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छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

२४० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय २

२४०छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय २

लो३ कद्वारमपावा३ र्णू ३३ पश्येम त्वा वयग्ँ-
स्वारा ३३३३३ हु३ म् आ ३३ ज्या ३ यो ३ आ
३२१११ इति ॥ १२ ॥ आदित्यमथ वैश्वदेवं लो-
३ कद्वारमपावा ३ र्णू ३३ पश्येम त्वा वयग्ँ साम्रा ३ ३
३३३ हु ३ म् आ ३३ ज्या ३ यो ३ आ ३२१११
इति ॥ १३ ॥

लोकका द्वार खोल दो, जिससे हम स्वाराज्यप्राप्तिके लिये तुम्हारा दर्शन कर सकें। यह आदित्यसम्बन्धी साम है; अब विश्वेदेवसम्बन्धी साम कहते हैं—लोकका द्वार खोल दो, जिससे हम साम्राज्यप्राप्तिके लिये तुम्हारा दर्शन कर सकें ॥ १२-१३ ॥

—: ० :—

अथ जुहोति नम आदित्येभ्यश्च विश्वेभ्यश्च देवेभ्यो दिविक्षिद्भ्यो लोकक्षिद्भ्यो लोकं मे यजमानाय विन्दत ॥ १४ ॥

तत्पश्चात् [ यजमान इस मन्त्रद्वारा ] हवन करता है—स्वर्गमें रहनेवाले द्युलोकनिवासी आदित्योंको और विश्वेदेवोंको नमस्कार है। मुझ यजमानको तुम पुण्यलोककी प्राप्ति कराओ ॥ १४ ॥

एष वै यजमानस्य लोक एतास्म्यत्र यजमानः परस्तादायुषः स्वाहापहत परिघमित्युक्त्वोत्तिष्ठति ॥१५॥

यह निश्चय ही यजमानका लोक है; मैं इसे प्राप्त करनेवाला हूँ। यहाँ यजमान 'आयु समाप्त होनेपर [मैं इसे प्राप्त करूँगा] स्वाहा'—ऐसा कहकर हवन करता है और 'लोकद्वारकी अर्गलाको दूर करो'—ऐसा कहकर उत्थान करता है ॥ १५ ॥

खण्ड २४ ] शाङ्करभाष्यार्थ २४१


| दिविक्षिद्भ्य इत्येवमादि समानमन्यत् । विन्दतापहतेति बहुवचनमात्रं विशेषः । याजमानं त्वेतत् । एतास्म्यत्र यजमान इत्यादिलिङ्गात् ॥ १४-१५ ॥ | ‘दिविक्षिद्भ्यः’ इत्यादि शेष सब अर्थ पहलेके ही समान है। ‘विन्दत, अपहत’ इन क्रियाओंमें बहुवचन होना ही पूर्वकी अपेक्षा विशेष है। ये मन्त्र यजमान-सम्बन्धी हैं, क्योंकि ‘मैं यजमान इस लोकको प्राप्त करनेवाला हूँ’ इत्यादि लिङ्गसे यह स्पष्ट होता है ॥ १४-१५ ॥ |

—:००:—

तस्मा आदित्याश्च विश्वे च देवास्तृतीयसवनँ सम्प्रयच्छन्त्येष ह वै यज्ञस्य मात्रां वेद य एवं वेद य एवं वेद ॥ १६ ॥

उस (यजमान) को आदित्य और विश्वेदेव तृतीय सवन प्रदान करते हैं। जो इस प्रकार जानता है, जो इस प्रकार जानता है वह निश्चय ही यज्ञकी मात्रा (यज्ञके यथार्थ स्वरूप) को जानता है ॥ १६ ॥

| एष ह वै यजमान एवंविद् यथोक्तस्य सामादेर्विद्वान्यज्ञस्य मात्रां यज्ञयाथात्म्यं वेद यथोक्तम्। य एवं वेद य एवं वेदेति द्विरुक्तिरध्यायपरिसमाप्त्यर्था ॥ १६ ॥ | एवंवित्—इस प्रकार पूर्वोक्त सामादिको जाननेवाला यह यजमान निश्चय ही यज्ञकी मात्रा—यज्ञके पूर्वोक्त यथार्थ स्वरूपको जानता है। ‘य एवं वेद य एवं वेद’ यह द्विरुक्ति अध्यायकी समाप्तिके लिये है ॥ १६ ॥ |

इतिच्छान्दोग्योपनिषदि द्वितीयाध्याये
चतुर्विंशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ २४ ॥

—: ० :—

इति श्रीगोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्यस्य परमहंसपरिव्राजकाचार्य-
श्रीमच्छंकरभगवतः कृतौ छान्दोग्यविवरणे
द्वितीयोऽध्यायः सम्पूर्णः ॥ २ ॥

