गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
४३३ उत्तरकाण्ड तब लक्ष्मणजीने सीताजीको लाकर मुनिवर वाल्मीकिको सौंप दिया और सिर नवा उनका आशीर्वाद पा करकमल जोड़े हुए खड़े रहे ॥ १ ॥ लक्ष्मणजीको व्याकुल और ग्लानिसे गलते देख सर्वज्ञ वाल्मीकिजीने विधाताको वाम जानकर उनसे कुछ भी नहीं पूछा ॥ २ ॥ उन्होंने अपने मन-ही-मन अनुमानसे सारी बातें जानकर सीताजी का सहस्रों प्रकार सम्मान किया; किंतु [ यह विचारकर कि ] राम तो सम्पूर्ण सद्गुणोंके धाम और सीमा हैं [ उन्होंने यह क्या किया ? ] उन्हें कुछ खेद भी हुआ ॥ ३ ॥ तुलसीदासजी कहते हैं, त्रिलोकीकी रानी सीताजी अपने दीनबन्धु और दयामय देवरको देखकर बड़ी व्याकुल हो गयीं और उदास होकर ये वचन कहने लगीं ॥ ४ ॥ [ २९ ] तौलौं बलि, आपुही कीबी बिनव समुझि सुधारि । जौलों हौं सिखि लेउँ बन रिषि-रीति बसि दिन चारि ॥ १ ॥ तापसी कहि कहा पठवति नृपतिको मनुहारि । बहुरि तिहि बिधि आइ कहिहै साधु कोउ हितकारि ॥ २ ॥ लखनलाल कृपाल ! निपटहि डारिबी न बिसारि । पालबी सब तापसनि ज्यौं राजधरम बिचारि ॥ ३ ॥ सुनत सीता-बचन मोचत सकल लोचन-बारि । बालमीकि न सके तुलसी सो सनेह सँभारि ॥ ४ ॥ [ सीताजी बोलीं— ] ‘जबतक मैं चार दिन वनमें रहकर तपस्वियोंकी रीति न सीख लूं तबतक तुम्हीं भलीभाँति समझ-बूझकर भगवान्को विनय करते रहना ॥ १ ॥ मैं तपस्विनी होकर भला गी० २८
गीतावली ४३४ राजाओंके अनुकूल वचन क्या कहला भेजूं । मुझे विश्वास है कि [जिस प्रकार मेरे विरुद्ध बातें अयोध्यामें कही गयी हैं] उसी प्रकार इस बार कोई सज्जन पुरुष आकर मेरे अनुकूल बातें भी कहेगा ॥२॥ कृपामय लषणलाल ! तुम मुझे एकाएकी भूल मत जाना और राजधर्म ही समझकर सब तपस्विनियोंके समान मेरा भी पालन करते रहना' ॥ ३ ॥ तुलसीदास कहते हैं, सीताजीके ये वचन सुनकर सब लोग नेत्रोंसे जल बरसाने लगे । [औरोंकी तो बात हो क्या,] वाल्मीकिजी भी उस स्नेहके कारण अपनेको न सँभाल सके ॥ ४ ॥
[ ३० ] सुनि ब्याकुल भए, उतरु कछु कह्यो न जाइ । जानि जिय बिधि बाम दीन्हों मोहि सरुष सजाइ ॥ १ ॥ कहत हित मेरी कठिनई लखि गई प्रीति लजाइ । आजु अवसर ऐसेहू जौं न चले प्रान बजाइ ॥ २ ॥ इतहि सीय-सनेह-संकट उतहि राम रजाइ । मौनही गहि चरन, गौने सिख-सुआसिष पाइ ॥ ३ ॥ प्रेम-निधि पितु को कहे मैं परुष बचन अघाइ । पाप तेहि परिताप तुलसी उचित सहे सिराइ ॥ ४ ॥
