सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
दादू द्वारे दीन पुकारे, काहे न दर्शन लहिये ॥ 3 ॥
276. उपदेश चेतावनी । मकरंद ताल
कुछ चेति रे कहि क्या आया ।
इन में बैठा फूल कर, तैं देखी माया ॥ टेक ॥
तूँ जनि जानैं तन धन मेरा, मूरख देख भुलाया ।
आज काल चल जावै देही, ऐसी सुन्दर काया ॥ 1 ॥
राम नाम निज लीजिये, मैं कहि समझाया ।
दादू हरि की सेवा कीजे, सुन्दर साज मिलाया ॥ 2 ॥
277. मकरंद ताल
नेटि रे माटी में मिलना, मोड़ मोड़ देह काहे को चलना ॥ टेक ॥
काहे को अपना मन डुलावै, यहु तन अपना नीका धरना ।
कोटि वर्ष तूँ काहे न जीवै, विचार देख आगै है मरना ॥ 1 ॥
काहे न अपनी बाट सँवारै, संजम रहना, सुमिरण करणा ।
गहिला ! दादू गर्व न कीजे, यहु संसार पँच दिन भरणा ॥ 2 ॥
278. ब्रह्मयोग ताल
जाइ रे तन जाइ रे ।
जन्म सुफल कर लेहु राम रमि, सुमिर सुमिर गुण गाइ रे ॥ टेक ॥
नर नारायण सकल शिरोमणि, जनम अमोलक आइ रे ।
सो तन जाइ जगत नहिं जानै, सकै तो ठाहर लाइ रे ॥ 1 ॥
जरा काल दिन जाइ गरासै, तासौं कुछ न बसाइ रे ।
छिन छिन छीजत जाइ मुग्ध नर, अंत काल दिन आइ रे ॥ 2 ॥
प्रेम भगति, साधु की संगति, नाम निरंतर गाइ रे ।
जे सिर भाग तो सौंज सुफल कर, दादू विलम्ब न लाइ रे ॥ 3 ॥
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श्री दादूवाणी-राग टोडी(तोडी) 16
279. त्रिताल
काहे रे बक मूल गँवावै, राम के नाम भलें सचु पावै ॥ टेक ॥
वाद विवाद न कीजे लोई, वाद विवाद न हरि रस होई ।
मैं मैं तेरी मांनै नाँहीं, मैं तैं मेट मिलै हरि मांहीं ॥ 1 ॥
हार जीत सौं हरि रस जाई, समझि देख मेरे मन भाई!
मूल न छाड़ी दादू बौरै, जनि भूलै तूँ बकबे औरै ॥ 2 ॥
२४०. (फारसी) त्रिताल
हुशियार हाकिम न्याव है, सांई के दीवान।
कुल का हिसाब होगा, समझ मुसलमान ॥ टेक ॥
नीयत नेकी सालिकां, रास्ता ईमान।
इखलास अंदर आपणे, रखणां सुबहान ॥ 1 ॥
हुक्म हाजिर होइ बाबा, मुसल्लम महरबान।
अक्ल सेती आपमां, शोध लेहु सुजान ॥ 2 ॥
हक सौं हजूरी हूँणां, देखणां कर ज्ञान।
दोस्त दाना दीन का, मनणां फरमान ॥ 3 ॥
गुस्सा हैवानी दूर कर, छाड़ दे अभिमान।
दुई दरोगां नांहिं खुशियाँ, दादू लेहु पिछान ॥ 4 ॥
२४1. साधु प्रति उपदेश (गुजराती) । ललित ताल
निर्पख रहणा, राम राम कहणा,
काम क्रोध में देह न दहणा ॥ टेक ॥
जेणें मारग संसार जाइला, तेणें प्राणी आप बहाइला ॥ 1 ॥
जे जे करणी जगत करीला, सो करणी संत दूर धरीला ॥ 2 ॥
जेणें पंथैं लोक राता, तेणें पंथैं साधु न जाता ॥ 3 ॥
राम नाम दादू ऐसें कहिये, राम रमत रामहि मिल रहिये ॥ 4 ॥
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श्री दादूवाणी-राग टोडी(तोडी) 16
282. भेष बिडंबन । ललित ताल
हम पाया, हम पाया रे भाई । भेष बनाय ऐसी मन आई ॥ टेक ॥
भीतर का यहु भेद न जानै, कहै सुहागिनी क्यों मन मानै ॥ 1 ॥
अंतर पीव सौं परिचय नाँहीं, भई सुहागिनी लोगन मांहीं ॥ 2 ॥
