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गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

Gita Sangraha 25 Gitas

महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि द्वारा

DevanagariHindipublished675 पृष्ठ

५७४ * गीता-संग्रह *


देहरहित और निराकार होकर मैं निरन्तर विनोदका रस लेता हूँ। मैं ज्ञानरूपी अमृत हूँ, समरस हूँ और आकाशके समान [व्यापक] हूँ॥ २६॥

मायाप्रपञ्चरचना न च मे विकारः कौटिल्यदम्भरचना न च मे विकारः। सत्यानृतेति रचना न च मे विकारो ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम्॥ २७॥

माया-प्रपंचकी रचना मेरा विकार नहीं है, कुटिलता तथा दम्भकी रचना भी मेरा विकार नहीं है और सत्य तथा मिथ्याकी रचना भी मेरा विकार नहीं है; मैं ज्ञानरूपी अमृत हूँ, समरस हूँ और आकाशके समान [व्यापक] हूँ॥ २७॥

सन्ध्यादिकालरहितं न च मे वियोगो ह्यन्तःप्रबोधरहितं बधिरो न मूकः। एवं विकल्परहितं न च भावशुद्धं ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम्॥ २८॥

मैं सन्ध्या, मध्याह्न आदि कालोंसे रहित हूँ, किसीके साथ मेरा वियोग नहीं है; मैं अन्तःकरणके ज्ञानसे रहित हूँ, किंतु बधिर और मूक नहीं हूँ। इस प्रकार मैं विकल्पोंसे रहित हूँ (इसलिये अन्तःकरणके अभावमें) मुझमें भाव-शुद्धि भी नहीं है। मैं ज्ञानरूपी अमृत हूँ, समरस हूँ तथा आकाशके समान [व्यापक] हूँ॥ २८॥

निर्नाथनाथरहितं हि निराकुलं वै निश्चिन्तचित्तविगतं हि निराकुलं वै। संविद्धि सर्वविगतं हि निराकुलं वै ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम्॥ २९॥

मैं स्वामीसे रहित हूँ और मैं भी किसीका स्वामी नहीं हूँ। मैं

  • अवधूतगीता ( १ ) * ५७५

व्याकुलतासे रहित हूँ। मैं चिन्तासे रहित हूँ और चित्तसे भी रहित हूँ। मैं प्रशान्त हूँ, तुम मुझे सर्वसे रहित तथा आकुलतारहित जानो। मैं ज्ञानरूपी अमृत हूँ, समरस हूँ और आकाशके समान [व्यापक] हूँ॥ २९ ॥

कान्तारमन्दिरमिदं हि कथं वदामि
संसिद्धसंशयमिदं हि कथं वदामि।
एवं निरन्तरसमं हि निराकुलं वै
ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम् ॥ ३० ॥

यह जगत् निर्जन वनस्थली है, यह मैं कैसे कहूँ; यह वास्तवमें है या इसमें संशय है—ऐसा भी मैं किस प्रकार कहूँ? इसी प्रकार यह निरन्तर सम है तथा निराकुल है—ऐसा भी मैं किस प्रकार कहूँ? मैं ज्ञानरूपी अमृत हूँ, समरस हूँ तथा आकाशके समान [व्यापक] हूँ॥ ३० ॥

निर्जीवजीवरहितं सततं विभाति
निर्बीजबीजरहितं सततं विभाति।
निर्वाणबन्धरहितं सततं विभाति
ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम् ॥ ३१ ॥

(मुझे यह संसार) निर्जीव (जड़) और जीव (चेतन) सभीसे सदा रहित ही प्रतीत होता है, निर्बीज और सबीज (पदार्थों)-से सदा रहित प्रतीत होता है और निर्वाण तथा बन्धनसे भी सदा रहित प्रतीत होता है (क्योंकि यह मायामात्र है)। मैं ज्ञानरूपी अमृत हूँ, समरस हूँ तथा आकाशके समान [व्यापक] हूँ॥ ३१ ॥

सम्भूतिवर्जितमिदं सततं विभाति
संसारवर्जितमिदं सततं विभाति।
संहारवर्जितमिदं सततं विभाति
ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम् ॥ ३२ ॥

यह परमतत्त्व मुझे निरन्तर उत्पत्तिसे रहित प्रतीत होता है, यह

५७६ * गीता-संग्रह *


मुझे निरन्तर नाशसे रहित भी प्रतीत होता है और यह मुझे निरन्तर संसारसे रहित प्रतीत होता है, [ब्रह्मस्वरूप] मैं ज्ञानरूपी अमृत हूँ, समरस हूँ और आकाशके समान [व्यापक] हूँ॥३२॥

उल्लेखमात्रमपि ते न च नामरूपं
निर्भिन्नभिन्नमपि ते न हि वस्तु किञ्चित्।
निर्लज्जमानस करोषि कथं विषादं
ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम्॥ ३३॥

किंचिन्मात्र भी तुम्हारा नाम तथा रूप नहीं है, तुम्हारे भेदरहित स्वरूपमें भेद उत्पन्न करनेवाली कोई भी वस्तु नहीं है; तब हे निर्लज्ज मन! तुम क्यों विषाद करते हो, [ब्रह्मस्वरूप] मैं ज्ञानरूपी अमृत हूँ, समरस हूँ और आकाशके समान [व्यापक] हूँ॥ ३३॥