ये सब बातें सुनकर लक्ष्मणजी व्याकुल हो गये, उनसे कुछ भी उत्तर नहीं दिया गया; मनमें समझ लिया कि वाम विधाताने कुपित होकर मुझे सजा दी है ॥ १ ॥ वे मन-ही-मन कहने लगे—'अहो मेरी कठोरता देखकर प्रीति भी लज्जित हो गयी जो आज ऐसे अवसरपर भी मेरे प्राणोंने कूच नहीं किया' ॥ २ ॥
४३५ उत्तरकाण्ड इधर तो उन्हें सीताजीके प्रेमका आकर्षण था और उधर भगवान् रामकी आज्ञाका विचार था। अन्तमें वे चुपचाप ही सीताजीके चरण छू उनसे आशीर्वाद और शिक्षा ग्रहणकर वहांसे चल दिये ॥ ३ ॥ [ वे सोचने लगे— ] 'मैंने अपने प्रेमनिधि पिताजीको भरपेट कठोर बचन कहे थे*। उस पापके कारण ही आज यह उचित दुःख सहन करना पड़ा जो संहकर ही चुकेगा' ॥ ४ ॥ [ ३१ ] गौने मौनहो बारहि बार परि परि पाय। जात जनु रथ चीर कर लछिमन मगन पछिताय ॥ १ ॥ असन बिनु बन, बरन बिनु रन, बच्यो कठिन कुघाय। दुवह साँसति सहनको हनुमान ज्यायो जाय ॥ २ ॥ हेतु हौ सियहरनको तब, अबहु भयो सहाय। होत हठि मोहि दाहिनो दिन दैव दारुन दाय ॥ ३ ॥ तज्यो तनु संग्राम जेहि लगि गीध जसो जटाय। ताहि हौं पहुँचाइ कानन चल्यों अवध सुझाय ॥ ४ ॥ घोरहृदय कठोर करतव सृज्यो हौं बिधि बायें। दास तुलसी जानि राख्यो कृपानिधि रघुराय ॥ ५ ॥ फिर बारंबार चरणोंमें गिर लक्ष्मणजी चुपचाप ही चल दिये। वे पश्चात्तापमें ऐसे डूबे हुए थे मानो रथमें वस्त्रके पुतले ही हैं ॥ १ ॥ [ वे मन-ही-मन सोचते थे-- ] 'हाय ! मैं वनमें बिना भोजनके ही जीवित रहा, युद्धक्षेत्रमें कवच न रहनेपर भी कुछ न बिगड़ा; शक्ति लगते समय भी बच गया, उस समय इस दुःसह *लखन कहे कछु बचन कठोरा। बरजि राम पुनि मोहि निहोरा ॥ —रामचरितमानस
गीतावली ४३६ दुःखको सहन करनेके लिये मुझे हनूमान्जीने ओषधि लाकर व्यर्थ ही जीवित कर दिया ॥ २ ॥ मैं ही सीताहरणका कारण था और अब मैं ही उनके वनवासका हेतु हुआ । हे विधाता ! मेरा दाहिना दिन ( अनुकूल समय ) भी हट करके तेरा कठोर दाँव ही हो जाता है ! [ इसीसे भगवदाज्ञापालनरूप अनुकूल कर्म करते हुए भी मुझसे सीतावनवास-जैसा कठोर कर्म बन गया ] ॥ ३ ॥ अहो ! जिनके लिये यशस्वी जटायुने संग्रामभूमिमें अपना शरीर त्याग दिया उन्हीं सीताजीको मैं वनमें पहुँचाकर स्वभावतः अयोध्यापुरीको जा रहा हूँ ॥ ४ ॥ मालूम होता है, वाम विधाताने मुझे कठोर कर्तव्य करनेके लिये कुटिलहृदय ही रचा है और इस बातको कृपानिधि श्रीरामचन्द्रजी जानते हैं [ इसीलिये ऐसे कठोर कार्योंके लिये वे मुझे ही आज्ञा दिया करते हैं ]' ॥ ५ ॥ [ ३२ ] पुत्रि ! न सोचिये आई हौ जनक-गृह जिय जानि । काल्हिको कल्यान-कौतुक, कु
