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सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary

सन्त दादू दयाल जी द्वारा

DevanagariHindipublished504 पृष्ठ

राग सोरठ अथ राग सोरठ 19 (गायन समय रात्रि 9 से 12) 298. स्मरण । उत्सव ताल कोली साल न छाड़ै रे, सब घावर काढै रे ।। टेक ।। प्रेम पाण लगाई धागै, तत्त्व तेल निज दीया । एक मना इस आरंभ लागा, ज्ञान राछ भर लीया ।। 1 ।। नाँव नली भर बुणकर लागा, अंतरगति रंग राता । ताणैं बाणें जीव जुलाहा, परम तत्व सौं माता ।। 2 ।। सकल शिरोमणि बुनैन विचारा, सान्हाँ सूत न तोड़ै । सदा सचेत रहै ल्यौ लागा, ज्यौं टूटै त्यौं जोड़ै ।। 3 ।। ऐसे तनि बुनि गहर गजीना, सांई के मन भावै । दादू कोली करता के संग, बहुरि न इहि जग आवै ।। 4 ।।

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श्री दादूवाणी-राग सोरठ 19 २९९. बिरही । ललित ताल विरहणी वपु न सँभारै । निशदिन तलफै राम के कारण, अंतर एक विचारै ॥ टेक ॥ आतुर भई मिलन के कारण, कहि कहि राम पुकारै । सास उसास निमिष नहिं विसरै, जित तित पंथ निहारै ॥ 1 ॥ फिरै उदास चहुँ दिशि चितवत, नैन नीर भर आवै । राम वियोग विरह की जारी, और न कोई भावै ॥ 2 ॥ व्याकुल भई शरीर न समझै, विषम बाण हरि मारे । दादू दर्शन बिन क्यों जीवै, राम सनेही हमारे ॥ 3 ॥ ३००. मन उपदेश चेतावनी । धीमा ताल मन रे, राम रटत क्यों रहिये ! यहु तत बार बार क्यों न कहिये ॥ टेक ॥ जब लग जिह्वा वाणी, तो लौं जपिले सारंगपाणी । जब पवना चल जावे, तब प्राणी पछतावे ॥ 1 ॥ जब लग श्रवण सुणीजे, तो लौं साध शब्द सुण लीजे । श्रवणों सुरति जब जाई, ए तब का सुणि है भाई ॥ 2 ॥ जब लग नैन हुँ पेखे, तो लौं चरण-कमल क्यों न देखे । जब नैनहुं कछु न सूझे, ये सब मूरख क्या बूझे ॥ 3 ॥ जब लग तन मन नीका, तो लौं जपिले जीवन जीका । जब दादू जीव आवै, तब हरि के मन भावै ॥ 4 ॥ ३०१. धीमा ताल मन रे, तेरा कौन गँवारा, जपि जीवन प्राण आधारा ॥ टेक ॥ रे मात पिता कुल जाती, धन जौबन सजन सगाती । रे गृह दारा सुत भाई, हरि बिन सब झूठा है जाई ॥ 1 ॥ रे तूं अंत अकेला जावै, काहू के संग न आवै ।

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श्री दादूवाणी-राग सोरठ 19 रे तूँ ना कर मेरी मेरा, हरि राम बिना को तेरा ॥ 2 ॥ रे तूँ चेत न देखे अंधा, यहु माया मोह सब धंधा । रे काल मीच सिर जागे, हरि सुमिरण काहे न लागे ॥ 3 ॥ यहु औसर बहुरि न आवै, फिर मनिषा जन्म न पावै । अब दादू ढ़ील न कीजे, हरि राम भजन कर लीजे ॥ 4 ॥ ३०२. प्रतिपाल मन रे, देखत जन्म गयो, तातैं काज न कोई भयो रे ॥ टेक ॥ मन इंद्रिय ज्ञान विचारा, तातैं जन्म जुआ ज्यों हारा । मन झूठ साँच कर जानै, हरि साध कहैं, नहिं मानै ॥ 1 ॥ मन रे बादि गहे चतुराई, तातैं मनमुख बात बनाइ । मन आप आपको थापै, करता होइ बैठा आपै ॥ 2 ॥ मन स्वादी बहुत बनावै, मैं जान्या विषय बतावै । मन मांगै सोई दीजै, हमहिं राम दुखी क्यों कीजै ॥ 3 ॥ मन सबही छाड़ विकारा, प्राणी होइ गुणण तैं न्यारा । निर्गुण निज गहि रहिये, दादू साध कहैं, ते कहिये ॥ 4 ॥ ३०३. प्रतिपाल मन रे, अंतकाल दिन आया, तातैं यहु सब भया पराया ॥ टेक ॥ श्रवनों सुनै न नैनहुँ सूझै, रसना कह्या न जाई । शीश चरण कर कंपन लागे, सो दिन पहुँच्यो आई ॥ 1 ॥ काले धोले वरण पलटिया, तन मन का बल भागा । जौबन गया जरा चल आई, तब पछतावन लागा ॥ 2 ॥ आयु घटै घट छीजै काया, यहु तन भया पुराना । पाँचों थाके कह्या न मानैं, ताका मर्म न जाना ॥ 3 ॥ हंस बटाऊ प्राण पयाना, समझि देख मन मांहिं ।

