सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
दादू बलि बलि जाय, सेज सुख दीजिये ॥ 4 ॥
319. निरंजन स्वरूप । त्रिताल
निरंजन यूं रहै, काहू लिप्त न होइ ।
जल थल थावर जंगमा, गुण नहीं लागै कोइ ॥ टेक ॥
धर अंबर लागै नहिं, नहिं लागै शशिहर सूर ।
पाणी पवन लागै नहीं, जहाँ तहाँ भरपूर ॥ 1 ॥
निश वासर लागै नहीं, नहिं लागै शीतल घाम ।
क्षुधा तृषा लागै नहीं, घट-घट आतम राम ॥ 2 ॥
माया मोह लागै नहीं, नहिं लागै काया जीव ।
काल कर्म लागै नहीं, प्रगट मेरा पीव ॥ 3 ॥
इकलस एकै नूर है, इकलस एकै तेज ।
इकलस एकै ज्योति है, दादू खेलै सेज ॥ 4 ॥
320. विनय । त्रिताल
जग जीवन प्राण आधार, वाचा पालना ।
हौं कहाँ पुकारूं जाइ, मेरे लालना ॥ टेक ॥
मेरे वेदन अंग अपार, सो दुख टालना ।
सागर यह निस्तार, गहरा अति घणा ॥ 1 ॥
अंतर है सो टाल, कीजै आपणा ।
मेरे तुम बिन और न कोइ, इहै विचारणा ॥ 2 ॥
तातैं करूं पुकार, यहु तन चालणा ।
दादू को दर्शन देहु, जाय दुख सालणा ॥ 3 ॥
321. मन की नीकी विनती । मल्लिका मोद ताल
मेरे तुम ही राखणहार, दूजा को नहीं ।
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श्री दादूवाणी-राग गुंड(गौंड) 20
ये चंचल चहुँ दिशि जाय, काल तहीं तहीं ॥ टेक ॥
मैं केते किये उपाय, निश्चल ना रहै ।
जहाँ बरजूं तहँ जाय, मद मातो बहै ॥ 1 ॥
जहाँ जाणा तहँ जाय, तुम्ह तैं ना डरै ।
तासौं कहा बसाइ, भावै त्यों करै ॥ 2 ॥
सकल पुकारैं साध, मैं केता कह्या ।
गुरु अंकुश मानै नाहिं, निर्भय है रह्या ॥ 3 ॥
तुम बिन और न कोइ, इस मन को गहै ।
तूँ राखै राखणहार, दादू तो रहै ॥ 4 ॥
३२२. संसार की नीकी विनती । दीपचन्दी ताल
निरंजन, कायर कंपै प्राणिया, देखि यहु दरिया ।
वार पार सूझै नहीं, मन मेरा डरिया ॥ टेक ॥
अति अथाह यह भौजला, आसंघ नहिं आवै ।
देख देख डरपै घणा, प्राणी दुख पावै ॥ 1 ॥
विष जल भरिया सागरा, सब थके सयाना ।
तुम बिन कहु कैसे तिरूं, मैं मूढ़ अयाना ॥ 2 ॥
आगे ही डरपै घणा, मेरी का कहिये ।
कर गहि काढो केशवा, पार तो लहिये ॥ 3 ॥
एक भरोसा तोर है, जे तुम होहु दयाला ।
दादू कहु कैसे तिरै ! तूँ तार गोपाला ॥ 4 ॥
३२३. समर्थ उपदेश । दादरा ताल
समर्थ मेरा सांइयां, सकल अघ जारै,
सुख दाता मेरे प्राण का, संकोच निवारै ॥ टेक ॥
त्रिविध ताप तन की हरै, चौथे जन राखै ।
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श्री दादूवाणी-राग गुंड(गौंड) 20
आप समागम सेवका, साधू यूं भाखै ॥ 1 ॥
आप करै प्रतिपालना, दारुण दुख टारै।
इच्छा जन की पूरवै, सब कारज सारै ॥ 2 ॥
कर्म कोटि भय भंजना, सुख मंडन सोई।
मन मनोरथ पूरणा, ऐसा और न कोई ॥ 3 ॥
ऐसा और न देखिहौं, सब पूरण कामा।
दादू साधु संगी किये, उन आतम रामा ॥ 4 ॥
324. (गुजराती) मन स्थिरार्थ विनती । त्रिताल
तुम बिन राम कवन कलि मांही, विषिया थैं कोइ वारे रे।
मुनियर मोटा मनवैं बाह्या, येन्हा कौन मनोरथ मारे रे ॥ टेक ॥
