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सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary

सन्त दादू दयाल जी द्वारा

DevanagariHindipublished504 पृष्ठ

श्री दादूवाणी-राग ललित 26
अम्हचा सज्जन अम्हचा बँधू, प्राण हमारे अम्हचा जिन्दू ॥ 2 ॥
अम्हचा प्रीतम अम्हचा मेला, अम्हची जीवन आप अकेला ॥ 3 ॥
अम्हचा साथी संग सनेही, राम बिना दुख दादू देही ॥ 4 ॥
५०९. (गुजराती) हितोपदेश । गजताल
वाहला माहरा ! प्रेम भक्ति रस पीजिये,
रमिये रमता राम, माहरा वाहला रे ।
हिरदा कमल में राखिये, उत्तम एहज ठाम, माहरा वाहला रे ॥ टेक ॥
वाहला माहरा ! सतगुरु शरणे अणसरे,
साधु समागम थाइ, माहरा वाहला रे ।
वाणी ब्रह्म बखानिये, आनन्द में दिन जाइ, माहरा वाहला रे ॥ 1 ॥
वाहला माहरा ! आतम अनुभव ऊपजे,
ऊपजे ब्रह्म गियान, माहरा वाहला रे ।
सुख सागर में झूलिये, साचो येह स्नान, माहरा वाहला रे ॥ 2 ॥
वाहला माहरा ! भव बन्धन सब छूटिये,
कर्म न लागे कोइ, माहरा वाहला रे ।
जीवन मुक्ति फल पामिये, अमर अभय पद होइ, माहरा वाहला रे ॥ 3 ॥
वाहला माहरा ! अठ सिधि नौ निधि आँगणे,
परम पदारथ चार, माहरा वाहला रे ।
दादू जन देखे नहीं, रातो सिरजनहार, माहरा वाहला रे ॥ 4 ॥
५१०. अखंड प्रीति । गजताल
हमारो मन माई ! राम नाम रंग रातो ।
पिव पिव करै पीव को जानै, मगन रहै रस मातो ॥ टेक ॥
सदा सील संतोष सुहावत, चरण कँवल मन बाँधो ।
हिरदा माँही जतन कर राखूँ, मानों रंक धन लाधो ॥ 1 ॥

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श्री दादूवाणी-राग ललित 26
प्रेम भक्ति प्रीति हरि जानूं, हरि सेवा सुखदाई ।
ज्ञान ध्यान मोहन को मेरे, कंप न लागे काई ॥ 2 ॥
संगि सदा हेत हरि लागो, अंगि और नहिं आवे ।
दादू दीन दयाल दमोदर, सार सुधा रस भावे ॥ 3 ॥
५11. (फारसी) साहिब सिफत। राज मृगांक ताल
महरवान, महरवान!
आब बाद खाक आतिश, आदम नीशान ॥ टेक ॥
शीश पाँव हाथ कीये, नैन कीये कान।
मुख कीया जीव दीया, राजिक रहमान ॥ 1 ॥
मादर पिदर परदः पोश, सांई सुबहान।
संग रहै दस्त गहै, साहिब सुलतान ॥ 2 ॥
या करीम या रहीम, दाना तूँ दीवान।
पाक नूर है हजूर, दादू है हैरान ॥ 3 ॥
इति राग ललित सम्पूर्ण ॥ 26 ॥ पद 5 ॥

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राग जैतश्री
अथ राग जैत श्री 27
(गायन समय दिन 3 से 6)
412. अमिट नाम विनती । पंजाबी त्रिताल
तेरे नाम की बलि जाऊँ, जहाँ रहूँ जिस ठाऊँ ॥ टेक ॥
तेरे बैनों की बलिहारी, तेरे नैनहुँ ऊपरि वारी ।
तेरी मूरति की बलि कीती, वारि-वारि हौं दीती ॥ 1 ॥
शोभित नूर तुम्हारा, सुन्दर ज्योति उजारा ।
मीठा प्राण पियारा, तूं है पीव हमारा ॥ 2 ॥
तेज तुम्हारा कहिये, निर्मल काहे न लहिये ।
दादू बलि बलि तेरे, आव पिया तूँ मेरे ॥ 3 ॥

