देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
| अ० २८ ] | पञ्चम स्कन्ध | ६८१ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| अन्यैर्जघान विशिखै रक्तबीजं महासुरम्।<br>अम्बिका चापनिर्मुक्तैः कर्णाकृष्टैः शिलाशितैः॥ ८ | इसके बाद अम्बिकाने कानतक खींचकर धनुषसे छोड़े गये तथा पत्थरपर घिसकर तीक्ष्ण बनाये गये अन्य बाणोंसे महान् असुर रक्तबीजपर प्रहार किया॥ ८॥ |
| देवीबाणहतः पापो मूर्च्छामप रथोपरि।<br>पतिते रक्तबीजे तु हाहाकारो महानभूत्॥ ९ | भगवतीके बाणोंसे आहत होकर पापी रक्तबीज रथपर ही मूर्च्छित हो गया। रक्तबीजके गिर जानेपर बड़ा हाहाकार मच गया। उसके सभी सैनिक चीखने-चिल्लाने लगे और 'हाय! हम मारे गये'—ऐसा कहने लगे॥ ९ १/२॥ |
| सैनिकाश्चुक्रुशुः सर्वे हताः स्म इति चाब्रुवन्।<br>ततो बुम्बारवं श्रुत्वा शुम्भः परमदारुणम्॥ १०<br>उद्योगं सर्वसैन्यानां दैत्यानामादिदेश ह। | तब अपने सैनिकोंका अत्यन्त भीषण क्रन्दन सुनकर शुम्भने सभी दैत्ययोद्धाओंको शस्त्रास्त्रसे सुसज्जित होनेका आदेश दिया॥ १० १/२॥ |
| शुम्भ उवाच<br>निर्यान्तु दानवाः सर्वे काम्बोजाः स्वबलैर्वृताः॥ ११<br>अन्येऽप्यतिबलाः शूराः कालकेया विशेषतः। | शुम्भ बोला—कम्बोजदेशके सभी दानव तथा उनके अतिरिक्त अन्य महाबली वीर विशेष करके कालकेयसंज्ञक पराक्रमी योद्धा भी अपनी-अपनी सेनाके साथ निकल पड़ें॥ ११ १/२॥ |
| व्यास उवाच<br>इत्याज्ञप्तं बलं सर्वं शुम्भेन च चतुर्विधम्॥ १२<br>निर्जगाम मदाविष्टं देवीसमरमण्डले।<br>तमागतं समालोक्य चण्डिका दानवं बलम्॥ १३<br>घण्टानादं चकाराशु भीषणं भयदं मुहुः।<br>ज्यास्वनं शङ्खनादञ्च चकार जगदम्बिका॥ १४<br>तेन नादेन सा जाता काली विस्तारितानना।<br>श्रुत्वा तन्निनादं घोरं सिंहो देव्याश्च वाहनम्॥ १५ | व्यासजी बोले—इस प्रकार शुम्भके आदेश देनेपर उसकी सारी चतुरंगिणी सेना मदमत्त होकर देवीके संग्रामस्थलके लिये निकल पड़ी। समरभूमिमें आयी हुई उस दानवी सेनाको देखकर भगवती चण्डिका बार-बार भीषण तथा भयदायक घण्टानाद करने लगीं। जगदम्बाने धनुषका टंकार तथा शंखनाद किया। उस नादके होते ही भगवती काली भी अपना मुख फैलाकर घोर ध्वनि करने लगीं॥ १२—१४ १/२॥ |
| जगर्ज सोऽपि बलवाञ्जनयन्भयमद्भुतम्।<br>तन्निनादमुपश्रुत्य दानवाः क्रोधमूर्च्छिताः॥ १६ | उस भयंकर शब्दको सुनकर भगवतीका वाहन बलशाली सिंह भी अद्भुत भय उत्पन्न करता हुआ बड़े जोरका गर्जन करने लगा। वह निनाद सुनकर सभी दैत्य क्रोधके मारे बौखला उठे और वे महाबली दैत्य देवीपर अस्त्र छोड़ने लगे॥ १५-१६ १/२॥ |
| सर्वे चिक्षिपुरस्त्राणि देवीं प्रति महाबलाः।<br>तस्मिन्नेवायते युद्धे दारुणे लोमहर्षणे॥ १७<br>ब्रह्मादीनाञ्च देवानां शक्तयश्चण्डिकां ययुः।<br>यस्य देवस्य यद्रूपं यथा भूषणवाहनम्॥ १८<br>तादृग्रूपास्तदा देव्यः प्रययुः समराङ्गणे। | उस भयानक तथा रोमांचकारी महासंग्राममें ब्रह्मा आदि देवताओंकी विभिन्न शक्तियाँ भी चण्डिकाके पास पहुँच गयीं। जिस देवताका जैसा रूप, भूषण तथा वाहन था; ठीक उसी प्रकारके रूप, भूषण तथा वाहनसे युक्त होकर सभी देवियाँ रणक्षेत्रमें पहुँची थीं॥ १७-१८ १/२॥ |
| ६८२ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० २८ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| ब्रह्माणी वरटारूढा साक्षसूत्रकमण्डलुः॥ १९<br><br>आगता ब्रह्मणः शक्तिर्ब्रह्माणीति परिश्रुता।<br>वैष्णवी गरुडारूढा शङ्खचक्रगदाधरा॥ २०<br><br>पद्महस्ता समायाता पीताम्बरविभूषिता।<br>शाङ्करी तु वृषारूढा त्रिशूलवरधारिणी॥ २१<br><br>अर्धचन्द्रधरा देवी तथाहिवलया शिवा। | ब्रह्माजीकी शक्ति, जो ब्रह्माणी नामसे प्रख्यात हैं, हाथमें अक्षसूत्र तथा कमण्डलु धारण करके हंसपर आरूढ़ हो वहाँ आयीं। भगवान् विष्णुकी शक्ति वैष्णवी गरुडपर सवार होकर रणभूमिमें आयीं। वे पीताम्बरसे विभूषित थीं तथा उन्होंने हाथोंमें शंख-चक्र-गदा-पद्म धारण कर रखा था। शंकरकी शक्ति भगवती शिवा बैलपर सवार होकर हाथमें उत्तम त्रिशूल लिये मस्तकपर अर्धचन्द्र धारण किये तथा सर्पोंके कंगन पहने वहाँ उपस्थित हुईं॥ १९-२१३॥ |
| कौमारी शिखिसंरूढा शक्तिहस्ता वरानना॥ २२<br><br>युद्धकामा समायाता कार्तिकेयस्वरूपिणी।<br>इन्द्राणी सुष्ठुवदना सुश्वेतगजवाहना॥ २३<br><br>वज्रहस्तातिरोषाढ्या संग्रामाभिमुखी ययौ।<br>वाराही शूकराकारा प्रौढप्रेतासना मता॥ २४<br><br>नारसिंही नृसिंहस्य बिभ्रती सदृशं वपुः।<br>याम्या च महिषारूढा दण्डहस्ता भयप्रदा॥ २५<br><br>समायाताथ संग्रामे यमरूपा शुचिस्मिता।<br>तथैव वारुणी शक्तिः कौबेरी च मदोत्कटा॥ २६<br><br>एवंविधास्तथाकारा ययुः स्वस्वबलैर्वृताः।<br>आगतास्ताः समालोक्य देवी मुदमवाप च॥ २७<br><br>स्वस्था मुमुदिरे देवा दैत्याश्च भयमाययुः। | भगवान् कार्तिकेयके समान ही रूप धारण करके सुन्दर मुखवाली भगवती कौमारी युद्धकी इच्छासे हाथमें शक्ति धारण करके मयूरपर आरूढ़ होकर आयीं। सुन्दर मुखवाली इन्द्राणी अतिशय उज्ज्वल हाथीपर सवार होकर हाथमें वज्र लिये उग्र क्रोधसे आविष्ट हो समरभूमिमें पहुँचीं। इसी प्रकार सूकरका रूप धारण करके एक विशाल प्रेतपर सवार होकर भगवती वाराही, नृसिंहके समान रूप धारण करके भगवती नारसिंही और यमराजके ही समान रूपवाली भयदायिनी शक्ति भगवती याम्या हाथमें दण्ड धारण किये तथा महिषपर आरूढ़ होकर मधुर-मधुर मुसकराती हुई संग्राममें आयीं। उसी प्रकार वरुणकी शक्ति वारुणी तथा कुबेरकी मदोन्मत्त शक्ति कौबेरी भी समरभूमिमें पहुँच गयीं। इसी तरह अन्य देवताओंकी शक्तियाँ भी उन्हीं देवोंका रूप धारणकर अपनी-अपनी सेनाओंके साथ रणभूमिमें उपस्थित हुईं। उन शक्तियोंको वहाँ उपस्थित देखकर भगवती अम्बिका बहुत हर्षित हुईं। इससे देवता निश्चिन्त तथा प्रसन्न हो गये और दैत्य भयभीत हो उठे॥ २२-२७३॥ |
| ताभिः परिवृतस्तत्र शङ्करो लोकशङ्करः॥ २८<br><br>समागम्य च संग्रामे चण्डिकामित्युवाच ह।<br>हन्यन्तामसुराः शीघ्रं देवानां कार्यसिद्धये॥ २९<br><br>निशुम्भं चैव शुम्भं च ये चान्ये दानवाः स्थिताः।<br>हत्वा दैत्यबलं सर्वं कृत्वा च निर्भयं जगत्॥ ३० | लोककल्याणकारी शिवजी भी उन शक्तियोंके साथ वहाँ संग्राममें भगवती चण्डिकाके पास आकर उनसे कहने लगे—देवताओंकी कार्यसिद्धिके लिये आप शुम्भ-निशुम्भ तथा अन्य जो भी दानव उपस्थित हैं, उन सबका वध कर दीजिये। साथ ही सारी असुर-सेनाका संहार करके और इस प्रकार संसारको भयमुक्त करके ये समस्त शक्तियाँ अपने-अपने |
अ० २८ ] पञ्चम स्कन्ध ६८३
अ० २८ ] पञ्चम स्कन्ध ६८३
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| स्वानि स्वानि च धिष्ण्यानि समागच्छन्तु शक्तयः।<br>देवा यज्ञभुजः सन्तु ब्राह्मणा यजने रताः॥ ३१<br><br>प्राणिनः सन्तु सन्तुष्टाः सर्वे स्थावरजङ्गमाः।<br>शमं यान्तु तथोत्पाता ईतयश्च तथा पुनः॥ ३२<br><br>घनाः काले प्रवर्षन्तु कृषिर्बहुफला तथा। | स्थानोंको चली जायें। [आप यह कार्य सम्पन्न करें जिससे] देवता यज्ञभाग पाने लगें, ब्राह्मण [निर्भय होकर] यज्ञ आदि करनेमें तत्पर हो जायँ, सभी स्थावर-जंगम प्राणी सन्तुष्ट हो जायँ, सब प्रकारके उपद्रव और अकाल आदि आपदाएँ समाप्त हो जायें, मेघ समयपर वृष्टि करें और कृषि लोगोंके लिये अधिक फलदायिनी हो॥ २८—३२ १/२॥ |
