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देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
७५४श्रीमद्देवीभागवत[ अ० ७

| देवीं सम्पूजयामास यत्प्रसादाद्धतो रिपुः।<br>प्रसादयामास तदा स्तोत्रैर्नानाविधैरपि॥ ६२ | पूजा की तथा विविध स्तोत्रोंसे उन्हें प्रसन्न किया, जिनकी कृपासे शत्रु मारा गया॥ ६०–६२॥ | | देवोद्याने पराशक्तेः प्रासादमकरोद्धरिः।<br>पद्मरागमयीं मूर्तिं स्थापयामास वासवः॥ ६३<br><br>त्रिकालं महतीं पूजां चक्रुः सर्वेऽपि निर्जराः।<br>तदाप्रभृति देवानां श्रीदेवी कुलदैवतम्॥ ६४ | तत्पश्चात् इन्द्रने देवोद्यान नन्दनवनमें पराशक्ति भगवतीका मन्दिर बनवाया और उसमें पद्मराग मणियोंसे निर्मित मूर्तिकी स्थापना की और सभी देवता भी तीनों समय उनकी महती पूजा करने लगे; तभीसे श्रीदेवी ही उन देवताओंकी कुलदेवी हो गयीं॥ ६३-६४॥ | | विष्णुं त्रिभुवनश्रेष्ठं पूजयामास वासवः।<br>ततो हते महावीर्ये वृत्रे देवभयङ्करे॥ ६५<br><br>प्रववौ च शिवो वायुर्जहृषुर्दैवतास्तथा।<br>हते तस्मिन्सगन्धर्वा यक्षराक्षसकिन्नराः॥ ६६ | तब महापराक्रमी और देवताओंके लिये भयंकर वृत्रके मारे जानेपर इन्द्रने तीनों लोकोंमें श्रेष्ठ भगवान् विष्णुकी पूजा की। उस वृत्रासुरके मर जानेपर कल्याणकारी वायु बहने लगी तथा देवता, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस और किन्नरगण हर्षित हो उठे॥ ६५-६६॥ | | इत्थं वृत्रः पराशक्तिप्रवेशयुतफेनतः।<br>तया कृतविमोहाच्च शक्रेण सहसा हतः॥ ६७<br><br>ततो वृत्रनिहन्त्रीति देवी लोकेषु गीयते।<br>शक्रेण निहतत्वाच्च शक्रेण हत उच्यते॥ ६८ | इस प्रकार भगवती पराशक्तिके समुद्रफेनसे संयुक्त होने और उनके द्वारा ही विमोहित किये जानेके कारण वृत्रासुर सहसा इन्द्रके द्वारा मारा गया। इसलिये वे भगवती देवी संसारमें 'वृत्रनिहन्त्री' इस नामसे विख्यात हुईं और वह वृत्रासुर चूँकि प्रकटरूपसे इन्द्रके द्वारा मारा गया था, इसलिये उसे इन्द्रके द्वारा मारा गया, ऐसा कहा जाता है॥ ६७-६८॥ |

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां षष्ठस्कन्धे छद्मनेन्द्रेण फेनद्वारा पराशक्तिस्मरणपूर्वकं वृत्रहननवर्णनं नाम षष्ठोऽध्यायः॥ ६॥


अथ सप्तमोऽध्यायः

त्वष्टाका वृत्रासुरकी पारलौकिक क्रिया करके इन्द्रको शाप देना, इन्द्रको ब्रह्महत्या लगना, नहुषका स्वर्गाधिपति बनना और इन्द्राणीपर आसक्त होना

व्यास उवाचव्यासजी बोले—
अथ तं पतितं दृष्ट्वा विष्णुर्विष्णुपुरीं ययौ।<br>मनसा शङ्कमानस्तु तस्य हत्याकृतं भयम्॥ १इस प्रकार उसे गिरा हुआ देखकर मन-ही-मन हत्याके भयसे सशंकित भगवान् विष्णु वैकुण्ठलोकको चले गये॥ १॥
इन्द्रोऽपि भयसंत्रस्तो ययाविन्द्रपुरीं ततः।<br>मुनयो भयसंविग्ना ह्यभवन्निहते रिपौ॥ २<br><br>किमस्माभिः कृतं पापं यदसौ वञ्चितः किल।<br>मुनिशब्दो वृथा जातः सुरेशस्य च सङ्गमात्॥ ३तत्पश्चात् इन्द्र भी भयभीत होकर इन्द्रपुरीको चल दिये। उस शत्रु (वृत्रासुर)-के मारे जानेपर मुनिगण भी भयग्रस्त हो गये कि हमने छलपूर्ण यह कैसा पापकृत्य कर डाला। इन्द्रका साथ देनेसे हमारा 'मुनि' नाम व्यर्थ हो गया॥ २-३॥
अस्माकं वचनाद् वृत्रो विश्वासमगमत्किल।<br>विश्वासघातिनः सङ्गाद्वयं विश्वासघातकाः॥ ४हमारी ही बातोंसे वृत्रासुरको विश्वास आया; विश्वासघातीके संगसे हम सब भी विश्वासघाती हो गये॥ ४॥

अ० ७ ] षष्ठ स्कन्ध [ ७५५

अ० ७ ] षष्ठ स्कन्ध [ ७५५

श्लोकअर्थ
धिगियं ममता पापमूलमेवमनर्थकृत्।<br>यदस्माभिश्चलं कृत्वा शपथैर्वञ्चितोऽसुरः॥ ५पापकी जड़ और अनर्थकारी इस ममताको धिक्कार है, जिसके कारण हमलोगोंने छलपूर्वक शपथ ली और उस असुर (वृत्रासुर)-को धोखा दिया॥ ५॥
मन्त्रकृद् बुद्धिदाता च प्रेरकः पापकारिणाम्।<br>पापभाक्स भवेन्नूनं पक्षकर्ता तथैव च॥ ६पाप करनेका परामर्श देनेवाला, पाप करनेके लिये बुद्धि देनेवाला, पापकी प्रेरणा देनेवाला तथा पाप करनेवालोंका पक्ष लेनेवाला भी निश्चय ही पापकर्ताके समान पापभाजन होता है॥ ६॥
विष्णुनापि कृतं पापं यत्साहाय्यमवाप्तवान्।<br>वज्रं प्रविश्य येनासौ पातितः सत्त्वमूर्त्तिना॥ ७वज्रमें प्रविष्ट होकर वृत्रकी हत्या करनेमें सत्त्वगुणके मूर्तरूप भगवान् विष्णुने इन्द्रकी सहायता की और उसे मारा, अतः उन्होंने भी पाप किया॥ ७॥
नूनं स्वार्थपरः प्राणी न पापात् त्रासमश्नुते।<br>हरिणा हरिसङ्गेन सर्वथा दुष्कृतं कृतम्॥ ८स्वार्थपरायण प्राणी पापसे भयभीत नहीं होता। विष्णुने इन्द्रका साथ देकर सर्वथा दुष्कृत कर्म किया॥ ८॥
द्वावेव स्तः पदार्थानां द्वावेव निधनं गतौ।<br>प्रथमश्च तुरीयश्च यौ त्रिलोक्यां तु दुर्लभौ॥ ९चार पदार्थों (धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष)-मेंसे दो ही रह गये हैं और दो समाप्त हो गये हैं। उनमें भी प्रथम पदार्थ धर्म और चतुर्थ पदार्थ मोक्ष दोनों त्रिलोकमें दुर्लभ ही हो गये हैं॥ ९॥
अर्थकामौ प्रशस्तौ द्वौ सर्वेषां सम्मतौ प्रियौ।<br>धर्माधर्मेति वाग्वादो दम्भोऽयं महतामपि॥ १०अर्थ और काम ही सबके प्रिय और प्रशस्त माने गये हैं। धर्म और अधर्मकी विवेचना—यह बड़े लोगोंका वाचिक दम्भमात्र ही रह गया है॥ १०॥
मुनयोऽपि मनस्तापमेवं कृत्वा पुनः पुनः।<br>जग्मुः स्वानाश्रमानेव विमनस्का हतोद्यमाः॥ ११इस प्रकार मुनिगण भी बार-बार मनमें सन्ताप करके उदासमनसे हतोत्साह होकर अपने-अपने आश्रमोंको चले गये॥ ११॥
त्वष्टा तु निहतं श्रुत्वा पुत्रमिन्द्रेण भारत।<br>रुरोद दुःखसन्तप्तो निर्वेदमगमत्पुनः॥ १२हे भारत! उधर अपने पुत्रको इन्द्रद्वारा मारा गया सुनकर त्वष्टा दुःखसे सन्तप्त होकर अत्यन्त दुःखित हो रोने लगे; उन्हें इससे बहुत वेदना हुई॥ १२॥
यत्रासौ पतितस्तत्र गत्वा वीक्ष्य तथागतम्।<br>संस्कारं कारयामास विधिवत्पारलौकिकम्॥ १३तदनन्तर जहाँ वह (वृत्र) गिरा पड़ा था, वहाँ जाकर उसे उस स्थितिमें देखकर त्वष्टाने विधिपूर्वक उसका पारलौकिक संस्कार कराया॥ १३॥
स्नात्वास्य सलिलं दत्त्वा कृत्वा चैवौर्ध्वदैहिकम्।<br>शशापेन्द्रं स शोकार्तः पापिष्ठं मित्रघातकम्॥ १४<br><br>यथा मे निहतः पुत्रः प्रलोभ्य शपथैर्भृशम्।<br>तथेन्द्रोऽपि महद्दुःखं प्राप्नोतु विधिनिर्मितम्॥ १५तत्पश्चात् स्नान करके, जलाञ्जलि देकर उसका और्ध्वदैहिक कर्म सम्पन्न करनेके पश्चात् उन शोकसन्तप्त त्वष्टाने पापी और मित्रघाती इन्द्रको इस प्रकार शाप दे दिया कि जिस प्रकार शपथोंसे प्रलोभितकर इन्द्रने मेरे पुत्रको मार डाला है, उसी प्रकार वह भी विधाताद्वारा दिये हुए महान् दुःख प्राप्त करे॥ १४–१५॥
७५६श्रीमद्देवीभागवत[ अ० ७
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
इति शप्त्वा सुरेशानं त्वष्टा तापसमन्वितः।<br>मेरोः शिखरमास्थाय तपस्तेपे सुदुष्करम्॥ १६इस प्रकार देवराज इन्द्रको शाप देकर सन्तप्त त्वष्टा सुमेरुपर्वतके शिखरका आश्रय लेकर अत्यन्त कठोर तपस्या करने लगे॥ १६॥
जनमेजय उवाच<br>हत्वा त्वाष्ट्रं सुरेशोऽथ कामवस्थामवाप्तवान्।<br>सुखं वा दुःखमेवाग्रे तन्मे ब्रूहि पितामह॥ १७जनमेजय बोले— हे पितामह ! वृत्रासुरको मारनेके बाद इन्द्रकी क्या दशा हुई ? उन्हें बादमें सुख मिला या दुःख, इसे मुझे बताइये॥ १७॥
व्यास उवाच<br>किं पृच्छसि महाभाग सन्देहः कीदृशस्तव।<br>अवश्यमेव भोक्तव्यं कृतं कर्म शुभाशुभम्॥ १८<br><br>बलिष्ठैर्दुर्बलैर्वापि स्वल्पं वा बहु वा कृतम्।<br>सर्वथैव हि भोक्तव्यं सदेवासुरमानुषैः॥ १९व्यासजी बोले— हे महाभाग ! तुम क्या पूछ रहे हो, [इस विषयमें] तुम्हें क्या सन्देह है ? किये गये शुभ-अशुभ कर्मका फल तो अवश्य ही भोगना पड़ता है। देवता, राक्षस और मनुष्यसहित बलवान् या दुर्बल कोई भी हो—सभीको अपने द्वारा किये गये अत्यन्त अल्प या अधिक कर्मका फल सर्वथा भोगना ही पड़ता है॥ १८-१९॥
शक्रायेत्थं मतिर्दत्ता हरिणा वृत्रघातिने।<br>प्रविष्टोऽथ पविं विष्णुः सहायः प्रत्यपद्यत॥ २०<br><br>न चापदि सहायोऽभूद्वासुदेवः कथञ्चन।<br>समये स्वजनः सर्वः संसारेऽस्मिन्नराधिप॥ २१<br><br>दैवे विमुखतां प्राप्ते न कोऽप्यस्ति सहायवान्।<br>पिता माता तथा भार्या भ्राता वाथ सहोदरः॥ २२<br><br>सेवको वापि मित्रं वा पुत्रश्चैव तथौरसः।<br>प्रतिकूले गते दैवे न कोऽप्येति सहायताम्॥ २३भगवान् विष्णुने वृत्रघाती इन्द्रको इस प्रकारकी मति प्रदान की थी। वे विष्णु उनके वज्रमें प्रविष्ट हुए थे तथा उनके सहायक बने थे; परंतु विपत्तिमें उन्होंने किसी भी तरह सहायता नहीं की। हे राजन् ! इस संसारमें अच्छे समयमें सभी लोग अपने बन जाते हैं, किंतु दैवके प्रतिकूल होनेपर कोई भी सहायक नहीं होता। पिता, माता, पत्नी, सहोदर भाई, सेवक, मित्र एवं औरस पुत्र—कोई भी दैवके प्रतिकूल हो जानेपर सहायता नहीं करता। पाप या पुण्य करनेवाला ही उसका भागी होता है॥ २०–२३ १/२॥
भोक्ता पापस्य पुण्यस्य कर्ता भवति सर्वथा।<br>वृत्रं हत्वा गताः सर्वे निस्तेजस्कः शचीपतिः॥ २४<br><br>शेपुस्तं त्रिदशाः सर्वे ब्रह्महत्येत्यब्रुवञ्छनैः।<br>को नाम शपथान्कृत्वा सत्यं दत्त्वा वचः पुनः॥ २५<br><br>जिघांसति सुविश्वस्तं मुनिं मित्रत्वमागतम्।<br>देवगोष्ठ्यां सुरोद्याने गन्धर्वाणां समागमे॥ २६<br><br>सर्वत्रैव कथा तस्य विस्तारमगमत्किल।<br>किं कृतं दुष्कृतं कर्म शक्रेणाद्य जिघांसता॥ २७<br><br>वृत्रं छलेन विश्वस्तं मुनिभिश्च प्रतारितम्।<br>वेदप्रमाणमुत्सृज्य स्वीकृतं सौगतं मतम्॥ २८वृत्रके मारे जानेपर अन्य सभी लोग चले गये; इन्द्र तेजहीन हो गये। सभी देवता उसकी निन्दा करने लगे और ‘यह ब्रह्महत्या है’—ऐसा मन्द स्वरमें कहने लगे। कौन ऐसा होगा जो शपथ खाकर और वचन देकर अत्यन्त विश्वासमें आये हुए तथा मित्रताको प्राप्त मुनिको मारनेकी इच्छा करेगा ! उसकी यह बात देवताओंकी सभामें, देवोद्यानमें तथा गन्धर्वोंके समाजमें सर्वत्र फैल गयी। हत्या करनेकी इच्छावाले इन्द्रने आज यह कैसा दुष्कृत कर्म कर डाला ! मुनियोंके द्वारा विश्वास दिलाये गये वृत्रासुरको छलपूर्वक मार करके (मानो) इन्द्रने वेदोंकी प्रामाणिकताका त्यागकर सौगतोंका मत स्वीकार कर लिया। इन्द्रने छल करके अत्यन्त साहससे शत्रुको
अ० ७ ]षष्ठ स्कन्ध७५७
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
यदयं निहतः शत्रुर्वञ्चयित्वातिसाहसात् ।<br>को नाम वचनं दत्त्वा विपरीतमथाचरेत् ॥ २९<br>विना शक्रं हरिं वापि यथायं विनिपातितः ।<br>एवंविधाः कथाश्चान्याः समाजेष्वभवन्भृशम् ॥ ३०मार डाला। वचन देकर भी जिस प्रकार [छलपूर्वक] यह वृत्रासुर मारा गया, वैसा विपरीत आचरण इन्द्र और विष्णुके अतिरिक्त कौन होगा, जो कर सकता है ! इस प्रकारकी कथाएँ तथा और भी बातें लोगोंमें व्यापक रूपसे होने लगीं ॥ २८–३० ॥
शुश्रावेन्द्रोऽपि विविधाः स्वकीर्तेर्हानिकारकाः ।<br>यस्य कीर्तिर्हृता लोके धिक्कस्यैव कुजीवितम् ॥ ३१<br>यं दृष्ट्वा पथि गच्छन्तं शत्रुः स्मेरमुखो भवेत् ।<br>इन्द्रद्युम्नोऽपि राजर्षिः पतितः कीर्तिसंक्षयात् ॥ ३२<br>स्वर्गादकृतपापोऽसौ पापकृत्किं न पात्यते ।<br>स्वल्पेऽपराधेऽपि नृपो ययातिः पतितः किल ॥ ३३<br>नृपः कर्कटतां प्राप्तो युगानष्टादशैव तु ।<br>भृगुपत्नीशिरश्छेदाद्भगवान्हरिरच्युतः ॥ ३४<br>ब्रह्मशापात्पशोर्योनौ सञ्जातो मकरादिषु ।<br>विष्णुश्च वामनो भूत्वा याचनार्थं बलेर्गृहे ॥ ३५<br>गतः किमपरं दुःखं प्राप्नोति दुष्कृती नरः ।<br>रामोऽपि वनवासेषु सीताविरहजं बहु ॥ ३६<br>दुःखं च प्राप्तवान्घोरं भृगुशापेन भारत ।<br>तथेन्द्रोऽपि ब्रह्महत्याकृतं प्राप्य महद्भयम् ॥ ३७<br>न स्वास्थ्यं प्राप गेहेऽसौ सर्वसिद्धिसमन्विते ।<br>पौलोमी तं सभाहीनं दृष्ट्वा प्रोवाच वासवम् ॥ ३८<br>निःश्वसन्तं भयत्रस्तं नष्टसंज्ञं विचेतसम् ।<br>किं प्रभोऽद्य भयार्तोऽसि मृतस्ते दारुणो रिपुः ॥ ३९<br>का चिन्ता वर्तते कान्त तव शत्रुनिषूदन ।<br>कस्माच्छोचसि लोकेश निःश्वसन्नाकृतो यथा ॥ ४०<br>नान्योऽस्ति बलवाञ्छत्रुर्यैन चिन्तापरो भवान् ।इन्द्र भी अपनी कीर्ति नष्ट करनेवाली तरह-तरहकी बातें सुनते रहे। संसारमें जिसकी कीर्ति नष्ट हो गयी, उसके कलुषित जीवनको धिक्कार है। रास्तेमें जाते हुए ऐसे व्यक्तिको देखकर शत्रु हँस पड़ता है। राजर्षि इन्द्रद्युम्नने कोई पाप नहीं किया था फिर भी कीर्ति नष्ट हो जानेसे वे स्वर्गसे गिर गये थे; तब पाप करनेवाला कैसे नहीं गिरेगा ? राजा ययातिका बहुत थोड़ेसे अपराधपर पतन हो गया था। इसी प्रकार एक राजाको अठारह युगोंतक केकड़ेकी योनिमें रहना पड़ा था। भृगुकी पत्नीका मस्तक काटनेके कारण अच्युत भगवान् श्रीहरिको ब्रह्मशापसे मकर आदि रूपोंमें पशुयोनिमें जन्म लेना पड़ा। विष्णुको भी वामन होकर याचनाके लिये बलिके घर जाना पड़ा; तब यदि कुकर्मी मनुष्य दुःख पाये तो क्या आश्चर्य है ! हे भारत! श्रीरामचन्द्रजीको भी भृगुके शापसे वनवासकालमें सीतासे वियोगका महान् कष्ट उठाना पड़ा। उसी प्रकार इन्द्रको भी ब्रह्महत्याजनित महान् भय प्राप्त करके समस्त सिद्धियोंसे युक्त भवनमें भी सुख नहीं प्राप्त होता था। उन्हें दीर्घ श्वास लेते, भयग्रस्त, चेतनारहित, खिन्नमनस्क और सभामें न जाते देखकर शचीने पूछा—हे प्रभो! आजकल आप भयभीत क्यों रहते हैं, आपका भयंकर शत्रु तो मर गया है। हे कान्त! हे शत्रुहन्ता! आपको क्या चिन्ता है? हे लोकेश! साधारण मनुष्यकी भाँति लम्बी-लम्बी साँसें लेते हुए आप शोक क्यों करते हैं? आपका कोई बलवान् शत्रु भी तो नहीं है, जिससे आप चिन्ताकुल हों ॥ ३१–४० ½ ॥
इन्द्र उवाच<br>नारातिर्बलवान्मेऽस्ति न शान्तिर्न सुखं तथा ॥ ४१<br>ब्रह्महत्याभयाद्राज्ञि बिभेमि सततं गृहे ।<br>न नन्दनं सुखकरं नामृतं न गृहं वनम् ॥ ४२**इन्द्र बोले—**हे राज्ञि! यद्यपि अब मेरा कोई बलवान् शत्रु नहीं है तथापि ब्रह्महत्याके भयसे मैं निरन्तर डरता रहता हूँ। घरमें रहते हुए भी मुझे न सुख है और न शान्ति। नन्दनवन, अमृत, घर तथा वन—कुछ भी मुझे सुखकर नहीं लगता। गन्धर्वोंका

