गौतम धर्मसूत्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Gautama Dharmasutra Hindi
महर्षि गौतम द्वारा
स्रोत: Gautama Dharmasutram with Hindi Commentary (उद्गम)
( १० )
| विषय | पृष्ठ |
|---|---|
| त्यक्त व्यक्ति से संबन्ध रखने वाले का प्रायश्चित्त | २०९ |
| परित्यक्त को पुनः शुद्ध करने की विधि ... | २०९ |
तृतीय अध्याय
| विषय | पृष्ठ |
|---|---|
| ब्राह्मण की हत्या करने वाले का त्याग ... | २१२ |
| पातक कर्म में प्रेरित करने वाले का पाप ... | २१२ |
| पतित का द्विजाति कर्म से वंचित होना ... | २१३ |
| नरक की अवस्था ... | २१४ |
| परस्त्रीगमन के विषय में पतित होने का विचार | २१४ |
| स्त्री के पतित होने के निमित्त ... | २१४ |
| महापातक के समान पापकर्म ... | २१५ |
| उपपातक ... | २१५ |
| ऋत्विज और आचार्य के त्याग की अवस्था ... | २१६ |
| माता-पिता के साथ अनुचित व्यवहार का निषेध | २१७ |
| पतित माता-पिता की सम्पत्ति का उत्तराधिकार | २१७ |
| ब्राह्मण को दोष मढ़ने वाले का दोष ... | २१८ |
| ब्राह्मण के ऊपर हाथ या हथियार उठाने वाले का पाप | २१८ |
चतुर्थ अध्याय
| विषय | पृष्ठ |
|---|---|
| प्रायश्चित्त का वर्णन ... | २१९ |
| अग्निमें कूदकर प्रायश्चित्त करना ... | २१९ |
| युद्धमें लक्ष्य बनकर प्रायश्चित्त ... | २१९ |
| पतित का जीवन ... | २२० |
| पापसे मुक्त होने की स्थितियाँ ... | २२१ |
| क्षत्रिय के वध का प्रायश्चित्त ... | २२४ |
| वैश्य के वध का प्रायश्चित्त ... | २२५ |
| शूद्र के वध का प्रायश्चित्त ... | २२५ |
| अनात्रेयी के वध का प्रायश्चित्त ... | २२५ |
| गाय के वध का प्रायश्चित्त ... | २२६ |
| छोटे जीवों की हत्या का प्रायश्चित्त ... | २२८ |
| नपुंसक की हत्या का प्रायश्चित्त ... | २३० |
| सर्प की हत्या का प्रायश्चित्त ... | २३० |
| व्यभिचारिणी स्त्री के वध का प्रायश्चित्त ... | २३० |
( ११ )
वेश्या के वध का प्रायश्चित्त ... २३० परस्त्रीगमन का प्रायश्चित्त ... २३१ श्रोत्रिय की पत्नी के साथ संभोग का प्रायश्चित्त ... २३१ परस्त्री से प्राप्त धन के विषय में विचार ... २३२ अन्य उपपातक के दोष का प्रायश्चित्त ... २३२ व्यभिचारिणी स्त्री के लिये व्रत ... २३३ पशुमैथुन का प्रायश्चित्त ... २३४
पंचम अध्याय
सुरापान का प्रायश्चित्त ... २३५ अज्ञानवश सुरापान करने का प्रायश्चित्त ... २३६ अमेध्य के निगलने पर प्रायश्चित्त ... २३७ वर्जित मांस खाने पर प्रायश्चित्त ... २३७ सुरापान करने वाले की गंध पाने पर प्रायश्चित्त ... २३८ गुरुपत्नीगमन का प्रायश्चित्त ... २३८ गुरुपत्नीगमन के समान अन्य पातक ... २४० प्रायश्चित्त न करने वाली स्त्री के लिये दण्ड ... २४२ वीर्यस्खलन आदि का प्रायश्चित्त ... २४४ सूर्योदय के बाद उठने का प्रायश्चित्त ... २४५ अपवित्र वस्तु के दर्शन पर प्रायश्चित्त ... २४५ अभोज्य वस्तु के भोजन पर प्रायश्चित्त ... २४७ आक्रोश करने का प्रायश्चित्त ... २५० विवाहादि में झूठ बोलना पाप से मुक्त ... २५१ इसके अपवाद ... २५२ वर्जित दशा में स्त्रीगमन का प्रायश्चित्त ... २५२
षष्ठ अध्याय
रहस्य का प्रायश्चित्त ... २५४ ब्राह्मण वध का रहस्य ... २५५
सप्तम अध्याय
ब्रह्मचर्य भंग करने वालोंका प्रायश्चित्त ... २५८
अष्टम अध्याय
कृच्छ्र आदि का स्वरूप ... २६२ अतिकृच्छ्र के विषय में विशेषता ... २६२
( १२ )
| कृच्छ्रातिकृच्छ्र का स्वरूप | ... | २६७ |
| कृच्छ्र इत्यादि के आचरण का फल | ... | २६७ |
नवम अध्याय
| चान्द्रायण की विधि | ... | २६९ |
| चान्द्रायण का फल | ... | २७२ |
दशम अध्याय
| सम्पत्ति का बंटवारा | ... | २७५ |
| पिता के बाद और जीवन काल में विभाजन | ... | २७५ |
| पशुओं के विभाजन के विषय में विशेषता | ... | २७६ |
| उसका अपवाद | ... | २७७ |
| अनेक माताओं वालों के बीच बंटवारा का ढंग | ... | २७७ |
| ज्येष्ठ पुत्र को बड़े बैल की अतिरिक्त प्राप्ति | ... | २७९ |
| पुत्र न होने पर सम्पत्ति के उत्तराधिकार का विचार | २७९ | |
| स्त्रीधन | ... | २८१ |
| बंटवारे के बाद मृत भ्राता के धन का विभाजन | ... | २८२ |
| विना बंटवारे के मरे हुए भ्राताओं के विभाजनका प्रकार | २८२ | |
| बंटवारे के बाद उत्पन्न पुत्र का हिस्सा | ... | २८३ |
| मूर्ख भ्राता के लिये विभाजन की व्यवस्था | ... | २८४ |
| औरस आदि छः प्रकार के पुत्र का उत्तराधिकार | २८५ | |
| असवर्ण पुत्र का विभाग | ... | २८७ |