| व्यास उवाच<br>एवं ब्रुवति देवेशे शङ्करे लोकशङ्करे॥ ३३<br><br>चण्डिकायाः शरीरात्तु निर्गता शक्तिरद्भुता।<br>भीषणातिप्रचण्डा च शिवाशतनिनादिनी॥ ३४<br><br>घोररूपाथ पञ्चास्यमित्युवाच स्मितानना।<br>देवदेव व्रजाशु त्वं दैत्यानामधिपं प्रति॥ ३५<br><br>दूतत्वं कुरु कामारे ब्रूहि शुम्भं स्मराकुलम्।<br>निशुम्भञ्च मदोत्सिक्तं वचनान्मम शङ्कर॥ ३६<br><br>मुक्त्वा त्रिविष्टपं यात यूयं पातालमाशु वै।<br>देवाः स्वर्गे सुखं यान्तु तुराषाट् स्वासनं शुभम्॥ ३७<br><br>प्राप्नोतु त्रिदिवं स्थानं यज्ञभागांश्च देवताः।<br>जीवितेच्छा च युष्माकं यदि स्यात्तु महत्तरा॥ ३८<br><br>तर्हि गच्छत पातालं तरसा यत्र दानवाः।<br>अथवा बलमास्थाय युद्धेच्छा मरणाय चेत्॥ ३९<br><br>तदागच्छन्तु तृप्यन्तु मच्छिवाः पिशितेन वः। | व्यासजी बोले—लोकका कल्याण करनेवाले देवेश्वर शिवके ऐसा कहनेपर भगवती चण्डिकाके शरीरसे एक अद्भुत शक्ति प्रकट हुई। वह शक्ति अत्यन्त भयंकर तथा प्रचण्ड थी, वह सैकड़ों सियारिनोंके समवेत स्वरके समान ध्वनि कर रही थी और उसका रूप बहुत भयानक था। मन्द-मन्द मुसकानयुक्त मुखमण्डलवाली उस शक्तिने पंचमुख शिवजीसे कहा—हे देवदेव! आप दैत्यराज शुम्भके पास शीघ्र जाइये। हे कामरिपु! इस समय आप मेरे दूतका काम कीजिये। हे शंकर! कामपीड़ित शुम्भ तथा मदोन्मत्त निशुम्भसे मेरे शब्दोंमें कह दीजिये—‘तुम सब तत्काल स्वर्ग त्यागकर पाताललोक चले जाओ, जिससे देवगण सुखपूर्वक स्वर्गमें प्रविष्ट हो सकें और इन्द्रको स्वर्गलोक तथा अपना उत्तम इन्द्रासन पुनः प्राप्त हो जाय; साथ ही सभी देवताओंको उनके यज्ञभाग पुनः मिलने लगें। यदि जीवित रहनेकी तुमलोगोंकी बलवती इच्छा हो तो तुमलोग बहुत शीघ्र पाताललोक चले जाओ, जहाँ दानवलोग रहते हैं। अथवा अपने बलका आश्रय लेकर यदि तुम सब युद्धकी इच्छा रखते हो, तो मरनेके लिये आ जाओ, जिससे मेरी सियारिनें तुमलोगोंके कच्चे मांससे तृप्त हो जायँ॥ ३३—३९ १/२॥ |
| व्यास उवाच<br>तच्छ्रुत्वा वचनं तस्याः शूलपाणिस्त्वरान्वितः॥ ४०<br><br>गत्वाह दैत्यराजानं शुम्भं सदसि संस्थितम्। | व्यासजी बोले—चण्डिकाका यह वचन सुनकर शिव अपनी सभामें बैठे हुए दैत्यराज शुम्भके पास शीघ्र जाकर उससे कहने लगे॥ ४० १/२॥ |
| शिव उवाच<br>राजन् दूतोऽहमम्बायास्त्रिपुरान्तकरो हरः॥ ४१<br><br>त्वत्सकाशमिहायातो हितं कर्तुं तवाखिलम्।<br>त्यक्त्वा स्वर्गं तथा भूमिं यूयं गच्छत सत्वरम्॥ ४२ | शिवजी बोले—हे राजन्! मैं त्रिपुरासुरका संहार करनेवाला महादेव हूँ। अम्बिकाका दूत बनकर मैं इस समय तुम्हारा सम्पूर्ण हित करनेके लिये यहाँ तुम्हारे पास आया हूँ। [देवीने कहलाया है कि] तुमलोग स्वर्ग तथा भूलोक त्यागकर शीघ्र पाताललोक |
| ६८४ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० २८ | | :--- | :--- |
| पातालं यत्र प्रह्लादो बलिश्च बलिनां वरः।<br>अथवा मरणेच्छा चेत्तर्ह्यागच्छत सत्वरम्॥ ४३<br><br>संग्रामे वो हनिष्यामि सर्वान्नेवाहमाशु वै।<br>इत्युवाच महाराज्ञी युष्मत्कल्याणहेतवे॥ ४४ | चले जाओ, जहाँ प्रह्लाद तथा बलवानोंमें श्रेष्ठ राजा बलि रहते हैं। अथवा यदि मरनेकी ही इच्छा हो तो तुरंत सामने आ जाओ; मैं तुम सबको संग्राममें शीघ्र ही मार डालूँगी। तुमलोगोंके कल्याणके लिये महारानी अम्बिकाने ऐसा कहा है॥ ४१–४४॥ | | व्यास उवाच<br>इति दैत्यवरान्देवीवाक्यं पीयूषसन्निभम्।<br>हितकृच्छ्रावयित्वा स प्रत्यायातश्च शूलभृत्॥ ४५ | **व्यासजी बोले—**भगवतीका यह अमृत-तुल्य कल्याणकारी सन्देश उन प्रधान दैत्योंको सुनाकर शूलधारी भगवान् शंकर लौट आये॥ ४५॥ | | ययासौ प्रेरितः शम्भूर्दूतत्वे दानवान्प्रति।<br>शिवदूतीति विख्याता जाता त्रिभुवनेऽखिले॥ ४६ | भगवती अम्बिकाने शिवजीको दूत बनाकर दानवोंके पास भेजा था, अतः वे सम्पूर्ण त्रिलोकीमें ‘शिवदूती’ इस नामसे विख्यात हुईं॥ ४६॥ | | तेऽपि श्रुत्वा वचो देव्याः शङ्करोक्तं तु दुष्करम्।<br>युद्धाय निर्ययुः शीघ्रं दंशिताः शस्त्रपाणयः॥ ४७ | शंकरजीके मुखसे कहे गये भगवतीके इस दुष्कर सन्देशको सुनते ही वे दैत्य भी कवच धारण करके तथा हाथोंमें शस्त्र लेकर शीघ्र ही युद्धके लिये निकल पड़े॥ ४७॥ | | तरसा रणमागत्य चण्डिकां प्रति दानवाः।<br>निर्जघ्नुश्च शरैस्तीक्ष्णैः कर्णाकृष्टैः शिलाशितैः॥ ४८ | वे दानव बड़े वेगसे रणभूमिमें चण्डिकाके समक्ष आकर कानोंतक खींचे गये तथा पत्थरपर सान चढ़े तीखे बाणोंसे प्रहार करने लगे॥ ४८॥ | | कालिका शूलपातैस्तान् गदाशक्तिविदारितान्।<br>कुर्वन्ती व्यचरत्तत्र भक्षयन्ती च दानवान्॥ ४९ | भगवती कालिका त्रिशूल, गदा और शक्तिसे दानवोंको विदीर्ण करती हुई और उनका भक्षण करती हुई युद्धमें विचरने लगीं॥ ४९॥ | | कमण्डलुजलाक्षेपगतप्राणान् महाबलान्।<br>ब्रह्माणी चाकरोत्तत्र दानवान्समराङ्गणे॥ ५० | भगवती ब्रह्माणी युद्धभूमिमें अपने कमण्डलुके जलके प्रक्षेपमात्रसे उन महाबली दानवोंको प्राणशून्य कर देती थीं॥ ५०॥ | | माहेश्वरी वृषारूढा त्रिशूलेनातिरंहसा।<br>जघान दानवान्संख्ये पातयामास भूतले॥ ५१ | वृषभपर विराजमान भगवती माहेश्वरी अपने त्रिशूलसे रणमें दानवोंपर बड़े वेगसे प्रहार करती थीं और उन्हें मारकर धराशायी कर देती थीं॥ ५१॥ | | वैष्णवी चक्रपातेन गदापातेन दानवान्।<br>गतप्राणांश्चकाराशु चोत्तमाङ्गविवर्जितान्॥ ५२ | भगवती वैष्णवी गदा तथा चक्रके प्रहारसे दानवोंको निष्प्राण तथा सिरविहीन कर डालती थीं॥ ५२॥ | | ऐन्द्री वज्रप्रहारेण पातयामास भूतले।<br>ऐरावतकराघातपीडितान्दैत्यपुङ्गवान् ॥ ५३ | इन्द्रकी शक्ति देवी ऐन्द्री ऐरावत हाथीकी सूँड़की चोटसे पीड़ित बड़े-बड़े दैत्योंको अपने वज्रके प्रहारसे भूतलपर गिरा देती थीं॥ ५३॥ | | वाराही तुण्डघातेन दंष्ट्राग्रपातनेन च।<br>जघान क्रोधसंयुक्ता शतशो दैत्यदानवान्॥ ५४ | देवी वाराही कुपित होकर अपने तुण्ड तथा भयंकर दाढ़ोंके प्रहारसे सैकड़ों दैत्यों और दानवोंको मार डालती थीं॥ ५४॥ | | नारसिंही नखैस्तीव्रैर्दारितान्दैत्यपुङ्गवान्।<br>भक्षयन्ती चचाराजौ ननाद च मुहुर्मुहुः॥ ५५ | देवी नारसिंही अपने तीक्ष्ण नखोंसे बड़े-बड़े दैत्योंको फाड़-फाड़कर खाती हुई रणभूमिमें विचर रही थीं तथा बार-बार गर्जना कर रही थीं॥ ५५॥ |
अ० २९] पञ्चम स्कन्ध ६८५
अ० २९] पञ्चम स्कन्ध ६८५
| शिवदूती अट्टहासैः पातयामास भूतले।<br>तांश्चखादाथ चामुण्डा कालिका च त्वरान्विता॥ ५६ | शिवदूती अपने अट्टहाससे ही दैत्योंको धराशायी कर देती थीं और चामुण्डा तथा कालिका बड़ी शीघ्रतासे उन्हें खाने लगती थीं॥ ५६॥ |
| शिखिसंस्था च कौमारी कर्णाकृष्टैः शिलाशितैः।<br>निजघान रणे शत्रून्देवानां च हिताय वै॥ ५७ | मयूरपर विराजमान भगवती कौमारी देवताओंके कल्याणके लिये कानोंतक खींचे गये तथा पत्थरपर सान चढ़े तीक्ष्ण बाणोंसे शत्रुओंका संहार करने लगीं॥ ५७॥ |
| वारुणी पाशसम्बद्धान्दैत्यान्समरमस्तके।<br>पातयामास तत्पृष्ठे मूर्च्छितानागतचेतनान्॥ ५८ | भगवती वारुणी समरांगणमें दैत्योंको अपने पाशमें बाँधकर उन्हें अचेत करके एकके ऊपर एकके क्रमसे गिरा देती थीं और वे निष्प्राण हो जाते थे॥ ५८॥ |
| एवं मातृगणेनाजावतिवीर्यपराक्रमम्।<br>मर्दितं दानवं सैन्यं पलायनपरं ह्यभूत्॥ ५९ | इस प्रकार उन मातृशक्तियोंके प्रयाससे दानवोंकी वह ओजस्विनी तथा पराक्रमी सेना युद्धभूमिमें तहस-नहस होकर भाग खड़ी हुई॥ ५९॥ |
| बुम्बारवस्तु सुमहानभूत्तत्र बलार्णवे।<br>पुष्पवृष्टिं तदा देवाश्चक्रुर्देव्या गणोपरि॥ ६० | उस सेनारूपी समुद्रमें बड़े जोरसे रोने-चिल्लानेकी ध्वनि होने लगी। देवीके गणोंके ऊपर देवता पुष्पोंकी वर्षा करने लगे॥ ६०॥ |
| तच्छ्रुत्वा निनदं घोरं जयशब्दं च दानवाः।<br>रक्तबीजश्चुकोपाशु दृष्ट्वा दैत्यान्पलायितान्॥ ६१<br><br>गर्जमानांस्तथा देवान्वीक्ष्य दैत्यो महाबलः।<br>रक्तबीजस्तु तेजस्वी रणमभ्याययौ तदा॥ ६२<br><br>सायुधो रथसंविष्टः कुर्वञ्ज्याशब्दमद्भुतम्।<br>आजगाम तदा देवीं क्रोधरक्तेक्षणोद्यतः॥ ६३ | दानवोंकी भयंकर चीत्कार तथा देवताओंकी जयध्वनि सुनकर रक्तबीज बहुत कुपित हुआ। उस समय दैत्योंको पलायित देखकर तथा देवताओंको गरजते हुए देखकर वह महाबली तथा तेजस्वी दैत्य रक्तबीज युद्धभूमिमें स्वयं आ डटा। वह आयुधोंसे सुसज्जित होकर रथपर सवार था और प्रत्यंचाकी अद्भुत टंकार करता हुआ क्रोधके मारे आँखें लाल किये युद्धके लिये देवीके सम्मुख आ गया॥ ६१–६३॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां पञ्चमस्कन्धे रक्तबीजेन देव्या युद्धवर्णनं नामाष्टाविंशोऽध्यायः॥ २८॥
अथैकोनत्रिंशोऽध्यायः
रक्तबीजका वध और निशुम्भका युद्धक्षेत्रके लिये प्रस्थान
| व्यास उवाच | व्यासजी बोले— हे राजन्! किसी समय शंकरजीने |