सांई स्वप्नै कबहुँ न आवै, कहबा ऐसे महल बुलावै ॥ 3 ॥
इन बातन मोहि अचरज आवै, पटम किये कैसे पीव पावै ॥ 4 ॥
दादू सुहागिनी ऐसे कोई, आपा मेट राम रत होई ॥ 5 ॥
283. आत्म समता । उत्सव ताल
ऐसे बाबा राम रमीजे, आतम सौं अंतर नहीं कीजे ॥ टेक ॥
जैसे आतम आपा लेखै, जीव जंतु ऐसे कर पेखै ॥ 1 ॥
एक राम ऐसे कर जानै, आपा पर अंतर नहिं आनै ॥ 2 ॥
सब घट आतम एक विचारे, राम सनेही प्राण हमारे ॥ 3 ॥
दादू साची राम सगाई, ऐसा भाव हमारे भाई ॥ 4 ॥
284. नाम समता । उत्सव ताल
माधइयो-माधइयो मीठो री माइ, माहवो-माहवो भेटियो आइ ॥ टेक ॥
कान्हइयो-कान्हइयो करता जाइ, केशवो केशवो केशवो धाइ ॥ 1 ॥
भूधरो भूधरो भूधरो भाइ, रमैयो रमैयो रह्यो समाइ ॥ 2 ॥
नरहरि नरहरि नरहरि राइ, गोविन्दो गोविन्दो दादू गाइ ॥ 3 ॥
285. समता । बसंत ताल
एकही एकै भया आनंद, एकही एकै भागे द्वन्द ॥ टेक ॥
एकही एकै एक समान, एकही एकै पद निर्वान ॥ 1 ॥
एकही एकै त्रिभुवन सार, एकही एकै अगम अपार ॥ 2 ॥
एकही एकै निर्भय होइ, एकही एकै काल न कोइ ॥ 3 ॥
एकही एकै घट प्रकास, एकही एकै निरंजन वास ॥ 4 ॥
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श्री दादूवाणी-राग टोडी(तोडी) 16
एकही एकै आपहि आप, एकही एकै माइ न बाप ॥ 5 ॥
एकही एकै सहज स्वरूप, एकही एकै भये अनूप ॥ 6 ॥
एकही एकै अनत न जाइ, एकही एकै रह्या समाइ ॥ 7 ॥
एकही एकै भये लै लीन, एकही एकै दादू दीन ॥ 8 ॥
286. विनती । वसंत ताल
आदि है आदि अनादि मेरा, संसार सागर भक्ति भेरा ।
आदि है अंत है, अंत है आदि है, बिड़द तेरा ॥ टेक ॥
काल है झाल है, झाल है काल है, राखिले राखिले प्राण घेरा ।
जीव का जन्म का, जन्म का जीव का, आपही आपले भांन झेरा ॥ 1 ॥
मर्म का कर्म का, कर्म का मर्म का, आइबा जाइबा मेट फेरा ।
तार ले पार ले, पार ले तार ले, जीव सौं शिव है निकट नेरा ॥ 2 ॥
आत्मा राम है, राम है आत्मा, ज्योति है युक्ति सौं करो मेला ।
तेज है सेज है, सेज है तेज है, एक रस दादू खेल खेला ॥ 3 ॥
287. परिचय । कोकिल ताल
सुन्दर राम राया ।
परम ज्ञान परम ध्यान, परम प्राण आया ॥ टेक ॥
अकल सकल अति अनूप, छाया नहिं माया ।
निराकार निराधार, वार पार न पाया ॥ 1 ॥
गंभीर धीर निधि शरीर, निर्गुण निरकारा ।
अखिल अमर परम पुरुष, निर्मल निज सारा ॥ 2 ॥
परम नूर परम तेज, परम ज्योति प्रकाशा ।
परम पुंज परापरं, दादू निज दासा ॥ 3 ॥
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श्री दादूवाणी-राग टोडी(तोडी) 16
२४४. परिचय पराभक्ति । कोकिल ताल
अखिल भाव अखिल भक्ति, अखिल नाम देवा।
अखिल प्रेम अखिल प्रीति,अखिल सुरति सेवा ।। टेक ।।
अखिल अंग अखिल संग, अखिल रंग रामा।
अखिला रत अखिला मत, अखिला निज नामा ।। 1 ।।
अखिल ज्ञान अखिल ध्यान, अखिल आनन्द कीजे।
अखिला लय अखिला में, अखिला रस पीजे ।। 2 ।।
अखिल मगन अखिल मुदित, अखिल गलित सांई।
अखिल दर्श अखिल पर्श, दादू तुम मांहीं ।। 3 ।।
इति राग टोडी सम्पूर्णः ।। 16 ।। पद 20 ।।
