भारतकोश
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गरुड़ पुराण

Garuda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished634 पृष्ठ

८४- संन्यास-धर्म-निरूपण

काण्ड ] द्रव्यशुद्धि १६९


तथापि जो शूद्र परम्परासे ही अपने यहाँ सेवक है, गोपालन करनेवाला है, कुल-परम्परासे ही जो मित्रके समान व्यवहार करनेवाला है, परम्परासे अपने यहाँ हलवाहेका काम करनेवाला है, कुल-परम्परासे जो निर्धारित नाई है—इनके अतिरिक्त वह शूद्र जिसने मन, वाणी, शरीर एवं कर्मसे सर्वथा अपनेको समर्पित कर रखा है—ऐसे शूद्रोंका अन्न स्वीकार किया जा सकता है। घी आदि स्निग्ध पदार्थोंसे युक्त अन्न यदि बासी है या बहुत कालसे रखा हुआ है तो भी ग्रहण करने योग्य होता है। किंतु घृत या तेल आदिसे संमिश्रित न होनेपर भी गेहूँ, जौ और गोरससे तैयार किये गये पदार्थ यदि बहुत देरतक रखे गये हैं, तब भी ग्रहण किये जा सकते हैं; यदि विकृत न हुए हों।

देव और अतिथिको बिना समर्पित किया हुआ तिल-तण्डुलमिश्रित पदार्थ, यवागू, खीर, पुआ तथा पूड़ीका भोजन व्यर्थ हो जाता है।

पलाण्डु (प्याज) और लहसुन आदि उग्र पदार्थोंका सेवन करनेपर चान्द्रायणव्रत करना चाहिये। जो पुरुष पशु-हत्या करता है, वह पशुके रोम-परिमित कालतक घोर यातनाओंको सहन करते हुए नरकमें वास करता है। अभोज्य पदार्थोंका परित्याग करके अपनी सद्गतिकी भावनासे प्रभुसे क्षमा-याचना और प्रार्थना करता हुआ व्यक्ति भगवान्‌को प्राप्त करता है। (अध्याय ९६)


द्रव्यशुद्धि

याज्ञवल्क्यजीने कहा—हे श्रेष्ठ मुनिजनो! अब मैं द्रव्य-शुद्धिका वर्णन कर रहा हूँ। आप सब उसका ज्ञान प्राप्त करें।

सोने, चाँदी, अब्ज (मुक्ताफल, शंख, शुक्ति आदि), शाक, रस्सी तथा बकरे आदिके चमड़ेसे बनाये गये पात्र, होतृ, चमस आदि यदि किसी चिकने पदार्थके लेपसे रहित हैं और उच्छिष्ट हाथ आदिसे ही केवल स्पृष्ट हैं तो इनकी शुद्धि जलसे प्रक्षालनमात्र करनेपर हो जाती है। यज्ञमें प्रयुक्त स्रुक् एवं स्रुवाकी शुद्धि उष्ण जलसे तथा धान्यादिका शुद्धीकरण जलके प्रोक्षणसे होता है।

काष्ठ और सींग आदिसे विनिर्मित पात्रादिकी शुद्धि छिलनेसे होती है। मार्जन करनेसे यज्ञका पात्र पवित्र हो जाता है। उष्ण जल और उष्ण गोमूत्रसे धोनेपर ऊनी और रेशमी वस्त्र शुद्ध हो जाते हैं। ब्रह्मचारीके हाथमें विद्यमान भिक्षा-प्राप्त अन्न, बाजारमें विक्रयके लिये रखा अन्न तथा स्त्रीका मुख पवित्र होता है। मिट्टीका पात्र अग्निमें पुनः पकानेपर शुद्ध होता है, यदि चाण्डाल आदिसे स्पृष्ट नहीं है। गौके द्वारा सूँघे जानेपर और केश, मक्षिका एवं कीटादिसे दूषित होनेपर अन्नकी शुद्धि यथायोग्य जल, भस्म तथा मिट्टी डालनेसे हो जाती है। भूमिका पवित्रीकरण मार्जनादि करनेपर होता है। राँगा, सीसा तथा ताम्रपात्रकी शुद्धि क्षार और अम्लमिश्रित जलसे होती है। कांस्य और लौहपात्रोंकी शुद्धि भस्म तथा जलसे मार्जन करनेपर होती है। अज्ञात वस्तुएँ तो सदैव पवित्र ही रहती हैं।

अमेध्य (शरीरसे निकलनेवाले मल, वसा, शुक्र और श्लेष्मा आदि)-से लिप्त पात्रकी शुद्धि मिट्टी और जलके द्वारा परिमार्जित कर उसमें व्याप्त गन्ध एवं लेपको दूर करनेसे होती है। प्रकृतिद्वारा भूमिमें एकत्र जल जो गौको संतृप्त करनेमें पर्याप्त हो, सदैव शुद्ध होता है।

सूर्य-रश्मि, अग्नि, धूलि, वृक्ष-छाया, गौ,

८५- कर्मविपाक-निरूपण

१७०संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

अश्व, पृथ्वी, वायु तथा ओसकी बूँदें पवित्र ही होती हैं।

मनुष्यको स्नान करनेके बाद, जल पीनेके बाद, छींक आनेके बाद, शयनोपरान्त, भोजन करनेपर, मार्गमें चलनेपर तथा वस्त्र बदलनेपर पुनः आचमन करना चाहिये।

जम्हाई लेनेपर, निष्ठीवन (थूकनेपर), शयन करनेपर, वस्त्र-धारण करनेपर और अश्रुपात होनेपर—इन पाँच अवस्थाओंमें आचमन नहीं करे, अपितु दक्षिण कानका स्पर्श कर ले। ब्राह्मणके दक्षिण कानपर अग्नि आदि देवता सदैव विराजमान रहते हैं।

(अध्याय ९७)


दान-धर्मकी महिमा

याज्ञवल्क्यजीने पुनः कहा— हे ऋषियो! अब मैं दान-धर्मकी महिमाका वर्णन करता हूँ, उसे सुनें।

अन्य वर्णोंकी अपेक्षा ब्राह्मण श्रेष्ठ हैं, उनमें भी जो सक्रियावान् (कर्मनिष्ठ) ब्राह्मण हैं वे श्रेष्ठ हैं। उन कर्मनिष्ठोंमें भी विद्या तथा तपस्यासे युक्त ब्रह्म-तत्त्ववेत्ता श्रेष्ठ तथा सत्पात्र हैं। गृहस्थके द्वारा गौ, भूमि, धान्य तथा सुवर्ण आदिका दान सत्पात्रको उसका पूजन करके दिया जाना चाहिये।

विद्या एवं तपस्यासे हीन ब्राह्मणको प्रतिग्रह (दान) स्वीकार नहीं करना चाहिये। इस प्रकार दान लेनेपर वह प्रदाता और स्वयंको अधोगामी बना देता है। प्रतिदिन उपयुक्त पात्रको दान देना चाहिये। निमित्त (सूर्यग्रहण, चन्द्रग्रहण आदि विशेष अवसर) उपस्थित होनेपर विशेष रूपसे अधिक दान देना चाहिये। किसीके याचना करनेपर भी यथाशक्ति अपनी श्रद्धाके अनुसार दान देना चाहिये। सुवर्णसे अलंकृत सींगोंवाली, चाँदीसे मढ़े हुए खुरोंवाली, सुन्दर वस्त्राच्छादित, अधिक दूध देनेवाली, सुशील गौका यथाशक्ति दक्षिणाके साथ दान करना चाहिये और दान देते समय साथमें कांस्यपात्र भी देना चाहिये।

सींगमें दस सौवर्णिक (एक सौ साठ माशा) सोना तथा खुरमें सात पल चाँदी लगाना चाहिये एवं दोहन-पात्र पचास पल काँसेका होना चाहिये।

गौका बछड़ा भी अलंकृत होना चाहिये। गौ रोगरहित तथा सवत्सा होनी चाहिये। यदि बछड़ा न हो तो स्वर्ण या पिप्पलकाष्ठका बाछा या बाछी बनाकर देना चाहिये। ऐसा करनेसे प्रदाता बछड़ेके शरीरमें स्थित रोम-संख्याके अनुसार उतने ही वर्षपर्यन्त स्वर्गका उपभोग करता है। यदि गौ कपिला (भूरे रंगकी) होती है तो वह दाताके सात कुलोंका उद्धार कर देती है।

जबतक प्रसव कर रही गौकी योनिमें बछड़ेके दोनों पैरोंसहित मुख दिखायी देता है और जबतक वह गर्भका प्रसव नहीं कर देती है, तबतक गौको पृथ्वीके समान ही मानना चाहिये।

सामर्थ्यके अभावमें स्वर्णमय सींग आदिसे युक्त गौका दान यदि न किया जा सके तो भी रोगरहित, हृष्ट-पुष्ट, दूध देनेवाली धेनु अथवा दूध न देनेवाली गर्भिणी गौका जो दान करता है, वह स्वर्गलोकमें महिमामण्डित होकर निवास करता है।

थके हुए प्राणीकी आसनादिक दानके द्वारा थकान दूर करना, रोगीकी सेवा करना, देवपूजन करना, ब्राह्मणका पाद-प्रक्षालन करना तथा ब्राह्मणद्वारा उच्छिष्ट किये गये स्थान और पात्रका मार्जन-कृत्य विधिवत् दिये गये गोदानके समान फलदायक होता है। ब्राह्मणके लिये जो अभीष्ट हो, उसे वह

काण्ड ] * श्राद्धके अवसर तथा अधिकारी; श्राद्धकी संक्षिप्त विधि, महिमा और फल * १७१


वस्तु प्रदानकर प्रदाताको स्वर्ग-लाभ लेना चाहिये।

भूमि, दीप, अन्न, वस्त्र और घृतके दानसे प्रदाता लक्ष्मी प्राप्त कर सकता है। घर, धान्य, छाता, माला, उपयोगी वृक्ष, यान (सवारी), घृत, जल, शय्या, कुंकुम, चन्दन आदि प्रदान करनेसे स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठा प्राप्त होती है।

सत्पात्रको विद्या प्रदान करनेवाला देवदुर्लभ ब्रह्मलोकको प्राप्त करता है। मूल्य लेकर भी वेदोंके अर्थ, यज्ञोंकी विभिन्न विधियोंको सम्पादित करनेवाले तथा शास्त्र और धर्म-शास्त्रोंको लिखनेवाले ब्रह्मलोकको प्राप्त करते हैं। वेद-शास्त्र ही संसारके मूल (व्यवस्थापक) हैं। इसी कारण ईश्वरने सबसे पहले इन्हींकी सृष्टि की। अतः सब प्रकारका सत्प्रयत्न करके वेदोंका अर्थ-संग्रह करना चाहिये अर्थात् वेदोंके तात्पर्यको समझनेके लिये भलीभाँति प्रयास करना चाहिये। जो अधिकारी इतिहास अथवा पुराण लिखकर दान देता है, वह ब्रह्मदानके समान प्राप्त पुण्यका द्विगुणित पुण्य प्राप्त करता है।

द्विजको नास्तिकोंके वचन, कुतर्क तथा प्राकृत और म्लेच्छ-भाषा-भाषित वचन नहीं सुनने चाहिये, क्योंकि ये शब्द द्विजको अधोगतिमें ले जाते हैं।

दान ग्रहण करनेका सामर्थ्य रहनेपर भी जो लोग दान ग्रहण नहीं करते, वे लोग उन्हीं लोकोंको प्राप्त करते हैं, जो दान-दाताको प्राप्त होते हैं।

कुश, शाक, दूध, गन्ध तथा जल—ये वस्तुएँ बिना माँगे यदि कुलटा, पतित, नपुंसक एवं शत्रुके अतिरिक्त किसी दुष्कृतीके द्वारा भी दी जा रही हों तो भी इनका प्रत्याख्यान नहीं करना चाहिये। यदि कोई सुकृती इन्हें बिना याचनाके दे रहा है, तब तो इनके प्रत्याख्यानका कोई प्रसंग ही नहीं है। देवता तथा अतिथिकी पूजा करनेके लिये, अपने माता-पिता आदिके भरण-पोषणके लिये तथा अपने जीवनकी रक्षाके लिये पतित आदि अत्यन्त कुत्सितको छोड़कर अन्य सभीसे जितना अत्यावश्यक है, उतना प्रतिग्रह लिया जा सकता है।

(अध्याय ९८)


श्राद्धके अवसर तथा अधिकारी; श्राद्धकी संक्षिप्त विधि, महिमा और फल

याज्ञवल्क्यजीने कहा—ऋषिगणो! अब मैं सर्वपाप-विनाशिनी श्राद्ध-विधिका वर्णन करता हूँ।

अमावास्या, अष्टका*, वृद्धि (पुत्रजन्म आदि), कृष्णपक्ष, उत्तरायण, दक्षिणायन, द्रव्य (अन्नादि)-लाभ होना, श्राद्ध-योग्य ब्राह्मणकी प्राप्ति होना, विषुवत्-संक्रान्ति (सूर्यके तुला और मेषराशिपर संक्रमण करनेका समय), मकर-संक्रान्ति, व्यतीपात, गजच्छाया-योग, चन्द्र-सूर्यग्रहण तथा कर्ताकी श्राद्धके प्रति अभिरुचि होना—ये सब श्राद्धके काल (अवसर) कहे गये हैं।