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श्री दादूवाणी-राग सोरठ 19 दिन दिन काल ग्रासै जियरा, दादू चेतै नाँहीं ॥ 4 ॥ 304. राज विद्याधर ताल मन रे, तूँ देखै सो नाँहीं, है सो अगम अगोचर मांहीं ॥ टेक ॥ निशि अँधियारी कछू न सूझै, संशय सर्प दिखावा । ऐसे अंध जगत नहिं जानै, जीव जेवड़ी खावा ॥ 1 ॥ मृग जल देख तहाँ मन धावै, दिन दिन झूठी आशा । जहाँ जहाँ जाइ तहाँ जल नाँहीं, निश्चय मरै पियासा ॥ 2 ॥ भ्रम विलास बहुत विधि कीन्हा, ज्यों स्वप्नै सुख पावै । जागत झूठ तहाँ कुछ नाँहीं, फिर पीछे पछितावै ॥ 3 ॥ जब लग सूता तब लग देखै, जागत भ्रम विलाना । दादू अंत इहाँ कुछ नाँहीं, है सो सोध सयाना ॥ 4 ॥ 305. उपदेश । त्रिताल भाई रे, बाजीगर नट खेला, ऐसे आपै रहै अकेला ॥ टेक ॥ यहु बाजी खेल पसारा, सब मोहे कौतुकहारा । यहु बाजी खेलदिखावा, बाजीगर किनहुँ न पावा ॥ 1 ॥ इहि बाजी जगत भुलाना, बाजीगर किनहुँ न जाना । कुछ नांही सो पेखा, है सो किनहुँ न देखा ॥ 2 ॥ कुछ ऐसा चेटक कीन्हा, तन मन सब हर लीन्हा । बाजीगर भुरकी बाही, काहू पै लखी न जाही ॥ 3 ॥ बाजीगर परकासा, यहु बाजी झूठ तमासा । दादू पावा सोई, जो इहि बाजी लिप्त न होई ॥ 4 ॥ 306. ज्ञान उपदेश । त्रिताल भाई रे, ऐसा एक विचारा, यूं हरि गुरु कहै हमारा ॥ टेक ॥

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श्री दादूवाणी-राग सोरठ 19 जागत सूते, सोवत सूते, जब लग राम न जाना । जागत जागे, सोवत जागे, जब राम नाम मन माना ॥ 1 ॥ देखत अंधे, अंध भी अंधे, जब लग सत्य न सूझै । देखत देखे, अंध भी देखे, जब राम सनेही बूझै ॥ 2 ॥ बोलत गूंगे, गूंगे भी गूंगे, जब लग सत्य न चीन्हा । बोलत बोले, गूंगे भी बोले, जब राम नाम कह दीन्हा ॥ 3 ॥ जीवत मूये, मूये भी मूये, जब लग नहीं प्रकासा । जीवत जीये, मुये भी जीये, दादू राम निवासा ॥ 4 ॥ 307. नाम महिमा । एक ताल रामजी ! नाम बिना दुख भारी, तेरे साधुन कही विचारी ॥ टेक ॥ केई जोग ध्यान गह रहिया, केई कुल के मारग बहिया । केई सकल देव को ध्यावैं, केई रिधि सिधि चाहैं पावैं ॥ 1 ॥ केई वेद पुराणों माते, केई माया के संग राते । केई देश दिशंतर डोलैं, केई ज्ञानी ह्वै बहु बोलैं ॥ 2 ॥ केई काया कसैं अपारा, केई मरैं खड्ग की धारा । केई अनंत जीवन की आशा, केई करैं गुफा में वासा ॥ 3 ॥ आदि अंत जे जागे, सो तो राम नाम ल्यौ लागे । इब दादू इहै विचारा, हरि लागा प्राण हमारा ॥ 4 ॥ 308. भ्रम विध्वंसन । एक ताल साधो ! हरि सौं हेत हमारा, जिन यहु कीन्ह पसारा ॥ टेक ॥ जा कारण व्रत कीजे, तिल तिल यहु तन छीजे । सहजैं ही सो जाना, हरि जानत ही मन माना ॥ 1 ॥ जा कारण तप जइये, धूप सीत सिर सहिये । सहजैं ही सो आवा, हरि आवत ही सचु पावा ॥ 2 ॥