किं नाम रोदिषि सखे न जरा न मृत्युः
किं नाम रोदिषि सखे न च जन्मदुःखम्।
किं नाम रोदिषि सखे न च ते विकारो
ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम्॥ ३४॥

हे सखे! तुम क्यों रोते हो, तुम्हें न तो जरा और न तो मृत्यु ही व्याप्त कर सकती है। हे सखे! तुम क्यों रोते हो, तुम्हें तो जन्मका दुःख भी नहीं हो सकता है। हे सखे! तुम क्यों रोते हो, तुम्हें कोई विकार नहीं हो सकता। [ब्रह्मस्वरूप] मैं ज्ञानरूपी अमृत हूँ, समरस हूँ और आकाशके समान [व्यापक] हूँ॥ ३४॥

किं नाम रोदिषि सखे न च ते स्वरूपं
किं नाम रोदिषि सखे न च ते विरूपम्।
किं नाम रोदिषि सखे न च ते वयांसि
ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम्॥ ३५॥

हे सखे! तुम किसलिये रुदन करते हो, (यह शरीर) तुम्हारा

  • अवधूतगीता ( १ ) * ५७७

[वास्तविक] स्वरूप नहीं है। हे सखे! तुम किसलिये रुदन करते हो, तुम्हारा रूप नष्ट होनेवाला नहीं है। हे सखे! तुम किसलिये रुदन करते हो, आयु आदि भी तुम्हारे नहीं हैं। मैं ज्ञानरूपी अमृत हूँ, समरस हूँ और आकाशके समान [व्यापक] हूँ॥ ३५ ॥

किं नाम रोदिषि सखे न च ते वयांसि किं नाम रोदिषि सखे न च ते मनांसि। किं नाम रोदिषि सखे न तवेन्द्रियाणि ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम्॥ ३६॥

हे सखे! तुम किसलिये रुदन करते हो, आयु आदि तुम्हारे नहीं हैं। हे सखे! तुम किसलिये रुदन करते हो, मन आदि भी तुम्हारे नहीं हैं। हे सखे! तुम किसलिये रुदन करते हो, इन्द्रियाँ भी तुम्हारी नहीं हैं। मैं ज्ञानरूपी अमृत हूँ, समरस हूँ और आकाशके समान [व्यापक] हूँ॥ ३६ ॥

किं नाम रोदिषि सखे न च तेऽस्ति कामः किं नाम रोदिषि सखे न च ते प्रलोभः। किं नाम रोदिषि सखे न च ते विमोहो ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम्॥ ३७॥

हे सखे! तुम किसलिये रुदन करते हो, तुम्हारे अन्तःकरणमें कामना नहीं है। हे सखे! तुम किसलिये रुदन करते हो, तुम्हारे अन्तःकरणमें लोभ नहीं है। हे सखे! तुम किसलिये रुदन करते हो, तुम्हारे अन्तःकरणमें मोह नहीं है। मैं ज्ञानरूपी अमृत हूँ, समरस हूँ तथा आकाशके समान [व्यापक] हूँ॥ ३७॥

ऐश्वर्यमिच्छसि कथं न च ते धनानि ऐश्वर्यमिच्छसि कथं न च ते हि पत्नी।

५७८ * गीता-संग्रह *


ऐश्वर्यमिच्छसि कथं न च ते ममेति
  ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम् ॥ ३८ ॥

[हे तात!] जब धन आदि तुम्हारे नहीं हैं, तब तुम ऐश्वर्यकी इच्छा किसलिये करते हो; जब पत्नी भी वस्तुतः तुम्हारी नहीं है, तब तुम ऐश्वर्यकी इच्छा क्यों करते हो; जब ममत्व ही तुम्हारा नहीं रहा, तब तुम ऐश्वर्यकी इच्छा क्यों करते हो? मैं ज्ञानरूपी अमृत हूँ, समरस हूँ और आकाशके समान [व्यापक] हूँ ॥ ३८ ॥

लिङ्गप्रपञ्चजनुषी न च ते न मे च
  निर्लज्जमानसमिदं च विभाति भिन्नम्।
निर्भेदभेदरहितं न च ते न मे च
  ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम् ॥ ३९ ॥

[नाना प्रकारके पशु, पक्षी, मनुष्य आदि] चिह्नस्वरूप प्रपंचकी उत्पत्ति न तुम्हारे है और न मेरे है; यह सम्पूर्ण रचना निर्लज्ज मनको [भ्रान्तिवश] भिन्न होकर प्रतीत होती है। अभेद और भेदसे रहित होना भी तुम्हारा नहीं है और मेरा भी नहीं है। मैं ज्ञानरूपी अमृत हूँ, समरस हूँ और आकाशके समान [व्यापक] हूँ ॥ ३९ ॥

नो वाणुमात्रमपि ते हि विरागरूपं
  नो वाणुमात्रमपि ते हि सरागरूपम्।
नो वाणुमात्रमपि ते हि सकामरूपं
  ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम् ॥ ४० ॥

