गरुड़ पुराण
Garuda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
| ८० | संक्षिप्त गरुडपुराण | [ आचार- |
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आचार्य वेदव्रत, वामदेव्य, ज्येष्ठसाम, रथन्तर एवं भेरूण्डसामका पाठ करे। ऐसे ही कुण्डके उत्तरमें स्थित अथर्ववेदवेत्ता अथर्वशिरस्, कुम्भसूक्त, नीलरुद्रसूक्त एवं मैत्रसूक्तका पारायण करे।
तदनन्तर आचार्य अस्त्र-मन्त्रके द्वारा भलीभाँति कुण्डका प्रोक्षण करके स्वसामर्थ्यके अनुसार प्राप्त ताम्र या अन्य किसी धातुसे निर्मित पात्रमें अग्नि ग्रहणकर उस मूर्तिके आगे स्थापित करे। तत्पश्चात् उस अग्निको अस्त्र-मन्त्रसे प्रज्वलित करके कवच-मन्त्रके द्वारा वेष्टित कर देना चाहिये (इसे अग्निका अमृतीकरण-कृत्य कहते हैं)।
इस प्रकार अमृतीकृत अग्निको गुरु वेदमन्त्रोंसे अभिमन्त्रित करके पात्रसहित कुण्डके चारों ओर घुमाये और वैष्णवयोगसे उसे प्रज्वलितकर वहीं कुण्डके मध्य स्थापित करे। अग्निके दक्षिणमें ब्रह्मा और उत्तरमें प्रणीताको स्थापितकर कुण्डकी प्रत्येक दिशाओं एवं विदिशाओंमें कुशाके विष्टरोंसे परिधिका निर्माण करे।
तदनन्तर गुरु ब्रह्मा, विष्णु, हर और ईशानकी पूजा करके दर्भोंके ऊपर अग्निको रखकर दर्भसे ही वेष्टित करके दर्भजलसे ही प्रोक्षण करे, क्योंकि कुशाद्वारा प्रदत्त जलका प्रोक्षण करनेसे बिना मन्त्रके भी शुद्धि हो जाती है और पूर्वाग्र, उत्तराग्र एवं पश्चिमाग्र अखण्डित तथा विस्तृत कुशाओंसे वेष्टित वह्निमें देवताका सांनिध्य स्वयं ही हो जाता है।
अग्निकी रक्षाके लिये मन्त्रज्ञोंने जो उपर्युक्त नियम कहे हैं, उनके विषयमें कुछ आचार्योंका विचार है कि उन सभी कृत्योंको जातकर्म-संस्कारके पश्चात् करना चाहिये।
अग्निका पवित्रीकरण करके आचार्यको आज्य-संस्कार करना चाहिये। अनन्तर आज्य (घृत)-को आहुतियोग्य बनानेके लिये उसका अवेक्षण, निरीक्षण, नीराजन एवं अभिमन्त्रण करके उसके द्वारा मुख्य हवनके पूर्व करणीय आज्यभाग एवं अभिघार* नामका कृत्यविशेष सम्पन्न करना चाहिये। तदनन्तर उस आज्यसे पाँच-पाँच आहुतियाँ देनी चाहिये। उसके बाद गर्भाधान-संस्कारसे लेकर गोदान-संस्कारपर्यन्त अग्निका संस्कार करके आचार्यको अपनी शाखाके अनुसार विहित मन्त्रोंसे अथवा प्रणवसे आहुति प्रदान करनी चाहिये। आचार्य अन्तमें पूर्णाहुति प्रदान करे, क्योंकि पूर्णाहुति देनेसे यजमानकी अभिलाषा पूर्ण हो जाती है।
इन वेद-विहित नियमोंसे उत्पन्न हुई अग्नि सभी कार्योंमें सिद्धि प्रदान करनेवाली होती है। अतएव पुनः उसकी पूजा करके अन्य सभी कुण्डोंमें उसे प्रतिष्ठित करना चाहिये। वहाँ प्रत्येक आचार्य अपने शाखामन्त्रोंसे इन्द्रादि सभी देवोंको सौ-सौ आहुतियाँ प्रदान करे। सौ आहुतियोंके पश्चात् पूर्णाहुति समर्पित करके सभी देवोंको एक-एक आहुति पुनः प्रदान करनी चाहिये।
होता अपने द्वारा अनुष्ठित आज्याहुतियोंके शेष भागको यथाविधान कलशमें समर्पित करे। इसके बाद आचार्य देवता, मन्त्र एवं अग्निके साथ अपने तादात्म्यकी भावना करते हुए पूर्णाहुति सम्पन्न कराये।
यज्ञमण्डपसे बाहर आकर आचार्य दिक्पालोंको बलि प्रदान करे। इस बलिकृत्यके साथ भूतों, देवताओं और नागोंको बलि देनी चाहिये। तिल और समिधा—यही दो होम-पदार्थ विहित हैं। आज्य तो उन दोनोंका सहयोगी है, क्योंकि घृतके बिना हवनीय द्रव्य अक्षय (परिपूर्ण) नहीं होता।
इस हवनकृत्यमें पुरुषसूक्त, रुद्रसूक्त, ज्येष्ठसाम तथा 'तन्नयामि' इस मन्त्रसे युक्त भारुण्डसूक्त, महामन्त्रके रूपमें प्रसिद्ध नीलरुद्रसूक्त एवं अथर्वके कुम्भसूक्तका पारायण यथाक्रम पूर्व, दक्षिण तथा
* अभिघार (आधार) एवं आज्यभाग आहुतिविशेषका नाम है। यह कुशकण्डिका नामके विशेष कृत्यके सम्पादन-कालमें मुख्य आहुतियोंके पूर्व अवश्य करणीय है।
३४- दानधर्मका निरूपण एवं विभिन्न देवताओंकी उपासना
काण्ड ] देव-प्रतिष्ठाकी सामान्य विधि [ ८१
पश्चिम आदि दिशाओंमें आसीन ऋत्विजोंसे करवाना चाहिये। इस हवन-कर्ममें एक-एक सहस्र आहुतिका विधान है और इन आहुतियोंमें वेदोंके आदि मन्त्रों, देवताके नाम-मन्त्रों, अपनी शाखाके विहित मन्त्रों, गायत्री-मन्त्रके साथ यथाविधान व्याहृति एवं प्रणवका प्रयोग करना चाहिये। साथ ही यह भावना करनी चाहिये कि हम इन आहुतियोंको देवताके शिरोभाग, मध्यभाग तथा पादभाग आदिमें समर्पित कर रहे हैं और स्वयंको देवमय समझना चाहिये।
इस प्रकार होम-विधिको सम्पन्न करके देशिक (आचार्य)-को चाहिये कि वह देव-विग्रहमें मन्त्रोंका न्यास करे। यथा— ‘ॐ अग्निमीळे०’ मन्त्रका देवके दोनों चरणोंमें, ‘ॐ इषेत्वेति०’ मन्त्रका दोनों गुल्फोंमें, ‘ॐ अग्न आयाहि०’ मन्त्रसे देवकी दोनों जंघाओंमें, ‘ॐ शं नो देवी०’ मन्त्रका दोनों जानुओंमें, ‘ॐ बृहद्रथन्तर०’ मन्त्रका दोनों ऊरुओंमें न्यास विहित है। देवके उदर भागमें भी इसी प्रकार न्यास करना चाहिये। तदनन्तर ‘ॐ दीर्घायुष्ट्वाय०’ मन्त्रका देवके हृदयमें, ‘ॐ श्रीश्चते०’ मन्त्रका गलेमें, ‘ॐ त्रातारमिन्द्र०’ मन्त्रका वक्षःस्थलमें, ‘ॐ त्र्यम्बक०’ मन्त्रका दोनों नेत्रोंमें तथा ‘ॐ मूर्द्धा भव०’ मन्त्रका मस्तकमें न्यास करके विहित लग्नमुहूर्तमें हवन करे।
इसके पश्चात् ‘ॐ उत्तिष्ठ ब्रह्मणस्पते०’ मन्त्रसे देवमूर्तिका उत्थापन करके मन्त्रवेत्ता आचार्य ‘देवस्य त्वा०’ मन्त्रसे मूर्तिका स्पर्श करते हुए वेदोक्त पुण्याहवाचनके साथ देवप्रासादकी प्रदक्षिणा करे। इसके अनन्तर विविध रत्न, विविध धातु, लौहद्रव्य एवं विधानके अनुसार अनेक प्रकारके सिद्धबीजोंके साथ दिक्पाल आदि देवताओंकी प्रदक्षिणा विहित है। इसके अनन्तर यथास्थान प्रधान देवप्रतिमाकी प्रतिष्ठा होनी चाहिये।
देवमूर्तिको मन्दिरके मुख्य गर्भभागमें स्थापित नहीं करना चाहिये और न उस गर्भका परित्याग करके अन्यत्र ही उसकी स्थापना होनी चाहिये, अपितु गर्भभागका कुछ मध्यभाग छोड़कर उसे स्थापित करनेसे दोषका परिहार हो जाता है। अतः तिलके कणमात्र परिमाणमें मूर्तिको उत्तरकी ओर कुछ बढ़ा लेना चाहिये।
‘ॐ स्थिरो भव’, ‘शिवो भव’, ‘प्रजाभ्यश्च नमो नमः’, ‘देवस्य त्वा सवितुः०’ आदि मन्त्रोंसे गुरु देवमूर्तिका यथाविधि विन्यास एवं अभिमन्त्रण करे। साथ ही सुप्रतिष्ठित देवप्रतिमाको यथाविधान सम्पातकलशके जलसे ही स्नान कराना चाहिये।
तदनन्तर धूप-दीप, अन्य सुगन्धित पदार्थ तथा नैवेद्यसे उस देवप्रतिमाकी विधिवत् पूजा करके अर्घ्य प्रदान करे और प्रणाम निवेदन करके क्षमा-प्रार्थना करे।
उसके बाद अपनी शक्तिके अनुसार यजमान ऋत्विजोंको पात्र, वस्त्र एवं उपवस्त्र, छत्र, सुन्दर बहुमूल्य अँगूठी तथा दक्षिणा देकर संतुष्ट करे। तदनन्तर सावधान होकर यजमान चतुर्थी होम करे। सौ आहुतियोंको देकर अन्तमें वह पूर्णाहुति प्रदान करे।
इसके बाद आचार्य मण्डपसे बाहर आकर दिक्पालोंको बलि प्रदान करके पुष्प लेकर ‘क्षमस्व’ इस वाक्यसे उन देवोंका विसर्जन कर दे।
इस प्रकार यज्ञ पूर्ण होनेके पश्चात् आचार्यको कपिला धेनु, चामर, मुकुट, कुण्डल, छत्र, केयूर, कटिसूत्र, व्यजन (पंखा), वस्त्रादि वस्तुएँ, ग्राम तथा साज-सज्जापूर्ण सुन्दर भवन प्रदान करना चाहिये। तदनन्तर आचार्य तथा अन्य सहयोगीजनोंके लिये सुन्दर विशाल भोजका आयोजन कराकर सबको संतुष्ट करना चाहिये। ऐसा करनेसे यजमान कृतार्थ हो जाता है और वास्तुदेवकी प्रसन्नतासे उसे मुक्ति प्राप्त हो जाती है। (अध्याय ४८)
| ८२ | संक्षिप्त गरुडपुराण | [ आचार- |
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वर्ण एवं आश्रमधर्मोंका निरूपण
ब्रह्माजीने कहा— हे व्यासजी महाराज! स्वायम्भुव मनु आदि शास्त्रकारोंके द्वारा पूज्य तथा सृष्टि, स्थिति और प्रलय करनेवाले भगवान् हरिकी पूजा ब्राह्मणादि चारों वर्ण अपने-अपने धर्मके अनुसार करते हैं। मैं पृथक्-पृथक् रूपसे उनके धर्मोंको कह रहा हूँ। आप उसे सुनें।
हे ब्राह्मणश्रेष्ठ! यजन, याजन, दान, प्रतिग्रह, अध्ययन और अध्यापन—ये छः कर्म ब्राह्मणके धर्म हैं। दान, अध्ययन तथा यज्ञ—ये क्षत्रिय एवं वैश्यके साधारण धर्म हैं। इसके अतिरिक्त दण्ड क्षत्रियके लिये और कृषि करना वैश्यके लिये विशेष धर्म स्वीकार किया गया है।
ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य—इन तीनों द्विजातियोंकी सेवा करना शूद्रोंका धर्म है। शिल्पकारी उनकी आजीविका है। धर्मानुसार वे पाकयज्ञ-संस्थाका निर्वहन भी कर सकते हैं।
भिक्षाचरण, गुरु-शुश्रूषा, स्वाध्याय, संध्या तथा अग्नि-कार्य—ये ब्रह्मचारियोंके धर्म हैं।
चारों आश्रमोंके दो भेद माने गये हैं। इसके अनुसार ब्रह्मचारीके उपकुर्वाण तथा नैष्ठिक—ये दो भेद हैं। जो द्विज विधिवत् वेदादिका अध्ययन करके गृहस्थाश्रममें प्रविष्ट हो जाता है वह उपकुर्वाण है। जो मृत्युपर्यन्त गुरुकुलमें निवास करते हुए वेदाध्ययन करते रहते हैं—ब्रह्मतत्पर होते हैं, उन्हें नैष्ठिक ब्रह्मचारीके नामसे जानना चाहिये।