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श्री दादूवाणी-राग सोरठ 19 जा कारण बहु फिरिये, कर तीरथ भ्रमि भ्रमि मरिये । सहजैं ही सो चीन्हा, हरि चीन्ह सबै सुख लीन्हा ॥ 3 ॥ प्रेम भक्ति जिन जानी, सो काहे भरमै प्राणी । हरि सहजैं ही भल मानैं, तातैं दादू और न जानैं ॥ 4 ॥ ३०९. परिचय विनती । वर्ण भिन्न ताल राम जी जनि भरमावो हम को, तातैं करूं विनती तुमको ॥ टेक ॥ चरण तुम्हारे सब ही देखूं, तप तीरथ व्रत दाना । गंग जमुन पास पाइन के, तहाँ देहु अस्नाना ॥ 1 ॥ संग तुम्हारे सब ही लागे, योग यज्ञ जे कीजे । साधन सकल येही सब मेरे, संग आपनो दीजैं ॥ 2 ॥ पूजा पाती देवी देवल, सब देखूं तुम मांहिं । मोको ओट आपणी दीजे, चरण कवल की छांहीं ॥ 3 ॥ ये अरदास दास की सुनिये, दूर करो भ्रम मेरा । दादू तुम बिन और न जानै, राखो चरणों नेरा ॥ 4 ॥ ३१०. उपास्य परिचय । वर्ण भिन्न ताल सोई देव पूजूं, जे टांची नहिं घड़िया, गर्भवास नहीं औतरिया ॥ टेक ॥ बिन जल संजम सदा सोइ देवा, भाव भक्ति करूं हरि सेवा ॥ 1 ॥ पाती प्राण हरि देव चढ़ाऊँ, सहज समाधि प्रेम ल्यौ लाऊँ ॥ 2 ॥ इहि विधि सेवा सदा तहँ होई, अलख निरंजन लखै न कोई ॥ 3 ॥ ये पूजा मेरे मन मानै, जिहि विधि होइ सु दादू न जानै ॥ 4 ॥ ३११. परिचय हैरान । खेमटा ताल राम राइ ! मोको अचरज आवै, तेरा पार न कोई पावै ॥ टेक ॥ ब्रह्मादिक सनकादिक नारद, नेति नेति जे गावै ।

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श्री दादूवाणी-राग सोरठ 19 शरण तुम्हारी रहै निशवासर, तिनको तूँ न लखावै ॥ 1 ॥ शंकर शेष सबै सुर मुनिजन, तिनको तूँ न जनावै । तीन लोक रटैं रसना भर, तिनको तूँ न दिखावै ॥ 2 ॥ दीन लीन राम रंग राते, तिनको तूँ संग लावै । अपने अंग की युक्ति न जानै, सो मन तेरे भावै ॥ 3 ॥ सेवा संजम करें जप पूजा, शब्द न तिनको सुनावै । मैं अछोप हीन मति मेरी, दादू को दिखलावै ॥ 4 ॥ इति राग सोरठ सम्पूर्णः ॥ 19 ॥ पद 14 ॥

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अथ राग गुंड (गौंड) २० (गायन समय वर्षा ऋतु में सब समय, संगीत प्रकाश के मतानुसार) ३12. भक्ति निष्काम । सुरफाख्ता ताल दर्शन दे राम ! दर्शन दे, हौं तो तेरी मुक्ति न माँगूं रे ।। टेक ।। सिद्धि न माँगूं, रिद्धि न माँगूं, तुम्ह ही माँगूं, गोविन्दा ।। 1 ।। जोग न माँगूं, भोग न माँगूं, तुम्ह ही माँगूं, रामजी ।। 2 ।। घर नहीं माँगूं, वन नहीं माँगूं, तुम्ह ही माँगूं, देवजी ।। 3 ।। दादू तुम बिन और न माँगूं, दर्शन माँगूं देहुजी ।। 4 ।। ३1३. विरह विनती । सुरफाख्ता ताल तूँ आपैं ही विचार, तुझ बिन क्यों रहूँ ? मेरे और न दूजा कोइ, दुःख किसको कहूँ ।। टेक ।।