तुम्हारा स्वरूप अणुमात्र भी रागसे रहित नहीं है और तुम्हारा स्वरूप अणुमात्र भी रागयुक्त नहीं है; उसी प्रकार तुम्हारा स्वरूप अणुमात्र भी कामनायुक्त नहीं है। मैं ज्ञानरूपी अमृत हूँ, समरस हूँ तथा आकाशके समान [व्यापक] हूँ ॥ ४० ॥

  • अवधूतगीता (१) * ५७९

ध्याता न ते हि हृदये न च ते समाधि-
र्ध्यानं न ते हि हृदये न बहिः प्रदेशः।
ध्येयं न चेति हृदये न हि वस्तु कालो
ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम् ॥ ४१ ॥

तुम्हारे हृदयमें न कोई ध्यान करनेवाला है, न कोई समाधि है, न कोई ध्यान है और न कोई बाह्य प्रदेश ही है; इसी प्रकार तुम्हारे हृदयमें न कोई ध्येय है, न कोई वस्तु है और न काल ही है। मैं ज्ञानरूपी अमृत हूँ, समरस हूँ और आकाशके समान [व्यापक] हूँ॥ ४१ ॥

यत्सारभूतमखिलं कथितं मया ते
न त्वं न मे न महतो न गुरुर्न शिष्यः।
स्वच्छन्दरूपसहजं परमार्थतत्त्वं
ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम् ॥ ४२ ॥

जो कुछ भी सारभूत था, वह सब मैंने तुमसे कह दिया। वास्तवमें न तुम हो, न मैं हूँ, न कोई पूज्य है, न कोई गुरु है और न कोई शिष्य है। मैं सहज, परमस्वतन्त्र तथा परमार्थस्वरूप हूँ। [ब्रह्मस्वरूप] मैं ज्ञानरूपी अमृत हूँ, समरस हूँ तथा आकाशके समान [व्यापक] हूँ [तुम भी वही हो] ॥ ४२ ॥

कथमिह परमार्थं तत्त्वमानन्दरूपं
कथमिह परमार्थं नैवमानन्दरूपम्।
कथमिह परमार्थं ज्ञानविज्ञानरूपं
यदि परमहमेकं वर्तते व्योमरूपम् ॥ ४३ ॥

जब मैं ही एकमात्र परमतत्त्व आकाशकी भाँति सर्वव्याप्त हूँ, तब मैं कैसे कहूँ कि यह परमार्थतत्त्व आनन्दस्वरूप है अथवा नहीं और यह ज्ञान अथवा विज्ञान (साधना)-से प्राप्य है अथवा नहीं॥ ४३ ॥

५८० * गीता-संग्रह *


दहनपवनहीनं विद्धि विज्ञानमेक- मवनिजलविहीनं विद्धि विज्ञानरूपम्। समगमनविहीनं विद्धि विज्ञानमेकं गगनमिव विशालं विद्धि विज्ञानमेकम्॥ ४४॥

[हे तात !] तुम विज्ञानस्वरूप आत्माको अग्नि तथा वायुसे रहित और एक समझो; उसी प्रकार इस विज्ञानस्वरूप आत्माको पृथ्वी तथा जलसे रहित समझो; इस विज्ञानस्वरूप आत्माको सतत गतिसे विहीन समझो और इस विज्ञानस्वरूप आत्माको आकाशकी भाँति विशाल तथा एक जानो॥ ४४॥

न शून्यरूपं न विशून्यरूपं न शुद्धरूपं न विशुद्धरूपम्। रूपं विरूपं न भवामि किञ्चित् स्वरूपरूपं परमार्थतत्त्वम्॥ ४५॥

मैं न शून्यरूप हूँ तथा न अशून्यरूप हूँ; न शुद्धरूप हूँ और न अशुद्ध रूप हूँ; मैं रूप तथा विरूप कुछ भी नहीं हूँ। मैं स्वरूपमात्र हूँ और परमार्थतत्त्व हूँ॥ ४५॥

मुञ्च मुञ्च हि संसारं त्यागं मुञ्च हि सर्वथा। त्यागात्यागविषं शुद्धममृतं सहजं ध्रुवम्॥ ४६॥

[हे तात !] तुम संसारका त्याग कर दो, त्याग कर दो; पुनः उस त्यागका भी सर्वथा त्याग कर दो; त्याग तथा अत्यागको विषरूप जानकर उन्हें छोड़ दो। तुम शुद्धस्वभाव, अमृतरूप, सहज तथा नित्य हो॥ ४६॥

॥ इति श्रीदत्तात्रेयविरचितायामवधूतगीतायामात्मसंवित्त्युपदेशो नाम तृतीयोऽध्यायः॥ ३॥

* अवधूतगीता (१) * ५८१


चौथा अध्याय

आत्मज्ञानीकी सर्वत्र समदृष्टि तथा आत्मतत्त्वकी अकथनीयताकी विवेचना

अवधूत उवाच

नावाहनं नैव विसर्जनं वा पुष्पाणि पत्राणि कथं भवन्ति।
ध्यानानि मन्त्राणि कथं भवन्ति समासमं चैव शिवार्चनं च॥ १ ॥