जो ब्राह्मण युवा (मध्यम वयस्क) होते हुए सभी वेदोंमें अग्र्य (सतत अस्खलित अध्ययनमें समर्थ), श्रोत्रिय, ब्रह्मवित्, मन्त्र-ब्राह्मणात्मक वेदके तात्पर्यके वेत्ता, ज्येष्ठ साम नामक साम-विशेषके अध्ययनके लिये विहित व्रतके आचरणके साथ ज्येष्ठ सामके अध्येता, त्रिमधु नामके ऋग्वेदके एकदेशके अध्ययनके लिये विहित व्रतके आचरणके साथ त्रिमधुके अध्येता तथा ऋक् और यजुके एकदेश त्रिसुपर्णके अध्ययनके लिये विहित व्रतके आचरणके साथ त्रिसुपर्णके अध्येता ब्राह्मण हैं, ये


* हेमन्त-ऋतु एवं शिशिर-ऋतुके महीनोंमें आनेवाली कृष्णपक्षकी अष्टमीमें 'अष्टका' होती है।

१७२संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

श्राद्धकी सम्पत्ति माने जाते हैं, अर्थात् इन्हें भोजन कराने या दान देनेसे अक्षय फलकी प्राप्ति होती है। ऐसे ही भानजा, श्राद्ध-योग्य ब्राह्मणोंके लक्षणोंसे विशिष्ट ऋत्विक्, यजुर्वेदके एकदेश-विशेषके अध्ययनके अङ्ग व्रतके आचरणके साथ उस एकदेशके अध्येता, दौहित्र, शिष्य तथा अन्य सम्बन्धी—बन्धु-बान्धव एवं कर्मनिष्ठ, तपोनिष्ठ पञ्चाग्नि¹-विद्याके अध्येता, ब्रह्मचारी, मातृ-पितृभक्त एवं ज्ञाननिष्ठ ब्राह्मण श्राद्धकी सम्पत्ति (श्राद्धमें भोजनीय एवं दान देने योग्य) हैं।

जो रोगी (महारोगसे युक्त), अङ्गहीन, अधिकाङ्ग, काण, पौनर्भव² (विधवाके पुनर्विवाहके अनन्तर उत्पन्न पुत्र), अवकीर्णी³ आदि⁴ आचारभ्रष्ट तथा अवैष्णव हैं, वे श्राद्धके योग्य नहीं हैं।

श्राद्धके एक दिन पूर्व ब्राह्मणोंको निमन्त्रित करना चाहिये। निमन्त्रित ब्राह्मणोंको उस दिन संयम रखना चाहिये। श्राद्ध-दिवसके पूर्वाह्नकालमें उपस्थित उन ब्राह्मणोंको आचमन कराकर आसनोंपर बैठा दे। विश्वेदेव अथवा आभ्युदयिक श्राद्धके लिये दो ब्राह्मण तथा पितृपात्रके स्थानपर यथाशक्ति ब्राह्मणको बैठाना चाहिये अथवा इनमें दो ब्राह्मणोंको विश्वेदेवपात्रके आसनपर पूर्वाभिमुख तथा तीन ब्राह्मणोंको पितृपात्रके आसनपर उत्तराभिमुख अथवा दोनों (देव-पितर)-के लिये एक-एक ब्राह्मण आसनपर बैठाना चाहिये। इसी प्रकार मातामहादिके श्राद्धमें व्यवस्था करनी चाहिये और मातामह-श्राद्धमें विश्वेदेव-सम्बन्धी कृत्य अलग-अलग या एक साथ किया जा सकता है।

इसके बाद ब्राह्मणोंको हस्त-प्रक्षालनके लिये जल (हस्तार्घ्य) और आसनके लिये कुश प्रदानकर उन्हींकी अनुज्ञासे 'विश्वे देवास०' इस मन्त्रसे विश्वेदेवका आवाहन करके भोजन-पात्रमें यव विकीर्ण करे। तदनन्तर पवित्रकयुक्त अर्घ्यपात्रमें 'शं नो देवी०' इस मन्त्रसे उसमें जल तथा 'यवोऽसि०' मन्त्रद्वारा यव डालकर 'या दिव्या०' मन्त्रसे ब्राह्मणके हाथमें अर्घ्योदक प्रदानकर गन्ध, दीपक, माला, हार आदि आभूषण तथा वस्त्र दान करे।

तत्पश्चात् अपसव्य होकर पितरोंको अप्रदक्षिण (वाम)-क्रमसे स्थान (कुशरूपी आसन) प्रदान करे और (आसनके लिये मोटकरूप) द्विगुणित कुश देकर 'उशन्तस्त्वा०' मन्त्रसे उन पितरोंका आवाहन करे। उसके बाद पितृ-स्थानपर विराजमान ब्राह्मणकी आज्ञा लेकर 'आयन्तु नः पितरः०' इस मन्त्रका जप करे।

पितृकार्यमें यवके स्थानपर तिलोंका प्रयोग करना चाहिये और तिलके साथ उन पितृगणोंको पूर्ववत् अर्घ्यादि प्रदान करे। उन अर्घ्यों (अर्घ्यपात्रों)-के संस्रव (ब्राह्मणके हाथमें दिये गये अर्घ्योदकका नीचे गिरा हुआ जल)-को पितृपात्रमें रखकर और दक्षिणाग्र कुशस्तम्बको भूमिपर रखकर उसके ऊपर 'पितृभ्यः स्थानमसि०' इस मन्त्रके द्वारा उक्त अर्घ्यपात्र (पितरोंके वामभागमें) भूमिपर उलटकर रख दे। उसके बाद घृत-सम्मिश्रित अन्नको अग्निमें प्रदान करनेके लिये आचार्यसे श्राद्धकर्ता अग्नौकरणकी आज्ञा प्राप्त करे। जब आचार्य 'ऐसा ही करो' यह


१-पञ्चाग्नि—सभ्य, आवसथ्य, आहवनीय, गार्हपत्य और दक्षिणाग्नि—ये पाँच अग्नियाँ हैं।
२-पौनर्भव—पुनर्भूसे उत्पन्न। पुनर्भू उस स्त्रीको कहते हैं, जो विवाहके पहले किसी दूसरे पुरुषसे विवाहित हो चुकी है अथवा किसी दूसरे पुरुषके संसर्गसे दूषित हो चुकी है।
३-अवकीर्णी—ब्रह्मचर्याश्रममें रहते हुए जिसका वीर्य स्खलित हो गया है।
४-आदिसे कुण्ड, गोलक, कुनखी एवं काले दाँतवाले ब्राह्मण समझे जाने चाहिये। पति जीवित रहते हुए दूसरे पुरुषसे उत्पन्न कुण्ड एवं पतिके निधनके बाद दूसरे पुरुषसे उत्पन्न गोलक होता है।

काण्ड ] श्राद्धके अवसर तथा अधिकारी; श्राद्धकी संक्षिप्त विधि, महिमा और फल १७३


कह दें तो उन्हें पितृयज्ञके समान ही उस अग्निमें युक्त घृताक्त हव्यका हवन करके आहुति करनेसे शेष बचे हुए अन्नको समाहित मनसे पितरोंके भोजन-पात्रोंमें रख दे। पितरोंके भोजन-पात्रोंके रूपमें यथाशक्ति चाँदीके पात्रोंका प्रयोग करना चाहिये।

‘पृथिवी ते पात्रं०’ मन्त्रसे पात्रको अभिमन्त्रित करे। ‘इदं विष्णुः’ मन्त्रका पाठ करे और ब्राह्मणके अंगुष्ठको पितरोंके लिये परिवेशित अन्नमें प्रवेशित करे। व्याहृतियोंके सहित ‘गायत्री’ एवं ‘मधुवाता०’ मन्त्रका जप करके सुखपूर्वक भोजन करें, इस प्रकार ब्राह्मणोंसे निवेदन करे और ब्राह्मण मौन होकर भोजन करें। श्राद्धकर्ता क्रोधादिसे रहित होकर बड़े ही श्रद्धा-भावसे उन ब्राह्मणोंको बिना शीघ्रता किये उनका अभीष्ट अन्न तथा हविष्यान्न उन्हें प्रदान करे और ब्राह्मणोंकी तृप्तितक ‘पुरुषसूक्त’ तथा ‘पवमानसूक्त’ आदिका जप करता रहे। उसके बाद पुनः पहलेके समान ‘मधुवाता०’ मन्त्रका पाठ करे और शेषान्नको लेकर उन संतृप्त ब्राह्मणोंके द्वारा ‘हम तृप्त हो गये’, इस प्रकार कहनेपर उन ब्राह्मणोंकी अनुज्ञासे श्राद्धकर्ता दक्षिणाभिमुख होकर तिलसहित उस शेषान्नको ब्राह्मणोंके उच्छिष्ट पात्रोंके समीपमें ही भूमिपर जलके साथ रख दे और प्रत्येक ब्राह्मणको मुख-प्रक्षालनके लिये अलग-अलग जल प्रदान करे।

उच्छिष्टके समीपमें पितर आदिके लिये पिण्डदान करके उसी प्रकार मातामहादिके लिये भी पिण्डदान करे। उसके बाद ब्राह्मणोंको आचमन कराये। तदनन्तर ब्राह्मणोंके ‘स्वस्ति’ ऐसा कहनेपर श्राद्धकर्ता ‘अक्षय्यमस्तु’ कहकर ब्राह्मणोंके हाथमें जल प्रदानकर यथासामर्थ्य दक्षिणा दे और ‘स्वधां वाचयिष्ये’ ऐसा कहे। ‘वाच्यताम्’ के द्वारा ब्राह्मण श्राद्धकर्ताको आज्ञा प्रदान करें। उनकी अनुज्ञा प्राप्तकर श्राद्धकर्ता पितृजनोंके लिये ‘स्वधा’ इस वाक्यका प्रयोग करे। पुनः उन ब्राह्मणोंके द्वारा ‘स्वधा’ ऐसा कह देनेके पश्चात् श्राद्धकर्ता पृथ्वीपर जलसिञ्चन करे।

‘विश्वेदेवाः प्रीयन्ताम्’ यह कहकर श्राद्धकर्ता विश्वेदेवोंको जल अर्पितकर उन्हें विसर्जित करे। तदनन्तर पितरोंसे इस प्रकारकी प्रार्थना करे—

दातारो नोऽभिवर्धन्तां वेदाः संततिरेव च॥
श्रद्धा च नो मा व्यगमद् बहु देयं च नोऽस्त्विति।
(९९। २६-२७)

पितृगण! हमारे यहाँ दाताओं, वेदों और संतानोंकी वृद्धि हो, हमारी श्रद्धा कभी न घटे, देनेके लिये हमारे पास बहुत सम्पत्ति हो। तदनन्तर ‘वाजे वाजे०’ इस मन्त्रका उच्चारण करते हुए श्राद्धकर्ता प्रसन्नताके साथ यथाक्रम पितरोंका विसर्जन करे। जिस अर्घ्यपात्रमें पहले संस्रव-जल रखा गया था, उस पितृपात्र (अर्घ्यपात्र)-को सीधा कर दे तथा श्राद्धकर्ता उन आमन्त्रित ब्राह्मणोंका प्रदक्षिणाके साथ अनुगमन करते हुए उन्हें विदा करे। इसके पश्चात् श्राद्धसे अवशिष्ट अन्नका भोजन करके उस रात्रिमें सपत्नीक ब्रह्मचर्यव्रतका पालन करे।

विवाहादिक माङ्गलिक अवसरोंपर पितरोंका नान्दीमुख श्राद्ध करना चाहिये। उनके लिये दधि, कर्कन्धू (बदरी फल)-मिश्रित यवान्नका पिण्डदान करना चाहिये।

एकोद्दिष्ट* श्राद्ध विश्वेदेवसे रहित एकान्न और एक पवित्रकसे युक्त होता है। इस श्राद्धमें आवाहन और अग्नौकरण नहीं किया जाता। इस श्राद्धका सम्पूर्ण कृत्य अपसव्य अर्थात् दक्षिण कन्धेपर यज्ञोपवीत धारण करके करना चाहिये। श्राद्धकर्ता इस श्राद्धमें निमन्त्रित ब्राह्मणोंको पवित्र भूमिपर रखे हुए आसनपर ‘उपतिष्ठताम्’ कहकर बैठनेके लिये निवेदन करे। उसी प्रकार ‘अभिरम्यताम्’ कहकर विसर्जन करे। ब्राह्मणोंको भी ‘अभिरताः स्म’ यह वचन कहना चाहिये।

