श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
ङ्क ₹ २५० देकर प्राप्त करनेके पश्चात् संलग्न कूपनपर आप अपना पूरा बाइल नम्बर लिखकर जिस दूकानसे विशेषाङ्क लिये हैं उसके पास जमा सीधे कल्याण-कार्यालय, गीताप्रेस, गोरखपुर भेज देवें। शेष मासिक अङ्क र डाकद्वारा भिजवा दिया जायगा। इसके लिये आप द्वारा कोई अतिरिक्त नहीं है। पत्र व्यवहारमें कूपन-संख्या एवं मोबाइल नम्बर अवश्य नको Scan करके हमारे e-mail : kalyan@gitapress.org अथवा p No. 9648916010 पर भी भेज सकते हैं। (कृपया कूपन-संख्या एवं रिकार्डके लिये नोट कर लेवें।) कल्याणसे सम्बन्धित सभी नकारीके लिये मोबाइल नम्बर 09235400242, 09235400244 पर ा BS— रा पता— ________________________________________
०- पिन-
- ॐ श्रीपरमात्मने नमः * कल्याण वर्ष श्रीगणेशपुराणाङ्क संख्या ९५ गीताप्रेस, गोरखपुर १
दुर्गति-नाशिनि दुर्गा जय जय, काल-विनाशिनि काली जय जय। उमा-रमा-ब्रह्माणी जय जय, राधा-सीता-रुक्मिणि जय जय॥ साम्ब सदाशिव, साम्ब सदाशिव, साम्ब सदाशिव, जय शंकर। हर हर शंकर दुखहर सुखकर अघ-तम-हर हर हर शंकर॥ हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे। हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे॥ जय जय दुर्गा, जय मा तारा। जय गणेश जय शुभ-आगारा॥ जयति शिवाशिव जानकिराम। गौरीशंकर सीताराम॥ जय रघुनन्दन जय सियाराम। व्रज-गोपी-प्रिय राधेश्याम॥ रघुपति राघव राजाराम। पतितपावन सीताराम॥ (संस्करण २,००,०००) ═वार्षिक सुभाषित═ ● सच्चिदानन्दस्वरूप परब्रह्म श्रीगणेश ● यतो वेदवाचो विकुण्ठा मनोभिः सदा नेति नेतीति यत्ता गृणन्ति। परब्रह्मरूपं चिदानन्दभूतं सदा तं गणेशं नमामो भजामः॥ [श्रीगणेशपुराण, उपासनाखण्ड ९९। ५२] जिनके विषयमें वेदवाणी कुण्ठित है; जहाँ मनकी भी पहुँच नहीं है तथा श्रुति सदा सावधान रहकर 'नेति-नेति'—इन शब्दोंद्वारा जिनका वर्णन करती है; जो सच्चिदानन्दस्वरूप परब्रह्म हैं, उन गणेशका हम सदा ही नमन एवं भजन करते हैं।
- कृपया नियम अन्तिम पृष्ठपर देखें। एकवर्षीय शुल्क | जय पावक रवि चन्द्र जयति जय। सत्-चित्-आनंद भूमा जय जय॥ | पंचवर्षीय शुल्क ₹ 250 | जय जय विश्वरूप हरि जय। जय हर अखिलात्मन् जय जय॥ | ₹ 1250 जय विराद् जय जगत्पते। गौरीपति जय रमापते॥ विदेशमें Air Mail } वार्षिक US$ 50 (₹ 3,000) { Us Cheque Collection शुल्क } पंचवर्षीय US$ 250 (₹ 15,000) { Charges 6$ Extra संस्थापक — ब्रह्मलीन परम श्रद्धेय श्रीजयदयालजी गोयन्दका आदिसम्पादक — नित्यलीलालीन भाईजी श्रीहनुमानप्रसादजी पोद्दार सम्पादक — राधेश्याम खेमका, सहसम्पादक — डॉ० प्रेमप्रकाश लक्कड़ केशोराम अग्रवालद्वारा गोबिन्दभवन-कार्यालय के लिये गीताप्रेस, गोरखपुर से मुद्रित तथा प्रकाशित website : gitapress.org | e-mail : kalyan@gitapress.org | ✆ 09235400242 / 244 सदस्यता-शुल्क—व्यवस्थापक—'कल्याण-कार्यालय', पो० गीताप्रेस—२७३००५, गोरखपुर को भेजें। Online सदस्यता हेतु gitapress.org पर Kalyan या Kalyan Subscription option पर click करें। अब 'कल्याण' के मासिक अङ्क gitapress.org अथवा book.gitapress.org पर निःशुल्क पढ़ें।
कल्याण पृष्ठ ३ भगवान् मयूरेश्वर गणपति
कल्याण ⸎ पृष्ठ ४ श्रीशिव-परिवार
कल्याण पृष्ठ ५ देवसेनापति भगवान् श्रीकार्तिकेय
कल्याण पृष्ठ ६ भगवान् शिव एवं माता पार्वतीके अंकमें बालक गणेश भगवान् शिवद्वारा त्रिपुरदाह
कल्याण पृष्ठ ७ भगवान् शिवकी क्रोधाग्निसे कामदहन दैत्यराज बलिकी यज्ञशालामें भगवान् वामनका आगमन
कल्याण पृष्ठ ८ श्रीमहोत्कट श्रीमयूरेश कृतयुगमें वे मान्य 'महोत्कट', 'मयूरेश' त्रेता अभिराम। द्वापरमें वे गेय 'गजानन', कलियुग 'धूम्रकेतु' शुभनाम॥ श्रीगजानन बी. एन. प्रसाद श्रीधूम्रकेतु चार युगोंमें भगवान् गणेशके पृथक्-पृथक् चार अवतार
कल्याण पृष्ठ ९ महर्षि व्यासद्वारा भगवान् गणेशका पूजन श्रीगणेशजीद्वारा राजा वरेण्यपर कृपा देवगणोंके समक्ष श्रीगणेशजीद्वारा सिद्धि-बुद्धिका पाणिग्रहण
कल्याण पृष्ठ १० महड़ मोरगाँव थेऊर ॐ लेण्याद्रि ओझर सिद्धटेक पाली राजणगाँव महाराष्ट्रस्थित अष्टगणपतिस्थानोंके विग्रह
ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते। पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते॥ कल्याण यतो वेदवाचो विकुण्ठा मनोभिः सदा नेति नेतीति यत्ता गृणन्ति। परब्रह्मरूपं चिदानन्दभूतं सदा तं गणेशं नमामो भजामः॥ वर्ष ९५ गोरखपुर, सौर माघ, वि० सं० २०७७, श्रीकृष्ण-सं० ५२४६, जनवरी २०२१ ई० संख्या १ पूर्ण संख्या ११३० अष्टगणपतिस्थान-स्मरण स्वस्ति श्रीगणनायकं गजमुखं मोरेश्वरं सिद्धिदम्। बल्लालं मुरुडं विनायकमढं चिन्तामणिं थेवरम्॥ लेह्याद्रिं गिरिजात्मजं सुवरदं विघ्नेश्वरं ओझरम्। ग्रामे रांजणसंस्थितो गणपतिः कुर्यात् सदा मङ्गलम्॥ गजके समान मुखवाले गणोंके नायक (श्रीगणेशजी) हमारा कल्याण करें। १. मोरेश्वर (मोरेगाँवके मयूरेश्वर), २. सिद्धिदम् (सिद्धटेकके सिद्धिविनायक), ३. बल्लाल (पालीके बल्लालेश्वर), ४. मढ़के विनायक (मढ़ अर्थात् महड़के वरदविनायक), ५. थेवरके चिन्तामणि (थेवर अर्थात् थेऊरके चिन्तामणि), ६. सुन्दर वर देनेवाले लेह्याद्रिके गिरिजात्मज, ७. ओझरके विघ्नेश्वर, ८. रांजणगाँवमें स्थित (महा) गणपति हमारा सदा मंगल करें। Kalyana Visheshank 2021_Section_2_1_Front
॥ श्रीहरिः ॥ 'कल्याण' के सम्मान्य सदस्योंसे नम्र निवेदन १-'कल्याण' के ९५वें वर्ष—सन् २०२१ का यह विशेषाङ्क— 'श्रीगणेशपुराणाङ्क' आपलोगोंकी सेवामें प्रस्तुत है। इसमें ६२२ पृष्ठोंमें पाठ्य-सामग्री और १० पृष्ठोंमें विषय-सूची एवं अंतमें गीताप्रेससे प्रकाशित पुस्तकोंकी सूची है। कई बहुरंगे एवं रेखाचित्र भी दिये गये हैं। डाकसे सभी ग्राहकोंको विशेषाङ्क-प्रेषणमें लगभग एक माहका समय लग जाता है। २-वार्षिक सदस्यता-शुल्क प्रेषित करनेपर भी किसी कारणवश यदि विशेषाङ्क वी०पी०पी० द्वारा आपके पास पहुँच गया हो तो उसे डाकघरसे प्राप्त कर लेना चाहिये एवं प्रेषित की गयी राशिका पूरा विवरण (मनीऑर्डर पावतीसहित) उचित व्यवस्थाके लिये यहाँ भेज देना चाहिये अथवा उक्त वी०पी०पी० से किसी अन्य सज्जनको ग्राहक बनाकर उसकी सूचना यहाँ नये सदस्यके पूरे पतेसहित देनी चाहिये। ३-इस अङ्कके लिफाफे (कवर)-पर आपकी सदस्य-संख्या एवं पता छपा है, उसे कृपया जाँच लें तथा नोट कर लें। पत्र-व्यवहारमें सदस्य-संख्याका उल्लेख नितान्त आवश्यक है। ४-अब कल्याणके मासिक अङ्क gitapress.org अथवा book.gitapress.org पर निःशुल्क पढ़ें। ५-'कल्याण' एवं 