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श्री दादूवाणी-राग गुंड(गौंड) 20 मीत हमारा सोइ, आदैं जे पीया । मुझे मिलावै कोइ, वै जीवन जीया ॥ 1 ॥ तेरे नैन दिखाइ, जीऊँ जिस आस रे । सो धन जीवै क्यों, नहीं जिस पास रे ॥ 2 ॥ पिंजर मांहैं प्राण, तुझ बिन जाइसी । जन दादू माँगे मान, कब घर आइसी ॥ 3 ॥ ३14. (गुजराती) सुरफाख्ता ताल हौं जोइ रही रे बाट, तूँ घर आवनें । तारा दर्शन थी सुख होइ, ते तूँ ल्यावनें ॥ टेक ॥ चरण जोवा नें खांत, ते तूँ देखाड़नें । तुझ बिना जीव देइ, दुहेली कामिनी ॥ 1 ॥ नैणें निहारूं बाट, ऊभी चावनी । तूँ अंतर थी ऊरो आव, देही जावनी ॥ 2 ॥ तूँ दया करी घर आव, दासी गाँवनी । जन दादू राम संभाल, बैन सुहाँवनी ॥ 3 ॥ ३15. झपताल पीव देखे बिन क्यों रहूँ, जिय तलफै मेरा । सब सुख आनन्द पाइये, मुख देखूं तेरा ॥ टेक ॥ पीव बिन कैसा जीवना, मोहि चैन न आवै । निर्धन ज्यों धन पाइये, जब दरस दिखावै ॥ 1 ॥ तुम बिन क्यों धीरज धरूं, जो लौं तोहि न पाऊँ । सन्मुख ह्वै सुख दीजिये, बलिहारी जाऊँ ॥ 2 ॥ विरह वियोग न सह सकूँ, कायर घट काचा । पावन परस न पाइये, सुनि साहिब साँचा ॥ 3 ॥

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सुनिये मेरी विनती, इब दर्शन दीजे। दादू देखन पावही, तैसैं कुछ कीजे ॥ 4 ॥ 316. प्रीति अखंडित । दादरा इहि विधि वेध्यो मोर मना, ज्यों लै भृंगी कीट तना ॥ टेक॥ चातक रटतैं रैन बिहाई, पिंड परै पै बान न जाई ॥ 1 ॥ मरै मीन बिसरै नहि पानी, प्राण तजे उन और न जानी ॥ 2 ॥ जलै शरीर न मोड़े अंगा, ज्योति न छाड़ै पड़ै पतंगा ॥ 3 ॥ दादू अब तै ऐसैं होहि, पिंड परै, नहीं छाडूं तोहि ॥ 4 ॥ 317. विरह । त्रिताल आओ राम दया कर मेरे, बार बार बलिहारी तेरे ॥ टेक॥ विरहनी आतुर पंथ निहारै, राम नाम कह पीव पुकारै ॥ 1 ॥ पंथी बूझै मारग जोवै, नैन नीर जल भर भर रोवै ॥ 2 ॥ निशदिन तलफै रहै उदास, आतम राम तुम्हारे पास ॥ 3 ॥ वपु विसरे तन की सुधि नांही, दादू विरहनी मृतक मांही ॥ 4 ॥ 318. केवल विनती । रूपक ताल निरंजन क्यों रहै, मौन गहे वैराग, केते जुग गये ॥ टेक॥ जागै जगपति राइ, हँस बोलै नहीं। परगट घूंघट मांहि, पट खोलै नहीं ॥ 1 ॥ सदके करूं संसार, सब जग वारणै। छाडूं सब परिवार, तेरे कारणै ॥ 2 ॥ वारूं पिंड पराण, पावों सिर धरूं। ज्यों ज्यों भावै राम, सो सेवा करूं ॥ 3 ॥ दीनानाथ दयाल ! विलंब न कीजिये।