छिन एकैं मनवो मर्कट माहरो, घर घरबार नचावे रे।
छिन एकैं मनवो चंचल माहरो, छिन एकैं घरमां आवे रे ॥ 1 ॥
छिन एकैं मनवो मीन अम्हारो, सचराचर मां धाये रे।
छिन एकैं मनवो उदमद मातो, स्वादैं लागो खाये रे ॥ 2 ॥
छिन एकैं मनवो ज्योति पतंगा, भ्रम भ्रम स्वादैं दाझे रे।
छिन एकैं मनवो लोभैं लागो, आपा पर में बाझे रे ॥ 3 ॥
छिन एकैं मनवो कुंजर माहरो, वन वन मांहिं भ्रमाड़े रे।
छिन एकैं मनवो कामी माहरो, विषिया रंग रमाड़े रे ॥ 4 ॥
छिन एकैं मनवो मिरग अम्हारो, नादैं मोह्यो जाये रे।
छिन एकैं मनवो माया रातो, छिन एकैं हमनें बाहे रे ॥ 5 ॥
छिन एकैं मनवो भँवर अम्हारो, बासैं कंवल बँधाणें रे।
छिन एकैं मनवो चहुँ दिशि जाये, मनवा नें कोई आणें रे ॥ 6 ॥
तुम बिन राखै कौन विधाता, मुनिवर साखी आणें रे।
दादू मृतक छिन में जीवे, मनवा चरित न जाणें रे ॥ 7 ॥
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श्री दादूवाणी-राग गुंड(गौंड) 20
325. बेखर्च व्यसनी । ब्रह्म ताल
करणी पोच, सोच सुख करई, लौह की नाव कैसे भौजल तिरई ॥ टेक ॥
दक्षिण जात पश्चिम कैसे आवै, नैन बिन भूल बाट कित पावै ॥ 1 ॥
विष वन बेलि, अमृत फल चाहै, खाइ हलाहल, अमर उमाहै ॥ 2 ॥
अग्नि गृह पैसि कर सुख क्यों सोवै, जलन लागी घणी, सीत क्यों होवै ॥ 3 ॥
पाप पाखंड कीये, पुण्य क्यों पाइये, कूप खन पड़िबा, गगन क्यों जाइये ॥ 4 ॥
कहै दादू मोहि अचरज भारी, हिरदै कपट क्यों मिलै मुरारी ॥ 5 ॥
326. परिचय प्राप्ति । खेमटा ताल
मेरा मन के मन सौं मन लागा, शब्द के शब्द सौं नाद बागा ॥ टेक ॥
श्रवण के श्रवण सुन सुख पाया, नैन के नैन सौं निरख राया ॥ 1 ॥
प्राण के प्राण सौं खेल प्राणी, मुख के मुख सौं बोल वाणी ॥ 2 ॥
जीव के जीव सौं रंग राता, चित्त के चित्त सौं प्रेम माता ॥ 3 ॥
शीश के शीश सौं शीश मेरा, देखि रे दादू वा भाग तेरा ॥ 4 ॥
327. मन को उपदेश । त्रिताल मल्हार में
मेरे शिखर चढ़ बोल मन मोरा, राम जल वर्षे शब्द सुण तोरा ॥ टेक ॥
आरत आतुर पीव पुकारै, सोवत जागत पंथ निहारै ॥ 1 ॥
निशवासर कह अमृत वाणी, राम नाम ल्यौ लाइ ले प्राणी ॥ 2 ॥
टेर मन भाई, जब लग जीवे, प्रीति कर गाढ़ी प्रेम रस पीवे ॥ 3 ॥
दादू अवसर जे जन जागे, राम घटा-जल वरषण लागे ॥ 4 ॥
328. वैराग्य उपदेश त्रिताल
नारी नेह न कीजिये, जे तुझ राम पियारा,
माया मोह न बंधिये, तजिये संसारा ॥ टेक ॥
विषिया रंग राचै नहीं, नहीं करै पसारा।
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श्री दादूवाणी-राग गुंड(गौंड) 20
देह गेह परिवार में, सब तैं रहै नियारा ॥ 1 ॥
आपा पर उरझै नहीं, नाहीं मैं मेरा।
मनसा वाचा कर्मना, सांई सब तेरा ॥ 2 ॥
मन इन्द्रिय स्थिर करे, कतहूं नहिं डोले।
जग विकार सब परिहरे, मिथ्या नहिं बोले ॥ 3 ॥
रहे निरंतर राम सौं, अंतरगति राता।
गावे गुण गोविन्द का, दादू रस माता ॥ 4 ॥