| वरदानमिदं तस्य दानवस्य शिवार्पितम्।<br>अत्यद्भुततरं राजञ्छृणु तत्प्रब्रवीम्यहम्॥ १ | उस दानव रक्तबीजको यह बड़ा ही अद्भुत वर दे डाला था, मैं उसे बता रहा हूँ; आप सुनिये॥ १॥ |
| तस्य देहाद्रक्तबिन्दुर्यदा पतति भूतले।<br>समुत्पतन्ति दैतेयास्तद्रूपास्तत्पराक्रमाः॥ २ | उस दानवके शरीरसे जब रक्तकी बूँद पृथ्वीपर गिरती थी, तब उसीके रूप तथा पराक्रमवाले दानव तुरंत उत्पन्न हो जाते थे। भगवान् शंकरने |
| ६८६ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० २९ |
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| असंख्याता महावीर्या दानवा रक्तसम्भवाः।<br>प्रभवन्विति रुद्रेण दत्तोऽस्त्यत्यद्भुतो वरः॥ ३ | उसे यह बड़ा ही अद्भुत वर दे दिया था कि तुम्हारे रक्तसे असंख्य महान् पराक्रमी दानव उत्पन्न हो जायँगे ॥ २-३ ॥ | | स तेन वरदानेन दर्पितः क्रोधसंयुतः।<br>अभ्यगात्तरसा संख्ये हन्तुं देवीं सकालिकाम्॥ ४ | उस वरदानके कारण अभिमानमें भरा हुआ वह दैत्य अत्यन्त कुपित होकर कालिकासमेत अम्बिकाको मारनेके लिये बड़े वेगसे रणभूमिमें पहुँचा ॥ ४ ॥ | | स दृष्ट्वा वैष्णवीं शक्तिं गरुडोपरिसंस्थिताम्।<br>शक्त्या जघान दैत्येन्द्रस्तां वै कमललोचनाम्॥ ५ | गरुडपर विराजमान वैष्णवी शक्तिको देखकर उस दैत्येन्द्रने उन कमलनयनी देवीपर शक्ति (बर्छी)-से प्रहार कर दिया ॥ ५ ॥ | | गदया वारयामास शक्तिः सा शक्तिसंयुता।<br>अताडयच्च चक्रेण रक्तबीजं महासुरम्॥ ६ | तब उस शक्तिशालिनी वैष्णवी शक्तिने अपनी गदासे उस प्रहारको विफल कर दिया और अपने चक्रसे महान् असुर रक्तबीजपर आघात किया ॥ ६ ॥ | | रथाङ्गहतदेहात्तु बहु सुस्राव शोणितम्।<br>वज्राहतगिरेः शृङ्गान्निर्झरा इव गैरिकाः॥ ७ | उस चक्रके लगनेपर रक्तबीजके घायल शरीरसे रक्तकी विशाल धारा बह चली मानो वज्रप्रहारसे घायल पर्वतके शिखरसे गेरूकी धारा बह चली हो ॥ ७ ॥ | | यत्र यत्र यदा भूमौ पतन्ति रक्तबिन्दवः।<br>समुत्तस्थुस्तदाकाराः पुरुषाश्च सहस्रशः॥ ८ | पृथ्वीतलपर जहाँ-जहाँ रक्तकी बूँदें गिरती थीं, वहाँ-वहाँ उसीके समान आकारवाले हजारों पुरुष उत्पन्न हो जाते थे ॥ ८ ॥ | | ऐन्द्री तमसुरं घोरं वज्रेणाभिजघान च।<br>रक्तबीजं क्रुधाविष्टा निःससार च शोणितम्॥ ९ | तदनन्तर इन्द्रकी शक्ति ऐन्द्रीने क्रोधमें भरकर उस महान् असुर रक्तबीजपर वज्रसे आघात किया, जिससे उसके शरीरसे और रक्त निकलने लगा ॥ ९ ॥ | | ततस्तत्क्षतजाज्जाता रक्तबीजा ह्यनेकशः।<br>तद्वीर्याश्च तदाकाराः सायुधा युद्धदुर्मदाः॥ १० | तब उसके रक्तसे अनेक रक्तबीज उत्पन्न हो गये, जो उसीके समान पराक्रमी तथा आकारवाले थे। वे सब-के-सब शस्त्रसम्पन्न तथा युद्धोन्मत्त थे ॥ १० ॥ | | ब्रह्माणी ब्रह्मदण्डेन कुपिता ह्यहनद् भृशम्।<br>माहेश्वरी त्रिशूलेन दारयामास दानवम्॥ ११<br><br>नारसिंही नखाघातैस्तं विव्याध महासुरम्।<br>अहनत्तुण्डघातेन क्रुद्धा तं राक्षसाधमम्॥ १२<br><br>कौमारी च तथा शक्त्या वक्षस्येनमताडयत्। | ब्रह्माणीने कुपित होकर उसे ब्रह्मदण्डसे बहुत मारा और देवी माहेश्वरीने अपने त्रिशूलसे उस दानवको विदीर्ण कर दिया। देवी नारसिंहीने अपने नखोंके प्रहारोंसे उस महान् असुरको बींध डाला, देवी वाराहीने क्रुद्ध होकर उस अधम राक्षसको अपने तुण्डप्रहारसे चोट पहुँचायी और भगवती कौमारीने अपनी शक्तिसे उसके वक्षपर प्रहार किया ॥ ११-१२ १/२ ॥ | | सोऽपि क्रुद्धः शरासारैर्बिभेद निशितैश्च ताः॥ १३ | तब वह दानव रक्तबीज भी क्रुद्ध होकर अलग-अलग उन सभी देवियोंको तीखे बाणोंकी घोर वर्षा तथा गदा और शक्तिके प्रहारोंसे चोट पहुँचाने लगा। |
अ० २९] पञ्चम स्कन्ध ६८७
अ० २९] पञ्चम स्कन्ध ६८७
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| गदाशक्तिप्रहारैस्तु मातृः सर्वाः पृथक्पृथक्।<br>शक्तयस्तं शराघातैर्विब्यधुस्तत्प्रकोपिताः॥ १४<br><br>तस्य शस्त्राणि चिच्छेद चण्डिका स्वशरैः शितैः।<br>जघानान्यैश्च विशिखैस्तं देवी कुपिता भृशम्॥ १५ | उसके आघातसे कुपित होकर सभी देवियोंने बाणोंके प्रहारसे उसको बींध डाला। भगवती चण्डिकाने अपने तीक्ष्ण बाणोंसे उसके शस्त्रोंको काट डाला और अत्यन्त कुपित होकर वे अन्य बाणोंसे उस दानवको मारने लगीं॥ १३—१५॥ |
| तस्य देहाच्च सुस्राव रुधिरं बहुधा तु यत्।<br>तस्मात्तत्सदृशाः शूराः प्रादुरासन्सहस्रशः॥ १६<br><br>रक्तबीजैर्जगद्व्याप्तं रुधिरौघसमुद्भवैः।<br>सन्नद्धैः सायुधैः कामं कुर्वद्भिर्युद्धमद्भुतम्॥ १७ | अब उसके शरीरसे अत्यधिक रक्त निकलने लगा। उस रक्तसे उसी रक्तबीजके समान हजारों वीर उत्पन्न हो गये। इस प्रकार उस रुधिर-राशिसे उत्पन्न रक्तबीजोंसे सारा जगत् भर गया; वे सब कवच पहने हुए थे, आयुधोंसे सुसज्जित थे और अद्भुत युद्ध कर रहे थे॥ १६-१७॥ |
| प्रहरन्तश्च तान्दृष्ट्वा रक्तबीजाननेकशः।<br>भयभीताः सुरास्त्रेसुर्विषण्णाः शोककर्षिताः॥ १८<br><br>कथमद्य क्षयं दैत्या गमिष्यन्ति सहस्रशः।<br>महाकाया महावीर्या दानवा रक्तसम्भवाः॥ १९<br><br>एकैव चण्डिकात्रास्ति तथा काली च मातरः।<br>एताभिर्दानवाः सर्वे जेतव्याः कष्टमेव तत्॥ २०<br><br>निशुम्भो वाथ शुम्भो वा सहसा बलसंवृतः।<br>आगमिष्यति संग्रामे ततोऽनर्थो महान्भवेत्॥ २१ | उन असंख्य रक्तबीजोंको प्रहार करते देखकर देवता भयभीत, आतंकित, विषादग्रस्त और शोकसंतप्त हो गये। [वे सोचने लगे] इस समय रक्तबीजके रक्तसे उत्पन्न ये हजारों विशालकाय और महापराक्रमी दानव किस प्रकार विनष्ट होंगे? यहाँ रणभूमिमें केवल भगवती चण्डिका हैं और उनके साथमें देवी काली तथा कुछ मातृकाएँ हैं; केवल इन्हीं देवियोंको मिलकर सभी दानवोंको जीतना है—यह तो महान् कष्ट है। इसी समय यदि अचानक शुम्भ अथवा निशुम्भ भी सेनाके साथ संग्राममें आ जायगा, तब तो बहुत बड़ा अनर्थ हो जायगा॥ १८—२१॥ |
| व्यास उवाच<br>एवं देवा भयोद्विग्नाश्चिन्तामापुर्महत्तराम्।<br>यदा तदाम्बिका प्राह कालीं कमललोचनाम्॥ २२<br><br>चामुण्डे कुरु विस्तीर्णं वदनं त्वरिता भृशम्।<br>मच्छस्त्रपातसम्भूतं रुधिरं पिब सत्वरा॥ २३<br><br>भक्षयन्ती चर रणे दानवानद्य कामतः।<br>हनिष्यामि शरैस्तीक्ष्णैर्गदासिसुमुसलैस्तथा॥ २४ | व्यासजी बोले— [हे राजन्!] इस प्रकार जब सभी देवता भयसे व्याकुल होकर अत्यधिक चिन्तित हो उठे, तब भगवती अम्बिकाने कमलसदृश नेत्रोंवाली कालीसे कहा—हे चामुण्डे! तुम शीघ्रतापूर्वक अपना मुख पूर्णरूपसे फैला लो और मेरे शस्त्राघातके द्वारा [रक्तबीजके शरीरसे] निकले रक्तको जल्दी-जल्दी पीती जाओ। तुम दानवोंका भक्षण करती हुई इच्छानुसार युद्धभूमिमें विचरण करो। मैं तीक्ष्ण बाणों, गदा, तलवार तथा मुसलोंसे इन दैत्योंको मार डालूँगी॥ २२—२४॥ |
| तथा कुरु विशालाक्षि पानं तद्रुधिरस्य च।<br>बिन्दुमात्रं यथा भूम्यां न पतेदपि साम्प्रतम्॥ २५<br><br>भक्ष्यमाणास्तदा दैत्या न चोत्पत्स्यन्ति चापरे।<br>एवमेषां क्षयो नूनं भविष्यति न चान्यथा॥ २६ | हे विशाल नयनोंवाली! तुम इस प्रकारसे इस दैत्यके रुधिरका पान करो, जिससे कि अब एक भी बूँद रक्त भूमिपर न गिरने पाये; तब इस ढंगसे भक्षण किये जानेपर दूसरे दानव उत्पन्न नहीं हो सकेंगे। इस प्रकार इन दैत्योंका नाश अवश्य हो जायगा, इसके अतिरिक्त दूसरा कोई उपाय नहीं है॥ २५-२६॥ |
| ६८८ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० २९ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| घातयिष्याम्यहं दैत्यं त्वं भक्षय च सत्वरा।<br>पिबन्ती क्षतजं सर्वं यतमानारिसंक्षये ॥ २७<br><br>इत्थं दैत्यक्षयं कृत्वा दत्त्वा राज्यं सुरालयम्।<br>इन्द्राय सुस्थिरं सर्वं गमिष्यामो यथासुखम्॥ २८ | जब मैं इस दैत्यको मारूँ, तब तुम शत्रुसंहाररूपी इस कार्यमें प्रयत्नशील होकर सारा रक्त पीती हुई शीघ्रतापूर्वक इसका भक्षण कर जाना। इस प्रकार दैत्यवध करके स्वर्गका सारा राज्य इन्द्रको देकर हम सब आनन्दपूर्वक यहाँसे चली जायँगी॥ २७-२८॥ |