'गीताप्रेस-पुस्तक-विभाग' की व्यवस्था अलग-अलग है। अतः पत्र तथा मनीऑर्डर आदि सम्बन्धित विभागको अलग-अलग भेजना चाहिये। व्यवस्थापक—'कल्याण'-कार्यालय, पत्रालय—गीताप्रेस-२७३००५, जनपद-गोरखपुर, (उ०प्र०) 'कल्याण' के पुनर्मुद्रित उपलब्ध विशेषाङ्क कोड | विशेषाङ्क | मूल्य ₹ | कोड | विशेषाङ्क | मूल्य ₹ | कोड | विशेषाङ्क | मूल्य ₹ 627 | संत-अङ्क | 260 | 1133 | सं० श्रीमद्देवीभागवत | 300 | 586 | शिवोपासनाङ्क | 150 518 | हिन्दू-संस्कृति-अङ्क | 350 | 789 | सं० शिवपुराण | 250 | 653 | गोसेवा-अङ्क | 130 41 | शक्ति-अङ्क | 200 | 631 | सं० ब्रह्मवैवर्तपुराण | 250 | 1131 | कूर्मपुराण-सानुवाद | 150 616 | योगाङ्क-(परिशिष्टसहित) | 280 | 1184 | श्रीकृष्णाय | 200 | 1044 | वेद-कथाङ्क (परिशिष्टसहित) | 220 604 | साधनाङ्क | 250 | 572 | परलोक-पुनर्जन्माङ्क | 220 | 1980 | ज्योतिषतत्त्वाङ्क | 150 1773 | गो-अङ्क | 200 | 517 | गर्ग-संहिता | 165 | 2066 | श्रीभक्तमाल | 250 44 | संक्षिप्त पद्मपुराण | 280 | 1135 | भगवन्नाम-महिमा और | | 1132 | धर्मशास्त्राङ्क | 200 539 | सं० मार्कण्डेयपुराण | 100 | | प्रार्थना-अङ्क | 200 | 1189 | सं० गरुडपुराण | 200 1111 | संक्षिप्त ब्रह्मपुराण | 150 | 1113 | नरसिंहपुराणम्-सानुवाद | 100 | 1985 | लिङ्गमहापुराण-सटीक | 250 43 | नारी-अङ्क | 300 | 1362 | अग्निपुराण | 260 | 1592 | आरोग्य-अङ्क | 260 659 | उपनिषद्-अङ्क | 230 | | (मूल संस्कृतका हिन्दी-अनुवाद) | | 1610 | (महाभागवत) देवीपुराण | 279 | सं० स्कन्दपुराण | 425 | 1432 | वामनपुराण-सानुवाद | 150 | | सानुवाद | 130 40 | भक्त-चरिताङ्क | 250 | 557 | मत्स्यमहापुराण (सानुवाद) | 300 | 1793 | श्रीमद्देवीभागवताङ्क-पूर्वार्द्ध | 100 1183 | सं० नारदपुराण | 220 | 657 | श्रीगणेश-अङ्क | 180 | 1887 | श्रीमद्देवीभागवताङ्क [उत्तरार्ध] | 75 667 | संतवाणी-अङ्क | 250 | 42 | हनुमान-अङ्क (परिशिष्टसहित) | 150 | 1875 | सेवा-अङ्क | 130 587 | सत्कथा-अङ्क | 230 | 1361 | सं० श्रीवाराहपुराण | 120 | 2125 | श्रीशिवमहापुराणाङ्क-पूर्वार्ध | 140 636 | तीर्थाङ्क | 230 | 791 | सूर्याङ्क | 150 | 2154 | श्रीशिवमहापुराणाङ्क-उत्तरार्ध | 140 574 | संक्षिप्त योगवासिष्ठ | 180 | 584 | सं० भविष्यपुराण | 200 | 2235 | श्रीराधामाधव-अङ्क | 140 booksales@gitapress.org थोक पुस्तकोंसे सम्बन्धित सन्देश भेजें। gitapress.org सूची-पत्र एवं पुस्तकोंका विवरण पढ़ें। कूरियर/डाकसे मँगवानेके लिये गीताप्रेस, गोरखपुर, 273005 book.gitapress.org / gitapressbookshop.in व्यवस्थापक-गीताप्रेस, पत्रालय-गीताप्रेस-२७३००५, जनपद-गोरखपुर, (उ०प्र०) Kalyana Visheshank 2021_Section_2_1_Back
श्रीहरिः 'श्रीगणेशपुराण-अङ्क' की विषय-सूची विषय पृष्ठ-संख्या विषय पृष्ठ-संख्या १- अष्टगणपतिस्थान-स्मरण ....................................... ११ उनके वधहेतु योगनिद्रा देवीकी प्रार्थना करना ........ ७२ स्मरण-स्तवन १७- भगवान् विष्णुका मधु-कैटभसे मल्लयुद्ध करना, उन्हें २- वैदिक गणेश-स्तवन ........................................... २३ जीतनेमें अपनेको असमर्थ समझ गन्धर्वरूपसे गायन- ३- श्रीगणपति-ध्यान-मंजरी ...................................... २४ वादनकर भगवान् शिवको प्रसन्न करना और भगवान् ४- पञ्चश्लोकिगणेशपुराणम् ...................................... २५ शिवका उन्हें गणेशजीके षडक्षरमन्त्रका उपदेश देना ... ७४ ५- सर्वकामप्रद श्रीगणेशाष्टकम् ................................. २६ १८- विष्णुका गणेशजीके षडक्षरमन्त्रका अनुष्ठान करना और ६- श्रीगणेशपञ्चरत्नस्तोत्रम् ....................................... २८ गणेशजीकी कृपासे मधु-कैटभका वध करना .......... ७६ ७- गणेशगीतोक्त परब्रह्म श्रीगणेश-तत्त्व........................ २९ १९- राजा भीमकी निःसंतानताके कारणका वर्णन ............ ७९ ८- श्रीगणेशपुराण-सूक्तिसुधा ................................... ३० २०- बालक दक्षद्वारा विघ्नविनायक गणेशजीकी स्तुति करना ९- भगवान् श्रीगणेशजीकी आरती ............................... ३४ और गणेशजीका उसे दर्शन देना .......................... ८१ सम्पादकीय २१- राजकुमार दक्षकी मुद्गलसे भेंट और मुद्गलका उसे १०- श्रीगणेशपुराण—एक अध्ययन.............................. ३५ गणेशजीके एकाक्षर मन्त्रका उपदेश देना ................ ८४ श्रीगणेशपुराण—[ पूर्वार्ध ] २२- दक्षके पूर्वजन्मकी कथाके प्रसंगमें बल्लालकी गणेश- उपासना-खण्ड भक्ति और बल्लालविनायककी महिमाका वर्णन ......... ८७ १- ऋषियों और सूतजीके संवादके प्रसंगमें गणेशजीकी २३- बल्लालके शापसे कल्याण वैश्यको अन्धत्व, बधिरत्व महिमा और राजा सोमकान्तके चरित्रका वर्णन ......... ४३ और मूकत्वकी प्राप्ति; माताकी प्रार्थनापर बल्लालद्वारा २- गलित कुष्ठसे पीड़ित राजा सोमकान्तका वनमें जानेका शापमुक्तिका उपाय बताना ................................. ९० निश्चय करना ..................................................... ४५ २४- दक्षको राज्यप्राप्तिसूचक स्वप्नका दर्शन ................. ९२ ३- राजा सोमकान्तका राजकुमार हेमकण्ठको सदाचार और २५- कौण्डिन्यनगरके राजा चन्द्रसेनकी पुत्रहीन-अवस्थामें मृत्यु, राजनीतिकी शिक्षा देना ......................................... ४७ मुद्गलमुनिका उनके उत्तराधिकारीके सम्बन्धमें निर्णय ४- सोमकान्तका वनगमन .......................................... ४९ देना ................................................................ ९३ ५- सुधर्मा-च्यवन-संवाद ........................................... ५१ २६- दक्षको राज्यकी प्राप्ति और उनकी वंश-परम्पराका ६- राजा सोमकान्तका भृगुमुनिके आश्रममें जाना ............ ५३ वर्णन ................................................................ ९५ ७- भृगुमुनिके द्वारा राजा सोमकान्तके पूर्वजन्मका २७- राजा भीमकी गणेशोपासना और गणेशजीकी कृपासे उसे वर्णन ................................................................ ५५ रुक्मांगद नामक पुत्रकी प्राप्ति .............................. ९६ ८- राजा सोमकान्तद्वारा पूर्वजन्ममें किये गये पापों तथा २८- रुक्मांगदका कुष्ठरोगसे ग्रस्त होना ........................ ९८ वृद्धावस्थामें गणेश-मन्दिरके जीर्णोद्धारका वर्णन....... ५७ २९- देवर्षि नारदका राजा रुक्मांगदको कुष्ठसे मुक्तिहेतु ९- भृगुमुनिका राजा सोमकान्तको गणेशपुराणके श्रवणका गणेशकुण्डमें स्नानकी सलाह देना........................... ९९ उपदेश देना ....................................................... ५९ ३०- इन्द्रका अहल्याके साथ छल करना ...................... १०० १०- गणेशपूजन न करनेसे व्यासजीका विघ्नोंसे अभिभूत होना ३१- गौतममुनिद्वारा अहल्या और इन्द्रको शाप ................ १०२ और ब्रह्माजीका उन्हें गणेशाराधनका उपदेश देना ..... ६१ ३२- देवताओंकी गौतममुनिसे इन्द्रके शापोद्धारहेतु प्रार्थना और ११- ब्रह्माजीका व्यासजीको गणेशजीके मन्त्रके अनुष्ठानकी गौतममुनिका उन्हें षडक्षर मन्त्रका उपदेश देना ....... १०३ विधि बताना .................................................... ६३ ३३- गणेशजीके षडक्षरमन्त्रके प्रभावसे इन्द्रको सहस्र नेत्रोंकी १२- ब्रह्मा, विष्णु और शिवको भगवान् गणेशके दर्शन ..... ६४ प्राप्ति ................................................................ १०५ १३- ब्रह्मा, विष्णु और महेशका भगवान् गणेशकी स्तुति करना ३४- इन्द्रद्वारा चिन्तामणितीर्थमें चिन्तामणि विनायककी तथा गणेशजीका अपने उदरमें स्थित असंख्य ब्रह्माण्डोंका स्थापना ......................................................... १०७ उन्हें दर्शन कराना ............................................. ६६ ३५- चिन्तामणिक्षेत्रस्थ गणेशतीर्थमें स्नानसे राजा रुक्मांगदको १४- सृष्टि करते समय विघ्नोंद्वारा बाधित ब्रह्माजीका भगवान् दिव्य देहकी प्राप्ति तथा उनका माता-पितासहित गणेशकी प्रार्थना करना ...................................... ६९ विनायकलोकको जाना ........................................ १०९ १५- ब्रह्माजीद्वारा भगवान् गणेशकी आराधना ................ ७० ३६- गृत्समदमुनिके जन्मकी कथा ................................ १११ १६- सृष्टि-वर्णन, मधु-कैटभकी उत्पत्ति और ब्रह्माजीद्वारा ३७- गृत्समदमुनिकी गणेशाराधना और वरप्राप्ति .............. ११३ Kalyana Visheshank 2021_Section_2_2_Front
[ १४ ] विषय पृष्ठ-संख्या ३८- गृत्समदकी छींकसे एक बालकका जन्म, उसके द्वारा गणेशाराधन, गणेशजीका प्रसन्न होकर त्रैलोक्य-विजयका वरदान और तीन पुर प्रदान करना .................................... ११५ ३९- त्रिपुरासुरका इन्द्रपर आक्रमणकर अमरावतीपुरीपर अधिकार कर लेना .................................................... ११८ ४०- ब्रह्मा, विष्णु और शिवका त्रिपुरासुरके भयसे अपने- अपने लोकोंसे पलायन, देवताओंद्वारा गणेशाराधन, गणेशजीका प्रकट होना, देवताओंद्वारा संकष्टनाशनस्तोत्रसे उनका स्तवन ......................................................... १२० ४१- श्रीगणेशजीका कलाधर विप्रके रूपमें त्रिपुरासुरके पास आना और उसे स्वर्ण, रजत एवं लौहसे निर्मित तीन पुर प्रदान करना ........................................................... १२४ ४२- भगवान् शंकर और त्रिपुरासुरका युद्ध ............................. १२५ ४३- त्रिपुरासुरके साथ युद्धमें भगवान् शंकरकी पराजय ...... १२७ ४४- नारदजीके निर्देशसे भगवान् शंकरका तप करके गणेशजीको प्रसन्न करना ............................................. १२९ ४५- शिवकृत गणपति स्तुति ............................................. १३१ ४६- श्रीगणेशसहस्रनामस्तोत्र ............................................. १३३ ४७- त्रिपुरदाह एवं त्रिपुरासुरका वध .................................... १४७ ४८- त्रिपुर-विजयके उपलक्ष्यमें देवताओंद्वारा त्रिपुरारि-महोत्सव (देव-दीपावली)-का आयोजन, हिमवान्का पार्वतीको गणेशजीकी महिमा बताना ........................................ १६० ४९- श्रीगणेशजीकी पार्थिव-पूजाकी विधि ........................... १६२ ५०- श्रीगणेशजीके मन्त्रोंके अनुष्ठान एवं गणेशचतुर्थीव्रतकी विधि ..................................................................... १६८ ५१- गणेशचतुर्थीव्रतानुष्ठानविधिके वर्णनके प्रसंगमें राजा कर्दमके पूर्वजन्मकी कथा .......................................... १६९ ५२- राजा नलके पूर्वजन्मका वृत्तान्त ................................. १७४ ५३- हिमवान्-पार्वती-संवादमें राजा चंद्रांगदका उपाख्यान ..... १७६ ५४- प्रजाजनोंको आश्वासन देना, रानी इंदुमतीका राजाको मृत समझकर विलाप करना तथा नारदजीके उपदेशसे गणेशचतुर्थीका व्रत करना ......................................... १७८ ५५- गणेशचतुर्थीव्रतके माहात्म्यके सन्दर्भमें राजा चंद्रांगद और रानी इंदुमतीके पुनर्मिलनकी कथा ......................... १८० ५६- गणपत्युपासनाकी महिमाके सन्दर्भमें भृशुण्डीमुनिका आख्यान ............................................................... १८२ ५७- भृशुण्डीमुनिका प्रारम्भिक जीवन, मुद्गलमुनिकी उनपर कृपा, उनकी कठोर तपस्या तथा उन्हें गणेश-सारूप्यकी प्राप्ति ..................................................................... १८४ ५८- संकष्टचतुर्थीव्रतकी महिमाके प्रसंगमें भृशुण्डीमुनिके पितरोंके उद्धारकी कथा .......................................... १८७ ५९- कृतवीर्यके पूर्वजन्मकी कथा, संकष्टचतुर्थीव्रतकी विधि और उसकी महिमा ................................................. १८८ ६०- भूमिपुत्र मंगलकी उत्पत्तिकी कथा, उसकी उग्र तपस्यासे गणेशजीका प्रसन्न होकर वर देना, अंगारकचतुर्थीव्रतकी महिमा ................................................................... १९० विषय पृष्ठ-संख्या ६१- गणेशजीद्वारा चन्द्रमाको शाप देना तथा देवताओंकी प्रार्थनापर पुनः अनुग्रह करना, चन्द्रमाद्वारा वरद विनायककी स्थापना... १९३ ६२- भाद्र शुक्ल चतुर्थीव्रतके अन्तर्गत गणेशजीको दूर्वार्पणके माहात्म्यका वर्णन .................................................... १९६ ६३- गणेश-पूजनमें दूर्वांकुरके माहात्म्यके प्रसंगमें अनलासुरके आतंकका वर्णन ...................................................... १९८ ६४- गणेशपूजनमें दूर्वांकुरके माहात्म्यके प्रसंगमें अनलासुरके शमनकी कथा ........................................................ २०० ६५- गणेशजीद्वारा राजा जनकके दानशीलताजनित अभिमानका मर्दन .................................................................... २०२ ६६- कुष्ठी ब्राह्मणके वेशमें गणेशजीका अपने भक्त द्विज- दम्पतीके यहाँ जाना और उनके द्वारा भक्तिपूर्वक प्रदत्त दूर्वांकुरमात्रसे तृप्त होना .......................................... २०४ ६७- दूर्वांकुरकी महिमाके प्रति संशयग्रस्त आश्रयाको कौण्डिन्यमुनिका इन्द्रके पास दूर्वांकुरके भारके बराबर स्वर्ण लानेके लिये भेजना और एक दूर्वांकुरपर त्रैलोक्यकी सम्पदाका भी न्यून होना ......................................... २०६ ६८- कृतवीर्यके पिताका कृतवीर्यको स्वप्नमें दर्शन देना और उसे संकष्टचतुर्थीव्रतकी पुस्तक देना ........................... २०९ ६९- देवराज इन्द्रका राजा शूरसेनसे संकष्टचतुर्थीव्रतकी विधिका निरूपण करना ....................................................... २११ ७०- संकष्टचतुर्थीव्रतकी महिमा ......................................... २१६ ७१- संकष्टचतुर्थीव्रतके उद्यापनकी विधि, संकष्टचतुर्थीव्रतके अनुष्ठानसे राजा कृतवीर्यको पुत्रप्राप्ति .......................... २१७ ७२- कृतवीर्यकी पत्नीका अंगहीन पुत्रको जन्म० देना, दत्तात्रेयजीका आना और कृतवीर्यपुत्रको गणेशजीके एकाक्षरमन्त्रका उपदेश देना, कृतवीर्यका पुत्रको गणपति- आराधनाके लिये वनमें भेजना ................................... २१९ ७३- गणेशजीकी आराधनाके प्रभावसे कार्तवीर्यको दिव्य देह और सहस्र भुजाओंकी प्राप्ति .................................... २२१ ७४- संकष्टचतुर्थीव्रतकी महिमाके सन्दर्भमें एक गलत्कुष्ठा चाण्डालीकी कथा .................................................. २२२ ७५- राजा शूरसेनका संकष्टचतुर्थीव्रत करना और उसके प्रभावसे सम्पूर्ण प्रजासहित उनको ले जानेके लिये गणेशलोकसे विमान आना .......................................................... २२४ ७६- श्रीगणेशजीके चार अक्षरवाले 'गजानन' नाम-मन्त्रके माहात्म्यमें ब्राह्मण-पुत्र बुधका आख्यान, शापवश वैश्यकुलमें उत्पन्न बुधका कुष्ठी होना और 'गजानन' नाम-मन्त्रके श्रवणसे उसे विनायकधामकी प्राप्ति ...... २२६ ७७- श्रीपरशुरामजीके आविर्भावके प्रसंगमें महर्षि जमदग्निका आख्यान, कार्तवीर्यार्जुनका महर्षि जमदग्निके आश्रममें आना और महर्षिद्वारा कामधेनुके प्रभावसे ससैन्य राजाका सत्कार करना ........................................................ २३० ७८- मुनि जमदग्निद्वारा ससैन्य राजा कार्तवीर्यका आतिथ्य; कामधेनुका अद्भुत प्रभाव देखकर राजाका बलपूर्वक उसे ग्रहण करनेकी इच्छा करना ................................. २३३ Kalyana Visheshank 2021_Section_2_2_Back
[ १५ ]
| विषय | पृष्ठ-संख्या | विषय | पृष्ठ-संख्या |
|---|---|---|---|
| ७९- जमदग्निद्वारा कामधेनुको देनेसे मना करनेपर कार्तवीर्यका क्रुद्ध होकर अपने सैनिकोंको युद्धका आदेश देना, इधर कामधेनुद्वारा अनेक वीरोंका प्रादुर्भाव और उनके द्वारा कार्तवीर्यकी सेनाका पराभव, क्रुद्ध कार्तवीर्यद्वारा महर्षि जमदग्निका वध, रेणुकाका कार्तवीर्यको शाप देना .... | २३५ | शिवकी प्रार्थना, प्रसन्न होकर शिवद्वारा उसे अनेक वरदानोंकी प्राप्ति तथा कामदेवके सदेह होनेका वरदान दिया जाना, कामदेवद्वारा गणेशजीके एकाक्षर मन्त्रका अनुष्ठान तथा गणेशजीकी आराधना...................... | २५६ |
| ८०- माता रेणुकाके स्मरण करनेपर परशुरामका आगमन, माताद्वारा सारा वृत्तान्त जानकर परशुरामका दुखी होना और माताद्वारा प्राप्त इक्कीस बार पृथ्वीको क्षत्रियविहीन बनानेकी आज्ञाको स्वीकार करना, परशुरामद्वारा माता-पिताका और्ध्वदैहिक संस्कार करना .................... | २३८ | ८९- गणेशजीद्वारा कामदेवको अनेक वरोंकी प्राप्ति, कामदेवद्वारा गणेशके महोत्कट स्वरूपकी आराधना, कामदेवका रुक्मिणीके गर्भसे प्रद्युम्नके रूपमें जन्म, शम्बरासुरद्वारा उस बालकका हरण, गणेशजीके कृपाप्रसादसे प्रद्युम्नद्वारा शम्बरासुरका वध और द्वारकापुरीको प्रस्थान, शंकरजीका शेषनागके दर्पको भंग करना ............................ | २५९ |
| ८१- परशुरामका माता-पिताका दाह-संस्कार करके महर्षि दत्तात्रेयजीको आमन्त्रित करने उनके आश्रमपर जाना और अपने आगमनका प्रयोजन बताना, तदनन्तर दोनोंका वापस आश्रमपर आना, दत्तात्रेयजीके निर्देशानुसार परशुरामद्वारा त्रयोदशाहपर्यन्त अपने माता-पिताका और्ध्वदैहिक संस्कार सम्पन्न करना और पिता-माताकी सद्गति ............. | २३९ | ९०- देवर्षि नारदजीका शेषनागको गणेशोपासनाकी दीक्षा देना, शेषनागद्वारा षडक्षर मन्त्रका अनुष्ठान, प्रसन्न होकर गणेशजीका उन्हें दिव्यरूपमें दर्शन देना, शेषनागद्वारा गणेश-स्तवन और अनेक वरोंकी प्राप्ति, गणेशजीकी कृपासे शेषनागका सहस्र सिरवाला होना, शेषनागका धरणीधर नामसे गणेश-प्रतिमाकी प्रतिष्ठा करना ...... | २६२ |
| ८२- परशुरामजीद्वारा पूछे जानेपर माता रेणुकाद्वारा कार्तवीर्य-विजयका उपाय बतलाना, परशुरामद्वारा महादेवजीकी आराधनासे उन्हें गणेशजीके षडक्षरमन्त्रका उपदेश प्राप्त होना, मन्त्रजपसे गणेशजीका उन्हें दर्शन देना, गणेशजीका उन्हें अपना परशु प्रदान करना और परशुराम नामकी प्रसिद्धि, परशुरामद्वारा कार्तवीर्यका वध तथा इक्कीस बार पृथिवीको क्षत्रियविहीन बनाना .......................... | २४१ | ९१- गणेशजीकी आज्ञासे ब्रह्माजीद्वारा सात मानस पुत्रोंकी सृष्टि, ब्रह्मपुत्र कश्यपद्वारा गणेशजीकी आराधना और विविध वरोंकी प्राप्ति, कश्यपपत्नियोंसे सृष्टिका विस्तार, कश्यपपुत्रोंद्वारा गणेशजीकी स्तुति ...................... | २६५ |
| ८३- तारकासुरका आख्यान, ब्रह्माजीसे वरप्राप्त तारकासुरका अत्याचार, देवोंद्वारा भगवान् शिवकी स्तुति, भगवती उमाका प्रकट होकर तारकासुरके वधका उपाय बताना, देवताओंद्वारा कामदेवका आवाहन, कामदेवका शिवको विचलित करनेके लिये प्रस्थान ..................................... | २४४ | ९२- देवताओंको गणेशजीसे अनेक वरदानोंकी प्राप्ति, देवताओं आदिद्वारा गणेशजीकी द्वादश मूर्तियोंकी स्थापना, गणेशजीके सुमुख आदि द्वादश नामोंके स्मरणका माहात्म्य, उपासनाखण्डके श्रवणकी महिमा तथा उपासनाखण्डका उपसंहार .................................................... | २६८ |
| ८४- कामदेवद्वारा समाधिस्थ भगवान् शंकरको विचलित करना, उनकी नेत्राग्निसे कामका दग्ध होना, पार्वतीद्वारा शंकरकी स्तुति तथा शिव-पार्वतीका कैलासगमन ............... | २४७ | श्रीगणेशपुराण — [ उत्तरार्ध ]<br>क्रीडा-खण्ड<br>१- देवान्तक और नरान्तकका जन्म तथा नारदजीका उन्हें पंचाक्षरी महाविद्याका उपदेश देना ...................... | २७१ |