329. आज्ञाकारी । झपताल
तूं राखै त्यों ही रहैं, तेई जन तेरा।
तुम्ह बिन और न जानहीं, सो सेवक नेरा ॥ टेक ॥
अम्बर आपै ही धन्या, अजहूँ उपकारी।
धरती धारी आप तैं, सबही सुखकारी ॥ 1 ॥
पवन पास सब के चलै, जैसे तुम कीन्हा।
पानी परकट देखिहूँ, सब सौं रहै भीना ॥ 2 ॥
चंद चिराकी चहुँ दिशा, सब शीतल जानै।
सूरज भी सेवा करै, जैसे भल मानै ॥ 3 ॥
ये निज सेवक तेरड़े, सब आज्ञाकारी।
मोको ऐसे कीजिये, दादू बलिहारी ॥ 4 ॥
330. निन्दक । झपताल
निदंक बाबा बीर हमारा, बिनही कौड़े बहै बिचारा ॥ टेक ॥
कर्म कोटि के कश्मल काटे, काज सँवारै बिन ही साटे ॥ 1 ॥
आपण डूबै और को तारे, ऐसा प्रीतम पार उतारे ॥ 2 ॥
जुग जुग जीवो निन्दक मोरा, राम देव तुम करो निहोरा ॥ 3 ॥
निदंक बपुरा पर उपकारी, दादू निंदा करै हमारी ॥ 4 ॥
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श्री दादूवाणी-राग गुंड(गौंड) 20
३३१. विरह विनती । शूलताल
देहुजी, देहुजी, प्रेम पियाला देहुजी, देकर बहुरि न लेहुजी ॥ टेक ॥
ज्यों-ज्यों नूर न देखूं तेरा, त्यों-त्यों जियरा तलफै मेरा ॥ 1 ॥
अमी महारस नाम न आवै, त्यों-त्यों प्राण बहुत दुख पावै ॥ 2 ॥
प्रेम भक्ति रस पावै नाँहीं, त्यों-त्यों सालै मन ही मांहीं ॥ 3 ॥
सेज सुहाग सदा सुख दीजे, दादू दुखिया विलम्ब न कीजे ॥ 4 ॥
३३२. परिचय विनती । त्रिताल
वर्षहु राम अमृतधारा, झिलमिल झिलमिल सींचनहारा ॥ टेक ॥
प्राण बेलि निज नीर न पावै, जलहर बिना कमल कुम्हलावै ॥ 1 ॥
सूखे बेली सकल बनराय, राम देव जल वर्षहु आय ॥ 2 ॥
आतम बेली मरै पियास, नीर न पावै दादूदास ॥ 3 ॥
इति राग गुंड सम्पूर्ण: ॥ 20 ॥ पद 20 ॥
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राग बिलावल
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अथ राग बिलावल २१
(गायन समय प्रातः 6 से 9)
३३३. परिचय विनती । त्रिताल
दया तुम्हारी दर्शन पड्ये ।
जानत हो तुम अंतरजामी, जानराय तुम सौं कहा कहिये ॥ टेक ॥
तुम सौं कहा चतुराई कीजै, कौण कर्म कर तुम पाये ।
को नहीं मिले प्राण बल अपने, दया तुम्हारी तुम आये ॥ 1 ॥
कहा हमारो आन तुम आगे, कौन कला कर वश किये ।
जीते कौन बुद्धि बल पौरुष, रुचि अपनी तैं सरण लिये ॥ 2 ॥
तुम ही आदि अंत पुनि तुम ही, तुम कर्ता त्रय लोक मंझार ।
कुछ नांही तैं कहा होत है, दादू बलि पावे दीदार ॥ 3 ॥
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श्री दादूवाणी-राग बिलावल 21
३३४. (फारसी) विनती । उदीक्षण ताल
मालिक महरबान करीम ।
गुनहगार हररोज हरदम, पन्ह राख रहीम ॥ टेक ॥
अव्वल आखिर बंदा गुनही, अमल बद विसियार ।
गरक दुनिया सत्तार साहिब, दरदवंद पुकार ॥ 1 ॥
फरामोश नेकी बदी करद, बुराई बद फैल ।
बख्शिन्दः तूँ अजीब आखिर, हुक्म हाजिर सैल ॥ 2 ॥
नाम नेक रहीम राजिक, पाक परवरदिगार ।
गुनह फिल कर देहु दादू, तलब दर दीदार ॥ 3 ॥
३३५. उदीक्षण ताल