अवधूत श्रीदत्तात्रेयजी बोले— [ चेतन ब्रह्म सर्वव्यापी है, अतः ] उस ब्रह्मके न तो आवाहनकी और न उसके विसर्जनकी ही कोई आवश्यकता है। पुष्प तथा पत्र आदि भी किसलिये अर्पण होते हैं। उसके ध्यान तथा मन्त्र भी किस प्रकार होते हैं अर्थात् उसकी कोई आवश्यकता नहीं। सभीमें समदृष्टि रखना ही कल्याणस्वरूप चेतन ब्रह्मका पूजन है ॥ १ ॥

न केवलं बन्धविबन्धमुक्तो न केवलं शुद्धविशुद्धमुक्तः।
न केवलं योगवियोगमुक्तः स वै विमुक्तो गगनोपमोऽहम्॥ २ ॥

मैं केवल आसक्ति-अनासक्ति, शुद्ध-अशुद्ध और योग-वियोगसे ही रहित नहीं हूँ, मैं तो आकाशकी भाँति (सर्वव्यापक) और सर्वथा मुक्त हूँ॥ २ ॥

सञ्जायते सर्वमिदं हि तथ्यं सञ्जायते सर्वमिदं वितथ्यम्।
एवं विकल्पो मम नैव जातः स्वरूपनिर्वाणमनामयोऽहम् ॥ ३ ॥

यह सम्पूर्ण जगत्-प्रपंच सत्यरूपमें उत्पन्न होता है अथवा यह मिथ्या उत्पन्न होता है—इस प्रकारका विकल्प मुझे कभी उत्पन्न नहीं हुआ; क्योंकि मैं स्वभावसे मुक्तरूप हूँ और विकाररहित हूँ॥ ३ ॥

५८२ * गीता-संग्रह *


न साञ्जनं चैव निरञ्जनं वा न चान्तरं वापि निरन्तरं वा। अन्तर्विभिन्नं न हि मे विभाति स्वरूपनिर्वाणमनामयोऽहम् ॥ ४॥

मैं न तो मायामलसे युक्त हूँ और न मायामलसे रहित ही हूँ, मैं न व्यवधान हूँ और न व्यवधानरहित हूँ। मुझे व्यवधान तथा भेदका भान नहीं होता है। मैं स्वभावसे मुक्तरूप हूँ और विकाररहित हूँ॥ ४॥

अबोधबोधो मम नैव जातो बोधस्वरूपं मम नैव जातम्। निर्बोधबोधं च कथं वदामि स्वरूपनिर्वाणमनामयोऽहम् ॥ ५॥

अज्ञानका बोध मुझे कभी नहीं हुआ, मैं बोधस्वरूप हूँ—ऐसा ज्ञान भी मुझे कभी नहीं हुआ। मैं अपनेको ज्ञानसे रहित अथवा बोध-वाला किस प्रकार कहूँ; [क्योंकि] मैं स्वभावसे मुक्तस्वरूप हूँ तथा विकाररहित हूँ॥ ५॥

न धर्मयुक्तो न च पापयुक्तो न बन्धयुक्तो न च मोक्षयुक्तः। युक्तं त्वयुक्तं न च मे विभाति स्वरूपनिर्वाणमनामयोऽहम् ॥ ६॥

मैं धर्मयुक्त नहीं हूँ, पापयुक्त नहीं हूँ, बन्धनयुक्त नहीं हूँ और मोक्षयुक्त भी नहीं हूँ। मुझे युक्त तथा अयुक्तका भान नहीं होता है; [क्योंकि] मैं स्वभावसे मुक्तरूप हूँ तथा विकाररहित हूँ॥ ६॥

परापरं वा न च मे कदाचिन् मध्यस्थभावो हि न चारिमित्रम्।

* अवधूतगीता ( १ ) * ५८३


हिताहितं चापि कथं वदामि
स्वरूपनिर्वाणमनामयोऽहम् ॥७॥

मुझमें न पर, न अपर और न तो मध्यस्थभाव ही हैं। मुझमें शत्रु तथा मित्रकी भी भावना नहीं है। मैं [किसीको] अपना हितकर अथवा अहितकर भी कैसे कहूँ, [क्योंकि] मैं स्वभावसे मुक्तस्वरूप तथा विकाररहित हूँ॥७॥

नोपासको नैवमुपास्यरूपं
न चोपदेशो न च मे क्रिया च।
संवित्स्वरूपं च कथं वदामि
स्वरूपनिर्वाणमनामयोऽहम् ॥८॥

मैं उपासक नहीं हूँ और उपास्यरूप भी नहीं हूँ। मुझमें न तो उपदेश है और न क्रिया है। मैं अपनेको शुद्धज्ञानस्वरूप भी किस प्रकार कह सकता हूँ; [क्योंकि] मैं स्वभावसे मुक्तस्वरूप हूँ तथा विकाररहित हूँ॥८॥

