धनुर्वेद संहिता (महर्षि वसिष्ठ - प्राचीन भारतीय युद्धकला, धनुर्विद्या एवं अस्त्र-शास्त्र सटीक)
Dhanurveda Samhita of Maharshi Vasishtha with Commentary
महर्षि वसिष्ठ (टीकाकार: स्वामी हरिदयालु जी महाराज) द्वारा
हिन्दीटीकासमेता १५ अन्यद्गोपुच्छकं ज्ञेयं शुद्धकाष्ठविनिर्मितम् । मुखे च लोहकंटेन विद्धं त्र्यंगुलसंमितम् ॥६७॥ और गोपुच्छ बाण जानना शुद्ध काष्ठ का बना हुआ उसके मुख पर तीन अंगुल का लोह का कांटा विंधा हुआ होता है॥६७॥ बाणस्य फलकस्थाने (सेह) कंटकयोजनाद्गोपुच्छबाणो भवति । अनेन शराभ्यासस्तथा लक्ष्याभ्यासो वा कर्तव्यः ॥६८॥ बाण के फलक स्थान में (साई) का कांटा लगाकर गोपुच्छ बाण होता है, इससे निशाना और बाण फेंकने का अभ्यास करना चाहिये॥६८॥ अथ पायनम् इषुफलशरवशामूललेपनाद्व्रणोऽसाध्यो भवति । तच्चि- ह्नमेतत् । यस्मिञ्छरवंशासमूहे स्वातिबिन्दुर्निपतति स पीतवर्णो भवति तस्य मूले विषमुत्पद्यते तन्मूलं ग्राह्यं स च सर्वदा पवनाभावेपि कम्पते इदमेव तल्लक्ष्मेति॥६९॥ अब फलों का पायन लिखते हैं, बाण के फल पर सरकण्डे की जड़ के लेप से घाव असाध्य होता है, उसकी पहिचान यह है कि, जिस झूँडे के समूह पर स्वाति की बूँद पड़ती है, वह पीले रंग का हो जाता है, उसकी जड़ में विष उत्पन्न होता है, वह जड़ लेनी चाहिये और वह सदा पवन भी न चलता हो तो भी कांपता रहता है, यही उसका चिह्न है॥६९॥ फलस्य पायनं वक्ष्ये दिव्यौषधिविलेपनैः । येन दुर्भेद्यवर्माणि भेदने तरुपर्णवत् ॥७०॥ फलों का पायन कहेंगे, दिव्य औषधियों के लेपन से जो किसी से भी न कटे, ऐसे कवचों को वृक्ष के पत्तों की तरह काट देवे॥७०॥ पिप्पली सैंधवं कुष्ठं गोमूत्रे तु सुपेषयेत् ॥ अनेन लेपयेच्छस्त्रं लिप्तं चाग्नौ प्रतापयेत् ॥७१॥ शिखिग्रीवानुवर्णाभं तप्तपीतं तथौषधम् ।
१६ धनुर्वेदसंहिता ततस्तु विमलं तोयं पाययेच्छस्त्रमुत्तमम् ॥७२॥ पीपल, सेंधानमक, कूठ, इन तीनों को गोमूत्र में अच्छी पीसे, फिर इससे शस्त्र को लीपे पीछे उसको अग्नि में तपावे, वह मोर की गरदन के सदृश नीला हो जाय तपाने से औषधि को पी जाय पीछे स्वच्छ जल में बुझा दे॥७१-७२॥ अथ नाराचनालीकशतघ्नीनां च वर्णनम् । सर्वलोहास्तु ये बाणा नाराचास्ते प्रकीर्तिताः । पञ्चभिः पृथुलैः पक्षैर्युक्ताः सिद्धयंति कस्यचित् ॥७३॥ अथ नाराच और नालीक और शतघ्नी का वर्णन करते हैं, जो बाण सब लोह के होते हैं वे नाराच कहे हैं, वे पांच मोटे पर बांधने से किसी को सिद्ध होते हैं॥७३॥ नालीका लघवो बाणा नलयंत्रेण नोदिताः । अत्युच्चदूरपातेषु दुर्गयुद्धेषु ते मताः ॥७४॥ जो कि नलयंत्र से फेंके जाते हैं, छोटे छोटे बाण कहाते हैं उनका नाम नालीक है अर्थात् गोली का नाम नालीक बाण हैं, और नलयंत्र नाम बन्दूक का है, सो बहुत ऊंचे और दूर फेंकने में तथा गढ़युद्ध में काम आते हैं ॥७४॥ सिंहासनस्य रक्षार्थं शतघ्नीः स्थापयेद्गढे । रंजकं बहुलं तत्र स्थाप्यं च बहु धीमता ॥७५॥ तख्तकी रक्षा के लिये गढ़ में तोपें स्थापन करे और बहुत सी बारूद और गोले गोली भी स्थापन करे॥७५॥ अथ स्थानमुष्टचाकर्षणलक्षणम् स्थानान्यष्टौ विधेयानि योजने भिन्नकर्मणाम् । मुष्टयः पंच समाख्याता व्यायाः पञ्च प्रकीर्तिताः ॥७६॥ इनके अनन्तर स्थान मुष्टि आकर्षण के लक्षण कहते हैं, अलग अलग काम में बाण प्रयोग करने के लिये स्थान आठ प्रकारके करने और पांच प्रकार की मुट्टी कही है, तथा पांच प्रकार के व्याय कहे हैं॥७६॥