  • 483 -

श्री दादूवाणी-राग जैत श्री 27

५13. विरह विनती । पंजाबी त्रिताल
मेरे जीव की जानै जानराइ, तुमतैं सेवक कहा दुराइ ॥ टेक ॥
जल बिन जैसे जाइ जिय तलफत, तुम्ह बिन तैसे हमहु विहाइ ॥ 1 ॥
तन मन व्याकुल होइ विरहनी, दरश पियासी प्राण जाइ ॥ 2 ॥
जैसे चित्त चकोर चंद मन, ऐसे मोहन हमहि आहि ॥ 3 ॥
विरह अगनि दहत दादू को, दर्शन परसन तनहि सिराइ ॥ 4 ॥
इति राग जैत श्री सम्पूर्ण ॥ 27 ॥ पद 2 ॥

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राग धनाश्री
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अथ राग धना श्री २४
(गायन समय दिन ३ से ६)
५14. अमिट अविनाशी रंग । धीमा ताल
रंग लागो रे राम को, सो रंग कदे न जाई रे ।
हरि रंग मेरो मन रंग्यो, और न रंग सुहाई रे ।। टेक ।।
अविनाशी रंग ऊपनो, रच मच लागो चोलो रे ।
सो रंग सदा सुहावनो, ऐसो रंग अमोलो रे ।। 1 ।।
हरि रंग कदे न ऊतरै, दिन दिन होइ सुरंगो रे ।
नित नवो निरवाण है, कदे न ह्वैला भंगो रे ।। 2 ।।
सांचो रंग सहजैं मिल्यो, सुन्दर रंग अपारो रे ।
भाग बिना क्यों पाइये, सब रंग मांहीं सारो रे ।। 3 ।।
अवरण को का वरणिये, सो रंग सहज स्वरूपो रे ।

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श्री दादूवाणी-राग धना श्री 27
बलिहारी उस रंग की, जन दादू देख अनूपो रे ॥ 4 ॥
415. धीमा ताल
लाग रह्यो मन राम सौं, अब अनतैं नहिं जाये रे।
अचला सौं थिर है रह्यो, सकै न चित्त डुलाये रे ॥ टेक ॥
ज्यों फुर्निंग चंदन रहै, परिमल रहै लुभाये रे।
त्यूँ मन मेरा राम सौं, अब की बेर अघाये रे ॥ 1 ॥
भँवर न छाड़ै बास को, कँवल हि रह्यो बँधाये रे।
त्यूं मन मेरा राम सौं, वेध रह्यो चित्त लाये रे ॥ 2 ॥
जल बिन मीन न जीवई, विछुरत ही मर जाये रे।
त्यों मन मेरा राम सौं, ऐसी प्रीति बनाये रे ॥ 3 ॥
ज्यूं चातक जल को रटै, पीव पीव करत बिहाये रे।
त्यों मन मेरा राम सौं, जन दादू हेत लगाये रे ॥ 4 ॥
416. विनती । वीर विक्रम ताल
मनमोहन हो !
कठिन विरह की पीर, सुन्दर दरस दिखाइये ॥ टेक ॥
सुनहु न दीन दयाल, तव मुख बैन सुनाइये ॥ 1 ॥
करुणामय कृपाल, सकल शिरोमणि आइये ॥ 2 ॥
मम जीवन प्राण अधार, अविनाशी उर लाइये ॥ 3 ॥
इब हरि दरसन देहु, दादू प्रेम बढ़ाइये ॥ 4 ॥
417. वीर विक्रम ताल
कतहूँ रहे हो विदेश, हरि नहिं आये हो।
जन्म सिरानों जाइ, पीव नहिं पाये हो ॥ टेक ॥
विपति हमारी जाइ, हरि सौं को कहे हो।