हे द्विजश्रेष्ठ! अग्निकार्य, अतिथिसेवा, यज्ञ-दान और देवार्चन—ये सभी गृहस्थोंके संक्षिप्त धर्म हैं। गृहस्थके साधक और उदासीन दो प्रकार हैं। जो गृहस्थ परिवारके भरण-पोषणमें लगा रहता है, वह साधक है। जो गृहस्थ पितृऋण, देवऋण और ऋषिऋण—इन तीनोंसे मुक्त होकर पत्नी-धनादिका भी त्याग करके एकाकी धर्माचरण करता हुआ विचरण करता रहता है, वह उदासीन गृहस्थ है। उसीको मौक्षिक भी कहते हैं।
भूमिशयन, फल-मूलका आहार, वेदाध्ययन, तप और अपनी सम्पत्तिका यथाधिकार यथोचित विभाग—ये सभी वानप्रस्थके धर्म हैं। जो वानप्रस्थ अरण्यमें तपश्चरण करता है, देवार्चन और उन्हें आहुति प्रदान करता है तथा स्वाध्यायमें सदैव अनुरक्त रहता है, वह वानप्रस्थ तापसोत्तम कहा जाता है। ऐसे ही जो वानप्रस्थ तपके द्वारा शरीरको अत्यन्त क्षीण करके ईश्वरके ध्यानमें सदा निमग्न रहता है, वह वानप्रस्थाश्रममें रहता हुआ भी संन्यासीके रूपमें जाना जाता है।
जो भिक्षु (संन्यासाश्रमी) नित्य योगाभ्यासमें अनुरक्त होकर ब्रह्मकी प्राप्तिके लिये प्रयासरत एवं जितेन्द्रिय बना रहता है, उसको पारमेष्ठिक संन्यासी कहते हैं। जो सदैव आत्मतत्त्वानुसंधानमें प्रेम रखनेवाले हैं, नित्य तृप्त हैं, जो संयम-नियमसे रहते हैं, ऐसे महामुनि योगी भिक्षु कहे जाते हैं। भिक्षाचरण, वेदाध्ययन, मौनावलम्बन, तप, ध्यान, सम्यक्-ज्ञान और वैराग्य—ये भिक्षुक (संन्यासाश्रमी)-के सामान्य धर्म माने गये हैं।
पारमेष्ठिक संन्यासी तीन प्रकारके हैं—ज्ञानसंन्यासी, वेदसंन्यासी एवं कर्मसंन्यासी। योगीके भी तीन प्रकार हैं—जिन्हें भौतिक, (क्षत्र) एवं अन्त्याश्रमी योगी कहते हैं। ये तीनों योगमूर्तिस्वरूप परमात्माका आश्रयकर स्थित रहते हैं।
इन योगियोंकी पृथक्-पृथक् ब्रह्मभावनाएँ होती हैं। प्रथम प्रकारकी ब्रह्मभावना भौतिक योगीमें रहती है। दूसरी (मोक्ष) भावना क्षत्र योगीमें रहती है, इसीको अक्षर भावना कहते हैं। तीसरी भावनाको
३५- प्रायश्चित्त-निरूपण
काण्ड ] वर्ण एवं आश्रमधर्मोंका निरूपण ८३
अन्तिम भावना कहते हैं, जो पारमेश्वरी भावनाके नामसे भी जानी जाती है<sup>१</sup>।
मनुष्यको धर्मसे ही मोक्षकी प्राप्ति होती है, अर्थसे काम-पुरुषार्थकी प्राप्ति होती है। वेदमें प्रवृत्ति और निवृत्तिके भेदसे दो प्रकारके कर्म कहे गये हैं। वेदशास्त्रानुसार अग्नि आदि देव एवं गुरु-विप्रादिको प्रसन्न करनेके लिये जो कर्म विहित हैं, वे प्रवृत्तिकर्म हैं तथा सविधि कर्मानुष्ठानसे चित्तशुद्धिके अनन्तर आत्मज्ञानमात्रमें सदा रत रहना निवृत्तिकर्म है।
क्षमा, दम, दया, दान, निर्लोभता, स्वाध्याय, सरलता, अनसूया, तीर्थको<sup>२</sup> अनुसरण, सत्य, संतोष, आस्तिक्य, इन्द्रियनिग्रह, देवार्चन—विशेषकर ब्राह्मणोंका पूजन, अहिंसा, प्रियवादिता, अरूक्षता और अपैशुन्य (चुगली न करना)—इन सभीको चारों आश्रमोंका सामान्य धर्म स्वीकार किया गया है<sup>३</sup>।
इसके बाद अब मैं चारों वर्णोंको प्राप्त होनेवाले स्थानके विषयमें कह रहा हूँ।
उपर्युक्त वेद-विहित कर्मोंको करनेवाले ब्राह्मणोंके निमित्त प्राजापत्य नामका स्थान है (अर्थात् ब्राह्मण ऐसे धर्मोंका पालन करता हुआ अन्त समयमें प्राजापत्य लोक प्राप्त करता है)। युद्धमें न भागनेवाले धर्मरत क्षत्रियोंको स्वर्गमें इन्द्रका स्थान प्राप्त होता है। सदैव अपने धर्ममें अनुरक्त रहनेवाले वैश्य अन्तमें मरुद् देवके स्थानको प्राप्त करते हैं। ब्राह्मणादि द्विजोंकी सेवामें तत्पर रहनेसे शूद्रोंको गन्धर्वलोक प्राप्त होता है।
ऊर्ध्वरेतस् ब्रह्मनिष्ठ अट्ठासी सहस्र ऋषियोंने तपस्याके द्वारा जिस स्थानको प्राप्त किया था, वही स्थान गुरुकुलमें निवास करनेवाले ब्रह्मचारीको प्राप्त होता है। जो स्थान मरीचि, अत्रि आदि सप्तर्षियोंको प्राप्त है, वह स्थान वानप्रस्थाश्रमी प्राप्त करते हैं। संयमित चित्तवाले, ऊर्ध्वरेतस् संन्यासियोंको वह आनन्दरूप परब्रह्मपद प्राप्त होता है, जहाँसे पुनः आगमनकी सम्भावना नहीं होती। यह परब्रह्मपद व्योम नामके अक्षरतत्त्वके रूपमें, योगियोंके अमृतस्थानके रूपमें एवं ईश्वरसम्बन्धी परम आनन्दके रूपमें प्रसिद्ध है। इस स्थानको प्राप्त करनेवाला मुक्त आत्मा पुनः संसारमें नहीं आता है। अभी जिस मुक्तात्माकी चर्चा की गयी है, उसको प्राप्त होनेवाली मुक्ति अष्टाङ्ग-मार्गका सम्यक्-ज्ञान रखनेसे प्राप्त होती है। अतः मैं संक्षेपमें उसे भी कह रहा हूँ। आप सुनें।
अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य तथा अपरिग्रह—ये पाँच यम हैं। प्राणीकी हिंसा न करना अहिंसा है। प्राणियोंके हितमें बोलना सत्य है। दूसरेकी वस्तु अपहरण न करना अस्तेय है। अमैथुनका पालन करना ब्रह्मचर्य है और सब कुछ त्याग देना अपरिग्रह है।
शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय तथा प्रणिधान—ये पाँच नियम हैं। बाह्य और आभ्यन्तर रूपसे शौचके दो भेद हैं। इसी प्रकार संतोषको तुष्टि, इन्द्रिय-निग्रहको तप, मन्त्र-जपको स्वाध्याय और भगवत्पूजनादिको प्रणिधान कहते हैं<sup>४</sup>।
१-ब्रह्मभावनाके ये तीन भेद ब्रह्मानुसंधानकी प्राथमिक, माध्यमिक और अन्तिम स्थितिको दृष्टिमें रखकर किये गये हैं।
२-'तीर्थ' शब्द श्रेष्ठताका वाचक है।
३- क्षमा दमो दया दानमलोभा (भो) भ्यास एव च॥
आर्जवं चानसूया च तीर्थानुसरणं तथा। सत्यं संतोष आस्तिक्यं तथा चेन्द्रियनिग्रहः॥
देवताभ्यर्चनं पूजा ब्राह्मणानां विशेषतः। अहिंसा प्रियवादित्वमपैशुन्यमरूक्षता॥
एते आश्रमिका धर्माश्चातुर्वण्यं ब्रवीम्यतः। (४९। २१–२४)
४-यमाः पञ्च त्वहिंसाद्या अहिंसा प्राण्यहिंसनम्॥
सत्यं भूतहितं वाक्यमस्तेयं स्वाग्रहं परम्। अमैथुनं ब्रह्मचर्यं सर्वत्यागोऽपरिग्रहः॥
नियमाः पञ्च सत्याद्या बाह्यामाभ्यन्तरं द्विधा। शौचं तुष्टिश्च संतोषस्तपश्चेन्द्रियनिग्रहः॥
स्वाध्यायः स्यान्मन्त्रजापः प्रणिधानं हरेर्यजिः। (४९। ३०–३३)
८४ संक्षिप्त गरुडपुराण [ आचार-
साधकके द्वारा पद्मादि प्रकारसे स्थित होना आसन कहा जाता है। वायुका निरोध करना प्राणायाम है। यह दो प्रकारका होता है। मन्त्रोच्चार करते हुए देवका ध्यान करना सगर्भ-प्राणायाम है। उसके विपरीत (अमन्त्रक, प्राणायाम) अगर्भ-प्राणायाम है। यह दो प्रकारका प्राणायाम प्रकारान्तरसे तीन प्रकारका कहा गया है। यथा—वायु अंदर खींचकर अवस्थित होना पूरक नामक प्राणायाम है। वायुको रोककर देहेन्द्रियोंको स्थिर करना कुम्भक और उस वायुको धीरे-धीरे बाहर निकालना रेचक नामक प्राणायाम है।
बारह मात्राँवाला प्राणायाम 'लघु' है। चौबीस मात्राका प्राणायाम 'मध्यम' तथा छत्तीस मात्रावाला प्राणायाम 'उत्तम' है।
अपने-अपने विषयोंसे असम्बद्ध इन्द्रियोंके द्वारा चित्तके स्वरूपमात्रका अनुकरण करना एक विशेष प्रकारका निरोध है और इसी निरोधको प्रत्याहार कहते हैं। ब्रह्मके साथ आत्माका अभेद चिन्तन करना (ब्रह्माकारवृत्तिका अखण्ड प्रवाह) ध्यान है। उस कालमें मनके द्वारा धैर्यका अवलम्बन करना (ध्येयमें चित्तकी निश्चलरूपमें स्थिति) धारणा है।
'अहं ब्रह्म' इस प्रकार अभेद ज्ञानके साथ ब्रह्मरूपमें अवस्थिति ही समाधि है। मैं आत्मा ही परमात्मा—परब्रह्म हूँ। वह परब्रह्म सत्यस्वरूप, ज्ञानरूप और अनन्त है। वही ब्रह्म है। उसीको विज्ञान कहते हैं। वही आनन्दस्वरूप है, उसीका 'तत्त्वमसि' इस श्रुतिसे बोध कराया गया है। 'मैं ब्रह्म हूँ', 'मैं अशरीरी, इन्द्रियातीत हूँ, मन, बुद्धि, महत्तत्त्व, अहङ्कारादिसे रहित, जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति आदि अवस्थाओंसे मुक्त जो ब्रह्मका तेजःस्वरूप है, मैं वही हूँ। नित्य शुद्ध, बुद्ध, मुक्त, सत्य, आनन्दस्वरूप, अद्वय कहा जानेवाला जो वह आदित्य पुरुष है, वही मैं पूर्ण पुरुष हूँ।' इस प्रकार ब्रह्मका ध्यान करता हुआ ब्राह्मण भवबन्धनसे मुक्त हो जाता है। (अध्याय ४९)
संध्योपासन, तर्पण, देवाराधन आदि नित्य कर्मों तथा आशौचका निरूपण
ब्रह्माजीने कहा—जो मनुष्य प्रतिदिन शास्त्रविहित क्रियाओंको करता है, उसको दिव्य ज्ञानकी प्राप्ति होती है। अतः ब्राह्म-मुहूर्तमें उठकर मनुष्यको धर्म और अर्थका चिन्तन करना चाहिये।
उषःकाल होनेपर विद्वान् व्यक्ति सर्वप्रथम अपने हृदयकमलमें विराजमान आनन्दघन, अजर, अमर, सनातन पुरुष भगवान् हरिका ध्यान करे। तदनन्तर यथाविधि शौचादि आवश्यक क्रियाओंसे निवृत्त होकर पवित्र नदियोंमें स्नान करे। प्रातःकाल स्नान करनेसे पापकर्म करनेवाले मनुष्य भी पवित्र हो जाते हैं। इसलिये यत्नपूर्वक प्रातःकाल स्नान करना चाहिये। प्रातःकालके स्नानकी लोगोंने प्रशंसा की है, क्योंकि यह स्नान लौकिक और पारलौकिक फलोंको प्रदान करनेमें समर्थ होता है।