| अन्याय का आचरण करने वाले सवर्ण पुत्र के लिये भी विभाग का अभाव | ... | २८८ |
| विना पुत्र वाले ब्राह्मण का विभाग | ... | २८९ |
| विना पुत्र वाले क्षत्रिय का विभाग | ... | २८९ |
| मन्दबुद्धि और नपुंसक का पालनपोषण | २८९ | |
| प्रतिलोम विवाह से उत्पन्न हुओं का विभाग | ... | २८९ |
| जल आदि का विभाग नहीं | ... | २९० |
| संदिग्ध विषयों का निर्णय | ... | २९० |
| परिषत् का लक्षण | ... | २९१ |
| शिष्टवचन करने के संबन्ध में प्रमाण | ... | २९१ |
| धर्मशास्त्रों की प्रशंसा | ... | २९१ |
॥ ॐ तत्सद्ब्रह्मणे नमः ॥
गौतमधर्मसूत्राणि
सानुवाद'मिताक्षरावृत्ति'सहितानि
अथ प्रथमप्रश्ने प्रथमोऽध्यायः
ॐ वेदो धर्ममूलम् ॥ १ ॥
नमो रुद्राय यद्धर्मशास्त्रं गौतमनिर्मितम् ।
क्रियते हरदत्तेन तस्य वृत्तिर्मिताक्षरा ॥
कर्मजन्योऽभ्युदयनिःश्रेयसहेतुरपूर्वाख्य आत्मगुणो धर्मः। तस्य मूलं प्रमाणम्। वेदो मन्त्रब्राह्मणात्मकः। जातावेकवचनम्। चत्वारो वेदा ऋग्यजुःसामात्मकास्त एव धर्मे प्रमाणम्। न योगिप्रत्यक्षं नानुमानं नार्थापत्तिर्न शाक्याद्यागमः। तेन तन्मूला एवोपनयनादयो धर्मा वक्ष्यन्ते न चैत्यवन्दनकेशोल्लुञ्चनादय इति। धर्मग्रहणमुपलक्षणम्। अधर्मस्यापि प्रतिषेधात्मको वेद एव मूलम्। निषेधविधयो हि ब्रह्महत्यादौ विषये प्रवृत्तं निवर्तयन्ति। न च रागद्वेषादिना विषये प्रवृत्तस्ततो निवर्तयितुं शक्यः। यद्यसौ विषयोऽनुष्ठितः प्रत्यवायहेतुर्न स्यादिति निषेधविधिरैव प्रत्यवायहेतुतां गमयति ॥ १ ॥
( चारों ) वेद धर्म के मूल ( प्रमाण ) हैं ॥ १ ॥
अथ यत्र प्रत्यक्षो वेदो मूलभूतो नोपपद्यते तत्र कथम्—
तद्विदां च स्मृतिशीले ॥ २ ॥
तद्विदां वेदविदां मन्वादीनां या स्मृतिस्तत्प्रणीतं धर्मशास्त्रं यच्च तेषां शीलमनुष्ठानं ते स्मृतिशीले अस्मदादीनां प्रमाणम्। न च तेषामनुष्ठानं निर्मूलं सम्भवति। सम्भवति च वैदिकानामुत्सन्नपाठे वेदानुभव इति। तेषां तु तदानीं विद्यमानत्वेन सम्प्रदायाविच्छेदाच्च वैदिकानुष्ठानं वेदमूलमेव। यथाऽऽहाऽऽपस्तम्बः—
तेषामुत्सन्नाः पाठाः प्रयोगादनुमीयन्त इति ॥ २ ॥
| २ | गौतमधर्मसूत्राणि |
|---|
उन (वेदों) के ज्ञाताओं (मनु आदि) को स्मृति तथा (उनके) (धर्मानुकूल) आचरण (भी प्रमाण हैं) ॥ २ ॥
यदि शीलं प्रमाणम्, अतिप्रसङ्गः स्यात् । कथम्, कतकभरद्वाजौ व्यत्यस्य भार्ये जग्मतुः । वसिष्ठश्चण्डालीमक्षमलाम् । प्रजापतिः स्वां दुहितरम् । रामेण पितृवचनादविचारेण मातुः शिरश्छिन्नमित्यादि साहसमपि प्रमाणं स्यात् । नेत्याह—
दृष्टो धर्मव्यतिक्रमः साहसं च महताम् ॥ ३ ॥
महतामेतादृशं साहसमपि धर्मव्यतिक्रम एव दृष्टो न तु धर्मः । रागद्वेषनिबन्धनत्वात् ॥ ३ ॥
महान् पुरुषों के साहस कर्म भी (जैसे प्रजापति द्वारा अपनी पुत्री का भोग या परशुराम द्वारा पिता की आज्ञा से माता का शिर काटना आदि) धर्म के व्यतिक्रम के रूप में देखा जाता है ॥ ३ ॥
न च तेषामेवंविधं दृष्टमित्येतावताऽस्मदादीनामपि प्रसङ्गः । कुतः—
अवरदौर्बल्यात् ॥ ४ ॥
अवरेषामस्मदादीनां दुर्बलत्वात् । तथा च श्रूयते—
तेषां तेजोविशेषेण प्रत्यवायो न विद्यते ।
तदन्वीक्ष्य प्रयुञ्जानः सीदत्यवरको जनः ॥ इति ॥ ४ ॥
(इन महापुरुषों की अपेक्षा तेज आदि की दृष्टि से हम) अवर कोटि के लोगों के दुर्बल होने के कारण (महापुरुषों के धर्मविरुद्ध आचरण को प्रमाण मानकर उसका अनुशीलन करना हमारे लिये कष्टप्रद होगा) ॥ ४ ॥
अथ यत्र द्वे विरुद्धे तुल्यबले प्रमाणे उपनिपतेतः । यथाऽतिरात्रे षोडशिनं गृह्णाति, नातिरात्रे षोडशिनं गृह्णाति । उदिते जुहोत्यनुदिते जुहोतीति श्रुतिः । नित्यमभोज्यं केशकीटावपन्नमिति गौतमः—
पक्षिजग्धं गवाघ्रातमवधूतमवक्षुतम् ।
केशकीटावपन्नं च मृत्प्रक्षेपेण शुध्यति ॥ इति मनुः ।
तत्र किं कर्तव्यम्—
तुल्यबलविरोधे विकल्पः ॥ ५ ॥
तुल्यप्रमाणप्रापितयोरेवंजातीयकयोरर्थयोर्विकल्पः । तद्वेदं वेत्यन्यतरस्वीकारः । न समुच्चयोऽसम्भवात् । प्रकर्षबोधने तु श्रुतिस्मृतिविरोधे स्मृत्यर्थो नाऽऽदरणीयः । अतुल्यबलत्वात् । अत एव जाबालिराह—
सानुवाद-मिताक्षरावृत्तिसहितानि ३
श्रुतिस्मृतिविरोधे तु श्रुतिरेव गरीयसी । अविरोधे सदा कार्यं स्मार्तं वैदिकवत्सदा ॥ इति ॥ ५ ॥
दो समान कोटि के प्रमाणों में विरोध उपस्थित होने पर विकल्प होता है (अर्थात् उनमें से किसी एक का अनुसरण किया जा सकता है। श्रुति और स्मृति के प्रमाण समान कोटि के नहीं होते; अतः इनमें परस्पर विरोध होने पर स्मृति मान्य नहीं होती ॥ ५ ॥)