नो व्यापकं व्याप्यमिहास्ति किञ्चि-
न्न चालयं वापि निरालयं वा।
अशून्यशून्यं च कथं वदामि
स्वरूपनिर्वाणमनामयोऽहम् ॥९॥

इस चेतन आत्मामें किंचिन्मात्र भी व्याप्य-व्यापकभाव नहीं है; इसमें आश्रयभाव अथवा अनाश्रयभाव भी नहीं है। मैं इसे शून्यरहित अथवा शून्य भी कैसे कहूँ; मैं स्वभावसे मुक्तस्वरूप हूँ तथा विकाररहित हूँ॥९॥

न ग्राहको ग्राह्यकमेव किञ्चि-
न्न कारणं वा मम नैव कार्यम्।

५८४ * गीता-संग्रह *


अचिन्त्यचिन्त्यं च कथं वदामि स्वरूपनिर्वाणमनामयोऽहम् ॥१०॥

मेरा ग्राहक (ग्रहण करनेवाला) अथवा ग्राह्य (ग्रहण किये जाने योग्य) भी कोई नहीं है; मेरा न कोई कारण है और न तो कोई कार्य है। उस आत्मतत्त्वको मैं अचिन्त्य अथवा चिन्त्य भी कैसे कहूँ; [ब्रह्मस्वरूप] मैं स्वभावसे मुक्तस्वरूप हूँ तथा विकाररहित हूँ॥१०॥

न भेदकं वापि न चैव भेद्यं न वेदकं वा मम नैव वेद्यम्। गतागतं तात कथं वदामि स्वरूपनिर्वाणमनामयोऽहम् ॥११॥

मैं न तो भेद करता हूँ न मेरा भेद होता है, मैं न तो जाननेवाला हूँ न जाना ही जाता हूँ। हे मित्र, आने-जानेवाले (पदार्थों)-के विषय में मैं कैसे कहूँ ? मैं स्वभावसे मुक्तस्वरूप और विकाररहित हूँ॥ ११ ॥

न चास्ति देहो न च मे विदेहो बुद्धिर्मनो मे न हि चेन्द्रियाणि। रागो विरागश्च कथं वदामि स्वरूपनिर्वाणमनामयोऽहम् ॥१२॥

मैं न शरीरयुक्त हूँ और न शरीरसे रहित ही हूँ। बुद्धि, मन तथा इन्द्रियाँ भी मेरे नहीं हैं। किसीमें भी मेरा राग है अथवा विराग है—यह मैं किस प्रकार कहूँ, क्योंकि मैं स्वभावसे मुक्तस्वरूप तथा विकाररहित हूँ॥ १२ ॥

उल्लेखमात्रं न हि भिन्नमुच्चै- रुल्लेखमात्रं न तिरोहितं वै। समासमं मित्र कथं वदामि स्वरूपनिर्वाणमनामयोऽहम् ॥१३॥

जीव तथा ब्रह्मका भेद किंचिन्मात्र भी नहीं है; वह ब्रह्म

  • अवधूतगीता (१) * ५८५

किंचिन्मात्र भी छिपा हुआ नहीं है। हे मित्र! मैं उसे सम अथवा विषम भी कैसे कह सकता हूँ; मैं स्वभावसे मुक्तस्वरूप तथा विकारसे रहित हूँ॥ १३॥

जितेन्द्रियोऽहं त्वजितेन्द्रियो वा न संयमो मे नियमो न जातः। जयाजयौ मित्र कथं वदामि स्वरूपनिर्वाणमनामयोऽहम् ॥ १४॥

मैं जितेन्द्रिय हूँ अथवा अजितेन्द्रिय हूँ—यह कैसे कहूँ, (क्योंकि) मेरा कोई संयम अथवा नियम नहीं है। हे मित्र! मैं जय तथा पराजयका किस प्रकार कथन करूँ; मैं स्वभावसे मुक्तस्वरूप हूँ तथा विकाररहित हूँ॥ १४॥

अमूर्तमूर्तिर्न च मे कदाचि- दाद्यन्तमध्यं न च मे कदाचित्। बलाबलं मित्र कथं वदामि स्वरूपनिर्वाणमनामयोऽहम् ॥ १५॥

मैं कभी भी मूर्तिरहित अथवा मूर्तिमान् नहीं हूँ; मेरा कभी भी आदि, अन्त अथवा मध्य नहीं है। हे मित्र! मैं बलवान् तथा निर्बलका भी कथन किस प्रकार करूँ; मैं स्वभावसे मुक्तस्वरूप हूँ और विकाररहित हूँ॥ १५॥

मृतामृतं वापि विषाविषं च सञ्जायते तात न मे कदाचित्। अशुद्धशुद्धं च कथं वदामि स्वरूपनिर्वाणमनामयोऽहम् ॥ १६॥

हे तात! मुझमें मरनेका, न मरनेका, विषका अथवा विषरहितका भाव कभी उत्पन्न नहीं होता है। मैं अशुद्ध अथवा शुद्धका भी कथन कैसे करूँ; मैं स्वभावसे मुक्तस्वरूप हूँ तथा विकाररहित हूँ॥ १६॥