सपिण्डीकरण श्राद्धमें श्राद्धकर्ता तिल एवं


*एक व्यक्ति (पिता)-के उद्देश्यसे किया जानेवाला श्राद्ध एकोद्दिष्ट है।

१७४संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

गन्धमिश्रित जलसे चार पात्रोंको परिपूर्ण करे। उन पितृपात्रोंमेंसे एक पात्रको अर्घ्य प्रदान करनेके लिये प्रेतपात्रके रूपमें कल्पित करे। तदनन्तर श्राद्धकर्ता प्रेतपात्रमें रखे हुए अर्घ्य-जलके कुछ भागको पिता आदिके तीन पात्रोंमें मिलाकर पूर्ववत् अर्घ्यादि क्रियाका सम्पादन करे। 'ये समाना०' इन दो मन्त्रोंके द्वारा प्रेतपिण्डको तीन भागोंमें विभक्तकर पितरोंके पिण्डोंमें मिला दे। इसके अनन्तर विहित एकोद्दिष्ट श्राद्ध स्त्री (माता)-का भी करना चाहिये। जिसका सपिण्डीकरण एक वर्षसे पूर्व होता है, उसके उद्देश्यसे भी एक वर्षपर्यन्त सान्नोदक कुम्भ प्रतिदिन, प्रतिमाह यथाशक्ति ब्राह्मणको देना चाहिये। पितरोंको समर्पित पिण्डोंको गौ, अज, ब्राह्मण, अग्नि अथवा जलको अर्पित कर दे।

हविष्यान्न (तिल, व्रीहि, यव आदि)-से श्राद्ध करनेपर पितृगणोंको एक मास तथा पायससे श्राद्ध करनेपर उन्हें एक वर्षपर्यन्त संतुष्टि प्राप्त होती है।

मृत व्यक्तियोंके लिये कृष्ण चतुर्दशी तिथिमें श्राद्ध करना चाहिये। ऐसा करनेपर श्राद्धकर्ताको मृत्युके पश्चात् स्वर्ग तो प्राप्त होता ही है, जीवनकालमें भी उन (श्राद्धकर्ता)-को उत्साह, शौर्य, क्षेत्र तथा शक्तिकी प्राप्ति होती है।

जो विधिवत् अपने पितृजनोंके लिये श्राद्ध करता है, वह पुत्र, सर्वजनश्रेष्ठता, सौभाग्य, समृद्धि, प्रमुखता, माङ्गलिक दक्षता, अभीष्ट कामना-पूर्ति, वाणिज्यमें लाभ, निरोगता, यश, शोकराहित्य, परम गति, धन, विद्या, वाक्-सिद्धि, पात्र, गौ, अज, आविक (भेंड़), अश्व और दीर्घायु प्राप्तकर अन्तकालमें मोक्ष-लाभ प्राप्त करता है। कृत्तिकादिसे भरणीपर्यन्त प्रत्येक नक्षत्रमें श्राद्ध करनेवाले व्यक्तिको भी इन सभी सुखोंकी प्राप्ति होती है। सुन्दर-सुन्दर वस्त्र तथा भवन आदि सुख-साधन स्वयं ही श्राद्धकर्ताको सुलभ होते हैं अर्थात् इस प्रकारका श्राद्धकर्ता भोजन, वस्त्र तथा भवन आदिसे परिपूर्ण रहता है।

पिता-पितामहादि पितर संतुष्ट होकर श्राद्धकर्ताको नित्य आयु, संतति, धन, विद्या, राज्य, सभी प्रकारके सुख, स्वर्ग और मोक्ष प्रदान करते हैं।

(अध्याय ९९)

विनायकशान्ति-स्नान

याज्ञवल्क्यजीने कहा— हे ऋषियो! अब आप सभी विनायककी अप्रसन्नतासे ग्रस्त (आविष्ट) पुरुषके लक्षणोंका श्रवण करें।

विनायकसे ग्रस्त व्यक्ति स्वप्नावस्थामें बहुत अधिक स्नान करता है। उसे स्वप्नमें मरे हुए प्राणियोंके सिरोंका दर्शन होता है। वह उद्विग्नमन रहता है। उसके सारे प्रयत्न निष्फल रहते हैं। बिना कारण उसे पीड़ा होती है। विनायककी अप्रसन्नतासे युक्त होनेपर राजा राज्यसे वञ्चित रहता है, कुमारी पतिसे वञ्चित रहती है तथा गर्भिणी स्त्री पुत्र-लाभसे वञ्चित रहती है। अतएव विनायककी शान्तिके लिये किसी पवित्र दिन एवं शुभ मुहूर्तमें उसे विधिपूर्वक स्नान कराना चाहिये। स्नानकी विधि संक्षेपमें इस प्रकार है— भद्रासनपर बिठाकर ब्राह्मणोंद्वारा स्वस्तिवाचनपूर्वक स्नान कराना चाहिये। पीली सरसों पीसकर उसे घृत-मिश्रित करके उबटन बनाये और उस व्यक्तिके सम्पूर्ण शरीरमें मले। फिर उसके मस्तकपर सर्वौषधिसहित सब प्रकारके सुगन्धित द्रव्यका लेप करे। सर्वौषधियुक्त चार कलशोंके जलसे स्नान कराना चाहिये। सरोवर


१-ये चार पात्र पितरोंके लिये अलग-अलग विहित हैं। इनके अतिरिक्त विश्वेदेवके दो पात्र तो होते ही हैं।
२-इस एकोदिष्टका तात्पर्य यह है कि पार्वण श्राद्धमें माताका श्राद्ध अलगसे करना चाहिये (या० मिताक्षरा, श्रा० प्र० अ० श्लोक २५४)।

८७- अशौच तथा आपद्वृत्ति-निरूपण

काण्ड ] विनायकशान्ति-स्नान [ १७५


आदि पाँच स्थानोंकी मिट्टी, गोरोचन, गन्ध और गुग्गुल—ये वस्तुएँ भी उन कलशोंके जलमें छोड़े।

प्रथम कलशको लेकर आचार्य निम्नलिखित मन्त्रसे उसे स्नान कराये—

सहस्राक्षं शतधारमृषिभिः पावनं स्मृतम्॥
तेन त्वामभिषिञ्चामि पावमान्यः पुनन्तु ते।
(१००। ६-७)

जो सहस्रों नेत्र (अनेक प्रकारकी शक्तियों)-से युक्त हैं, जिनकी सैकड़ों धाराएँ (प्रवाह) हैं और जिसे महर्षियोंने पवित्र करनेवाला बताया है, उस पवित्र जलसे मैं (विनायकग्रस्त) तुम्हारा (उपद्रवकी शान्तिके लिये) अभिषेक करता हूँ। यह पावन जल तुम्हें पवित्र करे।

द्वितीय कलशके जलसे निम्नलिखित मन्त्र पढ़ते हुए अभिषेक करे—

भगं ते वरुणो राजा भगं सूर्यो बृहस्पतिः॥
भगमिन्द्रश्च वायुश्च भगं सप्तर्षयो ददुः।
(१००। ७-८)

राजा वरुण तथा भगवान् सूर्य एवं देवगुरु बृहस्पति आपके सौभाग्यकी अभिवृद्धि करें; इसी प्रकार देवराज इन्द्र, वायुदेव तथा सप्तर्षिगण भी आपके सौभाग्यकी अभिवृद्धि करते रहें।

तृतीय कलशके जलसे निम्नलिखित मन्त्र पढ़ते हुए अभिषेक करे—

यत्ते केशेषु दौर्भाग्यं सीमन्ते यच्च मूर्द्धनि॥
ललाटे कर्णयोरक्षणोरापस्तद्घ्नन्तु ते सदा।
(१००। ८-९)

तुम्हारे केशोंमें, सीमन्तमें, मस्तकपर, ललाटमें, कानोंमें और नेत्रोंमें भी जो दुर्भाग्य है, उसे जलदेवता सदाके लिये शान्त करें।

तदनन्तर पहले कहे गये तीनों मन्त्रोंसे चतुर्थ कलशके जलसे स्नान कराये। इसके बाद बाँयें हाथमें कुशा लेकर स्नान किये हुए प्राणीके सिरको कुशसे स्पर्श करते हुए ब्राह्मणको संयमित होकर गूलरकी लकड़ीसे निर्मित स्रुवाके द्वारा सार्षपतैल (सरसोंका तेल)-से अग्निमें आहुति प्रदान करनी चाहिये। आहुति देनेके लिये ये मन्त्र विहित हैं— 'मिताय स्वाहा', 'सम्मिताय स्वाहा', 'शालाय स्वाहा', 'कटङ्कटाय स्वाहा', 'कूष्माण्डाय स्वाहा', 'राजपुत्राय स्वाहा' ('स्वाहा' के पूर्व प्रयुक्त सभी नाम विनायकके हैं। या० मि० ग० प्र० अ० श्लोक २८५)।

इसके अनन्तर लौकिक अग्निमें स्थालीपाक-विधिसे चरु पकाकर उससे सभी निर्दिष्ट विनायक नामवाले 'स्वाहा' युक्त छः मन्त्रोंसे उसी लौकिक अग्निमें ही हवनकर अवशिष्ट हविशेषके द्वारा इन्द्र, अग्नि, यम आदिको बलि देनी चाहिये। तत्पश्चात् किसी चतुष्पथ (चौराहे)-पर कुशोंका आसन बिछाकर उसमें पुष्प, गन्ध, उण्डेरककी माला, कच्चे-पक्के चावल, घृतमिश्रित पुलाव, मूली, पूड़ी, पुआ, दही, पायस, घृत, गुड़पिष्ट, लड्डू तथा इक्षु—इन सभी सामग्रियोंको एकत्र करके रख दे। तदनन्तर विनायकजननी भगवती अम्बिकाका उपस्थान करे और हाथ जोड़कर अर्घ्य प्रदान करे।

पुत्रजन्मकी कामना करनेवाली स्त्रीको दूर्वा और सरसोंके पुष्पोंसे भगवती दुर्गाकी अर्चना करके स्वस्ति-वाचनके साथ इस प्रकार उनकी प्रार्थना करनी चाहिये—

रूपं देहि यशो देहि भगं भगवति देहि मे।
पुत्रान्देहि श्रियं देहि सर्वान्कामांश्च देहि मे॥
(१००।१६)

हे भगवति! आप मुझे रूप, यश और ऐश्वर्य प्रदान करें। हे देवि! आप मेरे लिये पुत्र दें, लक्ष्मी दें और मेरी सभी कामनाओंको परिपूर्ण करें।

तत्पश्चात् ब्राह्मणोंको भोजन प्रदानकर संतुष्ट करे। अपने गुरुको दो वस्त्र प्रदानकर अन्य ग्रहोंकी पूजा करके सूर्यार्चनमें निरत रहे। इस प्रकार विनायक और ग्रहोंका पूजन करके मनुष्य अपने सभी कार्योंमें सफलता प्राप्त करता है।

(अध्याय १००)

१७६संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

ग्रहशान्ति-निरूपण

याज्ञवल्क्यजीने कहा— हे मुनियो! लक्ष्मी एवं सुख-शान्तिके इच्छुक तथा ग्रहोंकी दृष्टिसे दुःखित जनोंको ग्रहशान्तिके लिये तत्सम्बन्धित यज्ञ करना चाहिये। विद्वानोंके द्वारा सूर्य, सोम, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि, राहु और केतु—ये नौ ग्रह बताये गये हैं। इनकी अर्चाके लिये इनकी मूर्ति क्रमशः इन द्रव्योंसे बनानी चाहिये—ताम्र, स्फटिक, रक्तचन्दन, स्वर्ण, सुवर्ण, रजत, अयस् (लोहा), सीसा तथा कांस्य। अर्थात् सूर्यग्रहके लिये ताम्र धातु, चन्द्रके लिये स्फटिक, मंगलके लिये रक्तचन्दन, बुध एवं बृहस्पतिके लिये स्वर्ण, शुक्रके लिये रजत, शनिके लिये लोहा, राहुके लिये सीसा तथा केतुके लिये कांस्य धातु प्रशस्त है।

सूर्यका वर्ण लाल, चन्द्रमाका सफेद, मंगलका लाल, बुध तथा बृहस्पतिका पीला, शुक्रका श्वेत, शनि, राहु और केतुका काला वर्ण होता है। इसी वर्णके इनके द्रव्य भी होते हैं। एक पाटेपर वस्त्र बिछाकर ग्रहवर्णोंके अनुसार निर्दिष्ट द्रव्योंके द्वारा विधिपूर्वक उनकी स्थापना तथा पूजा-होम करे। उन्हें सुवर्ण, वस्त्र तथा पुष्प समर्पित करे। उनके लिये गन्ध, बलि, धूप, गुग्गुल भी देना चाहिये। तत्पश्चात् मन्त्रोंके द्वारा प्रत्येक ग्रह-देवताके निमित्त चरु पदार्थ अर्पित करना चाहिये।

उसके बाद यथाक्रम ‘ॐ आकृष्णेन रजसा०’ इस मन्त्रके द्वारा सूर्य, ‘ॐ इमं देवा०’ मन्त्रसे चन्द्र, ‘ॐ अग्निमूर्धादिवः ककुत्०’ मन्त्रके द्वारा मंगल, ‘ॐ उद्बुध्यस्व०’ मन्त्रसे बुध, ‘ॐ बृहस्पते०’ इस मन्त्रके द्वारा बृहस्पति, ‘ॐ अन्नात्परिस्रुतम०’ मन्त्रसे शुक्र, ‘ॐ शं नो देवी०’ मन्त्रके द्वारा शनि, ‘ॐ कयानश्चि०’ मन्त्रसे राहु तथा ‘ॐ केतुं कृण्वन्०’ मन्त्रके द्वारा केतु ग्रहके लिये आहुति देनी चाहिये।