अथेदानीं धर्मान् वक्ष्यन्नुपनयनपूर्वकत्वात्तेषामुपनेयनं तावदाह—
उपनयनं ब्राह्मणस्याष्टमे ॥ ६ ॥
उपनयनानन्तरभाविनि ब्राह्मणत्वेऽत्र [ ब्राह्मणग्रहणम् ] । ब्राह्मणग्रहणं तु ब्राह्मणस्य सत एवोपनयनं न तूपनयनादिसंस्कारजन्मब्राह्मण्यमिति ज्ञापनार्थम् । किंच ब्राह्मणो न हन्तव्यः । ब्राह्मणो न सुरां पिबेदिति निषेधश्रुतिरनुपनीतविषये ( या ) न स्यात् । ब्राह्मणस्याष्टमं वर्षं मुख्यमुपनयनकालः । प्रथमभाविनो गर्भाधानादीन्संस्कारानुल्लङ्घ्योपनयनं व्याचक्षाणस्तस्य प्राधान्यं दर्शयति । तेन दैवानुपपत्त्या गर्भाधानादेरकरणेऽप्युपनयनं भवति । तस्याकरणे तु विवाहादिष्वनधिकार इति सिद्धम् ॥ ६ ॥
ब्राह्मण का उपनयन संस्कार आठवें वर्ष में होना चाहिये ॥ ६ ॥
नवमे पञ्चमे वा काम्यम् ॥ ७ ॥
कामनिमित्तं काम्यम् । तन्नवमे पञ्चमे वा भवति । नवमे तेजस्काममित्यापस्तम्बः ।
ब्रह्मवर्चसकामस्य कार्यो विप्रस्य पञ्चमे । इति मनुः ॥ ७ ॥
( तेज की कामना से ) नवें या ( ब्रह्मवर्चस् की इच्छा से ) पाँचवें वर्ष में इच्छानुकूल ( ब्राह्मण का उपनयन संस्कार करना चाहिए ) ॥ ७ ॥
गर्भादिः संख्या वर्षाणाम् ॥ ८ ॥
वर्षाणां संख्या गर्भादिरेव भवति । न जननादिः ॥ ८ ॥
( उपनयन काल के ) वर्षों की गिनती गर्भकाल से करनी चाहिए ( जन्म के समय से नहीं ) ॥ ८ ॥
तद्द्वितीयं जन्म ॥ ९ ॥
तदुपनयनं द्वितीयं जन्म । अत्रास्य माता सावित्री पिता त्वाचार्यः । तेन द्विजन्मत्वसिद्धिः ॥ ९ ॥
४ गौतमधर्मसूत्राणि
वह (उपनयन संस्कार) दूसरा जन्म होता है। (इसके द्वारा उपनीत व्यक्ति द्विज कहा जाता है) ॥ ९ ॥
तद्यस्मात्स आचार्यः ॥ १० ॥
तदुपनयनं पितुरभावे यस्मात्पुरुषाद्भवति स आचार्यः ॥ १० ॥
वह (उपनयन संस्कार के समय का दूसरा जन्म) जिस पुरुष द्वारा होता है वह आचार्य कहलाता है ॥ १० ॥
न तु केवलदुपनयनात्। कस्मात्तर्हि—
वेदानुवचनाच्च ॥ ११ ॥
अनुवचनमध्यापनम्। अत्र मनुः—
उपनीय तु यः शिष्यं वेदमध्यापयेद् द्विजः।
सकल्पं सरहस्यं च तमाचार्यं प्रचक्षते ॥ इति ॥ ११ ॥
(उपनयन के उपरान्त बालक को) वेद का अध्यापन करने से भी (अध्यापन करने वाला आचार्य कहलाता है) ॥ ११ ॥
एकादशद्वादशयोः क्षत्रियवैश्ययोः ॥ १२ ॥
नित्योऽयमनयोः कल्पः। काम्यस्तु मनुना दर्शितः—
राज्ञो बलार्थिनः षष्ठे वैश्यस्यार्थार्थिनोऽष्टमे ॥ इति ॥ १२ ॥
(गर्भकाल से) ग्यारहवें और सोलहवें वर्ष में (क्रमशः) क्षत्रिय और वैश्य का (उपनयन संस्कार करना चाहिए) ॥ १२ ॥
अथाऽऽपत्कल्पानाह—
आ षोडशाद् ब्राह्मणस्यापतिता सावित्री ॥ १३ ॥
अभिविधावाकारः। आ षोडशाद्वर्षाद् ब्राह्मणस्य सावित्र्यपतिताऽप्रच्युता। सावित्रीशब्देन तदुपदेशनिमित्तमुपनयनं लक्ष्यते। तदुपपनयनस्य काल इत्यर्थः ॥ १३ ॥
सोलहवें वर्ष तक ब्राह्मण के लिए सावित्री च्युत नहीं होती (उस समय तक सावित्री मंत्र के उपदेश का अर्थात् उपनयन की अवधि रहती है) ॥ १३ ॥
द्वाविंशते राजन्यस्य द्व्यधिकाया वैश्यस्य ॥ १४ ॥
उभयत्राप्याङनुवर्तते। पूरणप्रत्ययस्य लोपो द्रष्टव्यः। आ द्वाविंशाद्वर्षाद्राजन्यस्याऽऽचतुर्विंशाद्वैश्यस्यापतिता सावित्री ॥ १४ ॥
बाइसवें वर्ष तक क्षत्रिय की और उससे दो वर्ष अधिक अर्थात् चौबीसवें वर्ष तक वैश्य की (सावित्री च्युत नहीं होती) ॥ १४ ॥
सानुवाद-मिताक्षरावृत्तिसहितानि ५
मौञ्जीज्यामौर्वीसौत्र्यो मेखलाः क्रमेण ॥ १५ ॥
मुञ्जो दर्भविशेषस्तद्विकारो मौञ्जी । मूर्वाऽरण्यौषधिविशेषः । ( सरलीति द्रविडभाषायाम् ) । तद्विकारा मौर्वी । ज्या चासौ मौर्वी चेति कर्मधारयः । ज्याशब्देन धनुषो ग्राह्येति यावत् । सौत्री सूत्रविकारः । एता वर्णक्रमेण मेखला भवन्ति ॥ १५ ॥
( ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य के लिए ) क्रमशः मूँज, मौर्वी घास की बनी हुई धनुष की डोरी और सूत की मेखला ( होती है ) ॥ १५ ॥
कृष्णरुरुबस्ताजिनानि ॥ १६ ॥
कृष्णः कृष्णसारः । रुरुर्बिन्दुमान्मृगः । बस्तश्छागः । एतेषामजिनान्युत्तरीयाणि क्रमेण । अजिनं त्वेवोत्तरं धारयेदित्यापस्तम्बीये दर्शनात् ॥ १६ ॥
( इन तीनों वर्णों के क्रमशः ) काले मृग के चर्म का, धब्बे वाले रुरु मृग के चर्म का और बकरे के चर्म का अजिन ( उत्तरीय ) होता है ॥ १६ ॥
वासांसि शाणक्षौमचीरकुतपाः सर्वेषाम् ॥ १७ ॥
शणविकारः शाणः । क्षुमाऽतसी तद्विकारः क्षौमम् । श्वेतपट्ट इत्यन्ये । दर्भादिनिर्मितं चीरम् । ऊर्णानिर्मितः कम्बलः कुतपः । चत्वार्येतानि वासांसि सर्वेषाम् ॥ १७ ॥