हिन्दीटीकासमेता १७ अग्रतो वामपादश्च दक्षिणे चानुकुञ्चितम् । प्रत्यालीढं प्रकर्तव्यं हस्तद्वयसविस्तरम् ॥७७॥ बायां पैर आगे और दाहिना पीछे सुकड़ा हुआ यह दो हाथ की प्रत्यालीढ गति कहाती है॥७७॥ आलीढे तु प्रकर्तव्यं सव्यं चैवानुकुञ्चितम् । दक्षिणन्तु पुरस्ताद्वा दूरपाते विशिष्यते ॥७८॥ आलीढ गति में धनुषधारी को बायां पैर सकोड़ना, और दाहिना आगे कर बाण फेंके तो बाण दूर जाय॥७८॥ पादौ सविस्तरौ कार्यों समौ हस्तप्रमाणतः । विशाखस्थानकं ज्ञेयं कूटलक्ष्यस्य वेधने ॥७९॥ एक हाथ के प्रमाण से पैरों को विस्तार के साथ करे, उसका नाम विशाख गति है, कूटलक्ष्य के वेधने में इसका उपयोग होता है॥७९॥ समपादैः समौ पादौ निष्कम्पौ च सुसंगतौ । असमे च पुरो वामे हस्तमात्रनतं वपुः ॥८०॥ समपादों से बराबर दोनों पैर बिना ही लिये खड़ा हो बाण फेंके, और असमगति में आगे बायां पैर एक हाथ आगे रहे और शरीर झुका हुआ॥८०॥ आकुञ्चितोरुद्वौ यत्र जानुभ्यां धरणीं गतौ । दर्दुरक्रममित्याहुः स्थानकं दृढभेदने ॥८१॥ जहां दोनों ऊरू सिकोड़ कर जानुओं को धरती पर टेके, वह दर्दुरक्रम कहा है। दृढ़स्थान को भेद करने के लिये॥८१॥ सव्यं जानु गतं भूमौ दक्षिणं च सुकुञ्चितम् । अग्रतो यत्र दातव्यं तं विद्याद्गरुडक्रमम् ॥८२॥ बायां तो पृथिवी पर हो और दंहिना सुकड़ा हुआ हो, आगे से जो दे उसको गरुड़क्रम जानना॥८२॥ पद्मासनं प्रसिद्धन्तु उपविश्य यथाक्रमम् । धन्विनां तत्तु विज्ञेयं स्थानकं शुभलक्षणम् ॥८३॥ पद्मासन प्रसिद्ध है, इसका जैसा क्रम है वैसे बैठकर बाण मारे, ३
१८ धनुर्वेदसंहिता धनुषधारी को जानना चाहिये, यह शुभलक्षण वाला स्थानक है॥८३॥ अथ गुणमुष्टयः पताका वज्रमुष्टिश्च सिंहकर्णस्तथैव च । मत्सरी काकतुण्डी च योजनीया यथाक्रमम् ॥८४॥ अब गुणकी मुष्टि कहते हैं, पताका, वज्रमुष्टि, सिंहकर्ण, मत्सरी और काकतुण्डी ये पांच प्रकार गुण के हैं॥८४॥ दीर्घा तु तर्जनी यत्र ह्याश्रितोऽङ्गुष्ठमूलकम् । पताका सा च विज्ञेया नलिकादूरमोक्षणे ॥८५॥ जहां तर्जनी दीर्घ की जाय और अँगुठे को जड़ के पास हो, वह पताका जाननी, यह नलिका नाम वाण जिसमें रंजक और लोहकण भरे हों, उसके छोड़ने के लिये है॥८५॥ तर्जनीमध्यमामध्यमंगुष्ठो विशते यदि । वज्रमुष्टिस्तु सा ज्ञेया स्थले नाराचमोक्षणे ॥८६॥ तर्जनी और मध्यमा के बीच में यदि अँगूठा प्रवेश हो, वह वज्रमुष्टि जाननी, मोटा लोह का वाण छोड़ने के लिये इसका उपयोग करना॥८६॥ अंगुष्ठमध्यदेशन्तु तर्जन्यग्रं सुसंस्थितम् । सिंहकर्णः स विज्ञेयो दृढलक्ष्यस्य वेधने ॥८७॥ अँगूठे के बीच में तर्जनी का अग्र रखे, वह सिंहकर्ण जानना, दृढ़ लक्ष्य के वेधने में उपयोगी है॥८७॥ अंगुष्ठनखमूले तु तर्जन्यग्रं च संस्थितम् । मत्सरी सा च विज्ञेया चित्रलक्ष्यस्य वेधने ॥८८॥ अँगूठे के नख की जड़ में तर्जनी का अग्रभाग धरे; वह मत्सरी जाननी, चित्रकारी के निशाने के वेधने में यह उपयोगी है॥८८॥
हिन्दीटीकासमेता १९ अँगुष्ठाग्रे तु तर्जन्या मुखं यत्र निवेशितम् । काकतुण्डं च सा ज्ञेया सूक्ष्मलक्ष्ये सुयोजिता ॥८९॥ जहां तर्जनी का मुख अँगूठे के आगे निवेशित किया हो वह काकतुण्डी जानना, सूक्ष्म लक्ष्य में यह मुद्रा करनी॥८९॥ अथ धनुर्मुष्टिसंधानम् संधानं त्रिविधं प्रोक्तमध ऊर्ध्वं समं सदा । योजयेत्त्रिप्रकारं हि कार्येष्वपि यथाक्रमम् ॥९०॥ अब धनुष की मुष्टिका प्रकार कहते हैं, संधान तीन प्रकार का कहा है, अधःसन्धान १ ऊर्ध्वसन्धान २ और समसन्धान ३ ।। ऊपर १ नीचे २ बराबर ३ इनको जैसा कार्य हो उसमें यथाक्रम से ३ तीन प्रकार से योजना करै॥९०॥ अधश्च दूरपातित्वे समे लक्ष्ये सुनिश्चले । दृढास्फोटं प्रकुर्वीत ऊर्ध्वसंधानयोगतः ॥९१॥ दूर बाण फेंकने को अधःसन्धान करना जो अचल वस्तु हो उस पर समसन्धान करना और वस्तु को तोड़ने के लिये ऊर्ध्वसंधान करना॥९१॥ अथ व्यायाः कैशिकः केशमूले वै शरभृंगे च सात्विकः । श्रवणे वत्सकर्णश्च ग्रीवायां भरतो भवेत् ॥९२॥ अंस्के स्कंधनामा च व्यायाः पंच प्रकीर्तिताः ॥ केशों की जड़ में कैशिक और सात्विक शर श्रृंगतक और वत्सकर्ण कानतक, ग्रीवातक भरत और स्कन्धनाम व्याय कंधे तक, ये पांच व्याय अर्थात् बाण के खैंचने के प्रकार कहे हैं॥९२॥ कैशिकश्चित्रयुद्धेषु ह्यधोलक्ष्येपु सात्विकः । वत्सकर्णः सदा ज्ञेयो भरतो गूढभेदने ॥९३॥ दृढभेदे च दूरे च स्कंधनामानमुद्दिशेत् ॥