इन ग्रहोंके लिये इसी क्रमसे मन्दार, पलाश, खैर, अपामार्ग (चिचड़ा), पिप्पल, गूलर, शमी, दूर्वा और कुशकी समिधाएँ विहित हैं। इन समिधाओंको घृत, दधि तथा मधुसे मिश्रितकर हवन करना चाहिये। तदनन्तर क्रमानुसार उपर्युक्त मन्त्रोंके द्वारा पदार्थोंकी आहुति प्रदान करे। यथा—सूर्यके लिये गुड़, चन्द्रके लिये भात, मंगलके लिये पायस, बुधके लिये साठी चावलकी खीर, बृहस्पतिके लिये दही-भात, शुक्रके लिये घृत, शनिके लिये अपूप (पुआ), राहुके लिये फलका गूदा और केतुके लिये अनेक वर्णके पकाये हुए धान्यकी आहुति देनी चाहिये।

द्विजको चाहिये कि इसी क्रमसे प्रत्येक ग्रहके लिये अन्न भी दानरूपमें दे। तदनन्तर प्रत्येक ग्रहके निमित्त यथाक्रम—धेनु, शंख, बैल, सुवर्ण, वस्त्र, अश्व, कृष्णा गौ, अयस् (शस्त्र आदि) तथा छागकी दक्षिणा देनी चाहिये। इस प्रकार ग्रहोंकी सदैव पूजा करनेसे मनुष्यको राज्यादि फल प्राप्त होते हैं।
(अध्याय १०१)


वानप्रस्थ-धर्म-निरूपण

याज्ञवल्क्यजीने कहा— हे महर्षियो! अब मैं वानप्रस्थाश्रमके धर्मका वर्णन कर रहा हूँ, आप सभी इसका श्रवण करें।

वानप्रस्थ-आश्रममें प्रविष्ट पुरुषको अपनी पत्नीके संरक्षणका भार पुत्रोंके ऊपर छोड़कर अथवा पत्नीके सहित वनमें जाना चाहिये।

वानप्रस्थ-धर्मका पालन करनेवाला ब्रह्मचर्य-व्रतका निर्वाह करते हुए अपनी श्रौत-अग्नि एवं

काण्ड ] * संन्यास-धर्म-निरूपण * १७७


गृह-अग्निके साथ वनमें जाय। शान्त एवं क्षमावान् रहकर वह अहर्निश देवोपासनामें निमग्न रहे। वह बिना जोती हुई भूमिसे उत्पन्न अन्नके द्वारा अग्निदेव, पितरों, देवताओं, अतिथियों तथा भृत्योंको तृप्त (संतुष्ट) करे। आत्मज्ञानमें तत्पर रहनेवाला वह वानप्रस्थी दाढ़ी, जटा तथा लोमराशिको धारण करे, इन्द्रियोंका दमन करे, त्रिकाल स्नान करे एवं अपनेको प्रतिग्रह अर्थात् दान-ग्रहणसे दूर रखे।

ऐसे व्यक्तिको स्वाध्यायवान्, भगवद्ध्यानपरायण तथा सभी लोगोंके हितसाधनमें लगे रहना चाहिये। उसको जीवनयापनके लिये सीमित अर्थ-संग्रह करना चाहिये।

उसके पास जो कुछ शेष सामग्री हो, उसका आश्विन-मासमें परित्यागकर वह व्रतादिके द्वारा ही समय व्यतीत करे। यदि शक्ति हो तो एक मास या एक पक्षका व्रतकर मास या पक्षके अन्तमें ही भोजन करे। ऐसे व्रती अपने दाँतोंको ही उलूखल मानकर उन्हींसे अन्नको तुषसे विहीनकर अपनी प्राण-रक्षाके लिये उपयोगमें लाते हैं।

वानप्रस्थीको चान्द्रायणव्रत करना चाहिये, भूमिपर सोना चाहिये और वह अपने सभी धार्मिक कृत्योंका सम्पादन यथासम्भव फलसे करे (अन्नसे नहीं)। वह ग्रीष्म-ऋतुमें पञ्चाग्निके^१ मध्य स्थित रहे, वर्षा-ऋतुमें स्थण्डिल (खुले चबूतरे)-पर शयन करे तथा हेमन्त-ऋतुमें आर्द्रवस्त्रोंको धारण करके योगाभ्यासके द्वारा अपने दिन व्यतीत करे।

जो काँटोंसे उसे पीड़ा पहुँचाये उसके प्रति भी क्रोध न करे और जो अङ्गोंमें चन्दनका अनुलेपन करे उसपर भी प्रसन्न न हो, उन दोनोंके प्रति वह समान भाव रखे। वानप्रस्थियोंमें दुःख और सुख भोगनेकी एक समान ही क्षमता होनी आवश्यक है। (अध्याय १०२)


संन्यास-धर्म-निरूपण

याज्ञवल्क्यजीने पुनः कहा—हे सज्जनवृन्द! अब मैं भिक्षु-धर्म (संन्यास-धर्म)-का वर्णन करूँगा। आप सब उसका ज्ञान प्राप्त करें।

गृहस्थाश्रम एवं वानप्रस्थाश्रममें विहित सभी श्रौत इष्टियोंको सम्पन्नकर सर्व वेद-सम्बन्धी दक्षिणा जिस इष्टिमें विहित है, उस प्राजापत्य इष्टिको भी सम्पन्न करके अन्तमें वेद-विहित विधानसे समस्त श्रौताग्नियोंको अपनेमें आरोपित करके संन्यास ग्रहण किया जा सकता है। संन्यासीको चाहिये कि वह सभी प्राणियोंका हितैषी हो, शान्त हो, त्रिदण्डी हो, (संन्यासीके लिये बाँसके बने तीन दण्ड धारण करनेका विधान है।) वह कमण्डलु धारण करे। सभी प्रकारके सुख-साधनयुक्त भवनोंका परित्यागकर भिक्षार्थी होकर ग्रामका आश्रय ग्रहण करे। प्रमादरहित होकर भिक्षाटन करे और सायंकाल ग्राममें न दिखलायी पड़े। जो ग्राम भिक्षुकोंसे^२ रहित हो, वहाँपर वह लोभशून्य होकर प्राणधारणमात्रके लिये भिक्षा माँगे।

यम-नियमका पालन करते हुए योग-सिद्ध होकर संन्यासीको एकदण्डी^३ अथवा परमहंस^४ बनना चाहिये। इस प्रकार रहता हुआ संन्यासी शरीरका परित्यागकर इसी लोकमें अमरत्व प्राप्त कर लेता है। दान देनेवाला, अतिथिका आदर करनेवाला, ब्रह्मज्ञ, यथाविधि श्राद्ध करनेवाला गृहस्थ भी मुक्ति प्राप्त कर लेता है। (अध्याय १०३)


१-चार दिशाओंमें चार अग्नि और ऊपर सूर्य।
२-व्यवसायकी दृष्टिसे अनेक प्रकारके पाखण्डके साथ भिक्षा माँगनेवाले यहाँ 'भिक्षुक' शब्दसे अभिप्रेत हैं।
३-बाँसके बने हुए तीन दण्डोंके विकल्पमें बाँसके एक दण्डके धारणका भी विधान है। अतः संन्यासी बाँसके एक दण्डको भी धारण कर सकता है। ऐसे संन्यासीको 'एकदण्डी' कहते हैं।
४-परमहंस उस अवधूतको कहते हैं, जो अपने शरीरकी ममतासे सर्वथा विनिर्मुक्त हो। ये यथेच्छ सवस्त्र-निर्वस्त्र आदि किसी भी रूपमें रह सकते हैं। इसके लिये कोई बन्धन नहीं होता।

८८- महर्षि पराशरप्रोक्त वर्ण तथा आश्रम-धर्म एवं प्रायश्चित्त-धर्मका निरूपण

१७८ संक्षिप्त गरुडपुराण [ आचार-

कर्मविपाक-निरूपण

याज्ञवल्क्यजीने कहा—पापकर्मसे उत्पन्न होनेवाली नारकीय यातनाओंको भोगनेसे उस पापकर्मका क्षय होता है। शेष बचे हुए पापोंका शमन करनेके निमित्त प्राणी पुनः विभिन्न योनियोंमें जन्म ग्रहण करता है। यथा—

ब्रह्महन्ता नरकभोगके पश्चात् श्वान, गर्दभ और ऊँट-योनिमें उत्पन्न होता है। मदिरापायी व्यक्ति मेढक और जुआँ होता है। सुवर्णका चोर कृमि-कीट तथा गुरुतल्पगामी घास-फूसादिको योनिमें जन्म लेता है। इन योनियोंमें पाप-शमन होनेके पश्चात् वे ब्रह्महत्यादिके पापी पुनः यथाक्रम क्षयरोगी, काले दाँतवाले, कुत्सित नखवाले तथा शिपिविष्टक (कुष्ठरोगी) होकर जन्म ग्रहण करते हैं अथवा ये सभी दोष उक्त प्राणियोंकी संततिमें प्रकट होते हैं।

अन्नकी चोरी करनेवाला रोगी, वचन देकर उसका पालन न करनेवाला गूँगा, धान्यका अपहरणकर्ता अधिक अङ्गोंवाला, चुगलखोर दुर्गन्धसे युक्त नाकवाला, तेलका चोर तैलपायी अर्थात् तिलचट्टा कीट, अविद्यमान दोषकी सूचना देनेवाला दुर्गन्धयुक्त मुखवाला होता है।

ब्राह्मणके धनका हरण करनेवाला तथा कन्याको खरीदनेवाला व्यक्ति वनमें राक्षस तथा बैल होता है। रत्नका अपहरणकर्ता हीनजाति और शाक-पातका चोर मयूर-योनिमें जन्म लेता है। पुष्पका चोर छछुन्दरी, धान्यापहारी मूषक, फलका चोर वानर, पशुओंका हरण करनेवाला बकरी तथा दूधहर्ता काकयोनिमें उत्पन्न होता है।

मांस, वस्त्र और नमककी चोरी करनेवाले मनुष्य यथाक्रम—गृध्र, श्वेतकुष्ठी तथा चीरी<sup></sup> की योनि प्राप्त करते हैं। उस फलको भोगकर वे तिर्यग्योनिमें उत्पन्न होते हैं।

इस प्रकार भोग भोगनेके पश्चात् ये लक्षणभ्रष्ट पतितजन दूसरे जन्ममें दरिद्र या पुरुषाधम होते हैं। तत्पश्चात् अपने सत्कर्मोंसे निष्कलुष होकर वे योगोके महान् कुलमें जन्म लेते हैं और सुलक्षणोंसे युक्त होते हुए वे धन-धान्यसे सम्पन्न हो जाते हैं। (अध्याय १०४)


प्रायश्चित्त-विधान एवं सान्तपन, कृच्छ्र, पराक तथा चान्द्रायणादि व्रतोंका विविध स्वरूप

याज्ञवल्क्यजीने पुनः कहा—हे मुनियो ! विहित कर्म न करनेसे, निन्दित (निषिद्ध) कर्मका आचरण करनेसे एवं इन्द्रिय-निग्रह न करनेके कारण मनुष्य अधोगतिको प्राप्त करता है<sup></sup>। अतएव आत्मशुद्धिके लिये प्रयत्नपूर्वक प्रायश्चित्त करना चाहिये। इस प्रकार प्रायश्चित्त-कर्म करनेसे उसकी अन्तरात्मा प्रसन्न हो जाती है और लोक भी उसके साथ प्रसन्नतापूर्वक व्यवहार करता है। प्रायश्चित्तसे पापका विनाश भी हो जाता है। प्रायश्चित्त न करनेवाले तथा पश्चात्तापसे रहित पापीजन पापके प्रभावसे महारौरव नरकसे भी महाभयंकर तामिस्र, लोहशंकु, पूतिगन्ध, हंसाभ, लोहितोद, संजीवन, नदीपथ, महानिलय, काकोल, अन्धतामिस्र तथा तापन नामक नरकमें जाते हैं।

ब्रह्महन्ता, मद्यपी, ब्राह्मणके सुवर्णका<sup></sup> चोर, गुरुपत्नीगामी तथा इनका संसर्ग करनेवाले मनुष्य अपने पापके कारण अवीचि तथा कुम्भीपाक नामक महाभयानक नरकका भोग करते हैं।

गुरु एवं वेदकी निन्दा करना ब्रह्महत्याके


<sup>१-</sup> ऊँची आवाजवाला कीटविशेष (या० मिताक्षरा, प्रायश्चित्त प्रकरण श्लोक २१५)<br> <sup>२-</sup> विहितस्याननुष्ठानान्निन्दितस्य च सेवनात्। अनिग्रहाच्चेन्द्रियाणां नरः पतनमृच्छति॥ (१०५।१)<br> <sup>३-</sup> या० मिताक्षरा प्रा०प्र० श्लोक २२७।