सन के, अतसी के, दर्भ आदि द्वारा निर्मित एवं ऊन के बने हुए कम्बल ( कुतप )—ये ( चारो ) वस्त्र सभी के ( ब्राह्मण, क्षत्रिय एवं वैश्य सभी वर्णों के ब्रह्मचारियों के ) होते हैं ॥ १७ ॥
कार्पासं वाऽविकृतम् ॥ १८ ॥
अविकृतं कार्पासं वासः सर्वेषाम् । कुसुम्भादिरागद्रव्यैर्वर्णान्तरकल्पनं विकृतिस्तद्रहितम् ॥ १८ ॥
अथवा बिना रंगा हुआ रुई का वस्त्र ( सभी द्विजाति ब्रह्मचारियों के लिये होना चाहिए ) ॥ १८ ॥
अनुमतान्याह —
काषायमप्येके ॥ १९ ॥
एके त्वाचार्याः कषायेण रक्तमपि धार्यं मन्यन्ते ॥ १९ ॥
कुछ आचार्यों का विचार है कि गेरुआ रंग का वस्त्र भी ( ब्रह्मचारी पहन सकता है ) ॥ १९ ॥
६ गौतमधर्मसूत्राणि
तत्रापि नियमः— वार्क्षं ब्राह्मणस्य माञ्जिष्ठहारिद्रे इतरयोः ॥ २० ॥ वृक्षकषायेण रक्तं वार्क्षम् । तद्ब्राह्मणस्य । मञ्जिष्ठया रक्तं माञ्जिष्ठम् । हरिद्रया रक्तं हारिद्रम् । ते इतरयोः । क्षत्रियवैश्ययोरिति यावत् ॥ २० ॥ ब्राह्मण (वर्ण के ब्रह्मचारी) का वस्त्र वृक्ष के कषाय से रंगा हुआ (होना चाहिए) और शेष दोनों वर्णों (क्षत्रिय और वैश्य वर्णों के ब्रह्मचारियों) का मंजीठी और हल्दी से रंगा हुआ (होना चाहिए) ॥ २० ॥
बैल्वपालाशौ ब्राह्मणदण्डौ ॥ २१ ॥ बैल्वः पालाशो वा ब्राह्मणस्य दण्डो न पुनः समुच्चितौ ॥ २१ ॥ ब्राह्मण (वर्ण के ब्रह्मचारी) का दण्ड बिल्व या पलाश का होना चाहिए ॥ २१ ॥
अश्वत्थपैलवौ शेषे ॥ २२ ॥ पीलुर्वृक्षविशेषः । उता (?) उता इति प्रसिद्धः । शेषे क्षत्रियवैश्यविषये ॥ २२ ॥ शेष (क्षत्रिय और वैश्य ब्रह्मचारियों) के दण्ड पीपल या पीलु का होना चाहिए ॥ २२ ॥
यज्ञियो वा सर्वेषाम् ॥ २३ ॥ सर्वेषामुक्तालाभे यज्ञियो यज्ञियवृक्षो वा दण्डः स्यात् ॥ २३ ॥ अथवा (उल्लिखित वृक्षों के दण्ड न मिलने पर ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य) सभी ब्रह्मचारियों के दण्ड किसी यज्ञिय (यज्ञ में प्रयुज्य) वृक्ष के हो सकते हैं ॥ २३ ॥
अपीडिता यूपवक्राः सशल्काः ॥ २४ ॥ अपीडिताः कीटादिभिरदूषिताः । यूपवक्रा यूपवदग्रे वक्राः । सशल्काः सत्वचः । एवंविधा दण्डाः सर्वेषाम् ॥ २४ ॥ (दण्ड) कीड़ों आदि से अक्षत, यूप (यज्ञ के खूँटे) की तरह ऊपर वक्र और छाल से युक्त होना चाहिए ॥ २४ ॥
मूर्धललाटनासाग्रप्रमाणाः ॥ २५ ॥ यथासंख्यमत्रेष्यते । मूर्धप्रमाणो ब्राह्मणस्य दण्डः । ललाटावधिः क्षत्रियस्य । नासावधिर्वैश्यस्येति ॥ २५ ॥ (ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य के दण्ड लम्बाई में) वर्णक्रमानुसार सिर
सानुवाद-मिताक्षरावृत्तिसहितानि ७
तक, ललाट तक और नासिका के अग्रभाग तक के होने चाहिए ॥ २५ ॥
मुण्डजटिलशिखाजटाश्च ॥ २६ ॥
अत्र न यथासंख्यम् । मुण्डा लुप्तसर्वकेशाः । जटिलाः केशधारिणः । जटा केशसंहतिः । शिखामात्रैव जटा येषां ते शिखाजटाः । सर्वेषामयं सामान्यधर्मः । छन्दोगापेक्षया मुण्डशब्दग्रहणम् ॥ २६ ॥
(ब्रह्मचारी) सभी केश मुंडाये रखे, या जटा धारण करे अथवा केवल शिखा को ही जटा के रूप में रखे ॥ २६ ॥
द्रव्यहस्तश्चेदूच्छिष्टोऽनिधायाऽऽचामेत् ॥ २७ ॥
मूत्रपुरीषयोः कर्म, भोजनादि चोच्छिष्टत्वनिमित्तम् । द्रव्यहस्तः सन्नुच्छिष्टश्चेत्तद्द्रव्यमनिधायाऽऽचामेत् । उच्छिष्टः सन् द्रव्यहस्तश्चेद् द्रव्यं निधायाऽऽचामेत् । तथा च मनुः—
उच्छिष्टेन तु संस्पृष्टो द्रव्यहस्तः कथंचन ।
अनिधायैव तद्द्रव्यमाचान्तः शुचितामियात् ॥ इति ।
किंच भक्ष्यभोज्यादिद्रव्यविषये तद्द्रव्यं निधायैव मूत्रपुरीषयोः कर्म कृत्वा पुनस्तत्पात्रं निधायाऽऽचामेत् । वस्त्रदण्डादिविषये त्वनिधायैवाऽऽचामेत् ॥ २७ ॥
यदि हाथ में (कोई) वस्तु लिये हुए ही मूत्र, पुरीष करे या भोजन करने के उपरान्त जूठा हुआ हो तो उस (हाथ में ली हुई वस्तु) को अलग रखे बिना (अनिधाय) आचमन करे । ॥ २७ ॥
दूसरा अर्थ—यदि (पूर्वोक्त प्रकार से) उच्छिष्ट (अपवित्र या जूठा) होते हुए किसी वस्तु को हाथ में ले तो उसे अलग रखकर (निधाय) आचमन करे ।
तीसरा अर्थ—यदि कोई खाने योग्य वस्तु हाथ में हो तो उसे अलग रखकर मूत्र, पुरीष कर्म करे और तब आचमन करे ।
अथ द्रव्यशुद्धिरुच्यते—
द्रव्यशुद्धिः परिमार्जनप्रदाहतक्षणनिर्णेजनानि तैजसमार्तिकदारववान्तवानाम् ॥ २८ ॥
तैजसादीनां द्रव्याणां यथाक्रमं परिमार्जनादिशुद्धयः । तैजसं कांस्यादि । मार्तिकं मृन्मयादि । दारवं दारुमयादि । तान्तवं तन्तुमयादि । तेषां क्रमेण परिसार्जनम् । तत्र भस्मना कांस्यस्य । शकृता सौवर्णराज-
८ गौतमधर्मसूत्राणि