रात्रिमें सुखपूर्वक सोये हुए व्यक्तिके मुखसे निरन्तर लार आदि अपवित्र मल गिरते रहते हैं। (अतः सम्पूर्ण शरीर अपवित्र हो जाता है।) इसलिये प्रथमतः स्नान करके ही संध्या-वन्दनादिके
* प्रणवके जपकी प्रक्रियामें 'मात्रा'का विशेष महत्त्व है। उस मात्राके अनुसार बारह बार प्रणव-जपके साथ सम्पन्न प्राणायामको 'द्वादशमात्रिक', चौबीस बार प्रणव-जपके साथ सम्पन्न प्राणायामको 'चतुर्विंशतिमात्रिक' और छत्तीस बार प्रणव-जपके साथ सम्पन्न प्राणायामको 'षट्त्रिंशन्मात्रिक' कहा जाता है। यहाँ प्रणवके स्थानपर बीजमन्त्र भी दिया जा सकता है।
३६- नवनिधियोंके लक्षणोंसे युक्त पुरुषके ऐश्वर्य एवं स्वभावका वर्णन
काण्ड ] संध्योपासन, तर्पण, देवाराधन आदि नित्य कर्मों तथा आशौचका निरूपण ८५
धार्मिक कृत्य करने चाहिये (बिना प्रातःकाल स्नान-कृत्य किये संध्या-वन्दनादि करना उचित नहीं है)।
प्रातःस्नान करनेसे अलक्ष्मी, कालकर्णी अर्थात् विघ्न डालनेवाली अनिष्टकारी शक्तियाँ, दुःस्वप्न एवं दुर्विचारसे होनेवाले चिन्तनके पाप धुल जाते हैं, इसमें संशय नहीं। यह स्मरणीय है कि बिना स्नानके किये गये कार्य प्रशस्त नहीं होते। अतएव होम और जपादिके कार्योंमें विशेषरूपसे सबसे पहले विधिवत् स्नान करना चाहिये।
अशक्त होनेपर बिना सिरपर जल डाले ही स्नान करनेका विधान है। आर्द्र वस्त्रसे भी शरीरको पोंछा जा सकता है। इसको कायिक स्नान कहते हैं।
ब्राह्म, आग्नेय, वायव्य, दिव्य, वारुण और यौगिक—ये छः प्रकारके स्नान हैं, यथाधिकार मनुष्यको स्नान करना चाहिये। मन्त्रोंसहित कुशके द्वारा जल-बिन्दुओंसे मार्जन करना ब्राह्म-स्नान है। सिरसे लेकर पैरतक यथाविधान भस्मके द्वारा अङ्गोंका लेपन आग्नेय-स्नान है। गोधूलिसे शरीरको पवित्र करना वायव्य-स्नान कहा गया है। यह उत्तम स्नान माना जाता है। धूपके साथ होनेवाली वृष्टिमें किये गये स्नानको दिव्य-स्नान कहते हैं। जलमें अवगाहन करना वारुण-स्नान है। योगद्वारा हरिका चिन्तन यौगिक स्नान है। इसीको मानस-आत्मवेदन (ब्रह्माकार अखण्ड चित्तवृत्ति) कहते हैं। यह यौगिक स्नान ब्रह्मवादियोंके द्वारा सेवित है, इसे ही आत्मतीर्थ भी कहते हैं।
(स्नानके पूर्व) दुग्धधारी वृक्षोंसे उत्पन्न काष्ठ, मालती, अपामार्ग, बिल्व अथवा करवीर अर्थात् कनेरकी दातौन लेकर उत्तर या पूर्व दिशाकी ओर पवित्र स्थानमें बैठकर दाँतोंको स्वच्छ करना चाहिये और उसे धोकर उसका पवित्र स्थानमें त्याग करना चाहिये।
तदनन्तर स्नान करके देवताओं, ऋषियों और पितृगणोंका विधिवत् तर्पण करना चाहिये। यहाँ यथाशास्त्र स्नानका अङ्गभूत आचमन एवं संध्योपासनके अङ्गभूत आचमनका विधान है। संध्योपासनके अङ्गरूपमें ही कुशोदक बिन्दुओंसे 'आपो हि ष्ठा०' आदि वारुणमन्त्र एवं यथाविधान सावित्रीमन्त्रके द्वारा मार्जन करना विहित है। इसी क्रममें ॐकार और 'भूः भुवः स्वः' इन व्याहृतियोंसे युक्त वेदमाता गायत्रीका जप करके अनन्यभावसे भगवान् सूर्यके प्रति जलाञ्जलि समर्पित करे (सूर्यार्घ्य प्रदान करे)।
इसी क्रममें पूर्वकी ओर अग्रभागवाले कुशोंके आसनपर समाहितचित्तसे बैठकर प्राणायाम करके संध्या-ध्यान करनेका श्रुतिमें विधान है। यह जो संध्या है, वही जगत्की सृष्टि करनेवाली है, मायासे परे है, निष्कळा, ऐश्वरी, केवला शक्ति तथा तीन तत्त्वोंसे समुद्भूत है। अतः अधिकारी व्यक्ति (प्रातःकाल) रक्तवर्ण, (मध्याह्नकाल) शुक्लवर्ण एवं (सायंकाल) कृष्णवर्ण गायत्रीका ध्यान करके गायत्रीमन्त्रका जप करे।
द्विजको सदैव पूर्वाभिमुख होकर संध्योपासन करना चाहिये। संध्या-कृत्यसे रहित ब्राह्मण सदा अपवित्र रहता है, वह सभी कार्योंके लिये अयोग्य होता है। वह जो भी अन्य कोई कार्य करता है, उसका कुछ भी फल उसे प्राप्त नहीं होता। अनन्यचित्त होकर वेदपारङ्गत ब्राह्मणोंने विधिवत् संध्योपासन करके अपने पूर्वजोंके द्वारा प्राप्त उत्तम गतिको प्राप्त किया है। संध्योपासनका त्यागकर जो द्विजोत्तम अन्य किसी धर्म-कार्यके लिये प्रयत्न करता है, उसे दस हजार वर्षोंतक नरकभोग करना पड़ता है। अतः सभी प्रकारका प्रयत्न करके संध्योपासन अवश्य करना चाहिये*।
* प्राङ्मुखः सततं विप्रः संध्योपासनमाचरेत्। संध्याहीनोऽशुचिर्नित्यमनर्हः सर्वकर्मसु॥
यदन्यत्कुरुते किञ्चिन्न तस्य फलभाग्भवेत्। अनन्यचेतसः संतो ब्राह्मणा वेदपारगाः॥
उपास्य विधिवत्संध्यां प्राप्ताः पूर्वपरां गतिम्। योऽन्यत्र कुरुते यत्नं धर्मकार्ये द्विजोत्तमः॥
विहाय संध्याप्रणतिं स याति नरकायुतम्। तस्मात् सर्वप्रयत्नेन संध्योपासनमाचरेत्॥
उपासितो भवेत्तेन देवो योगतनुः परः। (५०। २१—२५)
३७- भुवनकोशवर्णनमें राजा प्रियव्रतके वंशका निरूपण .
| ८६ | संक्षिप्त गरुडपुराण | [ आचार- |
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उस संध्योपासनकर्मसे योगमूर्ति परमात्मा भगवान् नारायण पूजित हो जाते हैं। अतः अधिकारीको चाहिये कि वह पवित्र होकर पूर्वाभिमुख बैठ करके नित्य संयत-भावसे एक सहस्र या एक सौ अथवा दस बार गायत्रीका जप (अवश्य) करे। गायत्रीका एक सहस्र जप उत्तम, एक सौ जप मध्यम तथा दस बार किया गया जप कनिष्ठ जप कहलाता है।
एकाग्रचित्त होकर उदय होते हुए भगवान् भास्करका उपस्थान करे। ऋग्वेद, यजुर्वेद तथा सामवेदमें आये हुए विविध सौर मन्त्रोंसे देवाधिदेव महायोगेश्वर भगवान् दिवाकरका उपस्थान करके पृथिवीपर मस्तक टेककर इस मन्त्रसे प्रणाम करे—
ॐ खखोल्काय शान्ताय कारणत्रयहेतवे ॥
निवेदयामि चात्मानं नमस्ते ज्ञानरूपिणे ।
त्वमेव ब्रह्म परममापो ज्योती रसोऽमृतम् ॥
भूर्भुवः स्वस्त्वमोङ्कारः सर्वो रुद्रः सनातनः ।
(५०। २८–३०)
शान्तस्वरूप भगवान् भास्कर आप सृष्टि, स्थिति और संहार—इन तीनों कारणोंके कारण हैं, आप ज्ञानस्वरूप हैं। मैं आपको आत्मनिवेदन करता हूँ, आप ही परब्रह्म हैं, आप ही ज्योतिःस्वरूप, अप्-स्वरूप, रसरूप तथा अमृतस्वरूप हैं। भूः, भुवः, स्वः—ये तीनों आप ही हैं और आप ही ॐकाररूप, सर्वस्वरूप रुद्र तथा अविनाशी हैं, आपको नमस्कार है।
इस उत्तम आदित्यहृदय-स्तोत्रका जप करके भगवान् दिवाकरको प्रातः और मध्याह्न (तथा सायंकाल)-में नमस्कार करना चाहिये।
इसके पश्चात् घर आ करके ब्राह्मण पुनः विधिवत् आचमन करे।
तदनन्तर उसे अग्निको प्रज्वलित करके विधिवत् भगवान् अग्निदेवको आहुति प्रदान करनी चाहिये। मुख्य अधिकारीकी अशक्तावस्थामें उसकी आज्ञा प्राप्त करके ऋत्विक् पुत्र अथवा पत्नी, शिष्य या सहोदर भ्राता भी हवन करे। मन्त्रविहीन एवं विधिकी उपेक्षा करके किया गया कोई भी कर्म इस लोक या परलोकमें फल देनेवाला नहीं होता।
तदनन्तर देवताओंको नमस्कार करके (अर्घ्य, पाद्य, चन्दन, सुगन्धित पदार्थका अनुलेपन, वस्त्र तथा नैवेद्यादि) पूजाके उपचारोंको निवेदनकर गुरुका पूजन करे और उनके हित-साधनमें लग जाय। तत्पश्चात् प्रयत्नपूर्वक यथाशक्ति द्विजको वेदाभ्यास करना चाहिये और उसके बाद इष्ट मन्त्रोंका जप (वेदपारायण) करके शिष्योंके अध्यापन-कार्यमें प्रवृत्त होना चाहिये। वह शिष्योंको वेदार्थ धारण कराये और दत्तचित्त होकर वेदार्थका विचार करे। द्विजोत्तम धर्मशास्त्र आदि विविध शास्त्रोंका अवलोकन करे और वेदादि निगमशास्त्रों (उपनिषदों) तथा व्याकरणादि वेदाङ्गोंका अच्छी प्रकार अवलोकन करे। इसके बाद वह पुनः योग-क्षेमके लिये राजा या श्रीमान्के पास जाय और अपने परिवारके लिये विविध प्रकारके अर्थोंका उपार्जन करे।
इसके पश्चात् मध्याह्न कालके आनेपर स्नान करनेके लिये शुद्ध मिट्टी, पुष्प, अक्षत, तिल, कुश और गोमय (गायके गोबर) आदि पदार्थोंको एकत्र करना चाहिये। उसके बाद नदी, देव, पोखर, तडाग या सरोवरमें जाकर स्नान करे। प्रत्येक दिन तडाग, सरोवर या नदी आदिसे पाँच मृत्तिकापिण्ड बिना निकाले स्नान करना दोषयुक्त होता है। (अतः पाँच पिण्ड मिट्टी निकाल करके ही स्नान करना चाहिये।) स्नानके समय (स्नानके लिये लायी गयी) मिट्टीके एक भागसे सिर धोना चाहिये, दूसरे भागसे नाभिके ऊपरी भागको और तीसरे भागसे नाभिसे नीचेके भागका तथा मृत्तिकाके छठे भागसे पैरोंका प्रक्षालन करना चाहिये। इन मृत्तिकापिण्डोंको परिमाणमें पके हुए आँवलेके
३८- भारतवर्षका वर्णन
काण्ड ] संध्योपासन, तर्पण, देवाराधन आदि नित्य कर्मों तथा आशौचका निरूपण ८७
फलके समान होना चाहिये। मृत्तिकाके समान ही गोमय-स्नान भी होना चाहिये। तदनन्तर शरीरके अङ्गोंको विधिवत् धोकर आचमन करके स्नान करना चाहिये।
जलाशयके तीरपर स्थित होकर ही मृत्तिका, गोमय आदिका अपने अङ्गोंमें लेपन करना चाहिये और इस लेपनके अङ्गभूत स्नानके अनन्तर पुनः वारुण (वरुणदेवताके)-मन्त्रोंसे जलाशयके जलका अभिमन्त्रण करके पुनः जल-स्नान करना चाहिये; क्योंकि जल भगवान् विष्णुका ही रूप है। यह स्नानकी प्रक्रिया प्रणवस्वरूप भगवान् सूर्यका दर्शनकर जलाशयमें तीन बार निमज्जन (डुबकी लगाने)-से पूरी होती है। तदनन्तर स्नानाङ्ग आचमन करके नीचे लिखे मन्त्रसे आचमन करे—