कौण आदमी कमीण विचारा, किसको पूजे गरीब पियारा ॥ टेक ॥
मैं जन एक, अनेक पसारा, भौजल भरिया अधिक अपारा ॥ 1 ॥
एक होइ तो कहि समझाऊँ, अनेक अरूझे क्यों सुरझाऊँ ॥ 2 ॥
मैं हौं निबल, सबल ये सारे, क्यों कर पूजूं बहुत पसारे ॥ 3 ॥
पीव पुकारूं समझत नाहीं, दादू देखु दशों दिशि जाहीं ॥ 4 ॥
३३६. उपदेश चेतावनी । भंगताल
जागहु जियरा काहे सोवे, सेव करीमा तो सुख होवै ॥ टेक ॥
जातैं जीवन सो तैं विसारा, पच्छिम जाना पथ न संवारा ।
मैं मेरी कर बहुत भुलाना, अजहुँ न चेतै दूर पयाना ॥ 1 ॥
सांई केरी सेवा नाँहीं, फिर फिर डूबै दरिया मांहीं ।
ओर न आवा, पार न पावा, झूठा जीवन बहुत भुलावा ॥ 2 ॥
मूल न राख्या लाह न लीया, कौड़ी बदले हीरा दीया ।
फिर पछताना संबल नाहीं, हार चल्या क्यों पावै सांई ॥ 3 ॥
इब सुख कारण फिर दुख पावै, अजहुँ न चेतै क्यों दहकावै ।
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श्री दादूवाणी-राग बिलावल 21
दादू कहै सीख सुन मेरी, कहु करीम संभाल सबेरी ॥ 4 ॥
337. भंगताल
बार बार तन नहीं वावरे, काहे को बाद गँवावै रे ।
बिनसत बार कछू नहिं लागै, बहुरि कहाँ को पावै रे ॥ टेक ॥
तेरे भाग बड़े भाव धर कीन्हाँ, क्यों कर चित्र बनावै रे ।
सो तूँ लेइ विषय में डारे, कंचन छार मिलावै रे ॥ 1 ॥
तूँ मत जानै बहुरि पाइये, अब कै जनि डहिकावै रे ।
तीनि लोक की पूँजी तेरे, बनिज बेगि सो आवै रे ॥ 2 ॥
जब लग घट मैं श्वास वास है, तब लग काहे न ध्यावै रे ।
दादू तन धर नाम न लीन्हा, सो प्राणी पछतावै रे ॥ 3 ॥
338. ललित ताल
राम विसार्यो रे जगनाथ ।
हीरा हार्यो देखत ही रे, कौड़ी कीन्ही हाथ ॥ टेक ॥
काचहुता कंचन कर जानै, भूल्यो रे भ्रम पास ।
साचे सौं पल परिचय नाहीं, कर काचे की आस ॥ 1 ॥
विष ताको अमृत कर जानै, सो संग न आवै साथ ।
सेमल के फूलन पर फूल्यो, चूक्यो अब की घात ॥ 2 ॥
हरि भज रे मन सहज पिछानै, ये सुन साची बात ।
दादू रे अब तैं कर लीजै, आयु घटै दिन जात ॥ 3 ॥
339. मन । ललित ताल
मन चंचल मेरो कह्यो न मानै, दसों दिशा दौरावै रे ।
आवत जात बार नहि लागै, बहुत भाँति बौरावै रे ॥ टेक ॥
बेर बेर बरजत या मन को, किंचित सीख न मानै रे ।
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श्री दादूवाणी-राग बिलावल 21
ऐसे निकस जाइ या तन तैं, जैसे जीव न जानै रे ॥ 1 ॥
कोटिक जतन करत या मन को, निश्चल निमष न होई रे ।
चंचल चपल चहुँ दिशि भरमै, कहा करै जन कोई रे ॥ 2 ॥
सदा सोच रहत घट भीतर, मन थिर कैसे कीजे रे ।
सहजैं सहज साधु की संगति, दादू हरि भजि लीजे रे ॥ 3 ॥
३४०. माया । उत्सव ताल
इन कामिनी घर घाले रे ।
प्रीति लगाइ प्राण सब सोषै, बिन पावक जिय जाले रे ॥ टेक ॥
अंग लगाइ सार सब लेवै, इनतैं कोई न बाचै रे ।
यहु संसार जीत सब लीया, मिलन न देई साचै रे ॥ 1 ॥
हेत लगाइ सबै धन लेवै, बाकी कछु न राखै रे ।
माखन मांहि सोध सब लेवै, छाछ छिया कर नाखै रे ॥ 2 ॥