तयोः । आम्लेन ताम्रस्य । इदमुच्छिष्टलिप्तानाम् । तैजसानामेवंभूतानां भस्मादिभिरिति कण्वः। रजस्वलाचण्डालादिस्पृष्टानामेकदिनं पञ्चगव्यं निक्षिप्यैकविंशतिकृत्वो मार्जनाच्छुद्धिः। मार्त्तिकानां प्रदाहः। प्रकृष्टो दाहो वर्णान्तरापत्तिर्यथा स्यात्तथाविधो दाहः शोधनम् । इदं स्पर्शोपहतानाम् । अत्र वसिष्ठः—
मद्यमूत्रपुरीषैस्तु श्लेष्मपूयाश्रुशोणितैः ।
संस्पृष्टं नैव शुध्येत पुनर्दाहेन मृन्मयम् ॥ इति ।
दारवाणां तक्षणाच्छुद्धिः । इदममेध्यादिवासितानाम् । अन्यत्र प्रोक्षणप्रक्षालनादि । तान्तवानां निर्णेजनाच्छुद्धिः। इदं स्पर्शदूषितानाम् । मलादिदूषितानां धावनं तन्मात्रच्छेदनं वा । स्पर्शदूषितानां बहूनां प्रोक्षणाच्छुद्धिरिति ॥ २८ ॥
क्रमशः माँजने से, आग में तपाने, काटने और धोने से (कांसे आदि) धातु के, मिट्टी के, लकड़ी के और सूत से निर्मित वस्तुओं की (जो उच्छिष्ट से दूषित हुई हों) शुद्धि होती है ॥ २८ ॥
तैजसवदुपलमणिशङ्खमुक्तानाम् ॥ २६ ॥
उपलादीनां तैजसवच्छुद्धिः परिमार्जनमिति ॥ २६ ॥
धातु के पदार्थों की शुद्धि के समान ही उपल (पत्थर) के पदार्थों, मणि, शङ्ख और मुक्ता की भी (शुद्धि परिमार्जन द्वारा होती है) ॥ २६ ॥
दारुवदस्थिभूम्योः ॥ ३० ॥
अस्थि हास्तिदन्तादि । भूमिर्गृहादि । तयोर्दारुवच्छुद्धिस्तक्षणमिति । दारुवदिति वक्तव्ये दारुवदिति निर्देशाद्विकारस्य या शुद्धिर्विकारिणोऽपि सैव शुद्धिरित्युक्तम् ॥ ३० ॥
काठ से बनी हुई वस्तुओं की शुद्धि के समान ही हाथोदाँत से बनी वस्तुओं और (घर के भीतर की) भूमि की भी शुद्धि काटने या खोदने से होती है ॥ ३० ॥
आवपनं च भूमेः ॥ ३१ ॥
आवपनमन्यत आनीय पूरणमधिका शुद्धिर्भूमेः ।
अत्र वसिष्ठः—
खननाद्दहनाद्वार्गोभिराक्रमणेन च ।
चतुर्भिः शुध्यते भूमिः पञ्चमात्तूपलेपनात् ॥ इति ॥ ३१ ॥
सानुवाद-मिताक्षरावृत्तिसहितानि ९
और दूसरे स्थान से मिट्टी लाकर ( पहले शुद्धि के लिए खोदी गई भूमि को ) भरने से भूमि की और भी अधिक शुद्धि होती है ॥ ३१ ॥
चैलवद्रज्जुविदलचर्मणाम् ॥ ३२ ॥
विदलं वेत्रवेणुविदलादिनिर्मितम् । पिच्छनिर्मितमप्यन्ये । रज्ज्वादीनां त्रयाणां चैलवद्वस्त्रवच्छुद्धिर्निर्णैजनमिति । पैठीनसिस्तु—
रज्जुविदलचर्मणामस्पृश्यस्पृष्टानां प्रोक्षणाच्छुद्धिरिति ॥ ३२ ॥
वस्त्र की शुद्धि के समान ही रस्सी की, बेंत से बने हुए ( और पिच्छ से निर्मित ) पदार्थ की ( शुद्धि धोने से होती है ) ॥ ३२ ॥
उत्सर्गो वाऽत्यन्तोपहतानाम् ॥ ३३ ॥
इदं वासिष्ठेन समानविषयं मद्यमूत्रपुरीषैरित्यादिना । वाशब्दः पक्षव्यावृत्तौ ॥ ३३ ॥
अथवा ( मूत्र, पुरीष आदि से ) अत्यन्त दूषित हो गये हों तो ( उन पदार्थों का त्याग कर देना चाहिए ) ॥ ३३ ॥
प्राङ्मुख उदङ्मुखो वा शौचमारभेत ॥ ३४ ॥
इच्छातो विकल्प आरभेतेति वचनात्पादप्रक्षालनप्रभृतिदिङ्नियमः । आपस्तम्बस्तु प्रत्यक्पादावनेजनमित्याह । शौचग्रहणमाचमन एव मा भून्मूत्रपुरीषादिशौचेऽपि दिङ्नियमज्ञापनार्थम् ॥ ३४ ॥
( पादप्रक्षालन आदि आचमन जैसे ) शौच कर्म पूर्व की ओर मुख करके अथवा उत्तर की ओर मुख करके करना चाहिए ॥ ३४ ॥
शुचौ देश आसीनो दक्षिणं बाहुं जान्वन्तरा कृत्वा यज्ञोपवीत्यामणिबन्धनात्पाणी प्रक्षाल्य वाग्यतो हृदयस्पृशस्त्रिचतुर्वाऽप आचामेत् ॥ ३५ ॥
इदमेकं वाक्यम् । आचमनकाले शुचौ देशेऽनुपहत आसीन इत्युपलक्षणमासीनस्तिष्ठन् प्रह्वो वेति । जान्वन्तरा जानुनोर्मध्ये दक्षिणबाहुं कृत्वा । दक्षिणं बाहुमित्युक्तत्वाद्वामहस्तस्य नावश्यंभावः । यज्ञोपवीतीति पूर्वं स्वस्थानस्थमपि यथास्थाननिवेशनार्थम् । अथवोत्तरीयविन्यासार्थम् । तथा चाऽऽपस्तम्बः—'उपासने गुरूणां वृद्धानामतिथीनां होमे जप्यकर्मणि भोजन आचमने स्वाध्याये च यज्ञोपवीती स्यादपि वा सूत्रमेवोपवीतार्थः' इति । आमणिबन्धाद्देमन्शोद्यसि मणिवंर्धयत आ तस्मात्पाणी प्रक्षाल्य ।
| १० | गौतमधर्मसूत्राणि |
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वाग्यतः शब्दमकुर्वन् । हृदयस्पृशः परिमाणार्थमिदं यावत्यः पीता हृदयं स्पृशन्ति यासु माषो मज्जति तावतीरप आचामेत्रिश्चतुर्वा । यत्र मन्त्रवदाचमनं विहितं तत्र तेन सह चतुः । अन्यत्र त्रिरिति विकल्पः ॥ ३५॥
( आचमन करते समय ) पवित्र स्थान पर बैठकर, दाहिनी बाँह को दोनों घुटनों के बीच में करके, यज्ञोपवीत को यथास्थान रखकर, कलाई तक हाथों को धोकर और मौन होकर तीन चार बार इतने जल से आचमन करे, जितना जल ( पीने पर ) हृदय तक पहुँच सके ॥ ३५ ॥
द्विः परिमृज्यते ॥ ३६ ॥
प्रतियोगं सोदकेन पाणिनाौष्ठयोः परिमार्जनम् ॥ ३६ ॥
