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सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary

सन्त दादू दयाल जी द्वारा

DevanagariHindipublished504 पृष्ठ

श्री दादूवाणी-कायाबेली ग्रंथ 23
काया माँही खेलै प्राण, काया माँही पद निर्वाण।
काया माँही मूल गह रहै, काया मांही सब कुछ लहै ॥ 4 ॥
काया माँही निज निरधार, काया माँही अपरम्पार।
काया माँही सेवा करै, काया माँही नीझर झरै ॥ 5 ॥
काया माँही वास कर, रहै निरंतर छाइ।
दादू पाया आदि घर, सद्गुरु दिया दिखाइ ॥ 6 ॥
361. वर्ण भिन्न ताल
काया माँही अनुभै सार, काया माँही करै विचार।
काया माँही उपजै ज्ञान, काया माँही लागै ध्यान ॥ 1 ॥
काया माँही अमर स्थान, काया माँही आतमराम।
काया माँही कला अनेक, काया माँही कर्ता एक॥ 2 ॥
काया माँही लागै रंग, काया माँही सांई संग।
काया माँही सरवर तीर, काया माँही कोकिल कीर ॥ 3 ॥
काया माँही कच्छप नैन, काया माँही कूँजी बैन।
काया माँही कमल प्रकाश, काया माँही मधुकर वास ॥ 4 ॥
काया माँही नाद कुरंग, काया माँही ज्योति पतंग।
काया माँही चातक मोर, काया माँही चंद चकोर ॥ 5 ॥
काया माँही प्रीति कर, काया माँही सनेह।
काया माँही प्रेम रस, दादू गुरुमुख येह ॥ 6 ॥
362. राज विद्याधर ताल
काया माँही तारणहार, काया माँही उतरे पार।
काया माँही दुस्तर तारे, काया माँही आप उबारे ॥ 1 ॥
काया माँही दुस्तर तिरे, काया माँही होइ उद्धरे।
काया माँही निपजै आइ, काया माँही रहै समाइ ॥ 2 ॥

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श्री दादूवाणी-कायाबेली ग्रंथ 23
काया माँही खुले कपाट, काया माँही निरंजन हाट।
काया माँही है दीदार, काया माँही देखणहार ॥ 3 ॥
काया माँही राम रंग राते, काया माँही प्रेम रस माते।
काया माँही अविचल भये, काया माँही निहचल रहे ॥ 4 ॥
काया माँही जीवै जीव, काया माँही पाया पीव।
काया माँही सदा आनंद, काया माँही परमानन्द ॥ 5 ॥
काया माँही कुशल है, सो हम देख्या आइ।
दादू गुरुमुख पाइये, साधु कहैं समझाइ ॥ 6 ॥
363. राज विद्याधर ताल
काया माँही देख्या नूर, काया माँही रह्या भरपूर।
काया माँही पाया तेज, काया माँही सुन्दर सेज ॥ 1 ॥
काया माँही पुंज प्रकाश, काया माँही सदा उजास।
काया माँही झिलमिल सारा, काया माँही सब तैं न्यारा ॥ 2 ॥
काया माँही ज्योति अनन्त, काया माँही सदा बसन्त।
काया माँही खेलें फाग, काया माँही सब वन बाग ॥ 3 ॥
काया माँही खेलें रास, काया माँही विविध विलास।
काया माँही बाजैं बाजे, काया माँही नाद धुनि साजे ॥ 4 ॥
काया माँही सेज सुहाग, काया माँही मोटे भाग।
काया माँही मंगलाचार, काया माँही जै जैकार ॥ 5 ॥
काया अगम अगाध है, माँही तूर बजाइ।
दादू प्रकट पीव मिल्या, गुरुमुख रहे समाइ ॥ 6 ॥
इति कायाबेली ग्रन्थ सम्पूर्णः ॥ 23 ॥ पद 10 ॥

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राग
बसंत
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अथ राग बसंत २४
(गायन समय प्रभात ३ से ६ तथा बसंत ऋतु)
३६४. भजन भेद । मल्लिका मोद ताल
निर्मल ना मन लीयो जाइ, जाके भाग बड़े सोई फल खाइ ॥ टेक ॥
मन माया मोह मद माते, कर्म कठिन ता मांहि परे ।
विषय विकार मान मन मांही, सकल मनोरथ स्वाद खरे ॥ १ ॥
काम क्रोध ये काल कल्पना, मैं मैं मेरी अति अहंकार ।
तृष्णा तृप्ति न मानै कबहूँ, सदा कुसंगी पाँच विकार ॥ २ ॥
अनेक जोध रहैं रखवाले, दुर्लभ दूर फल अगम अपार ।
जाके भाग बड़े सोई फल पावै, दादू दाता सिरजनहार ॥ ३ ॥
३६५. (गुजराती) विरह । धीमी ताल