जे जन जानि जुगति सौं त्यागैं, तिन को निज पद परसै रे ।
काल न खाइ, मरै नहिं कबहुँ, दादू तिनको दरशै रे ॥ 3 ॥
३४१. विश्वास । उत्सव ताल
जनि सत छाड़ै बावरे, पूरक है पूरा ।
सिरजे की सब चिन्त है, देबे को सूरा ॥ टेक ॥
गर्भवास जिन राखिया, पावक तैं न्यारा ।
युक्ति यत्न कर सींचिया, दे प्राण अधारा ॥ 1 ॥
कुंज कहाँ धर संचरै, तहाँ को रखवारा ।
हिमहर तैं जिन राखिया, सो खसम हमारा ॥ 2 ॥
जल थल जीव जिते रहैं, सो सब को पूरै ।
संपट सिला में देत है, काहे नर झूरै ॥ 3 ॥
जिन यहु भार उठाइया, निर्वाहै सोई ।
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श्री दादूवाणी-राग बिलावल 21
दादू छिन न बिसारिये, तातैं जीवन होई ॥ 4 ॥
342. गजताल
सोई राम सँभाल जियरा, प्राण पिंड जिन दीन्हा रे ।
अम्बर आप उपावनहारा, मांहि चित्र जिन कीन्हा रे ।। टेक ।।
चंद सूर जिन किये चिराका, चरणों बिना चलावै रे ।
इक शीतल इक तारा डोलै, अनन्त कला दिखलावै रे ।। 1 ।।
धरती धरनि वरन बहु वाणी, रचिले सप्त समंदा रे ।
जल थल जीव सँभालनहारा, पूर रह्या सब संगा रे ।। 2 ।।
प्रकट पवन पानी जिन कीन्हा, वरषावै बहु धारा रे ।
अठारह भार वृक्ष बहु विधि के, सबका सींचनहारा रे ।। 3 ।।
पाँच तत्त्व जिन किये पसारा, सब करि देखन लागा रे ।
निश्चल राम जपो मेरे जियरा, दादू तातैं जागा रे ।। 4 ।।
343. परिचय । गज ताल
जब मैं रहते की रह जानी ।
क ाल काया के निकट न आवै, पावत है सुख प्राणी ।। टेक ।।
शोक संताप नैन नहिं देखूं, राग द्वेष नहिं आवै ।
जागत है जासों रुचि मेरी, स्वप्नै सोइ दिखावै ।। 1 ।।
भरम कर्म मोह नहिं ममता, वाद विवाद न जानूं ।
मोहन सौं मेरी बन आई, रसना सोई बखानूं ।। 2 ।।
निशिवासर मोहन तन मेरे, चरण कँवल मन जानै ।
निधि निरख देख सचु पाऊँ, दादू और न जानै ।। 3 ।।
344. राज मृगांक ताल
जब मैं साँचे की सुधि पाई ।
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तब तैं अंग और नहीं आवै, देखत हूँ सुखदाई ॥ टेक ॥
ता दिन तैं तन ताप न व्यापै, सुख दुख संग न जाऊँ ।
पावन पीव परस पद लीन्हा, आनंद भर गुन गाऊँ ॥ 1 ॥
सब सौं संग नहीं पुनि मेरे, अरस परस कुछ नाँहीं ।
एक अनंत सोई संग मेरे, निरखत हूँ निज मांहीं ॥ 2 ॥
तन मन मांहिं शोध सो लीन्हा, निरखत हूँ निज सारा ।
सोई संग सबै सुखदाई, दादू भाग्य हमारा ॥ 3 ॥
345. सच निदान । राज मृगांक ताल
हरि बिन निहचल कहीं न देखूं, तीन लोक फिरि सोधा रे ।
जे दीसै सो विनश जायगा, ऐसा गुरु परमोधा रे ॥ टेक ॥
धरती गगन पवन अरु पानी, चंद सूर थिर नाँहीं रे ।
रैनि दिवस रहत नहिं दीसै, एक रहै कलि मांहीं रे ॥ 1 ॥
पीर पैगम्बर शेख मुशायख, शिव विरंचि सब देवा रे ।
कलि आया सो कोई न रहसी, रहसी अलख अभेवा रे ॥ 2 ॥
सवा लाख मेरु गिरि पर्वत, समंद न रहसी थीरा रे ।
नदी निवान कछू नहिं दीसै, रहसी अकल शरीरा रे ॥ 3 ॥