काण्ड ] प्रायश्चित्त-विधान एवं सान्तपन, कृच्छ्र, पराक तथा चान्द्रायणादि व्रतोंका विविध स्वरूप १७९


समान हैं। निषिद्ध पदार्थका भक्षण, कुटिलतापूर्वक आचरण और रजस्वला स्त्रीका अधरपान मदिरापान नामक महापातकके सदृश माना जाता है। अश्व तथा रत्नादिका अपहरण, सुवर्ण-चोरीके महापापकी भाँति होता है। मित्रकी पत्नी, अपनी अपेक्षा उत्तम जातिकी कन्या, चाण्डाली और बहन तथा पुत्रवधूके साथ सहवास करना गुरुपत्नी-गमनके समान महापाप स्वीकार किया गया है। इसी प्रकार माता-पिताकी बहन, मामी, विमाता, आचार्यपुत्री, आचार्यपत्नी तथा पुत्रीके साथ रमण करनेवाला व्यक्ति भी गुरुपत्नीगामीके समान ही महापातकी होता है।

ऐसा महापापी मनुष्य लिंग-छेदनके पश्चात् वध करनेके योग्य होता है। इस प्रकारके पापमें यदि स्त्री सकाम होकर संश्लिष्ट होती है तो उसके लिये भी इसी प्रकारका प्रायश्चित्त-विधान कहा गया है।

गोहत्या, व्रात्यता (समयपर यज्ञोपवीत-संस्कार न होना अर्थात् सावित्रीच्युत होना), चोरी (ब्राह्मणका सुवर्ण अथवा सुवर्ण-सदृश अन्य द्रव्यका हरण करना), ऋण न लौटाना तथा देव, ऋषि एवं पितृ-ऋणसे मुक्त होना, अधिकारी होते हुए भी अग्न्याधान न करना, विक्री न करने योग्य लवण आदिका विक्रय करना, परिवेदन<sup></sup>, रुपये लेकर अध्ययन करानेवालेसे अध्ययन करना, रुपये लेकर अध्यापन करना, परस्त्रीके<sup></sup> साथ सहवास, परिवित्त्यै<sup></sup>, प्रतिषिद्ध सूदसे जीविकायापन, नमकका उत्पादन, स्त्रीवध, शूद्रवध, अधेक्षित वैश्य तथा क्षत्रियका वध करना और निन्दित धनसे जीविका चलाना, नास्तिकता, व्रतका लोप, सुत-विक्रय, माता-पिता तथा मित्रका परित्याग, तालाब-उद्यानका विक्रय, कन्याको दूषित करना, बड़े भाईकी उपेक्षा करके अग्न्याधान तथा विवाह करनेवालेको यजन कराना तथा ऐसे व्यक्तिको कन्यादान करना, गुरुसे अतिरिक्तके साथ कुटिलता करना, व्रतका लोप, केवल अपने लिये भोजन बनानेवाला, मद्यपान करनेवाली स्त्रीका सम्पर्क, स्वाध्याय, अग्नि, पुत्र तथा बन्धुका परित्याग, असत्-शास्त्रका अध्ययन, भार्या एवं अपना विक्रय—ये सभी निन्दित कर्म उपपातक कहे गये हैं। हे मुनियो ! आप अब इनके प्रायश्चित्तका ज्ञान प्राप्त करें—

ब्रह्महत्या करनेपर पापी व्यक्ति शिरःकपाल (खर्पर-खोपड़ी)-को हाथमें लेकर तथा दूसरा एक शिरःकपाल ध्वजके समान दण्डमें लगाकर चले और भिक्षामात्रसे जीविका-निर्वाह करता हुआ अपने पापकर्मका उद्घोष करते हुए बारह वर्षतक अल्प भोजन कर आत्मशुद्धि करे अथवा जानते हुए इच्छापूर्वक ब्रह्महत्या करनेपर ‘लोमभ्यः स्वाहा’ इत्यादि मन्त्रके अनुसार लोमसे शरीरके अवयवोंके प्रतिनिधिस्वरूप यथाविहित विभिन्न द्रव्योंकी आहुति देकर अन्तमें अपने शरीरका भी प्रायश्चित्त-विधानमें निर्दिष्ट विधानके अनुसार अग्निमें प्रक्षेप करे। अपने प्राणोंका त्याग करके ब्राह्मणकी रक्षा करनेसे भी ब्रह्महत्याकी शुद्धि हो जाती है।

अत्यधिक कष्ट देनेवाले दुःसह बहुकालव्यापी रोग या अन्य किसी प्रकारके भयरूप आतंकसे ग्रस्त ब्राह्मणको अथवा मार्गमें पड़ी हुई ऐसी ही गायको निरोग या निरान्तक करके भी ब्रह्महत्याके पापसे मुक्ति पायी जा सकती है। यदि कदाचित् प्रमादवश ऐसे ब्राह्मणकी हत्या किसीके द्वारा होती है, जो ब्राह्मणके लिये अपेक्षित गुणोंसे युक्त नहीं है


१-सहोदर ज्येष्ठ भाईके अविवाहित रहते हुए छोटा भाई यदि विवाह एवं अग्निहोत्र ग्रहण करता है तो वही परिवेदन नामक पाप है।
२-गुरु एवं गुरुके समान श्रेष्ठजनोंके अतिरिक्त स्त्री।
३-छोटे भाईके विवाह कर लेनेपर ज्येष्ठके द्वारा विवाह न करनेपर होनेवाला दोष पारिवित्य कहलाता है।

१८० संक्षिप्त गरुडपुराण [ आचार-

तो इस हत्यासे होनेवाले पापसे मुक्तिके लिये यह प्रायश्चित्त है—वनमें रहकर मन्त्र ब्राह्मणात्मक वेदका तीन बार पारायणकर अथवा सरस्वती (वेदविद्या)-की सेवामें अपना पूर्ण समर्पण करनेके साथ अपना सब कुछ धन (सर्वस्व) योग्य पात्रमें समर्पित करके अपनेको शुद्ध किया जाय। सोमयाग प्रयोगमें वर्तमान क्षत्रिय और वैश्यका वध करनेपर ब्रह्महत्याके लिये जो प्रायश्चित्त है, उसे करे। गर्भहत्या करनेवाले पापीने जिस वर्णका गर्भ नष्ट किया हो, उसी वर्णके अनुसार उसको उस पापका प्रायश्चित्त करना चाहिये। रजस्वला होनेके बाद ऋतुस्नान की हुई स्त्रीकी हत्या करनेवाला जिस वर्णकी स्त्रीकी हत्या की है, उस वर्णके अनुसार प्रायश्चित्त करे। हत्या करनेके लिये उद्यत होनेपर यदि हत्यारेको उस कृत्यमें सफलता नहीं प्राप्त होती है तो भी वह हत्याके पापसे मुक्त नहीं है, उसको उस पापका प्रायश्चित्त करना चाहिये।

सोमयागके लिये दीक्षित ब्राह्मणकी हत्या करनेपर ब्रह्महत्याके लिये विहित प्रायश्चित्तका दुगुना प्रायश्चित्त-व्रत करे। मदिरापान करनेवालेका प्रायश्चित्त, अग्निके समान तप्त मदिरा एवं गोमूत्रका अथवा अग्निके समान लाल-लाल खौलता हुआ गोघृतपान एवं गोदुग्धपान करनेसे होता है और जल समझकर भूलसे मदिरा पी लेनेपर जटाधारण करके मलिन वस्त्र धारणकर अग्निके समान तप्त घृत पीते हुए ब्रह्महत्याके लिये विहित व्रत करे तथा पुनः सवर्णोचित संस्कार करे तब शुद्धि होती है।

वीर्य, विष्ठा, मूत्रका पान करनेवाली ब्राह्मणी एवं सुरा पीनेवाली ब्राह्मणी पातकी हो जाती है। पतिलोकसे परिभ्रष्ट होकर वह क्रमशः गृध्री, सूकरी तथा कुतियाकी योनिमें जन्म लेती है।

ब्राह्मणके सुवर्णकी चोरी करनेवाले द्विजको चाहिये कि वह राजाको मूसल समर्पित करके अपने चौर्य-कर्मका उद्घोष करे। तत्पश्चात् उस मूसलके आघातसे वह मृत्युको प्राप्त हो या जीवित दोनों दशामें पवित्र हो जाता है। ऐसा द्विज अपनी तौलके बराबर सुवर्ण देकर भी आत्मशुद्धि कर सकता है।

जो गुरु-पत्नीके साथ सहवास करता है, उसको दहकती हुई लौहमयी स्त्री-प्रतिमाके साथ शयन करके अपने शरीरका परित्याग करना चाहिये अथवा अपना लिंग और अण्डकोश काटकर नैर्ऋत्य दिशामें फेंक देना चाहिये और शरीरपर्यन्त पीछे मुँह करके चलता रहे अथवा वह दुरात्मा तीन वर्ष प्राजापत्य तथा कृच्छ्रव्रतका पालन करे या तीन मासतक चान्द्रायणव्रत एवं वेद-संहिताका पाठ करके भी वह उस पापसे विमुक्त हो सकता है।

गो-वध करनेवाले पापीको पञ्चगव्य पानकर एक मासतक संयमित जीवन व्यतीत करना चाहिये। वह गोष्ठमें निवास करते हुए गौओंका अनुगमन तथा गौका दान करे।

चान्द्रायणव्रत करनेसे उपपातकोंकी शुद्धि होती है। एक मासतक दुग्ध-पान अथवा पराक नामक व्रत करके उन उपपातकोंसे शुद्धि प्राप्त की जा सकती है।

क्षत्रिय-वध करनेपर मनुष्यको एक बैल और एक हजार गायोंका दान देना चाहिये अथवा वह तीन वर्षतक ब्रह्महत्याके लिये विहित व्रतका पालन करे। वैश्यका वध करनेवाले मनुष्यको एक वर्षतक ब्रह्महत्याका प्रायश्चित्त-व्रत अथवा एक सौ गायोंका दान करना चाहिये। शूद्रकी हत्या करनेपर छः मासतक ब्रह्महत्याका प्रायश्चित्त अथवा दस सवत्सा दूध देनेवाली गायोंका दान दे।* अदुष्ट अर्थात् सुशीला सच्चरित्र स्त्रीका वध करनेपर मनुष्यको शूद्र-वध-विहित प्रायश्चित्तव्रतका पालन करना चाहिये।


*ये सभी प्रायश्चित्त अज्ञानपूर्वक वधके लिये विहित हैं।

८९- बृहस्पतिप्रोक्त नीतिसार

काण्ड ] प्रायश्चित्त-विधान एवं सान्तपन, कृच्छ्र, पराक तथा चान्द्रायणादि व्रतोंका विविध स्वरूप १८१


मार्जार (बिल्ली), गोह, नेवला, साधारण पशु तथा मेढककी हत्या करनेपर पापी व्यक्ति तीन रात्रितक दुग्धपानके साथ ही पाद कृच्छ्रव्रतका पालन करे। हाथीका वध करनेपर मनुष्यको पाँच नील¹ बैलोंका दान देना चाहिये। शुक पक्षीकी हत्या करनेपर दो वर्षका बछड़ा तथा क्रौंच पक्षीका वध करनेपर तीन वर्षका बछड़ा दान देना चाहिये। गधा, बकरा और भेड़की हत्या करनेपर भी एक बैलका दान दे। वृक्ष, गुल्म, लता तथा झाड़ीको काटनेपर सौ बार गायत्री-जप करे।

मधु और मांसका भक्षण करनेपर कृच्छ्रव्रत तथा अन्य शेष व्रतोंका पालन करना चाहिये। यदि गुरुके द्वारा प्रेषित शिष्यकी मृत्यु मार्गमें हो जाती है तो गुरु तीन कृच्छ्रव्रतका पालन करे, किंतु गुरुके प्रतिकूल कार्य करनेपर शिष्यके द्वारा उन्हें प्रसन्न करनेसे ही शुद्धि हो जाती है।

शत्रुओंको धान्य आदि तथा प्रीति आदिके द्वारा प्रसन्न करे। यदि किये जा रहे उपकारके बीच ही ब्राह्मणकी मृत्यु हो जाती है तो उपकारी व्यक्तिको पाप नहीं लगता।

जो मनुष्य दूसरेको महापापी तथा उपपातकीका मिथ्या दोष लगाता है, ऐसा मनुष्य जितेन्द्रिय रहकर एक मासतक केवल जल पीकर रहे और पापमोचनमन्त्रका जप करे।

असत्-प्रतिग्रह लेनेसे जो पाप होता है, उससे मुक्ति प्राप्त करनेके लिये एक मासपर्यन्त ब्रह्मचर्यका पालन करते हुए पयोव्रत करे। गोष्ठमें निवासकर गायत्री-मन्त्रके जपमें परायण रहे। ऐसा करनेसे मनुष्य पापविमुक्त हो जाता है।