| ८५- भगवान् शिव-पार्वतीका क्रीडा-विहार, देवताओंकी प्रार्थनापर अग्निदेवका भिक्षुकरूपमें उनके समीप जाकर भिक्षाकी याचना करना, माता पार्वतीका भिक्षाके रूपमें उन्हें शिवतेज प्रदान करना, अग्निदेवद्वारा उस तेजको गंगामें प्रवाहित करना, छः कृत्तिकाओंद्वारा शिवतेजका धारण और षण्मुखका प्रादुर्भाव ................................. | २४८ | २- देवान्तक और नरान्तककी तपस्यासे प्रसन्न होकर शिवका प्रकट होना और उन्हें वरदान देना ..................... | २७३ |
| ३- देवान्तककी देवलोकपर विजय ......................... | २७५ | ||
| ४- नरान्तककी भूलोक और नागलोकपर विजय ............ | २७८ | ||
| ८६- ब्रह्मा तथा बृहस्पतिद्वारा स्कन्दका नामकरण, देवताओंद्वारा स्कन्दका 'सेनापति' पदपर अभिषेक, स्कन्दका वरद-चतुर्थीके माहात्म्यके विषयमें शिवजीसे प्रश्न करना ... | २५१ | ५- अदितिकी तपस्यासे प्रसन्न गणेशजीका उनके पुत्ररूपमें जन्म ग्रहण करनेकी स्वीकृति देना ...................... | २७९ |
| ८७- वरदचतुर्थीव्रतका विधान, शिवजीके उपदेशसे स्कन्दद्वारा वरदचतुर्थीव्रतका प्रत्यक्ष अनुष्ठान, कार्तिकेयको लक्ष्य-विनायक गणेशजीके दिव्य स्वरूपका दर्शन और अनेक वरदानोंकी प्राप्ति, कार्तिकेयद्वारा लक्ष्य-विनायक गणेशकी प्रतिमाकी स्थापना और तारकासुरका वध .............. | २५३ | ६- दैत्योंके भारसे पीड़ित पृथ्वीका ब्रह्माजीके पास जाकर अपनी व्यथा बताना, ब्रह्मादि देवताओंद्वारा परमात्मा गणेशसे अवतार धारण करनेकी प्रार्थना करना, देवी अदिति और कश्यपके पुत्ररूपमें गणेशजीका अवतरण, कश्यपद्वारा उनके जातकर्मादि संस्कार करना और 'महोत्कट' यह नाम रखना .............................. | २८१ |
| ८८- कामदेवके दग्ध किये जानेपर कामपत्नी रतिद्वारा भगवान् | ७- वसिष्ठ आदि ऋषियोंका बालक महोत्कटका दर्शन करनेके लिये कश्यपजीके आश्रममें आना, विरजा राक्षसीद्वारा बालक महोत्कटका अपहरण, बालकका विरजा राक्षसीका उद्धारकर अपने धाम भेजना, कश्यपद्वारा अदितिको बालककी रक्षा करते रहनेका आदेश देना .............. | २८४ |
[ १६ ] विषय | पृष्ठ-संख्या ८- गणेशजीकी बाललीलाके सन्दर्भमें उद्धत तथा धुन्धुर नामक दैत्योंके वधकी कथा और चित्र नामक गन्धर्वके उद्धारका आख्यान ............................................... २८६ ९- हाहा-हूहू तथा तुम्बुरु नामक गन्धर्वोंका कश्यपमुनिके आश्रममें आना, गन्धर्वोंद्वारा पंच-देवोंका पूजन, बालक गणेशद्वारा लीलापूर्वक पंचदेवोंकी मूर्तियोंको अदृश्य कर देना, माताको अपने मुखमें समस्त ब्रह्माण्डको प्रतिष्ठित दिखाना तथा गन्धर्वोंको विश्वात्मारूप दिखाकर उनके भ्रमको निवारित करना, गन्धर्वोंद्वारा गणेश-स्तवन .... २८८ १०- बालक गणेशद्वारा विघातादि राक्षसोंका उद्धार, बालक गणेशके यज्ञोपवीत-संस्कारका वर्णन, विविध देवोंद्वारा उन्हें अनेक नाम तथा विविध उपहार प्रदान करना ..... २९० ११- महर्षि कश्यपजीद्वारा इन्द्रको बालक गणेशके अद्भुत कर्मोंको बताना, इन्द्रकी आज्ञासे वायु तथा अग्निद्वारा बालक गणेशकी परीक्षा, गणेशका विराट् रूप धारणकर इन्द्रको दिखाना, इन्द्रका भयभीत होकर उनकी स्तुति करना, इन्द्रकृत स्तुतिका माहात्म्य ......................... २९२ १२- काशीनरेशका मुनि कश्यपके आश्रममें आगमन और अपने पुत्रका विवाह सम्पादित करवानेकी प्रार्थना करना, मुनि कश्यपद्वारा बालक विनायकको काशिराजके साथ भेजना, मार्गमें विनायकद्वारा धूम्राक्ष राक्षसका वध एवं उसके दोनों पुत्रोंको उड़ाकर नरान्तकके पास भेजना, नरान्तकका दूतोंको युद्धका आदेश, विनायकद्वारा निशाचरोंका वध ................................................ २९५ १३- दूतोंका अपने राजा नरान्तकसे बालक विनायकके पराक्रमका वर्णन करना, काशिराजसहित बालक विनायकका काशीनगरीमें प्रवेश, काशीवासियोंको विविध रूपोंमें विनायकका दर्शन, बालक विनायकके वधकी दृष्टिसे वहाँ आये विघण्ट तथा दन्तुर आदि अनेक राक्षसोंका वध, काशिराजद्वारा विनायकका पूजन तथा सत्कार ... २९८ १४- धर्मदत्त नामक ब्राह्मणका काशिराजके यहाँ आना और विनायककी स्तुति करना, विनायकका धर्मदत्तके साथ उनके घरको प्रस्थान, मार्गमें आये काम-क्रोध नामक राक्षसोंका विनायकद्वारा वध, विनायककी बाललीलाके प्रसंगमें मदोन्मत्त हाथीका वध, धर्मदत्तद्वारा सिद्धि तथा बुद्धि नामक दो कन्याओंको विनायकको सौंपना, विनायकद्वारा जृम्भा राक्षसीका वध, विनायकके बालचरितके श्रवणकी महिमा ............................... ३०१ १५- काशीनरेशद्वारा अपनी सभामें विनायकके अद्भुत कर्मोंका वर्णन, ज्वालामुख, व्याघ्रमुख तथा दारुण नामक राक्षसोंका काशीपुरीको दग्ध करना, बालक विनायकके द्वारा तीनों असुरोंका वध तथा काशीपुरीको पूर्ववत् बना देना और राजाद्वारा विनायककी स्तुति ................................ ३०४ १६- काशिराजका दण्डकारण्यमें महर्षि भृशुण्डीके आश्रममें गमन, काशिराज तथा गजाननके अनन्य भक्त भृशुण्डीका वार्तालाप ........................................................... ३०७ विषय | पृष्ठ-संख्या १७- काशिराज तथा गजाननभक्त मुनि भृशुण्डीको विनायकद्वारा अपने यथार्थ स्वरूपका दर्शन कराना, विनायकके 'आशापूरक' नामकी प्रसिद्धि .............................. ३०९ १८- बालक विनायकके बालचरितके वर्णन-प्रसंगमें एक दैत्यका ज्योतिषी बनकर काशिराजके दरबारमें आना और विनायकद्वारा उसका वध .................................... ३१२ १९- विनायककी बाललीलाके प्रसंगमें दैत्य नरान्तकद्वारा दो दैत्यों कूप तथा कन्दरको काशीनगरीमें भेजना, कूपका कुआँ और मेढक बनकर तथा कन्दरका बालक बनकर विनायकको मारनेका प्रयत्न करना, विनायकद्वारा लीलापूर्वक दोनोंका परस्पर वध कराना ................................ ३१५ २०- बालक विनायककी बाललीलाके सन्दर्भमें विनायकद्वारा अन्धासुर आदि तीन दैत्योंके वधका वर्णन ............ ३१७ २१- भ्रमरा राक्षसीका अदितिका रूप धारणकर बालक विनायकके पास आना, बालक विनायकद्वारा उसका वध, देवताओं आदिके द्वारा विनायककी स्तुति .............. ३२० २२- काशीनगरीके निवासियों तथा शुक्ल नामक ब्राह्मणद्वारा विनायकको अपने-अपने घर ले जानेके लिये राजासे प्रार्थना करना और स्वीकृति प्राप्तकर विनायकके स्वागतकी तैयारी करना ..................................................... ३२४ २३- कुमार सनक तथा सनन्दनका बालक विनायकके दर्शनके लिये काशीनरेशकी सभामें आना, बालक विनायकका शुक्ल नामक ब्राह्मणके घरमें उसका आतिथ्य स्वीकार करने जाना तथा शुक्ल-दम्पतीको विविध वरोंकी प्राप्ति .................................................... ३२६ २४- काशीनगरीमें विनायकके द्वारा एक ही समयमें अनेक घरोंमें भोजनादि सम्पन्न करना तथा सनक-सनन्दनको अपने विविध स्वरूपोंका दर्शन कराकर विवेकज्ञानकी प्राप्ति कराना ..................................................... ३२९ २५- कुमार सनक तथा सनन्दनद्वारा की गयी विनायक-स्तुति, उनके द्वारा काशीमें गणेशकुण्डका निर्माण तथा मन्दिर बनाकर उसमें वरदविनायक नामक विनायक-मूर्तिकी प्रतिष्ठा, भक्तिकी महिमा .................................... ३३२ २६- व्याध तथा राक्षसद्वारा अनजानेमें ही गणेशजीके ऊपर शमीपत्रके गिर जानेसे प्रसन्न विनायकद्वारा उन दोनोंको अपने लोककी प्राप्ति कराना................................... ३३३ २७- भीम नामक व्याध और राक्षसके पूर्वजन्मका वृत्तान्त ............................................................ ३३५ २८- राजा साम्ब तथा दुष्टबुद्धिके जन्म-जन्मान्तरोंकी कथा, उनके द्वारा अनजानेमें किये गये शमीपत्रके पूजनसे गजाननका प्रसन्न होकर उन्हें दिव्य देह प्राप्त कराकर स्वर्गलोक प्राप्त कराना ........................................ ३३६ २९- महर्षि कश्यपकी पत्नी दिति तथा अदितिके वंशका वर्णन, हिरण्याक्ष तथा हिरण्यकशिपुकी उत्पत्तिका वर्णन, उनकी तपस्या तथा उन्हें वरदानकी प्राप्ति, प्रह्लादपुत्र विरोचनके वधका आख्यान ............................................... ३३८
[ १७ ] विषय पृष्ठ-संख्या ३०- विष्णुभक्त राजा बलिका आख्यान, बलिके द्वारा सौवाँ अश्वमेधयज्ञ करनेपर इन्द्रका चिन्तित होना तथा भगवान् विष्णुको अपनी चिन्ता निवेदित करना, भगवान् विष्णुद्वारा अदितिके गर्भसे वामनरूपमें प्रकट होना .................... ३४१ ३१- पिता कश्यपमुनिसे वामनको गणेशाराधनाका उपदेश प्राप्त होना, वामनद्वारा गणेशकी आराधना, गणेशका प्रकट होकर वामनको दर्शन और अनेक वर देना, वामन-भगवान्द्वारा बलिके यज्ञमें पधारना और तीन पग भूमिका दान प्राप्तकर अपने भक्त बलिको पाताल भेजना, वामनद्वारा स्थापित सुमुख नामक गणेश- प्रतिमाका माहात्म्य ................................................ ३४३ ३२-गणेशाराधनामें शमीका माहात्म्य, राजा प्रियव्रतका आख्यान, उनकी ज्येष्ठ पत्नी कीर्तिद्वारा गणेशजीकी आराधना ........................................................... ३४६ ३३-प्रियव्रतकी पत्नी कीर्तिद्वारा शमीपत्रोंसे विनायकका पूजन, स्वप्नमें कीर्तिको अनेक वरदानोंकी प्राप्ति, वरदानके प्रभावसे राजा प्रियव्रतका कीर्तिको धर्मपत्नीरूपमें स्वीकार कर लेना, यथासमय कीर्तिको 'क्षिप्तप्रसादन' नामक पुत्रकी प्राप्ति और सपत्नीद्वारा उसे विष देना, महर्षि गृत्समदद्वारा पुत्रको जिला देना, शमीका माहात्म्य ..................... ३४९ ३४-महर्षि भृशुण्डीके शापसे ब्राह्मण और्वकी पुत्री शमीकाका शमीवृक्षकी तथा महर्षि शौनकके शिष्य धौम्यपुत्र मन्दारका मन्दारवृक्षकी योनि प्राप्त करनेका आख्यान ............ ३५१ ३५-महर्षि शौनक तथा ब्राह्मण और्वके समक्ष भगवान् गजाननका प्राकट्य और उन्हें शमी तथा मन्दारके माहात्म्यको बतलाना ........................................ ३५४ ३६-गजाननकी पूजा किये बिना यज्ञारम्भ करनेपर विश्वस्वरूप देवी सावित्रीका रुष्ट होना और उन देवों तथा मुनियोंको जलरूप (नदीरूप) प्राप्त करनेका शाप देना, पुनः ब्रह्माजीके कहनेपर देवपत्नियोंका शमीपत्रद्वारा गणेशजीका पूजन करना, प्रसन्न होकर गजाननका उन्हें दर्शन देना ....... ३५६ ३७-देवपत्नियोंद्वारा की गयी गजाननस्तुति, गजाननसे वर प्राप्तकर देवोंको पुनः अपने पूर्ववत् स्वरूपकी प्राप्ति, देवताओंद्वारा हेरम्बगणपतिकी मूर्तिका शमीपत्रोंद्वारा पूजन, ब्रह्माजीद्वारा मन्दारकाष्ठसे निर्मित गणेशप्रतिमाका शमीपत्रोंद्वारा पूजन, मन्दार तथा शमीके माहात्म्यका वर्णन .................. ३५८ ३८-रानी कीर्तिके पुत्रको महर्षि गृत्समदद्वारा गणेशजीके 'ढुंढिराज' नामक चतुरक्षर मन्त्रका उपदेश, ढुंढिराज गणेशका माहात्म्य, काशीविश्वनाथ तथा गंगाजीकी महिमा, भस्मासुरपुत्र दुरासदद्वारा शंकरजीकी आराधना और वरप्राप्ति ...................................................... ३६० ३९-भस्मासुरपुत्र दुरासदद्वारा भूमण्डल तथा देवलोकमें विजय प्राप्त करना, भस्मासुरका शिवसे वरदान प्राप्त करना, मोहिनीरूप भगवान् विष्णुकी युक्तिसे उसका भस्म होना, दुरासदका अविमुक्तक्षेत्र काशीपुरीमें आना, दुरासदके अत्याचारोंका वर्णन............................................. ३६४
विषय पृष्ठ-संख्या ४०-दुरासददैत्यके वधका निवेदन करनेके लिये देवताओं तथा ऋषियोंका केदारक्षेत्रमें भगवान् शिव एवं पार्वतीके पास जाना, देवोंद्वारा भगवतीकी स्तुति, भगवतीके मुखमण्डलसे गजाननका प्राकट्य, देवीका उनका 'वक्रतुण्ड' नाम रखना ........................................... ३६६ ४१-विनायकदेव और दैत्य दुरासदका युद्ध, भयभीत दैत्य दुरासदका युद्धक्षेत्रसे वापस लौटना ........................ ३६८ ४२- दैत्य दुरासदद्वारा पुनः विनायकसे युद्ध, विनायकद्वारा अपने तेजसे छप्पन विनायकोंको प्रकट करना, विनायकोंद्वारा सम्पूर्ण सेनाके मारे जानेपर दुरासदद्वारा भगवान् शंकरसे प्राप्त वरदानका स्मरण करना, विनायकद्वारा योगबलसे विराट् रूप धारणकर एक पैर काशीमें तथा दूसरा पैर दुरासदके सिरपर रखकर उसे काशीके द्वारके रूपमें काशीमें प्रतिष्ठित करना और स्वयं भी 'एकपाद विनायक'के नामसे काशीमें स्थित होना ................................... ३७० ४३-देवताओं तथा मुनियोंद्वारा ढुंढिराज गणेश तथा छप्पन विनायकोंकी स्तुति तथा पूजाका वर्णन ................. ३७२ ४४- मुनि गृत्समदद्वारा रानी कीर्तिसे विनायकदेवकी महिमाका कथन, काशीमें राजा दिवोदासके राज्य-शासनका वर्णन .............................................................. ३७३ ४५- शंकरजीका सभी देवताओंको लेकर मन्दरगिरिपर जाना, राजा दिवोदासका काशीमें राज्य करना, भगवान् शिवका दिवोदासके विकार देखनेके लिये देवताओं तथा ऋषियोंको काशी भेजना, किंतु दिवोदासको निर्विकार देखकर उन सभीका काशीमें स्थित हो जाना, फलस्वरूप शिवका काशीदर्शनके लिये चिन्तित होना ........................... ३७४ ४६- भगवान् शिवद्वारा ढुंढिराज गणेशसे काशी जानेकी प्रार्थना करना, ढुंढिराजका एक मायावी ज्योतिषीके रूपमें काशी जाना तथा वहाँकि स्त्री-पुरुषों एवं राजा दिवोदासको भी अपनी भविष्यवाणियोंसे मोहित करना................ ३७९ ४७- भगवान् विष्णुद्वारा बौद्धरूप धारणकर काशीनिवासियोंको उपदेश प्रदान करना, काशीमें अधर्माचरणकी वृद्धि, भगवान् विष्णुका अपने चतुर्भुजरूपमें दिवोदासको दर्शन देना और अनेक वर प्रदान करना तथा शिवके काशी- आगमनके लिये दूतद्वारा सन्देश भेजना, दिवोदासद्वारा काशीका राज्य त्यागकर तपस्यामें निरत होना .......... ३८१ ४८- ढुंढिराजका शिवको काशीमें आनेके लिये सन्देश भेजना, भगवान् शिवका काशीमें आकर ढुंढिराजकी स्तुति करना तथा ढुंढिराजकी महिमाका प्रतिपादन करना, रानी कीर्तिका काशी आकर ढुंढिराजकी भक्ति करना, ढुंढिराजका प्रत्यक्ष दर्शन देकर उसे तथा उसके पुत्रको अनेक वर प्रदानकर कीर्तिपुत्रका 'पर्शुबाहु' नामकरण करना .............................................................. ३८३ ४९- कीर्तिके पुत्रका राज्याभिषेक, ब्रह्माजीद्वारा विनायकलोकका तथा उसकी महिमाका वर्णन, विनायकके भक्तोंको विनायकलोककी प्राप्ति ........................................ ३८७