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अथ राग हुसेनी बंगाल 17
(गायन समय पहर दिन चढ़े, चंद्रोदय ग्रन्थ के मतानुसार)
२४9. (फारसी) अनन्यता । त्रिताल
है दाना है दाना, दिलदार मेरे कान्हा।
तूँ ही मेरे जान जिगर, यार मेरे खाना ॥ टेक॥
तूँ ही मेरे मादर पिदर, आलम बेगाना।
साहिब शिरताज मेरे, तूँ ही सुलताना ॥ 1 ॥
दोस्त दिल तूँ ही मेरे, किसका खिल खाना।
नूर चश्म जिंद मेरे, तूँ ही रहमाना ॥ 2 ॥
एकै असनाव मेरे, तूँ ही हम जाना।
जानिबा अजीज मेरे, खूब खजाना ॥ 3 ॥
नेक नजर मेहर मीरां, बंदा मैं तेरा।
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श्री दादूवाणी-राग हुसैनी बंगाल 17
दादू दरबार तेरे, खूब साहिब मेरा ॥ 4 ॥
२१०. विनय । त्रिताल
तूँ घर आव सुलक्षण पीव ।
हिक तिल मुख दिखलावहु तेरा, क्या तरसावै जीव ॥ टेक ॥
निशदिन तेरा पंथ निहारूं, तूँ घर मेरे आव ।
हिरदा भीतर हेत सौं रे वाल्हा, तेरा मुख दिखलाव ॥ 1 ॥
वारी फेरी बलि गई रे, शोभित सोइ कपोल ।
दादू ऊपरि दया करीनें, सुनाइ सुहावे बोल ॥ 2 ॥
इति राग हुसेनी बंगाल सम्पूर्णः ॥ 17 ॥ पद 2 ॥
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राग नटनारायण
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अथ राग नट नारायण १४
(गायन समय रात्रि 9 से 12) 291. हित उपदेश । गज ताल
ताको काहे न प्राण संभालै ।
कोटि अपराध कल्प के लागे, मांहि महूरत टालै ॥ टेक ॥
अनेक जन्म के बन्धन बाढ़े, बिन पावक फँध जालै ।
ऐसो है मन नाम हरी को, कबहुँ दुःख न सालै ॥
चिंतामणि जुगति सौं राखै, ज्यूं जननी सुत पालै ।
दादू देखु दया करै ऐसी, जन को जाल न रालै ॥
292. विरह । जय मंगल ताल
गोविन्द कबहुँ मिलै पीव मेरा ।
चरण-कमल क्योंहीं कर देखूं, राखूं नैनहुँ नेरा ॥ टेक ॥
निरखण का मोहि चाव घणेरा, कब मुख देखूं तेरा।
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श्री दादूवाणी-राग नट नारायण 18
प्राण मिलन को भई उदासी, मिल तूँ मीत सवेरा ॥ 1 ॥
व्याकुल तातैं भई तन देही, सिर पर जम का हेरा ।
दादू रे जन राम मिलन को, तपहि तन बहुतेरा ॥ 2 ॥
293. राज मृगांक ताल
कब देखूं नैनहुँ रेख रति, प्राण मिलन को भई मति ।
हरि सौं खेलूं हरि गति,कब मिल हैं मोहि प्राणपति ॥ टेक ॥
बल कीती क्यों देखूंगी रे, मुझ मांही अति बात अनेरी ।
सुन साहिब इक विनती मेरी, जनम-जनम हूँ दासी तेरी ॥ 1 ॥
कहै दादू सो सुनसी सांई, हौं अबला बल मुझ में नांही ।
करम करी घर मेरे आई, तो शोभा पीव तेरे तांई ॥ 2 ॥
294. राज मृगांक ताल (बसंत में)
नीके मोहन सौं प्रीति लाई ।
तन मन प्राण देत बजाई, रंग रस के बनाई ॥ टेक ॥
ये ही जीयरे वे ही पीवरे, छोड्यो न जाई, माई ।
बाण भेद के देत लगाई, देखत ही मुरझाई ॥ 1 ॥
निर्मल नेह पिया सौं लागो, रती न राखी काई ।
दादू रे तिल में तन जावे, संग न छाडूं , माई ॥ 2 ॥
295. परमेश्वर महिमा । राज विद्याधर ताल
तुम बिन ऐसैं कौन करै !