| ७५८ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ७ | | :--- | :--- |

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
गन्धर्वाणां तथा गेयं नृत्यमप्सरसां पुनः ।<br>न त्वं सुखकरा नारी नाना च सुरयोषितः ॥ ४३<br>न तथा कामधेनुश्च देववृक्षः सुखप्रदः ।<br>किं करोमि क्व गच्छामि क्व शर्म मम जायते ॥ ४४<br>इति चिन्तापरः कान्ते न लभे सुखमात्मनि ।गान और अप्सराओंका नृत्य तथा यहाँतक कि तुम और अन्य देवांगनाएँ भी मुझे सुखकर नहीं लगतीं। न कामधेनु और न ही कल्पवृक्ष मुझे सुख प्रदान करते हैं। मैं क्या करूँ, कहाँ जाऊँ, मुझे शान्ति कहाँ मिलेगी? हे प्रिये! इसी चिन्तामें पड़ा हुआ मैं अपने मनमें शान्ति नहीं प्राप्त कर पा रहा हूँ॥ ४१–४४ १/२ ॥
व्यास उवाच<br>इत्युक्त्वा वचनं शक्रः प्रियां परमकातराम् ॥ ४५<br>निर्जगाम गृहान्मन्दो मानसं सर उत्तमम् ।<br>पद्मनाले प्रविष्टोऽसौ भयार्तः शोककर्षितः ॥ ४६<br>न प्राज्ञायत देवेन्द्रस्त्वभिभूतश्च कल्मषैः ।<br>प्रतिच्छन्नो वसत्यप्सु चेष्टमान इवोरगः ॥ ४७<br>असहायस्तुराषाडैच्चिन्तार्तो विकलेन्द्रियः ।व्यासजी बोले— अत्यन्त घबरायी हुई अपनी प्रिय पत्नीसे ऐसा कहकर मूढ़ इन्द्र घरसे निकल पड़े और उत्तम मानसरोवरको चले गये। भयसे पीडित और शोककन्तप्त होकर वे एक कमलनालमें प्रविष्ट हो गये। पापकर्मोंसे पराभूत हुए देवराज इन्द्रको कोई जान नहीं सका। वे सर्पके समान चेष्टा करते हुए जलमें छिपकर रह रहे थे। उस समय वे इन्द्र असहाय, चिन्तित और व्याकुल इन्द्रियोंवाले हो गये॥ ४५–४७ १/२॥
ततः प्रनष्टे देवेन्द्रे ब्रह्महत्याभयार्दिते ॥ ४८<br>सुराश्चिन्तातुराश्चासन्नुत्पाताश्चाभवन्नथ ।<br>ऋषयः सिद्धगन्धर्वा भयार्ताश्चाभवन्भृशम् ॥ ४९<br>अराजकं जगत्सर्वमभिभूतमुपद्रवैः ।<br>अवर्षणं तदा जातं पृथिवी क्षीणवैभवा ॥ ५०<br>विच्छिन्नस्रोतसो नद्यः सरांस्यनुदकानि वै ।<br>एवं त्वराजके जाते देवता मुनयस्तथा ॥ ५१<br>विचार्य नहुषं चक्रुः शक्रं सर्वे दिवौकसः ।ब्रह्महत्याके भयसे दुःखी होकर देवराज इन्द्रके अदृश्य हो जानेपर देवगण चिन्तातुर हो उठे तथा अनेक प्रकारके उत्पात होने लगे। ऋषि, सिद्ध और गन्धर्वगण भी अत्यन्त भयभीत हो गये। उपद्रवोंके होनेसे सम्पूर्ण जगत् अराजकतासे ग्रस्त हो गया। उस समय अनावृष्टि उपस्थित हो गयी और पृथिवी वैभवशून्य हो गयी, नदियोंके स्रोत सूख गये और तालाब बिना जलके हो गये—इस प्रकारकी अराजकताको देखकर स्वर्गके देवताओं और मुनियोंने विचार करके नहुषको इन्द्र बना दिया॥ ४८–५१ १/२॥
सम्प्राप्य नहुषो राजा धर्मिष्ठोऽपि रजोबलात् ॥ ५२<br>बभूव विषयासक्तः पञ्चबाणशराहतः ।<br>अप्सरोभिर्वृतः क्रीडन्देवोद्यानेषु भारत ॥ ५३राज्य प्राप्त करनेपर राजा नहुष धर्मात्मा होते हुए भी राजसी वृत्तिके कारण कामबाणसे आहत हो विषयासक्त हो गये। हे भारत! देवोद्यानोंमें क्रीडारत रहते हुए वे सदा अप्सराओंसे घिरे रहते थे॥ ५२-५३॥
शक्रपत्नीगुणाञ्छ्रुत्वा चकमे तां स पार्थिवः ।<br>ऋषीनाह किमिन्द्राणी नोपगच्छति मां किल ॥ ५४<br>भवद्भिश्चामरैः सर्वैः कृतोऽहं वासवस्त्विह ।<br>प्रेषयध्वं सुराः कामं सेवार्थं मम वै शचीम् ॥ ५५<br>प्रियं चेन्मम कर्तव्यं सर्वथा मुनयोऽमराः ।<br>अहमिन्द्रोऽद्य देवानां लोकानां च तथेश्वरः ॥ ५६<br>आगच्छतु शची मह्यं क्षिप्रमद्य निवेशनम् ।उस राजा नहुषके मनमें इन्द्राणी शचीके गुणोंको सुनकर उन्हें प्राप्त करनेकी इच्छा हुई। उसने ऋषियोंसे कहा—मेरे पास इन्द्राणी क्यों नहीं आती? आपलोग और देवताओंने मुझे इन्द्र बनाया, इसलिये हे देवताओ! शचीको मेरी सेवाके लिये भेजिये। हे मुनियो तथा देवताओ! आपलोगोंको मेरा प्रिय कार्य अवश्य करना चाहिये। इस समय मैं देवताओंका इन्द्र और समस्त लोकोंका स्वामी हूँ; शची शीघ्र ही आज मेरे भवनमें आ जायँ॥ ५४—५६ १/२॥