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श्री दादूवाणी-राग धना श्री 27
तुम्ह बिन नाथ अनाथ, विरहनि क्यों रहे हो ॥ 1 ॥
पीव के विरह वियोग, तन की सुधि नहीं हो।
तलफि तलफि जीव जाइ, मृतक ह्वै रही हो ॥ 2 ॥
दुखित भई हम नारि, कब हरि आवे हो ।
तुम्ह बिन प्राण अधार, जीव दुख पावे हो ॥ 3 ॥
प्रगटहु दीनदयाल, विलम्ब न कीजिये हो ।
दादू दुखी बेहाल, दरसन दीजिये हो ॥ 4 ॥
५18. रंग ताल
सुरजन मेरा वे ! कीहैं पार लहाऊँ।
जे सुरजन घर आवै वे, हिक कहाण कहाऊँ ॥ टेक॥
तो बाजैं मेकौं चैन न आवै, ये दुख कींह कहाऊँ।
तो बाजैं मेकौं नींद न आवै, अँखियाँ नीर भराऊँ ॥ 1 ॥
जे तूँ मेकौं सुरजन डेवै, सो हौं शीश सहाऊँ।
ये जन दादू सुरजन आवै, दरगह सेव कराऊँ ॥ 2 ॥
५19. रंग ताल
मोहन माधव कब मिलै, सकल शिरोमणि राइ।
तन मन व्याकुल होत है, दरस दिखाओ आइ ॥ टेक॥
नैन रहे पथ जोवताँ, रोवत रैनि बिहाइ।
बाल सनेही कब मिलै, मोपै रह्या न जाइ ॥ 1 ॥
छिन-छिन अंग अनल दहै, हरिजी कब मिलि हैं आइ।
अंतरजामी जान कर, मेरे तन की तप्त बुझाइ ॥ 2 ॥
तुम दाता सुख देत हो, हाँ हो सुन दीनदयाल।
चाहैं नैन उतावले, हाँ हो कब देखूं लाल ॥ 3 ॥
चरन कमल कब देख हौं, हाँ हो सन्मुख सिरजनहार।

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श्री दादूवाणी-राग धना श्री 27
सांई संग सदा रहौं, हाँ हो तब भाग हमार ॥ 4 ॥
जीवनि मेरी जब मिलै, हाँ हो तब ही सुख होइ ।
तन मन में तूं ही बसै, हाँ हो कब देखूं सोइ ॥ 5 ॥
तन मन की तूं ही लखै, हाँ हो सुन चतुर सुजान ।
तुम देखे बिन क्यों रहौं, हाँ हो मोहि लागे बान ॥ 6 ॥
बिन देखे दुख पाइये, हाँ हो इब विलम्ब न लाइ ।
दादू दरशन कारणैं, हाँ हो सुख दीजे आइ ॥ 7 ॥
५२०. (सिंधी) वैराग्य । वर्ण भिन्न ताल
ये खूहि पयें सब भोग विलासन,
तैसेहु वाझौं छत्र सिंहासन ॥ टेक॥
जन तिहुंरा बहिश्त नहिं भावे, लाल पलिंग क्या कीजे ।
भाहि लगे इह सेज सुखासन, मेकौं देखण दीजे ॥ 1 ॥
बैकुंठ मुक्ति स्वर्ग क्या कीजे, सकल भुवन नहिं भावे ।
भठी पयें सब मंडप छाजे, जे घर कंत न आवे ॥ 2 ॥
लोक अनंत अभै क्या कीजे, मैं विरहीजन तेरा ।
दादू दरशन देखण दीजे, ये सुन साहिब मेरा ॥ 3 ॥
५२१. (फारसी) ईमान साबित । (राग काफी) राज मृगांक ताल
अल्लह आशिकाँ ईमान, बहिश्त दोजख दीन दुनियां, चे कारे रहमान ॥ टेक॥
मीर मीरी पीर पीरी, फरिश्तः फरमान ।
आब आतिश अर्श कुर्सी, दीदनी दीवान ॥ 1 ॥
हरदो आलम खलक खाना, मोमिना इसलाम ।
हजां हाजी क़ज़ा क़ाज़ी, खान तूं सुलतान ॥ 2 ॥
इल्म आलम मुल्क मालुम, हाजते हैरान ।
अजब यारां खबरदारां, सूरते सुबहान ॥ 3 ॥