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श्री दादूवाणी-राग बसंत 24
तूँ घर आवने माहरे रे, हूँ जाऊँ वारणे ताहरे रे ॥ टेक ॥
रैन दिवस मूनै निरखतां जाये ।
वेलो थई घर आवे रे, वाहला आकुल थाये ॥ 1 ॥
तिल तिल हौं तो तारी वाटड़ी जोऊँ ।
एने रे आँसूड़े वाहला, मुखड़ो धोऊँ ॥ 2 ॥
ताहरी दया करि घर आवे रे वाहला ।
दादू तो ताहरो छे रे, मा कर टाला ॥ 3 ॥
366. करूणा विनती । तेवरा ताल
मोहन दुख दीरघ तूँ निवार, मोहि सतावै बारम्बार ॥ टेक ॥
काम कठिन घट रहै मांहि, तातैं ज्ञान ध्यान दोउ उदै नांहि ।
गति मति मोहन विकल मोर, तातैं चित्त न आवै नाम तोर ॥ 1 ॥
पाँचों द्वन्दर देह पूरि, तातैं सहज शील सत रहैं दूरि ।
सुधि बुधि मेरी गई भाज, तातैं तुम विसरे महाराज ॥ 2 ॥
क्रोध न कबहुँ तजै संग, तातैं भाव भजन का होइ भंग ।
समझि न काई मन मंझारि, तातैं चरण विमुख भये श्री मुरारि ॥ 3 ॥
अन्तरजामी कर सहाइ, तेरो दीन दुखित भयो जन्म जाइ ।
त्राहि त्राहि प्रभु तूँ दयाल, कहै दादू हरि कर संभाल ॥ 4 ॥
367. मन स्थिरार्थ विनती । एक ताल
मेरे मोहन मूरति राखि मोहि, निसवासर गुण रमूं तोहि ॥ टेक ॥
मन मीन होइ ज्यों स्वाद खाइ, लालच लागो जल तैं जाइ ।
मन हस्ती मातो अपार, काम अंध गज लहै न सार ॥ 1 ॥
मन पतंग पावक परै, अग्नि न देखै ज्यों जरै ।
मन मृगा ज्यों सुनै नाद, प्राण तजै यूं जाइ बाद ॥ 2 ॥
मन मधुकर जैसे लुब्धि वास, कँवल बँधावै होइ नास ।

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श्री दादूवाणी-राग बसंत 24
मनसा वाचा शरण तोर, दादू को राखो गोविन्द मोर ॥ ३ ॥
३६८. उपदेश । एक ताल
बहुरि न कीजे कपट कांम, हिरदै जपिये राम नांम ॥ टेक॥
हरि पाखैं नहिं कहूँ ठांम, पीव बिन खड़भड़ गांम गांम ।
तुम राखो जियरा अपनी मांम, अनत जनि जाय रहो विश्रांम ॥ १ ॥
कपट कांम नहीं कीजे हाँम, रघु चरण कमल कहु राम नांम ।
जब अंतरयामी रहै जांम, तब अक्षय पद जन दादू प्रांम ॥ २ ॥
३६९. परिचय प्राप्ति । कड्डुक ताल
तहँ खेलूं पीव सूं नित ही फाग, देख सखी री मेरे भाग ॥ टेक ॥
तहँ दिन दिन अति आनन्द होइ, प्रेम पिलावै आप सोइ ।
संगियन सेती रमूं रास, तहँ पूजा अर्चा चरण पास ॥ १ ॥
तहँ वचन अमोलक सब ही सार, तहँ बरतै लीला अति अपार ।
उमंग देइ तब मेरे भाग, तिहि तरुवर फल अमर लाग ॥ २ ॥
अलख देव कोइ जाणैं भेव, तहँ अलख देव की कीजै सेव ।
दादू बलि बलि बारंबार, तहँ आप निरंजन निराधार ॥ ३ ॥
३७०. परिचय सुख वर्णन । षड़ताल
मोहन माली सहज समाना, कोई जाणैं साध सुजाना ॥ टेक ॥
काया बाड़ी मांही माली, तहाँ रास बनाया ।
सेवग सौं स्वामी खेलन को, आप दया कर आया ॥ १ ॥
बाहर भीतर सर्व निरंतर, सब में रह्या समाई ।
परगट गुप्त, गुप्त पुनि परगट, अविगत लख्या न जाई ॥ २ ॥
ता माली की अकथ कहानी, कहत कही नहिं आवै ।
अगम अगोचर करत अनन्दा, दादू ये जस गावै ॥ ३ ॥