गरीब निवाज गुसांई मेरो,माथै मुकुट धरै ॥ टेक ॥
नीच ऊँच ले करै गुसांई, टार्यो हूँ न टरै ।
हस्त कमल की छाया राखै, काहू तैं न डरै ॥ 1 ॥
जाकी छोत जगत को लागै, तापर तूँ हीं ढरै ।
अमर आप ले करे गुसांई, मार्यो हूँ न मरै ॥ 2 ॥
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श्री दादूवाणी-राग नट नारायण 18
नामदेव कबीर जुलाहो, जन रैदास तिरै ।
दादू बेगि बार नहीं लागै, हरि सौं सबै सरै ॥ ३ ॥
२१६. मंगलाचरण । राज विद्याधर ताल
नमो नमो हरि ! नमो नमो ।
ताहि गुसाँई नमो नमो, अकल निरंजन नमो नमो ।
सकल वियापी जिहिं जग कीन्हा, नारायण निज नमो नमो ॥ टेक ॥
जिन सिरजे जल शीश चरण कर, अविगत जीव दियो ।
श्रवण सँवारि नैन रसना मुख, ऐसो चित्र कियो ॥ १ ॥
आप उपाइ किये जगजीवन, सुर नर शंकर साजे ।
पीर पैगम्बर सिद्ध अरु साधक, अपने नाम निवाजे ॥ २ ॥
धरती अम्बर चंद सूर जिन, पाणी पवन किये ।
भाणण घडन पलक में केते, सकल सँवार लिये ॥ ३ ॥
आप अखंडित खंडित नाहीं, सब सम पूर रहे ।
दादू दीन ताहि नइ वंदित, अगम अगाध कहे ॥ ४ ॥
२१७. हैरान । उत्सव ताल
हम तैं दूर रही गति तेरी ।
तुम हो तैसे तुम हीं जानो, कहा बपुरी मति मेरी ॥ टेक ॥
मन तैं अगम दृष्टि अगोचर, मनसा की गम नाँहीं ।
सुरति समाइ बुद्धि बल थाके, वचन न पहुँचे तांहीं ॥ १ ॥
जोग न ध्यान ज्ञान गम नांही, समझ समझ सब हारे ।
उनमनी रहत प्राण घट साधे, पार न गहत तुम्हारे ॥ २ ॥
खोज परे गति जाइ न जानी, अगह गहन कैसे आवे ।
दादू अविगत देहु दया कर, भाग बड़े सो पावे ॥ ३ ॥
इति राग नट नारायण सम्पूर्ण: ॥ १८ ॥ पद ७ ॥
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राग सोरठ
अथ राग सोरठ 19
(गायन समय रात्रि 9 से 12)
298. स्मरण । उत्सव ताल
कोली साल न छाड़ै रे, सब घावर काढै रे ।। टेक ।।
प्रेम पाण लगाई धागै, तत्त्व तेल निज दीया ।
एक मना इस आरंभ लागा, ज्ञान राछ भर लीया ।। 1 ।।
नाँव नली भर बुणकर लागा, अंतरगति रंग राता ।
ताणैं बाणें जीव जुलाहा, परम तत्व सौं माता ।। 2 ।।
सकल शिरोमणि बुनैन विचारा, सान्हाँ सूत न तोड़ै ।
सदा सचेत रहै ल्यौ लागा, ज्यौं टूटै त्यौं जोड़ै ।। 3 ।।
ऐसे तनि बुनि गहर गजीना, सांई के मन भावै ।
दादू कोली करता के संग, बहुरि न इहि जग आवै ।। 4 ।।
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श्री दादूवाणी-राग सोरठ 19
२९९. बिरही । ललित ताल
विरहणी वपु न सँभारै ।
निशदिन तलफै राम के कारण, अंतर एक विचारै ॥ टेक ॥
आतुर भई मिलन के कारण, कहि कहि राम पुकारै ।
सास उसास निमिष नहिं विसरै, जित तित पंथ निहारै ॥ 1 ॥
फिरै उदास चहुँ दिशि चितवत, नैन नीर भर आवै ।
राम वियोग विरह की जारी, और न कोई भावै ॥ 2 ॥
व्याकुल भई शरीर न समझै, विषम बाण हरि मारे ।
दादू दर्शन बिन क्यों जीवै, राम सनेही हमारे ॥ 3 ॥
३००. मन उपदेश चेतावनी । धीमा ताल
मन रे, राम रटत क्यों रहिये !