अ० ८ ] षष्ठ स्कन्ध ७५१

अ० ८ ] षष्ठ स्कन्ध ७५१


इति तस्य वचः श्रुत्वा देवा देवर्षयस्तथा ॥ ५७
गत्वा चिन्तातुराः प्रोचुः पौलोमीं प्रणतास्ततः।
इन्द्रपत्नि दुराचारो नहुषस्त्वामिहेच्छति ॥ ५८
कुपितोऽस्मानुवाचेदं प्रेषयध्वं शचीमिह।
किं कुर्मस्तदधीनाः स्मो येनेन्द्रोऽयं कृतः किल ॥ ५९
तच्छ्रुत्वा दुर्मना देवी बृहस्पतिमुवाच ह।
रक्ष मां नहुषाद् ब्रह्मंस्तवास्मि शरणं गता ॥ ६०

बृहस्पतिरुवाच
न भेतव्यं त्वया देवि नहुषात्पापमोहितात्।
न त्वां दास्याम्यहं वत्से त्यक्त्वा धर्मं सनातनम् ॥ ६१
शरणागतमार्तं च यो ददाति नराधमः।
स एव नरकं याति यावदाभूतसंप्लवम्।
स्वस्था भव पृथुश्रोणि न त्यक्ष्ये त्वां कदाचन ॥ ६२

उसकी यह बात सुनकर चिन्तासे व्याकुल देवता तथा ऋषिगण शचीके पास जाकर उन्हें प्रणाम करके कहने लगे—हे इन्द्रपत्नि ! दुराचारी नहुष इस समय आपकी कामना करता है। उसने क्रुद्ध होकर हमसे यह बात कही है ‘शचीको यहाँ भेज दीजिये।’ हम उसके अधीन हैं, अतः कर ही क्या सकते हैं; क्योंकि उसे इन्द्र बना दिया गया है ॥ ५७–५९॥

यह सुनकर दुःखितमन शचीने बृहस्पतिसे कहा—‘हे ब्रह्मन्! नहुषसे मेरी रक्षा कीजिये; मैं आपकी शरणमें हूँ’ ॥ ६० ॥

बृहस्पति बोले—हे देवि ! पापसे मोहित नहुषसे तुम्हें भय नहीं करना चाहिये। हे पुत्रि ! मैं सनातनधर्मका त्यागकर तुम्हें उसको नहीं दूँगा ॥ ६१ ॥

जो अधम मनुष्य शरणमें आये हुए तथा दुःखी प्राणीको दूसरोंको सौंप देता है वह प्रलयपर्यन्त नरकमें वास करता है। अतः हे पृथुश्रोणि ! तुम निश्चिन्त रहो, मैं तुम्हारा त्याग कभी नहीं करूँगा॥ ६२॥


इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां षष्ठस्कन्धे इन्द्रस्य पद्मनालप्रवेशानन्तरं नहुषस्य देवेन्द्रपदेऽभिषेकवर्णनं नाम सप्तमोऽध्यायः ॥ ७ ॥


अथाष्टमोऽध्यायः

इन्द्राणीको बृहस्पतिकी शरणमें जानकर नहुषका क्रुद्ध होना, देवताओंका नहुषको समझाना, बृहस्पतिके परामर्शसे इन्द्राणीका नहुषसे समय माँगना, देवताओंका भगवान् विष्णुके पास जाना और विष्णुका उन्हें देवीको प्रसन्न करनेके लिये अश्वमेधयज्ञ करनेको कहना, बृहस्पतिको शचीको भगवतीकी आराधना करनेको कहना, शचीकी आराधनासे प्रसन्न होकर देवीका प्रकट होना और शचीको इन्द्रका दर्शन होना

व्यास उवाच
नहुषस्त्वथ तां श्रुत्वा गुरोस्तु शरणं गताम्।
चुक्रोध स्मरबाणार्तस्तमाङ्गिरसमाशु वै ॥ १

देवावाहाङ्गिरससूनुर्हन्तव्योऽयं मया किल।
इतीन्द्राणीं गृहे मूढो रक्षतीति मया श्रुतम् ॥ २

इति तं कुपितं दृष्ट्वा देवाः सर्षपुरोगमाः।
अब्रुवन्नहुषं घोरं सामपूर्वं वचस्तदा ॥ ३

व्यासजी बोले—वे शची देवगुरुकी शरणमें चली गयी हैं—ऐसा सुनकर कामबाणसे आहत नहुष अंगिरापुत्र बृहस्पतिपर बहुत कुपित हुआ और उसने देवताओंसे कहा—यह अंगिरापुत्र बृहस्पति आज मेरेद्वारा निश्चय ही मारा जायगा; क्योंकि मैंने ऐसा सुना है कि उस मूर्खने इन्द्राणीको अपने घरमें रखा है॥ १-२॥

इस प्रकार नहुषको क्रुद्ध देखकर प्रधान ऋषियोंसहित देवतागण उस दुष्टसे सामनीतियुक्त वचन बोले—॥ ३॥

७६०श्रीमद्देवीभागवत[ अ० ८
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
क्रोधं संहर राजेन्द्र त्यज पापमतिं प्रभो।<br>निन्दन्ति धर्मशास्त्रेषु परदाराभिमर्शनम्॥ ४हे राजेन्द्र! क्रोध दूर करो और पापकारिणी बुद्धिका त्याग करो। हे प्रभो! [मनीषियोंने] धर्मशास्त्रोंमें परस्त्रीगमनकी निन्दा की है॥ ४॥
शक्रपत्नी सदा साध्वी जीवमाने पतौ पुनः।<br>कथमन्यं पतिं कुर्यात्सुभगातिपतिव्रता॥ ५इन्द्रकी पत्नी शची सदासे अत्यन्त साध्वी, सौभाग्यवती और पतिव्रता हैं; फिर अपने पतिके जीवित रहते वे कैसे दूसरेको पति बना सकती हैं?॥ ५॥
त्रिलोकीशस्त्वमधुना शास्ता धर्मस्य वै विभो।<br>त्वादृशोऽधर्ममातिष्ठेत्तदा नश्येत्प्रजा ध्रुवम्॥ ६हे विभो! आज इस समय आप तीनों लोकोंके स्वामी तथा धर्मके रक्षक हैं। आप-जैसा राजा अधर्ममें स्थित हो जाय तब तो निश्चितरूपसे प्रजाका नाश हो जायगा॥ ६॥
सर्वथा प्रभुणा कार्यं शिष्टाचारस्य रक्षणम्।<br>वारमुख्याश्च शतशो वर्तन्तेऽत्र शचीसमाः॥ ७राजाको सब प्रकारसे सदाचारकी रक्षा करनी चाहिये। यहाँ स्वर्गमें तो शचीके सदृश सैकड़ों प्रमुख अप्सराएँ हैं॥ ७॥
रतिस्तु कारणं प्रोक्तं शृङ्गारस्य महात्मभिः।<br>रसहानिर्बलात्कारे कृते सति तु जायते॥ ८महात्माओंने रतिको ही शृंगारका कारण बताया है, बलप्रयोग किये जानेपर तो रसकी हानि ही होती है॥ ८॥
उभयोः सदृशं प्रेम यदि पार्थिवसत्तम।<br>तदा वै सुखसम्पत्तिरुभयोरुपजायते॥ ९हे नृपश्रेष्ठ! जब [स्त्री-पुरुष] दोनोंमें एक समान प्रेम रहता है, तभी उन दोनोंको अधिक सुख प्राप्त होता है॥ ९॥
तस्माद्भावमिमं मुञ्च परदाराभिमर्शने।<br>सद्भावं कुरु देवेन्द्र पदं प्राप्तोऽस्यनुत्तमम्॥ १०अतः हे देवेन्द्र! परस्त्रीगमनकी यह भावना छोड़ दीजिये और श्रेष्ठ आचरण कीजिये; क्योंकि आपको इन्द्र-जैसा अतिश्रेष्ठ पद प्राप्त है॥ १०॥
ऋद्धिक्षयस्तु पापेन पुण्यैनातिविवर्धनम्।<br>तस्मात्पापं परित्यज्य सन्मतिं कुरु पार्थिव॥ ११हे राजन्! पापसे सम्पत्तिका क्षय होता है और पुण्यसे महान् वृद्धि होती है, इसलिये पापकर्म छोड़कर सात्त्विक बुद्धिका आश्रय लीजिये॥ ११॥
नहुष उवाच<br>गौतमस्य यदा भुक्ता दाराः शक्रेण देवताः।<br>वाचस्पतेस्तु सोमेन क्व यूयं संस्थितास्तदा॥ १२नहुषने कहा—हे देवताओ! जब देवराज इन्द्रने गौतमकी पत्नीके साथ और चन्द्रमाने बृहस्पतिकी पत्नीके साथ अनाचार किया था, तब तुमलोग कहाँ थे?॥ १२॥
परोपदेशे कुशला प्रभवन्ति नराः किल।<br>कर्ता चैवोपदेष्टा च दुर्लभः पुरुषो भवेत्॥ १३लोग दूसरोंको उपदेश देनेमें बहुत कुशल होते हैं, परंतु उपदेश देनेवाला तथा उसका पालन करनेवाला पुरुष दुर्लभ होता है॥ १३॥
मामागच्छतु सा देवी हितं स्यादद्भुतं हि वः।<br>एतस्याः परमं देवाः सुखमेवं भविष्यति॥ १४हे देवताओ! वह शची मेरे पास आ जाय, इसीमें आप सबका परम कल्याण है; इससे उसको भी अत्यन्त सुख मिलेगा॥ १४॥
अन्यथा न हि तुष्येऽहं सत्यमेतद् ब्रवीमि वः।<br>विनयाद्वा बलाद्वापि तामाशु प्रापयन्त्विह॥ १५अन्य किसी भी प्रकारसे मैं सन्तुष्ट नहीं होऊँगा, यह मैं तुमलोगोंसे कह रहा हूँ। इसलिये विनयसे या बलपूर्वक तुमलोग उसे शीघ्र ही मुझे प्राप्त कराओ॥ १५॥

| अ० ८ ] | षष्ठ स्कन्ध | ७६१ | | :--- | :--- |

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
इति तस्य वचः श्रुत्वा देवाश्च मुनयस्तथा।<br>तमूचुश्चातिसन्त्रस्ता नहुषं मदनातुरम्॥ १६<br>इन्द्राणीमानयिष्यामः सामपूर्वं तवान्तिकम्।<br>इत्युक्त्वा ते तदा जग्मुर्बृहस्पतिनिकेतनम्॥ १७उसकी यह बात सुनकर भयभीत देवताओं और मुनियोंने उस कामातुर नहुषसे कहा—हमलोग सामनीतिसे इन्द्राणीको आपके पास लायेंगे—ऐसा कहकर वे लोग बृहस्पतिके निवासपर चले गये॥ १६-१७॥
व्यास उवाच<br>ते गत्वाङ्गिरसः पुत्रं प्रोचुः प्राञ्जलयः सुराः।<br>जानीमः शरणं प्राप्तामिन्द्राणीं तव वेश्मनि॥ १८<br>सा देया नहुषायाद्य वासवेऽसौ कृतो यतः।<br>वृणोत्वियं वरारोहा पतित्वे वरवर्णिनी॥ १९व्यासजी बोले—तदनन्तर वे देवगण अंगिराके पुत्र बृहस्पतिके पास जाकर हाथ जोड़कर उनसे बोले—हमें ज्ञात हुआ है कि इन्द्राणीको आपके घरमें शरण प्राप्त है, उन्हें आज ही नहुषको देना है; क्योंकि वह इन्द्र बना दिया गया है। यह सुलक्षणा सुन्दरी उन्हें पतिके रूपमें वरण कर ले॥ १८-१९॥
बृहस्पतिः सुरानाह तच्छ्रुत्वा दारुणं वचः।<br>नाहं त्यक्ष्ये तु पौलोमीं सतीं च शरणागताम्॥ २०यह दारुण वचन सुनकर बृहस्पतीने देवताओंसे कहा—मैं शरणमें आयी हुई इस पतिव्रता शचीका त्याग नहीं करूँगा॥ २०॥
देवा ऊचुः<br>उपायोऽन्यः प्रकर्तव्यो येन सोऽद्य प्रसीदति।<br>अन्यथा कोपसंयुक्तो दुराराध्यो भविष्यति॥ २१देवगण बोले—तब दूसरा कोई उपाय करना चाहिये, जिससे वह आज प्रसन्न हो जाय, अन्यथा क्रुद्ध होनेपर वह दुराराध्य हो जायगा॥ २१॥
गुरुरुवाच<br>तत्र गत्वा शची भूपं प्रलोभ्य वचसा भृशम्।<br>करोतु समयं बाला पतिं ज्ञात्वा मृतं भजे॥ २२<br>इन्द्रे जीवति मे कान्ते कथमम्यं करोम्यहम्।<br>अन्वेषणार्थं गन्तव्यं मया तस्य महात्मनः॥ २३<br>इति सा समयं कृत्वा वञ्चयित्वा च भूपतिम्।<br>भर्तुरानयने यत्नं करोतु मम वाक्यतः॥ २४देवगुरु बोले—सुन्दरी शची वहाँ जाकर राजाको अपनी बातसे अत्यन्त मोहित करके यह शपथ ले कि ‘अपने पतिको मृत जाननेके बाद ही मैं आपको अंगीकार करूँगी। अपने पति इन्द्रके जीवित रहते मैं किसी दूसरेको पति कैसे बना लूँ? इसलिये उन महाभागकी खोजके लिये मुझे जाना पड़ेगा।’ इस प्रकार वह मेरे कथनके अनुसार शपथ लेकर और राजाको छलकर अपने पतिको लानेका प्रयत्न करे॥ २२—२४॥
इति सञ्चिन्त्य मे सर्वे बृहस्पतिपुरोगमाः।<br>नहुषं सहिता जग्मुरिन्द्रपत्न्या दिवौकसः॥ २५ऐसा विचार करके सभी देवता बृहस्पतिको आगे करके इन्द्रपत्नी शचीके साथ नहुषके पास गये॥ २५॥
तानागतान्समीक्ष्याह तदा कृत्रिमवासवः।<br>जहर्ष च मुदायुक्तस्तां वीक्ष्य मुदितोऽब्रवीत्॥ २६<br>अद्यास्मि वासवः कान्ते भज मां चारुलोचने।<br>पतित्वे सर्वलोकस्य पूज्योऽहं विहितः सुरैः॥ २७उन सभीको आया हुआ देखकर वह कृत्रिम इन्द्र नहुष हर्षित हुआ। उस शचीको देखकर वह आनन्दित हो गया और प्रसन्नतापूर्वक बोला—हे प्रिये! आज मैं इन्द्र हूँ, हे सुन्दर नेत्रोंवाली! मुझे पतिरूपमें अंगीकार करो। मैं देवताओंके द्वारा सम्पूर्ण लोकका पूज्य बना दिया गया हूँ॥ २६-२७॥
इत्युक्ता सा नृपं प्राह वेपमाना त्रपायुता।<br>वरमिच्छाम्यहं राजंस्त्वत्तः प्राप्तं सुरेश्वर॥ २८नहुषके ऐसा कहनेपर शचीने लज्जित होकर काँपते हुए कहा—हे राजन्! हे सुरेश्वर! मैं आपसे एक वरप्राप्तिकी इच्छा करती हूँ। आप कुछ समयतक