—: ० :—

तृतीय अध्याय

तृतीय अध्याय

— : ० : —

प्रथम खण्ड

मधुविद्या

प्रकरण-सम्बन्धः (संस्कृत)हिन्दी-अनुवाद
ॐ असौ वा आदित्य इत्याद्यध्यायारम्भे सम्बन्धः। अतीतानन्तराध्यायान्त उक्तं यज्ञस्य मात्रां वेदेति यज्ञविषयाणि च सामहोममन्त्रोत्थानानि विशिष्टफलप्राप्तये यज्ञाङ्गभूतान्युपदिष्टानि । सर्वयज्ञानां च कार्यनिर्वृत्तिरूपः सविता महत्या श्रिया दीप्यते । स एष सर्वप्राणिकर्मफलभूतः प्रत्यक्षं सर्वैरुपजीव्यते । अतो यज्ञव्यपदेशानन्तरं तत्कार्यभूतसवितृविषयमुपासनं सर्वपुरुषा-'ॐ असौ वा आदित्यः' इत्यादि अध्यायके आरम्भमें पूर्वोत्तर ग्रन्थका सम्बन्ध [ बतलाया जाता है ]। अव्यवहितपूर्व अध्यायके अन्तमें यह बतलाया गया है कि 'वह यज्ञके यथार्थ स्वरूपको जान जाता है। तथा उसी अध्यायमें विशिष्ट फलकी प्राप्तिके लिये यज्ञके अङ्गभूत यज्ञ-सम्बन्धी साम, होम, मन्त्र और उत्थानोंका भी उपदेश किया गया है। [ इनके द्वारा ] सम्पूर्ण यज्ञोंका कार्यनिष्पत्तिरूप [ अर्थात् सम्पूर्ण यज्ञसाधनोंका फलस्वरूप ] सूर्य महती श्रीसे दीप्त हो जाता है। वह यह सूर्यदेव सम्पूर्ण प्राणियोंके कर्मोंका फलस्वरूप है; अतः समस्त जीव प्रत्यक्ष ही इसके आश्रयसे जीवन धारण करते हैं। अतः अब यज्ञका निरूपण करनेके पश्चात् मैं उसके फलस्वरूप सूर्यकी उपासना-

खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ २४३


र्थेभ्यः श्रेष्ठतमफलं विधास्यामी-<br><br>त्येवमारभते श्रुतिः—का, जो सम्पूर्ण पुरुषार्थोंसे श्रेष्ठतम फलवाली है, विधान करूँगी—इस उद्देश्यसे श्रुति आरम्भ करती है—

आदित्यादिमें मधु आदि-दृष्टि

ॐ असौ वा आदित्यो देवमधु तस्य द्यौरेव तिरश्चीनवँशोऽन्तरिक्षमपूपो मरीचयः पुत्राः ॥ १ ॥

ॐ यह आदित्य निश्चय ही देवताओंका मधु है। द्युलोक ही उसका तिरछा बाँस है [ जिसपर कि वह लटका हुआ है ], अन्तरिक्ष छत्ता है और किरणें [ उसमें रहनेवाले ] मक्खियोंके बच्चे हैं ॥ १ ॥

| असौ वा आदित्यो देवम-<br><br>ध्वित्यादि । देवानां मोदना-<br><br>न्मध्विव मध्वसावादित्यः ।<br><br>वस्वादीनां च मोदनहेतुत्वं वक्ष्यति सर्वयज्ञफलरूपत्वादादि-<br><br>त्यस्य । | ‘असौ वा आदित्यो देवमधु’ इत्यादि। देवताओंको प्रसन्न करने-वाला होनेसे वह आदित्य मधुके समान मानो मधु है। वसु आदिको प्रसन्न करनेमें उसकी हेतुताका श्रुति आगे ( ३।६।१ में ) प्रतिपादन करेगी, क्योंकि वह आदित्य सम्पूर्ण यज्ञोंका फलरूप है। | | कथं मधुत्वम् ? इत्याह—तस्य<br><br>मधुनो द्यौरेव भ्रामरस्येव मधु-<br><br>नस्तिरश्चीनश्चासौ वंशश्चेति तिर-<br><br>श्चीनवंशः। तिर्यग्गतेव हि द्यौर्ल-<br><br>क्ष्यते । अन्तरिक्षं च मध्वपूपो | इसका मधुत्व किस प्रकार है ! यह श्रुति बतलाती है—मधुकरके मधुके समान इस मधुका द्युलोक ही तिरछा बाँस है। जो तिरश्चीन (तिरछा) हो और वंश ( बाँस ) हो उसे तिरश्चीनवंश (तिरछा बाँस) कहते हैं; क्योंकि द्युलोक तिरछा ही दिखायी देता है। तथा अन्तरिक्ष मधुका छत्ता है, वह द्युलोकरूप बाँसमें लगकर |

२४४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ३

२४४छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ३

| द्युवंशे लग्नः सँल्लम्बत इवातो मध्वपूपसामान्यादन्तरिक्षं मध्वपूपो मधुनः सवितुराश्रयत्वाच्च।<br><br>मरीचयो रश्मयो रश्मिस्था आपो भौमाः सवित्राकृष्टाः “एता वा आपः स्वराजो यन्मरीचयः” इति हि विज्ञायन्ते। ता अन्तरिक्षमध्वपूपस्थरश्म्यन्तर्गतत्वाद भ्रमरबीजभूताः पुत्रा इव हिता लक्ष्यन्त इति पुत्रा इव पुत्रा मध्वपूपनाड्यन्तर्गता हि भ्रमरपुत्राः ॥ १ ॥ | मानो लटकता है, अतः मधुके छत्तेके समान होनेके कारण तथा मधुरूप सूर्यका आश्रय होनेसे भी अन्तरिक्ष-लोक ही मधुका छत्ता है।<br><br>मरीचि—किरणें अर्थात् सूर्यद्वारा खींचा हुआ उसकी किरणोंमें स्थित पार्थिव जल—जिसका कि “स्वराट् (स्वयं प्रकाश सूर्य) की जो किरणें हैं वे निश्चय ही जल हैं” इस श्रुतिद्वारा ज्ञान होता है, वह अन्तरिक्षरूप शहदके छत्तेमें स्थित किरणोंके अन्तर्गत होनेके कारण मधुकरोंके बीजभूत पुत्रों (मधुमक्खियोंके बच्चों) के समान उनमें निहित दिखायी देता है। अतः वह सूर्यरश्मिस्थ जल भ्रमरपुत्रोंके समान पुत्ररूप है, क्योंकि छत्तेके छिद्रोंमें ही भ्रमरपुत्र रहा करते हैं ॥ १ ॥ |