अन्तश्चरसि भूतेषु गुहायां विश्वतोमुखः॥
त्वं यज्ञस्त्वं वषट्कार आपो ज्योती रसोऽमृतम्।
(५०।४५-४६)
हे जलदेव! आप समस्त प्राणियोंके अन्तःकरणरूपी गुहामें विचरण करते हैं। आप सर्वत्र मुखवाले हैं। आप ही यज्ञ हैं। आप ही वषट्कार हैं। आप ही ज्योतिःस्वरूप तेज और आप ही अमृतमय रसस्वरूप हैं।
'द्रुपदादिव०' इस मन्त्रका तीन बार उच्चारण अथवा प्रणव एवं व्याहृतियोंसहित सावित्री-मन्त्रका जप करना चाहिये। विद्वान् अघमर्षण-मन्त्रका जप करे। तदनन्तर 'ॐ आपो हि ष्ठा मयोभुवः', 'इदमपः प्रवहत' तथा व्याहृतियोंसे मार्जन करना चाहिये। अनन्तर 'आपो हि ष्ठा०' इत्यादि मन्त्रोंके द्वारा अभिमन्त्रित जलसे अघमर्षण-मन्त्रका तीन बार जप करते हुए अघमर्षण सम्पन्न करना चाहिये। अघमर्षणके अनन्तर 'द्रुपदादिव०' आदि मन्त्र अथवा गायत्री-मन्त्र या 'तद्विष्णोः परमं पदम्' आदि मन्त्र अथवा प्रणवकी आवृत्ति करनी चाहिये और देवाधिदेव श्रीहरिका स्मरण करना चाहिये। जिस जलको हाथमें लेकर अघमर्षण-क्रिया एवं मार्जन-क्रिया सम्पन्न की जाती है, उस जलको अपने सिरपर धारण करनेसे सभी प्रकारके पातकोंसे मुक्ति मिलती है। संध्योपासनके अनन्तर आचमन करके सदा परमेश्वरका स्मरण करना चाहिये। पुष्पसे युक्त अञ्जलिको शिरोभागसे लगाकर सूर्यका उपस्थान करना चाहिये और उपस्थानके बाद अपनी अञ्जलिके पुष्पोंको भगवान् सूर्यके चरणोंमें अर्पित करना चाहिये। उदित होते हुए सूर्यको नहीं देखना चाहिये, अतः विशेष मुद्राद्वारा ही उनका दर्शन करना चाहिये। 'ॐ उदुत्यं०', 'चित्रं०', 'तच्चक्षु०'—इन मन्त्रोंसे तथा 'ॐ हंसः शुचिषद०' इस मन्त्रसे और सावित्रीके विशेष मन्त्रसे एवं अन्य सूर्यसे सम्बन्धित वैदिक मन्त्रोंसे सूर्यका उपस्थान करना चाहिये। तदनन्तर पूर्वाग्र कुशाओंके आसनपर बैठकर सूर्यका दर्शन करते हुए समाहितचित्तसे गायत्री-मन्त्र एवं अन्य विहित मन्त्रोंका जप करना चाहिये। मन्त्र-जपके लिये स्फटिक, रुद्राक्ष अथवा पुत्रजीव (जीवन्तिका) या अब्जाक्षसे निर्मित मालाका प्रयोग करना चाहिये।
यदि आर्द्र वस्त्रोंवाला हो तो जलके मध्य खड़े होकर जप करना चाहिये। अन्यथा (सूखे वस्त्रोंकी स्थितिमें) पवित्र भूमिमें कुशासनपर बैठकर एकाग्रचित्त होकर जप करना चाहिये। जपके पश्चात् प्रदक्षिणाकर भूमिपर दण्डवत् नमस्कार करना चाहिये। तदनन्तर आचमन करके यथाशक्ति अपनी शाखाके अनुसार स्वाध्याय करे। उसके बाद देवों, ऋषियों और पितरोंका तर्पण करना चाहिये। मन्त्रोंके प्रारम्भमें ॐकारका और अन्तमें 'नमः' का प्रयोगकर प्रत्येक देव, ऋषि और पितृका तर्पण कर रहा हूँ—ऐसा कहकर तर्पण करे। देवताओं और मरीच्यादि ब्रह्मर्षियोंका तर्पण अक्षत
३९- प्लक्ष तथा पुष्कर आदि द्वीपों एवं पाताल आदिका निरूपण
| ८८ | संक्षिप्त गरुडपुराण | [ आचार- |
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और जलके साथ करना चाहिये। पितृगणों, देवों और मुनियोंके लिये अपने शाखासूत्रके विधानसे भक्तिपूर्वक तर्पण करे। तर्पण जलाञ्जलियोंके द्वारा करे। देवताओंका तर्पण यज्ञोपवीती अर्थात् सव्य होकर देवतीर्थसे करे और निवीती होकर (कण्ठमें यज्ञोपवीत कर) ऋषियोंका ऋषितीर्थसे तथा प्राचीनावीती अर्थात् अपसव्य होकर पितृतीर्थसे पितरोंका तर्पण करे।
तदनन्तर हे हर! स्नानमें प्रयुक्त वस्त्रको निचोड़कर मौन होकर आचमन करके मन्त्रोंसे पुष्प, पत्र तथा जलसे ब्रह्मा, शिव, सूर्य एवं मधुसूदन विष्णुदेवका पूजन करे। क्रोधरहित होकर भक्तिपूर्वक अन्य अभीष्ट देवोंकी भी पूजा करनी चाहिये। ‘पुरुषसूक्त’के द्वारा पुष्पादि समर्पित करे। जल सर्वमय देव है अर्थात् समस्त देवता जलमें व्याप्त रहते हैं। अतः उस जलमात्रसे भी वे सभी देवता पूजित होते हैं। इस पूजामें पूजकको समाहितचित्त होना चाहिये तथा प्रणवके साथ देवताका ध्यान करना चाहिये। उसके बाद प्रणाम करते हुए समस्त देवोंको पृथक्-पृथक् पुष्पाञ्जलि समर्पित करे।
देवताओंकी आराधनाके बिना कोई भी वैदिक कर्म पुण्यप्रद नहीं होता है। अतएव समस्त कार्योंके आदि, मध्य और अन्तमें हृदयसे भगवान् हरिका ध्यान करना चाहिये। ‘ॐ तद्विष्णोरिति०’ मन्त्र तथा पुरुषसूक्तके मन्त्रोंका जप करते हुए उस निर्मल विष्णुके परमतेजके सामने आत्मनिवेदन करे अर्थात् शरणागत हो जाय।
उसके बाद विष्णुमें अनुरक्तचित्त, शान्तस्वभाव वह भक्त ‘तद्विष्णोः०’ इस मन्त्रसे और ‘अप्रैतसशिराः०’ इस मन्त्रसे अभिमन्त्रित पुष्पासनपर विराजमान हरिकी पुनः पूजा करके देवयज्ञ, भूतयज्ञ, पितृयज्ञ, मानुषयज्ञ और ब्रह्मयज्ञ नामक पञ्चयज्ञोंको करे। तर्पणसे पूर्व ब्रह्मयज्ञ कैसे हो सकता है? अतः मानुषयज्ञ करके स्वाध्याय (ब्रह्मयज्ञ) करना चाहिये।
वैश्वदेव ही देवयज्ञ है। काक आदि प्राणियोंके लिये जो बलि प्रदान की जाती है, वह भूतयज्ञ है। हे द्विजोत्तम! चाण्डाल एवं पतित आदिको घरके बाहर अन्न देना चाहिये और कुत्ता आदि पशुओं तथा पक्षियोंको घरके बाहर भूमिपर अन्न देना चाहिये। पितरोंके उद्देश्यसे प्रतिदिन एक ब्राह्मणको भोजन कराये। पितरोंके निमित्त जो नित्य श्राद्ध किया जाता है, उसीको पितृयज्ञ कहते हैं। यह उत्तम गति प्रदान करनेवाला है।
अथवा समाहितचित्त होकर यथाशक्ति कुछ कच्चा अन्न निकालकर वैदिक तत्त्ववेत्ता विद्वान् ब्राह्मणको प्रदान करे। प्रतिदिन अतिथि-सत्कार करना चाहिये। घरपर आये हुए शान्तस्वभाव द्विज (ब्राह्मण)-को मन और वचनसे स्वागतपूर्वक नमस्कार करे तथा उनका अर्चन करे।
एक ग्रास परिमाणमात्र अन्नको ‘भिक्षा’ कहा गया है। उसका जो चार गुना अन्न है उसको ‘पुष्कल’ तथा उस पुष्कलके चार गुना अन्नको ‘हन्तकार भिक्षा’ कहते हैं।
गोदोहनमात्र कालतक अतिथिके आगमनकी प्रतीक्षा स्वयं करनी चाहिये। आये हुए अभ्यागत (अतिथि)-का सत्कार यथाशक्ति करना चाहिये।
ब्रह्मचारी भिक्षुकको विधिवत् भिक्षा देनी चाहिये। लोभसे रहित होकर याचकोंको अन्न प्रदान करे। तत्पश्चात् अपने बन्धुजनोंके साथ मौन होकर अन्नकी निन्दा न करते हुए भोजन करे।
हे द्विजश्रेष्ठ! जो देवयज्ञादि पञ्चयज्ञोंको बिना किये भोजन करते हैं, वे मूढात्मा तिर्यक्-योनि (पक्षियोंकी योनि)-में जाते हैं। यथाशक्ति प्रतिदिन
४०- भुवनकोश-वर्णनमें सूर्य तथा चन्द्र आदि नौ ग्रहोंके रथोंका विवरण
काण्ड ] दानधर्मका निरूपण एवं विभिन्न देवताओंकी उपासना ८९
किये जानेवाले वेदाभ्यासके साथ पञ्चमहायज्ञ एवं देवतार्चन शीघ्र ही सभी पापोंको नष्ट कर देते हैं। जो मोहवश अथवा आलस्यके कारण बिना देवार्चन किये ही भोजन करता है, उसे नाना प्रकारके कष्टदायक नरकोंमें जाकर सूकरकी योनिमें जन्म ग्रहण करना पड़ता है।
अब मैं अशौचका सम्यक् प्रकारसे वर्णन करता हूँ। जो अपवित्र है, वह सदा पातकी है। अपवित्र व्यक्तियोंके संसर्गसे अशौच होता है और उनके संसर्गका परित्याग कर देनेसे शरीर पवित्र हो जाता है। हे द्विजोत्तम ! सभी विद्वान् ब्राह्मण दस दिनोंका अशौच मानते हैं। यह अशौच मृत्यु अथवा जन्म दोनोंमें होता है। दाँत निकलनेके पूर्वतक बालककी मृत्यु होनेपर सद्यः स्नान करनेसे अशौचकी निवृत्ति हो जाती है। उसके बाद चूडा (मुण्डन)-संस्कारपर्यन्त बालककी मृत्यु होनेपर एक रात्रिका अशौच होता है।
उपनयन-संस्कारके पूर्वतक बालककी मृत्यु होनेपर तीन रात्रियोंका अशौच होता है। उपनयन-संस्कारके बाद किसीका मरण होनेपर यथाविधान दस रात्रिका अशौच ब्राह्मणोंको होता है।
क्षत्रिय बारह दिनोंमें, वैश्य पंद्रह दिनोंमें तथा शूद्र एक मासमें शुद्ध होता है। क्योंकि इनको यथाक्रम बारह दिनका, पंद्रह दिनका एवं एक मासका अशौच होता है। संन्यासियोंको अशौच नहीं लगता है। गर्भस्राव होनेपर गर्भमासके अनुसार जितने मासका गर्भ हो, उतनी रात्रिका अशौच होता है। (अर्थात् एक मासका गर्भस्राव होनेपर एक रात्रि, दो मासका गर्भस्राव होनेपर दो रात्रिका अशौच होता है। इसी क्रममें अन्य मासोंकी गणना करके अशौचकी रात्रियोंका निश्चय करना चाहिये।) (अध्याय ५०)
दानधर्मका निरूपण एवं विभिन्न देवताओंकी उपासना
**ब्रह्माजीने कहा—**अब मैं सर्वोत्तम दानधर्मके विषयमें कह रहा हूँ—
सत्पात्रमें श्रद्धापूर्वक किये गये अर्थ (भोग्यवस्तु)-का प्रतिपादन (विनियोग) दान कहलाता है—ऐसा दानधर्मवित्-जनोंका कहना है। यह दान इस लोकमें भोग और परलोकमें मोक्ष प्रदान करनेवाला है। मनुष्यको चाहिये कि वह न्यायपूर्वक ही अर्थका उपार्जन करे, क्योंकि न्यायसे उपार्जित अर्थका ही दान-भोग सफल होता है।
अध्यापन, याजन तथा प्रतिग्रह—ये तीनों ब्राह्मणोंकी वृत्ति (आजीविका) हैं। उनके लिये कुसीद अर्थात् सूदखोरी, कृषिकर्म तथा वाणिज्य अथवा क्षत्रियवृत्ति (युद्धादि कृत्य) त्याज्य है। उक्त सद्वृत्तिसे प्राप्त हुआ धन यदि सुयोग्य पात्रोंको दिया जाता है तो उसीको दान कहा जाता है। यह नित्य, नैमित्तिक, काम्य और विमल—चार प्रकारका कहा गया है।