यहु तत बार बार क्यों न कहिये ॥ टेक ॥
जब लग जिह्वा वाणी, तो लौं जपिले सारंगपाणी ।
जब पवना चल जावे, तब प्राणी पछतावे ॥ 1 ॥
जब लग श्रवण सुणीजे, तो लौं साध शब्द सुण लीजे ।
श्रवणों सुरति जब जाई, ए तब का सुणि है भाई ॥ 2 ॥
जब लग नैन हुँ पेखे, तो लौं चरण-कमल क्यों न देखे ।
जब नैनहुं कछु न सूझे, ये सब मूरख क्या बूझे ॥ 3 ॥
जब लग तन मन नीका, तो लौं जपिले जीवन जीका ।
जब दादू जीव आवै, तब हरि के मन भावै ॥ 4 ॥
३०१. धीमा ताल
मन रे, तेरा कौन गँवारा, जपि जीवन प्राण आधारा ॥ टेक ॥
रे मात पिता कुल जाती, धन जौबन सजन सगाती ।
रे गृह दारा सुत भाई, हरि बिन सब झूठा है जाई ॥ 1 ॥
रे तूं अंत अकेला जावै, काहू के संग न आवै ।
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श्री दादूवाणी-राग सोरठ 19
रे तूँ ना कर मेरी मेरा, हरि राम बिना को तेरा ॥ 2 ॥
रे तूँ चेत न देखे अंधा, यहु माया मोह सब धंधा ।
रे काल मीच सिर जागे, हरि सुमिरण काहे न लागे ॥ 3 ॥
यहु औसर बहुरि न आवै, फिर मनिषा जन्म न पावै ।
अब दादू ढ़ील न कीजे, हरि राम भजन कर लीजे ॥ 4 ॥
३०२. प्रतिपाल
मन रे, देखत जन्म गयो, तातैं काज न कोई भयो रे ॥ टेक ॥
मन इंद्रिय ज्ञान विचारा, तातैं जन्म जुआ ज्यों हारा ।
मन झूठ साँच कर जानै, हरि साध कहैं, नहिं मानै ॥ 1 ॥
मन रे बादि गहे चतुराई, तातैं मनमुख बात बनाइ ।
मन आप आपको थापै, करता होइ बैठा आपै ॥ 2 ॥
मन स्वादी बहुत बनावै, मैं जान्या विषय बतावै ।
मन मांगै सोई दीजै, हमहिं राम दुखी क्यों कीजै ॥ 3 ॥
मन सबही छाड़ विकारा, प्राणी होइ गुणण तैं न्यारा ।
निर्गुण निज गहि रहिये, दादू साध कहैं, ते कहिये ॥ 4 ॥
३०३. प्रतिपाल
मन रे, अंतकाल दिन आया, तातैं यहु सब भया पराया ॥ टेक ॥
श्रवनों सुनै न नैनहुँ सूझै, रसना कह्या न जाई ।
शीश चरण कर कंपन लागे, सो दिन पहुँच्यो आई ॥ 1 ॥
काले धोले वरण पलटिया, तन मन का बल भागा ।
जौबन गया जरा चल आई, तब पछतावन लागा ॥ 2 ॥
आयु घटै घट छीजै काया, यहु तन भया पुराना ।
पाँचों थाके कह्या न मानैं, ताका मर्म न जाना ॥ 3 ॥
हंस बटाऊ प्राण पयाना, समझि देख मन मांहिं ।
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श्री दादूवाणी-राग सोरठ 19
दिन दिन काल ग्रासै जियरा, दादू चेतै नाँहीं ॥ 4 ॥
304. राज विद्याधर ताल
मन रे, तूँ देखै सो नाँहीं, है सो अगम अगोचर मांहीं ॥ टेक ॥
निशि अँधियारी कछू न सूझै, संशय सर्प दिखावा ।
ऐसे अंध जगत नहिं जानै, जीव जेवड़ी खावा ॥ 1 ॥