५८६ * गीता-संग्रह *


स्वप्नः प्रबोधो न च योगमुद्रा
नक्तं दिवा वापि न मे कदाचित्।
अतुर्यतुर्यं च कथं वदामि
स्वरूपनिर्वाणमनामयोऽहम् ॥ १७ ॥

मुझमें न स्वप्न है, न जाग्रत् है, न योगमुद्रा है, न रात है अथवा न दिन ही है; इसी प्रकार मैं तुरीय अथवा अतुरीय अवस्थाको भी किस प्रकार कहूँ? मैं स्वभावसे मुक्तस्वरूप हूँ तथा विकाररहित हूँ॥ १७॥

संविद्धि मां सर्वविसर्वमुक्तं
माया विमाया न च मे कदाचित्।
सन्ध्यादिकं कर्म कथं वदामि
स्वरूपनिर्वाणमनामयोऽहम् ॥ १८ ॥

[हे तात!] तुम मुझको सब प्रकार सभी (प्रपंचों)-से मुक्त जानो; माया तथा विमाया भी मुझमें कभी उत्पन्न नहीं हुए। मैं सन्ध्या आदि कर्मका भी कथन किस प्रकार करूँ; मैं स्वभावसे मुक्तस्वरूप हूँ तथा विकाररहित हूँ॥ १८॥

संविद्धि मां सर्वसमाधियुक्तं
संविद्धि मां लक्ष्यविलक्ष्यमुक्तम्।
योगं वियोगं च कथं वदामि
स्वरूपनिर्वाणमनामयोऽहम् ॥ १९ ॥

[हे तात!] तुम मुझको सम्पूर्ण समाधिसे युक्त जानो और मुझको लक्ष्यभाव तथा विलक्ष्यभावसे रहित जानो। मैं योग तथा वियोगको भी किस प्रकार कहूँ; मैं स्वभावसे मुक्तस्वरूप हूँ तथा विकाररहित हूँ॥ १९॥

  • अवधूतगीता ( १ ) * ५८७

मूर्खोऽपि नाहं न च पण्डितोऽहं
मौनं विमौनं न च मे कदाचित्।
तर्कं वितर्कञ्च कथं वदामि
स्वरूपनिर्वाणमनामयोऽहम् ॥२०॥

मैं न तो मूर्ख हूँ और न पण्डित हूँ, मौन तथा वाचालका भाव भी मुझमें कभी नहीं हुआ। मैं तर्क और वितर्कका कथन किस प्रकार करूँ? मैं स्वभावसे मुक्तस्वरूप तथा विकाररहित हूँ॥२०॥

पिता च माता च कुलं न जाति-
र्जन्मादि मृत्युर्न च मे कदाचित्।
स्नेहं विमोहं च कथं वदामि
स्वरूपनिर्वाणमनामयोऽहम् ॥२१॥

[ब्रह्मस्वरूप] मेरा न कोई पिता है, न माता है, न कुल है और न जाति है; मेरा जन्म आदि तथा मृत्यु कभी नहीं हुए। मैं स्नेह तथा वैराग्यका कथन किस प्रकार करूँ? मैं स्वभावसे मुक्तस्वरूप हूँ तथा विकाररहित हूँ॥२१॥

अस्तं गतो नैव सदोदितोऽहं
तेजो वितेजो न च मे कदाचित्।
सन्ध्यादिकं कर्म कथं वदामि
स्वरूपनिर्वाणमनामयोऽहम् ॥२२॥

मैं कभी भी लयभावको प्राप्त नहीं होता हूँ, अपितु सदा उदित रहता हूँ। तेज अथवा निस्तेज कभी भी मुझमें नहीं होता। मैं सन्ध्या आदि कर्मका कथन किस प्रकार करूँ? मैं स्वभावसे मुक्तस्वरूप हूँ तथा विकाररहित हूँ॥२२॥

असंशयं विद्धि निराकुलं मा-
मसंशयं विद्धि निरन्तरं माम्।

५८८ * गीता-संग्रह *


असंशयं विद्धि निरञ्जनं मां स्वरूपनिर्वाणमनामयोऽहम् ॥ २३ ॥

हे तात ! तुम मुझको निस्सन्देह व्याकुलतासे रहित जानो, निश्चय ही मुझको शाश्वत जानो और निस्सन्देह मुझको मायामलसे रहित जानो; मैं स्वभावसे मुक्तस्वरूप तथा विकाररहित हूँ॥ २३ ॥

ध्यानानि सर्वाणि परित्यजन्ति शुभाशुभं कर्म परित्यजन्ति। त्यागामृतं तात पिबन्ति धीराः स्वरूपनिर्वाणमनामयोऽहम् ॥ २४ ॥

हे तात ! आत्मज्ञानी धीर पुरुष सभी ध्यानोंका त्याग कर देते हैं, सभी शुभाशुभ कर्मोंको छोड़ देते हैं और इस प्रकार वे (सर्व) त्यागरूपी अमृतका पान करते हैं। मैं तो स्वभावसे मुक्तस्वरूप हूँ और विकाररहित हूँ॥ २४॥