फलकी अभिलाषा न रखकर प्रत्युपकारकी भावनासे रहित होकर ब्राह्मणको प्रतिदिन जो दान दिया जाता है, वह नित्यदान है। अपने पापोंकी शान्तिके लिये विद्वान् ब्राह्मणोंके हाथोंपर जो धन दिया जाता है, सत्पुरुषोंके द्वारा अनुष्ठित ऐसा दान नैमित्तिक दान है। संतान, विजय, ऐश्वर्य और स्वर्ग-प्राप्तिकी इच्छासे जो दान किया जाता है, उसको धर्मवेत्ता ऋषिगण काम्य दान कहते हैं। ईश्वरकी प्रसन्नताको प्राप्त करनेके लिये ब्रह्मवित्-जनोंको सत्त्ववृत्तिसे युक्त चित्तवाले मनुष्यके द्वारा जो दान दिया जाता है, वह विमल दान है। यह दान कल्याणकारी है।
ईखकी हरी-भरी फसलसे युक्त या यव-
| ९० | संक्षिप्त गरुडपुराण | [ आचार- |
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गेहूँकी फसलसे सम्पन्न (शस्य-श्यामल) भूमिका दान वेदविद् ब्राह्मणोंको जो देता है, उसका पुनर्जन्म नहीं होता। भूमिदानसे श्रेष्ठ दान न हुआ है और न होगा ही।
ब्राह्मणको विद्या प्रदान करनेसे ब्रह्मलोककी प्राप्ति होती है। जो व्यक्ति प्रतिदिन ब्रह्मचारीको श्रद्धापूर्वक विद्या प्रदान करता है, वह सभी पापोंसे विमुक्त होकर ब्रह्मलोकके परमपदको प्राप्त करता है।
वैशाखमासकी पूर्णिमा तिथिको उपवास रखकर जो व्यक्ति पाँच या सात ब्राह्मणोंकी विधिवत् पूजा करके उन्हें मधु, तिल और घृतसे संतुष्ट करता है तथा उनकी गन्धादिसे भली प्रकार पूजा करके उनसे यह कहलवाता है या स्वयं कहता है—
प्रीयतां धर्मराजेति यथा मनसि वर्तते ॥
(५१। १३)
(हे धर्मराज ! मेरे मनमें जैसा भाव है, उसीके अनुकूल आप प्रसन्न हों।)
—ऐसा कहनेपर उसके जन्मभर किये गये समस्त पाप उसी क्षण विनष्ट हो जाते हैं।
जो व्यक्ति स्वर्ण, मधु एवं घीके साथ तिलोंको कृष्ण-मृगचर्ममें रखकर ब्राह्मणको देता है, वह सभी प्रकारके पापोंसे मुक्त हो जाता है।
वैशाखमासमें घृत, अन्न और जलका दान करनेसे विशेष फल प्राप्त होता है। अतः उस मासमें धर्मराजको उद्देश्य करके घृत, अन्न और जलका दान ब्राह्मणोंके लिये अवश्य करना चाहिये। ऐसा करनेसे सभी प्रकारके भयसे मुक्ति हो जाती है। द्वादशी तिथिमें स्वयं उपवास रखकर पापोंका विनाश करनेवाले भगवान् विष्णुकी पूजा करनी चाहिये। ऐसा करनेसे निश्चित ही मनुष्यके सभी पाप नष्ट हो जाते हैं। जो मनुष्य जिस देवताकी पूजा करनेके लिये इच्छा करता है, उसकी पूजा वह अपने इष्टको प्राप्त करनेके लिये करे और उसको उस देवकी प्रतिमूर्ति मानकर प्रयत्नपूर्वक ब्राह्मणोंकी पूजा करके उन्हें भोजन भी कराये। साथ ही सौभाग्यवती स्त्रियों तथा अन्य देवोंको भी पूजन-भोजनादिके द्वारा संतुष्ट करे।
संतान-प्राप्तिके इच्छुक व्यक्तिको इन्द्रदेवका पूजन करना चाहिये। ब्रह्मवर्चस्की कामना करनेवाला व्यक्ति ब्रह्मरूपमें ब्राह्मणोंको स्वीकार करके उनकी पूजा करे। आरोग्यकी इच्छावाला मनुष्य सूर्यकी तथा धन चाहनेवाला मनुष्य अग्निकी पूजा करे। कार्योंमें सिद्धि प्राप्त करनेकी अभिलाषा करनेवाला व्यक्ति विनायक (गणेश)—का पूजन करे। भोगकी कामना होनेपर चन्द्रमाकी तथा बल-प्राप्तिकी इच्छा होनेपर वायुकी पूजा करे। संसारसे मुक्त होनेकी अभिलाषा होनेपर प्रयत्नपूर्वक भगवान् हरिकी आराधना करनी चाहिये। निष्काम तथा सकाम सभी मनुष्योंको भगवान् गदाधर हरिकी पूजा करनी चाहिये।
जलदानसे तृप्ति, अन्नदानसे अक्षय सुख, तिलदानसे अभीष्ट संतान, दीपदानसे उत्तम नेत्र, भूमिदानसे समस्त अभिलषित पदार्थ, सुवर्णदानसे दीर्घ आयु, गृहदानसे उत्तम भवन तथा रजतदानसे उत्तम रूपकी प्राप्ति होती है।*
वस्त्र प्रदान करनेसे चन्द्रलोक तथा अश्वदान करनेसे अश्विनीकुमारके लोककी प्राप्ति होती है। अनडुह् (बैल)—का दान देनेसे विपुल सम्पत्तिका लाभ और गोदानसे सूर्यलोक प्राप्त होता है।
यान और शय्याका दान करनेपर भार्या तथा भयार्त (भयभीत)—को अभय प्रदान करनेसे ऐश्वर्यकी
* वारिदस्तृप्तिमाप्नोति सुखमक्षयमन्नद। तिलप्रदः प्रजामिष्टां दीपदाश्चक्षुरुत्तमम्॥
भूमिदः सर्वमाप्नोति दीर्घमायुर्हिरण्यदः। गृहदोऽग्र्याणि वेश्मानि रूप्यदो रूपमुत्तमम्॥ (५१। २२-२३)
४१- ज्योतिषक्रममें वर्णित नक्षत्र, उनके देवता एवं कतिपय शुभ-अशुभ योगों तथा मुहूर्तोंका वर्णन
काण्ड ] प्रायश्चित्त-निरूपण ९१
प्राप्ति होती है। धान्य-दानसे शाश्वत (अविनाशी) सुख तथा वेदके (वेदाध्यापन) दानसे ब्रह्मका सांनिध्य लाभ होता है। वेदविद् ब्राह्मणको ज्ञानोपदेश करनेसे स्वर्गलोककी प्राप्ति तथा गायको घास देनेसे सभी पापोंसे मुक्ति हो जाती है। ईंधन (अग्निको प्रज्वलित करने)-के लिये काष्ठ आदिका दान करनेपर व्यक्ति प्रदीप्त अग्निके समान तेजस्वी हो जाता है। रोगियोंके रोगशान्तिके लिये औषधि, तेल आदि पदार्थ एवं भोजन देनेवाला मनुष्य रोगरहित होकर सुखी और दीर्घायु हो जाता है।
छत्र और जूतेका दान करनेवाला मनुष्य प्रचण्ड धूपके कारण तीक्ष्ण तापवाले तथा तलवारके समान तीक्ष्ण धारवाली नुकीली पत्तियोंसे परिव्याप्त असिपत्रवन नामके नारकीय मार्गोंको पार कर जाता है। जो मनुष्य परलोकमें अक्षय सुखकी अभिलाषा रखता है, उसे अपने लिये संसार या घरमें जो वस्तु अभीष्टतम है तथा प्रिय है, उस वस्तुका दान गुणवान् ब्राह्मणको करना चाहिये।<sup>१</sup> उत्तरायण<sup>२</sup>, दक्षिणायन<sup>३</sup>, महाविषुवत्काल<sup>४</sup>, सूर्य तथा चन्द्रग्रहणमें एवं कर्क, मेष-मकरादिकी संक्रान्तियोंके आनेपर ब्राह्मणोंको दिया गया दान परलोकमें अक्षय सुख देनेवाला होता है। इस प्रकारके दानका महत्त्व प्रयागादि तीर्थोंमें बहुत है, गया-क्षेत्रके तीर्थोंमें किया गया दान विशेष महत्त्व रखता है।<sup>५</sup>
दान-धर्मसे बढ़कर श्रेष्ठ धर्म इस संसारमें प्राणियोंके लिये कोई दूसरा नहीं है। दान स्वर्ग, आयु तथा ऐश्वर्यको प्राप्त करनेकी इच्छासे और अपने पापोंकी उपशान्तिके लिये भी किया जाता है। गौ, ब्राह्मण, अग्नि तथा देवोंको दिये जानेवाले दानसे जो मनुष्य मोहवश दूसरोंको रोकता है, वह पापी तिर्यक् (पक्षीकी)-योनिको प्राप्त करता है। जो व्यक्ति दुर्भिक्षकालमें और मरणासन्न ब्राह्मणको अन्नादिका दान नहीं करता है, वह ब्रह्महत्या करनेवालेके समान तथा अति निन्दित है। (अध्याय ५१)
प्रायश्चित्त-निरूपण
ब्रह्माजीने कहा— हे ब्राह्मणो! अब इसके बाद मैं प्रायश्चित्त-विधिको भली प्रकार कह रहा हूँ—
ब्राह्मणकी हत्या करनेवाला ब्रह्महन्ता, मदिरा-पान करनेमें निरत मद्यपी, चोरी करनेवाला स्तेयी तथा गुरुकी पत्नीके साथ गमन करनेवाला गुरुतल्पगामी (गुरुपत्नीगामी)—ये चार महापातकी हैं। इन सभीका संसर्ग (साथ) करनेवाला पाँचवाँ
१- वासोदश्चन्द्रसालोक्यमश्वसालोक्यमश्वदः । अनडुद्दः श्रियं पुष्टां गोदो ब्रह्मस्य विष्टपम् ॥
यानशय्याप्रदो भार्यामैश्वर्यमभयप्रदः । धान्यदः शाश्वतं सौख्यं ब्रह्मदो ब्रह्म शाश्वतम् ॥
वेदवित्सु ददज्ज्ञानं स्वर्गलोके महीयते । गवां घासप्रदानेन सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥
इन्धनानां प्रदानेन दीप्ताग्निर्जायते नरः । औषधं स्नेहमाहारं रोगिरोगप्रशान्तये ॥
ददानो रोगरहितः सुखी दीर्घायुरेव च । असिपत्रवनं मार्गं क्षुरधारासमन्वितम् ॥
तीक्ष्णातपं च तरतिच्छत्रोपानत्प्रदो नरः । यद्यदिष्टतमं लोके यच्चास्य दयितं गृहे ॥
तत्तद्गुणवते देयं तदेवाक्षयमिच्छता । अयने विषुवे चैव ग्रहणे चन्द्रसूर्ययोः ॥
संक्रान्त्यादिषु कालेषु दत्तं भवति चाक्षयम् । (५१ । २४–३०)
२- मकर राशिसे मिथुन राशितक सूर्यके रहनेके कालको उत्तरायण कहते हैं। यह माघ माससे आषाढ़ मासतकका काल है।
३- कर्क राशिसे धनु राशितक सूर्यके रहनेके कालको दक्षिणायन कहते हैं। यह श्रावण माससे पौष मासतकका काल है।
४- जिस कालमें दिन-रात दोनों बराबर होते हैं, वह विषुवकाल कहा जाता है। यह काल तुला और मेषकी सूर्य-संक्रान्तिका होता है।
५- प्रयागादिषु तीर्थेषु गयायां च विशेषतः ॥ (५१ । ३१)
| ९२ | संक्षिप्त गरुडपुराण | [ आचार- |
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महापातकी है। गोहत्यादि जो अन्य पाप होते हैं—वे उपपातक हैं, ऐसा देवताओंका कहना है।
जिसने ब्रह्महत्या की है, उसे वनमें स्वयं पर्णकुटी बनाकर उसीमें उपवास करते हुए बारह वर्षोंतक रहना चाहिये अथवा पर्वतके उस ऊँचे भागसे गिरकर अपने प्राणोंका परित्याग करना चाहिये, जिस भागसे गिरनेपर कहीं बीचमें रुकनेकी सम्भावना न हो और मरण निश्चित हो। इसके अतिरिक्त जलती हुई अग्निमें प्रवेशकर प्राण-परित्याग, अगाध जलमें प्रवेशकर प्राण-परित्याग, ब्राह्मण या गौकी रक्षाके लिये प्राण-परित्याग भी ब्रह्महत्या-दोषके निवारक होते हैं। इतना अवश्य ध्यानमें रखना है कि ब्रह्महत्याके दोष-निवारणके लिये प्राण-परित्यागके जो साधन बताये गये हैं, उनको करनेके पहले यथाशक्ति विद्वान् ब्राह्मणको अन्नदान करना अनिवार्य है।