| व्यास उवाच<br>इत्युक्ताम्बिकया देवी चामुण्डा चण्डविक्रमा।<br>पपौ च क्षतजं सर्वं रक्तबीजशरीरजम्॥ २९<br><br>अम्बिका तं जघानाशु खड्गेन मुसलेन च।<br>चखाद देहशकलांश्चामुण्डा तान्कृशोदरी ॥ ३० | **व्यासजी बोले—**भगवती अम्बिकाके ऐसा कहनेपर प्रचण्ड पराक्रमवाली देवी चामुण्डा रक्तबीजके शरीरसे निकले हुए समस्त रुधिरको पीने लगीं। जगदम्बा खड्ग तथा मुसलसे उस दैत्यको मारने लगीं और कृशोदरी चामुण्डा उसके शरीरके कटे हुए अंगोंका भक्षण करने लगीं॥ २९-३०॥ |
| सोऽपि क्रुद्धो गदाघातैश्चामुण्डां समघातयत्।<br>तथापि सा पपावाशु क्षतजं तमभक्षयत्॥ ३१ | अब वह रक्तबीज भी कुपित होकर गदाके प्रहारोंसे चामुण्डाको घायल करने लगा, फिर भी वे शीघ्रतापूर्वक उसका रुधिर पीती रहीं और उसका भक्षण करती रहीं॥ ३१॥ |
| येऽन्ये रुधिरजाः क्रूरा रक्तबीजा महाबलाः।<br>तेऽपि निष्पातिताः सर्वे भक्षिता गतशोणिताः ॥ ३२ | उस दैत्यके रुधिरसे उत्पन्न हुए अन्य जो भी महाबली और क्रूर रक्तबीज थे, उन्हें भी चामुण्डांने मार डाला। वे देवी उनका भी रक्त पी गयीं और उन सबको खा गयीं॥ ३२॥ |
| कृत्रिमा भक्षिताः सर्वे यस्तु स्वाभाविकॊऽसुरः।<br>सोऽपि प्रपातितो हत्वा खड्गेनातिविखण्डितः ॥ ३३ | इस प्रकार भगवतीने जब सभी कृत्रिम रक्तबीजोंका भक्षण कर लिया, तब जो वास्तविक रक्तबीज था, उसे भी मारकर उन्होंने खड्गसे उसके अनेक टुकड़े करके भूमिपर गिरा दिया॥ ३३॥ |
| रक्तबीजे हते रौद्रे ये चान्ये दानवा रणे।<br>पलायनं ततः कृत्वा गतास्ते भयकम्पिताः ॥ ३४<br><br>हाहेति विब्रुवन्तस्ते शुम्भं प्रोचुः सविह्वलाः।<br>रुधिरारक्तदेहाश्च विगतास्त्रा विचेतसः ॥ ३५<br><br>राजन्नम्बिकया रक्तबीजोऽसौ विनिपातितः।<br>चामुण्डा तस्य देहात्तु पपौ सर्वं च शोणितम्॥ ३६<br><br>ये चान्ये दानवाः शूरा वाहनेनातिरंहसा।<br>सिंहेन निहताः सर्वे काल्या च भक्षिताः परे॥ ३७ | तत्पश्चात् भयंकर रक्तबीजका वध हो जानेपर जो अन्य दानव रणभूमिमें थे, वे भयसे काँपते हुए भाग करके शुम्भके पास पहुँचे। उनका चित्त बहुत व्याकुल था, उनका शरीर रुधिरसे लथपथ था, वे शस्त्रविहीन हो गये थे और अचेत-से हो गये थे। वे हाय, हाय—ऐसा पुकारते हुए शुम्भसे कहने लगे—हे राजन्! अम्बिकाने उस रक्तबीजको मार डाला और चामुण्डा उसकी देहसे निकला सारा रुधिर पी गयी। जो अन्य दानववीर थे, उन सबको देवीके वाहन सिंहने बड़ी तेजीसे मार डाला और शेष दानवोंको भगवती काली खा गयीं॥ ३४–३७॥ |
| वयं त्वां कथितुं राजन्नागता युद्धचेष्टितम्।<br>चरितञ्च तथा देव्याः संग्रामे परमाद्भुतम्॥ ३८ | हे राजन्! हमलोग आपको युद्धका वृत्तान्त तथा संग्राममें देवीके द्वारा प्रदर्शित किये गये उनके अत्यन्त अद्भुत चरित्रको बतानेके लिये आपके पास आये हुए हैं॥ ३८॥ |
अ० २९ ] पञ्चम स्कन्ध ६८९
अ० २९ ] पञ्चम स्कन्ध ६८९
| अजेयेयं महाराज सर्वथा दैत्यदानवैः।<br>गन्धर्वासुरयक्षैश्च पन्नगोरगराक्षसैः॥ ३९ | हे महाराज! यह देवी दैत्य, दानव, गन्धर्व, असुर, यक्ष, पन्नग, उरग और राक्षस—इन सभीसे सर्वथा अजेय है॥ ३९॥ |
| अन्यास्तत्रागता देव्य इन्द्राणीप्रमुखा भृशम्।<br>युध्यमाना महाराज वाहनैरायुधैर्युताः॥ ४०<br><br>ताभिः सर्वं हतं सैन्यं दानवानां वरायुधैः।<br>रक्तबीजोऽपि राजेन्द्र तरसा विनिपातितः॥ ४१ | हे महाराज! इन्द्राणी आदि अन्य प्रमुख देवियाँ भी वहाँ आयी हुई हैं। वे अपने-अपने वाहनोंपर सवार होकर नानाविध आयुध धारण करके घोर युद्ध कर रही हैं। हे राजेन्द्र! उन देवियोंने अपने उत्तम अस्त्रोंसे दानवोंकी सारी सेनाका विध्वंस कर डाला और रक्तबीजको भी बड़ी शीघ्रतासे मार गिराया॥ ४०-४१॥ |
| एकापि दुःसहा देवी किं पुनस्ताभिरन्विता।<br>सिंहोऽपि हन्ति संग्रामे राक्षसानमितप्रभः॥ ४२ | एकमात्र देवी अम्बिका ही हमलोगोंके लिये असह्य थी, और फिर जब वह उन देवियोंके साथ हो गयी है तब कहना ही क्या? असीम तेजवाला उसका वाहन सिंह भी संग्राममें राक्षसोंका वध कर रहा है॥ ४२॥ |
| अतो विचार्य सचिवैर्यद्युक्तं तद्विधीयताम्।<br>न वैरमनया युक्तं सन्धिरैव सुखप्रदः॥ ४३ | अतएव मन्त्रियोंके साथ विचार-विमर्श करके जो उचित हो, वह कीजिये। इसके साथ शत्रुता उचित नहीं है, अपितु सन्धि कर लेना ही सुखदायक होगा॥ ४३॥ |
| आश्चर्यमेतदखिलं यन्नारी हन्ति राक्षसान्।<br>रक्तबीजोऽपि निहतः पीतं तस्यापि शोणितम्॥ ४४<br><br>अन्ये निपातिता दैत्याः संग्रामेऽम्बिकया नृप।<br>चामुण्डया च मांसं वै भक्षितं सकलं रणे॥ ४५ | यह आश्चर्य है कि एक स्त्री राक्षसोंका संहार कर रही है! रक्तबीज भी मार डाला गया! देवी चामुण्डा उसका सारा रक्त भी पी गयी! हे नृप! अम्बिकाने संग्राममें अन्य दैत्योंको मार डाला और देवी चामुण्डा उनका सम्पूर्ण मांस खा गयी॥ ४४-४५॥ |
| वरं पातालगमनं तस्याः सेवाथवा वरा।<br>न तु युद्धं महाराज कार्यमम्बिकया सह॥ ४६<br><br>न नारी प्राकृता ह्येषा देवकार्यार्थसाधिनी।<br>मायेयं प्रबला देवी क्षपयन्तीयमुत्थिता॥ ४७ | हे महाराज! अब हमलोगोंके लिये या तो पाताल चला जाना श्रेयस्कर है अथवा उसकी दासता स्वीकार कर लेना; किंतु उस अम्बिकाके साथ युद्ध नहीं करना चाहिये। यह साधारण स्त्री नहीं है, यह देवताओंका कार्य सिद्ध करनेवाली है और यह मायारूपिणी शक्तिसम्पन्न देवीके रूपमें दैत्योंका नाश करनेके लिये प्रकट हुई है॥ ४६-४७॥ |
| व्यास उवाच<br>इति तेषां वचस्तथ्यं श्रुत्वा कालविमोहितः।<br>मुमूर्षुः प्रत्युवाचेदं शुम्भः प्रस्फुरिताधरः॥ ४८ | **व्यासजी बोले—**उन सैनिकोंकी यह यथार्थ बात सुनकर कालसे मोहित तथा मरनेके लिये उद्यत वह काँपते हुए ओठोंवाला शुम्भ उनसे कहने लगा॥ ४८॥ |
| शुम्भ उवाच<br>यूयं गच्छत पातालं शरणं वा भयातुराः।<br>हनिष्याम्यहमद्यैव ताञ्च ताश्च समुद्यतः॥ ४९ | **शुम्भ बोला—**तुमलोग भयभीत होकर पाताल चले जाओ अथवा उसकी शरणमें चले जाओ, किंतु मैं तो युद्धमें पूर्णरूपसे तत्पर रहते हुए उस अम्बिका तथा उन देवियोंको आज ही मार डालूँगा॥ ४९॥ |
६९० श्रीमद्देवीभागवत [ अ० २९
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी टीका |
|---|---|
| जित्वा सर्वान्सुरानाजौ कृत्वा राज्यं सुपुष्कलम्।<br>कथं नारीभयोद्विग्नः पातालं प्रविशाम्यहम्॥ ५०<br>निहत्य पार्षदान्सर्वान् रक्तबीजमुखान् रणे।<br>प्राणत्राणाय गच्छामि हित्वा किं विपुलं यशः॥ ५१ | रणभूमिमें सभी देवताओंको जीतकर तथा विशाल राज्यका भोग करके भला एक स्त्रीके भयसे व्याकुल होकर मैं पाताल क्यों चला जाऊँ? रक्तबीज आदि प्रमुख पार्षदोंको रणमें मरवाकर और अपनी विशद कीर्तिका नाश करके प्राणरक्षाके लिये मैं पाताल क्यों चला जाऊँ?॥ ५०-५१॥ |
| मरणं त्वनिवार्यं वै प्राणिनां कालकल्पितम्।<br>तद्भयं जन्मनोपात्तं त्यजेत्को दुर्लभं यशः॥ ५२ | कालके द्वारा निर्धारित प्राणियोंकी मृत्यु तो अनिवार्य है। जन्मके साथ ही मृत्युका भय प्राणीके साथ लग जाता है। तब भला कौन (बुद्धिमान्) व्यक्ति दुर्लभ यशका त्याग कर सकता है?॥ ५२॥ |
| निशुम्भाहं गमिष्यामि रथारूढो रणाजिरे।<br>हत्वा तामागमिष्यामि नागमिष्यामि चान्यथा॥ ५३ | हे निशुम्भ! मैं रथपर सवार होकर युद्धभूमिमें जाऊँगा और उसे मारकर ही वापस आऊँगा और यदि मैं उसे मार न सका तो फिर वापस नहीं लौटूँगा॥ ५३॥ |
| त्वं तु सेनायुतो वीर पार्ष्णिग्राहो भवस्व मे।<br>तरसा तां शरैस्तीक्ष्णैर्नारीं नय यमालये॥ ५४ | हे वीर! तुम भी सेना साथमें लेकर चलो और युद्धमें मेरे सहायक बनो। वहाँ अपने तीक्ष्ण बाणोंसे मारकर तुम उस स्त्रीको शीघ्र ही यमलोक पहुँचा दो॥ ५४॥ |
| निशुम्भ उवाच<br>अहमद्य हनिष्यामि गत्वा दुष्टाञ्च कालिकाम्।<br>आगमिष्याम्यहं शीघ्रं गृहीत्वा तामथाम्बिकाम्॥ ५५ | निशुम्भ बोला—मैं अभी युद्धक्षेत्रमें जाकर दुष्ट कालिकाको मार डालूँगा और उस अम्बिकाको लेकर शीघ्र ही आपके पास आ जाऊँगा॥ ५५॥ |
| मा चिन्तां कुरु राजेन्द्र वराकायास्तु कारणे।<br>क्वौषा बाला क्व मे बाहुवीर्यं विश्ववशङ्करम्॥ ५६<br>त्यक्त्वार्त्तिं विपुलां भ्रातृर्भुङ्क्ष्व भोगाननुत्तमान्।<br>आनयिष्याम्यहं कामं मानिनीं मानसयुताम्॥ ५७ | हे राजेन्द्र! आप उस बेचारीके विषयमें चिन्ता मत कीजिये। कहाँ यह एक साधारण स्त्री और कहाँ पूरे विश्वको अपने वशमें कर लेनेवाला मेरा बाहुबल! हे भाई! आप इस भारी चिन्ताको छोड़कर सर्वोत्तम सुखोंका उपभोग कीजिये। मैं आदरकी पात्र उस मानिनीको अवश्य ही ले आऊँगा॥ ५६-५७॥ |