दादू बलि बलि जाय, सेज सुख दीजिये ॥ 4 ॥ 319. निरंजन स्वरूप । त्रिताल निरंजन यूं रहै, काहू लिप्त न होइ । जल थल थावर जंगमा, गुण नहीं लागै कोइ ॥ टेक ॥ धर अंबर लागै नहिं, नहिं लागै शशिहर सूर । पाणी पवन लागै नहीं, जहाँ तहाँ भरपूर ॥ 1 ॥ निश वासर लागै नहीं, नहिं लागै शीतल घाम । क्षुधा तृषा लागै नहीं, घट-घट आतम राम ॥ 2 ॥ माया मोह लागै नहीं, नहिं लागै काया जीव । काल कर्म लागै नहीं, प्रगट मेरा पीव ॥ 3 ॥ इकलस एकै नूर है, इकलस एकै तेज । इकलस एकै ज्योति है, दादू खेलै सेज ॥ 4 ॥ 320. विनय । त्रिताल जग जीवन प्राण आधार, वाचा पालना । हौं कहाँ पुकारूं जाइ, मेरे लालना ॥ टेक ॥ मेरे वेदन अंग अपार, सो दुख टालना । सागर यह निस्तार, गहरा अति घणा ॥ 1 ॥ अंतर है सो टाल, कीजै आपणा । मेरे तुम बिन और न कोइ, इहै विचारणा ॥ 2 ॥ तातैं करूं पुकार, यहु तन चालणा । दादू को दर्शन देहु, जाय दुख सालणा ॥ 3 ॥ 321. मन की नीकी विनती । मल्लिका मोद ताल मेरे तुम ही राखणहार, दूजा को नहीं ।

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श्री दादूवाणी-राग गुंड(गौंड) 20 ये चंचल चहुँ दिशि जाय, काल तहीं तहीं ॥ टेक ॥ मैं केते किये उपाय, निश्चल ना रहै । जहाँ बरजूं तहँ जाय, मद मातो बहै ॥ 1 ॥ जहाँ जाणा तहँ जाय, तुम्ह तैं ना डरै । तासौं कहा बसाइ, भावै त्यों करै ॥ 2 ॥ सकल पुकारैं साध, मैं केता कह्या । गुरु अंकुश मानै नाहिं, निर्भय है रह्या ॥ 3 ॥ तुम बिन और न कोइ, इस मन को गहै । तूँ राखै राखणहार, दादू तो रहै ॥ 4 ॥ ३२२. संसार की नीकी विनती । दीपचन्दी ताल निरंजन, कायर कंपै प्राणिया, देखि यहु दरिया । वार पार सूझै नहीं, मन मेरा डरिया ॥ टेक ॥ अति अथाह यह भौजला, आसंघ नहिं आवै । देख देख डरपै घणा, प्राणी दुख पावै ॥ 1 ॥ विष जल भरिया सागरा, सब थके सयाना । तुम बिन कहु कैसे तिरूं, मैं मूढ़ अयाना ॥ 2 ॥ आगे ही डरपै घणा, मेरी का कहिये । कर गहि काढो केशवा, पार तो लहिये ॥ 3 ॥ एक भरोसा तोर है, जे तुम होहु दयाला । दादू कहु कैसे तिरै ! तूँ तार गोपाला ॥ 4 ॥ ३२३. समर्थ उपदेश । दादरा ताल समर्थ मेरा सांइयां, सकल अघ जारै, सुख दाता मेरे प्राण का, संकोच निवारै ॥ टेक ॥ त्रिविध ताप तन की हरै, चौथे जन राखै ।

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श्री दादूवाणी-राग गुंड(गौंड) 20 आप समागम सेवका, साधू यूं भाखै ॥ 1 ॥ आप करै प्रतिपालना, दारुण दुख टारै। इच्छा जन की पूरवै, सब कारज सारै ॥ 2 ॥ कर्म कोटि भय भंजना, सुख मंडन सोई। मन मनोरथ पूरणा, ऐसा और न कोई ॥ 3 ॥ ऐसा और न देखिहौं, सब पूरण कामा। दादू साधु संगी किये, उन आतम रामा ॥ 4 ॥ 324. (गुजराती) मन स्थिरार्थ विनती । त्रिताल तुम बिन राम कवन कलि मांही, विषिया थैं कोइ वारे रे। मुनियर मोटा मनवैं बाह्या, येन्हा कौन मनोरथ मारे रे ॥ टेक ॥ छिन एकैं मनवो मर्कट माहरो, घर घरबार नचावे रे। छिन एकैं मनवो चंचल माहरो, छिन एकैं घरमां आवे रे ॥ 1 ॥ छिन एकैं मनवो मीन अम्हारो, सचराचर मां धाये रे। छिन एकैं मनवो उदमद मातो, स्वादैं लागो खाये रे ॥ 2 ॥ छिन एकैं मनवो ज्योति पतंगा, भ्रम भ्रम स्वादैं दाझे रे। छिन एकैं मनवो लोभैं लागो, आपा पर में बाझे रे ॥ 3 ॥ छिन एकैं मनवो कुंजर माहरो, वन वन मांहिं भ्रमाड़े रे। छिन एकैं मनवो कामी माहरो, विषिया रंग रमाड़े रे ॥ 4 ॥ छिन एकैं मनवो मिरग अम्हारो, नादैं मोह्यो जाये रे। छिन एकैं मनवो माया रातो, छिन एकैं हमनें बाहे रे ॥ 5 ॥ छिन एकैं मनवो भँवर अम्हारो, बासैं कंवल बँधाणें रे। छिन एकैं मनवो चहुँ दिशि जाये, मनवा नें कोई आणें रे ॥ 6 ॥ तुम बिन राखै कौन विधाता, मुनिवर साखी आणें रे। दादू मृतक छिन में जीवे, मनवा चरित न जाणें रे ॥ 7 ॥