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श्री दादूवाणी-राग बसंत 24
371. परिचय । षड़ताल
मन मोहन मेरे मन ही मांहिं, कीजै सेवा अति तहाँ ॥ टेक ॥
तहँ पायो देव निरंजना, परगट भयो हरि यह तना ।
नैनन ही देखूं अघाइ, प्रगट्यो है हरि मेरे भाइ ॥ 1 ॥
मोहि कर नैनन की सैन देइ, प्राण मूंखि हरि मोर लेइ ।
तब उपजै मोकौं इहै बानि, निज निरखत हूँ सारंगपानि ॥ 2 ॥
अंकुर आदैं प्रगट्यो सोइ, बैन बाण तातें लागे मोहि ।
शरणै दादू रह्यो जाइ, हरि चरण दिखावै आप आइ ॥ 3 ॥
372. थकित निश्चल । मदन ताल
मतवाले पँचूं प्रेम पूर, निमष न इत उत जाहिं दूर ॥ टेक ॥
हरि रस माते दया दीन, राम रमत ह्वै रहे लीन ।
उलट अपूठे भये थीर, अमृत धारा पीवहिं नीर ॥ 1 ॥
सहज समाधि तज विकार, अविनाशी रस पीवहिं सार ।
थकित भये मिल महल मांहिं, मनसा वाचा आन नांहिं ॥ 2 ॥
मन मतवाला राम रंग, मिल आसण बैठे एक संग ।
सुस्थिर दादू एकै अंग, प्राणनाथ तहँ परमानन्द ॥ 3 ॥
इति राग बसंत सम्पूर्णः ॥ 24 ॥ पद 9 ॥

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राग भैरूं
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अथ राग भैरूं 25
(गायन समय प्रातः काल)
373. सतगुरु तथा नाम महिमा । त्रिताल
सतगुरु चरणां मस्तक धरणां, राम नाम कहि दुस्तर तिरणां ॥ टेक ॥
अठ सिधि नव निधि सहजैं पावै, अमर अभै पद सुख में आवै ॥ 1 ॥
भक्ति मुक्ति बैकुंठा जाइ, अमर लोक फल लेवै आइ ॥ 2 ॥
परम पदारथ मंगल चार, साहिब के सब भरे भंडार ॥ 3 ॥
नूर तेज है ज्योति अपार, दादू राता सिरजनहार ॥ 4 ॥
374. उत्तम ज्ञान स्मरण । चौताल
तन ही राम मन ही राम, राम हृदय रमि राखि ले ।
मनसा राम सकल परिपूरण, सहज सदा रस चाखि ले ॥ टेक ॥

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श्री दादूवाणी-राग भैरूं 25

नैनां राम बैनां राम, रसनां राम सँभारि ले ।
श्रवणां राम सन्मुख राम, रमता राम विचारि ले ॥ 1 ॥
श्वासैं राम सुरतैं राम, शब्दैं राम समाइ ले ।
अंतर राम निरंतर राम, आत्मराम ध्याइ ले ॥ 2 ॥
सर्वैं राम संगैं राम, राम नाम ल्यौ लाइ ले ।
बाहर राम भीतर राम, दादू गोविन्द गाइ ले ॥ 3 ॥

  1. उत्तम स्मरण। मदन ताल
    ऐसी सुरति राम ल्यौ लाइ, हरि हृदय जनि बिसरि जाइ ॥ टेक ॥
    छिन छिन मात संभारै पूत, बिंद राखै जोगी अवधूत ।
    त्रिया कुरूप रूप कों रटै, नटणी निरख बांस बरत चढ़ै ॥ 1 ॥
    कच्छप दृष्टि धरै धियांन, चातक नीर प्रेम की बान ।
    कुंजी कुरलि संभालै सोइ, भृंगी ध्यान कीट को होइ ॥ 2 ॥
    श्रवणों शब्द ज्यूं सुनै कुरंग, ज्योति पतंग न मोड़ै अंग ।
    जल बिन मीन तलफि ज्यों मरै, दादू सेवक ऐसै करै ॥ 3 ॥

  2. स्मरण फल। एक ताल
    निर्गुण राम रहै ल्यौ लाइ, सहजैं सहज मिलै हरि जाइ ॥ टेक ॥
    भौजल व्याधि लिपै नही कबहूँ, करम न कोई लागै आइ ।
    तीनों ताप जरै नहिं जियरा, सो पद परसै सहज सुभाइ ॥ 1 ॥
    जन्म जरा जोनी नहिं आवै, माया मोह न लागै ताहि ।
    पाँचों पीड़ प्राण नहीं व्यापै, सकल सोधि सब इहै उपाइ ॥ 2 ॥
    संकट संशय नरक न नैनहूँ, ताको कबहूँ काल न खाइ ।
    कंप न काई भय भ्रम भागै, सब विधि ऐसी एक लगाइ ॥ 3 ॥
    सहज समाधि गहो जे दिढ़ करि, जासौँ लागै सोइ आइ ।
    भृंगी होइ कीट की न्यांई, हरि जन दादू एक दिखाइ ॥ 4 ॥