विन्दति विन्दति नहि नहि यत्र छन्दो लक्षणं नहि नहि तत्र। समरसमग्नो भावितपूतः प्रलपति तत्त्वं परमवधूतः ॥ २५ ॥

पवित्रतासे युक्त तथा एकरस आत्मानन्दमें मग्न परम अवधूत उस आत्मामें कुछ भी नहीं देखता है और वहाँ कुछ भी नहीं प्राप्त करता है; क्योंकि वहाँ छन्दादि लक्षण वस्तुतः नहीं हैं। वह अवधूत तो एकमात्र परमतत्त्वका ही कथन करता है ॥ २५ ॥

॥ इति श्रीदत्तात्रेयविरचितायामवधूतगीतायामात्मसंवित्त्युपदेशो नाम चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥

  • अवधूतगीता ( १ ) * ५८९

पाँचवाँ अध्याय

आत्मज्ञानीद्वारा अपने मनको प्रबोध

अवधूत उवाच

ओमिति गदितं गगनसमं त-
न्न परापरसारविचार इति।
अविलासविलासनिराकरणं
कथमक्षरबिन्दुसमुच्चरणम् ॥ १ ॥

अवधूत श्रीदत्तात्रेयजी बोले— 'ओम्' इस प्रकार जो उच्चरित किया गया है, वह आकाशके समान व्यापक है; उसमें पर, अपर तथा सारका विचार नहीं है; और जगत्-प्रपंचके विलास तथा विलयका उसीमें निराकरण भी होता है। (उसके) अक्षर-बिन्दुका उच्चारण किस प्रकार होगा ? ॥ १ ॥

इति तत्त्वमसिप्रभृतिश्रुतिभिः
प्रतिपादितमात्मनि तत्त्वमसि।
त्वमुपाधिविवर्जितसर्वसमं
किमु रोदिषि मानस सर्वसमम् ॥ २ ॥

तत्त्वमसि आदि श्रुतियोंने प्रतिपादित किया है कि आत्मामें वह [ब्रह्म] तुम ही हो। तुम उपाधिसे रहित सभीमें सम हो। हे मन! तुम किसलिये रुदन करते हो; तुम तो सर्वत्र समरूप हो ॥ २ ॥

अधऊर्ध्वविवर्जितसर्वसमं
बहिरन्तरवर्जितसर्वसमम् ।
यदि चैकविवर्जितसर्वसमं
किमु रोदिषि मानस सर्वसमम् ॥ ३ ॥

जो सबमें समरूप है, वह (आत्मा) नीचे तथा ऊपरके भेदसे रहित, बाहर तथा भीतरके भेदसे रहित और एकत्वभावसे भी रहित है; हे मन! तुम किसलिये रुदन करते हो; तुम तो सर्वत्र समरूप हो ॥ ३ ॥

५९० * गीता-संग्रह *


न हि कल्पितकल्पविचार इति न हि कारणकार्यविचार इति। पदसन्धिविवर्जितसर्वसमं किमु रोदिषि मानस सर्वसमम्॥ ४॥

जो सबमें समरूप है, उस (आत्मा)-में कल्पित और कल्पका विचार नहीं हो सकता; कार्य और कारणका विचार नहीं हो सकता तथा वह पद तथा सन्धिस रहित होता है। हे मन! तुम किसलिये रुदन करते हो; तुम तो सर्वत्र समरूप हो॥ ४॥

न हि बोधविबोधसमाधिरिति न हि देशविदेशसमाधिरिति। न हि कालविकालसमाधिरिति किमु रोदिषि मानस सर्वसमम्॥ ५॥

[समत्वकी] समाधि-अवस्थामें ज्ञान अथवा अज्ञान नहीं होता, उसमें देश अथवा विदेश यह विचार भी नहीं हो सकता; उसमें काल अथवा अकाल नहीं है—ऐसा विचार भी नहीं हो सकता। हे मन! तुम किसलिये रुदन करते हो; तुम तो सर्वत्र समरूप हो॥ ५॥

न हि कुम्भनभो न हि कुम्भ इति न हि जीववपुर्न हि जीव इति। न हि कारणकार्यविभाग इति किमु रोदिषि मानस सर्वसमम्॥ ६॥

समत्वभावमें न तो घटाकाश है और न घट है; उसमें न तो जीवका शरीर है और न तो जीव ही है; उसमें कारण तथा कार्यका विभाग भी नहीं है। हे मन! तुम किसलिये रुदन करते हो; तुम तो सर्वत्र समरूप हो॥ ६॥

* अवधूतगीता (१) * ५९१


इह सर्वनिरन्तरमोक्षपदं
लघुदीर्घविचारविहीन इति।
न हि वर्तुलकोणविभाग इति
किमु रोदिषि मानस सर्वसमम् ॥ ७ ॥

यह चेतन आत्मा सर्वरूप, शाश्वत तथा मोक्षस्वरूप है। यह लघु तथा दीर्घके विचारसे रहित है। इसमें गोल तथा कोणका विभाग भी नहीं है। हे मन! तुम किसलिये रुदन करते हो; तुम तो सर्वत्र समरूप हो ॥ ७ ॥