अश्वमेध-यज्ञके अन्तमें होनेवाले अवभृथ-स्नानसे ब्रह्महत्याके पापसे मुक्ति प्राप्त हो जाती है। वेदविद् ब्राह्मणको सर्वस्व दान करनेसे ब्रह्महत्याजनित पापका नाश हो जाता है। सरस्वतीजी, गङ्गा तथा यमुना—इन नदियोंके पवित्र संगमपर तीन रात्रियोंतक उपवास रख करके प्रतिदिन तीनों कालोंमें स्नान करके भी द्विज ब्रह्महत्याके पापसे मुक्त हो जाता है। सेतुबन्ध रामेश्वरम् (कपालमोचन तीर्थ या वाराणसीके पवित्र तीर्थ)-में स्नान करके ब्रह्महत्याके पापसे मुक्ति हो जाती है।
मद्यपी द्विज अग्निवर्णके सदृश (अन्तःकरणको जला देनेवाली) खौलती हुई मदिरा अथवा दूध, घृत या गोमूत्रका पान करके तज्जनित पापसे मुक्ति प्राप्त कर लेता है। सुवर्णकी चोरी करनेवाला राजाओंके द्वारा दण्डरूपमें मूसलप्रहारसे पापमुक्त हो जाता है अथवा जीर्ण-शीर्ण वस्त्र धारण करके वनमें ब्रह्महत्यानाशक प्रायश्चित्त-व्रतको करनेसे पापमुक्त हो जाता है।
कामसे मोहित ब्राह्मण यदि अपने गुरुकी पत्नीके पास जाता है तो उसे इस गुरुपत्नीगमनरूप पापसे मुक्त होनेके लिये जलती हुई—तपती हुई लौह-निर्मित स्त्रीका सर्वाङ्ग आलिङ्गन करना चाहिये। अथवा ब्रह्महत्याके पापसे मुक्तिके लिये जो व्रत विहित है, उस व्रतका अनुष्ठान करना चाहिये। चार या पाँच चान्द्रायणव्रत करनेसे भी गुरुपत्नीगमनजनित पापसे मुक्ति हो सकती है।
जो द्विज पतितजनोंका संसर्ग करता है, उसे विभिन्न संसर्गोंसे होनेवाले पापोंको दूर करनेके लिये उन-उन पापोंके निमित्त कहे गये व्रतोंका पालन करना चाहिये। अथवा वह आलस्यसे रहित होकर एक संवत्सरपर्यन्त तप्तकृच्छ्रव्रतका अनुपालन करे। विधिवत् किया गया सर्वस्वदान सभी पापोंको दूर करनेवाला होता है। अथवा विधिवत् चान्द्रायणव्रत तथा अतिकृच्छ्रव्रत भी सभी पापोंको दूर करनेवाला होता है।
गया आदि पुण्यक्षेत्रोंकी यात्रा करनेसे भी ऐसे पापोंका विनाश हो जाता है। अमावास्या तिथिमें जो महादेव भगवान् शङ्करकी सम्यक्-रूपसे आराधना करके ब्राह्मणोंको भोजन प्रदान करता है, वह सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है।
जो मनुष्य कृष्णपक्षकी चतुर्दशी तिथिमें उपवास रखकर संयतचित्तसे पवित्र नदीमें स्नान करके ॐकारसे युक्त यम, धर्मराज, मृत्यु, अन्तक, वैवस्वत, काल तथा सर्वभूतक्षय—इन नामोंका उच्चारणकर तिलसे संयुक्त सात जलाञ्जलियोंसे तर्पण करता है, वह समस्त पापोंसे मुक्त हो जाता है।
इन व्रतोंके पालन करते समय शान्त रहकर तथा मनका निग्रहकर, ब्रह्मचर्यका पालन करते हुए भूमिपर सोना चाहिये और उपवास रखकर ब्राह्मणकी पूजा करनी चाहिये। (कार्तिक) शुक्लपक्षकी षष्ठी
४२- ग्रहदशा, यात्राशकुन, छींकका फल तथा सूर्यचक्र आदिका निरूपण
काण्ड ] नवनिधियोंके लक्षणोंसे युक्त पुरुषके ऐश्वर्य एवं स्वभावका वर्णन ९३
तिथिमें उपवास रखकर सप्तमी तिथिको सूर्यदेवकी पूजा करनेसे भी सभी प्रकारके पापोंसे मुक्ति हो जाती है।
शुक्लपक्षकी एकादशी तिथिमें निराहार रहकर जो द्वादशी तिथिमें जनार्दन भगवान् विष्णुकी पूजा करता है, वह समस्त महापापोंसे मुक्त हो जाता है।
सूर्य-चन्द्र-ग्रहण आदि समयोंमें मन्त्रका जप, तपस्या, तीर्थसेवन, देवार्चन तथा ब्राह्मण-पूजन—ये सभी कृत्य भी महापातकोंको नष्ट करनेवाले होते हैं। समस्त पापोंसे युक्त मनुष्य भी पुण्य-तीर्थोंमें जाकर नियमपूर्वक अपने प्राणोंका परित्यागकर समस्त पापोंसे मुक्त हो जाता है।
पतिव्रता नारी पतिके देहावसानके बाद पतिका वियोग असह्य होनेके कारण पति-धर्मके अनुसार पतिके शरीरके साथ शास्त्रीय विधिका पालन करते हुए अग्निमें प्रवेश करती है तो ब्रह्महत्या, कृतघ्नता आदि बड़े-बड़े पातकोंसे दूषित भी अपने पतिका उद्धार कर देती है।
जो स्त्री पतिव्रता है, अपने पतिकी सेवा-शुश्रूषामें दत्तचित्त रहती है, उसको इस लोक तथा परलोकमें कोई पाप नहीं लगता। वह वैसे ही निर्दोष रहती है, जैसे दशरथपुत्र श्रीरामकी पत्नी जगद्विख्यात भगवती सीतादेवी लङ्कामें रहकर भी निर्दोष रहीं तथा (अपने पातिव्रतके प्रभावसे) उन्होंने राक्षसराज रावणपर विजय प्राप्त की।
हे यतव्रत! संयतचित्त होकर विविध शास्त्रीय व्रतका अनुष्ठान करनेवाले! भगवान् विष्णुने मुझसे बहुत पहले ही यह बताया था कि गयामें स्थित फल्गु (नदी) आदि तीर्थोंमें यथाविधि श्रद्धाके साथ स्नान करनेवाला व्यक्ति सभी प्रकारके पातकोंसे मुक्त हो जाता है और समस्त सदाचरणका फल भी प्राप्त करता है। (अध्याय ५२)
नवनिधियोंके लक्षणोंसे युक्त पुरुषके ऐश्वर्य एवं स्वभावका वर्णन
सूतजीने कहा—भगवान् विष्णुसे अष्टनिधियोंके विषयमें सुनकर ब्रह्माजीने उनका वर्णन इस प्रकार किया था कि 'पद्म, महापद्म, मकर, कच्छप, मुकुन्द, कुन्द (नन्द), नील और शङ्ख नामकी अष्टनिधियाँ हैं। नवीं निधि मिश्र कहलाती है। अब मैं उनके स्वरूपका वर्णन करता हूँ।
पद्मनिधिके लक्षणोंसे सम्पन्न मनुष्य सात्त्विक और दाक्षिण्य गुणसे सम्पन्न होता है। वह सुवर्ण-चाँदी आदि मूल्यवान् धातुओंका संग्रह करके यतियों, देवताओं और याज्ञिकोंको दान करता है। महापद्म-चिह्नसे लक्षित व्यक्ति भी अपने संग्रहीत धन आदिका दान धार्मिक जनोंको करता रहता है। पद्म तथा महापद्मनिधिसम्पन्न पुरुष सात्त्विक स्वभाववाले कहे गये हैं।
मकरनिधिके चिह्नसे चिह्नित मनुष्य खड्ग, बाण एवं कुन्त (भाला) आदि अस्त्रोंका संग्रह करनेवाला होता है। वह नित्य श्रोत्रिय ब्राह्मणोंको दान देता है और राजाओंके साथ उसकी सदैव मित्रता बनी रहती है। द्रव्यादिका आहरण करनेके लिये वह शत्रुओंका विनाश करता है और युद्धके लिये सदा तत्पर रहता है। कच्छपनिधि-लक्षित व्यक्ति तामस गुणवाले होते हैं। कच्छप-चिह्नसे युक्त व्यक्ति किसीपर विश्वास नहीं करता है। वह न अपनी सम्पत्तिका स्वयं उपभोग करता है और न तो उसमेंसे वह किसीको कुछ देता ही है। वह एकान्तमें जाकर अपनी सम्पूर्ण सम्पत्तिको पृथिवीमें गाड़कर छिपा देता है। उसकी सम्पत्ति एक पीढ़ीतक रहती है।
मुकुन्दनिधिके चिह्नसे अंकित पुरुष रजोगुण-सम्पन्न होता है। वह राज्य-संग्रहमें लगा रहता है,
| ९४ | संक्षिप्त गरुडपुराण | [ आचार- |
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वह भोगोंका उपभोग करते हुए गायक और वेश्या आदिको धन देता है।
नन्दनिधिसे युक्त व्यक्ति राजस और तामस गुणोंवाला होता है। वही कुलका आधार बनता है। वह स्तुति करनेपर प्रसन्न होता है तथा बहुत-सी स्त्रियोंका पति होता है। पूर्वकालके मित्रोंमें उसकी प्रीति शिथिल होती है और वह अन्य नये मित्रोंके साथ प्रेम करने लगता है।
नीलनिधिके चिह्नसे सुशोभित मानव सात्त्विक तेजसे संयुक्त होता है। वह वस्त्र-धान्यादिका संग्रह तथा तडागादिका निर्माण करता है। उसके द्वारा (जनहितमें) आम्रादिके उद्यान भी लगवाये जाते हैं। उसकी सम्पत्ति तीन पीढ़ी तक रहती है।
शङ्खनिधि एक ही पुरुष (पीढ़ी)-के लिये होती है। इससे समन्वित मनुष्य धनादिका स्वयं तो उपभोग करता है, किंतु उसके परिजन कुत्सित अन्नका भोजन तथा अच्छे न लगनेवाले मैले-कुचैले वस्त्रोंसे जीवनयापन करते हैं। वह स्वयंके भरण-पोषणमें सदैव तत्पर रहता है। यदि वह किसीको कुछ वस्तु देता भी है तो वह व्यर्थकी वस्तु होती है (जिसका कोई उपयोग नहीं होता)।
मिश्र (मिली-जुली)-निधिके चिह्नसे युक्त होनेपर मनुष्यके स्वभावमें मिश्रित फल दिखलायी देते हैं।
भगवान् विष्णुने भी निधियोंके ऐसे ही स्वरूपका वर्णन शिव आदि देवोंसे किया था (उसको मैंने आप सभीको सुना दिया)। अब हरिने भुवनकोशादिका जैसा वर्णन किया था, वैसा ही मैं कह रहा हूँ। (अध्याय ५३)
भुवनकोशवर्णनमें राजा प्रियव्रतके वंशका निरूपण
श्रीहरिने कहा— राजा प्रियव्रतके आग्नीध्र, अग्निबाहु, वपुष्मान्, द्युतिमान्, मेधा, मेधातिथि, भव्य, शबल, पुत्र और ज्योतिष्मान् नामके दस पुत्र हुए थे।
इन पुत्रोंमेंसे मेधा, अग्निबाहु तथा पुत्र नामक तीन पुत्र योगपरायण (योगी), जातिस्मर (इन्हें पूर्वजन्मका वृत्तान्त विस्मृत नहीं हुआ था) तथा महासौभाग्यशाली थे। इन लोगोंने राज्यके प्रति अपनी कोई अभिरुचि प्रकट नहीं की, अतः राजाने सप्तद्वीपा पृथिवीको अपने अन्य सात पुत्रोंमें विभक्त कर दिया।
पचास करोड़ योजनमें विस्तृत सम्पूर्ण पृथिवी नदीकी जलराशिमें तैरती हुई नौकाके समान चारों ओर अवस्थित अथाह जलके ऊपर स्थित है।
हे शिव! जम्बू, प्लक्ष, शाल्मल, कुश, क्रौञ्च, शाक तथा पुष्कर नामक ये सात द्वीप हैं, जो सात समुद्रोंसे घिरे हुए हैं। उन सात समुद्रोंके नाम लवण, इक्षु, सुरा, घृत, दधि, दुग्ध और जलके सागररूपमें प्रसिद्ध हैं। हे वृषभध्वज! ये सभी द्वीप तथा समुद्र उक्त क्रममें एक-दूसरेसे द्विगुण परिमाणमें अवस्थित हैं।