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अव्वल आखिर एक तूँ ही, जिन्द है कुरबान ।
आशिकां दीदार दादू, नूर का नीशान ॥ 4 ॥
422. (फारसी) विरह विनती। (राग काफी) वर्ण भिन्न ताल
अल्लह तेरा ज़िकर फ़िकर करते हैं,
आशिकां मुश्ताक तेरे, तर्स तर्स मरते हैं ॥ टेक ॥
खलक खेश दिगर नेस्त, बैठे दिन भरते हैं।
दायम दरबार तेरे, गैर महल डरते हैं ॥ 1 ॥
तन शहीद मन शहीद, रात दिवस लड़ते हैं।
ज्ञान तेरा ध्यान तेरा, इश्क आग जलते हैं ॥ 2 ॥
जान तेरा जिन्द तेरा, पाँवों सिर धरते हैं।
दादू दीवान तेरा, जर खरीद घर के हैं ॥ 3 ॥
423. गज ताल
मुख बोल स्वामी तूँ अन्तर्यामी, तेरा शब्द सुहावै राम जी ॥ टेक ॥
धेनु चरावन बेनु बजावन, दर्श दिखावन कामिनी ॥ 1 ॥
विरह उपावन तम बुझावन, अंगि लगावन भामिनी ॥ 2 ॥
संग खिलावन रास बनावन, गोपी भावन भूधरा ॥ 3 ॥
दादू तारन दुरित निवारण, संत सुधारण राम जी ॥ 4 ॥
424. केवल विनती। गज ताल
हाथ दे हो रामा, तुम सब पूरण कामा, हौं तो उरझ रह्यो संसार ॥ टेक ॥
अंध कूप गृह में पर्यो, मेरी करहु सँभाल।
तुम बिन दूजा को नहीं, मेरे दीनानाथ दयाल ॥ 1 ॥
मारग को सूझै नहीं, दह दिशि माया जाल।
काल पाश कसि बाँधियो, मेरे कोई न छुड़ावनहार ॥ 2 ॥

श्री दादूवाणी-राग धना श्री 27
राम बिना छूटै नहीं, कीजै बहुत उपाइ ।
कोटि किया सुलझै नहीं, अधिक अलूझत जाइ ॥ ३ ॥
दीन दुखी तुम देखताँ, भौ दुख भंजन राम ।
दादू कहै कर हाथ दे हो, तुम सब पूरण काम ॥ ४ ॥
425. करुणा विनती । त्रिताल
जनि छाड़ै राम जनि छाड़ै, हमहिं विसार जनि छाड़ै ।
जीव जात न लागै बार, जनि छाड़ै ॥ टेक ॥
माता क्यों बालक तजै, सुत अपराधी होइ ।
कबहुँ न छाड़े जीव तैं, जनि दुःख पावै सोइ ॥ १ ॥
ठाकुर दीनदयाल है, सेवक सदा अचेत ।
गुण औगुण हरि ना गिणै, अंतर तासौं हेत ॥ २ ॥
अपराधी सुत सेवका, तुम हो दीन दयाल ।
हमतैं औगुण होत हैं, तुम पूरण प्रतिपाल ॥ ३ ॥
जब मोहन प्राणहि चलै, तब देही किहि काम ।
तुम जानत दादू का कहै, अब जनि छाड़ै राम ॥ ४ ॥
426. चौताल
विषम बार हरि अधार, करुणा बहु नामी ।
भक्ति भाव बेग आइ, भीड़ भंजन स्वामी ॥ टेक ॥
अंत अधार संत सुधार, सुन्दर सुखदाई ।
काम क्रोध काल ग्रसत,प्रकटो हरि आई ॥ १ ॥
पूरण प्रतिपाल कहिये, सुमिऱ्यां तैं आवै ।
भरम कर्म मोह लागे, काहे न छुड़ावै ॥ २ ॥
दीनदयालु होहु कृपालु, अंतरयामी कहिये ।
एक जीव अनेक लागे, कैसे दुख सहिये ॥ ३ ॥

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श्री दादूवाणी-राग धना श्री 27
पावन पीव चरण शरण,युग युग तैं तारे ।
अनाथ नाथ दादू के, हरि जी हमारे ॥ 4 ॥
427. विनती त्रिताल
साजनियां ! नेह न तोरी रे,
जे हम तोरैं महा अपराधी, तो तूँ जोरी रे ॥ टेक ॥
प्रेम बिना रस फीका लागै, मीठा मधुर न होई ।
सकल शिरोमणि सब तैं नीका, कड़वा लागै सोई ॥ 1 ॥
जब लग प्रीति प्रेम रस नाँहीं, तृषा बिना जल ऐसा ।
सब तैं सुन्दर एक अमीरस, होइ हलाहल जैसा ॥ 2 ॥
सुन्दरि सांई खरा पियारा, नेह नवा नित होवै ।
दादू मेरा तब मन मानै, सेज सदा सुख सोवै ॥ 3 ॥
428. कर्ता कीर्ति । त्रिताल
काइमां कीर्ति करूंली रे, तूँ मोटो दातार ।
सब तैं सिरजीला साहिबजी, तूँ मोटो कर्तार ॥ टेक ॥
चौदह भुवन भानै घड़ै, घड़त न लागै बार ।
थापै उथपै तूँ धणी, धनि धनि सिरजनहार ॥ 1 ॥
धरती अंबर तैं धन्या, पाणी पवन अपार ।
चंद सूर दीपक रचया, रैणि दिवस विस्तार ॥ 2 ॥
ब्रह्मा शंकर तैं किया, विष्णु दिया अवतार ।
सुर नर साधू सिरजिया, कर ले जीव विचार ॥ 3 ॥
आप निरंजन ह्वै रह्या, काइमां कौतिकहार ।
दादू निर्गुण गुण कहै, जाऊँली हौं बलिहार ॥ 4 ॥
429. उपदेश चेतावनी । प्रति ताल
जियरा! राम भजन कर लीजे ।

