत्तरोत्तरवीर्यवत्त्वमनुमीयते भोगकालद्वैगुण्यलिङ्गेन । उद्यमनसंवेशनादि देवानां रुद्रादीनां विदुषश्च समानम् ॥ १-४ ॥ | इस प्रकार ऋगादि अमृतके आश्रित जीवन व्यतीत करनेवाले देवताओंके पराक्रमकी उत्तरोत्तर द्विगुणताका उनके भोगकालके द्विगुणत्वरूप लिङ्गसे अनुमान किया जाता है । रुद्रादि देवताओं और विद्वानोंके उद्यमन और संवेशन समान ही हैं ॥ १-४ ॥ |
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इतिच्छान्दोग्योपनिषदि तृतीयाध्याये अष्टमखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ ८ ॥
</div>नवम खण्ड
मरुद्गणके जीवनाश्रयभूत चतुर्थ अमृतकी उपासना
अथ यच्चतुर्थममृतं तन्मरुत उपजीवन्ति सोमेन मुखेन न वै देवा अश्नन्ति न पिबन्त्येतदेवामृतं दृष्ट्वा तृप्यन्ति ॥ १ ॥
तथा जो चौथा अमृत है, मरुद्गण सोमकी प्रधानतासे उसके आश्रित जीवन धारण करते हैं। देवगण न तो खाते हैं और न पीते हैं, वे इस अमृतको देखकर ही तृप्त हो जाते हैं ॥ १ ॥
त एतदेव रूपमभिसंविशन्त्येतस्माद्रूपादुद्यन्ति ॥२॥
वे इस रूपको लक्षित करके ही उदासीन होते हैं और इसीसे उद्यमशील हो जाते हैं ॥ २ ॥
स य एतदेवममृतं वेद मरुतामेवैको भूत्वा सोमे-
नैव मुखेनैतदेवामृतं दृष्ट्वा तृप्यति स एतदेव रूप-
मभिसंविशत्येतस्माद्रूपादुदेति ॥ ३ ॥
वह, जो इस प्रकार इस अमृतको जानता है, मरुतोंमेंसे ही कोई एक होकर सोमकी प्रधानतासे ही इस अमृतको देखकर तृप्त हो जाता है। वह इस रूपसे ही उदासीन होता है और इस रूपसे ही उत्साहित होता है ॥ ३ ॥
खण्ड ९ ] शाङ्करभाष्यार्थ २११
स यावदादित्यः पश्चादुदेता पुरस्तादस्तमेता द्विस्ता-
वदुत्तरत उदेता दक्षिणतोऽस्तमेता मरुतामेव तावदाधि-
पत्यँस्वाराज्यं पर्येता ॥ ४ ॥
वह आदित्य जितने समयतक पश्चिमसे उदित होता और पूर्वमें अस्त होता है उससे दूने कालतक उत्तरसे उदित होता और दक्षिणमें अस्त होता रहता है । इतने कालतक वह मरुद्गणके ही आधिपत्य और स्वाराज्यको प्राप्त होता है ॥ ४ ॥
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि तृतीयाध्याये
नवमखण्डः सम्पूर्णः ॥ ९ ॥
दशम खण्ड
साध्योंके जीवनाश्रयभूत पञ्चम अमृतकी उपासना
अथ यत्पञ्चमममृतं तत्साध्या उपजीवन्ति ब्रह्मणा मुखेन न वै देवा अश्नन्ति न पिबन्त्येतदेवामृतं दृष्ट्वा तृप्यन्ति ॥ १ ॥
तथा जो पांचवां अमृत है, साध्यगण ब्रह्माकी प्रधानतासे उसके आश्रित जीवन धारण करते हैं। देवगण न तो खाते हैं और न पीते हैं, वे इस अमृतको देखकर ही तृप्त हो जाते हैं ॥ १ ॥
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य एतदेव रूपमभिसंविशन्त्येतस्माद्रूपादूद्यन्ति ॥२॥
वे इस रूपको लक्षित करके ही उदासीन होते हैं और इसीसे उद्यमशील हो जाते हैं ॥ २ ॥
—: ० :—
स य एतदेवममृतं वेद साध्यानामेवैको भूत्वा ब्रह्मणैव मुखेनैतदेवामृतं दृष्ट्वा तृप्यति स एतदेव रूपमभिसंविशत्येतस्माद्रूपादुदेति ॥ ३ ॥
वह, जो इस प्रकार इस अमृतको जानता है, साध्यगणमेंसे ही कोई एक होकर ब्रह्माकी ही प्रधानतासे इस अमृतको ही देखकर तृप्त हो जाता है। वह इस रूपको लक्ष्य करके ही उदासीन होता है और इस रूपसे ही उत्साहित हो जाता है ॥ ३ ॥
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खण्ड १० ] शाङ्करभाष्यार्थ २७१
स यावदादित्य उत्तरत उदेता दक्षिणतोऽस्तमेता द्विस्तावदूर्ध्व उदेतार्वाङस्तमेता साध्यानामेव तावदाधिपत्यँस्वाराज्यं पर्येता ॥ ४ ॥
वह आदित्य जबतक उत्तरसे उदित होता है और दक्षिणमें अस्त होता है उससे दूने समयतक ऊपरकी ओर उदित होता है और नीचेकी ओर अस्त होता है। इतने कालतक वह साध्योंके ही आधिपत्य और स्वाराज्यको प्राप्त होता है ॥ ४ ॥
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इतिच्छान्दोग्योपनिषदि तृतीयाध्याये
दशमखण्डः सम्पूर्णः ॥ १० ॥