अविनाशी वह एक रहेगा, जिन यहु सब कुछ कीन्हा रे ।
दादू जाता सब जग देखूं, एक रहत सो चीन्हा रे ॥ 4 ॥
346. पतिव्रत । राज विद्याधर ताल
मूल सींच बधै ज्यों बेला, सो तत तरुवर रहै अकेला ॥ टेक ॥
देवी देखत फिरै ज्यों भूलै, खाइ हलाहल विष को फूलै ।
सुख को चाहे पड़ै गल फाँसी, देखत हीरा हाथ तैं जासी ॥ 1 ॥
केई पूजा रच ध्यान लगावैं, देवल देखें खबर न पावैं ।
तोरैं पाती जुगति न जानी, इहि भ्रम भूल रहै अभिमानी ॥ 2 ॥
श्री दादूवाणी-राग बिलावल 21
तीर्थ व्रत न पूजै आसा, वन खंड जाहिं रहैं उदासा ।
यूं तप कर-कर देह जलावैं, भरमत डोलैं जन्म गवावैं ॥ ३ ॥
सतगुरु मिलै न संशय जाई, ये बँधन सब देइ छुड़ाई ।
तब दादू परम गति पावै, सो निज मूरति मांहि लखावै ॥ 4 ॥
347. साधु परीक्षा । दादरा
सोई साधु शिरोमणि, गोविंद गुण गावै ।
राम भजै विषिया तजै, आपा न जनावै ॥ टेक॥
मिथ्या मुख बोलै नहीं, पर निंदा नाँहीं ।
औगुण छाड़ै गुण गहै, मन हरि पद माहीं ॥ 1 ॥
निर्वैरी सब आतमा, पर आतम जानै ।
सुखदाई समता गहै, आपा नहीं आनै ॥ 2 ॥
आपा पर अंतर नहीं, निर्मल निज सारा ।
सतवादी साचा कहै, लै लीन विचारा ॥ 3 ॥
निर्भय भज न्यारा रहै, काहू लिप्त न होई ।
दादू सब संसार में, ऐसा जन कोई ॥ 4 ॥
348. परिचय परीक्षा । पतिताल
राम मिल्या यूँ जानिये, जाको काल न व्यापै ।
जरा मरण ताको नहीं, अरु मेटै आपै ॥ टेक ॥
सुख दुख कबहूँ न ऊपजै, अरु सब जग सूझै ।
क रम को बाँधै नहीं, सब आगम बूझै ॥ 1 ॥
जागत है सो जन रहै, अरु जुग जुग जागै ।
अंतरजामी सौं रहै, कछु काई न लागै ॥ 2 ॥
काम दहै सहजैं रहै, अरु शून्य विचारै ।
दादू सो सब की लहै, अरु कबहूं न हारै ॥ 3 ॥
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श्री दादूवाणी-राग बिलावल 21
३४९. समता ज्ञान । त्रिताल
इन बातनि मेरा मन मानै ।
दुतिया दोइ नहीं उर अंतर, एक एक कर पीव कौं जानै ॥ टेक ॥
पूर्ण ब्रह्म देखै सबहिन में, भ्रम न जीव काहू तैं आनै ।
होइ दयालु दीनता सब सौं, अरि पाँचनि को करै किसानै ॥ 1 ॥
आपा पर सम सब तत चीन्हैं, हरि भजै केवल जस गानै ।
दादू सोई सहज घर आनै, संकट सबै जीव के भानै ॥ 2 ॥
३५०. परिचय । एक ताल
ये मन मेरा पीव सौं, औरनि सौं नाँहीं ।
पीव बिन पलहि न जीव सौं, यह उपजै मांहीं ॥ टेक ॥
देख देख सुख जीव सौं, तहँ धूप न छाहीं ।
अजरावर मन बंधिया, तातैं अनत न जाहीं ॥ 1 ॥
तेज पुंज फल पाइया, तहाँ रस खाहीं ।
अमर बेलि अमृत झरै, पीव पीव अघाहीं ॥ 2 ॥
प्राणपति तहँ पाइया, जहाँ उलट समाई ।
दादू पीव परचा भया, हियरे हित लाई ॥ 3 ॥
३५१. त्रिताल
आज प्रभात मिले हरि लाल ।
दिल की व्यथा पीड़ सब भागी, मिट्यो जीव को साल ॥ टेक ॥
देखत नैन संतोष भयो है, इहै तुम्हारो ख्याल ॥ 1 ॥
दादू जन सौं हिल-मिल रहिबो, तुम हो दीन दयाल ॥ 2 ॥
३५२. (सिंधी) निज स्थान निर्णय । उपदेश एकताल
अर्श इलाही रब्बदा, इथांई रहमान वे ।