जम्बूद्वीपमें मेरु नामक पर्वत है, जो एक लाख योजनके परिमाणमें फैला हुआ है। इसकी ऊँचाई चौरासी हजार योजन है। इसका अधोभाग पृथिवीमें सोलह हजार योजन धँसा हुआ है और शिखरदेश बत्तीस हजार योजन विस्तृत है। इसका अधोभाग जो पृथिवीके ऊपर सन्निहित है, वह भी सोलह हजार योजनके विस्तारमें कर्णिकाके रूपमें अवस्थित है। इसके दक्षिणमें हिमालय, हेमकूट तथा निषध, उत्तरमें नील, श्वेत और शृंगी नामक वर्षपर्वत हैं।
हे रुद्र! प्लक्ष आदि द्वीपोंके निवासी मरणादिसे मुक्त हैं। उनमें युग या अवस्थाके आधारपर कोई विषमता नहीं है।
जम्बूद्वीपके राजा आग्नीध्रके नौ पुत्र उत्पन्न हुए। उन सभीका नाम क्रमशः—नाभि, किम्पुरुष,
४३- ग्रहोंके शुभ एवं अशुभ स्थान तथा उनके अनुसार शुभाशुभ फलका संक्षिप्त विवेचन
काण्ड ] भारतवर्षका वर्णन ९५
हरिवर्ष, इलावृत, रम्य, हिरण्मय, कुरु, भद्राश्व और केतुमाल था। राजाने उन सभी पुत्रोंको उनके नामसे ही अभिहित (प्रसिद्ध) एक-एक भूखण्ड प्रदान किया। हे हर ! राजा नाभि और उनकी पत्नी मेरुदेवीसे ऋषभ नामक पुत्र हुए थे, उनसे भरत नामके पुत्र हुए, जो शालग्रामतीर्थमें स्थित रहकर विभिन्न व्रतोंके पालनमें ही निरत रहते थे। उन भरतसे सुमति नामक पुत्र हुआ और उसका पुत्र तैजस हुआ।
तैजसके इन्द्रद्युम्न, इन्द्रद्युम्नसे परमेष्ठी, परमेष्ठीके प्रतीहार तथा प्रतीहारसे प्रतिहर्ता नामक पुत्र कहे गये हैं।
प्रतिहर्ताके पुत्र प्रस्तार, प्रस्तारके पुत्र विभु, विभुके पुत्र नक्त और नक्तके पुत्र गय नामके राजा हुए।
गयका पुत्र नर हुआ। नरसे विराट्, विराट्से महातेजस्वी धीमान्, धीमान्से भौवन नामके पुत्रकी उत्पत्ति हुई। भौवनके त्वष्टा, त्वष्टाके विरजा, विरजाके रज, रजके शतजित् तथा शतजित्के विष्वग्ज्योति नामक पुत्र हुआ था। (अध्याय ५४)
भारतवर्षका वर्णन
श्रीहरिने कहा— हे वृषभध्वज ! जम्बूद्वीपके मध्यभागमें इलावृत नामक वर्ष है। उसके पूर्वमें अद्भुत भद्राश्ववर्ष तथा उसके पूर्व-दक्षिण (अग्निकोण)-में हिरण्वान् नामक वर्ष है।
मेरुके दक्षिणभागमें किम्पुरुषवर्ष कहा गया है। उसके दक्षिणभागमें भारतवर्ष कहा गया है। मेरुके दक्षिण-पश्चिममें हरिवर्ष, पश्चिममें केतुमालवर्ष, पश्चिमोत्तरमें रम्यक् और उत्तरमें कुरुवर्ष स्थित हैं, जिनके भू-भाग कल्पवृक्षोंसे आच्छादित हैं।
हे रुद्र ! भारतवर्षको छोड़कर अन्य सभी वर्षोंमें सिद्धि स्वभावसे ही प्राप्त हो जाती है। यहाँ इन्द्रद्वीप, कशेरुमान्, ताम्रवर्ण, गभस्तिमान्, नागद्वीप, कटाह, सिंहल और वारुण नामक आठ वर्ष हैं। नवाँ वर्ष भारतवर्ष है, जो चतुर्दिक समुद्रसे घिरा हुआ है।
इस (भारतवर्ष)-के पूर्वमें किरात तथा पश्चिममें यवन देश स्थित हैं। हे रुद्र ! दक्षिणमें आन्ध्र, उत्तरमें तुरुष्का आदि देश हैं। इस भारतवर्षमें ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्रवर्णके लोग रहते हैं।
यहाँ महेन्द्र, मलय, सह्य, शुक्तिमान्, ऋक्ष, विन्ध्य और पारियात्र—ये सात कुलपर्वत हैं। इस वर्षमें वेद, स्मृति, नर्मदा, वरदा, सुरसा, शिवा, तापी, पयोष्णी, सरयू, कावेरी, गोमती, गोदावरी, भीमरथी, कृष्णवेणी, महानदी, केतुमाला, ताम्रपर्णी, चन्द्रभागा, सरस्वती, ऋषिकुल्या, कावेरी, मत्तगङ्गा, पयस्विनी, विदर्भा, शतद्रू नामक मङ्गल प्रदान करनेवाली तथा पापविनाशिनी नदियाँ हैं, जिनके जलका पान मध्यदेशादिके निवासीजन करते हैं।
पाञ्चाल, कुरु, मत्स्य, यौधेय, पटच्चर, कुन्त तथा शूरसेन देशके निवासी मध्यदेशीय हैं। पाद्म, सूत, मागध, चेदि, काशेय तथा विदेह पूर्वमें स्थित हैं। कोशल, कलिंग, वंग, पुण्ड्र, अंग और विदर्भ-मूलकजनोंके देश और विन्ध्यपर्वतके अन्तर्गत विद्यमान देश पूर्व तथा दक्षिणके तटवर्ती भूभागमें स्थित हैं। पुलिन्द, अश्मक, जीमूत, नय राष्ट्रमें निवास करनेवाले, कर्णाटक, कम्बोज तथा घण—ये दक्षिणापथ भूभागके निवासी हैं। अम्बष्ठ, द्रविड़, लाट, कम्बोज, स्त्रीमुख, शक और आनर्तवासी दक्षिण-पश्चिमके निवासी हैं।
स्त्रीराज्य, सैन्धव, म्लेच्छ, नास्तिक, यवन, मथुरा तथा निषधके रहनेवाले लोगोंके देश पश्चिमी
४४- लग्न-फल, राशियोंके चर-स्थिर आदि भेद, ग्रहोंका स्वभाव तथा सात वारोंमें किये जाने योग्य प्रशस्त कार्य
| ९६ | संक्षिप्त गरुड़पुराण | [ आचार- |
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भूभाग हैं। माण्डव्य, तुषार, मूलिका, अश्ममुख, खश, महाकेश, महानास देश उत्तर-पश्चिमभागमें स्थित हैं।
लम्बक, स्तननाग, माद्र, गान्धार, बाह्निक तथा म्लेच्छ देश हिमाचलके उत्तरतटवर्ती भूभागमें स्थित हैं। त्रिगर्त, नील, कोलात, ब्रह्मपुत्र, सटङ्गण, अभीषाह और कश्मीर देश उत्तर-पूर्व-दिशामें अवस्थित कहे गये हैं। (अध्याय ५५)
प्लक्ष तथा पुष्कर आदि द्वीपों एवं पाताल आदिका निरूपण
श्रीहरिने कहा—प्लक्षद्वीपके स्वामी मेधातिथिके सात पुत्र थे। उन सबमें शान्तभव नामक पुत्र ज्येष्ठ था। उससे छोटा शिशिर था। तदनन्तर सुखोदय, नन्द, शिव और क्षेमक हुए। उनका जो सातवाँ भाई था, वह ध्रुव नामसे प्रसिद्ध हुआ—ये सभी प्लक्षद्वीपके राजा बने।
इस द्वीपमें गोमेद, चन्द्र, नारद, दुन्दुभि, सोमक, सुमनस और वैभ्राज नामक सात पर्वत हैं। यहाँ अनुप्ता, शिखी, विपाशा, त्रिदिवा, क्रमु, अमृता तथा सुकृता नामकी सात नदियाँ प्रवाहित होती रहती हैं।
वपुष्मान् शाल्मकद्वीपके स्वामी थे। उस द्वीपमें अवस्थित सात वर्षोंके नामसे ही प्रसिद्ध उनके सात पुत्र थे, जिनके नाम श्वेत, हरित, जीमूत, रोहित, वैद्युत, मानस और सुप्रभ हैं।
यहाँ कुमुद, उन्नत, द्रोण, महिष, बलाहक, क्रौञ्च तथा ककुद्मान् नामक सात पर्वत हैं। योनि, तोया, वितृष्णा, चन्द्रा, शुक्ला, विमोचनी और विधृति—ये सात नदियाँ हैं। ये पापोंका प्रशमन करनेवाली हैं।
कुशद्वीपमें ज्योतिष्मान्का स्वामित्व था। उनके भी सात पुत्र उत्पन्न हुए थे। वे उद्भिद, वेणुमान्, द्वैरथ, लम्बन, धृति, प्रभाकर और कपिल नामसे प्रसिद्ध थे। उन्हींके नामसे इस द्वीपके जो सात वर्ष थे, वे प्रसिद्ध हुए। यहाँ विद्रुम, हेमशैल, द्युमान्, पुष्पवान्, कुशेशय, हरि तथा मन्दराचल नामक सात वर्षपर्वत हैं। यहाँ धूतपापा, शिवा, पवित्रा, सन्मति, विद्युद्दभ्र, मही और काशा नामकी ये सात नदियाँ हैं, जो सब प्रकारके पापोंको विनष्ट करनेवाली हैं।
हे शिव! क्रौञ्चद्वीपके अधीश्वर महात्मा द्युतिमान्के भी सात पुत्र हुए। कुशल, मन्दग, उष्ण, पीवर, अन्धकारक, मुनि और दुन्दुभि—ये उनके नाम हैं।
यहाँ क्रौञ्च, वामन, अन्धकारक, दिवावृत्, महाशैल, दुन्दुभि तथा पुण्डरीकवान् नामके सात वर्षपर्वत हैं। यहाँपर गौरी, कुमुद्वती, संध्या, रात्रि, मनोजवा, ख्याति और पुण्डरीका—ये सात नदियाँ (प्रवाहित होती रहती) हैं।
शाकद्वीपके राजा भव्यके भी सात पुत्र उत्पन्न हुए। वे जलद, कुमार, सुकुमार, अरूणीबक, कुसुमोद, समोदार्कि तथा महाद्रुम नामसे ख्यातिप्राप्त थे। यहाँ सुकुमारी, कुमारी, नलिनी, धेनुका, इक्षु, वेणुका और गभस्ति नामसे प्रसिद्ध सात नदियाँ हैं।
पुष्करद्वीपके स्वामी महाराज शबलके महावीर तथा धातकि नामक दो पुत्र हुए। उन्हींके नामसे यहाँपर दो वर्ष हैं। इन दोनोंके मध्य एक ही मानसोत्तर नामक वर्षपर्वत है। यह पचास सहस्र योजनमें विस्तृत तथा इतना ही ऊँचा है। यह चतुर्दिक् विस्तारमें भी उसी परिमाणको प्राप्तकर मण्डलाकार अवस्थित है। इस पुष्करद्वीपको स्वादिष्ट जलवाला समुद्र चारों ओरसे घेरकर स्थित है। उस
४५- सामुद्रिक शास्त्रके अनुसार स्त्री-पुरुषके शुभाशुभ लक्षण, मस्तक एवं हस्तरेखासे आयुका परिज्ञान
काण्ड ] भुवनकोश-वर्णनमें सूर्य तथा चन्द्र आदि नौ ग्रहोंके रथोंका विवरण ९७
स्वादिष्ट जलवाले समुद्रके सामने उससे द्विगुण जनजीवनसे रहित स्वर्णमयी भूमिवाली जगत्की स्थिति दिखायी देती है। वहाँपर दस हजार योजनमें फैला हुआ लोकालोक नामक पर्वत है। वह अन्धकारसे आच्छादित है और वह अन्धकार भी अण्डकटाहसे आवृत है।
श्रीहरिने कहा—हे वृषभध्वज ! इस भूमिकी ऊँचाई सत्तर हजार योजन है। इसमें दस-दस सहस्र योजनकी दूरीपर एक-एक पाताललोक स्थित हैं, जिन्हें अतल, वितल, नितल, गभस्तिमान्, महातल, सुतल तथा पाताल कहा जाता है।
इन लोकोंकी भूमि कृष्ण, शुक्ल, अरुण, पीत, शर्करा-सदृश, शैलमयी तथा स्वर्णमयी है। वहाँपर दैत्य तथा नागोंका निवास है। हे रुद्र! दारुण पुष्करद्वीपमें जो नरक स्थित हैं, उनके विषयमें आप सुनें। वहाँ रौरव, सूकर, रोध, ताल, विशसन, महाज्वाल, तप्तकुम्भ, लवण, विमोहित, रुधिर, वैतरणी, कृमिश, कृमिभोजन, असिपत्रवन, कृष्ण, नानाभक्ष (लालाभक्ष), दारुण, पूयवह, पाप, वह्निज्वाल, अधःशिरा, संदंश, कृष्णसूत्र, तमस्, अवीचि, श्वभोजन, अप्रतिष्ठ तथा उष्णवीचि नामक नरक हैं। उनमें विष देनेवाले, शस्त्रसे हत्या करनेवाले तथा अग्निसे जलाकर मारनेवाले पापीजन अपने-अपने पापका फलभोग करते हैं।