(यथासमय यज्ञोपवीत-संस्कारादिसे वञ्चित) व्रात्यका यजन करानेवाला तीन कृच्छ्रव्रतका आचरण करके अपने उस पापसे मुक्त हो सकता है। ऐसे ही अभिचारक क्रिया करनेवालेके लिये भी यही प्रायश्चित्त है। वेद²प्लावी वर्षपर्यन्त जौका भक्षण करे। शरणमें आये हुएका परित्याग करनेवाला भी वर्षपर्यन्त जौका भक्षण करे।

गर्दभयान तथा उष्ट्रयानसे गमन करनेवाला तीन प्राणायाम करे। इसी प्रकार नग्नस्नान, नग्न-शयन और दिनमें स्त्रीगमन करनेपर भी तीन प्राणायामसे शुद्धि होती है।

गुरुजनोंको 'तू' कहने तथा 'हूँ' इस प्रकार कहनेसे तथा वाद-प्रतिवादमें ब्राह्मणपर विजय प्राप्त करनेसे मनुष्यको जो पाप लगता है, उससे मुक्ति प्राप्त करनेके लिये पापी मनुष्यको उस गुरु या ब्राह्मणको प्रसन्नकर एक दिनका उपवास करना चाहिये। ब्राह्मणपर प्रहार करनेके लिये उद्यत होनेपर कृच्छ्रव्रत तथा प्रहार कर देनेपर अतिकृच्छ्रव्रतका पालन करना चाहिये।

जिस निन्दित आचरणके लिये प्रायश्चित्त-विधान निर्दिष्ट नहीं है, उसके लिये देश, काल, आयु, शक्ति और पापपर सम्यक् विचार करके ही प्रायश्चित्तका निर्णय करना चाहिये। शास्त्रकारोंने पाप-विमुक्तिका यही समुचित नियम कहा है।

गर्भपात तथा पतिनिन्दा करना स्त्रियोंके पतनके कारण हैं। ऐसी स्त्रियाँ अपने दोषके अनुसार शास्त्रविहित प्रायश्चित्त नहीं करती हैं तो उनका परित्याग ही उचित है अन्यथा उन्हें अपने घरमें जीवनयापनके लिये आवश्यक सामान देकर रखना चाहिये।

जो पाप विख्यात हो चुका है, उसका प्रायश्चित्त गुरुजनोंके (परिषद्के)³ अभिमतके अनुसार ही


१. नील-वृष एक विशिष्ट लक्षणवाले बैलको कहते हैं।
२. या० स्मृति श्लोक २८८ की मिताक्षरा व्याख्याके अनुसार प्रकृतमें विप्लव शब्दके तीन अर्थ हैं—१-जो व्यक्ति वेदकी रक्षा कर सकता है, यदि वह वेदरक्षा नहीं करता तो यह वेदका विप्लव है। २-अनध्यायकालमें वेदका अध्ययन विप्लव है। ३-वेदाध्ययनमें समर्थ अथवा वेदाध्ययन करके उत्कर्ष प्राप्त करनेवाले अधिकारीको वेदाध्ययनके प्रति अनुत्साहित करना विप्लव है। इनमेंसे किसी एक दोषसे युक्त व्यक्ति भी वेदप्लावी कहा जाता है।
३. वेद एवं धर्मके विज्ञाता चार ब्राह्मणों अथवा तीन ब्राह्मणों या ब्रह्मवेत्ता धर्मशास्त्रज्ञ एक ब्राह्मणकी भी परिषद् हो सकती है। (या० स्मृति; आचाराध्याय श्लोक ९)

१८२संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

करना चाहिये, किंतु जो पाप विख्यात नहीं है, उसका प्रायश्चित्त गुप्तरूपसे करना चाहिये।

गुप्तरूपसे किये जानेवाले कुछ प्रायश्चित्त इस प्रकार समझना चाहिये—ब्रह्महत्या करनेवाला पापी तीन रात्रियोंतक उपवास रखकर विशुद्ध जल (नदी आदिके जलमें निमग्न होकर)-के मध्य अघमर्षण-मन्त्रका जप करे और दूध देनेवाली गायका दान दे तो वह शुद्ध हो जाता है। किंतु यह प्रायश्चित्त अज्ञानमें होनेवाली ब्रह्महत्याके लिये विहित है। अज्ञानमें होनेवाली ब्रह्महत्याके निमित्त यह प्रायश्चित्त भी किया जा सकता है कि ब्रह्महत्याकर्ता अहोरात्रपर्यन्त वायुपान करते हुए जलमें रहनेके बाद प्रातःकाल जलसे बाहर आकर 'लोमभ्य स्वाहा॑०' इत्यादि आठ मन्त्रोंसे पाँच-पाँच आहुतियाँ यथाविधान अग्निमें दे।

मद्यपी एवं सुवर्णकी चोरी करनेवाले पापीको जलके मध्य स्थित होकर रुद्रदेवके मन्त्रका जप करते हुए तीन दिनका उपवास और कुष्माण्डी ऋचासे घृतकी आहुतियाँ देकर आत्मशुद्धि करनी चाहिये। गुरु-पत्नीके साथ सम्पर्क करनेवाला पापी 'सहस्त्रशीर्षा०' मन्त्रका जप करके पापसे विमुक्त हो जाता है।

सौ बार प्राणायाम करनेपर मनुष्य सर्वविध पापोंसे मुक्त हो जाता है। अज्ञानवश किये गये पापकी शान्ति त्रैकालिक संध्योपासनासे हो जाती है। ब्राह्मणोंके द्वारा एकादश आवृत्ति रुद्रानुवाकोंका जप करवानेसे भी पापका शमन होता है। वेदाभ्यास करनेवाले, शान्तिपरायण और पञ्चयज्ञके अनुष्ठाताको पापका स्पर्शतक नहीं होता। वायुमात्रका भक्षण करते हुए पूरे दिन सूर्यदर्शनके साथ एवं पूरी रात्रि जलमें रहकर एक सहस्र गायत्री-मन्त्रका जप करनेसे ब्रह्महत्यासे होनेवाले पापके अतिरिक्त अन्य समस्त पापोंसे मुक्ति हो जाती है।

ब्रह्मचर्य, दया, क्षमा, भगवद्ध्यान, सत्य, निष्कपटता, अहिंसा, अस्तेय (चोरी न करना), माधुर्य और दम—ये दस यम माने गये हैं। स्नान, मौन, उपवास, यज्ञ, स्वाध्याय, इन्द्रियनिग्रह, तपस्या, अक्रोध, गुरुभक्ति और पवित्रता—ये दस नियम कहे जाते हैं।

गोदुग्ध, गोदधि, गोघृत, गोमूत्र तथा गोमयको 'पञ्चगव्य' कहते हैं। इस पञ्चगव्यका कुशोदकके साथ पान कर व्रती दूसरे दिन उपवास करे। इस तरह दो रात्रिका कृच्छ्र-सान्तपनव्रत होता है। पहले दिन गोदुग्ध, दूसरे दिन गोदधि, तीसरे दिन गोघृत, चौथे दिन गोमूत्र, पाँचवें दिन गोमय, छठें दिन कुशोदक मात्र और सातवें दिन कुछ भी न लेकर शुद्ध उपवास कर जो व्रत पूर्ण किया जाता है, वही महासान्तपन नामक व्रत कहा जाता है।

पलाश, गूलर, कमल, बिल्वपत्र इनमेंसे एक-एकको एक-एक दिन जलमें पकाकर उसी जलको क्रमशः एक-एक दिन पीकर चार दिन रहे एवं पाँचवें दिन कुशोदकमात्र पीकर जिस व्रतका पालन किया जाता है, उसको पर्णकृच्छ्रव्रत कहते हैं। तप्तकृच्छ्रव्रतमें व्रतीको पहले दिन गरम गोदुग्ध, दूसरे दिन गरम घृत, तीसरे दिन गरम जलका प्राशन चौथे दिन उपवास करना चाहिये। यह पवित्र (शुद्ध) करनेवाला महातप्तकृच्छ्रव्रत है।

पहले दिन एकभक्तव्रत (चौबीस घण्टेमें मध्याह्नमें केवल एक बार भोजन करना), दूसरे दिन नक्तव्रत अर्थात् चौबीस घण्टेमें एक बार (रात्रिमें), तीसरे दिन अयाचित (बिना याचनासे प्राप्त) अन्नका भोजन करना, चौथे दिन पूर्ण


१- 'ऋतं च सत्यं०' आदि मन्त्र अघमर्षण है।
२- या० स्मृतिमें श्लोक २४७ में इन मन्त्रोंको दिया गया है।

९०- नीतिसार-निरूपण

काण्ड ] अशौच तथा आपद्वृत्ति-निरूपण १८३


उपवास करनेपर पादकृच्छ्रव्रत होता है। इसी पादकृच्छ्रव्रतको तीन बार करनेसे प्राजापत्यकृच्छ्रव्रत होता है। प्राजापत्यव्रतके अनुसार भोजन और उपवासका नियम किया जाय परंतु भोजनके रूपमें उतना ही अन्न ग्रहण किया जाय, जितना एक हाथमें आता हो। इस तरह चार दिनका उपवास करनेसे अतिकृच्छ्रव्रत हो जाता है। इक्कीस दिनतक जल या दूधमात्र लेकर अतिकृच्छ्रव्रतका पालन करनेसे वह कृच्छ्रातिकृच्छ्रव्रत होता है। बारह दिन पूर्ण उपवास करनेपर एक पराकव्रत होता है।

पहले दिन जिनसे तेल निकाल लिया गया है ऐसे तिल, दूसरे दिन माँड़, तीसरे दिन मट्ठा, चौथे दिन जल तथा पाँचवें दिन सत्तूका आहारकर छठें दिन उपवास करना सौम्यकृच्छ्रव्रत कहलाता है। इस सौम्यकृच्छ्रव्रतमें बताये गये पदार्थोंका एक दिनके स्थानपर तीन-तीन दिनतक क्रमशः पंद्रह दिनतक चलनेवाला तुलापुरुषसंज्ञक कृच्छ्रव्रत होता है अर्थात् इस व्रतमें (प्रथम) तीन रात्रियोंतक निःसृत तेलवाले तिल, (द्वितीय) तीन रात्रियोंतक माँड़, (तृतीय) तीन रात्रियोंतक मट्ठा, (चतुर्थ) तीन रात्रियोंतक जल तथा (पञ्चम) तीन रात्रियोंतक सत्तूका भोजन करके एक दिनका उपवास करना चाहिये।

शुक्लपक्षमें तिथि-वृद्धि-क्रमसे मयूरके अण्डेके समान मात्रावाले एक-एक भोजन-ग्रासका अधिक आहार करते हुए पूर्णिमा तिथिको यह क्रम समाप्त करके पुनः कृष्णपक्षमें प्रतिदिन एक-एक अन्न-ग्रासका भक्षण-क्रमसे घटाते हुए चतुर्दशी तिथिको एक ग्रास भोजन करे एवं अमावास्याको उपवास करे, यह चान्द्रायणव्रत है। चान्द्रायणका अन्य प्रकार यह है—पूरे मासमें दो सौ चालीस ग्रास मात्र हविष्यान्न ग्रहण किया जाय। इन व्रतोंमें यह आवश्यक है कि प्रातः, मध्याह्न एवं सायंकालीन स्नान करके पवित्र-संज्ञक विशेष मन्त्रोंका जप करे तथा गायत्री-मन्त्रसे पिण्डग्रासको अभिमन्त्रित कर उसे ग्रहण करे।

जिन पापोंका प्रायश्चित्त शास्त्रोंमें नहीं बताया गया है, उन पापोंसे भी शुद्धि चान्द्रायणव्रतसे हो जाती है। किसी पापके निवारणके लिये प्रायश्चित्तरूपमें नहीं, अपितु पुण्य प्राप्त करनेकी दृष्टिसे जो इस चान्द्रायणव्रतका अनुष्ठान करता है, उसको चन्द्रलोककी प्राप्ति होती है। इसी प्रकार पुण्य प्राप्त करनेके लिये ही जो कृच्छ्रव्रत करता है, वह महान् ऐश्वर्यका लाभ प्राप्त करता है। (अध्याय १०५)


अशौच तथा आपद्वृत्ति-निरूपण

**याज्ञवल्क्यजीने कहा—**हे यतियो! अब मैं मृत्युके पश्चात् होनेवाले मरणाशौचका वर्णन करता हूँ, उसका श्रवण करें।

दो वर्षसे कम आयुवाले बालककी मृत्यु होनेपर उसको मिट्टीमें गाड़ देना चाहिये।<sup></sup> उसके लिये जलाञ्जलि न दें। दो वर्षसे अधिक आयुके बालककी मृत्यु होनेपर उसे सभी बन्धुगण मिलकर श्मशानभूमिमें ले जाकर लौकिक अग्निसे 'यमसूक्त' का पाठ करते हुए चितामें जला दें। यज्ञोपवीत होनेके अनन्तर मृत्यु होनेपर सभी क्रियाएँ आहिताग्निके समान करे। मरणतिथिके सातवें दिन अथवा दसवें दिनके पहले अपने कुल एवं गोत्रमें आनेवाले परिजन<sup></sup> 'अप नः शोशुचदघम्<sup></sup>' मन्त्रसे दक्षिण दिशाकी ओर अभिमुख होकर यथासम्भव