| मयि तिष्ठति ते राजन्न युक्तं गमनं रणे।<br>गत्वाहमानयिष्यामि तवार्थे वै जयश्रियम्॥ ५८ | हे राजन्! मेरे रहते युद्धक्षेत्रमें आपका जाना उचित नहीं है। आपका कार्य सिद्ध करनेके लिये मैं वहाँ जाकर विजयश्री अवश्य ही प्राप्त करूँगा॥ ५८॥ |
| व्यास उवाच<br>इत्युक्त्वा भ्रातरं ज्येष्ठं कनीयान्बलगर्वितः।<br>रथमास्थाय विपुलं सन्नद्धः स्वबलावृतः॥ ५९ | व्यासजी बोले—बड़े भाई शुम्भसे ऐसा कहकर अपने बलपर अभिमान रखनेवाले छोटे भाई निशुम्भने कवच धारण कर लिया और अपनी सेना साथमें लेकर एक विशाल रथपर आरूढ़ हो स्वयं अनेकविध |
| अ० ३० ] | पञ्चम स्कन्ध | ६९१ |
|---|
| जगाम तरसा तूर्णं सङ्गरे कृतमङ्गलः।<br>संस्तुतो बन्दिसूतैश्च सायुधः सपरिष्करः॥ ६० | आयुध लेकर वह पूरी तैयारीके साथ तुरंत बड़ी तेजीसे युद्धभूमिकी ओर चल पड़ा। उस समय मंगलाचार किया जा रहा था और बन्दीजन तथा चारण उसका यशोगान कर रहे थे॥ ५९-६०॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां पञ्चमस्कन्धे देव्या सह युद्धकरणाय निशुम्भप्रयाणं नामैकोनत्रिंशोऽध्यायः॥ २९॥
अथ त्रिंशोऽध्यायः
देवीद्वारा निशुम्भका वध
| व्यास उवाच | व्यासजी बोले— |
|---|---|
| निशुम्भो निश्चयं कृत्वा मरणाय जयाय वा।<br>सोद्यमः सबलः शूरो रणे देवीमुपाययौ॥ १ | [हे राजन्!] वह पराक्रमी निशुम्भ अब मृत्यु अथवा विजयका निश्चय करके पूरी तैयारीके साथ सेनासहित समरभूमिमें उपस्थित हो गया॥ १॥ |
| तमाजगाम शुम्भोऽपि स्वबलेन समावृतः।<br>प्रेक्षकोऽभूद्रणे राजा संग्रामरसपण्डितः॥ २ | अपनी सेना साथमें लेकर शुम्भ भी उस निशुम्भके पास आ गया और युद्धकलाका पूर्ण ज्ञान रखनेवाला वह दैत्यराज शुम्भ रणमें दर्शक बनकर युद्धका अवलोकन करने लगा॥ २॥ |
| गगने संस्थिता देवास्तदाभ्रपटलावृताः।<br>दिदृक्षवस्तु संग्रामे सेन्द्रा यक्षगणास्तथा॥ ३ | इन्द्रसहित समस्त देवता तथा यक्षगण संग्राम देखनेकी इच्छासे आकाशमण्डलमें मेघपटलोंमें छिपकर विराजमान हो गये॥ ३॥ |
| निशुम्भोऽथ रणे गत्वा धनुरादाय शार्ङ्गकम्।<br>चकार शरवृष्टिं स भीषयञ्जगदम्बिकाम्॥ ४ | निशुम्भ रणभूमिमें पहुँचकर सींगका बना हुआ धनुष लेकर भगवती जगदम्बाको भयभीत करता हुआ उनके ऊपर बाणोंकी बौछार करने लगा॥ ४॥ |
| मुञ्चन्तं शरजालानि निशुम्भं चण्डिका रणे।<br>वीक्ष्यादाय धनुः श्रेष्ठं जहास सुस्वरं मुहुः॥ ५<br><br>उवाच कालिकां देवी पश्य मूर्खत्वमेतयोः।<br>मरणायागतौ कालि मत्समीपमिहाधुना॥ ६ | युद्धभूमिमें निशुम्भको बाण-समूह छोड़ते हुए देखकर भगवती चण्डिका अपना उत्कृष्ट धनुष धारण करके उच्च स्वरमें बार-बार हँसने लगीं। देवी चण्डिकाने कालीसे कहा—हे काली! इन दोनोंकी मूर्खता तो देखो, ये दोनों इस समय यहाँ मेरे पास मरनेके लिये ही आये हुए हैं॥ ५-६॥ |
| दृष्ट्वा दैत्यवधं घोरं रक्तबीजात्ययं तथा।<br>जयाशां कुरुतस्त्वेतौ मोहितौ मम मायया॥ ७ | दैत्योंका भीषण संहार तथा रक्तबीजकी मृत्यु देखकर भी मेरी मायासे विमोहित हुए ये दोनों दैत्य विजयकी आशा कर रहे हैं॥ ७॥ |
| आशा बलवती ह्येषा न जहाति नरं क्वचित्।<br>भग्नं हृतबलं नष्टं गतपक्षं विचेतनम्॥ ८ | यह आशा बड़ी बलवती होती है; यह प्राणियोंको कभी नहीं छोड़ती है। यहाँतक कि अंगहीन, बलहीन, नष्टप्राय, असहाय तथा अचेत प्राणी भी आशाके प्रभावसे छूट नहीं पाता है॥ ८॥ |
| ६१२ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ३० |
|---|
| आशापाशनिबद्धौ द्वौ युद्धाय समुपागतौ।<br>निहन्तव्यौ मया कालि रणे शुम्भनिशुम्भकौ॥ ९ | हे कालि! इस प्रकार आशा-पाशमें बँधे हुए ये दोनों शुम्भ-निशुम्भ युद्धके लिये समरभूमिमें आये हुए हैं, अब मुझे इन दोनोंका वध कर देना चाहिये॥ ९॥ | | आसन्नमरणावेतौ सम्प्राप्तौ दैवमोहितौ।<br>पश्यतां सर्वदेवानां हनिष्याम्यहमद्य तौ॥ १० | आसन्न मृत्युवाले ये दोनों दैत्य प्रारब्धकी प्रेरणासे यहाँ आये हुए हैं। सभी देवताओंके समक्ष आज ही मैं इन्हें मार डालूँगी॥ १०॥ | | व्यास उवाच<br>इत्युक्त्वा कालिकां चण्डी कर्णाकृष्टशरोत्करैः।<br>छादयामास तरसा निशुम्भं पुरतः स्थितम्॥ ११ | व्यासजी बोले—भगवती चण्डिकाने कालिकासे ऐसा कहकर कानोंतक खींचकर छोड़े गये बाण-समूहोंसे अपने समक्ष खड़े निशुम्भको शीघ्र ही आच्छादित कर दिया॥ ११॥ | | दानवोऽपि शरांस्तस्याश्चिच्छेद निशितैः शरैः।<br>तयोः परस्परं युद्धं बभूवातिभयानकम्॥ १२ | दैत्य निशुम्भने भी उन चण्डिकाके बाणोंको अपने तीक्ष्ण बाणोंसे काट डाला। इस प्रकार उन दोनोंमें परस्पर अत्यन्त भयंकर युद्ध होने लगा॥ १२॥ | | केसरी केशजालानि धुन्वानः सैन्यसागरम्।<br>गाहयामास बलवान्सरसीं वारणो यथा॥ १३ | देवीका सिंह भी अपने गर्दनके बालोंको झाड़ता हुआ दैत्योंके सेनारूपी समुद्रको उसी प्रकार मथने लगा, जैसे कोई बलवान् हाथी तालाबको मथ रहा हो॥ १३॥ | | नखैर्दन्तप्रहारैस्तु दानवान्पुरतः स्थितान्।<br>चखाद च विशीर्णाङ्गान् गजानिव मदोत्कटान्॥ १४ | जिस प्रकार कोई सिंह मतवाले हाथियोंके अंग-प्रत्यंग चीरकर खा डालता है, उसी प्रकार भगवतीका वह सिंह अपने समक्ष स्थित दानवोंको अपने नखों तथा दाँतोंके प्रहारसे फाड़कर खाने लगा॥ १४॥ | | एवं विमथ्यमाने तु सैन्ये केसरिणा तदा।<br>अभ्यधावन्निशुम्भोऽथ विकृष्टवरकार्मुकः॥ १५ | भगवतीके उस सिंहद्वारा दानवी सेनाका इस प्रकार संहार होते देखकर निशुम्भ अपना श्रेष्ठ धनुष चढ़ाकर सिंहके पीछे दौड़ा॥ १५॥ | | अन्येऽपि क्रुद्धा दैत्येन्द्रा देवीं हन्तुमुपाययुः।<br>सन्दष्टदन्तरसना रक्तनेत्रा ह्यनेकशः॥ १६ | उसी समय कोपके कारण लाल नेत्रोंवाले अन्य बहुत-से प्रधान दानव भी दाँतोंसे अपनी जीभ चबाते हुए भगवतीको मारनेके लिये उनपर टूट पड़े॥ १६॥ | | तत्राजगाम तरसा शुम्भः सैन्यसमावृतः।<br>निहत्य कालिकां कोपाद् ग्रहीतुं जगदम्बिकाम्॥ १७ | उसी अवसरपर कुपित होकर शुम्भ भी कालिकापर प्रहार करके भगवती अम्बिकाको पकड़नेके लिये अपनी सेनाके साथ बड़े वेगसे वहाँ आ पहुँचा॥ १७॥ | | तत्रागत्य ददर्शाजावम्बिकाञ्च पुरःस्थिताम्।<br>रौद्ररसयुतां कान्तां शृङ्गाररससंयुताम्॥ १८ | वहाँ आकर उसने जगदम्बिकाको युद्धभूमिमें अपने सामने खड़ी देखा; जो परम सुन्दरी, शृङ्गाररससे परिपूर्ण तथा रौद्ररससे भरी हुई थीं॥ १८॥ |
अ० ३०] पञ्चम स्कन्ध ६९३
अ० ३०] पञ्चम स्कन्ध ६९३
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| तां वीक्ष्य विपुलापाङ्गीं त्रैलोक्यवरसुन्दरीम्।<br>सुरक्तनयनां रम्यां क्रोधरक्तेक्षणां तथा॥ १९<br>विवाहेच्छां परित्यज्य जयाशां दूरतस्तथा।<br>मरणे निश्चयं कृत्वा तस्थावाहितकार्मुकः॥ २० | [स्वभावतः] लाल नेत्रोंवाली, किंतु उस समय कोपके कारण अतिरक्त नयनोंवाली, तीनों लोकोंमें परम सुन्दरी तथा विशाल नेत्रप्रान्तोंवाली उन मनोहर भगवतीको देखकर विजयकी आशा तथा विवाहकी अभिलाषाका दूरसे ही परित्याग करके वह दानव अब अपने मरणका निश्चय-कर हाथमें धनुष लिये हुए खड़ा ही रह गया॥ १९-२०॥ |
| तं तथा दानवं देवी स्मितपूर्वमिदं वचः।<br>बभाषे शृण्वतां तेषां दैत्यानां रणमस्तके॥ २१<br>गच्छध्वं पामरा यूयं पातालं वा जलार्णवम्।<br>जीविताशां स्थिरां कृत्वा त्यक्त्वात्रैवायुधानि च॥ २२<br>अथवा मच्छराघातहतप्राणा रणाजिरे।<br>प्राप्य स्वर्गसुखं सर्वे क्रीडन्तु विगतज्वराः॥ २३<br>कातरत्वं च शूरत्वं न भवत्येव सर्वथा।<br>ददाम्यभयदानं वै यान्तु सर्वे यथासुखम्॥ २४ | तब भगवतीने युद्धस्थलमें उपस्थित उन सभी दानवोंको सुनाते हुए मुसकराकर उस दैत्यसे यह वचन कहा—हे नीच दानवो! यदि तुम सब जीवित रहनेकी इच्छा रखते हो तो अपने आयुध यहीं छोड़कर पाताललोक या समुद्रमें चले जाओ अथवा तुमलोग समरांगणमें मेरे बाणोंके प्रहारसे निष्प्राण होकर स्वर्गमें सुख प्राप्तकर वहाँ निर्भय होकर विहार करो। कायरता तथा पराक्रम दोनोंका एक साथ रह पाना सम्भव नहीं है। मैं तुम सबको अभयदान देती हूँ; तुम सब सुखपूर्वक चले जाओ॥ २१-२४॥ |