आदित्यकी पूर्वदिक्सम्बन्धिनी किरणोंमें मधुनाड्यादि-दृष्टि

तस्य ये प्राञ्चो रश्मयस्ता एवास्य प्राच्यो मधुनाड्यः। ऋच एव मधुकृत ऋग्वेद एव पुष्पं ता अमृता आपस्ता वा एता ऋचः॥ २ ॥ एतमृग्वेदम्-अभ्यतपँस्तस्याभितप्तस्य यशस्तेज इन्द्रियं वीर्यमन्ना-द्यँरसोऽजायत ॥ ३ ॥

खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ २४५


उस आदित्यकी जो पूर्वदिशाकी किरणें हैं, वे ही इस (अन्तरिक्ष-रूप छत्ते) के पूर्वदिशावर्ती छिद्र हैं। ऋक् ही मधुकर हैं, ऋग्वेद ही पुष्प हैं, वे सोम आदि अमृत ही जल हैं। उन इन ऋक् [रूप मधुकरों] ने ही इस ऋग्वेदका अभिताप किया। उस अभितप्त ऋग्वेदसे यश, तेज, इन्द्रिय, वीर्य और अन्नाद्यरूप रस उत्पन्न हुआ ॥ २-३ ॥

| तस्य सवितुर्मध्वाश्रयस्य मधुनो ये प्राञ्चः प्राच्यां दिशि-गता रश्मयस्ता एवास्य प्राच्यः प्रागञ्चनान्मधुनो नाड्यो मधु-नाड्य इव मध्वाधारच्छिद्रा-णीत्यर्थः । <br><br> तत्र ऋच एव मधुकृतो लोहितरूपं सवित्राश्रयं मधु कुर्वन्तीति मधुकृतो भ्रमरा इव । यतो रसानादाय मधु कुर्वन्ति तत्पुष्पमिव पुष्पमृ-ग्वेद एव । <br><br> तत्र ऋग्ब्राह्मणसमुदायस्यर्त्वे-दाख्यत्वाच्छब्दमात्राच्च भोग्य-रूपरसनिस्त्रावासंभवादृग्वेदशब्दे-नात्र ऋग्वेदविहितं कर्म । ततो हि कर्मफलभूतमधुरसनिस्त्राव-संभवात् । मधुकरैरिव पुष्प- | मधुके आश्रयभूत उस सूर्यरूप मधुकी जो पूर्वदिशागत किरणें हैं वे ही पूर्वकी ओर जानेके कारण इसकी पूर्व मधुनाडियाँ हैं। मधुकी नाडियोंके समान मधुनाडियाँ हैं अर्थात् वे मधुके आधारभूत छिद्र हैं। <br><br> तहाँ ऋचाएँ ही मधुकर हैं, वे सूर्यमें रहनेवाला लोहितरूप मधु उत्पन्न करती हैं, अतः भ्रमरोंके समान वे ही मधुकर हैं। जिससे रसोंको ग्रहण करके वे मधु करती हैं वह ऋग्वेद ही पुष्पके समान पुष्प है। <br><br> किंतु यहाँ ऋग्ब्राह्मणसमुदायका ही नाम ऋग्वेद है और केवल शब्द-से ही भोग्यरूप रसका निकलना असम्भव है; अतः 'ऋग्वेद' शब्दसे यहाँ ऋग्वेदविहित कर्म अभिप्रेत है, क्योंकि उसीसे कर्मफलभूत मधुरूप रसका निकलना सम्भव है। मधुकरोंके समान उस पुष्प |

२४६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ३

२४६छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ३
संस्कृत-भाष्यहिन्दी-अनुवाद
स्थानीयादृग्वेदविहितात्कर्मण अप आदाय ऋग्भिर्मधु निर्वर्त्यते।स्थानीय ऋग्वेदविहित कर्मसे ही रस ग्रहण करके ऋचाओंद्वारा मधु तैयार किया जाता है।
कास्ता आपः ? इत्याह—ताः कर्मणि प्रयुक्ताः सोमाज्यपयोरूपा अग्नौ प्रक्षिप्तास्तत्पाकाभिनिर्वृत्ता अमृता अमृतार्थत्वादत्यन्तरसवत्य आपो भवन्ति। तद्रसानादाय ता वा एता ऋचः पुष्पेभ्यो रसमाददाना इव भ्रमरा ऋचः एतमृग्वेद-मृग्वेदविहितं कर्म पुष्पस्थानीयम् अभ्यतपन्नभितापं कृतवत्य इवैता ऋचः कर्मणि प्रयुक्ताः।वे रस क्या हैं ? सो श्रुति बतलाती है—वे कर्मोंमें प्रयुक्त अर्थात् अग्निमें डाले हुए सोम, घृत एवं दुग्धरूप रस अग्निपाकसे निष्पन्न हुए अमृत होते हैं अर्थात् अमृतत्व ( मोक्ष ) के हेतु होनेके कारण वे [ अमृतसंज्ञक ] जल अत्यन्त रसमय होते हैं। उन रसोंको ही ग्रहण करके इन ऋचाओंने—पुष्पोंसे रस ग्रहण करनेवाले भ्रमरोंके समान इन ऋचाओंने इस ऋग्वेदको—पुष्पस्थानीय ऋग्वेदविहित कर्मको अभितप्त किया अर्थात् कर्ममें प्रयुक्त हुई इन ऋचाओंने मानो उनका अभिताप किया।
ऋग्भिर्हि मन्त्रैः शस्त्राद्यङ्गभावमुपगतैः क्रियमाणं कर्म मधुनिर्वर्तकं रसं मुञ्चतीत्युपपद्यते पुष्पाणीव भ्रमरैराचूष्यमाणानि। तदेतदाह—तस्यग्वेदस्याभितप्तस्य, कोऽसौ रसः? यशस्त्रादि यज्ञाङ्गभावको प्राप्त हुए ऋगादि मन्त्रोंद्वारा ही किया हुआ कर्म भ्रमरोंसे चूसे जाते हुए पुष्पोंके समान मधु बनानेवाला रस छोड़ता है—यह कथन ठीक ही है। इसी बातको यह श्रुति बतलाती है—उस अभितप्त ऋग्वेदका वह कौन-सा रस

खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ २४७


| ऋङ्मधुकराभितापनिःसृत इत्युच्यते ।<br><br>यशो विश्रुतत्वं तेजो देहगता दीप्तिरिन्द्रियं सामर्थ्योपेतैरिन्द्रियैरवैकल्यं वीर्यं सामर्थ्यं बलमित्यर्थः, अन्नाद्यमन्नं च तदाद्यं च येनोपयुज्यमानेनाहन्यहनि देवानां स्थितिः स्यात्तदन्नाद्यमेष रसोऽजायत यागादिलक्षणात् कर्मणः ॥ २-३ ॥ | है ? जो ऋग्रूप मधुकरके अभितापसे निकला हुआ है—ऐसा कहा जाता है ।<br><br>उस यागादिरूप कर्मसे यश—विख्याति, तेज—देहगत दीप्ति, इन्द्रिय—सामर्थ्ययुक्त इन्द्रियोंके कारण—अविकलता, वीर्य—सामर्थ्य यानी बल और अन्नाद्य—जो अन्न हो और खाद्य (भक्ष्य) भी हो, जिसका प्रतिदिन उपयोग किये जानेपर देवताओंकी स्थिति हो उसे अन्नाद्य कहते हैं—ऐसा रस उत्पन्न हुआ ॥ २-३ ॥ |

—: ० :—

तद्व्यक्षरत्तदादित्यमभितोऽश्रयत्तद्वा एतद्यदेतदादित्यस्य रोहितꣳरूपम् ॥ ४ ॥

वह (यश आदि रस) विशेषरूपसे गया। उसने [जाकर] आदित्यके [पूर्व] भागमें आश्रय लिया। यह जो आदित्यका रोहित (लाल) रूप है वही यह (रस) है ॥ ४ ॥

| यशआद्यन्नाद्यपर्यन्तं तद्व्यक्षरद्विशेषेणाक्षरद्गमत् । गत्वा च तदादित्यमभितः पार्श्वतः पूर्वभागं सवितुरश्रयदाश्रितवदित्यर्थः । अमुष्मिन्नादित्ये संचितं | यशसे लेकर अन्नाद्यपर्यन्त वह रस ‘व्यक्षरत्’ विशेषरूपसे गया। उसने जाकर सूर्यको पार्श्वतः सूर्यके पूर्वभागको आश्रित किया, ऐसा इसका तात्पर्य है । हम इस आदित्यमें संचित हुए कर्मफलसंज्ञक |

२४८ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ३

२४८छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ३

| कर्मफलाख्यं मधु भोक्ष्यामह इत्येवं हि यशआदिलक्षणफलप्राप्तये कर्माणि क्रियन्ते मनुष्यैः केदारनिष्पादनमिव कर्षकैः । तत्प्रत्यक्षं प्रदर्श्यते श्रद्धाहेतोस्तद्वा एतत् । किं तत् ? यदेतदादित्यस्योद्यतो दृश्यते रोहितं रूपम् ॥ ४ ॥ | मधुको भोगेंगे—इस प्रकार यश आदिरूप फलकी प्राप्तिके लिये मनुष्योंद्वारा कर्म किये जाते हैं, जैसे कि कृषकलोग-[धान्यादिकी प्राप्तिके लिये] क्यारियाँ बनाते हैं। श्रद्धाकी उत्पत्तिके लिये अब उसे प्रत्यक्ष प्रदर्शित किया जाता है—वह निश्चय यह है। वह क्या है ? यह जो उदित होते हुए सूर्यका रोहित (लाल) रूप देखा जाता है ॥ ४ ॥ |


इतिच्छान्दोग्योपनिषदि तृतीयाध्याये
प्रथमखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ १ ॥

द्वितीय खण्ड

—: ० :—

आदित्यकी दक्षिणदिक्सम्बन्धिनी किरणोंमें मधुनाड्यादि-दृष्टि

अथ येऽस्य दक्षिणा रश्मयस्ता एवास्य दक्षिणा मधुनाड्यो यजूंष्येव मधुकृतो यजुर्वेद एव पुष्पं ता अमृता आपः ॥ १ ॥