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श्री दादूवाणी-राग गुंड(गौंड) 20 325. बेखर्च व्यसनी । ब्रह्म ताल करणी पोच, सोच सुख करई, लौह की नाव कैसे भौजल तिरई ॥ टेक ॥ दक्षिण जात पश्चिम कैसे आवै, नैन बिन भूल बाट कित पावै ॥ 1 ॥ विष वन बेलि, अमृत फल चाहै, खाइ हलाहल, अमर उमाहै ॥ 2 ॥ अग्नि गृह पैसि कर सुख क्यों सोवै, जलन लागी घणी, सीत क्यों होवै ॥ 3 ॥ पाप पाखंड कीये, पुण्य क्यों पाइये, कूप खन पड़िबा, गगन क्यों जाइये ॥ 4 ॥ कहै दादू मोहि अचरज भारी, हिरदै कपट क्यों मिलै मुरारी ॥ 5 ॥ 326. परिचय प्राप्ति । खेमटा ताल मेरा मन के मन सौं मन लागा, शब्द के शब्द सौं नाद बागा ॥ टेक ॥ श्रवण के श्रवण सुन सुख पाया, नैन के नैन सौं निरख राया ॥ 1 ॥ प्राण के प्राण सौं खेल प्राणी, मुख के मुख सौं बोल वाणी ॥ 2 ॥ जीव के जीव सौं रंग राता, चित्त के चित्त सौं प्रेम माता ॥ 3 ॥ शीश के शीश सौं शीश मेरा, देखि रे दादू वा भाग तेरा ॥ 4 ॥ 327. मन को उपदेश । त्रिताल मल्हार में मेरे शिखर चढ़ बोल मन मोरा, राम जल वर्षे शब्द सुण तोरा ॥ टेक ॥ आरत आतुर पीव पुकारै, सोवत जागत पंथ निहारै ॥ 1 ॥ निशवासर कह अमृत वाणी, राम नाम ल्यौ लाइ ले प्राणी ॥ 2 ॥ टेर मन भाई, जब लग जीवे, प्रीति कर गाढ़ी प्रेम रस पीवे ॥ 3 ॥ दादू अवसर जे जन जागे, राम घटा-जल वरषण लागे ॥ 4 ॥ 328. वैराग्य उपदेश त्रिताल नारी नेह न कीजिये, जे तुझ राम पियारा, माया मोह न बंधिये, तजिये संसारा ॥ टेक ॥ विषिया रंग राचै नहीं, नहीं करै पसारा।

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श्री दादूवाणी-राग गुंड(गौंड) 20 देह गेह परिवार में, सब तैं रहै नियारा ॥ 1 ॥ आपा पर उरझै नहीं, नाहीं मैं मेरा। मनसा वाचा कर्मना, सांई सब तेरा ॥ 2 ॥ मन इन्द्रिय स्थिर करे, कतहूं नहिं डोले। जग विकार सब परिहरे, मिथ्या नहिं बोले ॥ 3 ॥ रहे निरंतर राम सौं, अंतरगति राता। गावे गुण गोविन्द का, दादू रस माता ॥ 4 ॥ 329. आज्ञाकारी । झपताल तूं राखै त्यों ही रहैं, तेई जन तेरा। तुम्ह बिन और न जानहीं, सो सेवक नेरा ॥ टेक ॥ अम्बर आपै ही धन्या, अजहूँ उपकारी। धरती धारी आप तैं, सबही सुखकारी ॥ 1 ॥ पवन पास सब के चलै, जैसे तुम कीन्हा। पानी परकट देखिहूँ, सब सौं रहै भीना ॥ 2 ॥ चंद चिराकी चहुँ दिशा, सब शीतल जानै। सूरज भी सेवा करै, जैसे भल मानै ॥ 3 ॥ ये निज सेवक तेरड़े, सब आज्ञाकारी। मोको ऐसे कीजिये, दादू बलिहारी ॥ 4 ॥ 330. निन्दक । झपताल निदंक बाबा बीर हमारा, बिनही कौड़े बहै बिचारा ॥ टेक ॥ कर्म कोटि के कश्मल काटे, काज सँवारै बिन ही साटे ॥ 1 ॥ आपण डूबै और को तारे, ऐसा प्रीतम पार उतारे ॥ 2 ॥ जुग जुग जीवो निन्दक मोरा, राम देव तुम करो निहोरा ॥ 3 ॥ निदंक बपुरा पर उपकारी, दादू निंदा करै हमारी ॥ 4 ॥