| व्यास उवाच<br>इत्याकर्ण्य वचस्तस्या निशुम्भो मदगर्वितः।<br>निशितं खड्गमादाय चर्म चैवाष्टचन्द्रकम्॥ २५<br>धावमानस्तु तरसासिना सिंहं मदोत्कटम्।<br>जघानातिबलामूर्ध्नि भ्रामयञ्जगदम्बिकाम्॥ २६ | व्यासजी बोले— उन भगवतीका वचन सुनकर मदोन्मत्त निशुम्भ तीक्ष्ण खड्ग तथा अष्टचन्द्र नामक ढाल लेकर बड़े वेगसे दौड़ा और उसने बलपूर्वक अपने खड्गसे मतवाले सिंहके मस्तकपर प्रहार किया। तत्पश्चात् उसने तलवार घुमाकर जगदम्बापर भी प्रहार किया॥ २५-२६॥ |
| ततो देवी स्वगदया वञ्चयित्वासिपातनम्।<br>ताडयामास तं बाहोर्मूले परशुना तदा॥ २७ | तब भगवतीने अपनी गदासे उसके तलवारके प्रहारको रोककर अपने परशुसे उसके बाहुमूल (कन्धे)-पर आघात किया॥ २७॥ |
| खड्गेन निहतः सोऽपि बाहुमूले महामदः।<br>संस्तभ्य वेदनां भूयो जघान चण्डिकां तदा॥ २८ | अपने कन्धेपर खड्गसे प्रहार होनेपर भी उस महाभिमानी अहंकारी निशुम्भने उस आघातकी वेदना सहकर भगवती चण्डिकापर पुनः प्रहार किया॥ २८॥ |
| सापि घण्टास्वनं घोरं चकार भयदं नृणाम्।<br>पपौ पुनः पुनः पानं निशुम्भं हन्तुमिच्छती॥ २९ | तत्पश्चात् भगवती चण्डिकाने भी प्राणियोंको भयभीत कर देनेवाली भीषण घण्टाध्वनि की और निशुम्भको मारनेकी इच्छा प्रकट करती हुई उन्होंने बार-बार मधुपान किया॥ २९॥ |
| एवं परस्परं युद्धं बभूवातिभयप्रदम्।<br>देवानां दानवानाञ्च परस्परजयैषिणाम्॥ ३० | इस प्रकार एक-दूसरेको जीतनेकी प्रबल इच्छावाले देवताओं तथा दानवोंमें परस्पर अत्यन्त भयंकर युद्ध आरम्भ हो गया॥ ३०॥ |
| ६९४ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ३० |
|---|
| संस्कृत मूल श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| पलादाः पक्षिणः क्रूराः सारमेयाश्च जम्बुकाः ।<br>ननृतुश्चातिसन्तुष्टा गृध्राः कङ्काश्च वायसाः ॥ ३१ | मांसाहारी क्रूर पक्षी, कुत्ते, सियार, गीध, कंक तथा कौए अति प्रसन्न होकर नृत्य करने लगे ॥ ३१ ॥ |
| रणभूर्भाति भूयिष्ठपतितासुरवर्ष्मकैः ।<br>रुधिरस्रावसंयुक्तैर्गजाश्वदेहसंकुला ॥ ३२ | उस समय बहुत-से गिरे हुए दैत्योंके रक्त बहते हुए शरीरोंसे तथा हाथियों और घोड़ोंके देहसे पटी हुई वह रणभूमि अत्यधिक [ भयानक ] प्रतीत हो रही थी ॥ ३२ ॥ |
| पतितान्दानवान्दृष्ट्वा निशुम्भोऽतिरुषान्वितः ।<br>प्रययौ चण्डिकां तूर्णं गदामादाय दारुणाम् ॥ ३३ | [ भूमिपर ] गिरे हुए दानवोंको देखकर निशुम्भ अत्यन्त कुपित हो उठा और एक भयंकर गदा लेकर शीघ्रतापूर्वक भगवतीके समक्ष पहुँच गया ॥ ३३ ॥ |
| सिंहं जघान गदया मस्तके मदगर्वितः ।<br>प्रहृत्य च स्मितं कृत्वा पुनर्देवीमताडयत् ॥ ३४ | अभिमानमें चूर उस निशुम्भने सिंहके मस्तकपर गदासे प्रहार किया। तत्पश्चात् उसने मुसकराकर पुनः देवीपर प्रहार करके उन्हें चोट पहुँचायी ॥ ३४ ॥ |
| सापि तं कुपितातीव निशुम्भं पुरतः स्थितम् ।<br>प्रहरन्तं समीक्ष्याथ देवी वचनमब्रवीत् ॥ ३५ | इससे वे भगवती भी अत्यन्त कुपित हो गयीं और समक्ष स्थित होकर प्रहार कर रहे उस निशुम्भको देखकर कहने लगीं— ॥ ३५ ॥ |
| देव्युवाच<br>तिष्ठ मन्दमते तावद्यावत्खड्गमिदं तव ।<br>ग्रीवायां प्रेरयाम्यस्माद् गन्तासि यमसादनम् ॥ ३६ | **देवी बोलीं—**हे मन्दबुद्धि! मैं तलवार चला रही हूँ। तुम तबतकके लिये ठहर जाओ, जबतक मेरी यह तलवार तुम्हारी गर्दनतक नहीं पहुँच जाती। इसके बाद तुम यमपुरी निश्चय ही पहुँच जाओगे ॥ ३६ ॥ |
| व्यास उवाच<br>इत्युक्त्वा तरसा देवी कृपाणेन समाहिता ।<br>चिच्छेद मस्तकं तस्य निशुम्भस्याथ चण्डिका ॥ ३७ | **व्यासजी बोले—**ऐसा कहकर भगवती चण्डिकाने एकाग्रचित्त होकर बड़ी शीघ्रतासे अपने कृपाणसे उस निशुम्भका मस्तक काट दिया ॥ ३७ ॥ |
| सच्छिन्नमस्तको देव्या कबन्धोऽतीव दारुणः ।<br>बभ्राम च गदापाणिस्त्रासयन्देवतागणान् ॥ ३८ | इस प्रकार भगवतीके द्वारा सिर कटा हुआ अत्यन्त विकराल वह धड़ हाथमें गदा धारण किये देवगणोंको भयभीत करता हुआ इधर-उधर घूमने लगा ॥ ३८ ॥ |
| देवी तस्य शितैर्बाणैश्चिच्छेद चरणौ करौ ।<br>पपातोर्व्यां ततः पापी गतासुः पर्वतोपमः ॥ ३९ | तत्पश्चात् भगवतीने तीक्ष्ण बाणोंसे उसके दोनों हाथ तथा पैर भी काट दिये। इसके बाद पर्वतके समान शरीरवाला वह पापी दैत्य प्राणहीन होकर धरतीपर गिर पड़ा ॥ ३९ ॥ |
| तस्मिन्निपतिते दैत्ये निशुम्भे भीमविक्रमे ।<br>हाहाकारो महानासीत्तत्सैन्ये भयकम्पिते ॥ ४०<br><br>त्यक्त्वायुधानि सर्वाणि सैनिकाः क्षतजाप्लुताः ।<br>जग्मुर्बुम्बारवं सर्वे कुर्वाणा राजमन्दिरम् ॥ ४१ | प्रचण्ड पराक्रमवाले उस निशुम्भ दैत्यके गिर जानेपर भयसे कम्पित दानवसेनामें महान् हाहाकार मच गया। रक्तसे लथपथ समस्त दानवसैनिक अपने-अपने सभी आयुध फेंककर चीख-पुकार करते हुए राजभवनकी ओर भाग गये ॥ ४०-४१ ॥ |
| तानागतान्सम्प्रेक्ष्य शुम्भः शत्रुनिषूदनः ।<br>पप्रच्छ क्व निशुम्भोऽसौ कथं भग्नाः पलायिताः ॥ ४२ | शत्रुओंके संहारकी शक्ति रखनेवाले शुम्भने वहाँ आये हुए उन सैनिकोंको देखकर उनसे पूछा—निशुम्भ कहाँ है और घायल होकर तुम सब युद्धभूमिसे भाग क्यों आये ? ॥ ४२ ॥ |
| अ० ३० ] | पञ्चम स्कन्ध | ६१५ |
|---|
| तच्छ्रुत्वा वचनं राजंस्ते प्रोचुः प्रणता भृशम्।<br>राजंस्ते निहतो भ्राता शेते समरमूूर्धनि॥ ४३ | दानवराज शुम्भका वह वचन सुनकर उन सैनिकोंने अति विनम्रतापूर्वक कहा—हे राजन्! आपके भाई निशुम्भ मृत होकर रणभूमिमें सोये पड़े हैं॥ ४३॥ | | तया निपातिताः शूरा ये च तेऽप्यनुजानुगाः।<br>वयं त्वां कथितुं सर्वं वृत्तान्तं समुपागताः॥ ४४ | उस स्त्रीने आपके अनुज (निशुम्भ)-के जो भी अनुचर दानववीर थे, उन्हें मार डाला। यही सब समाचार आपको बतानेके लिये हम यहाँ आये हुए हैं॥ ४४॥ | | निशुम्भो निहतस्तत्र तया चण्डिकयाधुना।<br>न हि युद्धस्य कालोऽद्य तव राजन् रणाङ्गणे॥ ४५ | उस चण्डिकाने इसी समय युद्धभूमिमें निशुम्भका संहार किया है। अतएव हे राजन्! उसके साथ समरभूमिमें आपके लिये आज युद्ध करनेका [उचित] अवसर नहीं है॥ ४५॥ | | देवकार्यं समुद्दिश्य कापीय परमाङ्गना।<br>हन्तुं दैत्यकुलं नूनं प्राप्तेति परिचिन्तय॥ ४६ | आप यह निश्चितरूपसे जान लीजिये कि देवताओंका कार्य सिद्ध करनेके उद्देश्यसे दानवकुलका संहार करनेके लिये यह कोई अद्भुत देवी प्रकट हुई है॥ ४६॥ | | नैषा प्राकृतयोषैव देवी शक्तिरनुत्तमा।<br>अचिन्त्यचरिता क्वापि दुर्ज्ञेया दैवतैरपि॥ ४७ | यह सामान्य नारी नहीं है, अपितु देवीरूपिणी कोई अत्युत्तम शक्ति है। अद्भुत चरित्रोंवाली ये देवी देवताओंके भी ज्ञानसे परे हैं॥ ४७॥ | | नानारूपधरातीय मायामूलविशारदा।<br>विचित्रभूषणा देवी सर्वायुधधरा शुभा॥ ४८ | ये कल्याणी भगवती अनेक रूप धारण करनेमें समर्थ हैं, मायाके मूल तत्त्वका पूर्ण ज्ञान रखनेवाली हैं और अद्भुत भूषण तथा समस्त प्रकारके आयुध धारण करनेवाली हैं॥ ४८॥ | | गहना गूढचरिता कालरात्रिरिवापरा।<br>अपारपारगा पूर्णा सर्वलक्षणसंयुता॥ ४९ | गूढ़ चरित्रोंवाली इन देवीको जान पाना अत्यन्त कठिन है। ये दूसरी कालरात्रिके समान प्रतीत होती हैं। असीमके भी पार जा सकनेमें समर्थ ये पूर्णतामयी देवी सभी शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न हैं॥ ४९॥ | | अन्तरिक्षस्थिता देवास्तां स्तुवन्त्यकुतोभयाः।<br>देवकार्यञ्च कुर्वाणां श्रीदेवीं परमाद्भुताम्॥ ५० | समस्त देवतागण अन्तरिक्षमें स्थित होकर देवकार्य सिद्ध करनेवाली परम अद्भुतस्वरूपिणी उन देवीका निर्भीकतापूर्वक स्तवन कर रहे हैं॥ ५०॥ | | पलायनं परो धर्मः सर्वथा देहरक्षणम्।<br>रक्षिते किल देहेस्मिन्कालेऽस्मत्सुखताङ्गते॥ ५१ | यदि आप शरीरकी रक्षा करना चाहते हैं तो इस समय पलायन ही परम धर्म है। इस शरीरकी रक्षा हो जानेके बाद पुनः आनन्ददायक अनुकूल समय आनेपर संग्राममें आपकी विजय होगी, इसमें कोई सन्देह नहीं है। | | संग्रामे विजयो राजन् भविता ते न संशयः।<br>कालः करोति बलिनं समये निर्बलं क्वचित्॥ ५२ | हे राजन्! कभी-कभी काल बलवान्को भी बलहीन बना देता है और पुनः समय आनेपर उसे बलशाली बनाकर विजयकी प्राप्ति |