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श्री दादूवाणी-राग भैरूं 25
377. आशीर्वाद । पड़ताल
धन्य धन्य तूँ धन्य धणी, तुम्ह सौं मेरी आइ बणी ॥ टेक ॥
धन्य धन्य तूँ तारे जगदीश, सुर नर मुनिजन सेवैं ईश।
धन्य धन्य तूँ केवल राम, शेष सहस्र मुख ले हरि नाम ॥ 1 ॥
धन्य धन्य तूँ सिरजनहार, तेरा कोई न पावै पार।
धन्य धन्य तूँ निरंजन देव, दादू तेरा लखै न भेव ॥ 2 ॥
378. भयभीत भयानक । दादरा
का जानों मोहि का ले करसी ?
तनहिं ताप मोहि छिन न विसरसी ॥ टेक ॥
आगम मोपै जान्यूं न जाहि, इहै विमासण जियरे मांहि ॥ 1 ॥
मैं नहिं जानों क्या सिर होइ, तातैं जियरा डरपै रोइ ॥ 2 ॥
काहू तैं ले कछू करै, तातैं मइया जीव डरै ॥ 3 ॥
दादू न जानें कैसे कहै, तुम शरणागति आइ रहै ॥ 4 ॥
379. क्रीड़ा तालश्वण्डनि
का जानों राम ! को गति मेरी ? मैं विषयी मनसा नहीं फेरी ॥ टेक ॥
जे मन मांगै सोई दीन्हा, जाता देख फेरि नहिं लीन्हा ॥ 1 ॥
देवा द्वन्द्वर अधिक पसारे, पाँचों पकर पटक नहिं मारे ॥ 2 ॥
इन बातन घट भरे विकारा, तृष्णा तेज मोह नहिं हारा ॥ 3 ॥
इनहिं लाग मैं सेव न जानी, कहै दादू सुन कर्म कहानी ॥ 4 ॥
380. क्रीड़ा तालश्वण्डनि
डरिये रे डरिये, तातैं राम नाम चित धरिये ॥ टेक ॥
जिन ये पँच पसारे रे, मारे रे ते मारे रे ॥ 1 ॥
जिन ये पँच समेटे रे, भेटे रे ते भेटे रे ॥ 2 ॥

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श्री दादूवाणी-राग भैरूं 25
कच्छप ज्यों कर लीये रे, जीये रे ते जीये रे ॥ ३ ॥
भृंगी कीट समाना रे, ध्याना रे यहु ध्याना रे ॥ 4 ॥
अजा सिंह ज्यों रहिये रे, दादू दर्शन लहिये रे ॥ 5 ॥
३४1. हरि प्राप्ति दुर्लभ । त्रिताल
तहँ मुझ कमीन की कौन चलावै,
जाको अजहुँ मुनिजन महल न पावै ॥ टेक ॥
शिव विरंचि नारद यश गावैं, कौन भांति कर निकट बुलावैं ॥ 1 ॥
देवा सकल तेतीसौँ क्रोरि, रहे दरबार ठाड़े कर जोरि ॥ 2 ॥
सिध साधक रहे लयौ लाइ, अजहूँ मोटे महल न पाइ ॥ 3 ॥
सब तैं नीच मैं नाम न जाना, कहै दादू क्यों मिलै सयाना ॥ 4 ॥
३४२. करूणा विनती । त्रिताल
तुम बिन कहु क्यों जीवन मेरा, अजहूँ न देख्या दर्शन तेरा ॥ टेक ॥
होहु दयाल दीन के दाता, तुम पति पूरण सब विधि साचा ॥ 1 ॥
जो तुम करो सोई तुम छाजे, अपने जन को काहे न निवाजे ॥ 2 ॥
अकरन करन ऐसैं अब कीजे, अपनो जान कर दर्शन दीजे ॥ 3 ॥
दादू कहै सुनहु हरि सांई, दर्शन दीजे मिलो गुसांई ॥ 4 ॥
३४३. उपदेश चेतावनी । पंजाबी त्रिताल
कागा रे करंक पर बोलै, खाइ माँस अरु लग ही डोलै ॥ टेक ॥
जा तन को रचि अधिक सँवारा, तो तन ले माटी में डारा ॥ 1 ॥
जा तन देख अधिक नर फूले, सो तन छाड़ि चल्या रे भूले ॥ 2 ॥
जा तन देख मन में गर्वाना, मिल गया माटी तज अभिमाना ॥ 3 ॥
दादू तन की कहा बड़ाई, निमष माँहि माटी मिल जाई ॥ 4 ॥

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५. आरती, नामावली एवं परिशिष्ट