मृग जल देख तहाँ मन धावै, दिन दिन झूठी आशा ।
जहाँ जहाँ जाइ तहाँ जल नाँहीं, निश्चय मरै पियासा ॥ 2 ॥
भ्रम विलास बहुत विधि कीन्हा, ज्यों स्वप्नै सुख पावै ।
जागत झूठ तहाँ कुछ नाँहीं, फिर पीछे पछितावै ॥ 3 ॥
जब लग सूता तब लग देखै, जागत भ्रम विलाना ।
दादू अंत इहाँ कुछ नाँहीं, है सो सोध सयाना ॥ 4 ॥
305. उपदेश । त्रिताल
भाई रे, बाजीगर नट खेला, ऐसे आपै रहै अकेला ॥ टेक ॥
यहु बाजी खेल पसारा, सब मोहे कौतुकहारा ।
यहु बाजी खेलदिखावा, बाजीगर किनहुँ न पावा ॥ 1 ॥
इहि बाजी जगत भुलाना, बाजीगर किनहुँ न जाना ।
कुछ नांही सो पेखा, है सो किनहुँ न देखा ॥ 2 ॥
कुछ ऐसा चेटक कीन्हा, तन मन सब हर लीन्हा ।
बाजीगर भुरकी बाही, काहू पै लखी न जाही ॥ 3 ॥
बाजीगर परकासा, यहु बाजी झूठ तमासा ।
दादू पावा सोई, जो इहि बाजी लिप्त न होई ॥ 4 ॥
306. ज्ञान उपदेश । त्रिताल
भाई रे, ऐसा एक विचारा, यूं हरि गुरु कहै हमारा ॥ टेक ॥
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श्री दादूवाणी-राग सोरठ 19
जागत सूते, सोवत सूते, जब लग राम न जाना ।
जागत जागे, सोवत जागे, जब राम नाम मन माना ॥ 1 ॥
देखत अंधे, अंध भी अंधे, जब लग सत्य न सूझै ।
देखत देखे, अंध भी देखे, जब राम सनेही बूझै ॥ 2 ॥
बोलत गूंगे, गूंगे भी गूंगे, जब लग सत्य न चीन्हा ।
बोलत बोले, गूंगे भी बोले, जब राम नाम कह दीन्हा ॥ 3 ॥
जीवत मूये, मूये भी मूये, जब लग नहीं प्रकासा ।
जीवत जीये, मुये भी जीये, दादू राम निवासा ॥ 4 ॥
307. नाम महिमा । एक ताल
रामजी ! नाम बिना दुख भारी, तेरे साधुन कही विचारी ॥ टेक ॥
केई जोग ध्यान गह रहिया, केई कुल के मारग बहिया ।
केई सकल देव को ध्यावैं, केई रिधि सिधि चाहैं पावैं ॥ 1 ॥
केई वेद पुराणों माते, केई माया के संग राते ।
केई देश दिशंतर डोलैं, केई ज्ञानी ह्वै बहु बोलैं ॥ 2 ॥
केई काया कसैं अपारा, केई मरैं खड्ग की धारा ।
केई अनंत जीवन की आशा, केई करैं गुफा में वासा ॥ 3 ॥
आदि अंत जे जागे, सो तो राम नाम ल्यौ लागे ।
इब दादू इहै विचारा, हरि लागा प्राण हमारा ॥ 4 ॥
308. भ्रम विध्वंसन । एक ताल
साधो ! हरि सौं हेत हमारा, जिन यहु कीन्ह पसारा ॥ टेक ॥
जा कारण व्रत कीजे, तिल तिल यहु तन छीजे ।
सहजैं ही सो जाना, हरि जानत ही मन माना ॥ 1 ॥
जा कारण तप जइये, धूप सीत सिर सहिये ।
सहजैं ही सो आवा, हरि आवत ही सचु पावा ॥ 2 ॥
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श्री दादूवाणी-राग सोरठ 19
जा कारण बहु फिरिये, कर तीरथ भ्रमि भ्रमि मरिये ।