७६२ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० ८

७६२ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० ८

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
किञ्चित्कालं प्रतीक्षस्व यावत्कुर्वे विनिर्णयम्।<br>इन्द्रोऽस्तीति न वास्तीति सन्देहो मे हृदि स्थितः॥ २९<br>ततस्त्वां समुपस्थास्ये कृत्वा निश्चयमात्मनि।<br>तावत्क्षमस्व राजेन्द्र सत्यमेतद् ब्रवीमि ते॥ ३०<br>न हि विज्ञायते शक्रो नष्टः किं वा क्व वा गतः।<br>एवमुक्तः स चेन्द्राण्या नहुषः प्रीतिमानभूत्॥ ३१प्रतीक्षा करें, जबतक मैं यह निर्णय कर लूँ कि मेरे पति इन्द्र जीवित हैं या नहीं; क्योंकि इस बातका मेरे मनमें सन्देह है। मनमें इसका निश्चय करनेके अनन्तर मैं आपकी सेवामें उपस्थित होऊँगी। हे राजेन्द्र! तबतकके लिये क्षमा कीजिये; यह मैं सत्य कह रही हूँ। अभी यह ज्ञात नहीं है कि इन्द्र नष्ट हो गये हैं या कहीं चले गये हैं॥ २८-३० १/२ ॥
व्यसर्जयत्स तां देवीं तथेत्युक्त्वा मुदान्वितः।<br>सा विसृष्टा नृपेणाशु गत्वा प्राह सुरान्सती॥ ३२<br>इन्द्रस्यागमने यत्नं कुरुताद्य कृतोद्यमाः।<br>श्रुत्वा तद्वचनं देवा इन्द्राण्या रसवच्छुचि॥ ३३इन्द्राणीके ऐसा कहनेपर नहुष प्रसन्न हो गया और 'ऐसा ही हो'—यह कहकर उसने उन देवी शचीको प्रसन्नतापूर्वक विदा किया। राजासे मुक्ति पाकर वह पतिव्रता शची शीघ्रतापूर्वक देवताओंके पास जाकर बोली—आपलोग उद्यमशील होकर इन्द्रको ले आनेका प्रयास करें॥ ३१-३२ १/२ ॥
मन्त्रयामासुरेकाग्राः शक्रार्थं नृपसत्तम।<br>ते गत्वा वैष्णवं धाम तुष्टुवुः परमेश्वरम्॥ ३४<br>आदिदेवं जगन्नाथं शरणागतवत्सलम्।<br>ऊचुश्चैनं समुद्विग्ना वाक्यं वाक्यविशारदाः॥ ३५हे नृपश्रेष्ठ! इन्द्राणीका पवित्र और मधुर वचन सुनकर सभी देवताओंने एकाग्र होकर इन्द्रके विषयमें विचार-विमर्श किया। तदनन्तर वे वैकुण्ठलोक जाकर शरणागतवत्सल आदिदेव भगवान् जगन्नाथकी स्तुति करने लगे। उन वाक्पटुविशारद देवताओंने उद्विग्न होकर इस प्रकार कहा— ॥ ३३-३५ ॥
देवदेव सुरपतिर्ब्रह्महत्याप्रपीडितः।<br>अदृश्यः सर्वभूतानां क्वापि तिष्ठति वासवः॥ ३६<br>त्वद्धिया निहते विप्रे ब्रह्महत्या कुतः प्रभो।<br>त्वं गतिस्तस्य भगवन्नस्माकं च तथैव हि॥ ३७<br>त्राहि नः परमापन्नान्मोक्षं तस्य विनिर्देश।<br>देवानां वचनं श्रुत्वा कातरं विष्णुरब्रवीत्॥ ३८हे देवाधिदेव! ब्रह्महत्यासे पीड़ित देवराज इन्द्र सभी प्राणियोंसे अदृश्य होकर कहीं रह रहे हैं। हे प्रभो! आपके परामर्शसे ही उन्होंने ब्राह्मण वृत्रासुरका वध किया था। तब ब्रह्महत्या कहाँ हुई? हे भगवन्! आप ही उनकी और हम सबकी एकमात्र गति हैं। इस महान् कष्टमें पड़े हुए हम सबकी रक्षा कीजिये और उन इन्द्रके ब्रह्महत्यासे छूटनेका उपाय बताइये॥ ३६-३७ १/२ ॥
यजतामश्वमेधेन शक्रपापनिवृत्तये।<br>पुण्येन हयमेधेन पावितः पाकशासनः॥ ३९<br>पुनरेष्यति देवानामिन्द्रत्वमकुतोभयः।<br>हयमेधेन सन्तुष्टा देवी श्रीजगदम्बिका॥ ४०<br>ब्रह्महत्यादिपापानि नाशयिष्यत्यसंशयम्।<br>यस्याः स्मरणमात्रेण पापजालं विनश्यति॥ ४१<br>किं पुनर्वाजिमेधेन तत्प्रीत्यर्थं कृतेन च।<br>इन्द्राणी कुरुतान्नित्यं भगवत्याः प्रपूजनम्॥ ४२देवताओंका करुण वचन सुनकर भगवान् विष्णु बोले—इन्द्रके पापकी निवृत्तिके लिये अश्वमेधयज्ञ कीजिये; अश्वमेध करनेसे प्राप्त पुण्यसे इन्द्र पवित्र हो जायेंगे। इससे वे पुनः देवताओंके इन्द्रत्वको पा जायेंगे, फिर कोई भय नहीं रहेगा। अश्वमेधयज्ञसे भगवती श्रीजगदम्बिका प्रसन्न होकर ब्रह्महत्या आदि पाप निश्चितरूपसे नष्ट कर देंगी। जिनके स्मरणमात्रसे पापोंका समूह नष्ट हो जाता है, उन जगदम्बाकी प्रसन्नताके लिये किये गये अश्वमेधयज्ञका क्या कहना! इन्द्राणी भी नित्य भगवती जगदम्बाकी पूजा
अ० ८ ]षष्ठ स्कन्ध७६३
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
आराधनं शिवायास्तु सुखकारि भविष्यति।<br>नहुषोऽपि जगन्मातुर्मायया मोहितः किल॥ ४३<br><br>विनाशं स्वकृतेनाशु गमिष्यत्येनसा सुराः।<br>पावितश्चाश्वमेधेन तुराषाडपि वैभवम्॥ ४४करें; भगवती शिवाकी आराधना सुखकारी होगी। हे देवताओ! नहुष भी जगदम्बिकाकी मायासे मोहित होकर शीघ्र ही अपने किये हुए पापसे अवश्य विनष्ट हो जायगा। अश्वमेधयज्ञसे पवित्र होकर इन्द्र भी शीघ्र ही अपने उत्तम इन्द्रपद और वैभवको प्राप्त करेंगे॥ ३८–४४ १/२॥
प्राप्स्यत्यचिरकालेन स्वमासनमनुत्तमम्।<br>ते तु श्रुत्वा शुभां वाणीं विष्णोरमिततेजसः॥ ४५<br><br>जग्मुस्तं देशमनिशं यत्रास्ते पाकशासनः।<br>तमाश्वास्य सुराः शक्रं बृहस्पतिपुरोगमाः॥ ४६अमित तेजवाले भगवान् विष्णुकी इस शुभ वाणीको सुनकर वे देवगण उस स्थानको चल दिये जहाँ इन्द्र रह रहे थे। बृहस्पतिके नेतृत्वमें देवताओंने इन्द्रको आश्वासन देकर सम्पूर्ण अश्वमेध महायज्ञ सम्पन्न कराया॥ ४५–४६ १/२॥
कारयामासुरखिलं हयमेधं महाक्रतुम्।<br>विभज्य ब्रह्महत्यां तु वृक्षेषु च नदीषु च॥ ४७<br><br>पर्वतेषु पृथिव्यां च स्त्रीषु चैवाक्षिपद्विभुः।<br>तां विसृज्य च भूतेषु विपापः पाकशासनः॥ ४८<br><br>विज्वरः समभूद् भूयः कालाकाङ्क्षी स्थितो जले।<br>अदृश्यः सर्वभूतानां पद्मनाले व्यतिष्ठत॥ ४९तत्पश्चात् भगवान् विष्णुने ब्रह्महत्याको विभाजितकर वृक्षों, नदियों, पर्वतों, पृथ्वी और स्त्रियोंपर फेंक दिया। इस प्रकार उसको प्राणि-पदार्थोंमें विसर्जित करके इन्द्र पापरहित हो गये। सन्तापरहित होनेपर भी इन्द्र अच्छे समयकी प्रतीक्षा करते हुए जलमें ही ठहरे रहे। वहाँ सभी प्राणियोंसे अदृश्य रहते हुए जलमें वे एक कमलनालमें स्थित रहे॥ ४७–४९॥
देवास्तु निर्गताः स्थाने कृत्वा कार्यं तदद्भुतम्।<br>पौलोमी तु गुरुं प्राह दुःखिता विरहाकुला॥ ५०<br><br>कृतयज्ञोऽपि मे भर्ता किमदृश्यः पुरन्दरः।<br>कथं द्रक्ष्ये प्रियं स्वामिंस्तमुपायं वदस्व मे॥ ५१देवगण उस अद्भुत कार्यको करके अपने स्थानको चले गये। तब शचीने दुःख और वियोगसे व्याकुल होकर देवगुरु बृहस्पतिसे कहा—यज्ञ करनेपर भी मेरे स्वामी इन्द्र क्यों अदृश्य हैं? हे स्वामिन्! मैं अपने प्रियको कैसे देख सकूँगी; आप मुझे उस उपायको बतायें॥ ५०–५१॥
बृहस्पतिरुवाच<br>त्वमाराधय पौलोमि देवीं भगवतीं शिवाम्।<br>दर्शयिष्यति ते नाथं देवी विगतकल्मषम्॥ ५२<br><br>आराधिता जगद्धात्री नहुषं वारयिष्यति।<br>मोहयित्वा नृपं स्थानात्यातयिष्यति चाम्बिका॥ ५३बृहस्पति बोले—हे पौलोमि! तुम देवी भगवती शिवाकी आराधना करो। वे देवी तुम्हारे पापरहित पतिका तुम्हें दर्शन करायेंगी। आराधना करनेपर जगत्का पालन करनेवाली वे भगवती नहुषको शक्तिहीन कर देंगी। वे अम्बिका राजाको मोहित करके उसे उसके स्थानसे गिरा देंगी॥ ५२–५३॥
इत्युक्ता सा तदा तेन पुलोमतनया नृप।<br>जग्राह मन्त्रं विधिवद् गुरोर्देव्याः ससाधनम्॥ ५४हे राजन्! बृहस्पतिजीके ऐसा कहनेपर पुलोमापुत्री शचीने देवगुरुसे पूजाविधिसहित देवीका मन्त्र विधिवत् प्राप्त कर लिया॥ ५४॥
विद्यां प्राप्य गुरोर्देवी देवीं श्रीभुवनेश्वरीम्।<br>सम्यगाराधयामास बलिपुष्पार्चनैः शुभैः॥ ५५गुरुसे मन्त्रविद्या प्राप्त करके देवी शचीने बलि, पुष्प आदि शुभ अर्चनोंसे भगवती श्रीभुवनेश्वरीकी सम्यक् आराधना की॥ ५५॥
७६४श्रीमद्देवीभागवत[ अ० ८
त्यक्तान्यभोगसम्भारा तापसीवेषधारिणी।<br>चकार पूजनं देव्याः प्रियदर्शनलालसा॥ ५६अपने प्रिय पतिके दर्शनकी लालसासे युक्त शची समस्त भोगोंका त्यागकर तपस्विनीका वेश धारणकर देवीका पूजन करने लगीं॥ ५६॥
कालेन कियता तुष्टा प्रत्यक्षं दर्शनं ददौ।<br>सौम्यरूपधरा देवी वरदा हंसवाहिनी॥ ५७<br><br>सूर्यकोटिप्रतीकाशा चन्द्रकोटिसुशीतला।<br>विद्युत्कोटिसमानाभा चतुर्वेदसमन्विता॥ ५८<br><br>पाशांकुशाभयवरान्दधती निजबाहुभिः।<br>आपादलम्बिनीं स्वच्छां मुक्तामालां च बिभ्रती॥ ५९<br><br>प्रसन्नस्मेरवदना लोचनत्रयभूषिता।<br>आब्रह्मकीटजननी करुणामृतसागरा॥ ६०<br><br>अनन्तकोटिब्रह्माण्डनायिका परमेश्वरी।<br>सौम्यानन्तरसैर्युक्तस्तनद्वयविराजिता ॥ ६१<br><br>सर्वेश्वरी च सर्वज्ञा कूटस्थाक्षररूपिणी।<br>तामुवाच प्रसन्ना सा शक्रपत्नीं कृतोद्यमाम्॥ ६२<br><br>मेघगम्भीरशब्देन मुदमाददती भृशम्।[ आराधना करनेपर] कुछ समय बाद प्रसन्न होकर भगवतीने उन्हें प्रत्यक्ष दर्शन दिया। वे वरदायिनी देवी सौम्य रूप धारण किये हुए हंसपर सवार थीं। वे करोड़ों सूर्योंके समान प्रकाशमान, करोड़ों चन्द्रमाओंके समान शीतल, करोड़ों विद्युत्के समान प्रभासे युक्त और चारों वेदोंसे समन्वित थीं। उन्होंने अपनी भुजाओंमें पाश, अंकुश, अभय तथा वर-मुद्राएँ धारण कर रखी थीं, वे चरणोंतक लटकती हुई स्वच्छ मोतियोंकी माला पहने हुए थीं। उनके मुखपर मधुर मुसकान थी और वे तीन नेत्रोंसे सुशोभित थीं। ब्रह्मासे लेकर कीटपर्यन्त सभी प्राणियोंकी जननी, करुणारूपी अमृतकी सागरस्वरूपा तथा अनन्तकोटि ब्रह्माण्डोंकी अधीश्वरी वे परमेश्वरी सौम्य थीं तथा अनन्त रसोंसे आपूरित स्तनयुगलसे सुशोभित हो रही थीं। सबकी अधीश्वरी, सब कुछ जाननेवाली, कूटस्थ और बीजाक्षरस्वरूपिणी वे भगवती उद्यमशील इन्द्रपत्नी शचीसे प्रसन्न होकर मेघके समान अत्यन्त गम्भीर वाणीके द्वारा उन्हें परम हर्षित करती हुई कहने लगीं॥ ५७—६२ १/२॥
देव्युवाच<br>वरं वरय सुश्रोणि वाञ्छितं शक्रवल्लभे॥ ६३<br><br>ददाम्यद्य प्रसन्नास्मि पूजिता सुभृशं त्वया।<br>वरदाहं समायाता दर्शनं सहजं न मे॥ ६४<br><br>अनेककोटिजन्मोत्थपुण्यपुञ्जैर्र्हि लभ्यते।देवी बोलीं— हे सुन्दर कटिप्रदेशवाली इन्द्रप्रिये! अपना अभिलषित वर माँगो, तुम्हारे द्वारा सम्यक् प्रकारसे पूजित मैं अत्यन्त प्रसन्न हूँ, मैं तुम्हें आज वरदान दूँगी। मैं वर प्रदान करनेके लिये आयी हूँ; मेरा दर्शन सहज सुलभ नहीं है। करोड़ों जन्मोंकी संचित पुण्यराशिसे ही यह प्राप्त होता है॥ ६३-६४ १/२॥
इत्युक्ता सा तदा देवी तामाह प्रणता पुरः॥ ६५<br><br>शक्रपत्नी भगवतीं प्रसन्नां परमेश्वरीम्।<br>वाञ्छामि दर्शनं मातः पत्युः परमदुर्लभम्॥ ६६<br><br>नहुषाद्भयनाशं च स्वपदप्रापणं तथा।उनके ऐसा कहनेपर इन्द्रपत्नी देवी शचीने सम्मुख स्थित होकर उन प्रसन्न भगवती परमेश्वरीसे विनतभावसे कहा—हे माता! मैं अपने पतिका अत्यन्त दुर्लभ दर्शन, नहुषसे उत्पन्न भयका नाश और अपने पदकी पुनः प्राप्ति चाहती हूँ॥ ६५-६६ १/२॥
देव्युवाच<br>गच्छ त्वमनया दूत्या सार्धं श्रीमानसं सरः॥ ६७<br><br>यत्र मे मूर्तिरचला विश्वकामाभिधा मता।<br>तत्र पश्यसि शक्रं त्वं दुःखितं भयविह्वलम्॥ ६८<br><br>मोहयिष्यामि राजानं कालेन कियता पुनः।देवी बोलीं— तुम [मेरी] इस दूतीके साथ मानसरोवर चली जाओ, जहाँ मेरी विश्वकामा नामक अचल मूर्ति प्रतिष्ठित है, वहीं तुम्हें भयभीत और दुःखी इन्द्रके दर्शन हो जायेंगे। कुछ समय बाद मैं पुनः राजाको मोहित करूँगी। हे विशालाक्षि! तुम