प्रत्येक वार दोनों ओठों को हाथ में जल लेकर पोंछे ॥ ३६ ॥
पादौ चाभ्युक्षेत् ॥ ३७ ॥
चकाराच्छिरश्च ॥ ३७ ॥
दोनों पैरों ( और शिर ) पर जल छिड़के ॥ ३७ ॥
खानि चोपस्पृशेच्छीर्षण्यानि ॥ ३८ ॥
शीर्षे भवानि शीर्षण्यानि । शिरोभवानोति यावत् । खानोन्द्रियाणि । तान्युपस्पृशेत् । अत्र चकारः प्रतीन्द्रियोपस्पर्शनाथैः ॥ ३८ ॥
शिर की इन्द्रियों ( नेत्र, कान, मुख, नासिका-छिद्रों ) में प्रत्येक का स्पर्श करे ॥ ३८ ॥
मूर्धनि च दद्यात् ॥ ३९ ॥
चकारान्नाभौ मूर्धनि च सर्वाभिरङ्गुलिभिरुपस्पृशेदित्यर्थः ॥ ३९ ॥
( नाभि और ) सिर का सभी अंगुलियों से स्पर्श करे ॥ ३९ ॥
सुप्त्वा भुक्त्वा क्षुत्वा च पुनः ॥ ४० ॥
स्वापादिनिमित्ते पुनर्द्विराचामेदिति यावत् ॥ ४० ॥
सोने, भोजन करने और छींकने के बाद दो बार आचमन करना चाहिए ॥ ४० ॥
दन्तश्लिष्टेषु दन्तवदन्यत्र जिह्वाभिमशनात् ॥ ४१ ॥
दन्तश्लिष्टेषूच्छिष्टलेपेषु जिह्वाभिमशनादन्यत्र दन्तवन्नाशुचित्वम् ॥ ४१ ॥
दाँतों के बीच अटके हुए भोजन के उच्छिष्ट कणों में जीभ से न छू जा सकने वाले उच्छिष्टकण दाँतों के समान ही अपवित्र नहीं होते ॥ ४१ ॥
सानुवाद-मिताक्षरावृत्तिसहितानि ११
तत्रापि—
प्राक्च्युतेरित्येके ॥ ४२ ॥
सत्यपि जिह्वाभिमर्शने यावल्लेपाः स्वस्थानान्न च्यवन्ते तावन्नाशुचित्वमिति ॥ ४२ ॥
कुछ विद्वानों के मत से दाँतों में अटके हुए उच्छिष्ट कण जीभ से छुए जाने योग्य होने पर भी दाँतों से गिरने के पूर्व तक अपवित्र नहीं होते ॥ ४२ ॥
च्युतेष्वास्राववद्विद्यान्निगिरन्नेव तच्छुचिः ॥ ४३ ॥
आस्राव आस्यजलम् । निगरणमन्तःप्रवेशनम् । च्युतेषु निगिरन्नेवतच्छुचिरिति वक्तव्य आस्राववद्विद्यादिति वचनमास्रावे च निगरणादेव शुचिरिति सूचनार्थम् ॥ ४३ ॥
(दांतों में अटके हुए अच्छिष्ट कण के) दांतों से निकलने पर उन्हें लार के समान समझना चाहिए, और उनको निगलने से ही शुद्धि होती है ॥ ४३ ॥
न मुख्या विप्रुष उच्छिष्टं कुर्वन्ति । न चेदङ्गे निपतन्ति ॥ ४४ ॥
मुखे भवा मुख्याः । विप्रुष आस्रावबिन्दवः । भूम्यादिषु पतिता नोच्छिष्टतां नयन्ति ॥ ४४ ॥
मुख के लार की बूँदें (गिरने पर किसी पदार्थ को, जूठा या अशुद्ध नहीं बनातीं । शरीर के किसी अंग पर गिरती हैं तो भी उसे उच्छिष्ट नहीं करती हैं ॥ ४४ ॥
लेपगन्धापकर्षणं शौचममेध्यस्य ॥ ४५ ॥
वसा शुक्रमसृङ्मज्जा मूत्रविट्कर्णविण्नखाः ।
श्लेष्माश्श्रु दूषिका स्वेदो द्वादशैते नृणां मलाः ॥ इति मनुः ।
एतत्सर्वममेध्यशब्देन विवक्षितम् । अस्य यावता गन्धो लेपश्चापकृष्यतेऽपनीयते तावता शौचमिति । तत्र यस्य मलस्य गन्धमात्रं तस्य तदपकर्षणम् । यस्य गन्धो लेपश्च तस्य तदुभयापकर्षणम् ॥ ४५ ॥
शरीर के मलों (से दूषित पदार्थ) की शुद्धि उनके लेप और गन्ध को दूर करने से होती है ॥ ४५ ॥
तदद्भिः पूर्वं मृदा च ॥ ४६ ॥
तत्पूर्वं गन्धवन्मलापकर्षणमद्भिर्लेपगन्धवन्मलापकर्षणं मृदा चाद्भिश्चेति । इदं हस्तपादादेरमेध्यलिप्तस्य शौचम् । तैजसादिषु विशेषस्य पूर्वमुक्तत्वात् ॥ ४६ ॥
१२ | गौतमधर्मसूत्राणि
तब पहले ( गन्धवाले मल को ) जल से और ( गन्ध तथा लेप वाले मल को ) मिट्टी एवं जल से दूर किया जाता है ॥ ४६ ॥
मूत्रपुरीषस्नेहविस्रंसनाभ्यवहारसंयोगेषु च ॥ ४७ ॥
चकारः पूर्वोक्तसमुच्चये । स्नेहो रेतः । मूत्रपुरीषस्नेहानां विस्रंसनं निरसनम् । अभ्यवहारमव्यवहार्यद्रव्यं तेन संयोगः । एषु निमित्तेषु पूर्ववन्मृदा चाद्भिः शौचमिति ॥ ४७ ॥
मूत्र, पुरीष और वीर्य के त्याग से तथा व्यवहार में न लाई जानेवाली दूषित वस्तुओं के संयोग से होनेवाली अशुद्धि पूर्वोक्त विधि से अर्थात् मिट्टी और जल से दूर होती है ॥ ४७ ॥
यत्र चाऽऽम्नायो विदध्यात् ॥ ४८ ॥
यत्र विषये यच्छौचमाम्नाये विदध्यात्तत्र तदेव भवति । यथा चमसानामुच्छिष्टलिप्तानां मार्जालीयाद्भिः प्रक्षालनमिति ॥ ४८ ॥
वेद में जिस विषय में जैसी शुद्धि का विधान किया गया है उसी विधि से शुद्धि करनी चाहिए ॥ ४८ ॥
अथ गुरूपसदनविधिः—
पाणिना सव्यमुपसंगृह्यानङ्गुष्ठमधीहि भो इत्यामन्त्रयेद् गुरुं तत्र चक्षुर्मनःप्राणोपस्पर्शनं दर्भैः ॥ ४९ ॥
पाणिना स्वेन दक्षिणेन । सव्यमिति विशेषग्रहणाद्दक्षिणेनेति गम्यते । गुरोः सव्यं पादमनङ्गुष्ठमङ्गुष्ठवर्जं गृहीत्वाऽधीहि भो इति गुरुमामन्त्रयेत् । तत्र गुरौ मनश्चक्षुषी च निधायावहितः स्यादिति । प्राणाः शीर्षण्यानीन्द्रियाणि । तेषामात्मीयानामाचमनोक्तक्रमेण दर्भैरुपस्पर्शनं कर्तव्यं माणवकेन ॥ ४९ ॥