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श्री दादूवाणी-राग बिलावल 21
मक्का बीचि मुसाफरीला, मदीना मुलतान वे ॥ टेक ॥
नबी नाल पैगम्बरे, पीरों हंदा थान वे ।
जन तहुँ ले हिकसा ला, इथां बहिश्त मुकाम वे ॥ 1 ॥
इथां आब जमजमा, इथांई सुबहान वे ।
तख्त रबानी कंगुरेला, इथांई सुलतान वे ॥ 2 ॥
सब इथां अंदर आव वे, इथांई ईमान वे ।
दादू आप वंजाइ बेला, इथांई आसान वे ॥ 3 ॥
353. (पंजाबी) क्रीड़ा ताल खंडनि
आसण रमदा रामदा, हरि इथां अविगत आप वे ।
काया काशी वंजणां, हरि इथैं पूजा जाप वे ॥ टेक ॥
महादेव मुनि देवते, सिद्धैंदा विश्राम वे ।
स्वर्ग सुखासण हुलणैं, हरि इथैं आत्माराम वे ॥ 1 ॥
अमी सरोवर आतमा, इथांई आधार वे ।
अमर थान अविगत रहै, हरि इथैं सिरजनहार वे ॥ 2 ॥
सब कुछ इथैं आव वे, इथां परमानन्द वे ।
दादू आपा दूर कर, इथांई आनंद वे ॥ 3 ॥
इति राग बिलावल सम्पूर्णः ॥ 21 ॥ पद 20 ॥
दादूराम
सत्यराम
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राग सूहा
अथ राग सूहा २२
(गायन समय दिन 9 से 12) 354. विनती । एक ताल
तुम बिच अंतर जनि परै, माधव ! भावै तन धन लेहु ।
भावै स्वर्ग नरक रसातल, भावै करवत देहु ॥ टेक ॥
भावै विपति देहु दुख संकट, भावै संपति सुख शरीर ।
भावै घर वन राव रंक कर, भावै सागर तीर, माधव ॥ 1 ॥
भावै बँध मुक्त कर, माधव ! भावै त्रिभुवन सार ।
भावै सकल दोष धर माधव, भावै सकल निवार, माधव ॥ 2 ॥
भावै धरणि गगन धर, माधव ! भावै शीतल सूर ।
दादू निकटि सदा संग, माधव ! तूँ जनि होवै दूर, माधव ॥ 3 ॥
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श्री दादूवाणी-राग सूहा 22
३55. परिचय । पंजाबी त्रिताल
अब हम राम सनेही पाया, अगम अनहद सौं चित लाया ॥ टेक ॥
तन मन आतम ताकों दीन्हा, तब हरि हम अपना कर लीन्हा।
वाणी विमल पाँच परानां, पहिली शीश मिले भगवानां ॥ 1 ॥
जीवत जन्म सुफल कर लीन्हा, पहली चेते तिन भल कीन्हा।
अवसर आपा ठौर लगावा, दादू जीवित ले पहुँचावा ॥ 2 ॥
इति राग सूहा सम्पूर्णः ॥ 22 ॥ पद 2 ॥
दादूराम
सत्यराम
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कायाबेली ग्रंथ
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अथ काया बेली ग्रन्थ २३
३५६. पिंड ब्रह्माण्ड शोधन । पंजाबी त्रिताल
साचा सतगुरु राम मिलावे, सब कुछ काया मांहि दिखावे ॥ टेक ॥
काया माँही सिरजनहार, काया माँही ओंकार।
काया माँही है आकाश, काया माँही धरती पास ॥ १ ॥
काया माँही पवन प्रकाश, काया माँही नीर निवास ।
काया माँही शशिहर सूर, काया माँही बाजे तूर ॥ २ ॥
काया माँही तीनों देव, काया माँही अलख अभेव ।
काया माँही चारों वेद, काया माँही पाया भेद ॥ ३ ॥
काया माँही चारों खानी, काया माँही चारों वाणी ।
काया माँही उपजै आइ, काया माँही मर मर जाइ ॥ ४ ॥
काया माँही जामै मरै, काया माँही चौरासी फिरै ।