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां षष्ठस्कन्धे

अ० ९ ]षष्ठ स्कन्ध७६५

| स्वस्था भव विशालाक्षि करोमि तव चेप्सितम्॥ ६९ <br><br> भ्रंशयिष्यामि भूपालं मोहितं त्रिदशासनात्। | शान्तचित्त हो जाओ, मैं तुम्हारा अभिलषित कार्य करूँगी। मैं मोहग्रस्त राजा [नहुष]-को इन्द्रपदसे गिरा दूँगी॥ ६७—६९ १/२॥ | | व्यास उवाच <br> देवीदूती तां गृहीत्वा शक्रपत्नीं त्वरान्विता॥ ७० <br><br> प्रापयामास सान्निध्यं स्वपत्युः परमेश्वरीम्। <br> सा दृष्ट्वा तं पतिं बाला सुरेशं गुप्तसंस्थितम्। <br> मुदिताभूद्वरं वीक्ष्य बहुकालाभिवाञ्छितम्॥ ७१ | व्यासजी बोले—तदनन्तर परमेश्वरी इन्द्रपत्नीको ले जाकर देवीकी दूतीने शीघ्रतापूर्वक उनके पति इन्द्रके पास पहुँचा दिया। गुप्तरूपसे रहते हुए अपने पति उन देवराज इन्द्रको देखकर और इस प्रकार चिरकालसे वांछित अपने वरकी प्राप्ति करके वे शची अत्यन्त प्रसन्न हुई॥ ७०-७१॥ |

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां षष्ठस्कन्धे
इन्द्राण्या शक्रदर्शनं नामाष्टमोऽध्यायः॥ ८॥


अथ नवमोऽध्यायः

शचीका इन्द्रसे अपना दुःख कहना, इन्द्रका शचीको सलाह देना कि वह नहुषसे ऋषियोंद्वारा वहन की जा रही पालकीमें आनेको कहे, नहुषका ऋषियोंद्वारा वहन की जा रही पालकीमें सवार होना और शापित होकर सर्प होना तथा इन्द्रका पुनः स्वर्गाधिपति बनना

व्यास उवाच <br> तां वीक्ष्य विपुलापाङ्गीं रहः शोकसमान्विताम्। <br> आखण्डलः प्रियां भार्यां विस्मितश्चाब्रवीत्तदा॥ १व्यासजी बोले—विशाल नेत्रोंवाली अपनी शोकाकुल प्रिय पत्नीको वहाँ एकान्तमें देखकर इन्द्र आश्चर्यचकित हो गये और बोले—॥ १॥
कथमत्रागता कान्ते कथं ज्ञातस्त्वया ह्यहम्। <br> दुर्ज्ञेयः सर्वभूतानां संस्थितोऽस्मि शुभानने॥ २हे प्रिये! तुम यहाँ कैसे आयी? तुम्हें कैसे ज्ञात हुआ कि मैं यहाँ हूँ? हे शुभानने! मैं सभी प्राणियोंसे अज्ञात रहते हुए यहाँ निवास कर रहा हूँ॥ २॥
शच्युवाच <br> देव देव्याः प्रसादेन ज्ञातोऽस्यद्य भवानिह। <br> पुनस्तस्याः प्रसादेन प्राप्तास्मि त्वां दिवस्पते॥ ३शची बोली—हे देव! देवी भगवतीकी कृपासे आप आज मुझे यहाँ ज्ञात हुए हैं। हे देवेन्द्र! उन्हींकी कृपासे मैं आपको पुनः प्राप्त कर सकी हूँ॥ ३॥
नहुषो नाम राजर्षिः स्थापितो भवदासने। <br> त्रिदशैर्मुनिभिश्चैव स मां बाधति नित्यशः॥ ४ <br><br> पतिं मां कुरु चार्वङ्गि तुरासाहं सुराधिपम्। <br> एवं वदति मां पाप्मा किं करोमि बलार्दन॥ ५देवताओं और मुनियोंने नहुष नामक राजर्षिको आपके आसनपर बैठा दिया है; वह मुझे नित्य कष्ट देता है। वह पापी मुझसे इस प्रकार कहता है—हे सुन्दरि! मुझ देवराज इन्द्रको अपना पति बना लो। हे बलार्दन! अब मैं क्या करूँ?॥ ४-५॥
इन्द्र उवाच <br> कालाकाङ्क्षी वरारोहे संस्थितोऽस्मि यदृच्छया। <br> तथा त्वमपि कल्याणि सुस्थिरं स्वमनः कुरु॥ ६इन्द्र बोले—हे वरारोहे! हे कल्याणि! जिस प्रकार मैं [अनुकूल] समयकी प्रतीक्षा करते हुए प्रारब्धवश यहाँ रह रहा हूँ, वैसे ही तुम भी अपने मनको पूर्णरूपसे स्थिर करो॥ ६॥
७६६श्रीमद्देवीभागवत[ अ० ९

| व्यास उवाच | **व्यासजी बोले—**अपने परम आदरणीय पतिके ऐसा कहनेपर लम्बी साँसें खींचती तथा काँपती हुई वे शची अत्यन्त दुःखित होकर इन्द्रसे कहने लगीं—॥ ७॥ | | इत्युक्ता तेन सा देवी पतिनातिप्रशंसिना।<br>निःश्वसन्त्याह तं शक्रं वेपमानातिदुःखिता॥ ७ | | | कथं तिष्ठे महाभाग पापात्मा मां वशानुगाम्।<br>करिष्यति मदोन्मत्तो वरदानेन गर्वितः॥ ८<br>देवाश्च मुनयः सर्वे मामूचुस्तद्भयाकुलाः।<br>तं भजस्व वरारोहे देवराजं स्मरातुरम्॥ ९ | हे महाभाग! मैं कैसे रहूँ? वरदानके द्वारा मदोन्मत्त और अहंकारी बना हुआ वह पापात्मा मुझे अपने वशमें कर लेगा। उससे भयभीत सभी देवताओं और मुनियोंने मुझसे कहा—हे वरारोहे! तुम उस कामातुर देवराजको अंगीकार कर लो॥ ८-९॥ | | बृहस्पतिस्तु शत्रुघ्न वाडवो बलवर्जितः।<br>कथं मां रक्षितुं शक्तो भवेद्देवानुगः सदा॥ १० | हे शत्रुसूदन! बृहस्पति भी निर्बल ब्राह्मण हैं; वे मेरी रक्षा करनेमें कैसे समर्थ हो सकते हैं; क्योंकि वे भी तो सदा देवताओंके ही अनुगामी हैं॥ १०॥ | | तस्माच्चिन्तास्ति महती नार्यहं वशवर्तिनी।<br>अनाथा किं करिष्यामि विपरीते विधौ विभो॥ ११ | अतः हे विभो! मैं वशवर्तिनी नारी हूँ, मुझे यह महान् चिन्ता है कि भाग्यकी इस विपरीत अवस्थामें मैं अनाथ क्या करूँगी?॥ ११॥ | | नार्यस्म्यहं न कुलटा त्वच्चित्तातितिव्रता।<br>नास्ति मे शरणं तत्र यो मां रक्षति दुःखिताम्॥ १२ | मैं कुलटा नहीं हूँ अपितु आपका ही ध्यान करनेवाली पतिव्रता स्त्री हूँ। वहाँ मेरे लिये ऐसा कोई शरण नहीं है, जो मुझ दुःखितकी रक्षा करे॥ १२॥ | | इन्द्र उवाच | **इन्द्र बोले—**हे वरानने! मैं एक उपाय बताता हूँ, तुम उसे इस समय करो। इससे दुःखके समयमें तुम्हारे शीलकी रक्षा हो जायगी॥ १३॥ | | उपायं प्रब्रवीम्यद्य तं कुरुष्व वरानने।<br>शीलं ते दुःखिते काले परित्रातं भविष्यति॥ १३ | | | परेण रक्षिता नारी न भवेच्च पतिव्रता।<br>उपायैः कोटिभिः कामभिन्नचित्तातिचञ्चला॥ १४ | करोड़ों उपाय करनेपर भी दूसरेके द्वारा रक्षित स्त्री पतिव्रता नहीं रह सकती; क्योंकि वह कामसे विचलित मनवाली तथा अत्यन्त चंचल होती है॥ १४॥ | | शीलमेव हि नारीणां सदा रक्षति पापतः।<br>तस्मात्त्वं शीलमास्थाय स्थिरा भव शुचिस्मिते॥ १५ | स्त्रियोंका शील ही पापसे इनकी रक्षा करता है। इसलिये हे पवित्र मुसकानवाली! तुम शीलका आश्रय लेकर धैर्य धारण करो॥ १५॥ | | यदा त्वां नहुषो राजा बलादाकर्षयेत्खलः।<br>तदा त्वं समयं कृत्वा गुप्तं वञ्चय भूपतिम्॥ १६<br>एकान्ते तत्समीपे त्वं गत्वा वद मदालसे।<br>ऋषियानेन दिव्येन मामुपैहि जगत्पते॥ १७<br>एवं तव वशे प्रीता भविष्यामीति मे व्रतम्।<br>इति तं वद सुश्रोणि तदा तु परमोहितः॥ १८<br>कामान्धः स मुनीन् याने योजयिष्यति पार्थिवः।<br>अवश्यं तापसो भूपं शापदग्धं करिष्यति॥ १९ | जब दुष्ट राजा नहुष तुम्हें बलपूर्वक प्राप्त करनेकी चेष्टा करे तब तुम गुप्त प्रतिज्ञा करके राजाको धोखेमें डाल देना। हे मदालसे! तुम एकान्तमें उसके समीप जाकर कहो—हे जगत्पते! आप ऋषियोंके द्वारा वहन किये जानेवाले दिव्य वाहनसे मेरे पास आयें, ऐसा होनेपर मैं प्रेमपूर्वक आपके वशमें हो जाऊँगी—यह मेरी प्रतिज्ञा है। हे सुश्रोणि! तुम उससे ऐसा बोलना, तब मोहित और कामान्ध वह राजा मुनियोंको अपने वाहनमें लगायेगा; इससे तपस्वी अवश्य ही नहुषको शापसे दग्ध कर देंगे॥ १६—१९॥ |