[ १८ ] विषय पृष्ठ-संख्या ५०- महर्षि मुद्गलद्वारा काशिराजको विनायकके लोक 'स्वानन्दभुवन' का परिचय बताना तथा सदैव वहाँ विद्यमान रहनेवाले विनायकके स्वरूपका निरूपण करना, मुद्गलजीके उपदेशसे काशिराजद्वारा गणेशोपासना और अन्तमें विनायक-लोकको प्राप्त करना .................... ३८९ ५१- काशिराजके गणपतिधामगमनका वर्णन .......... ३९२ ५२- काशिराजका विभिन्न लोकोंका दर्शन करते हुए गणपतिधाममें पहुँचना .......... ३९४ ५३- काशिराजका गणपतिधाममें भगवान् विनायकका दर्शन करना और उनकी स्तुति करना .......... ३९७ ५४- काशीमें 'वरदविनायक' की स्थापना.......... ४०० ५५- भगवान् विनायकका अपने भक्त ब्राह्मण शुक्लको सर्ववैभवसम्पन्न भवन प्रदान करना .......... ४०३ ५६- नरान्तकका काशीपुरीपर आक्रमण करनेके लिये प्रस्थान .......... ४०६ ५७- काशिराजकी पराजय और नरान्तकका उन्हें बन्दी बना लेना .......... ४०८ ५८- काशिराजकी पत्नीका विलाप करना और विनायककी सिद्धि नामक शक्तिका विशाल सेना और क्रूर नामक कालपुरुषको प्रकट करना, कालपुरुषद्वारा नरान्तककी सेनाका भक्षणकर उसे विनायकके पास ले आना....... ४११ ५९- काशिराजकी नरान्तकसे मुक्ति .......... ४१३ ६०- भगवान् विनायक और नरान्तकका युद्ध .......... ४१५ ६१- भगवान् विनायकद्वारा नरान्तकका वध .......... ४१८ ६२- नरान्तकके सिरको लेकर उसके माता-पिताका देवान्तकके पास जाना और देवान्तकका काशिराजकी नगरीपर आक्रमण करना .......... ४२० ६३- अणिमादि सिद्धियोंकी सेनाका देवान्तककी सेनासे युद्ध. ४२३ ६४- देवान्तकसे युद्धमें सिद्धिसैनाकी पराजय .......... ४२५ ६५- विनायकका बुद्धिको युद्धके लिये भेजना, बुद्धिद्वारा एक भयंकर शक्तिका प्राकट्य और उस शक्तिद्वारा देवान्तककी सेनाका संहार .......... ४२६ ६६- देवान्तकका अघोरमन्त्रसे हवनकर दिव्य अश्व पाना और उसपर आरूढ़ हो रणक्षेत्रमें जाना तथा सिद्धियोंकी सम्पूर्ण सेनाका संहार कर डालना .......... ४२८ ६७- विनायक और देवान्तकका युद्ध .......... ४३० ६८- विनायक और देवान्तकके युद्धका वर्णन .......... ४३१ ६९- विनायक और देवान्तकके युद्धका वर्णन .......... ४३४ ७०- देवान्तक-वध .......... ४३६ ७१- काशिराजका अपने सभासदोंसे वार्तालाप, मगधराजकी कन्याके साथ काशिराजके पुत्रका विवाह, विनायकको साथ लेकर काशिराजका महर्षि कश्यपके आश्रममें गमन, पुरवासियोंका वियोगमें व्यथित होना तथा विनायकद्वारा उन्हें पुनः आनेका आश्वासन देना .......... ४३७ ७२- विनायकका पिता कश्यपके आश्रममें आगमन, काशिराजद्वारा विनायककी महिमाका कथन, काशिराजका काशीमें प्रत्यागमन विषय पृष्ठ-संख्या तथा ढुण्ढिविनायककी स्थापना, माता अदिति तथा पिता कश्यपको आश्वासन देकर विनायकका निजलोकगमन .. ४३९ ७३- गण्डकीनगराधिपति राजा चक्रपाणिका आख्यान, निःसंतान राजाको महर्षि शौनकद्वारा पुत्रप्राप्तिके लिये सौरव्रतके अनुष्ठानका उपदेश करना, राजा-रानीद्वारा सम्यग् रूपसे सौरव्रतके नियमोंका पालन, भगवान् सूर्यद्वारा स्वप्नमें रानीको पुत्रकी प्राप्ति, रानीद्वारा गर्भके तापको सहन न कर सकनेके कारण समुद्रमें उसका त्याग .......... ४४२ ७४- राजा चक्रपाणिके पुत्र सिन्धुद्वारा भगवान् सूर्यकी आराधना और उनसे विभिन्न वरोंकी प्राप्ति .......... ४४५ ७५- दैत्यराज सिन्धुका आख्यान, सिन्धुद्वारा दिग्विजयसे सम्पूर्ण पृथ्वीको विजित करना, अमरावतीपर आधिपत्य और स्वयं इन्द्रासनपर विराजमान होना .......... ४४८ ७६- सिन्धुसेनासे पराजित देवोंका वैकुण्ठलोकमें विष्णुकी शरणमें जाना, देवताओंको आश्वस्तकर भगवान् विष्णुका गरुड़पर आरूढ़ हो देवताओंसहित वहाँ आना, दैत्यसेना तथा देवसेनाका युद्ध .......... ४५० ७७- सिन्धुदैत्यका देवताओंको पराजित करना, विष्णुका उसके पराक्रमसे प्रसन्न हो वरदानके रूपमें देवोंसहित उसके नगर गण्डकीपुरमें रहना, विष्णुका देवताओंको आश्वस्त करना, दुष्ट सिन्धुदैत्यद्वारा किये गये अधर्माचरणका वर्णन ....... ४५२ ७८- बृहस्पतिके कथनानुसार देवताओंका माघमासके कृष्ण- पक्षकी चतुर्थी तिथिको संकटचतुर्थीव्रत करना तथा स्तुतिद्वारा विनायकदेवको प्रसन्न करना, संकटहरस्तोत्रकी महिमा, प्रसन्न हो विनायकदेवका देवोंको वरदान देना और चारों युगोंमें होनेवाले अपने स्वरूपका परिचय देना .......... ४५३ ७९- भगवान् शिवका गौरी तथा गणोंसहित त्रिसन्ध्याक्षेत्रमें गमन, भगवान् शिवद्वारा गौरीको गणेशजीके माहात्म्यका प्रतिपादन और उन्हें गणेशाराधनाका उपदेश, देवी पार्वतीका तपस्या करनेके लिये लेखनाद्रिपर्वतपर गमन .......... ४५६ ८०- पार्वतीजीका लेखनाद्रिपर्वतपर बारह वर्षतक तपस्या करना, प्रसन्न हुए भगवान् गणेशका प्रकट होकर दर्शन देना, गौरीका उन्हें पुत्ररूपमें प्राप्त करनेका वर माँगना और गणेशजीका उन्हें आश्वासन देना, पार्वतीजीद्वारा सिद्धिक्षेत्रमें प्रासाद तथा गणेशप्रतिमाकी प्रतिष्ठा करना, पुनः त्रिसन्ध्याक्षेत्रमें आकर भगवान् शिवको सम्पूर्ण वृत्तान्त निवेदित करना, शिव-पार्वती दोनोंका प्रसन्न होना..... ४५८ ८१- पार्वतीका भाद्रमासकी चतुर्थीको गणेशकी पार्थिव प्रतिमा बनाकर पूजन करना, भगवान् गणेशका उस पार्थिव प्रतिमासे प्रकट होना .......... ४६० ८२- शंकरद्वारा गौरीपुत्र गणेशकी महिमाका कथन, गणेशका प्रादुर्भाव, गौरीपुत्रका 'गणेश' यह नामकरण, गणेशचतुर्थी तिथिका माहात्म्य, सिन्धुदैत्यको दूतोंद्वारा गणेशके अवतारका वृत्तान्त ज्ञात होना, सिन्धुके दूतोंका त्रिसन्ध्याक्षेत्रमें जाकर गुप्तरूपसे निवास करना और गणेशके वधकलिये प्रयत्नशील होना .......... ४६२
[ १९ ]