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श्री दादूवाणी-राग गुंड(गौंड) 20 ३३१. विरह विनती । शूलताल देहुजी, देहुजी, प्रेम पियाला देहुजी, देकर बहुरि न लेहुजी ॥ टेक ॥ ज्यों-ज्यों नूर न देखूं तेरा, त्यों-त्यों जियरा तलफै मेरा ॥ 1 ॥ अमी महारस नाम न आवै, त्यों-त्यों प्राण बहुत दुख पावै ॥ 2 ॥ प्रेम भक्ति रस पावै नाँहीं, त्यों-त्यों सालै मन ही मांहीं ॥ 3 ॥ सेज सुहाग सदा सुख दीजे, दादू दुखिया विलम्ब न कीजे ॥ 4 ॥ ३३२. परिचय विनती । त्रिताल वर्षहु राम अमृतधारा, झिलमिल झिलमिल सींचनहारा ॥ टेक ॥ प्राण बेलि निज नीर न पावै, जलहर बिना कमल कुम्हलावै ॥ 1 ॥ सूखे बेली सकल बनराय, राम देव जल वर्षहु आय ॥ 2 ॥ आतम बेली मरै पियास, नीर न पावै दादूदास ॥ 3 ॥ इति राग गुंड सम्पूर्ण: ॥ 20 ॥ पद 20 ॥

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राग बिलावल www.dadooram.org अथ राग बिलावल २१ (गायन समय प्रातः 6 से 9) ३३३. परिचय विनती । त्रिताल दया तुम्हारी दर्शन पड्ये । जानत हो तुम अंतरजामी, जानराय तुम सौं कहा कहिये ॥ टेक ॥ तुम सौं कहा चतुराई कीजै, कौण कर्म कर तुम पाये । को नहीं मिले प्राण बल अपने, दया तुम्हारी तुम आये ॥ 1 ॥ कहा हमारो आन तुम आगे, कौन कला कर वश किये । जीते कौन बुद्धि बल पौरुष, रुचि अपनी तैं सरण लिये ॥ 2 ॥ तुम ही आदि अंत पुनि तुम ही, तुम कर्ता त्रय लोक मंझार । कुछ नांही तैं कहा होत है, दादू बलि पावे दीदार ॥ 3 ॥

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श्री दादूवाणी-राग बिलावल 21

३३४. (फारसी) विनती । उदीक्षण ताल मालिक महरबान करीम । गुनहगार हररोज हरदम, पन्ह राख रहीम ॥ टेक ॥ अव्वल आखिर बंदा गुनही, अमल बद विसियार । गरक दुनिया सत्तार साहिब, दरदवंद पुकार ॥ 1 ॥ फरामोश नेकी बदी करद, बुराई बद फैल । बख्शिन्दः तूँ अजीब आखिर, हुक्म हाजिर सैल ॥ 2 ॥ नाम नेक रहीम राजिक, पाक परवरदिगार । गुनह फिल कर देहु दादू, तलब दर दीदार ॥ 3 ॥ ३३५. उदीक्षण ताल कौण आदमी कमीण विचारा, किसको पूजे गरीब पियारा ॥ टेक ॥ मैं जन एक, अनेक पसारा, भौजल भरिया अधिक अपारा ॥ 1 ॥ एक होइ तो कहि समझाऊँ, अनेक अरूझे क्यों सुरझाऊँ ॥ 2 ॥ मैं हौं निबल, सबल ये सारे, क्यों कर पूजूं बहुत पसारे ॥ 3 ॥ पीव पुकारूं समझत नाहीं, दादू देखु दशों दिशि जाहीं ॥ 4 ॥ ३३६. उपदेश चेतावनी । भंगताल जागहु जियरा काहे सोवे, सेव करीमा तो सुख होवै ॥ टेक ॥ जातैं जीवन सो तैं विसारा, पच्छिम जाना पथ न संवारा । मैं मेरी कर बहुत भुलाना, अजहुँ न चेतै दूर पयाना ॥ 1 ॥ सांई केरी सेवा नाँहीं, फिर फिर डूबै दरिया मांहीं । ओर न आवा, पार न पावा, झूठा जीवन बहुत भुलावा ॥ 2 ॥ मूल न राख्या लाह न लीया, कौड़ी बदले हीरा दीया । फिर पछताना संबल नाहीं, हार चल्या क्यों पावै सांई ॥ 3 ॥ इब सुख कारण फिर दुख पावै, अजहुँ न चेतै क्यों दहकावै ।