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श्री दादूवाणी-राग धना श्री 27
साहिब लेखा माँगेगा रे, उत्तर कैसे दीजे ॥ टेक ॥
आगे जाइ पछतावन लागो, पल पल यहु तन छीजे ।
तातैं जिय समझाइ कहूँ रे, सुकृत अब तैं कीजे ॥ 1 ॥
राम जपत जम काल न लागे, संग रहै जन जीजे ।
दादू दास भजन कर लीजे, हरि जी की रास रमीजे ॥ 2 ॥
५30. (गुजराती) काल चेतावनी। प्रति ताल
काल काया गढ़ भेलसी, छीजे दशों दुवारो रे ।
देखतड़ां ते लूटिये, होसी हाहाकारो रे ॥ टेक ॥
नाइक नगर नें मेल्हसी, एकलड़ो ते जाये रे ।
संग न साथी कोइ न आसी, तहँ को जाणे किम थाये रे ॥ 1 ॥
सत जत साधो माहरा भाईड़ा, कांई सुकृत लीजे सारो रे ।
मारग विषम चालिबो, कांई लीजे प्राण अधारो रे ॥ 2 ॥
जिमि नीर निवाणा ठाहरे, तिमि साजी बांधो पालो रे ।
समर्थ सोई सेविये, तो काया न लागे कालो रे ॥ 3 ॥
दादू मन घर आणिये, तो निहचल थिर थाये रे ।
प्राणी नें पूरो मिलै, तो काया न मेल्ही जाये रे ॥ 4 ॥
५31. भयभीत भयानक । दीपचन्दी
डरिये रे डरिये, परमेश्वर तैं डरिये रे ।
लेखा लेवै, भर भर देवै, ताथैं बुरा न करिये रे, डरिये ॥ टेक ॥
सांचा लीजी, सांचा दीजी, सांचा सौदा कीजी रे ।
सांचा राखी, झूठा नाखी, विष ना पीजी रे ॥ 1 ॥
निर्मल गहिये, निर्मल रहिये, निर्मल कहिये रे ।
निर्मल लीजी, निर्मल दीजी, अनत न बहिये रे ॥ 2 ॥
साहि पठाया, बनिजन आया, जनि डहकावै रे ।

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श्री दादूवाणी-राग धना श्री 27
झूठ न भावै, फेरि पठावै, कीया पावै रे ॥ ३ ॥
पंथ दुहेला, जाइ अकेला, भार न लीजी रे ।
दादू मेला, होइ सुहेला, सो कुछ कीजी रे ॥ ४ ॥
५३२. दीप चन्दी
डरिये रे डरिये, देख देख पग धरिये ।
तारे तरिये, मारे मरिये, तातैं गर्व न करिये रे, डरिये ॥ टेक ॥
देवै लेवै, समर्थ दाता, सब कुछ छाजै रे ।
तारै मारै, गर्व निवारै, बैठा गाजै रे ॥ १ ॥
राखैं रहिये, बाहैं बहिये, अनत न लहिये रे ।
भानै घड़ै, संवारै आपै, ऐसा कहिये रे ॥ २ ॥
निकट बुलावै, दूर पठावै, सब बन आवै रे ।
पाके काचे, काचे पाके, ज्यूं मन भावै रे ॥ ३ ॥
पावक पाणी, पाणी पावक, कर दिखलावै रे ।
लोहा कंचन, कंचन लोहा, कहि समझावै रे ॥ ४ ॥
शशहर सूर, सूर तैं शशहर, परगट खेलै रे ।
धरती अंबर, अंबर धरती, दादू मेलै रे ॥ ५ ॥
५३३. हित उपदेश। चौताल
मनसा मन शब्द सुरति, पाँचों थिर कीजे ।
एक अंग सदा संग, सहजैं रस पीजे ॥ टेक ॥
सकल रहित मूल गहित, आपा नहिं जानें ।
अन्तर गति निर्मल रति, ऐकै मन मानैं ॥ १ ॥
हिरदै सुधि विमल बुधि, पूरण परकासै ।
रसना निज नाम निरख, अन्तर गति वासै ॥ २ ॥
आत्म मति पूरण गति, प्रेम भगति राता ।