श्री दादूवाणी-राग भैरूं 25
३८४. उपदेश । त्रिताल
जप गोविन्द, विसर जनि जाइ, जनम सुफल करिये लै लाइ ॥ टेक ॥
हरि सुमिरण सौं हेत लगाइ, भजन प्रेम यश गोविन्द गाइ ।
मानुष देह मुक्ति का द्वारा, राम सुमिर जग सिरजनहारा ॥ 1 ॥
जब लग विषम व्याधि नहिं आई, जब लग काल काया नहिं खाई ।
जब लग शब्द पलट नहीं जाई, तब लग सेवा कर राम राई ॥ 2 ॥
अवसर राम कहसि नहीं लोई, जनम गया तब कहै न कोई ।
जब लग जीवै तब लग सोई, पीछे फिर पछतावा होई ॥ 3 ॥
सांई सेवा सेवक लागे, सोई पावे जे कोइ जागे ।
गुरुमुख भरम तिमर सब भागे, बहुरि न उलटे मारग लागे ॥ 4 ॥
ऐसा अवसर बहुरि न तेरा, देख विचार समझ जिय मेरा ।
दादू हार जीत जग आया, बहुत भांति कह-कह समझाया ॥ 5 ॥
३८५. प्रतिताल
राम नाम तत काहे न बोलै, रे मन मूढ़ अनत जनि डोलै ॥ टेक ॥
भूला भरमत जन्म गमावै, यहु रस रसना काहै न गावै ॥ 1 ॥
क्या झक औरै परत जंजाले, वाणी विमल हरि काहे न सँभालै ॥ 2 ॥
राम विसार जन्म जनि खोवै, जपले जीवन साफल होवै ॥ 3 ॥
सार सुधा सदा रस पीजे, दादू तन धर लाहा लीजे ॥ 4 ॥
३८६. तत्व उपदेश । प्रतिताल
आप आपण में खोजो रे भाई, वस्तु अगोचर गुरु लखाई ॥ टेक ॥
ज्यों मही बिलोये माखण आवै, त्यों मन मथियां तैं तत पावै ॥ 1 ॥
काष्ठ हुताशन रह्या समाई, त्यूं मन माँही निरंजन राई ॥ 2 ॥
ज्यों अवनी में नीर समाना, त्यों मन माँही साच सयाना ॥ 3 ॥
ज्यों दर्पण के नहिं लागै काई, त्यों मूरति माँही निरख लखाई ॥ 4 ॥

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श्री दादूवाणी-राग भैरूं 25

सहजैं मन मथिया तत पाया, दादू उन तो आप लखाया ॥ 5 ॥
387. उपदेश । धीमा ताल
मन मैला मन ही सौं धोइ, उनमनि लागै निर्मल होइ ॥ टेक ॥
मन ही उपजै विषय विकार, मन ही निर्मल त्रिभुवन सार ॥ 1 ॥
मन ही दुविधा नाना भेद, मन ही समझै द्वै पख छेद ॥ 2 ॥
मन ही चंचल चहुँ दिशि जाइ, मन ही निश्चल रह्या समाइ ॥ 3 ॥
मन ही उपजै अग्नि शरीर, मन ही शीतल निर्मल नीर ॥ 4 ॥
मन उपदेश मनही समझाइ, दादू यहु मन उनमनि लाइ ॥ 5 ॥
388. मन प्रति शूरातन । धीमा ताल
रहु रे रहु मन मारूंगा, रती रती कर डारूंगा ॥ टेक ॥
खंड खंड कर नाखूंगा, जहाँ राम तहाँ राखूंगा ॥ 1 ॥
कह्या न मानै मेरा, सिर भानूंगा तेरा ॥ 2 ॥
घर में कदे न आवै, बाहर को उठि धावै ॥ 3 ॥
आतम राम न जानै, मेरा कह्या न मानै ॥ 4 ॥
दादू गुरुमुखि पूरा, मन सौं जूझै शूरा ॥ 5 ॥
389. नाम शूरातन । मकरन्द ताल
निर्भय नाम निरंजन लीजे, इन लोगन का भय नहिं कीजे ॥ टेक ॥
सेवक शूर शंक नही मानै, राणा राव रंक कर जानै ॥ 1 ॥
नाम निशंक मगन मतवाला, राम रसायन पीवै पियाला ॥ 2 ॥
सहजैं सदा राम रंग राता, पूरण ब्रह्म प्रेम रस माता ॥ 3 ॥
हरि बलवंत सकल सिर गाजै, दादू सेवक कैसे भाजै ॥ 4 ॥
390. समर्थाई । प्रतिपाल