हे रुद्र! यथाक्रम उनके ऊपर अन्य लोकोंकी स्थिति है। उन लोकोंको क्रमशः—जल, अग्नि, वायु तथा आकाश घेरे हुए है। इस प्रकार अवस्थित ब्रह्माण्ड प्रधान तत्त्वसे आवेष्टित है। वह ब्रह्माण्ड अन्य ब्रह्माण्डोंकी अपेक्षा दस गुना अधिक है। इसे परिव्याप्तकर स्वयं नारायण अवस्थित रहते हैं।
(अध्याय ५६-५७)
भुवनकोश-वर्णनमें सूर्य तथा चन्द्र आदि नौ ग्रहोंके रथोंका विवरण
श्रीहरिने कहा—हे वृषभध्वज ! अब मैं सूर्यादि ग्रहोंकी स्थिति एवं उनके परिमाणसे सम्बन्धित विषयका वर्णन कर रहा हूँ।
सूर्यदेवके रथका विस्तार नौ हजार योजन है। उसका ईषादण्ड अर्थात् जुआ तथा रथके बीचका जो भाग है, वह उस रथ-विस्तारका दुगुना है। उसकी धुरी एक करोड़ सत्तावन लाख योजन लम्बी है तथा उसमें चक्र लगा हुआ है। उस चक्रकी (पूर्वाह्न, मध्याह्न तथा अपराह्नरूप) तीन नाभियाँ हैं, (परिवत्सरादिक) पाँच अरे हैं, (वसन्तादि षड्ऋतुरूपी) छः नेमियाँ हैं तथा अक्षयस्वरूपवाले संवत्सरसे युक्त उस चक्रमें सम्पूर्ण कालचक्र सन्निहित है। सूर्यके रथकी दूसरी धुरी चालीस हजार योजन लम्बी है।
हे वृषभध्वज! रथके जो पहियोंके अक्ष हैं, वे साढ़े पाँच हजार योजन लम्बे हैं। रथके कहे गये प्रधान दोनों अक्षोंके परिमाणके समान जुएके दोनों अर्द्धोंकी लम्बाई है। सबसे छोटा अक्ष जुएके अर्द्धभाग-परिमाणवाला है, जो रथके ध्रुवाधारपर अवस्थित है। रथके दूसरे अक्षमें चक्र लगा हुआ है, जो मानसोत्तर पर्वतपर स्थित है।
गायत्री, बृहती, उष्णिक्, जगती, त्रिष्टुप्, अनुष्टुप् तथा पंक्ति नामक—ये सात छन्द ही सूर्यके सात घोड़े कहे गये हैं।
चैत्रमासमें सूर्यके इस रथपर धाता नामक आदित्य, क्रतुस्थला नामक अप्सरा, पुलस्त्य
४६- स्त्रियोंके शुभाशुभ लक्षण
| ९८ | संक्षिप्त गरुडपुराण | [ आचार- |
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ऋषि, वासुकि नाग, रथकृत् ग्रामणी, हेति नामका राक्षस और तुम्बुरु गन्धर्व स्थित रहते हैं। वैशाखमासमें इस रथपर अर्यमा नामवाले आदित्य, पुलह ऋषि, रथौजा यक्ष, पुञ्जिकस्थला अप्सरा, प्रहेति राक्षस, कच्छनीर सर्प तथा नारद नामक गन्धर्व आसीन रहते हैं। ज्येष्ठमासमें सूर्यके इस रथमें मित्र नामक आदित्य, अत्रि ऋषि, तक्षक नाग, पौरुषेय राक्षस, मेनका अप्सरा, हाहा नामक गन्धर्व और रथस्वन यक्षका वास रहता है।
आषाढ़मासमें इस रथके ऊपर वरुण नामसे प्रसिद्ध आदित्य, वसिष्ठ ऋषि, रम्भा तथा सहजन्या नामक अप्सरा, हूहू गन्धर्व, रथचित्र नामक यक्ष एवं राक्षसगुरु शुक्र निवास करते हैं। श्रावणमासमें इस रथपर इन्द्र नामसे विख्यात आदित्य, विश्वावसु गन्धर्व, स्रोत नामक यक्ष, एलापत्र सर्प, अङ्गिरा ऋषि, प्रम्लोचा अप्सरा और सर्प नामक राक्षसोंका निवास रहता है। भाद्रपदमासमें विवस्वान् नामक आदित्य, उग्रसेन गन्धर्व, भृगु ऋषि, आपूरण नामक यक्ष, अनुम्लोचा नामक अप्सरा, शंखपाल नामक सर्प तथा व्याघ्र राक्षसका सूर्य-रथमें निवास रहता है।
आश्विनमासमें इस रथपर पूषा नामक आदित्य, सुरुचि नामक गन्धर्व, धाता एवं गौतम ऋषि, धनञ्जय नाग, सुषेण तथा घृताची अप्सराका वास होता है। कार्तिकमासमें पर्जन्य नामके आदित्य, विश्वावसु गन्धर्व, भरद्वाज ऋषि, ऐरावत सर्प, विश्वाची अप्सरा, सेनजित् यक्ष एवं आप नामक राक्षसका निवास उस रथपर रहता है। मार्गशीर्षमासमें अंशु नामक आदित्य, कश्यप ऋषि, तार्क्ष्य, महापद्म नाग, उर्वशी अप्सरा, चित्रसेन गन्धर्व और विद्युत् नामक राक्षस उस रथमें संचरण करते हैं।
पौषमासमें भर्ग नामके आदित्य, क्रतु ऋषि, ऊर्णायु गन्धर्व, स्फूर्ज राक्षस, कर्कोटक नाग, अरिष्टनेमि यक्ष तथा पूर्वचित्ति नामक अप्सरा सूर्यमण्डलमें निवास करते हैं। माघमासमें त्वष्टा नामक आदित्य, जमदग्नि ऋषि, कम्बल सर्प, तिलोत्तमा अप्सरा, ब्रह्मापेत राक्षस, ऋतजित् यक्ष और धृतराष्ट्र नामक गन्धर्व सूर्यमण्डलमें रहते हैं। फाल्गुनमासमें विष्णु नामक आदित्य, अश्वतर सर्प, रम्भा अप्सरा, सूर्यवर्चा गन्धर्व, सत्यजित् यक्ष, विश्वामित्र ऋषि और यज्ञापेत राक्षसका उस रथमें वास रहता है।
हे ब्रह्मन्! भगवान् विष्णुकी शक्तिसे तेजोमय बने मुनिगण सूर्यमण्डलके सामने उपस्थित रहकर उनकी स्तुति करते हैं, गन्धर्वजन यशोगान करते हैं। अप्सराएँ नृत्य करती हैं। राक्षस उस रथके पीछे-पीछे चलते हैं। सर्प उस रथको वहन करते हैं और यक्षगण उसकी बागडोर सँभालनेका कार्य करते हैं। बाल्यखिल्य नामक ऋषिगण उस रथको सब ओरसे घेरकर स्थित रहते हैं।
चन्द्रमाका रथ तीन पहियोंवाला है। उसके घोड़े कुन्द-पुष्पके समान श्वेतवर्णवाले हैं। वे रथके जुएमें बायें और दाहिने दोनों ओर जुतकर उसे खींचते हैं। उनकी संख्या दस है।
चन्द्रमाके पुत्र बुधका रथ जल तथा अग्निसे मिश्रित द्रव्यका बना हुआ है। उसमें वायुके समान वेगशाली पिशंग (भूरे) वर्णके आठ घोड़े जुते रहते हैं।
शुक्रका महान् रथ सैन्यबलसे युक्त, अनुकर्ष (रथको सुदृढ बनानेके लिये सम्पन्न रथके नीचे लगा काष्ठविशेष), ऊँचे शिखरवाला, पृथिवीपर उत्पन्न होनेवाले घोड़ोंसे संयुक्त, उपासङ्ग (तरकश) तथा ऊँची पताकासे विभूषित है।
भूमिपुत्र मंगलका महान् रथ तपाये गये स्वर्णके सदृश काञ्चन वर्णवाला है। उसमें आठ घोड़े लगे रहते हैं, जो अग्निसे प्रादुर्भूत हैं तथा पद्मरागमणिके समान अरुण वर्णके हैं।
४७- स्त्री एवं पुरुषोंके शुभाशुभ लक्षण
काण्ड ] ज्योतिश्चक्रमें वर्णित नक्षत्र, उनके देवता एवं कतिपय शुभ-अशुभ योगोंका वर्णन ९९
आठ पाण्डुर (कुछ पीलापन लिये हुए सफेद) वर्णके घोड़ोंसे युक्त स्वर्णके रथपर विद्यमान बृहस्पति एक-एक राशिमें एक-एक वर्ष स्थित रहते हैं।
शनिका रथ आकाशसे उत्पन्न हुए चितकबरे घोड़ोंसे युक्त है। वे उसमें चढ़कर धीरे-धीरे चलते हैं। उनका मन्दगामी भी नाम है।
स्वर्भानु अर्थात् राहुके [रथमें] आठ घोड़े हैं, जो भ्रमरके सदृश काले हैं। उसका रथ धूसर* वर्णका है। हे भूतेश शिव! उन घोड़ोंको एक बार रथमें जोत दिये जानेपर वे निरन्तर चलते रहते हैं। इसी प्रकार केतुके रथमें भी वायुके समान वेगवाले आठ घोड़े हैं। उनके वर्णोंकी आभा पुवालसे निकलनेवाले धुएँके सदृश तथा लाक्षारसकी भाँति अरुण रंगकी है।
[हे शिव! इस प्रकार सूर्य-चन्द्रादि उपर्युक्त ग्रहोंसे युक्त] द्वीप, नदी, पर्वत, समुद्र आदिसे समन्वित समस्त भुवन-मण्डल भगवान् विष्णुका विराट् शरीर ही है। (अध्याय ५८)
ज्योतिश्चक्रमें वर्णित नक्षत्र, उनके देवता एवं कतिपय शुभ-अशुभ योगों तथा मुहूर्तोंका वर्णन
श्रीसूतजीने कहा— [ऋषियो!] केशवने भगवान् शिवसे पृथिवीका परिमाण बताकर कहा कि हे रुद्र! ज्योतिष्-शास्त्रकी गणना चार लाखमें है, पर उनमेंसे मैं अब ज्योतिश्चक्र अर्थात् नक्षत्रोंसे युक्त राशिचक्रका संक्षेपसे वर्णन करूँगा, जो सब कुछ देनेवाला है।
श्रीहरिने कहा— हे शिव! कृत्तिका नक्षत्रके देवता अग्नि हैं। रोहिणी नक्षत्रके देवता ब्रह्मा हैं। मृगशिराके चन्द्रमा तथा आर्द्राके रुद्र देवता कहे गये हैं। इसी प्रकार पुनर्वसुके आदित्य तथा तिष्य पुष्यके गुरु हैं। आश्लेषा नक्षत्रके सर्प तथा मघा नक्षत्रके देवता पितृगण हैं। पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्रके देवता भाग्य (भग), उत्तराफाल्गुनीके अर्यमा, हस्तके सविता और चित्राके देवता त्वष्टा हैं। स्वाती नक्षत्रके देवता वायु और विशाखा नक्षत्रके देवता इन्द्राग्नि हैं। अनुराधा नक्षत्रके देवता मित्र और ज्येष्ठाके शक्र (इन्द्र) देवता कहे गये हैं। नक्षत्रज्ञ विद्वानोंने मूल नक्षत्रका देवता निर्ऋतिको बताया है। पूर्वाषाढ नक्षत्रके देवता आप तथा उत्तराषाढके विश्वेदेव हैं। अभिजित्के देवता ब्रह्मा और श्रवणके विष्णु कहे गये हैं। धनिष्ठा नक्षत्रके देवता वसु तथा शतभिषाके वरुण कहे गये हैं। पूर्वाभाद्रपद नक्षत्रके देवता अजपाद, उत्तराभाद्रपदके अहिर्बुध्न्य, रेवतीके पूषा, अश्विनीके अश्विनीकुमार और भरणीके यम देवता कहे गये हैं।
प्रतिपदा तथा नवमी तिथिमें ब्रह्माणी नामकी योगिनी पूर्व दिशामें अवस्थित रहती है। द्वितीया और दशमी तिथिमें माहेश्वरी नामक योगिनी उत्तर दिशामें रहती है। पञ्चमी तथा त्रयोदशी तिथिमें वाराही नामक योगिनी दक्षिण दिशामें स्थित रहती है।
षष्ठी और चतुर्दशी तिथिमें इन्द्राणी नामकी योगिनीका वास पश्चिममें होता है। सप्तमी और पौर्णमासी तिथिमें चामुण्डा नामसे अभिहित योगिनीका निवास वायुगोचर अर्थात् वायव्यकोणमें रहता है। अष्टमी तथा अमावास्यामें महालक्ष्मी नामकी योगिनी ईशानकोणमें रहती है। एकादशी एवं तृतीया तिथिमें वैष्णवी नामकी योगिनी अग्निकोणमें वास करती है। द्वादशी और चतुर्थी
* थोड़े पाण्डु वर्णको धूसर और कुछ पीलापन लिये सफेद वर्णको पाण्डुरवर्ण कहते हैं।