तथा इसकी जो दक्षिण दिशाकी किरणें हैं वे ही इसकी दक्षिण-दिशावर्तिनी मधुनाडियाँ हैं, यजुःश्रुतियाँ ही मधुकर हैं, यजुर्वेद ही पुष्प है तथा वह [सोमादिरूप] अमृत ही आप है ॥ १ ॥

| अथ येऽस्य दक्षिणा रश्मय इत्यादि समानम् । यजूंष्येव मधुकृतो यजुर्वेदविहिते कर्मणि प्रयुक्तानि । पूर्ववन्मधुकृत इव । यजुर्वेदविहितं कर्म पुष्पस्थानीयं पुष्पमित्युच्यते । ता एव सोमाद्या अमृता आपः ॥ १ ॥ | 'अथ येऽस्य दक्षिणा रश्मयः' इत्यादि श्रुतिका अर्थ पूर्ववत है । यजुःश्रुतियाँ ही मधुकर हैं अर्थात् यजुर्वेदविहित कर्मोंमें प्रयुक्त यजुर्मन्त्र ही पूर्ववत् मधुकरोंके समान हैं । यजुर्वेदविहित कर्म ही पुष्पस्थानीय होनेके कारण 'पुष्प है' ऐसा कहा जाता है। तथा वे सोम आदि अमृत ही आप हैं ॥ १ ॥ |

—: ० :—

तानि वा एतानि यजूंष्येतं यजुर्वेदमभ्यतपँस्तस्याभितप्तस्य यशस्तेज इन्द्रियं वीर्यमन्नाद्यँरसोऽजा-

२५० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ३

२५०छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ३

यत ॥ २ ॥ तद्व्यक्षरंत्तदादित्यमभितोऽश्रयत्तद्वा एतद्यदेतदादित्यस्य शुक्लं रूपम् ॥ ३ ॥

उन इन यजुःश्रुतियोंने इस यजुर्वेदका अभिताप किया । उस अभितप्त यजुर्वेदसे यश, तेज, इन्द्रिय, वीर्य और अन्नाद्यरूप रस उत्पन्न हुआ । उस रसने विशेषरूपसे गमन किया और आदित्यके निकट [ दक्षिण ] भागमें आश्रय लिया । यह जो आदित्यका शुक्ल रूप है वह वही है ॥ २-३ ॥

| तानि वा एतानि यजूंष्येतं यजुर्वेदमभ्यतपन्नित्येवमादि सर्वं समानम् । मध्वेतदादित्यस्य दृश्यते शुक्लं रूपम् ॥ २-३ ॥ | उन यजुःश्रुतियोंने ही इस यजुर्वेदको अभितप्त किया—इत्यादि प्रकारसे यह सब अर्थ पूर्ववत है । यह जो आदित्यका शुक्लरूप दिखायी देता है मधु है ॥ २-३ ॥ |

—: ० :—

इतिच्छान्दोग्योपनिषदि तृतीयाध्याये द्वितीयखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ २ ॥

तृतीय खण्ड

—: ✤ :—

आदित्यकी पश्चिमदिक्सम्बन्धिनी किरणोंमें मधुनाड्यादि-दृष्टि

अथ येऽस्य प्रत्यञ्चो रश्मयस्ता एवास्य प्रतीच्यो मधुनाड्यः सामान्‍येव मधुकृतः सामवेद एव पुष्पं ता अमृता आपः ॥ १ ॥

तथा ये जो इसकी पश्चिम ओरकी रश्मियाँ हैं वे ही इसकी पश्चिमीय मधुनाडियाँ हैं। सामश्रुतियाँ ही मधुकर हैं, सामवेदविहित कर्म ही पुष्प है तथा वह [ सोमादिरूप ] अमृत ही आप.है ॥ १ ॥

तानि वा एतानि सामान्‍येतग्ँसामवेदमभ्यतपग्ँस्तस्याभितप्तस्य यशस्तेज इन्द्रियं वीर्यमन्नाद्यग्ँरसोऽजायत ॥ २ ॥

उन इन सामश्रुतियोंने ही इस सामवेदविहित कर्मका अभिताप किया। उस अभितप्त सामवेदसे ही यश, तेज, इन्द्रिय, वीर्य और अन्नाद्यरूप रस उत्पन्न हुआ ॥ २ ॥

तद्व्यक्षरत्तदादित्यमभितोऽश्रयत्तद्वा एतद्यदेतदादित्यस्य कृष्णग्ँरूपम् ॥ ३ ॥

उस रसने विशेषरूपसे गमन किया और आदित्यके समीप [पश्चिम] भागमें आश्रय लिया। यह जो आदित्यका कृष्ण तेज है यह वही है ॥ ३ ॥

| अथ येऽस्य प्रत्यञ्चो रश्मय इत्यादि समानम्। तथा साम्नां मधु एतदादित्यस्य कृष्णं रूपम् ॥ १–३ ॥ | ‘अथ येऽस्य प्रत्यञ्चो रश्मयः’इत्यादि श्रुतियोंका अर्थ पूर्ववत है। तथा सामश्रुतियोंका जो मधु है वही यह आदित्यका कृष्ण तेज है ॥१-३॥ |

इतिच्छान्दोग्योपनिषदि तृतीयाध्याये
तृतीयखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ ३ ॥

चतुर्थ खण्ड

—: ० :—

आदित्यकी उत्तरदिक्सम्बन्धिनी किरणोंमें मधुनाड्यादि-दृष्टि

अथ येऽस्योदञ्चो रश्मयस्ता एवास्योदीच्यो मधुनाड्योऽथर्वाङ्गिरस एव मधुकृत इतिहासपुराणं पुष्पं ता अमृता आपः ॥ १ ॥

तथा इसकी जो उत्तर दिशाकी किरणें हैं वे ही इसकी उत्तरदिशाकी मधुनाडियाँ हैं। अथर्वाङ्गिरस श्रुतियाँ ही मधुकर हैं, इतिहास-पुराण ही पुष्प हैं तथा वह [ सोमादिरूप ] अमृत ही आप है ॥ १ ॥