| विषय | पृष्ठ-संख्या | विषय | पृष्ठ-संख्या |
|---|---|---|---|
| ८३- पार्वतीको पुत्रकी प्राप्ति होनेपर हिमवान्का शिशुके दर्शनके | सुनाना, विश्वकर्माका प्रस्थान, उसी समय वृकासुर | ||
| लिये आना और उसे अनेक प्रकारसे आभूषणोंसे अलंकृतकर | दैत्यका वहाँ आना, गुणेशद्वारा असुरका वध ........ | ४९४ | |
| उसका 'हेरम्ब' यह नाम रखना, फिर हिमालयका प्रस्थान, | ९६- सातवें वर्षमें गुणेशका यज्ञोपवीत-संस्कार सम्पन्न | ||
| गृध्रासुरद्वारा बालक हेरम्बका हरणकर आकाशमें ले चलना, | होना, यज्ञोपवीत-महोत्सवका वर्णन, उसी अन्तरालमें | ||
| पार्वतीका शोक, बालक हेरम्बद्वारा गृध्रासुरका वध ..... | ४६५ | वहाँ आये कृतान्त तथा काल नामक दैत्योंका वध | |
| ८४- बालक हेरम्बकी बाल-लीलाद्वारा क्षेम, कुशल, क्रूर | करना, महर्षि कश्यप तथा अदितिद्वारा गुणेश्वरका | ||
| तथा बालासुर आदि दैत्योंके वधका आख्यान ........... | ४६७ | पूजन, देवताओंद्वारा बालक गुणेश्वरकी महिमाका | |
| ८५- महर्षि मरीचिका पार्वतीपुत्रका दर्शन करनेके लिये आना, | प्रतिपादन ................................................................ | ४९८ | |
| मरीचिद्वारा देवी पार्वतीसे विनायकके परब्रह्मस्वरूपका | ९७- माता कद्रूका अपने पुत्र शेषनागके पास पातालमें जाना | ||
| प्रतिपादन, बालककी रक्षाके लिये महर्षिका गणेशकवच | और विनता तथा गरुड़द्वारा हुए अपने अपमानका बदला | ||
| बतलाना, गणेशकवचका माहात्म्य तथा उसकी उपदेश- | लेनेके लिये कहना, वासुकि आदि नागों तथा गरुड़ | ||
| परम्परा ................................................................ | ४७० | आदि पक्षियोंका घनघोर युद्ध, नागोंद्वारा विनता और | |
| ८६- गौतम आदि महर्षियोंद्वारा पार्वतीपुत्रका भूमि-उपवेशन नामक | उनके पुत्रोंको बन्धनमें डालना, विनताद्वारा मुनि कश्यपको | ||
| संस्कार सम्पन्न किया जाना, बालकके वधकी इच्छासे | अपना दुःख निवेदित करना और कश्यपद्वारा उसे एक | ||
| व्योमासुरका वहाँ आना, बालकद्वारा व्योमासुरका वध... | ४७२ | अभेद्य अण्डकी उत्पत्तिका आश्वासन देना ............... | ५०२ |
| ८७- बालक विनायकद्वारा शतमाहिषा नामक राक्षसी और | ९८- आठवें वर्षमें गुणेश्वरद्वारा विचित्र दैत्यका वध और | ||
| कमठासुरका वध, इस आख्यानके श्रवण और श्रावणका | विनताके गर्भसे उत्पन्न अण्डका भेदन, उसमेंसे मयूर | ||
| माहात्म्य ................................................................ | ४७४ | नामक पक्षीका प्राकट्य, विनताद्वारा गुणेश्वरकी स्तुति, | |
| ८८- आठवें मासमें बालक गुणेशद्वारा किये गये तल्पासुर | गुणेश्वरका मयूरको अपना वाहन बनाना और मयूरेश्वर | ||
| एवं दुन्दुभि नामक दैत्योंके वधका आख्यान ........... | ४७७ | नामसे प्रसिद्ध होना .................................................. | ५०५ |
| ८९- दसवें मास तथा ग्यारहवें मासकी अवस्थामें बालक | ९९- नौवें वर्षमें गुणेश्वरका बालकोंके साथ जलक्रीडा | ||
| गुणेशद्वारा किये गये आजगरासुर तथा शलभासुर | करना, गुणेशद्वारा अश्वरूपी दैत्यका वध, नागकन्याओंका | ||
| नामक दैत्योंके वधकी कथा .................................. | ४७९ | गुणेशको नागलोक ले जाना, भगासुर | |
| ९०- बालक गुणेशके द्वारा बारहवें मासमें नूपुर तथा | नामक दैत्यके वधकी कथा .................................. | ५०७ | |
| अविपुत्र नामक दैत्योंका वध ................................... | ४८१ | १००- नागलोकमें नागकन्याओंद्वारा मयूरेश्वरका स्वागत-सत्कार, | |
| ९१- बालक गुणेशद्वारा कूट तथा मत्स्य आदि रूप धारण | नागराज वासुकिको मयूरेश्वरद्वारा आभूषणके रूपमें धारण | ||
| करनेवाले दैत्योंके वधकी लीला-कथा .................... | ४८४ | करना, सर्पों तथा मयूरका युद्ध, शेषनागको आभूषणके रूपमें | |
| ९२- चार वर्षकी अवस्थावाले बालक गुणेशके द्वारा दैत्य | धारण करना, शेषनागद्वारा मयूरेशकी स्तुति, शेषनागद्वारा | ||
| कर्दमासुरका वध, गुणेशद्वारा माता पार्वतीको अपने | सम्पाती आदिको बन्धन-मुक्त करना, मयूरेश्वरका नागलोकसे | ||
| मुखके भीतर समस्त विश्वका दर्शन कराना, माताद्वारा | धरतीपर आना, भगासुरसे बालकोंको मुक्त कराकर वापस | ||
| गुणेशकी स्तुति ........................................................ | ४८७ | घरमें आना और अपनी माया दिखाना ....................... | ५११ |
| ९३- गुणेशके पाँचवें वर्षमें खड्गासुरका ऊँटका रूप बनाकर | १०१- मयूरेश्वरद्वारा दसवें वर्षमें दैत्य कमलासुरकी सेनाका | ||
| तथा चंचल दैत्यका छायाका रूप धारणकर गुणेशकी | वध, मरे हुए सैनिकोंका मयूरेश्वरकी कृपासे मुक्ति | ||
| बालमण्डलीमें आना, गुणेशद्वारा लीलापूर्वक उनका | प्राप्त करना .............................................................. | ५१४ | |
| वध करना ............................................................. | ४९० | १०२- दैत्य कमलासुर और मयूरेश्वरके युद्धका वर्णन ...... | ५१६ |
| ९४- मुनिबालकोंके साथ गुणेशका महर्षि गौतम तथा | १०३- कमलासुर और मयूरेशका भीषण युद्ध, कमलासुरके | ||
| अहल्याके आश्रममें जाकर ओदन-क्रीडा करना, | रक्तबिन्दुओंसे अनेक दैत्योंकी उत्पत्ति, देवी सिद्धि- | ||
| पार्वतीद्वारा गुणेशको बन्धनमें डालना तथा उनकी | बुद्धिकी सेनाके सैनिकोंद्वारा उन असुरोंका भक्षण, | ||
| मायासे मोहित होना, महर्षि गौतमद्वारा अहल्यासे | मयूरेश्वरद्वारा कमलासुरका वध और मुनिगणोंद्वारा की | ||
| गुणेश्वरकी भगवत्ताका वर्णन ................................ | ४९२ | गयी मयूरेश्वर-स्तुति ............................................. | ५१८ |
| ९५- गुणेशके छठे वर्षमें विश्वकर्माका उनके दर्शनके लिये | १०४- ब्रह्माजीद्वारा मयूरेशकी स्तुति, स्तुतिका माहात्म्य, | ||
| पार्वतीके पास आना, विश्वकर्माका पार्वतीकी स्तुति | 'कमण्डलुभवा' नामक नदीका प्राकट्य, मयूरेशकी | ||
| करना, पार्वतीका उन्हें भक्तिका वर देना, विश्वकर्माद्वारा | मायासे ब्रह्माका मोहित होना, मयूरेशकी परीक्षाके | ||
| गुणेशका स्तवन और उन्हें अंकुश आदि आयुध प्रदान | लिये ब्रह्माद्वारा सृष्टिका तिरोधान, मयूरेशद्वारा पुनः | ||
| करना, गुणेशके द्वारा आयुधोंकी प्राप्ति कहाँसे हुई- | सृष्टि कर लेना और ब्रह्माजीको अपने विश्वरूपका | ||
| इस जिज्ञासापर विश्वकर्माका सूर्य तथा संज्ञाकी कथा | दर्शन कराना .......................................................... | ५२० |