अ० ९ ]षष्ठ स्कन्ध७६७
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
साहाय्यं जगदम्बा ते करिष्यति न संशयः।<br>जगदम्बापदस्मर्तुः सङ्कटं न कदाचन॥ २०<br>यदि जायेत तच्चापि ज्ञेयं तत्स्वस्तये किल।<br>तस्मात्सर्वप्रयत्नेन मणिद्वीपाधिवासिनीम्॥ २१<br>भज त्वं भुवनेशानीं गुरुवाक्यानुसारतः।भगवती जगदम्बा तुम्हारी सहायता करेंगी; इसमें सन्देह नहीं है। भगवती जगदम्बाके चरणोंका स्मरण करनेवालेको कभी संकट नहीं होता। यदि संकट उत्पन्न भी हो जाय तो उसे भी अपने कल्याणके लिये ही समझना चाहिये। अतः तुम गुरु बृहस्पतिके कथनानुसार पूर्ण प्रयत्नसे मणिद्वीपवासिनी भगवती भुवनेश्वरीका भजन करो॥ २०-२१ १/२॥
व्यास उवाच<br>इत्याख्याता शची तेन जगाम नहुषं प्रति॥ २२<br>तथेत्युक्त्वातिविश्वस्ता भाविकार्ये कृतोद्यमा।<br>नहुषस्तां समालोक्य मुदितो वाक्यमब्रवीत्॥ २३<br>स्वागतं सत्यवचनैस्त्वदधीनोऽस्मि कामिनि।<br>दासोऽहं तव सत्येन पालितं वचनं त्वया॥ २४<br>यदागता समीपे मे तुष्टोऽस्मि मितभाषिणि।<br>न च व्रीडा त्वया कार्या भक्तं मां भज सुस्मिते॥ २५<br>कार्यं वद विशालाक्षि करिष्यामि तव प्रियम्।व्यासजी बोले—उनके ऐसा कहनेपर ‘वैसा ही होगा’—यह कहकर अत्यन्त विश्वस्त तथा भावी कार्यके प्रति प्रयत्नशील शची नहुषके पास गयीं। नहुष उन्हें देखकर प्रसन्न होता हुआ यह वचन बोला—हे कामिनि! तुम्हारा स्वागत है, मैं तुम्हारे सत्य वचनोंके कारण तुम्हारे अधीन हूँ। तुमने अपने वचनका सत्यतापूर्वक पालन किया, इसलिये मैं तुम्हारा दास हो गया हूँ। हे मितभाषिणि! तुम जब मेरे समीप आ गयी हो तो मैं सन्तुष्ट हो गया हूँ। तुम्हें अब लज्जा नहीं करनी चाहिये। हे सुन्दर मुसकानवाली! मुझ अनुरक्तको अंगीकार करो। हे विशाल नेत्रोंवाली! अपना कार्य बताओ; मैं तुम्हारा प्रिय करूँगा॥ २२—२५ १/२॥
शच्युवाच<br>सर्वं कृतं त्वया कार्यं मम कृत्रिमवासव॥ २६<br>मनोरथोऽस्ति मे देव शृणु चित्तेऽधुना विभो।<br>वाञ्छितं कुरु कल्याण त्वद्वशाहमतः परम्॥ २७<br>ब्रवीमि मानसोत्साहं त्वं तं कर्तुमिहार्हसि।शची बोलीं—हे कृत्रिम वासव! आपने मेरा सम्पूर्ण कार्य कर दिया है। हे देव! हे विभो! इस समय मेरे मनमें एक अभिलाषा है, उसे आप सुनें। हे कल्याण! मेरा मनोरथ पूर्ण कर दीजिये; इसके बाद मैं आपकी वशवर्तिनी हो जाऊँगी, मैं बड़े उत्साहसे अपना मनोरथ कह रही हूँ, आप उसे पूरा करनेमें समर्थ हैं॥ २६-२७ १/२॥
नहुष उवाच<br>कार्यं त्वं ब्रूहि चन्द्रास्ये करोमि तव वाञ्छितम्॥ २८<br>अलभ्यमपि दास्यामि तुभ्यं सुभ्रु वदस्व माम्।नहुष बोला—हे चन्द्रमुखि! तुम अपना कार्य बताओ, मैं तुम्हारा अभिलाषित कार्य करता हूँ। हे सुभ्रु! यदि अलभ्य वस्तु होगी तो भी मैं तुम्हें दूँगा; मुझे बताओ॥ २८ १/२॥
शच्युवाच<br>कथं ब्रवीमि राजेन्द्र प्रत्ययो नास्ति मे तव॥ २९<br>शपथं कुरु राजेन्द्र यत्करोमि प्रियं तव।<br>राजानः सत्यवचसो दुर्लभा एव भूतले॥ ३०शची बोलीं—हे राजेन्द्र! मैं कैसे बताऊँ, मुझे आपका विश्वास नहीं है। हे राजेन्द्र! आप शपथ लें कि मैं तुम्हारा प्रिय करूँगा; क्योंकि पृथ्वीतलपर सत्यवादी राजा दुर्लभ हैं। हे राजन्! आपको सत्यसे बँधा जाननेके बाद ही मैं अपना अभिलाषित बताऊँगी।
७६८श्रीमद्देवीभागवत[ अ० ९

| पश्चाद् ब्रवीम्यहं राजन् ज्ञात्वा सत्येन यन्त्रितम्।<br>कृते चेद्वाञ्छिते भूप सदा ते वशवर्तिनी ॥ ३१<br>भविष्यामि तुराषाड् वै सत्यमेतद्वचो मम।<br><br>नहुष उवाच<br>अवश्यमेव कर्तव्यं वचनं तव सुन्दरि ॥ ३२<br>शपामि सुकृतेनाहं यज्ञदानकृतेन वै।<br><br>शच्युवाच<br>इन्द्रस्य हरयो वाहा गजश्चैव रथस्तथा ॥ ३३<br>गरुडो वासुदेवस्य यमस्य महिषस्तथा।<br>वृषभः शङ्करस्यापि ब्रह्मणो वरटापतिः ॥ ३४<br>मयूरः कार्तिकेयस्य गजास्यस्य तु मूषकः।<br>इच्छाम्यहमपूर्वं वै वाहनं ते सुराधिप ॥ ३५<br>यन्न विष्णोर्न रुद्रस्य नासुराणां न रक्षसाम्।<br>वहन्तु त्वां महाराज मुनयः संशितव्रताः ॥ ३६<br>सर्वे शिबिकया राजन्नेतद्धि मम वाञ्छितम्।<br>सर्वदेवाधिकं त्वां वै जानामि वसुधाधिप ॥ ३७<br>तेन ते तेजसो वृद्धिं वाञ्छाम्यहमतन्द्रिता।<br><br>व्यास उवाच<br>तस्यास्तद्वचनं श्रुत्वा प्रहस्य ज्ञानदुर्बलः ॥ ३८<br>मोहितस्तु महादेव्या कृतमोहेन तत्क्षणम्।<br>उवाच वचनं भूपः संस्तुवन्वासवप्रियाम् ॥ ३९<br><br>नहुष उवाच<br>सत्यमुक्तं त्वया तन्वि वाहनं रुचिरं मम।<br>करिष्यामि सुकेशान्ते वचनं तव सर्वथा ॥ ४०<br>न ह्यल्पवीर्यो भवति यो वाहान्कुरुते मुनीन्।<br>अहमारुह्य यानेन त्वामेष्यामि शुचिस्मिते ॥ ४१<br>सप्तर्षयो मां वक्ष्यन्ति सर्वे देवर्षयस्तथा।<br>समर्थं त्रिषु लोकेषु ज्ञात्वा मां तपसाधिकम् ॥ ४२<br><br>व्यास उवाच<br>इत्युक्त्वा तां सुसन्तुष्टो विससर्ज हरिप्रियाम्।<br>मुनीनाहूय सर्वांस्तानित्युवाच स्मरान्वितः ॥ ४३ | हे राजन्! मेरी उस अभिलाषाको पूर्ण कर देनेपर मैं सदाके लिये आपकी वशवर्तिनी हो जाऊँगी। हे इन्द्र! यह मेरा सत्यवचन है॥ २९-३१½॥<br><br>**नहुष बोला—**हे सुन्दरि! मैं यज्ञ, दान आदि कृत्योंसे संचित पुण्यकी शपथ लेकर कहता हूँ कि मैं तुम्हारे वचनका अवश्य पालन करूँगा॥ ३२½॥<br><br>**शची बोलीं—**इन्द्रके वाहन अश्व, गज और रथ हैं। भगवान् विष्णुका वाहन गरुड़, यमराजका वाहन महिष, शिवका वाहन वृषभ, ब्रह्माका वाहन हंस, कार्तिकेयका वाहन मयूर और गजाननका वाहन मूषक है। हे सुराधिप! मैं चाहती हूँ कि आपका वाहन ऐसा विलक्षण हो जो विष्णु, रुद्र, असुरों तथा राक्षसोंके भी पास न हो ॥ ३३-३५½॥<br>हे महाराज! अपने व्रतमें अटल रहनेवाले समस्त मुनिगण शिबिका (पालकी)-में आपको ढोयें—हे राजन्! यही मेरी इच्छा है। हे पृथ्वीपते! मैं आपको सभी देवताओंसे महान् समझती हूँ; इसीलिये मैं सावधान रहती हुई आपके तेजकी वृद्धि चाहती हूँ॥ ३६-३७½॥<br><br>**व्यासजी बोले—**उनकी यह बात सुनकर महादेवीद्वारा प्रकट किये गये मोहसे मोहित हुआ बुद्धिहीन राजा नहुष हँसकर इन्द्रप्रिया शचीको सन्तुष्ट करते हुए यह वचन कहने लगा— ॥ ३८-३९॥<br><br>**नहुष बोला—**हे तन्वंगि! तुमने सत्य ही कहा है, यह वाहन मुझे भी रुचिकर है। हे सुन्दर केशपाशवाली! मैं तुम्हारे वचनोंका सम्यक् रूपसे पालन करूँगा॥ ४०॥<br>हे पवित्र मुसकानवाली! जो अल्प पराक्रमवाला होता है, वही ऋषियोंको पालकी ढोनेमें नहीं लगा सकता; मैं [तुम्हारी इच्छाके अनुसार] वाहनपर आरूढ़ होकर तुम्हारे पास आऊँगा॥ ४१॥<br>मुझे तीनों लोकोंमें सबसे बड़ा तपस्वी और समर्थ जानकर सप्तर्षि तथा सभी देवर्षि मेरा वहन करेंगे॥ ४२॥<br><br>**व्यासजी बोले—**ऐसा कहकर परम सन्तुष्ट उस नहुषने उन इन्द्रप्रिया शचीको विदा किया, इसके बाद सभी मुनियोंको बुलाकर वह कामातुर उनसे इस प्रकार कहने लगा— ॥ ४३॥ |