ते वा एतेऽथर्वाङ्गिरस एतदितिहासपुराणमभ्यतपंस्तस्याभितप्तस्य यशस्तेज इन्द्रियं वीर्यमन्नाद्यꣳरसोऽजायत ॥ २ ॥

उन इन अथर्वाङ्गिरस श्रुतियोंने ही इस इतिहास-पुराणको अभितप्त किया। उस अभितप्त हुए [ इतिहास-पुराणरूप पुष्प ] से ही यश, तेज, इन्द्रिय, वीर्य और अन्नाद्यरूप रसकी उत्पत्ति हुई ॥ २ ॥

तद्व्यक्षरत्तदादित्यमभितोऽश्रयत्तद्वा एतद्यदेतदादित्यस्य परं कृष्णꣳरूपम् ॥ ३ ॥

उस रसने विशेषरूपसे गमन किया और आदित्यके निकट [ उत्तर ] भागमें आश्रय लिया। यह जो आदित्यका अत्यन्त कृष्ण रूप है यह वही है ॥ ३ ॥

खण्ड ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ २५३


| अथ येऽस्योदञ्चो रश्मय इत्यादि समानम् । अथर्वाङ्गिरसोऽथर्वाङ्गिरसा च दृष्टा मन्त्रा अथर्वाङ्गिरसः कर्माणि प्रयुक्ता मधुकृतः । इतिहासपुराणं पुष्पम् । तयोश्चेतिहासपुराणयोरश्वमेधे पारिप्लवासु रात्रिषु कर्माङ्गत्वेन विनियोगः सिद्धः । मध्वेवेदादित्यस्य परं कृष्णं रूपमतिशयेन कृष्णमित्यर्थः ॥ १-३ ॥ | ‘अथ येऽस्योदञ्चो रश्मयः’ इत्यादि मन्त्रोंका अर्थ पूर्ववत् है । अथर्वाङ्गिरसः—अथर्वा और अङ्गिरा ऋषियोंके प्रत्यक्ष किये हुए मन्त्र अथर्वाङ्गिरस कहलाते हैं; कर्ममें प्रयुक्त हुए वे ही मन्त्र मधुकर हैं। इतिहास-पुराण ही पुष्प हैं। उन इतिहास और पुराणोंका अश्वमेध यज्ञमें पारिप्लवा रात्रियोंमें* कर्माङ्गरूपसे विनियोग प्रसिद्ध ही है। इस आदित्यका जो परम कृष्ण अर्थात् अतिशय कृष्ण रूप है वही मधु है ॥ १-३ ॥ |

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—: ० :—

इतिच्छान्दोग्योपनिषदि तृतीयाध्याये चतुर्थखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ ४ ॥

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* अश्वमेधयज्ञ बहुत दिनोंमें समाप्त होता है। उसके अनुष्ठानमें चुपचाप बैठे-बैठे यज्ञकर्ताओंको आलस्य आने लगता है। उसकी निवृत्तिके लिये श्रुतिने रात्रिके समय इतिहास-पुराणादिश्रवणका विधान किया है। विविध उपाख्यानादिके समुदायका नाम ‘पारिप्लव’ है; जिन रात्रियोंमें उनके श्रवणका विधान है वे ‘पारिप्लवा रात्रियाँ’ कहलाती हैं।

पञ्चम

आदित्यकी ऊर्ध्वदिक्सम्बन्धिनी किरणोंमें मधुनाड्यादि-दृष्टि

अथ येऽस्योध्र्वा रश्मयस्ता एवास्योर्ध्वा मधुनाड्यो गुह्या एवादेशा मधुकृतो ब्रह्मैव पुष्पं ता अमृता आपः ॥ १ ॥

तथा इसकी जो ऊर्ध्वरश्मियाँ हैं वे ही इसकी ऊपरकी ओरकी मधुनाडियाँ हैं। गुह्य आदेश ही मधुकर हैं; [ प्रणवरूप ] ब्रह्म ही पुष्प है तथा वह [ सोमादिरूप ] अमृत ही आप है ॥ १ ॥

ते वा एते गुह्या आदेशा एतद्ब्रह्माभ्यतपंस्तस्याभि-तप्तस्य यशस्तेज इन्द्रियं वीर्यमन्नाद्यꣳरसोऽजायत ॥ २ ॥

उन इन गुह्य आदेशोंने ही इस [ प्रणवसंज्ञक ] ब्रह्मको अभितप्त किया। उस अभितप्त ब्रह्मसे ही यश, तेज, इन्द्रिय, वीर्य और अन्नाद्यरूप रस उत्पन्न हुआ ॥ २ ॥

तद्व्यक्षरत्तदादित्यमभितोऽश्रयत्तद्वा एतद्यदेतदा-दित्यस्य मध्ये क्षोभत इव ॥ ३ ॥

उस रसने विशेषरूपसे गमन किया और वह आदित्यके निकट [ ऊर्ध्व ] भागमें आश्रित हुआ। यह जो आदित्यके मध्यमें क्षुब्ध-सा होता है यही वह (मधु) है ॥ ३ ॥

| अथ येऽस्योध्र्वा रश्मय इत्यादि पूर्ववत् । गुह्या गोप्य रहस्या एवादेशा लोकद्वारीयादिविधय | 'अथ येऽस्योध्र्वा रश्मयः' इत्यादि मन्त्रोंका अर्थ पूर्ववत् है। गुह्य—गोपनीय अर्थात् रहस्यभूत जो आदेश हैं यानी जो लोकद्वारीयादि* |