२० धनुर्वेदसंहिता कैशिक चित्रयुद्ध में और अधोलक्षों में सात्विक तथा बत्सकर्ण सदा जानना और गूढ़ भेद में भरत और दृढ़ भेद में तथा दूर बाण फेंकने को स्कंधनाम व्याय कहा है॥९३॥ अथ लक्ष्यम् लक्ष्यं चतुर्विधं ज्ञेयं स्थिरं चैव चलं तथा । चलाचलं द्वयचलं वेधनीयं क्रमेण तु ॥९४॥ अब निशाना कहते हैं, चार प्रकार का लक्ष्य जानना एक स्थिर, दूसरा चल, तीसरा चलाचल, चौथा द्वयचल इनको क्रमसे वेधना चाहिये॥९४॥ आत्मानं सुस्थिरं कृत्वा लक्ष्यं चैव स्थिरं बुधः । वेधयेत्त्रिप्रकारं तु स्थिरवेधी स उच्यते ॥९५॥ बुद्धिमान् अपने को स्थिर करके तीनों प्रकार के संधानों से लक्ष्य को वेधे वह स्थिरवेधी कहाता है, तीन प्रकार पहिले कह चुके हैं॥९५॥ चलन्तु वेधयेद्यस्तु आत्मस्थानेषु संस्थितः । चलं लक्ष्यं तु तत्प्रोक्तमाचार्येण शिवेन वै ॥९६॥ चलते हुए को जो अपने स्थान पर बैठा हुआ वेधे उसको युद्ध के आचार्य शिवजी महाराज चल लक्ष्य कहते हैं॥९६॥ धन्वी तु चलते यत्र स्थिरलक्ष्ये समाहितः । चलाचलं भवेत्तच्च ह्यप्रमेयमचिंतितम् ॥९७॥ जहाँ धनुषधारी तो स्थिर लक्ष्यपर सावधान होकर चलता है, उसका नाम चलाचल है, जो चिंतन में नहीं आता है यह अत्यंत उत्तम लक्ष्य है॥९७॥ उभावेव चलौ यत्र लक्ष्यं चापि धनुर्द्धरः । तद्विज्ञेयं द्वयचलं श्रमेण बहु साध्यते ॥९८॥ जहाँ धनुषधारी और लक्ष्य दोनों चलते हों उसको द्वयचल जानो, वह बड़ी मेहनत से सिद्ध होता है॥९८॥ श्रमेणास्खलितं लक्ष्यं दूरं च बहुभेदनम् ।
हिन्दीटीकासमेता २१ श्रमेणास्खलिता कृष्टिः शीघ्रसंधानमाप्यते ॥९९॥ श्रम से छोड़ा हुआ निशाना, और बहुत दूर का भेदन और श्रम से मर्यादा के साथ खिंचा हुआ बाण शीघ्र संधान को प्राप्त होता है॥९९॥ श्रमेण चित्रयोधित्वं श्रमेण प्राप्यते जयः । तस्माद्गुरुसमक्षं हि श्रमः कार्यो विजानता ॥१००॥ श्रम से चित्रयोद्धा होता है और श्रम से ही जय प्राप्त होता है। इससे जानने वाले को गुरु के सामने ही परिश्रम करना चाहिये॥१००॥ प्रथमं वामहस्तेन यः श्रमं कुरुते नरः । तस्य चापक्रियासिद्धिरचिरादेव जायते ॥१॥ पहले बायें हाथ से जो मनुस्य श्रम करे, उसको धनुष की क्रिया सिद्धि शीघ्र ही हो जाती है॥१॥ वामहस्ते सुसंसिद्धे पश्चाद्दक्षिणमारभेत् । उभाभ्यां च श्रमं कुर्यान्नाराचैश्च शरैस्तथा ॥२॥ बाँयाँ हाथ सिद्ध हुए पीछे दाहिने से आरंभ करे, फिर दोनों से नाराच और बांणों से श्रम करे॥२॥ वामेनैव श्रमं कुर्यात्सुसिद्धे दक्षिणे करे । विशाखेनासमेनैव रथी व्याये च कैशिके ॥३॥ जब दाहिना हाथ सिद्ध हो जाय तब बाँये से ही श्रम करे, विशाखगति और असमपादगति से रथी कैशिक नाम व्याय से॥३॥ उदिते भास्करे लक्ष्यं पश्चिमायां निवेशयेत् । अपराह्ने च कर्तव्यं लक्ष्यं पूर्वदिगाश्रितम् ॥४॥ सूर्य के उदय से दोपहर तक पश्चिम दिशा में निशाना करे और अपराह्न अर्थात् दोपहर ढले पीछे पूर्व दिशा में लक्ष्य साधन करे॥४॥ उत्तरेण सदा कार्यमवश्यमवरोधिकम् । संग्रामेण विना कार्यं न लक्ष्यं दक्षिणामुखम् ॥५॥ उत्तर दिशा को सदा अवश्य ही अवरोध से निशाना करना चाहिये, परंतु संग्राम के विना दक्षिण के सामने मुख करके निशाना कभी न
२२ धनुर्वेदसंहिता लगावे सिद्धान्त यह हुआ कि, सूर्य सदा पीठ पीछे वा दाहिनी ओर हो॥५॥ षष्टिधन्वंतरे लक्ष्यं ज्येष्ठं लक्ष्यं प्रकीर्तितम् । चत्वारिंशन्मध्यमं च विंशतिश्च कनिष्ठकम् ॥६॥ ६० साठ वाण धनुष के लिये रखो, वह श्रेष्ठ निशाना कहता है, ४० वाणों से मध्यम और २० बीस वाणों से कनिष्ठ लक्ष्य कहाता है॥६॥ शरोंका यह प्रमाण कह दिया अब नाराचोंका कहते हैं चत्वारिंशच्च त्रिंशच्च षोडशैव भवेत्ततः ॥७॥ चालीस, तीन और पीछे सोलह नाराचों का अर्थात् समस्त लोहमय बाणों को रखने वाला क्रम से उत्तम मध्यम और कनिष्ठ कहाता है॥७॥ चतुःशतैश्च काण्डानां यो हि लक्ष्यं विसर्जयेत् । सूर्योदये चास्तमाने स ज्येष्ठो धन्विनां भवेत् ॥८॥ सूर्य के उदय में और अस्त में चार सौ बाणों का जो लक्ष्य छोड़े वह धनुषधारियो में बड़ा होता है॥८॥ त्रिशंतैर्मध्यमश्चैव द्विशताभ्यां कनिष्ठकः । लक्ष्यं च पुरुषोन्मान कुर्याच्चन्द्रकसंयुतम् ॥९॥ तीन सौ से मध्यम और दो सौ से कनिष्ठ इतना उन्मान मनुष्य का है, यह निशाना चन्द्रक के संयुत करे अर्थात् चांदमारी से करे॥९॥ ऊर्ध्वभेदी भवेज्ज्येष्ठो नाभिभेदी च मध्यमः । पादभेदी तु लक्ष्यस्य स कनिष्ठो मतो भृगो ॥१०॥ हे परशुराम! ऊर्ध्वभेदी तो ज्येष्ठ कहाता है और जो बीच में वेध करे, वह मध्यम और निशाने का पादवेधी जो हो वह कनिष्ठ कहाता है॥१०॥ अथाऽनध्यायः अष्टमी च ह्यमावास्या वर्जनीया चतुर्दशी ।
हिन्दीटीकासमेता २३ पूर्णिमार्द्धदिनं यावन्निषिद्धं सर्वकर्मसु ॥११॥ अब अनध्यायों का वर्णन करते हैं, अष्टमी और अमावस और चौदस ये तिथियां वर्जित हैं, पूर्णमासी आधे दिन तक सब कामों में निषेध की है॥११॥ अकाले गर्जिते देवे दुर्दिनं चाथवा भवेत् । पूर्वकांडहतं लक्ष्यमनध्याये प्रचक्षते ॥१२॥ विना समय बादल गर्जे वा बादलों से छाया हुआ आकाश हो, पहला ही बाण लक्ष्य पर न लगे तो धनुर्वेद विद्या का अनध्याय होता है॥१२॥ अनुराधर्क्षमारभ्य षोडशर्क्षे दिवाकरः । यावच्चरति तं कालमकालं हि प्रचक्षते ॥१३॥ अनुराधा नक्षत्र से आरंभ होकर सोलह नक्षत्रों पर सूर्य जब तक रहे, उस समय को असमय कहते हैं, अर्थात् वृश्चिक के राशि के सूर्य से लेकर मार्गशीर्ष के महीने से ज्येष्ठ तक धनुष का अभ्यास न करे, केवल आषाढ़, श्रावण, भाद्रपद, और आश्विन, कार्तिक इन पांच मासों में ही अभ्यास और पठन पाठन करे॥१३॥ अरुणोदयवेलायां वारिदो यदि गर्जति । तद्दिने स्यादनध्यायस्तमकालं प्रचक्षते ॥१४॥ जिस समय प्रातःकाल लाल बादल हो सूर्य उदय होते समय यदि बादल गर्जे, उस दिन अनध्याय होता है उसको असमय कहते हैं॥१४॥ श्रमं च कुर्वतस्तत्र भुजंगो दृश्यते यदि । अथवा भज्यते चापं यदैव श्रमकर्मणि ॥१५॥ त्रुट्यते वा गुणो यत्र प्रथमे बाणमोक्षणे । श्रमं तत्र न कुर्वीत शस्त्रे मतिमतां वरः ॥१६॥ धनुष अभ्यास करने के आरम्भ में जो सर्प दीखे अथवा धनुष टूट जाय और पहिले ही बाण छोड़ते समय डोरी टूट जाय तो बुद्धिमानों में श्रेष्ठ धनुर्द्धर को विचार करना चाहिये कि, वह धनुष का वा किसी शस्त्र का भी अभ्यास न करे॥१५-१६॥
२४ धनुर्वेदसंहिता अथ श्रमक्रिया क्रियाकलापान्वक्ष्यामि श्रमसाध्याञ्छुचिष्मताम् । येषां विज्ञानमात्रेण सिद्धिर्भवति नान्यथा ॥१७॥ अब श्रम क्रिया कहते हैं, पवित्र पुरुषों के लिये धनुष की क्रिया कहते हैं, जो परिश्रम से सिद्ध हो सकती है, जिनके जानने मात्र से ही सिद्धि हो जाती है यह अन्यथा नहीं है॥१७॥ प्रथमं चापमारोप्य चूलिकां बन्धयेत्ततः । स्थानकं तु ततः कृत्वा बाणोपरि करं न्यसेत् ॥१८॥ प्रथम धनुष को आरोपण करके पीछे चूलिको बांधे, तत्पश्चात् स्थानक करके बाण पर हाथ रखे॥१८॥ तोलनं धनुषश्चैव कर्तव्यं वामपाणिना । आदानं च ततः कृत्वा सन्धानं च ततःपरम् ॥१९॥ धनुषका तोलन बाँये हाथ से करना चाहिये, बोझ तोलकर पीछे उठावे, उसके उपरान्त वाण संधान करे॥१९॥ सकृदाकृष्टचापेन भूमिवेधं न कारयेत् । नमस्कुर्याच्च मां विघ्नराजं गुरुधनुःशरान् ॥२०॥ पहले चढ़ाये धनुष से धरती का वेध न करे और हे विश्वामित्र! शिवजी महाराज कहते हैं कि गणेशजी को और मुझको, गुरुको, धनुषको, बाणों को नमस्कार करे॥२०॥ याचितव्या गुरोराज्ञा बाणस्याकर्षणं प्रति । प्राणवायुं प्रयत्नेन प्राणेन सह पूरयेत् ॥२१॥ कुम्भकेन स्थिरं कृत्वा हुङ्कारेण विसर्जयेत् । इत्यभ्यासक्रिया कार्या धन्विना सिद्धिमिच्छता ॥२२॥ फिर गुरु से बाण खैंचने की आज्ञा मांगे, प्राण वायु को जतन से प्राण के साथ पूरक करे, पीछे कुम्भक से वायु को स्थिरकर हुंकार से रेचक करे, सिद्धि चाहने वाले धनुषधारी को यदि सिद्धि चाहे तो इस अभ्यास की क्रिया करनी चाहिये॥२१-२२॥ षण्मासात्सिध्यते मुष्टिः शराः संवत्सरेण तु ।