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श्री दादूवाणी-राग भैरूं 25
ऐसो अलख अनंत अपारा, तीन लोक जाको विस्तारा ॥ टेक ॥
निर्मल सदा सहज घर रहै, ताको पार न कोई लहै।
निर्गुण निकट सब रह्यो समाइ, निश्चल सदा न आवै जाइ ॥ 1 ॥
अविनाशी है अपरंपार, आदि अनंत रहै निरधार।
पावन सदा निरंतर आप, कला अतीत लिप्त नहिं पाप ॥ 2 ॥
समर्थ सोई सकल भरपूर, बाहर भीतर नेडा न दूर।
अकल आप कलै नहीं कोई, सब घट रह्यो निरंजन होई ॥ 3 ॥
अवरण आपै अजर अलेख, अगम अगाध रूप नहिं रेख।
अविगत की गति लखी न जाइ, दादू दीन ताहि चित्त लाइ ॥ 4 ॥
391. समर्थ लीला । तिलवाड़ा
ऐसो राजा सेऊँ ताहि, और अनेक सब लागे जाहि ॥ टेक ॥
तीन लोक ग्रह धरे रचाइ, चंद सूर दोऊ दीपक लाइ।
पवन बुहारे गृह आँगणां, छपन कोटि जल जाके घरां ॥ 1 ॥
राते सेवा शंकर देव, ब्रह्म कुलाल न जानै भेव।
कीरति करणा चारों वेद, नेति नेति न विजाणै भेद ॥ 2 ॥
सकल देवपति सेवा करैं, मुनि अनेक एक चित्त धरैं।
चित्र विचित्र लिखैं दरबार, धर्मराइ ठाढ़े गुण सार ॥ 3 ॥
रिधि सिधि दासी आगे रहैं, चार पदारथ जी जी कहैं।
सकल सिद्ध रहैं ल्यौ लाइ, सब परिपूरण ऐसो राइ ॥ 4 ॥
खलक खजीना भरे भंडार, ता घर बरतै सब संसार।
पूरि दीवान सहज सब दे, सदा निरंजन ऐसो है ॥ 5 ॥
नारद गावैं गुण गोविन्द, करैं शारदा सब ही छंद।
नटवर नाचै कला अनेक, आपन देखै चरित अलेख ॥ 6 ॥
सकल साध बाजैं नीशान, जै जैकार न मेटै आन।
मालिनी पुहुप अठारह भार, आपण दाता सिरजनहार ॥ 7 ॥

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श्री दादूवाणी-राग भैरूं 25
ऐसो राजा सोई आहि, चौदह भुवन में रह्यो समाहि ।
दादू ताकी सेवा करै, जिन यहु रचिले अधर धरै ॥ 8 ॥
३9२. जीवित मृतक । एकताल
जब यहु मैं मैं मेरी जाइ, तब देखत वेग मिलै राम राइ ॥ टेक ॥
मैं मैं मेरी तब लग दूर, मैं मैं मेटि मिलै भरपूर ॥ 1 ॥
मैं मैं मेरी तब लग नांहि, मैं मैं मेटि मिलै मन माँहि ॥ 2 ॥
मैं मैं मेरी न पावै कोइ, मैं मैं मेटि मिलै जन सोइ ॥ 3 ॥
दादू मैं मैं मेरी मेटि, तब तूँ जान राम सौं भेटि ॥ 4 ॥
३9३. ज्ञान प्रलय । मदन ताल
नाँहीं रे हम नाँहीं रे, सत्यराम सब माँहीं रे ॥ टेक ॥
नाँहीं धरणि अकाशा रे, नाँहीं पवन प्रकाशा रे।
नाँहीं रवि शशि तारा रे, नहीं पावक प्रजारा रे ॥ 1 ॥
नाँहीं पाँच पसारा रे, नाँहीं सब संसारा रे।
नहीं काया जीव हमारा रे, नहीं बाजी कौतिकहारा रे ॥ 2 ॥
नाँहीं तरवर छाया रे, नहीं पंखी नहीं माया रे।
नाँहीं गिरिवर वासा रे, नाँहीं समंद निवासा रे ॥ 3 ॥
नाँहीं जल थल खंडा रे, नाँहीं सब ब्रह्मांडा रे।
नाँहीं आदि अनंता रे, दादू राम रहंता रे ॥ 4 ॥
३94. मध्य मार्ग निष्पक्ष । षट्ताल
अलह कहो भावै राम कहो, डाल तजो सब मूल गहो ॥ टेक ॥
अलह राम कहि कर्म दहो, झूठे मारग कहा बहो ॥ 1 ॥
साधू संगति तो निबहो, आइ परै सो शीश सहो ॥ 2 ॥
काया कमल दिल लाइ रहो, अलख अलह दीदार लहो ॥ 3 ॥