सहजैं ही सो चीन्हा, हरि चीन्ह सबै सुख लीन्हा ॥ 3 ॥
प्रेम भक्ति जिन जानी, सो काहे भरमै प्राणी ।
हरि सहजैं ही भल मानैं, तातैं दादू और न जानैं ॥ 4 ॥
३०९. परिचय विनती । वर्ण भिन्न ताल
राम जी जनि भरमावो हम को, तातैं करूं विनती तुमको ॥ टेक ॥
चरण तुम्हारे सब ही देखूं, तप तीरथ व्रत दाना ।
गंग जमुन पास पाइन के, तहाँ देहु अस्नाना ॥ 1 ॥
संग तुम्हारे सब ही लागे, योग यज्ञ जे कीजे ।
साधन सकल येही सब मेरे, संग आपनो दीजैं ॥ 2 ॥
पूजा पाती देवी देवल, सब देखूं तुम मांहिं ।
मोको ओट आपणी दीजे, चरण कवल की छांहीं ॥ 3 ॥
ये अरदास दास की सुनिये, दूर करो भ्रम मेरा ।
दादू तुम बिन और न जानै, राखो चरणों नेरा ॥ 4 ॥
३१०. उपास्य परिचय । वर्ण भिन्न ताल
सोई देव पूजूं, जे टांची नहिं घड़िया, गर्भवास नहीं औतरिया ॥ टेक ॥
बिन जल संजम सदा सोइ देवा, भाव भक्ति करूं हरि सेवा ॥ 1 ॥
पाती प्राण हरि देव चढ़ाऊँ, सहज समाधि प्रेम ल्यौ लाऊँ ॥ 2 ॥
इहि विधि सेवा सदा तहँ होई, अलख निरंजन लखै न कोई ॥ 3 ॥
ये पूजा मेरे मन मानै, जिहि विधि होइ सु दादू न जानै ॥ 4 ॥
३११. परिचय हैरान । खेमटा ताल
राम राइ ! मोको अचरज आवै, तेरा पार न कोई पावै ॥ टेक ॥
ब्रह्मादिक सनकादिक नारद, नेति नेति जे गावै ।
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श्री दादूवाणी-राग सोरठ 19
शरण तुम्हारी रहै निशवासर, तिनको तूँ न लखावै ॥ 1 ॥
शंकर शेष सबै सुर मुनिजन, तिनको तूँ न जनावै ।
तीन लोक रटैं रसना भर, तिनको तूँ न दिखावै ॥ 2 ॥
दीन लीन राम रंग राते, तिनको तूँ संग लावै ।
अपने अंग की युक्ति न जानै, सो मन तेरे भावै ॥ 3 ॥
सेवा संजम करें जप पूजा, शब्द न तिनको सुनावै ।
मैं अछोप हीन मति मेरी, दादू को दिखलावै ॥ 4 ॥
इति राग सोरठ सम्पूर्णः ॥ 19 ॥ पद 14 ॥
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अथ राग गुंड (गौंड) २०
(गायन समय वर्षा ऋतु में सब समय, संगीत प्रकाश के मतानुसार)
३12. भक्ति निष्काम । सुरफाख्ता ताल
दर्शन दे राम ! दर्शन दे, हौं तो तेरी मुक्ति न माँगूं रे ।। टेक ।।
सिद्धि न माँगूं, रिद्धि न माँगूं, तुम्ह ही माँगूं, गोविन्दा ।। 1 ।।
जोग न माँगूं, भोग न माँगूं, तुम्ह ही माँगूं, रामजी ।। 2 ।।
घर नहीं माँगूं, वन नहीं माँगूं, तुम्ह ही माँगूं, देवजी ।। 3 ।।
दादू तुम बिन और न माँगूं, दर्शन माँगूं देहुजी ।। 4 ।।
३1३. विरह विनती । सुरफाख्ता ताल
तूँ आपैं ही विचार, तुझ बिन क्यों रहूँ ?