२. अष्टादश अस्त्र-प्रयोग, स्थान-विधान (स्थानक) एवं लक्ष्य-वेध विद्या
हिन्दीटीकासमेता २५ नाराचास्तस्य सिध्यंति यस्य तुष्टो महेश्वरः ॥२३॥ छः महीने में मुट्ठी सिद्ध होती है और बाण एक वर्ष में सिद्ध होते हैं, नाराच उसके सिद्ध होते हैं, जिस पर श्रीमहादेवजी प्रसन्न हों॥२३॥ पुष्पवद्धारयेद्वाणं सर्पवत्पीडयेद्धनुः । धनवच्चिंतयेल्लक्ष्यं यदिच्छेत्सिद्धिमात्मनः ॥२४॥ यदि अपनी सिद्धि चाहे तो फूल की तरह बाण धारण करे, साँप की तरह धनुष को पीडन करे, धन की तरह लक्ष्य का चिंतन करे॥२४॥ क्रियामिच्छन्ति चाचार्या दूरमिच्छन्ति भार्गवाः । राजानो दृढमिच्छन्ति लक्ष्यमिच्छन्ति चेतरे ॥२५॥ आचार्य तो क्रिया की इच्छा करते हैं और भृगुवंशी बाण दूर जाकर पड़े यह इच्छा करते हैं, राजा अंग दृढ़ वस्तु कट जाय ऐसी इच्छा करते हैं और लोग लक्ष्य (निशाना) अच्छा लगे, इसकी इच्छा करते हैं॥२५॥ जनानां रंजनं येन लक्ष्यपातातप्रजायते । हीनेनापीषुणा तस्मात्प्रशस्तं लक्ष्यवेधनम् ॥२६॥ जिस लक्ष्य के मारने से मनुष्यों का चित्त प्रसन्न हो, इससे छोटे बाण से भी लक्ष्य का बींधना अच्छा है छोटे बाण से निशाना अच्छा बिंधता है यह बात सिद्ध हुई॥२६॥ अथ लक्ष्यास्खलनविधिः विशाखस्थानकं हित्वा समसंधानमाचरेत् । गोपुच्छमुखबाणेन सिंहकर्णे न मुष्टिना ॥२७॥ आकर्षेत्कौशिकव्याये न शिखाञ्चालयेत्ततः । पूर्वापरौ समं कार्यौ समासौ निश्चलौ करौ ॥२८॥ चक्षुषी स्पंदयेन्नैव दृष्टिं लक्ष्ये नियोजयेत् । मुष्टिनाऽऽच्छादितं लक्ष्यं शरस्याग्रे नियोजयेत् ॥२९॥ मनो दृष्टिगतं कृत्वा ततः काण्डं विसर्जयेत् ॥
२६ धनुर्वेदसंहिता स्खलत्येव कदाचिन्न लक्ष्ये योधो जितश्रमः ॥३०॥ अब निशाना न चूकने की विधि, विशाख स्थान को छोड़कर समसंधान करे, समसंधान के लक्षण पहिले कह आये हैं, गोपुच्छमुख बाण से और सिंहकर्ण मुष्टि से, कौशिकव्याय से खैंचे और शिखा को भी न चलावे, पूर्व और पर समान करे, दोनों कंधे बराबर करे,और दोनों हाथों को हिलने न दे, आँखों को किंचित् भी न चलावे निगाह को निशाने पर जोड़े, मुट्ठी से लक्ष्य को ढ़ककर बाण के आगे करे, मन को दृष्टि से करके अर्थात् जहाँ निशाने पर दृष्टि हो वहां ही मन देकर पीछे बाण छोड़े, इस विधि से जितश्रम योद्धा कभी भी निशाने से नहीं चूकता है, क्योंकि उसने श्रम से लक्ष्य को जीत लिया॥२७-३०॥ अथ शीघ्रसंधानम् आदानं चैव तूणीरात्संधानं कर्षंणं तथा । क्षेपणं च त्वरायुक्तो बाणस्य कुरुते तु यः ॥३१॥ नित्याभ्यासवशात्तस्य शीघ्रसंधानता भवेत् । अब शीघ्रसंधान कहते हैं, जो पुरुष भाथे में से बाण लेकर संधान करके कर्षण करे, फिर जल्दी ही क्षेपण करे वह ऐसे नित्य के अभ्यास से शीघ्र संधानता हो जाती है॥३१॥ अथ दूरपातित्वम् मुष्ट्यापताकया बाणं स्त्रीचिह्नं दूरपातनम् ॥३२॥ पताका नाम मुष्टि से स्त्री चिह्न वाले बाण को फेंके तो दूर पड़े॥३२॥ अथ दृढभेदिता प्रत्यालीढे कृते स्थाने ह्यधःसंधानमाचरेत् । दर्दुरस्थानमास्थाय ह्यूर्ध्वं धारणमाचरेत् ॥३३॥ स्कंधव्यायेन वज्रस्य मुष्ट्या पुंमार्गेण च ।
हिन्दीटीकासमेता २७ अत्यन्तसौष्ठवाद्वाह्वोर्जायते दृढभेदिता ॥३४॥ पत्यालीढ़ स्थान किये पीछे अधःसंधान करै और दर्दुर स्थान से स्थित होकर ऊर्ध्वसंधान करे, स्कंधव्याय से वज्रमुष्टि और पुरुष बाण समसंधान करै, ऐसा करने से बहुत अच्छी दृढ़भेदिता हाथों से ही बाणों की हो जाती है॥३३-३४॥ अथ हीनगतयः सूचीमुखा मीनपुच्छा भ्रमरी च तृतीयाका । शराणां गतयस्तिस्रः प्रशस्ताः कथिता बुधैः ॥३५॥ अब हीन गतियों का वर्णन करते हैं। सूचीमुख १ मीनपुच्छ २ तीसरी भ्रमरी ३ ये बाणों की तीन चाल श्रेष्ठ कही हैं॥३५॥ सूचीमुखा गतिस्तस्य सायकस्य प्रजायते । पत्रं विलोकितं यस्य ह्यथवा हीनपत्रकम् ॥३६॥ जिस बाण के पर देखे हों, अर्थात् परवाला हो, अथवा पर रहित हो, उस बाण की सूचीमुख चाल हो जाती है॥३६॥ कर्करीतन्तु चापेन यैः कृष्टो हीनमुष्टिना । मत्स्यपुच्छा गतिस्तस्य सायकस्य प्रकीर्तिता ॥३७॥ जिस बाण को कठिन धनुष और पूर्वोक्त हीन मुष्टि से खैंचा जाय उसकी मत्स्यपुच्छा गति श्रीमहादेवजी महाराज ने कही है॥३७॥ भ्रमरी कथिता ह्येषा शिवेन श्रमकर्मणि । ऋजुत्वेन विना याति क्षेप्यमाणस्तु सायकः ॥३८॥ फेंका हुआ जो बाण सीधापन के विना ही जाय इसको शिवजी महाराज ने श्रमकर्म में भ्रमरी कहा है पूर्वोक्त तिर्यग्गत लक्ष्य वेधन के लिये श्रेष्ठ हैं॥३८॥ अथ बाणानां लक्ष्यस्खलनगतयः वामगा दक्षिणा चैव ऊर्ध्वगाऽधोगमा तथा । चतस्रो गतयः प्रोक्ता बाणस्खलनहेतवः ॥३९॥
२८ धनुर्वेदसंहिता बांई ओर जानेवाली, दाहिनी ओर जानेवाली, ऊपर को और वैसे ही नीचे को गति हो जाय, ये चार गतियां श्रीमहादेवजी ने बाणों के स्खलन के कारण कही हैं॥३९॥ अथैतासां क्रमेणोदाहरणानि कम्पते गुणमुष्टिस्तु मार्गणस्य तु पृष्ठतः । संमुखी स्याद्धनुर्मुष्टिस्तदा वामे गतिर्भवेत् ॥४०॥ गुणा की मुष्टि जो कि बाण की पीठ पर से काँपे और धनुष की मुष्टि सामने होय तब बाण सीधा जाके नहीं लगे, किंतु बाई ओर को उसकी चाल हो जाती है, इसलिये गुणा की मुष्टि को काँपने न दे॥४०॥ ग्रहणं शिथिलं यस्य ऋजुत्वेन विवर्जितम् । पार्श्वं तु दक्षिणं याति सायकस्य न संशयः ॥४१॥ जिस बाण का पकड़ना ढीला हो और सीधापन से भी रहित हो वह दाहिनी ओर चला जाता है, इसमें संदेह नहीं॥४१॥ ऊर्ध्वं भवेच्चापमुष्टिर्गुणमुष्टिरधो भवेत् । स मुक्तो मार्गणो लक्ष्यादूर्ध्वं याति न संशयः ॥४२॥ धनुष की मुट्ठी ऊपर को हो और गुणा की मुष्टि निशाने से नीचे को हो तो वह शर लक्ष्यवेध को छोड़कर ऊपर को चला जाता है इसमें कुछ संशय नहीं॥४२॥ मोक्षणे चैव बाणस्य चापे मुष्टिरधो भवेत् । गुणमुष्टिर्भवेदूर्ध्वं तदाधोगामिनी गतिः ॥४३॥ बाण के छोड़ने पर धनुष की मुष्टि यदि निशाने से नीचे हो और गुणा की मुष्टि ऊपर हो तब बाण की गति नीचे को हो जाती है, सिद्धांत यह है कि चापमुष्टि और गुणामुष्टि से लक्ष्य को ढक लेना चाहिये तब लक्ष्यभेद होता है अन्यथा नहीं होता॥४३॥ अथ शुद्धगतयः लक्ष्यबाणाग्रदृष्टीनां संगतिस्तु यदा भवेत् ।
हिन्दीटीकासमेता २९ तदानीं मुंचितो बाणो लक्ष्यान्न स्खलति ध्रुवम् ॥४४॥ अब शुद्ध गति का वर्णन ऐसा है कि, लक्ष्य और बाण का अग्रभाग तथा दृष्टि ये तीनों एक ही हो जायें, तब छोड़ा हुआ बाण निशाने से नहीं चूकता॥४४॥ निर्दोषः शब्दहीनश्च सममुष्टिद्वयोज्झितः । भिनत्ति दृढवेध्यानि सायको नास्ति संशयः ॥४५॥ दोष रहित और शब्द से हीन गुणा और धनुष इनकी समान मुष्टि से छोड़ा हुआ बाण कठिन वस्तुओं को विदारण कर देता है, इसमें संदेह नहीं॥४५॥ स्वाकृष्टस्तेजितो यश्च सुशुद्धो गाढमुष्टितः । नरनागाश्वकायेषु न तिष्ठति स मार्गणः ॥४६॥ सुंदर खैंचा हुआ तेज किया हुआ जो अच्छा स्वच्छ पक्ष आदि बँधा हो वह बाण गाढ़ी मुष्टि से छोड़ा हुआ, मनुष्य हाथी घोड़ों के शरीरों में नहीं ठहरता अर्थात् पार हो जाता है॥४६॥ यस्य तृणसमा बाणा यस्येन्धनसमं धनुः । यस्य प्राणसमा मौर्वी स धन्वी धन्विनां वरः ॥४७॥ जिसके तृण के समान बाण, और जिसके ईंधन के तुल्य धनुष और प्राण के समान मौर्वी (प्रत्यंचा) हो वह धनुषधारी धनुषधारियों में श्रेष्ठ है॥४७॥ अथ दृढचतुष्कम् अयश्चर्मघटश्चैव मृत्पिंडश्च चतुष्टयम् । यो भिनत्ति न तस्येषुर्वज्रेणापि विदार्यते ॥४८॥ अब दृढचतुष्क कहते हैं, लोह, चमड़ा, घड़ा, मिट्टी के पिण्ड इन चारों को जो बाण भेदन करे उसका बाण वज्र से भी न कटे॥४८॥ सार्द्धाङ्गुलप्रमाणेन लोहपत्राणि कारयेत् । तानि भित्त्वैकबाणेन दृढघाती भवेन्नरः ॥ डेढ़ अंगुल के मान चौड़े लोहे के पत्र करावे, उनको एक बाण से जो वेध