ब्रह्मचारी अपने दाहिने हाथ से (गुरु के) बायें पैर को अंगूठा छोड़ते हुए पकड़े और 'अधीहि भोः (श्रीमन्, मुझे पढ़ावें) ऐसा कहकर गुरु को आमन्त्रित करे । वहां गुरु की ओर अपने नेत्र एवं मन लगाकर प्राणों (सिर की इन्द्रियों) का कुश से स्पर्श करे ॥ ४९ ॥
प्राणायामास्त्रयः पञ्चदशमात्राः ॥ ५० ॥
कार्या इति शेषः । जानुपार्श्वतः परिमृज्य त्रुटिमेकां कुर्यात्सैका मात्रा । ताः पञ्चदश पूर्यन्ते यावता कालेन तावन्तं कालं प्राणवायुं धारयेत्स एकः प्राणायामः । ते त्रयः कार्याः ।
सानुवाद-मिताक्षरावृत्तिसहितानि १३
मनुः—सव्याहृतिकां सप्रणवां गायत्रीं शिरसा सह ।
त्रिः पठेदायतप्राणः प्राणायामः स उच्यते ॥ इति ॥ ५० ॥
पन्द्रह मात्रा ( समय तक ) का प्राणायाम करना चाहिए । ( घुटनों की बगल से सटाकर एक बार चुटकी बजाने में जो समय लगता है वह एक मात्रा का काल होता है ॥ ५० ॥
प्राक्कूलेष्वासनं च ॥ ५१ ॥
प्रागग्रेषु दर्भेषूवासनं चकारात्कर्तव्यमिति शेषः ॥ ५१ ॥
जिनके अग्रभाग पूर्व की ओर हों ऐसे कुशों को आसन बनाना चाहिए ॥ ५१ ॥
ॐपूर्वा व्याहृतयः पञ्च सत्यान्ताः ॥ ५२ ॥
व्याहृतिसाम भूर्भुवः स्वः सत्यं पुरुष इति पञ्च । अत्र तु पुरुष-व्याहृतिश्चतुर्थी सत्यव्याहृतिः पञ्चमी वक्तव्या । ताश्च प्रत्येकं प्रणवपूर्वा वक्तव्याः ॥ ५२ ॥
( प्रत्येक के ) पहले ॐ जोड़कर सत्यम् तक ( भूः, भुवः, स्वः, पुरुष और सत्यम् ) पाँच व्याहृतियाँ होती हैं ॥ ५२ ॥
गुरोः पादोपसंग्रहणं प्रातः ॥ ५३ ॥
अहरहः प्रातर्गुरोः पादोपसंग्रहणं कार्यम् ।
मनुः—व्यत्यस्तपाणिना कार्यमुपसंग्रहणं गुरोः ।
सव्येन सव्यः स्प्रष्टव्यो दक्षिणेन तु दक्षिणः ॥ इति ॥ ५३ ॥
प्रतिदिन प्रातःकाल गुरु का चरण छूना चाहिए ॥ ५३ ॥
ब्रह्मानुवचने चाऽऽद्यन्तयोः ॥ ५४ ॥
ब्रह्म वेदः । अनुवचनमध्यापनम् । तत्राऽऽद्यन्तयोश्च गुरुपादोप-संग्रहणं कार्यम् ॥ ५४ ॥
वेद का पाठ होने पर ( पाठ आरम्भ होने के ) पहले और अन्त में गुरु का चरण छुये ॥ ५४ ॥
अनुज्ञात उपविशेत् प्राङ्मुखो दक्षिणतः शिष्य उदङ्मुखो वा ॥ ५५ ॥
आचार्येणानुज्ञातस्तद्दक्षिणतः प्राङ्मुख उदङ्मुखो वोपविशेत् । कार्यानुगुणो विकल्पः ॥ ५५ ॥
१४ | गौतमधर्मसूत्राणि
आचार्य की आज्ञा पाकर (ब्रह्मचारी) उनकी दाहिनी ओर पूर्व की ओर मुख करके अथवा उत्तर की ओर मुख करके बैठे ॥ ५५ ॥
सावित्री चानुवचनम् ॥ ५६ ॥
तत्संवितुर्वरेण्यमित्येषा नत्वन्या सवितृदेवत्या । सा वाऽनुवचनं प्रत्यध्ययनं पठनीयेति ॥ ५६ ॥
प्रतिदिन के अध्ययन के समय सावित्री मन्त्र का (‘ॐ तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि। धियो यो नः प्रचोदयात्’ सवितृ देवता के इसी मन्त्र का किसी दूसरे मन्त्र का नहीं) उच्चारण करे ॥ ५६ ॥
आदितो ब्रह्मण आदाने ॥ ५७ ॥
पाणिना सव्यमुपसंगृह्येत्यादि सावित्र्यनुवचनान्तं यदुक्तं तदिदं ब्रह्मणो वेदस्य गुरोः सकाशादादित आदानकाले कर्तव्यम् । उपनयनादनन्तरं सावित्र्युपदेशकाले च, प्रत्यहं तु तत्र चक्षुर्मनस्त्वम् । प्रातरध्ययनाद्यन्तयोश्च गुरोः पादोपसंग्रहणमनुज्ञातोपवेशनं च कर्तव्यम् ॥ ५७ ॥
गुरु से वेद का ज्ञान ग्रहण करते समय (गुरु के बायें पैर को दाहिने हाथ से छूने से लेकर सावित्री मन्त्र के उच्चारण तक के पूर्वोक्त कार्य) आरम्भ से करना चाहिए ॥ ५७ ॥
ॐ कारोऽन्यत्रापि ॥ ५८ ॥
सावित्र्यनुवचनादन्यत्राप्योंकारो वक्तव्यः । प्रत्यहमध्ययनकाल इत्यर्थः ॥ ५८ ॥
(सावित्री मन्त्र के उच्चारण के साथ ॐ का उच्चारण करने के अतिरिक्त) अन्यत्र (प्रतिदिन अध्ययन के समय) ॐ का उच्चारण करना चाहिए ॥ ५८ ॥
अन्तरागमने पुनरुपसदनम् ॥ ५९ ॥
गुरोः शिष्यस्य च मध्ये गमनमन्तरागमनम् । यस्य कस्याप्यन्तरागमने पुनरुपसदनं कर्तव्यम् । पाणिना सव्यमित्याद्योंकारेऽन्यत्रापीत्यन्तमुपसदनम् ॥ ५९ ॥
(गुरु और शिष्य के) बीच में किसी भी प्राणी के आ जाने पर पुनः गुरु के चरण स्पर्श (आदि पूर्वोक्त कर्म) करने होते हैं ॥ ५९ ॥
श्बनकुलसर्पमण्डूकमाजराणां त्र्यहमुपवासो विप्रवासश्च ॥ ६० ॥
श्वादीनामन्तरागमने त्र्यहमुपवासो विप्रवासश्च कर्तव्यः । विप्रवास आचार्यकुलादन्यत्र वासः । मनुस्तु—
सानुवाद-मिताक्षरावृत्तिसहितानि १५
पशुमण्डूकमार्जारश्वसर्पनकुलेषु । च ।
अन्तरागमने विद्यादनध्यायमहर्निशम्॥ इति ।
तद्धारणाध्ययनविषयम्। गौतमोयं तु ग्रहणाध्ययनविषयम् ॥ ६० ॥
कुत्ता, नेवला साँप, मेंढक और बिल्ली के ( गुरु और शिष्य के बीच में ) आ जाने पर शिष्य तीन दिन उपवास करे और गुरुकुल से पृथक् निवास करे ॥ ६० ॥
प्राणायामा घृतप्राशनं चेतरेषाम् ॥ ६१ ॥