| ६९६ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ३० | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| तं पुनः सबलं कृत्वा जायायोपदधाति हि।<br>दातारं याचकं कालः करोति समये क्वचित्॥ ५३<br><br>भिक्षुकं धनदातारं करोति समयान्तरे। | करा देता है। कभी-कभी काल विषम परिस्थितिमें दाताको भिखारी बना देता है और पुनः कुछ समय बीतनेपर उसी भिखारीको धन देनेवाला बना देता है॥ ५१–५३ १/२ ॥ |
| विष्णुः कालवशे नूनं ब्रह्मा वा पार्वतीपतिः॥ ५४<br><br>इन्द्राद्या निर्जराः सर्वे काल एव प्रभुः स्वयम्।<br>तस्मात्कालं प्रतीक्षस्व विपरीतं तवाधुना॥ ५५ | विष्णु, ब्रह्मा, शिव तथा इन्द्र आदि सभी देवता निश्चितरूपसे सदा कालके वशवर्ती हैं। यह काल स्वयं ही सबका स्वामी है। हे राजन्! अभी काल आपके लिये विपरीत है, अतएव आप समयकी प्रतीक्षा कीजिये॥ ५४–५५॥ |
| सम्मुखो देवतानाञ्च दैत्यानां नाशहेतुकः।<br>एकैव च गतिर्नास्ति कालस्य किल भूपते॥ ५६<br><br>नानारूपधराप्यस्ति ज्ञातव्यं तस्य चेष्टितम्।<br>कदाचित्सम्भवो नृणां कदाचित्प्रलयस्तथा॥ ५७<br><br>उत्पत्तिहेतुः कालोऽन्यः क्षयहेतुस्तथापरः। | हे पृथ्वीपते! इस समय काल देवताओंके लिये अनुकूल तथा दैत्योंके लिये विनाशकारी है। कालकी गति सर्वथा एक ही तरहकी नहीं बनी रहती है। यह काल-गति नानाविध रूप भी धारण करती है। अतः कालकी चेष्टापर विचार करते रहना चाहिये। कभी प्राणियोंका जन्म होता है और कभी उनका मरण उपस्थित हो जाता है। एक काल उत्पत्तिका हेतु होता है तो दूसरा काल विनाशका हेतु बन जाता है॥ ५६–५७ १/२ ॥ |
| प्रत्यक्षं ते महाराज देवाः सर्वे सवासवाः॥ ५८<br><br>करदास्ते कृताः पूर्वं कालेन सम्मुखेन च।<br>तेनैव विमुखेनाद्य बलिनोऽबलयासुराः॥ ५९<br><br>निहता नितरां कालः करोति च शुभाशुभम्।<br>नैवात्र कारणं काली नैव देवाः सनातनाः॥ ६० | हे महाराज! आपके समक्ष इसका प्रमाण विद्यमान है कि पहले इन्द्र आदि सभी देवता आपके लिये अनुकूल समय रहनेपर आपके करदाता बन गये थे, किंतु आज उसी कालके विपरीत हो जानेके कारण एक अबलाने बलशाली असुरोंका संहार कर डाला। यही काल हित भी करता है तथा अहित भी करता है। इस पराजयमें न तो काली कारण हैं और न तो सनातन देवता ही कारण हैं॥ ५८–६०॥ |
| यथा ते रोचते राजंस्तथा कुरु विमृश्य च।<br>कालोऽयं नात्र हेतुस्ते दानवानां तथा पुनः॥ ६१ | हे राजन्! आपको जैसा उचित जान पड़े भलीभाँति सोच-समझकर आप वैसा ही कीजिये। हमारी समझमें तो यह काल अभी आपके तथा अन्य दानवोंके लिये भी अनुकूल नहीं है॥ ६१॥ |
| त्वदग्रतो गतः शक्रो भग्नः संख्ये निरायुधः।<br>तथा विष्णुस्तथा रुद्रो वरुणो धनदो यमः॥ ६२<br><br>तथा त्वमपि राजेन्द्र वीक्ष्य कालवशं जगत्।<br>पातालं गच्छ तरसा जीवन्भद्रमवाप्स्यसि॥ ६३ | किसी समय संग्राममें घायल होकर तथा अपने आयुध छोड़कर इन्द्र आपके सामनेसे भाग गये थे। ऐसे ही विष्णु, रुद्र, वरुण, कुबेर, यम आदि देवता भी आपके समक्ष टिक नहीं पाये थे। अतः हे राजेन्द्र! इस समस्त जगत्को कालके अधीन मानकर आप भी तत्काल पाताललोक चले जाइये; जीवन बचा रहा तो आप कल्याण अवश्य प्राप्त करेंगे॥ ६२–६३॥ |
| अ० ३१ ] | पञ्चम स्कन्ध | ६१७ |
|---|
| मृते त्वयि महाराज शत्रवस्ते मुदान्विताः ।<br>मङ्गलानि प्रगायन्तो विचरिष्यन्ति सर्वतः ॥ ६४ | हे महाराज ! यदि कहीं आपका निधन हो गया तो आपके शत्रु प्रसन्नतापूर्वक मंगलगान करते हुए निर्भय होकर सर्वत्र विचरण करेंगे ॥ ६४ ॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां पञ्चमस्कन्धे युद्धात्प्रत्यागतानां रक्षसां शुम्भाय वार्तावर्णनं नाम त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३० ॥
अथैकत्रिंशोऽध्यायः
शुम्भका रणभूमिमें आना और देवीसे वार्तालाप करना, भगवती कालिकाद्वारा उसका वध, देवीके इस उत्तम चरित्रके पठन और श्रवणका फल
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| व्यास उवाच<br>इति तेषां वचः श्रुत्वा शुम्भो दैत्यपतिस्तथा।<br>उवाच सैनिकानाशु कोपाकुलितलोचनः ॥ १ | व्यासजी बोले—उन सैनिकोंका यह वचन सुनकर क्रोधसे आकुलित नेत्रोंवाले दानवराज शुम्भने उनसे तुरन्त कहा ॥ १ ॥ |
| शुम्भ उवाच<br>जाल्माः किं ब्रूत दुर्वाच्यं कृत्वा जीवितमुत्सहे।<br>निहत्य सचिवान्भ्रातृन्निर्लज्जो विचरामि किम्॥ २ | शुम्भ बोला—हे मूर्खों! तुम सब खोटी बात क्यों बोल रहे हो? तुम्हारे वचनोंको मानकर मैं भला अपने जीवनकी रक्षा क्यों करूँ? क्या अपने सचिवों तथा भाई-बन्धुओंका वध कराकर मैं निर्लज्ज बनकर विचरण करूँ? ॥ २ ॥ |
| कालः कर्ता शुभानां वाशुभानां बलवत्तरः।<br>का चिन्ता मम दुर्वारे तस्मिन्नीशेऽप्यरूपके ॥ ३ | प्राणियोंके शुभ अथवा अशुभका कर्ता जब एकमात्र वही अति बलवान् काल है तो मुझे चिन्ता क्या? क्योंकि परोक्षरूपसे सबपर शासन करनेवाला वह काल टाला नहीं जा सकता ॥ ३ ॥ |
| यद्भवति तद्भवतु यत्करोति करोतु तत्।<br>न मे चिन्तास्ति कुत्रापि मरणाजीवनात्तथा ॥ ४ | जो हो रहा है, वह होता रहे तथा काल जो कुछ भी कर रहा है, उसे करता रहे; अब तो मुझे जीवन तथा मृत्युके विषयमें किसी भी प्रकारकी चिन्ता नहीं है ॥ ४ ॥ |
| स कालोऽप्यन्यथाकर्तुं भावितो नेशते क्वचित्।<br>न वर्षति च पर्जन्यः श्रावणे मासि सर्वथा ॥ ५<br><br>कदाचिन्मार्गशीर्षे वा पौषे माघेऽथ फाल्गुने।<br>अकाले वर्षतीवाशु तस्मान्मुख्यो न चास्त्ययम्॥ ६ | वह काल भी भवितव्यताको मिटा सकनेमें समर्थ नहीं है। ऐसा भी होता है कि सावनके महीनेमें मेघ सदा नहीं बरसते; अपितु कभी-कभी अगहन, पौष, माघ तथा फाल्गुनमें असमय ही तेज वृष्टि होने लगती है। अतएव [समस्त कार्योंमें] काल ही प्रधान नहीं है ॥ ५-६ ॥ |
| कालो निमित्तमात्रं तु दैवं हि बलवत्तरम्।<br>दैवेन निर्मितं सर्वं नान्यथा भवतीत्यदः ॥ ७ | काल तो निमित्तमात्र है, अपितु [इसकी तुलनामें] दैव अधिक बलवान् है। सब कुछ देवनिर्मित है; इसके विपरीत कुछ नहीं होता ॥ ७ ॥ |
| दैवमेव परं मन्ये धिक्पौरुषमनर्थकम्।<br>जेता यः सर्वदेवानां निशुम्भोऽप्यनया हतः ॥ ८ | मैं तो दैवको ही प्रधान मानता हूँ। अनर्थकारी पुरुषार्थको धिक्कार है; क्योंकि जिस निशुम्भने सभी देवताओंपर विजय प्राप्त कर ली थी, उसे इस स्त्रीने मार डाला ॥ ८ ॥ |
| ६९८ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ३१ |
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| रक्तबीजो महाशूरः सोऽपि नाशं गतो यदा।<br>तदाहं कीर्तिमुत्सृज्य जीविताशां करोमि किम्॥ ९ | जब महान् शूरवीर रक्तबीज भी विनाशको प्राप्त हो गया, तब अपनी कीर्तिको कलंकित करके मैं ही जीवनकी आशा क्यों करूँ?॥ ९॥ | | प्राप्ते काले स्वयं ब्रह्मा परार्धद्वयसम्मिते।<br>निधनं याति तरसा जगत्कर्ता स्वयं प्रभुः॥ १० | जगत्के रचयिता सर्वसमर्थ स्वयं ब्रह्मा भी दो परार्धका समय बीत जानेपर तत्क्षण ही निधनको प्राप्त हो जाते हैं॥ १०॥ | | चतुर्युगसहस्रं तु ब्रह्मणो दिवसे किल।<br>पतन्ति भवनात्पञ्च नव चेन्द्रास्तथा पुनः॥ ११ | ब्रह्माजीके एक दिनमें एक हजार चतुर्युग समाप्त हो जाते हैं और इतनी ही अवधिमें चौदह इन्द्रोंका स्वर्गसे पतन हो चुकता है॥ ११॥ | | तथैव द्विगुणे विष्णुर्मरणायोपकल्पते।<br>तथैव द्विगुणे काले शङ्करः शान्तिमेति च॥ १२ | इसी प्रकार [ब्रह्माजीके जीवनकालका] दुगुना समय बीतनेपर विष्णुका अन्त हो जाता है तथा इससे भी दूने समयके पश्चात् शंकर भी समाप्त हो जाते हैं॥ १२॥ | | का चिन्ता मरणे मूढा निश्चले दैवनिर्मिते।<br>मही महीधराणाञ्च नाशः सूर्यशशाङ्कयोः॥ १३ | इसी प्रकार पृथ्वी, पर्वत, सूर्य तथा चन्द्रमा आदिका भी विनाश हो जाता है, तब हे मूर्खो! दैवकी बनायी हुई इस अटल मृत्युके विषयमें क्या चिन्ता है?॥ १३॥ | | जातस्य हि ध्रुवं मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च।