<sup>१-ऐसे शवको गन्ध, माल्य, अनुलेपन आदिसे अलंकृत करके श्मशानसे अन्यत्र हड्डियोंके समूहसे रहित, ग्राम या नगरके बाहरकी भूमिमें गड्ढा खोदकर रखना चाहिये। (मनुस्मृति ५। ६८-६९)</sup>
<sup>२-समानगोत्र, समानपिण्ड एवं समानोदकवाले लोग।</sup>
<sup>३-ऋग्वेद १। ९७। १-८।</sup>

१८४संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

घरसे बाहर जलाशयपर जाकर जलाञ्जलि दे। इसी प्रकार मातामह तथा आचार्य-पत्नी आदिकी भी उदकक्रिया करनी चाहिये।

मित्र, विवाहित स्त्री (लड़की, बहन आदि), भागिनेय, श्वशुर और ऋत्विक्का यदि मरण हुआ है तो इनके अभ्युदयके लिये इन्हें सविधि जलाञ्जलि देनी चाहिये और वह जलाञ्जलि इनके नाम, गोत्रका उल्लेख करते हुए एक ही बार देनी चाहिये। पाखण्डी एवं पतितजनोंकी मृत्यु होनेपर उनकी उदकक्रिया नहीं होती। ब्रह्मचारी, व्रात्य तथा स्वेच्छाचारिणी स्त्रीके लिये भी उदकक्रियाका निषेध है। मद्यपी और आत्महत्या करनेवाले अशौच और उदकक्रियाके पात्र नहीं होते।

व्यक्तिके निधनपर रोना निषिद्ध है, क्योंकि जीवोंकी स्थिति अनित्य होती है। यथाशक्ति श्मशानभूमिमें दाहादिक क्रिया करके स्वजनोंको घर आना चाहिये। द्वारपर पहुँचकर वे सबसे पहले निम्बकी पत्ती चबाकर, तदनन्तर आचमन करके अग्नि, जल, गोबर और श्वेत सरसोंका स्पर्श कर पत्थरपर पैर रखकर धीरेसे घरमें प्रवेश करें। प्रेतका संस्पर्श करनेपर भी मनुष्यको घरमें प्रविष्ट होनेके पूर्व उक्त विहित-कर्म कर लेना चाहिये। सपिण्डमें आनेवाले जो लोग पुण्यप्राप्त करनेमात्रकी दृष्टिसे प्रेतका अनुगमन अर्थात् उसकी दाह-क्रिया आदिमें सम्मिलित होते हैं और वे यदि तत्काल अपनी शुद्धि चाहते हैं तो दाह-क्रिया सम्पन्न करानेके अनन्तर उन्हें स्नान एवं प्राणायाम कर लेना चाहिये।

उस दिन खरीदे हुए पदार्थोंका भोजन करके* सभी परिजनोंको अलग-अलग भूमिपर सोना चाहिये। पिण्डयज्ञके पश्चात् मृत व्यक्तिके उद्देश्यसे विहित पिण्डदानकी प्रक्रियाके अनुसार अपसव्य आदिके रूपमें तीन दिनतक पिण्डरूप अन्न पृथ्वीपर मौन धारण करते हुए दे। श्राद्धके लिये अधिकृत व्यक्ति खुले हुए आकाशके नीचे एक शिक्य आदिके मिट्टीके पात्रमें जल और दूसरे मिट्टीके पात्रमें दूध उस प्रेतात्माको समर्पित करे। श्राद्धकर्ताको अशुचि होनेपर भी श्रौत अग्नि एवं स्मार्त अग्निमें किये जानेवाले नित्यकर्म (अग्निहोत्र, दर्श पूर्णमास, स्मार्त अग्निमें विहित सायं-प्रातः होम)-का अनुष्ठान श्रुतिकी आज्ञाके अनुसार करना ही चाहिये।

यदि जन्मके पश्चात् और दाँत निकलनेके पूर्व बालककी मृत्यु हो जाती है तो उनके सम्बन्धियोंकी सद्यः शुद्धि हो जाती है। दाँत निकलनेके पश्चात् चूड़ाकरणतक एक अहोरात्रका अशौच होता है और उपनयन-संस्कारके पहले और चूड़ाकरणके बाद बालककी मृत्यु होनेपर तीन रात्रिके बाद अशौच समाप्त होता है। उपनयन-संस्कारके पश्चात् मृत्यु होनेपर दस रात्रियोंका अशौच होता है। सपिण्डोंके लिये दस रात्रिका एवं समानोदक लोगोंके लिये तीन रात्रिका अशौच होता है।

दो वर्षसे कम आयुवाले पुत्र एवं पुत्रीकी मृत्युपर माता-पिता दोनोंको दस रात्रिका अशौच होता है। यदि इस मरणाशौचके मध्य परिवारमें किसी बालकका जन्म या किसीकी मृत्यु होती है तो प्रथम अशौचके शेष दिनोंके पश्चात् ही शुद्धि हो जाती है।

सपिण्डकी मृत्यु होनेपर ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्रके लिये क्रमशः—दस, बारह, पंद्रह तथा तीस दिनोंका अशौच माना गया है। पाणिग्रहण-संस्कारके पूर्व और वाग्दानके पूर्व तथा चूड़ाकरणके बाद कन्याकी मृत्यु होनेपर एक अहोरात्रमें ही शुद्धि हो जाती है। या० स्मृति २४वें श्लोककी मिताक्षराके अनुसार दाँत निकलनेके पूर्व यदि


* बिना माँगे हुए अन्नमात्रका भोजन करना चाहिये।

काण्ड ]
अशौच तथा आपद्वृत्ति-निरूपण
१८५


बालकका मरण हुआ और उसका अग्नि-संस्कार किया गया तो एक दिनमें शुद्धि हो जाती है। गुरु<sup></sup> और अन्तेवासी (शिष्य) वेदाङ्गोंका प्रवक्ता, मामा<sup></sup>, श्रोत्रिय<sup></sup> एवं अनौरस<sup></sup> पुत्र, अपनी वह भार्या जो प्रतिलोम संकरसे अतिरिक्त किसी अन्यके आश्रयमें रह रही है, उसके तथा अपने देशके राजाकी मृत्युपर एक दिनका अशौच होता है। राजा (अभिषिक्त क्षत्रिय आदि राजा), गौ (पशुमात्र), ब्राह्मण (मनुष्यमात्र)-के द्वारा जो आहत होता है, उसके सम्बन्धियोंकी स्नानमात्रसे तत्काल शुद्धि हो जाती है। ऐसे ही जिसने विष या बन्धन आदिके द्वारा बुद्धिपूर्वक आत्मघात कर लिया है, उसके सम्बन्धियोंकी भी तत्काल स्नानमात्रसे शुद्धि हो जाती है और समस्त पृथ्वी या पृथ्वीके एक देशके अभिषिक्त अधिपति क्षत्रिय आदिको मरण या उत्पत्तिनिमित्तिक अशौच नहीं होता। सत्री (लगातार अन्नसत्र चलानेवाले), व्रती (कृच्छ्र, चान्द्रायण आदि व्रतमें प्रवृत्त), ब्रह्मचर्यव्रतमें प्रवृत्त, दाता (वह वानप्रस्थाश्रमी जो केवल दान ही देता है, प्रतिग्रह कभी भी नहीं करता), ब्रह्मविद् (संन्यासी) किसी भी प्रकारके अशौचसे ग्रस्त नहीं होते। दान (किसीको देनेके लिये पूर्वमें संकल्पित द्रव्य), विवाह (विवाहके निमित्त एकत्रित सामग्री), यज्ञ आदि विशेष कृत्योंके लिये एकत्रित सामग्री, संग्राम (युद्धकाल)-में, देशमें अतिभयंकर या राजभयसे उत्पन्न विप्लवकी दशामें, अतिकष्टकर आपत्तिमें किसी भी प्रकारके अशौचकी निवृत्ति तत्काल ही हो जाती है अर्थात् अशौच नहीं होता।

जो अकार्यकारी अर्थात् निषिद्ध कार्य करनेवाले हैं, उनकी शुद्धि दान देनेसे होती है। ग्रीष्म-ऋतु आदिके प्रभावसे जो नदी अत्यल्प जलवाली हो जाती है और उसके किनारे आदि अपवित्र वस्तुओंसे उपहत हो जाते हैं वह नदी जलके वेगपूर्ण उस प्रवाहसे शुद्ध हो जाती है जो प्रवाह नदीको जलमय बना दे और उसके किनारोंको काट देनेमें समर्थ हो।

आपत्कालमें ब्राह्मणको क्षत्रिय एवं वैश्यवर्णकी वृत्तिसे जीविकाका निर्वाह करना चाहिये, किंतु वैश्यवृत्ति करनेवाले ब्राह्मणके लिये फल, सोमलता, क्षौमवस्त्र (सभी वस्त्र), वेत्र आदिकी लताएँ, औषधि लता, दधि, दुग्ध, घृत, जल, तिल, ओदन, रस, क्षार, मधु, लाक्षा, पकाया हुआ हविष्यान्न, वस्त्र, मणि आदि प्रस्तरमात्र, आसव, पुष्प, शाक, मिट्टी, चर्म, पादुका, मृगचर्म, कौशेय (वस्त्र), लवण, मांस, तिलकुट (पिण्याक), मूल और सुगन्धित द्रव्य-पदार्थोंका विक्रय वर्जित है।

ब्राह्मणके द्वारा अपने श्रौत-स्मार्त-यज्ञकी पूर्णताके लिये अपेक्षित धान्य या अन्य किसी अत्यावश्यक औषधि आदिकी व्यवस्थाके लिये अपेक्षित धान्यके बराबर तिलका विक्रय करके धान्यका संग्रह किया जा सकता है। किंतु आपत्कालमें भी लवणादिका व्यापार ब्राह्मणके लिये अवश्य वर्जित है। (आपत्तियोंके कारण नमकादिके अतिरिक्त) ब्राह्मण अन्य जो कुछ हीन आवैश्यवृत्ति करता है, उसमें वह उसी प्रकार निष्कलुष रहता है जैसे सूर्य। आपत्कालमें ब्राह्मण कृषि एवं पशुपालनादि कार्य कर सकता है, किंतु उसके द्वारा अश्वोंका विक्रय त्याज्य है।


१-पिता ही यदि गुरु होते हैं तो उनकी मृत्युपर पिताकी मृत्युपर होनेवाला अशौच होगा।
२-यहाँ मामा मात्रको नहीं लेना है, अपितु मातृ-पक्ष एवं पितृ-पक्षके जितने भी बन्धु हैं उन सबको लेना है।
३-वेदकी एक शाखामात्रका अध्येता।
४-औरसके अतिरिक्त क्षेत्रज, दत्तक आदि पुत्र।

१८६संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

यदि किसी कारण ब्राह्मण कृषि आदिसे भी अपने जीवनकी रक्षा न कर सके तो तीन दिन बुभुक्षित ही रहे। तदनन्तर ब्राह्मणके अतिरिक्त और किसीके यहाँसे केवल एक दिनके लिये धान्य प्राप्त करे तथा अब्राह्मणसे प्राप्त इस धान्यका उपभोग करते समय वह प्रकाशित भी करे कि मैंने अब्राह्मणसे धान्य लेकर आज जीवन-निर्वाह किया है। ऐसे वृत्तिसंकरसे ग्रस्त ब्राह्मणके वृत्त, कुल, रीति, शास्त्राध्ययन, वेदाध्ययन और तप आदि विशेषताओंको जानकर राजाका यह कर्तव्य होता है कि वह उस ब्राह्मणके लिये धर्मानुकूल जीवन-यापनकी व्यवस्था करे। (अध्याय १०६)


महर्षि पराशरप्रोक्त वर्ण तथा आश्रम-धर्म एवं प्रायश्चित्त-धर्मका निरूपण

सूतजीने कहा—महर्षि पराशरने वेदव्यासजीसे वर्णाश्रमादिके धर्मका वर्णन किया था। [उनका यही कहना है कि] कल्प-कल्पमें उत्पत्ति और विनाशके कारण प्रजाएँ आदि क्षीण होती रहती हैं। कल्पके प्रारम्भमें मन्वादि ऋषि वेदोंका स्मरण करके ब्राह्मणादि वर्णोंके धर्मोंका पुनः निरूपण करते हैं।

कलियुगमें दान ही धर्म है। कलियुगमें केवल पाप करनेवालेका परित्याग करना चाहिये<sup></sup>। कलियुगमें पाप तथा शाप—ये दोनों एक वर्षमें फलीभूत हो जाते हैं।