अ० ९]षष्ठ स्कन्ध७६१
नहुष उवाचनहुष बोला—
अहमिन्द्रोऽद्य भो विप्राः सर्वशक्तिसमन्वितः।<br>कार्यमत्र प्रकुर्वन्तु भवन्तो विगतस्मयाः॥ ४४हे विप्रगण! मैं आज सर्वशक्तिसम्पन्न इन्द्र हूँ। आपलोग गर्वरहित होकर मेरा कार्य करें॥ ४४॥
इन्द्रासनं मया प्राप्तं नेन्द्राणी मामुपैति च।<br>आकारिता च मां ब्रूते प्रेमपूर्वमिदं वचः॥ ४५<br><br>मुनियानेन देवेन्द्र मामुपैहि सुराधिप।<br>देवदेव महाराज मत्प्रियं कुरु मानद॥ ४६इन्द्रपद मुझे प्राप्त हो गया है, परंतु इन्द्राणी अभी मुझे नहीं प्राप्त हो सकी हैं। उन्होंने मेरे पास आकर प्रेमपूर्वक यह बात कही है—'हे सुरेन्द्र! हे सुराधिप! मुनियोंद्वारा ढोयी जानेवाली पालकीसे आप मेरे पास आयें। हे देवाधिदेव! हे महाराज! हे मानद! आप मेरा यह प्रिय कार्य करें'॥ ४५-४६॥
एतत्कार्यं मुनिश्रेष्ठा ममात्यन्तं दुरासदम्।<br>भवद्भिरस्तु प्रकर्तव्यं सर्वथैव दयालुभिः॥ ४७<br><br>मनो दहति मे कामः शक्रपत्न्यां प्रवर्तितम्।<br>भवन्तः शरणं मेऽद्य कुरुध्वं कार्यमद्भुतम्॥ ४८हे श्रेष्ठ मुनिगण! मेरा यह कार्य अत्यन्त दुष्कर है, परंतु आप सब दयालुओेंको मेरा यह कार्य अवश्य करना चाहिये। इन्द्रपत्नी शचीमें अत्यन्त आसक्त मेरे मनको काम जला रहा है, मैं आप सबकी शरणमें हूँ। अतः मेरे इस महान् कार्यको सम्पन्न करें॥ ४७-४८॥
अगस्तिप्रमुखास्तस्य श्रुत्वा वाक्यमसत्करम्।<br>अङ्गीचक्रुश्च भावित्वात्कृपया परमर्षयः॥ ४९अगस्त्य आदि प्रमुख ऋषियोंने उसकी यह अनादरपूर्ण बात सुनकर भावीवश उसे कृपापूर्वक स्वीकार कर लिया॥ ४९॥
अङ्गीकृतेऽथ तद्वाक्ये मुनिभिस्तत्त्वदर्शिभिः।<br>मुदं प्राप नृपः कामं पौलोमीकृतमानसः॥ ५०उन तत्त्वदर्शी मुनियोंके द्वारा उस वचनके स्वीकार कर लिये जानेपर शचीके प्रति आसक्तचित्तवाला राजा नहुष प्रसन्न हो गया॥ ५०॥
आरुह्य शिबिकां रम्यां संस्थितस्त्वरयान्वितः।<br>वाहान्कृत्वा मुनीन्दिव्यान्सर्प सर्पेति चाब्रवीत्॥ ५१वह तुरंत एक सुन्दर पालकीपर चढ़कर उसमें बैठ गया और दिव्य मुनियोंको उसे ढोनेके लिये नियुक्तकर उन्हें ‘सर्प-सर्प’ (शीघ्र चलो-शीघ्र चलो) ऐसा कहने लगा॥ ५१॥
कामार्तः सोऽस्पृशन्मूढः पादेन मुनिमस्तकम्।<br>अगस्तिं तापसश्रेष्ठं लोपामुद्रापतिं तदा॥ ५२<br><br>वातापिभक्षकतारं समुद्रस्यापि शोषकम्।<br>कशया ताडयामास पञ्चबाणशराहतः॥ ५३उस कामातुर मूर्खने मुनि अगस्तिके मस्तकका पैरसे स्पर्श कर दिया। कामबाणसे आहत तथा इन्द्राणीके द्वारा आकृष्टचित्तवाले उस राजा नहुषने शीघ्र चलो—ऐसा कहते हुए वातापि नामक राक्षसका भक्षण करनेवाले तथा समुद्रको भी पी जानेवाले उन तपस्विश्रेष्ठ लोपामुद्रापति मुनि अगस्तिपर कोड़ेसे प्रहार भी किया॥ ५२-५३ १/२॥
इन्द्राणीहृतचित्तोऽसौ सर्पेति प्रब्रुवन्मुनिम्।<br>तं शशाप मुनिः क्रुद्धः कशाघातमनुस्मरन्॥ ५४<br><br>सर्पो भव दुराचार वने घोरवपुर्महान्।<br>बहुवर्षसहस्राणि यत्र क्लेशो महान्भवेत्॥ ५५तब उस कोड़ेके आघातका स्मरण करते हुए मुनिने उसे यह शाप दे दिया। हे दुराचारी! तुम वनमें भयंकर शरीरवाले विशाल सर्प हो जाओ, जहाँ तुम्हें हजारों वर्षोंतक बहुत कष्ट भोगते हुए विचरण करना पड़ेगा और अपने प्रभावसे तुम पुनः स्वर्ग प्राप्त

1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ] — 25 A

| ७७० | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ९ | | :--- | :--- |

| विचरिष्यसि वीर्येण पुनः स्वर्गमवाप्स्यसि।<br>दृष्ट्वा युधिष्ठिरं नाम तव मोक्षो भविष्यति॥ ५६<br>प्रश्नानामुत्तरं श्रुत्वा धर्मपुत्रमुखात्ततः। | करोगे। युधिष्ठिर नामवाले धर्मपुत्रका दर्शनकर और उनके मुखसे अपने प्रश्नोंके उत्तर सुनकर तुम्हारी मुक्ति हो जायगी॥ ५४–५६ १/२॥ | | व्यास उवाच<br>एवं शप्तः स राजर्षिः स्तुत्वा तं मुनिसत्तमम्॥ ५७<br>स्वर्गात्पपात सहसा सर्परूपधरोऽभवत्। | **व्यासजी बोले—**इस प्रकार शाप प्राप्तकर राजर्षि नहुष उन मुनिश्रेष्ठकी स्तुति करके अचानक स्वर्गसे गिर पड़ा और सर्परूपधारी हो गया॥ ५७ १/२॥ | | बृहस्पतिस्ततो गत्वा तरसा मानसं प्रति॥ ५८<br>इन्द्राय सर्ववृत्तान्तं कथयामास विस्तरात्।<br>तच्छ्रुत्वा मघवा राज्ञः स्वर्गात्प्रच्यवनादिकम्॥ ५९<br>मुदितोऽभून्महाराज स्थितस्तत्रैव वासवः।<br>देवाश्च मुनयो दृष्ट्वा नहुषं पतितं भुवि॥ ६०<br>जग्मुः सर्वेऽपि तत्रैव यत्रेन्द्रः सरसि स्थितः। | तब बृहस्पतिने शीघ्रतापूर्वक मानसरोवर जाकर इन्द्रसे सारा वृत्तान्त विस्तारपूर्वक कहा। हे महाराज (जनमेजय)! राजा नहुषके स्वर्गसे पतन आदिकी बात सुनकर इन्द्र बहुत प्रसन्न हुए। वे इन्द्र अब भी वहींपर स्थित रहे। सभी देवता और मुनि नहुषको पृथ्वीपर गिरा देखकर उसी सरोवरके पास गये, जहाँ इन्द्र रहते थे॥ ५८–६० १/२॥ | | तमाश्वास्य सुराः सर्वे मुनिभिः सहितास्तदा॥ ६१<br>स्वर्गे समानयामासुर्मानपूर्वं शचीपतिम्।<br>समागतं ततः शक्रं सर्वे ते मुनयः सुराः॥ ६२<br>स्थापयित्वासने पश्चादभिषेकं दधुः शिवम्।<br>इन्द्रोऽपि स्वासनं प्राप्य शच्या सह सुरालये॥ ६३<br>चिक्रीड नन्दने रम्ये कानने प्रेमयुक्तया। | तत्पश्चात् उन शचीपति इन्द्रको आश्वासन देकर मुनियोंसहित सभी देवता उन्हें सम्मानपूर्वक स्वर्ग ले आये। तदनन्तर वापस आये हुए उन इन्द्रको सभी मुनियों और देवताओंने आसनपर स्थापित करके उनका पवित्र अभिषेक किया। इन्द्र भी अपने पदको प्राप्तकर प्रेमयुक्त शचीके साथ देवप्रासाद और मनोहर नन्दनवनमें क्रीड़ा करने लगे॥ ६१–६३ १/२॥ | | व्यास उवाच<br>एवमिन्द्रेण सम्प्राप्तं दुःखं परमदारुणम्॥ ६४<br>हत्वासुरं कामरूपं विश्वरूपं महामुनिम्।<br>पुनर्देव्याः प्रसादेन स्वस्थानं प्राप्तवान्नृप॥ ६५ | **व्यासजी बोले—**हे राजन्! इस प्रकार इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले महामुनि विश्वरूप और वृत्रासुरको मारनेके कारण इन्द्रको अत्यन्त भीषण दुःख प्राप्त हुआ और देवीकी कृपासे उन्होंने पुनः अपना स्थान प्राप्त कर लिया॥ ६४-६५॥ | | एतत्ते सर्वमाख्यातं वृत्रासुरवधाश्रयम्।<br>यत्पृष्टोऽहं त्वया राजन् कथानकमनुत्तमम्॥ ६६ | हे राजन्! इस प्रकार आपने मुझसे जो पूछा था, वृत्रासुरवधपर आधारित वह सम्पूर्ण उत्तम आख्यान मैंने आपको कह दिया॥ ६६॥ | | यादृशं कुरुते कर्म तादृशं फलमाप्नुयात्।<br>अवश्यमेव भोक्तव्यं कृतं कर्म शुभाशुभम्॥ ६७ | जो जैसा कर्म करता है, उसे वैसा फल प्राप्त होता है। किये गये शुभ-अशुभ कर्मका फल अवश्य ही भोगना पड़ता है॥ ६७॥ |

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितयां षष्ठस्कन्धे नहुषस्वर्गच्युतिवर्णनं नाम नवमोऽध्यायः॥ ९॥

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1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—25 B

अथ दशमोऽध्यायः

| अ० १० ] | षष्ठ स्कन्ध | ७७१ | | :--- | :--- |

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अथ दशमोऽध्यायः

कर्मकी गहन गतिका वर्णन तथा इस सम्बन्धमें भगवान् श्रीकृष्ण और अर्जुनका उदाहरण

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संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
जनमेजय उवाच<br>कथितं चरितं ब्रह्मञ्छक्रस्याद्भुतकर्मणः।<br>स्थानभ्रंशस्तथा दुःखप्राप्तिरुक्ता विशेषतः॥ १<br>यत्र देवाधिदेव्याश्च महिमातीव वर्णितः।<br>सन्देहोऽत्र ममाप्यस्ति यच्छक्रोऽपि महातपाः॥ २जनमेजय बोले—हे ब्रह्मन्! आपने अद्भुत कर्म करनेवाले इन्द्रका आख्यान कहा, जिसमें उनके पदच्युत होने और दुःख प्राप्त करनेका विशेषरूपसे वर्णन किया गया है तथा जिसमें देवताओंकी भी अधीश्वरी देवी भगवतीकी महिमा विस्तारसे वर्णित हुई है॥ १ १/२ ॥
देवाधिपत्यमासाद्य दुःसहं दुःखमन्वभूत्।<br>मखानां तु शतं कृत्वा प्राप्तं स्थानमनुत्तमम्॥ ३<br>देवेशत्वं च सम्प्राप्य भ्रष्टः स्थानादसौ कथम्।<br>एतत्सर्वं समाचक्ष्व कारणं करुणानिधे॥ ४मुझे महान् सन्देह है कि महान् तपस्वी इन्द्रको देवाधिपतिका पद प्राप्त होनेपर भी दारुण दुःख प्राप्त हुआ। सौ यज्ञ करके उन्होंने अतिश्रेष्ठ स्थान प्राप्त किया; और देवताओंके स्वामीका पद प्राप्त करके भी वे अपने स्थानसे कैसे च्युत हो गये?॥ २-३ १/२ ॥
सर्वज्ञोऽसि मुनिश्रेष्ठ पुराणानां प्रवर्तकः।<br>नावाच्यं महतां किञ्चिच्छिष्ये च श्रद्धयान्विते॥ ५<br>तस्मात्कुरु महाभाग मत्सन्देहापनोदनम्।हे दयानिधे! इस सबका कारण सम्यक् रूपसे बताइये। हे मुनिश्रेष्ठ! आप सब कुछ जाननेवाले और पुराणोंके प्रवर्तक हैं, महापुरुषोंके लिये अपने श्रद्धालु शिष्यसे कुछ भी अकथ्य नहीं होता, इसलिये हे महाभाग! मेरे सन्देहका निवारण कीजिये॥ ४-५ १/२ ॥
सूत उवाच<br>इति पृष्टः स राज्ञा वै तदा सत्यवतीसुतः॥ ६<br>तमाहातिप्रसन्नात्मा यथानुक्रममुत्तरम्।सूतजी बोले—तब राजाके ऐसा पूछनेपर सत्यवतीपुत्र वेदव्यासजी प्रसन्नतापूर्वक उनके प्रश्नोंका क्रमसे उत्तर देने लगे॥ ६ १/२ ॥
व्यास उवाच<br>निबोध नृपतिश्रेष्ठ कारणं परमाद्भुतम्॥ ७<br>कर्मणस्तु त्रिधा प्रोक्ता गतिस्तत्त्वविदां वरैः।<br>सञ्चितं वर्तमानं च प्रारब्धमिति भेदतः॥ ८<br>अनेकजन्मस्सञ्जातं प्राक्तनं सञ्चितं स्मृतम्।<br>सात्त्विकं राजसं कर्म तामसं त्रिविधं पुनः॥ ९व्यासजी बोले—हे नृपश्रेष्ठ! इसका अत्यन्त अद्भुत कारण सुनो। श्रेष्ठ तत्त्वज्ञानियोंने संचित, वर्तमान और प्रारब्धके भेदसे कर्मकी तीन गतियाँ बतलायी हैं। अनेक जन्मोंका संचित प्राक्तन कर्म संचित-कर्म कहा गया है; फिर वे कर्म भी सात्त्विक, राजस और तामस—तीन प्रकारके होते हैं॥ ७—९॥
शुभं वाप्यशुभं भूप सञ्चितं बहुकालिकम्।<br>अवश्यमेव भोक्तव्यं सुकृतं दुष्कृतं तथा॥ १०<br>जन्मजन्मनि जीवानां सञ्चितानां च कर्मणाम्।<br>निःशेषस्तु क्षयो नाभूत्कल्पकोटिशतैरपि॥ ११हे राजन्! बहुत समयके संचित शुभ या अशुभ कर्म पुण्य या पापके रूपमें अवश्य ही भोगने पड़ते हैं। जीवोंके प्रत्येक जन्मके संचित कर्म बिना भोग किये करोड़ों कल्पोंमें भी नहीं नष्ट होते॥ १०-११॥
क्रियमाणं च यत्कर्म वर्तमानं तदुच्यते।<br>देहं प्राप्य शुभं वापि ह्यशुभं वा समाचरेत्॥ १२<br>सञ्चितानां पुनर्मध्यात्समाहृत्य कियान्किल।<br>देहारम्भे च समये कालः प्रेरयतीव तत्॥ १३जो कर्म किया जा रहा है, उसे वर्तमान कहा जाता है, जीव देह प्राप्तकर शुभ या अशुभ कार्यमें प्रवृत्त होता है। संचित कर्मोंके कारण देह प्राप्त होनेपर काल जीवको पुनः कर्मके लिये प्रेरित करता है॥ १२-१३॥