* 'लोकद्वारमपावृणु पश्येम त्वा वयम्' (लोकका द्वार खोल दे; जिससे हम तुझे देखें) इत्यादि ही 'लोकद्वारीयादि विधियाँ' हैं।

खण्ड ५] शाङ्करभाष्यार्थ ३५५

उपासनानि च कर्माङ्गविषयाणि मधुकृतः । ब्रह्मैव शब्दाधिकारात् प्रणवाख्यं पुष्पं समानमन्यत् । मध्वेतदादित्यस्य मध्ये क्षोभत इव समाहितदृष्टैर्दृश्यते सञ्चलतीव ॥ १-३ ॥विधियाँ और कर्माङ्गसम्बन्धिनी उपासनाएँ हैं वे ही मधुकर हैं। ब्रह्म शब्दका अधिकार होनेसे प्रणवसंज्ञक ब्रह्म ही पुष्प है। शेष अर्थ पूर्ववत् है। समाहितदृष्टि पुरुषको इस आदित्यके मध्यमें जो क्षुभित अर्थात् संचलित-सा होता दिखायी देता है वही मधु है॥१-३॥
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ते वा एते रसानाꣳरसा वेदा हि रसास्तेषामेते रसास्तानि वा एतान्यमृतानाममृतानि वेदा ह्यमृतास्तेषामेतान्यमृतानि ॥ ४ ॥

वे ये [ पूर्वोक्त लोहितादि रूप ] ही रसोंके रस हैं, वेद ही रस हैं और ये उनके भी रस हैं। वे ही ये अमृतोंके अमृत हैं—वेद ही अमृत हैं और ये उनके भी अमृत हैं ॥ ४ ॥

ते वा एते यथोक्ता रोहितादिरूपविशेषा रसानां रसाः । केषां रसानाम् ? इत्याह—वेदा हि यस्माल्लोकनिष्यन्दत्वात्सारा इति रसास्तेषां रसानां कर्मभावमापन्नानामप्येते रोहितादिविशेषा रसा अत्यन्तसारभूता इत्यर्थः ।वे ये पूर्वोक्त रोहितादि रूप विशेष ही रसोंके रस हैं। किन रसोंके रस हैं ? ऐसा प्रश्न होनेपर श्रुति कहती है—क्योंकि लोकोंके सारभूत होनेके कारण वेद ही सार अर्थात् रस हैं और कर्मभावको प्राप्त हुए उन रसोंके भी वे रोहितादि रूप-विशेष रस यानी अत्यन्त सारभूत हैं।

२५६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ३

२५६छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ३

| तथामृतानाममृतानि वेदा ह्यमृताः नित्यत्वात्, तेषामेतानि रोहितादीनि रूपाण्यमृतानि । रसानां रसा इत्यादि कर्मस्तुतिरेषा—यस्यैवंविशिष्टान्यमृतानि फलमिति ॥ ४ ॥ | तथा ये अमृर्तोंके भी अमृत हैं, क्योंकि वेद ही नित्य होनेके कारण अमृत हैं, उनके भी ये रोहितादि रूप अमृत हैं । 'रसानां रसाः' (रसोंके रस) इत्यादि वाक्य कर्मकी स्तुति है; अर्थात् इस वाक्यका ऐसा तात्पर्य है कि जिस रसरूप कर्मके ऐसे अमृतरूप फल हैं [उसके माहात्म्यका कहाँतक वर्णन किया जाय ?] ॥ ४ ॥ |

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इतिच्छान्दोग्योपनिषदि तृतीयाध्याये पञ्चमखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ ५ ॥

षष्ठ खण्ड

वसुओंके जीवनाश्रयभूत प्रथम अमृतकी उपासना

तद्यत्प्रथमममृतं तद्वसव उपजीवन्त्यग्निना मुखेन न वै देवा अश्नन्ति न पिबन्त्येतदेवामृतं दृष्ट्वा तृप्यन्ति ॥ १॥

इनमें जो पहला अमृत है, उससे वसुगण अग्निप्रधान होकर जीवन धारण करते हैं। देवगण न तो खाते हैं और न पीते ही हैं, वे इस अमृतको देखकर ही तृप्त हो जाते हैं ॥ १ ॥

संस्कृत भाष्यहिन्दी अनुवाद
तत्तत्र यत्प्रथमममृतं रोहितरूपलक्षणं तद्वसवः प्रातःसवनेशाना उपजीवन्त्यग्निना मुखेनाग्निना प्रधानभूतेनाग्निप्रधानाः सन्त उपजीवन्तीत्यर्थः। अन्नाद्यं रसोऽजायतेतिवचनात्कवलग्राहमश्नन्तीति प्राप्तम्, तत्प्रतिषिध्यते न वै देवा अश्नन्ति न पिबन्तीति। <br><br> कथं तर्ह्युपजीवन्ति ? इत्युच्यते— <br><br> एतदेव हि यथोक्तममृतं रोहितं रूपं दृष्ट्वोपलभ्य सर्वकरणैरनुभूयवहाँ इनमें जो रोहितरूपवाला पहला अमृत है उसके उपजीवी प्रातःसवनाधिकारी वसुगण हैं। वे अग्निमुखसे—प्रधानभूत अग्निसे अर्थात् अग्निप्रधान होकर इसके उपजीवी होते हैं। 'अन्नाद्यरूप रस उत्पन्न हुआ' इस वाक्यसे सिद्ध होता है कि वे उसे एक-एक ग्रास लेकर खाते हैं। इसीका 'देवगण न तो खाते हैं और न पीते ही हैं'—इस वाक्यद्वारा प्रतिषेध किया जाता है। <br><br> तो फिर वे किस प्रकार उसके उपजीवी होते हैं ? ऐसा प्रश्न होने-पर कहा जाता है—वे इस उपर्युक्त अमृत अर्थात् रोहितरूपको देखकर—उपलब्ध कर यानी समस्त इन्द्रियों-से इसका अनुभव कर तृप्त हो जाते