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श्री दादूवाणी-राग धना श्री 27
मगन गलित अरस परस, दादू रस माता ॥ 3 ॥
434. विनती । त्रिताल
गोविन्द के चरणों ही ल्यौ लाऊँ।
जैसे चातक बन में बोलै, पीव पीव कर ध्याऊँ ॥ टेक ॥
सुरजन मेरी सुनहु वीनती, मैं बलि तेरे जाऊँ।
विपति हमारी तोहि सुनाऊँ, दे दर्शन क्यों हि पाऊँ ॥ 1 ॥
जात दुख, सुख उपजत तन को, तुम शरणागति आऊँ।
दादू को दया कर दीजे, नाँव तुम्हारो गाऊँ ॥ 2 ॥
435. त्रिताल
ए ! प्रेम भक्ति बिन रह्यो न जाई, परगट दरसन देहु अघाई ॥ टेक ॥
तालाबेली तलफै माँही, तुम बिन राम जियरे जक नांही।
निशिवासर मन रहै उदासा, मैं जन व्याकुल श्वासों श्वासा ॥ 1 ॥
एकमेक रस होइ न आवै, तातैं प्राण बहुत दुख पावै।
अंग संग मिल यहु सुख दीजे, दादू राम रसायन पीजे ॥ 2 ॥
436. परिचय उपदेश । पंजाबी त्रिताल
तिस घरि जाना वे, जहाँ वे अकल स्वरूप,
सोइ इब ध्याइये रे, सब देवन का भूप ॥ टेक ॥
अकल स्वरूप पीव का, बान बरन न पाइये।
अखंड मंडल माँहि रहै, सोई प्रीतम गाइये ॥
गावहु मन विचारा वे, मन विचारा सोई सारा, प्रकट पीव ते पाइये।
सांई सेती संग साचा, जीवित तिस घर जाइये ॥ 1 ॥
अकल स्वरूप पीव का, कैसे करि आलेखिये।
शून्य मंडल माँहि साचा, नैन भर सो देखिये ॥

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श्री दादूवाणी-राग धना श्री 27

देखो लोचन सार वे, देखो लोचन सार,
सोई प्रकट होई, यह अचम्भा पेखिये ।
दयावंत दयालु ऐसो, बरण अति विशेखिये ॥ 2 ॥
अकल स्वरूप पीव का, प्राण जीव का, सोई जन जे पावही ।
दयावंत दयालु ऐसो, सहजैं आप लखावही ॥
लखै सु लखणहार वे, लखै सोई संग होई, अगम बैन सुनावही ।
सब दुःख भागा रंग लागा, काहे न मंगल गावही ॥ 3 ॥
अकल स्वरूप पीव का, कर कैसे करि आणिये ।
निरन्तर निर्धार आपै, अन्तर सोई जाणिये ॥
जाणहु मन विचारा वे, मन विचारा सोई सारा, सुमिर सोई बखानिये ।
श्री रंग सेती रंग लागा, दादू तो सुख मानिये ॥ 4 ॥

  1. दीपचन्दी
    राम तहाँ प्रगट रहे भरपूर, आत्मा कमल जहाँ,
    परम पुरुष तहाँ, झिलमिल झिलमिल नूर ॥ टेक ॥
    चन्द सूर मध्य भाइ, तहाँ बसै राम राइ, गंग जमुन के तीर ।
    त्रिवेणी संगम जहाँ, निर्मल विमल तहाँ, निरख निरख निज नीर ॥ 1 ॥
    आत्मा उलटि जहाँ, तेज पुंज रहै तहाँ, सहज समाइ ।
    अगम निगम अति, जहाँ बसै प्राणपति, परसि परसि निज आइ ॥ 2 ॥
    कोमल कुसम दल, निराकार ज्योति जल, वार न पार ।
    शून्य सरोवर जहाँ, दादू हंसा रहै तहाँ, विलसि-विलसि निज सार ॥ 3 ॥