इतरेषां श्वादिव्यतिरिक्तानां पश्वादीनामन्तरागमने प्राणायामास्त्रयः कार्या घृतप्राशनं च कार्यम्। एतत्सर्वं शिष्यस्य प्रायश्चित्तं न गुरोः, उभयोरित्यपरे ॥ ६१ ॥
( उपर्युक्त प्राणियों के अतिरिक्त ) अन्य पशुओं के गुरु और शिष्य के बीच में आने पर शिष्य ( तीन ) प्राणयाम करे और घी खावे। ( कुछ शास्त्रकारों के मतानुसार यह प्रायश्चित्त गुरु और शिष्य दोनों को ही करना चाहिए ) ॥ ६१ ॥
श्मशानाभ्यध्ययने चैवम् ॥ ६२ ॥
अभिरूपरिभावे श्मशानस्योपर्यध्ययने चैवं प्रायश्चित्तम्। प्राणायामा घृतप्राशनं चेति। द्विरुक्तिरध्यायपरिसमाप्त्यर्था ॥ ६२ ॥
इति श्रीगौतमीयवृत्तौ हरदत्तविरचितायां मिताक्षरायां प्रथमप्रश्ने प्रथमोऽध्यायः ॥
श्मशान के समीप अध्ययन करने पर भी यही प्रायश्चित्त ( प्राणायाम और घृतप्राशन ) करे ॥ ६२ ॥
गौतमधर्मसूत्र का प्रथम अध्याय समाप्त
अथ द्वितीयोऽध्यायः
उपनीतप्रसङ्गेनानुपनीतधर्मा उच्यन्ते—
प्रागुपनयनात्कामचारः कामवादः कामभक्षः ॥ १ ॥
आषोडशाद् ब्राह्मणस्येत्यापत्कल्पोपनयनविषयम् । कामचार इच्छाचरणम् । अपण्यान्यपि विक्रीणीयाच्छूद्रवृत्त्याऽपि जीवेदिति । कामवादोऽश्लीलानृतादिवचनम् । कामभक्षो लशुनपर्युषितान्नादिभक्षणं चतुःपञ्चकृत्वो वा भोजनमित्येतावद्यस्य स तथोक्तः । न तु ब्रह्महत्यासुरापानाद्यतिप्रसङ्गः ॥ १ ॥
उपनयन होने के पूर्व (बालक) इच्छानुसार कार्य (न बेचने योग्य वस्तुओं का विक्रय आदि कर्म) कर सकता है; जैसा चाहे वैसा (अर्थात् अश्लील या असत्य) बोल सकता है और इच्छानुसार (जैसे लहसुन, बासी, या चार-पाँच बार) भोजन कर सकता है ॥ १ ॥
अहुतात् ॥ २ ॥
हुतशेषं पुरोडाशादि । तदत्तीति हुतात् । तद्विपरीतोऽहुतात् । अनुपनीतो हुतं नाद्यादिति ॥ २ ॥
जिसका यज्ञोपवीत न हुआ हो वह हवन के उपरान्त अवशिष्ट (पुरोडाश आदि) का भोजन न करे ॥ २ ॥
ब्रह्मचारी ॥ ३ ॥
कामचारादेरयमपवादः । आषोडशादित्युक्तत्वात्स्त्रीषु प्रसङ्गयोग्यताऽस्त्यतो ब्रह्मचारी जितेन्द्रियः स्यादिति । तथा च स्मृत्यन्तरे—
प्रायश्चित्तं विलुप्तमवकीर्णिब्रतेन शुद्धमुपनयेन्न सप्तदशमत ऊर्ध्वं व्रात्यावकीर्णिब्रताभ्यामिति ॥ ३ ॥
(यज्ञोपवीत के पूर्व भी बालक) ब्रह्मचारी रहे (अर्थात् इन्द्रियों पर संयम रखे, स्त्रीप्रसंग न करे) ॥ ३ ॥
यथोपपादितमूत्रपुरीषो भवति ॥ ४ ॥
मूत्रपुरीषे यथोपपद्येते यस्य स तथोक्तः प्राङ्मुखादिरपि कुर्यात् । न भूमावनन्तर्धायेत्यादिस्थाननियमोऽपि नास्ति ॥ ४ ॥
सानुवाद-मिताक्षरावृत्तिसहितानि १७
जिस ढंग से सुविधा हो उस ढंग से मूत्र और पुरीष का त्याग कर सकता है ॥ ४ ॥
नास्याऽऽचमनकल्पो विद्यते ॥ ५ ॥
कल्पनषेधादाचमनमनुज्ञातं स्त्रीशूद्रवत् ॥ ५ ॥
उस ( अनुपनीत बालक ) के लिए आचमन का विधान नहीं है ॥ ५ ॥
अन्यत्रापमार्जनप्रधावनावेक्षणेभ्यः ॥ ६ ॥
अपमार्जनादीनि वर्जयित्वाऽऽचमनकल्पो नास्ति । अपमार्जनादिकमस्तीति यावत् । यद्यप्यपमार्जनादीन्याचमनकल्पे नान्तर्भवन्ति तथापि पर्युदासमुखेन तानि विधीयन्ते । अत्र (त्राप)मार्जनं सोदकेन पाणिना परिमार्जनमुच्छिष्टादिलिप्तस्य । प्रधावनममेध्यादिलिप्तस्याद्भिर्मृदा च क्षालनम् । अवेक्षणं रजस्वलादिस्पृष्टस्य । इदमत्यन्तबालविषयम् षड्वर्षादूर्ध्वं स्नानमिच्छन्ति । अस्यानुपनोतस्यैतावदुक्तमात्रकामचारादिव्यतिक्रमे प्रायश्चित्तमस्ति । तत्र स्मृत्यन्तरे—
अशीतिर्यस्य वर्षाणि बालो वाऽप्यूनषोडशः ।
प्रायश्चित्तार्धमर्हन्ति स्त्रियो व्याधित एव च ॥
ऊनैकादशवर्षस्य पञ्चवर्षात्परस्य च ।
चरेद्गुरुः सुहृच्चैव प्रायश्चित्तं विशुद्धये ॥
अतो बालतरस्यास्य नापराधो न पातकम् ।
राजदण्डश्च तस्यातः प्रायश्चित्तं च नेष्यते ॥ इति ॥ ६ ॥
भोजनोपरान्त उच्छिष्ट को धोने, मल आदि दूषित पदार्थों के लेप और गन्ध को दूर करने और रजस्वला आदि के स्पर्श से शुद्धि करने के अतिरिक्त अन्य किसी आचमन का विधान अनुपनीत बालक के लिए नहीं है ॥ ६ ॥
न तदुपस्पर्शनादशौचम् ॥ ७ ॥
तदुपस्पर्शनात्तस्याकृतोपनयनस्योदक्यादिस्पृष्टस्याप्युपस्पर्शनादशौचं न स्यात् । स्पृष्टास्पृष्टिरुपस्पर्शनम् । तेन स्नानं न कर्तव्यम् । भुक्तोच्छिष्टस्य कृतमूत्रपुरीष[स्य] स्पर्शनादपि नाऽऽचमनम् । इदमपि षड्वर्षात्प्रागेव । किमर्थं तर्हि तस्य शौचं विहितम् । न तावदनुष्ठानार्थं नापि स्पर्शयोग्यतार्थम् । अकृतशौचस्यापि स्पर्शयोग्यत्वात् । रक्षणार्थमिति ब्रूमः । तथा च स्मृत्यन्तरम्—
'बालस्य पञ्चमाद्वर्षाद्रक्षार्थं शौचमाचरेत् । इति ॥ ७ ॥
उसके ( अनुपनीत बालक के छः वर्ष की अवस्था से पहले ) रजस्वला
२ गौ०