मेरे और न दूजा कोइ, दुःख किसको कहूँ ।। टेक ।।
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श्री दादूवाणी-राग गुंड(गौंड) 20
मीत हमारा सोइ, आदैं जे पीया ।
मुझे मिलावै कोइ, वै जीवन जीया ॥ 1 ॥
तेरे नैन दिखाइ, जीऊँ जिस आस रे ।
सो धन जीवै क्यों, नहीं जिस पास रे ॥ 2 ॥
पिंजर मांहैं प्राण, तुझ बिन जाइसी ।
जन दादू माँगे मान, कब घर आइसी ॥ 3 ॥
३14. (गुजराती) सुरफाख्ता ताल
हौं जोइ रही रे बाट, तूँ घर आवनें ।
तारा दर्शन थी सुख होइ, ते तूँ ल्यावनें ॥ टेक ॥
चरण जोवा नें खांत, ते तूँ देखाड़नें ।
तुझ बिना जीव देइ, दुहेली कामिनी ॥ 1 ॥
नैणें निहारूं बाट, ऊभी चावनी ।
तूँ अंतर थी ऊरो आव, देही जावनी ॥ 2 ॥
तूँ दया करी घर आव, दासी गाँवनी ।
जन दादू राम संभाल, बैन सुहाँवनी ॥ 3 ॥
३15. झपताल
पीव देखे बिन क्यों रहूँ, जिय तलफै मेरा ।
सब सुख आनन्द पाइये, मुख देखूं तेरा ॥ टेक ॥
पीव बिन कैसा जीवना, मोहि चैन न आवै ।
निर्धन ज्यों धन पाइये, जब दरस दिखावै ॥ 1 ॥
तुम बिन क्यों धीरज धरूं, जो लौं तोहि न पाऊँ ।
सन्मुख ह्वै सुख दीजिये, बलिहारी जाऊँ ॥ 2 ॥
विरह वियोग न सह सकूँ, कायर घट काचा ।
पावन परस न पाइये, सुनि साहिब साँचा ॥ 3 ॥
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सुनिये मेरी विनती, इब दर्शन दीजे।
दादू देखन पावही, तैसैं कुछ कीजे ॥ 4 ॥
316. प्रीति अखंडित । दादरा
इहि विधि वेध्यो मोर मना, ज्यों लै भृंगी कीट तना ॥ टेक॥
चातक रटतैं रैन बिहाई, पिंड परै पै बान न जाई ॥ 1 ॥
मरै मीन बिसरै नहि पानी, प्राण तजे उन और न जानी ॥ 2 ॥
जलै शरीर न मोड़े अंगा, ज्योति न छाड़ै पड़ै पतंगा ॥ 3 ॥
दादू अब तै ऐसैं होहि, पिंड परै, नहीं छाडूं तोहि ॥ 4 ॥
317. विरह । त्रिताल
आओ राम दया कर मेरे, बार बार बलिहारी तेरे ॥ टेक॥
विरहनी आतुर पंथ निहारै, राम नाम कह पीव पुकारै ॥ 1 ॥
पंथी बूझै मारग जोवै, नैन नीर जल भर भर रोवै ॥ 2 ॥
निशदिन तलफै रहै उदास, आतम राम तुम्हारे पास ॥ 3 ॥
वपु विसरे तन की सुधि नांही, दादू विरहनी मृतक मांही ॥ 4 ॥
318. केवल विनती । रूपक ताल
निरंजन क्यों रहै, मौन गहे वैराग, केते जुग गये ॥ टेक॥
जागै जगपति राइ, हँस बोलै नहीं।
परगट घूंघट मांहि, पट खोलै नहीं ॥ 1 ॥
सदके करूं संसार, सब जग वारणै।
छाडूं सब परिवार, तेरे कारणै ॥ 2 ॥
वारूं पिंड पराण, पावों सिर धरूं।
ज्यों ज्यों भावै राम, सो सेवा करूं ॥ 3 ॥
दीनानाथ दयाल ! विलंब न कीजिये।