  2. फरोदस्त ताल
    गोविन्द पाया मन भाया, अमर कीये संग लीये ।
    अक्षय अभय दान दीये, छाया नहीं माया ॥ टेक ॥
    अगम गगन अगम तूर, अगम चन्द अगम सूर ।

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श्री दादूवाणी-राग धना श्री 27
काल झाल रहे दूर, जीव नहीं काया ॥ 1 ॥
आदि अंत नहीं कोइ, रात दिवस नहीं होइ।
उदय अस्त नहीं दोइ, मन ही मन लाया ॥ 2 ॥
अमर गुरु अमर ज्ञान, अमर पुरुष अमर ध्यान।
अमर ब्रह्म अमर थान, सहज शून्य आया ॥ 3 ॥
अमर नूर अमर वास, अमर तेज सुख निवास।
अमर ज्योति दादू दास, सकल भुवन राया ॥ 4 ॥
५३९. फरोदस्त ताल
राम की राती भई माती, लोक वेद विधि निषेध।
भागे सब भ्रम भेद, अमृत रस पीवै ॥ टेक ॥
भागे सब काल झाल, छूटे सब जग जंजाल।
विसरे सब हाल चाल, हरि की सुधि पाई ॥ 1 ॥
प्राण पवन जहाँ जाइ, अगम निगम मिले आइ।
प्रेम मगन रहे समाइ, विलसै वपु नाँहीं ॥ 2 ॥
परम नूर परम तेज, परम पुंज परम सेज।
परम ज्योति परम हेज, सुन्दरि सुख पावै ॥ 3 ॥
परम पुरुष परम रास, परम लाल सुख विलास।
परम मंगल दादू दास, पीव सौं मिल खेलै ॥ 4 ॥
५४० आरती। त्रिताल
इहि विधि आरती राम की कीजे, आत्मा अंतर वारणा लीजे ॥ टेक ॥
तन मन चन्दन प्रेम की माला, अनहद घंटा दीन दयाला।
ज्ञान का दीपक पवन की बाती, देव निरंजन पाँचों पाती।
आनन्द मंगल भाव की सेवा, मनसा मन्दिर आतम देवा।
भक्ति निरन्तर मैं बलिहारी, दादू न जानै सेव तुम्हारी।

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श्री दादूवाणी-राग धना श्री 27

४४१. उदीक्षण ताल
आरती जगजीवन तेरी, तेरे चरण कँवल पर वारी फेरी ॥ टेक ॥
चित चाँवर हेत हरि ढारे, दीपक ज्ञान हरि ज्योति विचारे ॥ 1 ॥
घंटा शब्द अनाहद बाजे, आनन्द आरती गगन गाजे ॥ 2 ॥
धूप ध्यान हरि सेती कीजे, पुहुप प्रीति हरि भाँवरि लीजे ॥ 3 ॥
सेवा सार आत्मा पूजा, देव निरंजन और न दूजा ॥ 4 ॥
भाव भक्ति सौं आरती कीजे, इहि विधि दादू जुग जुग जीजे ॥ 4 ॥
४४२. उदीक्षण ताल
अविचल आरती देव तुम्हारी, जुग जुग जीवन राम हमारी ॥ टेक ॥
मरण मीच जम काल न लागे, आवागमन सकल भ्रम भागे ॥ 1 ॥
जोनी जीव जनम नहिं आवे, निर्भय नाँव अमर पद पावे ॥ 2 ॥
कलिविष कसमल बँधन कापे, पार पहुँचे थिर कर थापे ॥ 3 ॥
अनेक उधारे तैं जन तारे, दादू आरती नरक निवारे ॥ 4 ॥
४४३. भंगताल
निराकार तेरी आरती,
बलि जाऊँ, अनन्त भवन के राइ ॥ टेक ॥
सुर नर सब सेवा करैं, ब्रह्मा विष्णु महेश ।
देव तुम्हारा भेव न जानैं, पार न पावै शेष ॥ 1 ॥
चन्द सूर आरती करैं, नमो निरंजन देव ।
धरणि पवन आकाश आराधैं, सबै तुम्हारी सेव ॥ 2 ॥
सकल भवन सेवा करैं, मुनियर सिद्ध समाधि ।
दीन लीन ह्वै रहे संतजन, अविगत के आराधि ॥ 3 ॥
जै जै जीवनि राम हमारी, भक्ति करैं ल्यौ लाइ ।
निराकार की आरती कीजै, दादू बलि बलि जाइ ॥ 4 ॥