काया माँही ले अवतार, काया माँही बारम्बार ॥ ५ ॥
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श्री दादूवाणी-कायाबेली ग्रंथ 23
काया माँही रात दिन, उदय अस्त इकतार।
दादू पाया परम गुरु, कीया एकंकार ॥ 6 ॥
357. त्रिताल
काया माँही खेल पसारा, काया माँही प्राण अधारा।
काया माँही अठारह भारा, काया माँही उपावनहारा ॥ 1 ॥
काया माँही सब वन राइ, काया माँही रहे घर छाइ।
काया माँही कंदलि वास, काया माँही है कैलास ॥ 2 ॥
काया माँही तरुवर छाया, काया माँही पंखी माया।
काया माँही आदि अनंत, काया माँही है भगवन्त ॥ 3 ॥
काया माँही त्रिभुवन राइ, काया माँही रहे समाइ।
काया माँही चौदह भुवन, काया माँही आवागवन ॥ 4 ॥
काया माँही सब ब्रह्मांड, काया माँही हैं नव खण्ड।
काया माँही स्वर्ग पयाल, काया माँही आप दयाल ॥ 5 ॥
काया माँही लोक सब, दादू दिये दिखाइ।
मनसा वाचा कर्मणा, गुरु बिन लख्या न जाइ ॥ 6 ॥
358.रंगताल
काया माँही सागर सात, काया माँही अविगत नाथ।
काया माँही नदिया नीर, काया माँही गहर गंभीर ॥ 1 ॥
काया माँही सरवर पाणी, काया माँही बसै बिनाणी।
काया माँही नीर निवान, काया माँही हंस सुजान ॥ 2 ॥
काया माँही गंग तरंग, काया माँही जमुना संग।
काया माँही है सरस्वती, काया माँही द्वारावती ॥ 3 ॥
काया माँही काशी स्थान, काया माँही करै स्नान।
काया माँही पूजा पाती, काया माँही तीर्थ जाती ॥ 4 ॥
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श्री दादूवाणी-कायाबेली ग्रंथ 23
काया माँही मुनिवर मेला, काया माँही आप अकेला ।
काया माँही जपिये जाप, काया माँही आपै आप ॥ 5 ॥
काया नगर निधान है, माँही कौतिक होइ ।
दादू सद्गुरु संग ले, भूल पड़े जनि कोइ ॥ 6 ॥
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रंगताल
काया माँही विषमी बाट, काया माँही औघट घाट।
काया माँही पट्टण गाँव, काया माँही उत्तम ठाँव ॥ 1 ॥
काया माँही मण्डप छाजै, काया माँही आप विराजै।
काया माँही महल आवास, काया माँही निश्चल बास ॥ 2 ॥
काया माँही राजद्वार, काया माँही बोलणहार।
काया माँही भरे भण्डार, काया माँही वस्तु अपार ॥ 3 ॥
काया माँही नौ निधि होइ, काया माँही अठ सिधि सोइ।
काया माँही हीरा साल, काया माँही निपजैं लाल ॥ 4 ॥
काया माँही माणिक भरे, काया माँही ले ले धरे।
काया माँही रत्न अमोल, काया माँही मोल न तोल ॥ 5 ॥
काया माँही कर्तार है, सो निधि जानै नाँहि।
दादू गुरुमुख पाइये, सब कुछ काया मांहि ॥ 6 ॥ -
वर्णभिन्न ताल
काया माँही सब कुछ जाण, काया मांहै लेहु पिछाण।
काया माँही बहु विस्तार, काया माँही अनन्त अपार ॥ 1 ॥
काया माँही अगम अगाध, काया माँही निपजे साध।
काया माँही कह्या न जाइ, काया माँही रहे ल्यौ लाइ ॥ 2 ॥
काया माँही साधन सार, काया माँही करे विचार।
काया माँही अमृत वाणी, काया माँही सारंग प्राणी ॥ 3 ॥
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