३० धनुर्वेदसंहिता दे वह दृढ़घाती मनुष्य होता है॥ चतुर्विंशतिचर्माणि यो भिनत्तीषुणा नरः । तस्य बाणो गजेन्द्रस्य कायं निर्भिद्य गच्छति ॥४९॥ जो मनुष्य एक बाण से २४ चौबीस चमड़ों को बींध दे, उसका बाण बड़े भारी हाथी के शरीर को भी भेदन कर चला जायगा॥४९॥ भ्राम्यं जले घटो वेध्यश्चक्रे मृत्पिंडकं तथा ॥ भ्रमंतं वेधयेद्यो हि दृढभेदी स उच्यते ॥५०॥ जल में घुमाकर घड़ा बींधना चाहिये और वैसे ही कुम्हार के चाक के मिट्टी के घूमते हुए पिण्डे को, जो भ्रमण करती हुई वस्तु को वेधे वह दृढ़ भेदी कहाता है॥५०॥ अयस्तु काकतुण्डेन चर्म चारामुखेन हि । मृत्पिण्डं च घटं चैव विध्येत्सूचीमुखेन वै ॥५१॥ लोहे की वस्तु को काकतुण्ड से, ढाल को आरामुख से और मिट्टी के ढेले को और घड़े को सूचीमुख बाण से वेधे॥५१॥ अथ चित्रविधिः बाणभंगकरावर्तकाष्ठच्छेदनमेव च । बिंदुकं गोलकयुगं यो वेत्ति स जयी भवेत् ॥५२॥ बाण के तोड़ने की विधि और काष्ठच्छेदन, तथा बिंदी (चांदमारी) और दो गोलों को जो बींधना जाने वह परसेना को जीतता है॥५२॥ लक्ष्यस्थाने धृतं काण्डं सन्मुखं छेदयेत्ततः ॥ किंचिन्मुष्टिं विधाय स्वां तिर्यग्द्विफलकेषुणा ॥५३॥ सम्मुखं बाणमायान्तं तिर्यग्बाणं न संचरेत् । प्राप्तं शरेण यच्छिद्याद्वाणच्छेदी स उच्यते ॥५४॥ निशाने के स्थान में धारण किये हुए बाण को सामने आते २ ही मार्ग में काट दे, कुछ अपनी मुष्टि को करके तिरछा हो, दो फलवाले बाण से वा अर्धचन्द्र से शत्रु के शिर को मध्य से काट दे, सामने आते हुए बाण को
हिन्दीटीकासमेता ३१ तिरछा बाण न चलावे, किंतु आप तिरछा हो जाय बाण से बाण को जो काट दे, वह बाण छेदी कहाता है॥५३-५४॥ अथ काष्ठच्छेदनम् काष्ठेऽश्वकेशं संयम्य तत्र बध्द्वा वराटिकाम् । हस्तेन भ्राम्यमाणं च यो हन्ति स धनुर्धरः ॥५५॥ लक्ष्यस्थाने न्यसेत्काष्ठं सार्द्रं गोपुच्छसन्निभम् । यश्छिद्यात्तत्क्षुरप्रेण काष्ठच्छेदी स जायते ॥५६॥ अब काष्ठच्छेदन को कहते हैं, लकड़ी को घोड़े का बाल बाँधकर उसमें कौड़ी बांधकर घूमती हुई कौड़ी को जो मार दे वह धनुषधारी है, निशाने की जगह गीली लकड़ी को काली करके रखे, जो उसको क्षुरप्रबाण से छेदन करदे वह सब काष्ठों को काट देगा और (काष्ठच्छेदी) की पदवी मिलेगी॥५५-५६॥ लक्ष्ये बिंदुंन्यसेच्छुभ्रं शुभ्रबंधूकपुष्पवत् । हन्ति तं बिन्दुकं यस्तु चित्रयोधा स उच्यते ॥५७॥ लक्ष्य की जगह सफेद बिंदी शुक्लकुन्दके फूल की सदृश रखे, उस बिन्दु को जो वेध दे वह (चित्रयोधा) कहाता है॥५७॥ काष्ठगोलयुगं क्षिप्रं दूरमूर्ध्वं पुरा स्थितैः । असम्प्राप्तं शरं पृष्ठे तद्गोपुच्छमुखेन हि ॥५८॥ यो हन्ति शरयुग्मेन शीघ्रसंधानयोगतः । स स्याद्धनुर्भृतां श्रेष्ठः पूजितः सर्वपार्थिवैः ॥५९॥ दो काष्ठ के गोलों को शीघ्रता से ऊपर को आकाश में फेंक दे वे दोनों धरती पर गिरने न पावें उनकी पीठ को गोपुच्छमुख से जो वेध दे दो बाणों से शीघ्रसंधान के योग से वह धनुषधारियों में श्रेष्ठ है और सब राजाओं से पूजित है, अर्थात् सब राजाओं को उसका सत्कार करना चाहिये॥५८-५९॥ अथ धावल्लक्ष्यम् रथस्थेन गजस्थेन हयस्थेन च पत्तिना । धावता वै श्रमः कार्यो लक्ष्यं हन्तुं स निश्चितम् ॥६०॥
३२ धनुर्वेदसंहिता रथी वा गजी अथवा सवार वा पैदल को भागते हुए पर लक्ष्य मारने का श्रम करना चाहिये॥६०॥ अथ विधिः वामादायाति यल्लक्ष्यं दक्षिणं हि प्रधावति । तच्छिंद्याच्चापमाकृष्य सव्येनैव च पाणिना ॥६१॥ तथैव दक्षिणायांतु विध्येद्वाणाद्धनुर्धरः ॥ आलीढक्रममारोप्य त्वराहन्याच्च तं नरः ॥६२॥ वायोरपि बलं दृष्ट्वा वामदक्षिणवाहतः । लक्ष्यं स साधयेद्देवं गाधिपुत्र नृपात्मज ॥६३॥ वायुपृष्ठे दक्षिणे च वहन्सूचयते बलम् । सम्मुखीनश्च वामश्च भटानां भङ्गसूचकः ॥६४॥ अब भागते हुए को मारने की विधि कहते हैं, जो निशाना बायें हाथ की ओर से आता हुआ दाहिनी ओर भागता जाता हो, उसको बाँयें खींचकर बाण हाथ से मारे, वैसे ही दक्षिण की ओर से आता हो उसको धनुषधारी मनुष्य आलीढक्रम करके मारे आलीढक्रम पहले कह आये, बांई ओर से चलता हुआ वा दाहिनी ओर से वायु चलता हो तो उसका बल भी देख ले, यदि बांई ओर से चलता हो तो धनुष को दाहिनी ओर झुका दे और दाहिना वायु हो तो बांई ओर बाण छोड़ दे। हे गाधि के पुत्र! हे राजा के पुत्र! ऐसे निशाना साधन करे, जिसके पीठ पीछे का वा दाहिनी ओर का वायु चलता हो, वही जीतता है और जिसके सामने का व वांई ओर पवन चलता है वह हार जाता है, जोधाओं का भंग सूचक है॥६१-६४॥ अथ शब्दवेधित्वम् लक्ष्यस्थाने न्यसेत्कांस्यपात्रं हस्तद्वयान्तरे । ताडिते शर्कराभिस्तच्छब्दः संजायते यदा ॥६५॥ यत्र संद्योत्यते शब्दस्तं सम्यक्तत्र चिंतयेत् । कर्णेन्द्रियमनोयोगाल्लक्ष्यं निश्चयतां नयेत् ॥६६॥