<br>अध्रुवेऽस्मिञ्छरीरे तु रक्षणीयं यशः स्थिरम्॥ १४ | जन्म लेनेवालेकी मृत्यु निश्चित है तथा मरनेवालेका जन्म निश्चित है। अतः इस अनित्य शरीरके द्वारा अपनी स्थिर कीर्तिकी रक्षा करनी चाहिये॥ १४॥ | | रथो मे कल्प्यतां शीघ्रं गमिष्यामि रणाजिरे।<br>जयो वा मरणं वापि भवत्वद्यैव दैवतः॥ १५ | शीघ्रतापूर्वक मेरा रथ तैयार करो। मैं समरांगणमें जाऊँगा। विजय अथवा मरण प्रारब्धानुसार जो भी होनेवाला हो, वह आज ही हो जाय॥ १५॥ | | इत्युक्त्वा सैनिकाञ्छुम्भो रथमास्थाय सत्वरः।<br>प्रययावम्बिका यत्र संस्थिता तु हिमाचले॥ १६ | सैनिकोंसे ऐसा कहकर वह शुम्भ तुरंत रथपर सवार होकर हिमालयकी ओर चल दिया, जहाँ भगवती विराजमान थीं॥ १६॥ | | सैन्यं प्रचलितं तस्य सङ्गे तत्र चतुर्विधम्।<br>हस्त्यश्वरथपादातिसंयुक्तं सायुधं बहु॥ १७ | उस समय हाथी, घोड़े, रथ तथा पैदल चलने-वालोंसे सुसज्जित एवं नानाविध आयुधोंसे युक्त विशाल चतुरंगिणी सेना भी उसके साथ चल पड़ी॥ १७॥ | | तत्र गत्वाचले शुम्भः संस्थितां जगदम्बिकाम्।<br>त्रैलोक्यमोहिनीं कान्तामपश्यत्सिंहवाहिनीम्॥ १८<br><br>सर्वाभरणभूषाढ्यां सर्वलक्षणसंवृताम्।<br>स्तूयमानां सुरैः खस्थैर्गन्धर्वयक्षकिन्नरैः॥ १९<br><br>पुष्पैश्च पूज्यमानाञ्च मन्दारपादपोद्भवैः।<br>कुर्वाणां शङ्खनिनदं घण्टानादं मनोहरम्॥ २० | उस पर्वतपर पहुँचकर शुम्भने त्रिभुवनको मोहित करनेवाली परम सुन्दरी सिंहवाहिनी भगवती जगदम्बिकाको वहाँ विराजमान देखा। वे सभी प्रकारके आभूषणोंसे अलंकृत थीं तथा सभी शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न थीं; देवता, यक्ष तथा किन्नर आकाशमें स्थित होकर उनकी स्तुति कर रहे थे तथा मन्दारवृक्षके पुष्पोंसे पूजा कर रहे थे और वे मनोहर शंखध्वनि तथा घंटानाद कर रही थीं॥ १८-२०॥ |
| अ० ३१ ] | पञ्चम स्कन्ध | ६९९ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| दृष्ट्वा तां मोहमगमच्छुम्भः कामविमोहितः।<br>पञ्चबाणाहतः कामं मनसा समचिन्तयत्॥ २१ | उन्हें देखकर शुम्भ मोहित हो गया। कामबाणसे आहत वह शुम्भ कामासक्त होकर मन-ही-मन सोचने लगा— ॥ २१ ॥ |
| अहो रूपमिदं सम्यगहो चातुर्यमद्भुतम्।<br>सौकुमार्यञ्च धैर्यञ्च परस्परविरोधि यत्॥ २२ | अहो, इसका ऐसा आकर्षक रूप तथा ऐसा अद्भुत चातुर्य है। सुकुमारता तथा धीरता—ये दोनों परस्पर विरोधीभाव इसमें एक साथ विद्यमान हैं!॥ २२॥ |
| सुकुमारातिन्वङ्गी सद्यः प्रकटयौवना।<br>चित्रमेतदसौ बाला कामभावविवर्जिता॥ २३ | अत्यन्त कृश शरीरवाली इस सुकुमारीमें अभी-अभी यौवन प्रस्फुटित हुआ है, किंतु आश्चर्य है कि यह रमणी कामभावनासे रहित है॥ २३॥ |
| कामकान्तासमा रूपे सर्वलक्षणलक्षिता।<br>अम्बिकेयं किमेतत्तु हन्ति सर्वान्महाबलान्॥ २४ | रूपमें कामदेवकी पत्नी रतिके समान सुन्दर तथा सभी शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न यह स्त्री कहीं अम्बिका ही तो नहीं, जो सभी महाबली दानवोंका संहार कर रही है॥ २४॥ |
| उपायः कोऽत्र कर्तव्यो येन मे वशगा भवेत्।<br>न मन्त्रा वा मरालाक्षीसाधने सन्निधौ मम॥ २५ | इस अवसरपर मैं कौन-सा उपाय करूँ, जिससे यह मेरी वशवर्तिनी हो जाय? इस हंस-सदृश नेत्रोंवालीको वशमें करनेहेतु मेरे पास कोई मन्त्र भी नहीं है॥ २५॥ |
| सर्वमन्त्रमयी ह्येषा मोहिनी मदगर्विता।<br>सुन्दरीयं कथं मे स्याद्वशगा वरवर्णिनी॥ २६ | सर्वमन्त्रमयी, सबको मोहित करनेवाली, अभिमानमें मत्त रहनेवाली तथा उत्तम लक्षणोंवाली यह सुन्दरी किस प्रकार मेरे वशमें होगी?॥ २६॥ |
| पातालगमनं मेऽद्य न युक्तं समराङ्गणात्।<br>सामदानविभेदैश्च नेयं साध्या महाबला॥ २७ | अब युद्धभूमि छोड़कर पाताललोक जाना भी मेरे लिये उचित नहीं है। साम, दान तथा भेद आदि उपायोंसे भी यह महाबलशालिनी वशमें नहीं की जा सकती॥ २७॥ |
| किं कर्तव्यं क्व गन्तव्यं विषमे समुपस्थिते।<br>मरणं नोत्तमं चात्र स्त्रीकृतं तु यशोऽपहृत्॥ २८ | इस विषम परिस्थितिके आ जानेपर अब मैं क्या करूँ, कहाँ जाऊँ? स्त्रीके हाथों मर जाना भी उचित नहीं है; क्योंकि ऐसी मृत्यु यशको नष्ट करनेवाली होती है॥ २८॥ |
| मरणमृषिभिः प्रोक्तं सङ्गरे मङ्गलास्पदम्।<br>यत्तत्समानबलयोर्योधयोर्युध्यतोः किल॥ २९ | ऋषियोंने उस मृत्युको श्रेयस्कर कहा है, जो समरभूमिमें समान बलवाले योद्धाओंके साथ लड़ते-लड़ते प्राप्त हो॥ २९॥ |
| प्राप्तेयं दैवरचिता नारी नरशतोत्तमा।<br>नाशायास्मत्कुलस्येह सर्वथातिबलाबला॥ ३० | सैकड़ों वीरोंसे श्रेष्ठ, महाबलशालिनी तथा दैव-विरचित यह नारी मेरे कुलके पूर्ण विनाशके लिये यहाँ उपस्थित हुई है॥ ३०॥ |
| वृथा किं सामवाक्यानि मया योज्यानि साम्प्रतम्।<br>हननायागता ह्येषा किं नु साम्ना प्रसीदति॥ ३१ | मैं इस समय सामनीतिसे युक्त वचनोंका प्रयोग व्यर्थमें क्यों करूँ? क्योंकि यह तो संहारके लिये आयी हुई है, तो फिर सामवचनोंसे यह कैसे |
| ७०० | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ३१ |
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| न दानैश्चालितुं योग्या नानाशस्त्रविभूषिता।<br>भेदस्तु विफलः कामं सर्वदेववशानुगा॥ ३२<br><br>तस्मात्तु मरणं श्रेयो न संग्रामे पलायनम्।<br>जयो वा मरणं वाद्य भवत्वेव यथाविधि॥ ३३ | प्रसन्न हो सकती है? अनेक प्रकारके शस्त्रोंसे विभूषित होनेके कारण दान आदिके प्रलोभनोंसे भी यह विचलित नहीं की जा सकती। भेदनीति भी निष्फल सिद्ध होगी; क्योंकि सभी देवता इसके वशमें हैं॥ ३१-३२॥<br>अतएव संग्राममें मर जाना श्रेयस्कर है, किंतु पलायन करना ठीक नहीं है। अब तो प्रारब्धके अनुसार विजय अथवा मृत्यु जो भी होना हो, वह हो॥ ३३॥ | | व्यास उवाच<br>इति सञ्चिन्त्य मनसा शुम्भः सत्त्वाश्रितोऽभवत्।<br>युद्धाय सुस्थिरो भूत्वा तामुवाच पुरःस्थिताम्॥ ३४ | व्यासजी बोले— इस प्रकार अपने मनमें विचार करके शुम्भने धैर्यका सहारा लिया। अब युद्धके लिये दृढ़ निश्चय करके उसने अपने सामने खड़ी भगवतीसे कहा॥ ३४॥ | | देवि युध्यस्व कान्तेऽद्य वृथायं ते परिश्रमः।<br>मूर्खासि किल नारीणां नायं धर्मः कदाचन॥ ३५ | हे देवि! युद्ध करो, किंतु हे प्रिये! इस समय तुम्हारा यह परिश्रम व्यर्थ है। तुम मूर्ख हो; क्योंकि युद्ध करना स्त्रियोंका धर्म कदापि नहीं है॥ ३५॥ | | नारीणां लोचने बाणा भ्रुवावेव शरासनम्।<br>हावभावास्तु शस्त्राणि पुमाल्लक्ष्यं विचक्षणः॥ ३६ | स्त्रियोंके नेत्र ही बाण हैं, उनकी भौंहें ही धनुष हैं, उनके हाव-भाव ही शस्त्र हैं और रसज्ञ पुरुष उनका लक्ष्य है॥ ३६॥ | | सन्नाहश्चाङ्गरागोऽत्र रथश्चापि मनोरथः।<br>मन्दप्रजल्पितं भेरीशब्दो नान्यः कदाचन॥ ३७ | अंगराग (शीतल चन्दन आदि) ही उनका कवच है, मनोकामना रथ है तथा धीरे-धीरे मधुर वाणीमें बोलना भेरी-ध्वनि है। अतएव स्त्रियोंके लिये अन्य शस्त्रोंकी कोई आवश्यकता नहीं रहती॥ ३७॥ | | अन्यास्त्रधारणं स्त्रीणां विडम्बनमसंशयम्।<br>लज्जैव भूषणं कान्ते न च धाष्टर्यं कदाचन॥ ३८ | यदि स्त्रियाँ इनके अतिरिक्त अन्य अस्त्र धारण करें तो यह निश्चितरूपसे उनके लिये विडम्बना ही है। हे प्रिये! लज्जा ही नारियोंका आभूषण है, धृष्टता उन्हें कभी भी शोभा नहीं देती॥ ३८॥ | | युध्यमाना वरा नारी कर्कशेवाभिदृश्यते।<br>स्तनौ सङ्गोपनीयौ वा धनुषः कर्षणे कथम्॥ ३९ | युद्ध करती हुई उत्तम नारी भी कर्कशाके सदृश दिखायी देती है। धनुष खींचते समय कोई स्त्री अपने दोनों स्तनोंको छिपानेमें कैसे सफल हो सकती है?॥ ३९॥ | | क्व मन्दगमनं कुत्र गदामादाय धावनम्।<br>बुद्धिदा कालिका तेऽत्र चामुण्डा परनायिका॥ ४०<br><br>चण्डिका मन्त्रमध्यस्था लालनेऽसुस्वरा शिवा।<br>वाहनं मृगराडास्ते सर्वसत्त्वभयङ्करः॥ ४१ | कहाँ नारियोंकी मन्थरगति और कहाँ युद्धमें गदा लेकर दौड़ना। इस समय यह कालिका तथा दूसरी स्त्री चामुण्डा ही तुम्हें बुद्धि देनेवाली हैं। मध्यस्थ होकर चण्डिका मन्त्रणा देती है, कर्कश स्वरवाली शिवा तुम्हारी शुश्रूषामें रहती है और सभी प्राणियोंमें भयंकर सिंह तुम्हारा वाहन है॥ ४०-४१॥ |