२५८ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ३

२५८छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ३

| तृप्यन्ति, दृशेः सर्वकरणद्वारोपलब्ध्यर्थत्वात् । | हैं, क्योंकि 'दृश्' धातु समस्त इन्द्रियोंद्वारा उपलब्धि (ज्ञान) होनेके अर्थमें प्रयुक्त होनेवाला है। | | ननु रोहितं रूपं दृष्ट्वेत्युक्तम्, कथमन्येन्द्रियविषयत्वं रूपस्येति? | किंतु यहाँ तो कहा गया है कि रोहितरूपको देखकर [अर्थात् सम्पूर्ण इन्द्रियोंसे उसका अनुभव कर<sup></sup>] फिर रूप अन्य इन्द्रियोंका विषय कैसे हो सकता है? | | न; यशआदीनां श्रोत्रादिगम्यत्वात् । श्रोत्रग्राह्यं यशः। तेजोरूपं चाक्षुषम् । इन्द्रियं विषयग्रहणकार्यानुमेयं करणसामर्थ्यम्। | [इसपर कहते हैं—] ऐसी बात नहीं है, क्योंकि श्रोत्रादि अन्य इन्द्रियोंके विषय तो यश आदि हैं। यश श्रोत्रग्राह्य है, चक्षु इन्द्रियका विषय तेजोरूप है। विषयग्रहणरूप कार्यसे अनुमित होनेवाले करणोंके सामर्थ्यका नाम 'इन्द्रिय' है, | | वीर्यं बलं देहगत उत्साहः प्राणवत्ता अन्नाद्यं प्रत्यहमुपजीव्यमानं शरीरस्थितिकरं यद्भवति । | 'वीर्य' का अर्थ है बल-देहगत उत्साह यानी प्राणवत्ता। तथा 'अन्नाद्य' जिसके आश्रित होकर प्राणादि प्रतिदिन जीवित रहते हैं और जो शरीरकी स्थिति करनेवाला है, वह है। | | रसो ह्येवमात्मकः सर्वः। यं दृष्ट्वा तृप्यन्ति सर्वे । देवा दृष्ट्वा तृप्यन्तीत्येतत्सर्वं स्वकरणैरनुभूय तृप्यन्तीत्यर्थः। आदित्यसंश्रयाः सन्तो वैगन्ध्यादिदेहकरणदोषरहिताश्च ॥ १ ॥ | इस प्रकार यह सब कुछ रस है, जिसे देखकर सब देवता तृप्त होते हैं। 'देवगण देखकर तृप्त होते हैं—' इसका आशय यह है कि इन सबका अपनी इन्द्रियोंसे अनुभव करके वे तृप्त हो जाते हैं। तथा आदित्यके आश्रित होनेसे वे दुर्गन्ध आदि देह और इन्द्रियोंके दोषोंसे रहित भी हैं ॥ १ ॥ |


१. क्योंकि भाष्यमें 'दृश्' धातुका ऐसा ही अर्थ कहा गया है।

खण्ड ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ २५९


किं ते निरुद्यमा अमृतमुपजीवन्ति ? न; कथं तर्हि ?तो क्या वे उद्यमहीन रहकर ही इस अमृतके उपजीवी होते हैं ? नहीं, तो फिर किस प्रकार होते हैं ?—

त एतदेव रूपमभिसंविशन्त्येतस्माद्रूपादुद्यन्ति ॥२॥

वे देवगण इस रूपको लक्षित करके ही उदासीन हो जाते हैं और फिर इसीसे उत्साहित होते हैं ॥ २ ॥

एतदेव रूपमभिलक्ष्याधुना भोगावसरो नास्माकमिति बुद्ध्वा भिसंविशन्त्युदासते । यदा वै तस्यामृतस्य भोगावसरो भवेत्तदैतस्मादमृतभोगनिमित्तमित्यर्थः । एतस्माद्रूपादुद्यन्त्युत्साहवन्तो भवन्तीत्यर्थः । न ह्यनुत्साहवतामननुतिष्ठतामलसानां भोगप्राप्तिर्लोके दृष्टा ॥ २ ॥इस रूपको ही लक्षित कर अर्थात् अभी हमारे भोगका अवसर नहीं है-ऐसा जानकर वे उदासीन हो जाते हैं । और जब उस अमृतके भोगका अवसर उपस्थित होता है तब इस अमृतसे अर्थात् इस अमृतके भोगके लिये इस रूपसे ही उत्साहयुक्त हो जाते हैं, क्योंकि जो अनुत्साही, अनुष्ठानहीन और आलसी हैं, उन्हें लोकमें भोगोंकी प्राप्ति होती नहीं देखी जाती ॥ २ ॥

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स य एतदेवममृतं वेद वसूनामेवैको भूत्वाग्निनैव मुखेनैतदेवामृतं दृष्ट्वा तृप्यति स एतदेव रूपमभिसंविशत्येतस्माद्रूपादुदेति ॥ ३ ॥

वह, जो इस प्रकार इस अमृतको जानता है वह वसुओंमेंसे ही कोई एक होकर अग्निकी ही प्रधानतासे इसे देखकर तृप्त हो जाता है । वह इस रूपको लक्ष्य करके ही उदासीन होता है और इस रूपसे ही उत्साहित होता है ॥ ३ ॥

छा० उ० ९—