मनुष्य आचार (सदाचार तथा शौचाचार)-से ही सब कुछ प्राप्त करे। संध्या, स्नान, जप, होम, देव और अतिथिपूजन—इन षट्कर्मोंको प्रतिदिन करना चाहिये। आचारवान् ब्राह्मण तथा संन्यासी इस कलियुगमें दुर्लभ हैं। क्षत्रियको चाहिये कि वह शत्रुसेनाओंको जीतकर पृथिवीका भलीभाँति पालन करे। वैश्य कृषि एवं पशुपालन तथा व्यापारादि करे और शूद्र इन तीन द्विजवर्णोंकी सेवामें अनुरक्त रहे। व्यक्तिका पतन अभक्ष्य-भक्षण (शास्त्र-निषिद्ध भोजन), चोरी और अगम्यागमन करनेसे हो जाता है। यदि द्विज कृषिकार्य करता है तो वह थके हुए बैलसे हल न खिंचे तथा उसे भार ढोनेके कार्यमें नियोजित न करे। स्नान और योगादि कार्योंसे निवृत्त होकर पञ्चयज्ञ करे। मध्याह्नकालमें ब्राह्मणोंको भोजन कराये और क्रूरकर्मोंकी निन्दा करे।

तिल तथा घृतका विक्रय नहीं करना चाहिये। पञ्चसूनाजनित<sup></sup> दोषके निवारणार्थ [बलिवैश्वदेव] होम करे। कृषिकर्ता द्विजद्वारा अपनी उपजका क्रमशः छठा भाग राजा, बीसवाँ भाग देवता और तैंतीसवाँ भाग ब्राह्मणोंको देय है, इससे (कृषिजनित) पाप नहीं लगता। कृषिकार्य करनेवाले क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र यदि खलिहानमें उक्त निर्धारित भाग राजा आदिको प्रदान नहीं करते हैं तो वे चोरके समान पापके भागी होते हैं।

मृत्युका अशौच होनेपर [सामान्यतः] ब्राह्मण तीन दिनके पश्चात् शुद्ध हो जाता है<sup></sup>। इसी प्रकार


<sup></sup>—त्यजेद्देशं कृतयुगे त्रेतायां ग्राममुत्सृजेत्। द्वापरे कुलमेकं तु कर्तारं तु कलौ युगे ॥
‘सत्ययुगमें जिस देशमें पाप होता हो उस देशका, त्रेतामें जिस ग्राममें पाप होता हो उस ग्रामका, द्वापरमें जिस कुलमें पाप होता हो उस कुलका और कलियुगमें केवल पाप करनेवालेका त्याग कर देना चाहिये।’
<sup></sup>—सूनाका अर्थ है—पशुके वधका स्थान। यहाँ सूनाका अर्थ है—हिंसाका स्थान। गृहस्थके घरमें हिंसाके पाँच स्थान होते हैं—चूल्हा, पेषणी (कूटने-पीसनेका साधन, खल-बट्टा, सिल आदि), मार्जनी (झाडू आदि), ऊखल, मूसल और जलका कलश—ये ही पाँच सूना हैं।
<sup></sup>—यहाँपर ब्राह्मण आदिकी अशौच-निवृत्तिके लिये दो प्रकारके वचन दिये गये हैं। पहलेके अनुसार तीन दिनमें तथा दूसरेके अनुसार दस दिनमें शुद्धि लिखी है। कलियुगमें दूसरा वचन ही मानकर अशौच-निवृत्तिकी व्यवस्था समझनी चाहिये।

९१- नीतिसार

काण्ड ] महर्षि पराशरप्रोक्त वर्ण तथा आश्रम-धर्म एवं प्रायश्चित्त-धर्मका निरूपण १८७


क्षत्रिय दस दिन, वैश्य बारह दिन और शूद्र एक मासके पश्चात् शुद्ध होता है। ब्राह्मण दस दिन, क्षत्रिय बारह दिन, वैश्य पंद्रह दिन तथा शूद्र एक मासमें शुद्ध होते हैं। जो सपिण्ड-कुल-परम्परासे प्राप्त होनेवाली भू-सम्पत्ति आदिके हिस्सेदार हैं। और पृथक् आवास बनाकर रहनेवाले बन्धु-बान्धव हैं, उन्हें जन्म तथा मृत्यु आदिकी विपत्तिमें अशौच होता है। चौथी पीढ़ीतक दस दिन, पाँचवीं पीढ़ीमें छः दिन, छठीं पीढ़ीमें चार दिन, सातवीं पीढ़ीमें तीन दिन मरणाशौच होता है। देशान्तरमें बालककी मृत्यु होनेपर सद्यः स्नानमात्रसे शुद्धि होती है।

जो बालक जन्म होनेके पश्चात् दाँत निकलनेके पूर्व ही मर जाते हैं या जिनकी मृत्यु गर्भसे बाहर होनेके समय हो जाती है, उन सबका अग्नि-संस्कार, पिण्डदान तथा जल-संतर्पण-कार्य नहीं होता है। यदि स्त्रीका गर्भस्राव हो जाता है अथवा गर्भपात हो जाता है तो जितने मासका वह गर्भ होता है, उतने दिनतक सूतक मानना चाहिये। जन्मसे लेकर नामकरणतक बालककी मृत्यु होनेपर सद्यः स्नानमात्रसे शुद्धि होती है। यदि नामकरणके पश्चात् चूडाकरण-संस्कारके मध्य बालककी मृत्यु होती है तो एक दिन और एक रात्रिका अशौच होता है। यदि उपनयन-संस्कारके पूर्व बालककी मृत्यु हो जाती है तो तीन रात्रियोंतक और तत्पश्चात् उसकी मृत्यु होनेपर दस रात्रियोंका अशौच होता है।

चार मासतकके गर्भके नष्ट होनेपर गर्भस्राव तथा पाँच और छः मासके गर्भके गिरनेको गर्भपात कहा जाता है।

जो ब्रह्मचर्यव्रतके अग्निहोत्रकी दीक्षामें है अथवा अनासक्त-भावसे जीवन व्यतीत करनेवाले हैं, उनके लिये जन्म एवं मृत्युका अशौच नहीं होता। शिल्पकार, कारुकर्म करनेवाला (चटाई बनानेवाला), वैद्य, दास-दासी-भृत्य-अग्निहोत्री तथा श्रोत्रिय ब्राह्मण और राजा—ये सद्यः शौचवाले कहे गये हैं।

जन्मका अशौच होनेपर माता दस दिनमें तथा पिता स्नान करनेके बाद शुद्ध हो जाता है। सूतिका-गृहमें प्रसूता स्त्रीके स्पर्शसे पिताको अशौच हो जाता है। आचमनसे पिता इस अशौचसे शुद्ध हो जाता है।

यदि विवाहोत्सव तथा यज्ञादिक कार्योंके सम्पादन-कालमें ही मृत्यु या जन्मका अशौच हो जाता है तो पूर्वसंकल्पित कार्यसे अन्य कार्यके निषेधका विधान है। अर्थात् पूर्वसंकल्पित कार्यके लिये अशौच नहीं होता। बादके कार्यमें अशौच होगा।

अनाथ व्यक्तिके शवको वहन करनेपर प्राणायाममात्रसे ही मनुष्यकी शुद्धि हो जाती है, किंतु शूद्रका शव उठानेपर तीन रात्रियोंके पश्चात् शुद्धि होती है।

आत्मघात, विषपान, फाँसी तथा कृमिदंशसे मृत्यु होनेपर उसका संस्कार यथाविधान विशेष प्रायश्चित्तके बिना नहीं होता है। गौके द्वारा आहत होनेसे अथवा कृमिदंशके कारण मरे हुए व्यक्तिका स्पर्श करनेपर कृच्छ्रव्रतसे शुद्धि होती है, यह शुद्धि अशौच-निमित्तक है।

जो पत्नी यौवनावस्थामें अपने निर्दुष्ट एवं सच्चरित्रवान् पतिका परित्याग कर देती है, वह सात जन्मोंतक स्त्रीयोनिको प्राप्त कर बार-बार विधवा होती है। ऋतुकालमें पत्नीके साथ संसर्ग न करनेके कारण पुरुषको बालहत्याका पाप लगता है। जो स्त्री अन्न-पानादिकी दृष्टिसे भ्रष्ट होती है, वह अगम्या होती है तथा जन्मान्तरमें सूकरयोनि प्राप्त करती है।

औरस और क्षेत्रज पुत्र एक ही पिताके पुत्र

१८८संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

होते हैं। अतः ये दोनों पुत्र अपने पिताके लिये पिण्डदान कर सकते हैं।

परिवेत्ता<sup></sup> एवं परिवित्ति (बड़े भाईद्वारा अपने विवाहकी अस्वीकृति देनेवाला)-को अपनी शुद्धिके लिये कृच्छ्रव्रत करना चाहिये। इसी प्रकार कन्याको भी कृच्छ्रव्रत करना चाहिये। ऐसी कन्याके दान देनेवालेको अतिकृच्छ्रव्रत तथा विवाह-विधि सम्पन्न करानेवालेको चान्द्रायणव्रत करना चाहिये।

यदि बड़ा भाई कुबड़ा, बौना, नपुंसक, हकलाने-वाला, मूर्ख, जन्मान्ध, बहरा तथा गूँगा हो तो छोटे भाईके द्वारा विवाह कर लेनेमें कोई दोष नहीं होता।

जिसे वाग्दानमात्र किया गया है ऐसा भावी पति यदि परदेश चला जाय, मर जाय, संन्यास-धर्मका अवलम्बन कर ले, नपुंसक हो अथवा पतित हो गया हो तो इन पाँच आपदाओंमें वाग्दत्ता कन्या दूसरे पतिका वरण कर सकती है। अपने पतिके साथ सतीधर्मके अनुसार अग्निमें प्रवेश करनेवाली स्त्री शरीरमें स्थित रोमोंकी संख्याके बराबर वर्षोंतक स्वर्गमें निवास करती है।

कुत्ता आदिके काटनेपर मनुष्यको गायत्री-मन्त्रके जपसे शुद्धि करनी चाहिये। जिसे स्वयं गायत्री-जपका अधिकार नहीं है, उसे ब्राह्मणद्वारा गायत्री-जप कराना चाहिये। चाण्डाल आदिके द्वारा मारा गया अग्निहोत्री ब्राह्मण लौकिक अग्निसे जलाने योग्य होता है। [उस अग्निसे जलाये गये] ब्राह्मणकी अस्थियोंको दूधमें प्रक्षालित करके पुनः विधिवत् मन्त्रपूर्वक अपने अग्निहोत्रशालाकी अग्निसे प्रदग्ध करना चाहिये। यदि मृत्यु प्रवासकालमें होती है तो परिजनको अपने घरपर उस मृत व्यक्तिका कुशसे शरीर बनाकर पुनः अग्निदाह करना चाहिये।

कृष्णमृगचर्मपर छः सौ पलाशपत्रोंको (मृतककी आकृतिके समान) बिछाकर अथवा कुशमय शरीरका निर्माण करके शिश्न-भागपर शमी तथा वृषण-भागपर अरणिके काष्ठको स्थापित करे। उसके दायें हाथके स्थानपर कुण्ड (स्थाली) और बायें हाथके स्थानपर उपभृत [यज्ञियपात्र], पार्श्वभागमें उलूखल तथा पीठकी ओर मूसल रखे। तत्पश्चात् उस शवके वक्षःस्थलपर [सोमरस तैयार करनेके लिये प्रयोगमें आनेवाले] पत्थरको रखकर उसके मुखभागमें घृत-तण्डुल और तिल डालना चाहिये। कानके पास प्रोक्षणीपात्र और नेत्रोंके संनिकट आज्यस्थाली रखे। कान, नेत्र, मुख तथा नासिका-भागमें स्वर्ण-खण्ड रखनेका विधान है। इस प्रकार अग्निहोत्रके समस्त उपकरणोंके सहित उस अग्निहोत्रीका शवदाह करनेसे वह (मृत अग्निहोत्री) ब्रह्मलोकको प्राप्त करता है। 'असौ स्वर्गाय लोकाय स्वाहा' इस मन्त्रसे घृतकी एक आहुति देनी चाहिये।

हंस, सारस, क्रौँच, चक्रवाक, कुक्कुट, मयूर और मेषका वध करनेवाला मनुष्य एक दिन तथा एक रात्रिके उपवासके पश्चात् पापसे शुद्ध हो जाता है। अन्य सभी पक्षियोंका वध करनेपर एक अहोरात्रमें शुद्धि होती है।

सभी प्रकारके चतुष्पद पशुओंका वध करनेपर जो पाप मनुष्यको लगता है, उसका अवमोचन खड़े होकर एक अहोरात्र उपवास कर [गायत्री] मन्त्रका जप करनेसे होता है।

शूद्रका वध करनेपर कृच्छ्रव्रत, वैश्यकी हत्या करनेपर अतिकृच्छ्रव्रत, क्षत्रियका वध करनेपर बाईस चान्द्रायणव्रत एवं ब्राह्मणकी हत्या करनेपर तीस चान्द्रायणव्रत करना चाहिये। (अध्याय १०७)


१-ज्येष्ठ भ्राताके अविवाहित रहते हुए अपना विवाह कर लेनेवाला छोटा भाई 'परिवेत्ता' कहा जाता है और परिवेत्ताका अविवाहित बड़ा भाई 'परिवित्त' कहा जाता है।