हिन्दीटीकासमेता ३३ पुनः शर्करया तच्च ताडयेच्छब्दहेतवे । पुनर्निश्श्रयतां नेयं शब्दस्थानानुसारतः ॥६७॥ ततः किंचित्कृतं दूरं नित्यं नित्यं विधानतः । लक्ष्यं समभ्यसेद्ध्वाते शब्दवेधनहेतवे ॥६८॥ ततो बाणेन हन्यात्तदवधानेन तीक्ष्णधीः । एतच्च दुष्करं कर्म भाग्ये कस्यापि सिध्यति ॥६९॥ निशाने के स्थान में कांसे का पात्र दो हाथ दूर रखे फिर उसको बालूरेत से ताडन करे, तब शब्द उत्पन्न हो, जहां से शब्द उत्पन्न हो उसको भली भाँति चिंतन करे, कान इन्द्रिय और मन के योग से निशाने को निश्चय करे फिर उसको शब्द सुनने के हेतु शब्दस्थान के अनुसार ताडन करे, जब दो हाथ अंतर से शब्द सुनने का अभ्यास हो जाय। तब कुछ उस कांस्यपात्र को दूर धरे, नित्य बढ़ता जाय, ऐसे शब्दवेधन के लिये निशाने का अभ्यास अँधेरे में करे, फिर बाण से निशाने को सावधान चित्त से हनन करे, यह दुष्कर कर्म किसी के भाग्य में हो उसको सिद्ध होता है॥६५-६९॥ अथ प्रत्यागमनम् खगं बाणन्तु राजेन्द्र प्रक्षिपेद्वायुसम्मुखे । रंजकस्य च नालाभिरतो ह्यागमनं भवेत् ॥७०॥ हे राजेन्द्र विश्वामित्र! खगनाम बाण को वायु के सामने फेंके जिसमें रंजक की नलिका लगी हों, इससे उस बाण का फिर आगमन हो जाता है॥७०॥ अथास्त्रविधिः एवं श्रमविधिं कुर्याद्यावत्सिद्धिः प्रजायते । श्रमे सिद्धे च वर्षासु नैव ग्राह्यं धनुष्करे ॥७१॥ पूर्वाभ्यासस्य शस्त्राणामविस्मरणहेतवे । मासद्वयं श्रमं कुर्यात्प्रतिवर्षं शरद्ऋतौ ॥७२॥
३४ धनुर्वेदसंहिता जाते वाऽऽश्वयुजे मासे नवमीदेवतादिने । पूजयेदीश्वरीं चण्डीं गुरुं शस्त्राणि वाजिनः ॥७३॥ विप्रेभ्यो दक्षिणां दत्वा कुमारीर्भोजयेत्ततः । देव्यै पशुबलिं दद्याद्वृतो वादित्रमंगलैः ॥७४॥ ततस्तु साधयेन्मंत्रान्वेदोक्तान्वागमोदितान् । अस्त्राणां कर्मसिद्ध्यर्थं जपहोमविधानतः ॥७५॥ ऐसे श्रमविधि करे, जब तक सिद्धि हो श्रमसिद्धि हुए पीछे वर्षा में धनुष को कर में धारण न करे पूर्व अभ्यास किये हुए शस्त्रों के न भूलने के कारण दो महीना परिश्रम करे, प्रत्येक वर्ष के शरदृतु में अथवा आश्विन महीने में शुक्ल पक्ष की ९ नवमी देवी के दिन चण्डी ईश्वरी और गुरु तथा हथियार और घोड़ों की राजा वा अभ्यासी पूजा करे, ब्राह्मणों को दक्षिणा देकर पीछे कुंवारी कन्याओं को जिमावे, देवी के लिये बाजों और मंगलों के साथ पशु की बलि दे। पीछे वेदोक्त हों वा शास्त्रोक्त हों अस्त्रों की कर्मसिद्धि के लिये जप और होम की विधि से मंत्रों का साधन करे॥७१-७५॥ ब्राह्मं नारायणं शैवमैन्द्रं वायव्यवारुणे । आग्नेयं चापरास्त्राणि गुरुदत्तानि साधयेत् ॥७६॥ मनोवाक्कर्मभिर्भाव्यं लब्धास्त्रेण शुचिष्मता । अपात्रमसमर्थं च दहन्त्यस्त्राणि पूरुषम् ॥७७॥ प्रयोगं चोपसंहारं यो वेत्ति स धनुर्द्धरः । सामान्ये कर्मणि प्राज्ञो नैवास्त्राणि प्रयोजयेत् ॥७८॥ ब्राह्म, नारायण, शैव, ऐन्द्र, वायव्य, वारुण, आग्नेय और गुरु के दिये हुए अस्त्रों का साधन करे, पवित्र पुरुष मन, वाणी, कर्म से अनुभव करे अस्त्रों को पाकर, अस्त्रों का प्रयोग और संहार जो जाने वह धनुर्धर है, सामान्य काम के लिये बुद्धिमान् अस्त्रों का प्रयोग न करे॥७६-७८॥ अथास्त्राणि प्रवक्ष्यामि सावधानोऽवधारय । ब्रह्मास्त्रं प्रथमं प्रोक्तं द्वितीयं ब्रह्मदंडकम् ॥७९॥ ब्रह्मशिरस्तृतीयं च तुर्यं पाशुपतं मतम् ।