1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—25 C

| ७७२ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १० | | :--- | :--- |

| प्रारब्धं कर्म विज्ञेयं भोगात्तस्य क्षयः स्मृतः।<br>प्राणिभिः खलु भोक्तव्यं प्रारब्धं नात्र संशयः ॥ १४<br><br>पुरा कृतानि राजेन्द्र ह्यशुभानि शुभानि च।<br>अवश्यमेव कर्माणि भोक्तव्यानीति निश्चयः ॥ १५<br><br>देवैर्मनुष्यैरसुरैर्यक्षगन्धर्वकिन्नरैः ।<br>कर्मैव हि महाराज देहारम्भस्य कारणम् ॥ १६ | प्रारब्ध कर्म उसे जानना चाहिये, जिसका भोगसे क्षय हो जाता है। प्राणियोंको यहाँ प्रारब्ध कर्म अवश्य भोगना पड़ता है; इसमें सन्देह नहीं है। हे राजेन्द्र! देवता, मनुष्य, असुर, यक्ष, गन्धर्व और किन्नर—इन सभीको पूर्वकालमें किये गये शुभ-अशुभ कर्मोंका फल भोगना पड़ता है—यह निश्चित है। हे महाराज! सबके देह-धारणका कारण उनका कर्म ही होता है। कर्मके समाप्त हो जानेपर प्राणियोंका जन्म लेना भी समाप्त हो जाता है—इसमें सन्देह नहीं है॥ १४–१६ १/२ ॥ | | कर्मक्षये जन्मनाशः प्राणिनां नात्र संशयः।<br>ब्रह्मा विष्णुस्तथा रुद्र इन्द्राद्याश्च सुरास्तथा ॥ १७<br><br>दानवा यक्षगन्धर्वाः सर्वे कर्मवशाः किल।<br>अन्यथा देहसम्बन्धः कथं भवति भूपते ॥ १८<br><br>कारणं यस्तु भोगस्य देहिनः सुखदुःखयोः।<br>तस्मादनेकजन्मोत्थसञ्चितानां च कर्मणाम् ॥ १९<br><br>मध्ये वेगः समायाति कस्यचित्कालपाकतः।<br>तत्प्रारब्धवशात्पुण्यं करोति च यथा तथा ॥ २० | हे राजन्! ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, इन्द्र आदि देवता, दानव, यक्ष और गन्धर्व—ये सभी कर्मके वशीभूत हैं, अन्यथा जीवके सुख-दुःखमें भोगका जो कारणरूप देहसम्बन्ध है वह कैसे होता? इसीलिये किसी कालविपाकके योगसे यथासमय अनेक जन्मोंमें किये हुए संचित कर्मोंका प्रभाव प्रकट हो जाता है। उसी प्रारब्धकर्मके वशमें होकर ही मनुष्य पुण्य या पाप करता है, उसी प्रकार देवता आदि भी करते हैं॥ १७–२० १/२ ॥ | | पापं करोति मनुजस्तथा देवादयोऽपि च।<br>तथा नारायणो राजन्नरश्च धर्मजावुभौ ॥ २१<br><br>जातौ कृष्णार्जुनौ काममंशौ नारायणस्य तौ।<br>पुराणपीठिकेयं वै मुनिभिः परिकीर्तिता ॥ २२ | हे राजन्! भगवान् विष्णुके अंशसे धर्मपुत्र नर और नारायण ही कृष्ण और अर्जुनके रूपमें प्रकट हुए। मुनियोंके द्वारा इस पौराणिक आख्यानका विवेचन किया गया है॥ २१–२२ ॥ | | देवांशः स तु विज्ञेयो यो भवेद्विभवाधिकः।<br>नानृषिः कुरुते काव्यं नारुद्रो रुद्रमर्चते ॥ २३<br><br>नादेवांशो ददात्यन्नं नाविष्णुः पृथिवीपतिः।<br>इन्द्रादग्नेर्यमाद्विष्णोर्धनदादिति भूपते ॥ २४<br><br>प्रभुत्वं च प्रभावं च कोपं चैव पराक्रमम्।<br>आदाय क्रियते नूनं शरीरमिति निश्चयः ॥ २५ | जो अधिक वैभवशाली होता है उसे देवांश जानना चाहिये। जो ऋषि नहीं है वह काव्यकी रचना नहीं कर सकता; जो रुद्र नहीं है वह रुद्रकी अर्चना नहीं कर सकता। जिसमें देवांश नहीं है वह अन्नदान नहीं कर सकता और जिसमें विष्णुका अंश नहीं है वह राजा नहीं हो सकता। हे राजन्! विष्णु, इन्द्र, अग्नि, यम और कुबेरसे प्रभुत्व, प्रभाव, कोप और पराक्रम प्राप्त करके ही निश्चितरूपसे यह शरीर बनता है॥ २३–२५ ॥ | | यः कश्चिद्बलवाँल्लोके भाग्यवानथ भोगवान्।<br>विद्यावान्दानवान्वापि स देवांशः प्रपठ्यते ॥ २६ | इस संसारमें जो कोई बलवान्, भाग्यवान्, भोगवान्, विद्यावान् या दानशील है, उसे देवांश कहा जाता है॥ २६ ॥ | | तथैवैते मयाख्याताः पाण्डवाः पृथिवीपते।<br>देवांशो वासुदेवोऽपि नारायणसमद्युतिः ॥ २७ | हे राजन्! उसी प्रकार मैंने पाण्डवोंको भी देवांश बताया था। वासुदेव श्रीकृष्ण तो नारायणके अंश और उन्हींके समान कान्तियुक्त थे॥ २७ ॥ |


1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—25 D

अ० १० ]षष्ठ स्कन्ध७७३
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
शरीरं प्राणिनां नूनं भाजनं सुखदुःखयोः।<br>शरीरी प्राप्नुयात्कामं सुखं दुःखमनन्तरम्॥ २८प्राणियोंका शरीर सुख-दुःखका भाजन होता है; शरीरधारी सुख-दुःख प्राप्त करता रहता है॥ २८॥
देही नास्ति वशः कोऽपि दैवाधीनः सदैव हि।<br>जननं मरणं दुःखं सुखं प्राप्नोति चावशः॥ २९कोई भी प्राणी स्वतन्त्र नहीं है, बल्कि सदैव दैवके अधीन रहता है। वह विवश होकर जन्म, मरण, सुख तथा दुःख प्राप्त करता है॥ २९॥
पाण्डवास्ते वने जाताः प्राप्तास्तु स्वगृहं पुनः।<br>स्वबाहुबलतः पश्चाद्राजसूयं क्रतूत्तमम्॥ ३०<br>वनवासं पुनः प्राप्ता बहुदुःखकरं परम्।<br>अर्जुनेन तपस्तप्तं दुष्करं ह्यजितेन्द्रियैः॥ ३१<br>सन्तुष्टैस्तु सुरैर्दत्तं वरदानं पुनः शुभम्।<br>नरदेहकृतं पुण्यं क्व गतं वनवासजम्॥ ३२<br>नरदेहे तपस्तप्तं चोग्रं बदरिकाश्रमे।<br>नार्जुनस्य शरीरे तत्फलदं सम्बभूव ह॥ ३३दैववश ही पाण्डव वन गये और पुनः उन्होंने अपना राज्य प्राप्त किया। तत्पश्चात् उन्होंने अपने बाहुबलसे राजसूय नामक उत्तम यज्ञ किया और बादमें अत्यन्त दुःखदायक वनवास उन्हें पुनः प्राप्त हुआ। वहाँ अर्जुनने अजितेन्द्रिय पुरुषोंके लिये दुष्कर तपस्या की। तब [उस तपस्यासे] सन्तुष्ट होकर देवताओंने उन्हें कल्याणकारी वरदान दिया। उस वनवास और नरावतारमें किया गया पुण्य कहाँ गया ? नरावतारमें उन्होंने बदरिकाश्रममें उग्र तपस्या की थी, परंतु अर्जुनके रूपमें उन्हें उस तपस्याका फल नहीं मिला!॥ ३०—३३॥
प्राणिनां देहसम्बन्धे गहना कर्मणो गतिः।<br>दुर्ज्ञेया सर्वथा दैवर्मानवानां तु का कथा॥ ३४प्राणियोंके देह-सम्बन्धी कर्मोंकी गति अत्यन्त गहन है; यह देवताओंके लिये भी दुर्ज्ञेय है तो मनुष्योंकी क्या बात !॥ ३४॥
वासुदेवोऽपि सञ्जातः कारागारेऽतिसङ्कटे।<br>नीतोऽसौ वसुदेवेन नन्दगोपस्य गोकुलम्॥ ३५<br>एकादशैव वर्षाणि संस्थितस्तत्र भारत।<br>पुनः स मथुरां गत्वा जघानोग्रसुतं बलात्॥ ३६<br>मोचयामास पितरौ बन्धनाद् भृशदुःखितौ।<br>उग्रसेनं च राजानञ्चकार मथुरापुरे॥ ३७<br>जगाम द्वारवत्यां स म्लेच्छराजभयात्पुनः।<br>सर्वं भाविवशात्कृष्णः कृतवान्पौरुषं महत्॥ ३८वासुदेव श्रीकृष्ण भी अत्यन्त संकटमय कारागारमें उत्पन्न हुए और वसुदेवके द्वारा गोकुलमें नन्दगोपके घर ले जाये गये। हे भारत! वे वहाँ ग्यारह वर्षतक रहे और पुनः मथुरा जाकर उन्होंने बलपूर्वक उग्रसेनके पुत्र कंसका वध किया। तदनन्तर अत्यन्त दुःखित माता-पिताको बन्धनसे मुक्त किया तथा उग्रसेनको मथुरापुरीका राजा नियुक्त किया। पुनः वे म्लेच्छराज कालयवनके भयसे द्वारका चले गये। श्रीकृष्णने यह सब महान् पराक्रम दैवके अधीन होकर ही किया॥ ३५—३८॥
कृत्वा कार्याण्यनेकानि द्वारवत्यां जनार्दनः।<br>देहं त्यक्त्वा प्रभासे तु सकुदुम्बो दिवं गतः॥ ३९<br>पुत्राः पौत्राश्च सुहृदो भ्रातरो जामयस्तथा।<br>प्रभासे यादवाः सर्वे विप्रशापात्क्षयं गताः॥ ४०<br>एवं ते कथिता राजन् कर्मणो गहना गतिः।<br>वासुदेवोऽपि व्याधस्य बाणेन निधनं गतः॥ ४१वे जनार्दन श्रीकृष्ण द्वारकामें अनेक कार्य करके और प्रभासक्षेत्रमें देहका परित्यागकर अपने कुटुम्बसहित स्वर्ग चले गये। विप्रशापके कारण समस्त यादवगण पुत्रों, पौत्रों, मित्रों, भाइयों और बहनोंसहित प्रभासक्षेत्रमें नष्ट हो गये और वासुदेव श्रीकृष्ण भी व्याधके बाणसे निधनको प्राप्त हुए। हे राजन्! इस प्रकार मैंने आपसे कर्मकी गहन गतिका वर्णन कर दिया॥ ३९—४१॥

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां षष्ठस्कन्धे
कर्मणां गहनगतिवर्णनं नाम दशमोऽध्यायः ॥ १० ॥