  • 474 -

श्री दादूवाणी-राग भैरूं 25
सतगुरु की सुन सीख अहो, दादू पहुँचे पार पहो ॥ 4 ॥
395. दादरा
हिंदू तुरक न जानूं दोइ।
सांई सबन का सोई है रे, और न दूजा देखूं कोइ ॥ टेक ॥
कीट पतंग सबै योनिन में, जल थल संग समाना सोइ।
पीर पैगम्बर देवा दानव, मीर मलिक मुनिजन को मोहि ॥ 1 ॥
कर्ता है रे सोई चीन्हौं, जनि वै क्रोध करे रे कोइ।
जैसे आरसी मंजन कीजे, राम रहीम देही तन धोइ ॥ 2 ॥
सांई केरी सेवा कीजे, पायो धन काहे को खोइ।
दादू रे जन हरि जप लीजे,जन्म जन्म जे सुरिजन होइ ॥ 3 ॥
396. मदन ताल
को स्वामी को शेख कहै, इस दुनियां का मर्म न कोई लहै ॥ टेक ॥
कोई राम कोई अलह सुनावै, पुनि अलह राम का भेद न पावै ॥ 1 ॥
कोई हिन्दू कोई तुर्क कर मानै, पुनि हिन्दू तुर्क की खबर न जानै ॥ 2 ॥
यहु सब करणी दोनों वेद, समझ परी तब पाया भेद ॥ 3 ॥
दादू देखै आत्म एक, कहबा सुनबा अनन्त अनेक ॥ 4 ॥
397. निन्दा। त्रिताल
निन्दत है सब लोक विचारा, हमको भावै राम पियारा ॥ टेक ॥
निस्संशय निर्दोष लगावै, तातैं मोको अचरज आवै ॥ 1 ॥
दुविधा द्वै पख रहिता जे, तासन कहत गये रे ये ॥ 2 ॥
निर्बैरी निहकामी साध, ता सिर देत बहुत अपराध ॥ 3 ॥
लोहा कंचन एक समान, तासन कहत करत अभिमान ॥ 4 ॥
निन्दा औ स्तुति एकै तोलै, तासन कहैं अपवाद हि बोलै ॥ 5 ॥

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श्री दादूवाणी-राग भैरूं 25
दादू निन्दा ताको भावै, जाकै हिरदै राम न आवै ॥ 6 ॥
३९४. (गुजराती) अनन्य शरण । उदीक्षण ताल
महारूं सूं जेहूँ आपूं, ताहरूं छै तूंनें थापूं ॥ टेक ॥
सर्व जीव नें तूं दातार, तैं सिरज्या नें तूं प्रतिपाल ॥ 1 ॥
तन धन ताहरो तैं दीधो, हूँ ताहरो नें तैं कीधो ॥ 2 ॥
सहुवे ताहरो सांचो ये, मैं मैं माहरो झूठो ते ॥ 3 ॥
दादू नें मन और न आवे, तूं कर्ता ने तूं हि जु भावे ॥ 4 ॥
३९९. निष्काम । उदीक्षण ताल
ऐसा अवधू राम पियारा, प्राण पिंड तैं रहै नियारा ॥ टेक ॥
जल लग काया तब लग माया, रहै निरन्तर अवधू राया ॥ 1 ॥
अठ सिधि भाई नो निधि आई, निकट न जाई राम दुहाई ॥ 2 ॥
अमर अभय पद बैकुंठ बासा, छाया माया रहै उदासा ॥ 3 ॥
सांई सेवक सब दिखलावै, दादू दूजा दृष्टि न आवै ॥ 4 ॥
५००. शूरातन कसौटी । भंगताल
तूँ साहिब मैं सेवक तेरा, भावै सिर दे सूली मेरा ॥ टेक ॥
भावै करवत सिर पर सार, भावै लेकर गरदन मार ॥ 1 ॥
भावै चहुँ दिशि अग्नि लगाइ, भावै काल दशों दिशि खाइ ॥ 2 ॥
भावै गिरिवर गगन गिराइ, भावै दरिया माँहि बहाइ ॥ 3 ॥
भावै कनक कसौटी देहु, दादू सेवक कस कस लेहु ॥ 4 ॥
५०1. साधु । भंगताल
काम क्रोध नहिं आवै मेरे, तातैं गोविन्द पाया नेरे ॥ टेक ॥
भरम कर्म जाल सब दीन्हा, रमता राम सबन में चीन्हा ॥ 1 ॥

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श्री दादूवाणी-राग भैरूं 25


दुविधा दुर्मति दूरि गँवाई, राम रमत सांची मन आई ॥ २ ॥
नीच ऊँच मध्यम को नांही, देखूं राम सबन के मांही ॥ ३ ॥
दादू सांच सबन में सोई, पैंड पकर जन निर्भय होई ॥ ४ ॥

५०२. हित उपदेश। खेमटा ताल
हाजिरां हजूर सांई, है हरि नेड़ा दूर नांही ॥ टेक ॥
मनी मेट महल में पावै, काहे खोजन दूरि जावै ॥ १ ॥
हिर्स न होइ, गुस्सा सब खाइ, तातैं संइयां दूर न जाइ ॥ २ ॥
दुई दूर दरोग न होइ, मालिक मन में देखै सोइ ॥ ३ ॥
अरि ये पाँच शोध सब मारै, तब दादू देखै निकटि विचारै ॥ ४ ॥