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श्री दादूवाणी-राग धना श्री 27

५५५. दीपचन्दी
तेरी आरती ए, जुग जुग जै जै कार ॥ टेक ॥
जुग जुग आत्म राम, जुग जुग सेवा कीजिये ॥ 1 ॥
जुग जुग लंघे पार, जुग जुग जगपति को मिले ॥ 2 ॥
जुग जुग तारणहार, जुग जुग दरसन देखिये ॥ 3 ॥
जुग जुग मंगलचार, जुग जुग दादू गाइये ॥ 4 ॥
इति श्री दादूदास-विरचिते सतगुरु-प्रसादेन प्रोक्तं भक्तियोगनाम
तत्वसारमत-सर्वसाधुर्बुद्धिज्ञान-सर्वशास्त्र-शोधितं रामनाम सतगुरुशिक्षा
धर्मशास्त्र-सत्योपदेश-ब्रह्मविद्यायां मनुष्य जीवनाम् नित्य-श्रवणं पठनं
मोक्षदायकम् श्री दादूवाणीनाम् माहात्म्य सम्पूर्ण
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः

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परिशिष्ट
श्री दादूवाणी जी की आरती
ॐ जय दादूदयालु गिरा, मां जय दादूदयालु गिरा ।
माधव के मन भावनी, भव भय सततः हरा ॥ 1 ॥
जो गावे, सुख पावे, क्लेश मिटै हिय का ।
शम दमादि मन आवे, क्षौभ मिटे जिय का ॥ 2 ॥
काम क्रोध मद भंजनि, लोभ मोह हननी ।
साधक जन मन रंजनी, शांति क्षमा जननी ॥ 3 ॥
संशय शोक नशावनी, कहती हरि गाथा ।
श्रुति सिद्धांत सुनावति,तारति भव पाथा ॥ 4 ॥
भेद विवाद मिटावनि, समता सुखकारी ।
पक्ष विपक्ष नशावनि, विषयाशाहारी ॥ 5 ॥

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श्री दादूवाणी-उपदेश अष्टक
अखिल विकार विभंजति, मंजति मन नीका ।
निगमागम नवनीत सौं, गिर प्राकृत टीका ॥ 6 ॥
बम्ह विचार प्रदायिनी, पर वैराग्य प्रदा ।
सफल करत नर तन को, सोचत सरति सदा ॥ 7 ॥
धारण करत बुद्धि को, बम्हनिष्ठ करती ।
नारायण निश्चय ही, मुक्ति महल धरती ॥ 8 ॥
उपदेश अष्टक
दादू सद्गुरु शीश पर, उरमें जिनको नांव ।
सुन्दर आये शरण तकि, जिन पायो निज धाम ॥
बहे जात संसार में, सद्गुरु पकरें केश ।
सुन्दर काढें डूबते, दे अद्भुत उपदेश ॥
उपदेश श्रवण सुनाय अद्भुत, हृदय ज्ञान प्रकाशियो ।
चिरकाल को अज्ञान पूरण, सकल भ्रम तम नाशियो ॥
आनन्ददायक पुनि सहायक, करत जन निष्काम हैं ।
दादूदयालु प्रसिद्ध सद्गुरु, ताहि मोर प्रणाम हैं ॥ 1 ॥
सुन्दर सद्गुरु हाथ में, करडी लई कमान ।
मार्यो खैंच कसीस कर, बचन लगाया बाण ॥
जिनि बचन बाण लगाय उर में, मृतक फेर जिवाइया ।
मुख द्वार होय उचार कर, निज सार अमृत पाइया ॥
अत्यन्त कर आनन्द में, हम रहत आठों याम हैं ।
दादूदयालु प्रसिद्ध सद्गुरु, ताहि मोर प्रणाम हैं ॥ 2 ॥
सुन्दर सद्गुरु जगत में, पर उपकारी होय ।
नीच ऊंच सब ऊबरैं, शरणे आवै कोय ॥

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