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श्री दादूवाणी-राग बिलावल 21 दादू कहै सीख सुन मेरी, कहु करीम संभाल सबेरी ॥ 4 ॥ 337. भंगताल बार बार तन नहीं वावरे, काहे को बाद गँवावै रे । बिनसत बार कछू नहिं लागै, बहुरि कहाँ को पावै रे ॥ टेक ॥ तेरे भाग बड़े भाव धर कीन्हाँ, क्यों कर चित्र बनावै रे । सो तूँ लेइ विषय में डारे, कंचन छार मिलावै रे ॥ 1 ॥ तूँ मत जानै बहुरि पाइये, अब कै जनि डहिकावै रे । तीनि लोक की पूँजी तेरे, बनिज बेगि सो आवै रे ॥ 2 ॥ जब लग घट मैं श्वास वास है, तब लग काहे न ध्यावै रे । दादू तन धर नाम न लीन्हा, सो प्राणी पछतावै रे ॥ 3 ॥ 338. ललित ताल राम विसार्यो रे जगनाथ । हीरा हार्यो देखत ही रे, कौड़ी कीन्ही हाथ ॥ टेक ॥ काचहुता कंचन कर जानै, भूल्यो रे भ्रम पास । साचे सौं पल परिचय नाहीं, कर काचे की आस ॥ 1 ॥ विष ताको अमृत कर जानै, सो संग न आवै साथ । सेमल के फूलन पर फूल्यो, चूक्यो अब की घात ॥ 2 ॥ हरि भज रे मन सहज पिछानै, ये सुन साची बात । दादू रे अब तैं कर लीजै, आयु घटै दिन जात ॥ 3 ॥ 339. मन । ललित ताल मन चंचल मेरो कह्यो न मानै, दसों दिशा दौरावै रे । आवत जात बार नहि लागै, बहुत भाँति बौरावै रे ॥ टेक ॥ बेर बेर बरजत या मन को, किंचित सीख न मानै रे ।

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श्री दादूवाणी-राग बिलावल 21 ऐसे निकस जाइ या तन तैं, जैसे जीव न जानै रे ॥ 1 ॥ कोटिक जतन करत या मन को, निश्चल निमष न होई रे । चंचल चपल चहुँ दिशि भरमै, कहा करै जन कोई रे ॥ 2 ॥ सदा सोच रहत घट भीतर, मन थिर कैसे कीजे रे । सहजैं सहज साधु की संगति, दादू हरि भजि लीजे रे ॥ 3 ॥ ३४०. माया । उत्सव ताल इन कामिनी घर घाले रे । प्रीति लगाइ प्राण सब सोषै, बिन पावक जिय जाले रे ॥ टेक ॥ अंग लगाइ सार सब लेवै, इनतैं कोई न बाचै रे । यहु संसार जीत सब लीया, मिलन न देई साचै रे ॥ 1 ॥ हेत लगाइ सबै धन लेवै, बाकी कछु न राखै रे । माखन मांहि सोध सब लेवै, छाछ छिया कर नाखै रे ॥ 2 ॥ जे जन जानि जुगति सौं त्यागैं, तिन को निज पद परसै रे । काल न खाइ, मरै नहिं कबहुँ, दादू तिनको दरशै रे ॥ 3 ॥ ३४१. विश्वास । उत्सव ताल जनि सत छाड़ै बावरे, पूरक है पूरा । सिरजे की सब चिन्त है, देबे को सूरा ॥ टेक ॥ गर्भवास जिन राखिया, पावक तैं न्यारा । युक्ति यत्न कर सींचिया, दे प्राण अधारा ॥ 1 ॥ कुंज कहाँ धर संचरै, तहाँ को रखवारा । हिमहर तैं जिन राखिया, सो खसम हमारा ॥ 2 ॥ जल थल जीव जिते रहैं, सो सब को पूरै । संपट सिला में देत है, काहे नर झूरै ॥ 3 ॥ जिन यहु भार उठाइया, निर्वाहै सोई ।

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