५०३. खेमटा ताल
राम रमत है देखे न कोइ, जो देखे सो पावन होइ ॥ टेक ॥
बाहिर भीतर नेड़ा न दूर, स्वामी सकल रह्या भरपूर ॥ १ ॥
जहां देखूं तहँ दूसर नांहि, सब घट राम समाना मांहि ॥ २ ॥
जहाँ जाऊँ तहँ सोई साथ, पूर रह्या हरि त्रिभुवन नाथ ॥ ३ ॥
दादू हरि देखे सुख होहि, निशदिन निरखन दीजे मोहि ॥ ४ ॥

५०४. अध्यात्म। एकताल
मन पवन ले उनमन रहै, अगम निगम मूल सो लहै ॥ टेक ॥
पाँच वायु जे सहज समावै, शशिहर के घर आणै सूर।
शीतल सदा मिलै सुखदाई, अनहद शब्द बजावै तूर ॥ १ ॥
बंकनालि सदा रस पीवै, तब यहु मनवा कहीं न जाइ।
विकसै कमल प्रेम जब उपजै, ब्रह्म जीव की करै सहाइ ॥ २ ॥
बैस गुफा में ज्योति विचारै, तब तेहिं सूझै त्रिभुवन राइ।
अंतर आप मिलै अविनाशी, पद आनन्द काल नहिं खाइ ॥ ३ ॥

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श्री दादूवाणी-राग भैरूं 25
जामण मरण जाइ, भव भाजै, अवरण के घर वरण समाइ ।
दादू जाय मिलै जगजीवन, तब यहु आवागमन विलाइ ॥ 4 ॥
405. एक ताल
जीवन मूरी मेरे आतम राम, भाग बड़े पायो निज ठाम ॥ टेक ॥
शब्द अनाहद उपजै जहाँ, सुषमन रंग लगावै तहाँ ।
तहँ रंग लागे निर्मल होइ, ये तत उपजे जानै सोइ ॥ 1 ॥
सरवर तहाँ हंसा रहे, कर स्नान सबै सुख लहै ।
सुखदाई को नैनहुँ जोइ, त्यों त्यों मन अति आनन्द होइ ॥ 2 ॥
सो हंसा शरणागति जाइ, सुन्दरि तहाँ पखाले पाइ ।
पीवै अमृत नीझर नीर, बैठे तहाँ जगत गुरु पीर ॥ 3 ॥
तहँ भाव प्रेम की पूजा होइ, जा पर किरपा जानै सोइ ।
कृपा करि हरि देइ उमंग, तहँ जन पायो निर्भय संग ॥ 4 ॥
तब हंसा मन आनंद होइ, वस्तु अगोचर लखै रे सोइ ।
जा को हरि लखावै आप, ताहि न लिपैं पुन्य न पाप ॥ 5 ॥
तहँ अनहद बाजै अद्भुत खेल, दीपक जलै बाती बिन तेल ।
अखंड ज्योति तहँ भयो प्रकास, फाग बसंत ज्यों बारह मास ॥ 6 ॥
त्रय स्थान निरंतर निरधार, तहँ प्रभु बैठे समर्थ सार ।
नैनहुँ निरखूं तो सुख होइ, ताहि पुरुष को लखै न कोइ ॥ 7 ॥
ऐसा है हरि दीनदयाल, सेवक की जानें प्रतिपाल ।
चलु हंसा तहँ चरण समान, तहँ दादू पहुँचे परिवान ॥ 8 ॥
406. आत्म परमात्म रास । एकताल
घट घट गोपी घट घट कान्ह, घट घट राम अमर अस्थान ॥ टेक ॥
गंगा जमना अंतर-वेद, सरस्वती नीर बहै प्रस्वेद ॥ 1 ॥
कुंज केलि तहं परम विसाल, सब संगी मिल खेलैं रास ॥ 2 ॥

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श्री दादूवाणी-राग भैरूं 25
तहँ बिन बैना बाजैं तूर, विकसै कँवल चंद अरु सूर ॥ 3 ॥
पूरण ब्रह्म परम प्रकाश, तहँ निज देखै दादू दास ॥ 4 ॥
इति राग भैरूं सम्पूर्णम् ॥ 25 ॥ पद 34 ॥
दादूराम
सत्यराम

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अथ राग ललित 26
(गायन समय प्रातः 3 से 6)
५०7. पराभक्ति । त्रिताल
राम तूँ मोरा हौं तोरा, पाइन परत निहोरा ॥ टेक ॥
एकै संगैं वासा, तुम ठाकुर हम दासा ॥ 1 ॥
तन मन तुम कौं देबा, तेज पुंज हम लेबा ॥ 2 ॥
रस माँही रस होइबा, ज्योति स्वरूपी जोइबा ॥ 3 ॥
ब्रह्म जीव का मेला, दादू नूर अकेला ॥ 4 ॥
५०8. (मराठी) अनन्य शरण । त्रिताल
मेरे गृह आव हो गुरु मेरा, मैं बालक सेवक तेरा ॥ टेक ॥
मात पिता तूँ अम्हचा स्वामी, देव हमारे अंतरजामी ॥ 1 ॥

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