इह शून्यविशून्यविहीन इति
इह शुद्धविशुद्धविहीन इति।
इह सर्वविसर्वविहीन इति
किमु रोदिषि मानस सर्वसमम् ॥ ८ ॥

यह आत्मा शून्य तथा अशून्यसे रहित है; यह शुद्ध तथा अशुद्धसे विहीन है; यह सर्व तथा विसर्वसे भी रहित है। हे मन! तुम किसलिये रुदन करते हो; तुम तो सर्वत्र समरूप हो ॥ ८ ॥

न हि भिन्नविभिन्नविचार इति
बहिरन्तरसन्धिविचार इति।
अरिमित्रविवर्जितसर्वसमं
किमु रोदिषि मानस सर्वसमम् ॥ ९ ॥

यह चेतन आत्मा भिन्न है अथवा अभिन्न है—यह विचार नहीं हो सकता; यह बाहर है अथवा भीतर अथवा सन्धिस्थानपर है—यह विचार भी नहीं हो सकता। यह शत्रु-मित्रके भावसे रहित सर्वसम है। हे मन! तुम किसलिये रुदन करते हो; तुम तो सर्वत्र समरूप हो ॥ ९ ॥

न हि शिष्यविशिष्यस्वरूप इति
न चराचरभेदविचार इति।

५९२ * गीता-संग्रह *


इह सर्वनिरन्तरमोक्षपदं
किमु रोदिषि मानस सर्वसमम् ॥ १० ॥

उस चेतन आत्मामें शिष्यभाव अथवा शिष्यत्वसे रहित होनेका भाव नहीं है। उसमें चर-अचरके भेदका विचार भी नहीं है। वह सर्वरूप, शाश्वत तथा मोक्षस्वरूप है। हे मन! तुम किसलिये रुदन करते हो; तुम तो सर्वत्र समरूप हो ॥ १० ॥

ननु रूपविरूपविहीन इति
ननु भिन्नविभिन्नविहीन इति।
ननु सर्गविसर्गविहीन इति
किमु रोदिषि मानस सर्वसमम् ॥ ११ ॥

वह चेतन आत्मा निश्चय ही रूप तथा विरूपसे रहित है; वह निश्चय ही भेद तथा अभेदसे भी रहित है; वह निश्चय ही उत्पत्ति तथा प्रलयसे भी रहित है। हे मन! तुम किसलिये रुदन करते हो; तुम तो सर्वत्र समरूप हो ॥ ११ ॥

न गुणागुणपाशनिबन्ध इति
मृतजीवनकर्म करोति कथम्।
इति शुद्धनिरञ्जनसर्वसमं
किमु रोदिषि मानस सर्वसमम् ॥ १२ ॥

उस चेतन आत्मामें गुण तथा अगुणके पाशका बन्धन नहीं है; वह मृतकके तथा जीवितके कर्म कैसे कर सकता है? वह शुद्ध, मायामलसे रहित तथा सर्वत्र समरूप है। हे मन! तुम किसलिये रुदन करते हो; तुम तो सर्वत्र समरूप हो ॥ १२ ॥

इह भावविभावविहीन इति
इह कामविकामविहीन इति।

  • अवधूतगीता (१) * ५१३

इह बोधतमं खलु मोक्षसमं किमु रोदिषि मानस सर्वसमम् ॥ १३ ॥

वह आत्मा भाव तथा अभावसे रहित है; वह काम तथा अकामसे रहित है। वह आत्मा परम बोधस्वरूप तथा मोक्षस्वरूप है। हे मन ! तुम किसलिये रुदन करते हो; तुम तो सर्वत्र समरूप हो ॥ १३ ॥

इह तत्त्वनिरन्तरतत्त्वमिति न हि सन्धिविसन्धिविहीन इति। यदि सर्वविवर्जितसर्वसमं किमु रोदिषि मानस सर्वसमम् ॥ १४ ॥

इस आत्मामें यह तत्त्व है या निरन्तरता ही तत्त्व है—ऐसा भेद नहीं होता है; यह सन्धि तथा विसन्धिसे रहित है। यदि यह सर्वसे रहित तथा सर्वसम है, तब हे मन ! तुम किसलिये रुदन करते हो; तुम तो सर्वत्र समरूप हो ॥ १४ ॥

अनिकेतकुटी परिवारसमं इह सङ्गविसङ्गविहीनपरम्। इह बोधविबोधविहीनपरं किमु रोदिषि मानस सर्वसमम् ॥ १५ ॥

तुम्हारे लिये एकान्त कुटियामें रहना या परिवारके बीच रहना समान है, उसी तरह संग-असंग और ज्ञान-अज्ञानके द्वन्द्वसे परे तुम्हारी स्थिति है। तब हे मन ! तुम किसलिये रुदन करते हो; तुम तो सर्वत्र समरूप हो ॥ १५ ॥

अविकारविकारमसत्यमिति अविलक्षविलक्षमसत्यमिति । यदि केवलमात्मनि सत्यमिति किमु रोदिषि मानस सर्वसमम् ॥ १६ ॥

विकाररहित और विकारवान् दोनों ही असत्य हैं, प्रत्यक्ष और