४३७ उत्तरकाण्ड
[ बाल्मीकिजी कहते हैं—] 'पुत्रि ! तू मनमें यह समझकर कि मैं अपने पिताके घर आयी हुई हूँ, किसी प्रकारका शोक न कर । कल्याणि ! तुझे कल ( शीघ्र ) ही आनन्द-मङ्गल प्राप्त होने- वाला है ॥ १ ॥ तेरे पिता और ससुर—दोनों ही राजर्षि हैं, साक्षात् भगवान् पति हैं और तू भी सम्पूर्ण मङ्गलोंकी खानि है—ऐसे स्थलमें भी विपरीत गति देखी जाती है, इससे मालूम होता है विधाताका स्वभाव बड़ा ही टेढ़ा है, ॥ २ ॥ फिर वाल्मीकिजीने प्रीतिकी गति जानकर सीताजीको बुलाया और उन्हें अपनी कन्या मानकर यह शिक्षा दी—'हे सीते ! तुम आलसियोंको शुभ गति देनेवाली गङ्गाजीकी मन लगाकर सेवा करना ॥ ३ ॥ प्रातःकाल ही स्नान करके इच्छित फल देनेवाले वटवृक्षका पूजन करना । हे देवि ! इससे तुम्हें पुत्रोंकी प्राप्ति होगी; दिन-दिन चित्तमें उत्साह- बढ़ेगा और अहितकी हानि होगी' ॥ ४ ॥ तुलसीदासजी कहते हैं, फिर वाल्मीकिजीने पाप और तापको दूर करनेवाली बहुत-सी सरस और पुरानी कथाएँ कहकर सीताजीको सान्त्वना दी । इससे उनकी भारी ग्लानि दूर हो गयी ॥ ५ ॥
[ ३३ ] जबतें जानकी रही रुचिर आश्रम आइ । गगन, जल, थल बिमल तबतें, मंगलदाइ ॥ १ ॥ निरस भूरुह सरस फूलत, फलत अति अधिकाइ । कंद-मूल अनेक अंकुर स्वाद सुधा लजाइ ॥ २ ॥ मलय मरुत, मराल-मधुकर-मोर-पिक-समुदाइ । मुदित-मन मृग-बिहग बिहरत बिषम बैर बिहाइ ॥ ३ ॥
गीतावली ४३८ रहत रबि अनुकूल दिन, ससि रजनि सजनि सुहाइ । सीय सुनि सादर सराहति सखिन्ह भलो मनाइ ॥ ४ ॥ मोद बिपिन बिनोद चितवत लेत चितहि चोराइ । राम बिनु सिय सुखद बन, तुलसी कहै किमि गाइ ॥ ५ ॥ जबसे जानकीजीने उस सुन्दर आश्रममें आकर निवास किया है तबसे आकाश, जल और पृथ्वी—सभी निर्मल और सब प्रकारके मङ्गल देनेवाले हो गये हैं ॥ १ ॥ नीरस वृक्षोंमें भी बहुत अधिकता- से सरस फूल-फल लगने लगे हैं तथा अनेकों प्रकारके कन्द, मूल और अंकुर अपने स्वादसे अमृतको लज्जित करते हैं ॥ २ ॥ मलयवायु, हंस, भ्रमर, मयूर और कोकिलोंके समूह तथा प्रसन्नचित्त मृग और पक्षी आपसका विषम वैर त्यागकर बिहार करते रहते हैं ॥ ३ ॥ दिनमें सूर्य अनुकूल रहता है और रात्रिमें चन्द्रमा स्त्रियोंको प्रिय जान पड़ता है, सखियोंसे ऐसी बातें सुनकर सीताजी प्रसन्न होकर आदरपूर्वक उनकी सराहना करती हैं ॥ ४ ॥ वनमें ऐसा आनन्द- मङ्गल है कि देखते ही चित्तको चुरा लेता है; परंतु रामचन्द्रजीके बिना सीताजीको वन सुखदायक है—इसे तुलसीदास किस प्रकार गाकर कह सकता है ? ॥ ५ ॥ लव-कुश-जन्म [ ३४ ] सुभ दिन, सुभ घरी, नीको नखत, लगन सुहाइ । पूत जाये जानकी द्वै, मुनिबधू उठीं गाइ ॥ १ ॥ हरषि बरषत सुमन सुर गहगहे बधाए बजाइ । भुवन, कानन, आश्रमनि रहे मोद-मंगल छाइ ॥ २ ॥
४३६ उत्तरकाण्ड तेहि निसा तहँ सत्रुसूदन रहे बिधिबस आइ। माँगि मुनिसों बिदा गवने भोर सो सुख पाइ ॥ ३ ॥ मातु मौसी-बहिनिहूतें सासुतें अधिकाइ। करहिं तापस-तीय-तनया सीय-हित चित लाइ ॥ ४ ॥ किए बिधि-व्यवहार मुनिबर बिप्रवृन्द बोलाइ। कहत सब रिषिकृपाको फल भयो आजु अघाइ ॥ ५ ॥ सुरुष ऋषि, सुख सुतनिको, सिय-सुखद सकल सहाइ। सूल राम-सनेहको तुलसी न जियतें जाइ ॥ ६ ॥ जानकीजीने शुभ दिन, शुभ घड़ी, शुभ नक्षत्र और शुभ लग्नमें दो बालकोंको जन्म दिया। उस समय मुनि-पत्नियां गान करने लगीं ॥ १ ॥ देवतालोग प्रसन्न होकर गहगहे बाजे बजाते हुए फूलोंकी वर्षा करने लगे तथा सम्पूर्ण लोक, वन और आश्रमोंमें आनन्दमंगल छा गये ॥ २ ॥ उस रात्रिको दैवयोगसे वहाँ शत्रुघ्न- जी आकर टिक गये। यह सुख पाकर वे प्रातःकाल ही मुनिसे बिदा मांगकर चले गये ॥ ३ ॥ मुनियोंकी स्त्रियाँ और कन्याएँ सीताजीकी माता, मौसी, सासु और बहिनोंसे भी बढ़कर बहुत मन लगाकर सेवा करती थीं ॥ ४ ॥ मुनिवर वाल्मीकिजीने ब्राह्मणोंको बुलाकर सब प्रकारके विधि और व्यवहार किये। सब लोग यही कहते हैं कि आज ऋषिकृपाका पूरा-पूरा फल हुआ है ॥ ५ ॥ तुलसीदासजी कहते हैं, सीताजीको ऋषिकी अनुकूलता और पुत्र-सुख आदि तो सभी सुखदायक और सहायक हो रहे हैं, किंतु उनके हृदयसे भगवान् रामके स्नेहका शूल नहीं निकलता ॥ ६ ॥
गीतावली ४४० [ ३५ ] मुनिबर करि छठी कीन्ही बारहेंकी रीति । बन-बसन पहिराइ तापस, तोषि पोषे प्रीति ॥ १ ॥ नामकरन सुअन्नप्रासन बेद बांधी नीति । समय सब रिषिराज करत समाज साज समीति ॥ २ ॥ बाल लालहि, कहहिं 'करिहैं राज सब जग जीति ।' राम-सिय-सुत, गुर-अनुग्रह, उचित, अचल प्रतीति ॥ ३ ॥ निरखि बाल-विनोद तुलसी जात बासर बीति । पिय-चरित सिय-चित-चितेरो लिखत नित हित भीति ॥ ४ ॥ मुनिवर वाल्मीकिने बालकोंकी छठी करके बारहवें दिनकी रीति की। उस दिन उन्होंने तपस्वियोंको वनके वस्त्र पहनाकर प्रीतिपूर्वक सन्तुष्ट किया ॥ १ ॥ वेदने जो नामकरण और अन्न- प्राशन आदिका नियम बांधा है, ऋषिराज वाल्मीकिजीने समाज और साजको जोड़कर समय-समयपर वे सभी कृत्य किये ॥ २ ॥ बालकोंको खेलाते समय वे कहते थे, 'ये तो सारे जगत्को जीतकर राज्य करेंगे।' वे बालक प्रथम तो श्रीराम और सीताके पुत्र हैं, दूसरे उनपर गुरुजीकी भी खूब कृपा है; इसलिये उनके लिये यह उचित ही है और सब लोगोंको भी यही विश्वास होता था ॥ ३ ॥ तुलसीदासजी कहते हैं, सीताजीके दिन तो बालकोंके चरित्र देखनेमें निकल जाया करते थे तथापि उनका चित्तरूप चित्रकार प्रेमरूप भित्तिपर प्रियतमके चरित्र बराबर चित्रित करता रहता था ॥ ४ ॥
४४१ उत्तरकाण्ड [३६] बालक सीयके बिहरत मुदित-मत दो भाइ। नाम लव-कुस राम-सिय अनुहरति सुंदरताइ ॥ १ ॥ देत मुनि मुनि-सिसु खिलौना, ते ले धरत दुराइ । खेल खेलत नृप-सिसुन्हके बालबृन्द बोलाइ ॥ २ ॥ भूप-भूषन-बसन-बाहन राज-साज सजाइ । बरम-चरम, कृपान-सर धनु-तून लेत बनाइ ॥ ३ ॥ दुखी सिय पिय-बिरह तुलसी, सुखी, सुत-सुख पाइ । आंच पय उफनात सींचत सलिल ज्यों सकुचाइ ॥ ४ ॥ सीताजीके बालक दोनों भाई प्रसन्नचित्तसे वनमें खेलते फिरते हैं। उनके नाम लव और कुश हैं; वे सुन्दरतामें भगवान् राम और सीताजीके ही समान हैं ॥ १ ॥ वाल्मीकि मुनि जब उन्हें मुनिबालकोंवाले खिलौने देते हैं तो वे उन्हें लेकर छिपाकर रख देते हैं। वे बहुत-से बालकोंको बुलाकर राजकुमारोंके-से खेल खेलते हैं ॥ २ ॥ वे राजाओंके-से आभूषण, वस्त्र, वाहन और राजसामग्री सजाते हैं तथा कवच, ढाल, तलवार, बाण, धनुष और तरकस भी बना लेते हैं ॥ ३ ॥ तुलसीदासजी कहते हैं, सीताजी पतिके वियोग- में तो दुखी हैं, किंतु पुत्रसुख पाकर प्रसन्न भी हैं, जिस प्रकार अग्नि- पर रखा हुआ दूध.उफनने लगता है, परंतु जलके छींटे लगते ही फिर बैठ जाता है ॥ ४ ॥ [३७] कंकेयी जौलौं जियति रही । तौलौं बात मातुसों मुंह भरि भरत न भूलि कही ॥ १ ॥ गी० २९—*
गीतावली ४४२ मानी राम अधिक जननीतें, जननिहु गँस न गही। सीय-लषन रिपुदवन राम-रुख लखि सबकी निबही ॥ २ ॥ लोक-बेद-मरजाद दोष-गुन-गति चित चख न चढ़ी। तुलसी भरत समुझि सुनि राखी राम-सनेह सही ॥ ३ ॥ कैकेयी जबतक जीवित रही, तबतक सीताजीने भूलकर भी अपनी मातासे मुंह खोलकर बात नहीं की ॥ १ ॥ किंतु रामचन्द्रजीने उसे अपनी मातासे बढ़कर माना और माता कौसल्याने भी उससे किसी प्रकारका मनमुटाव नहीं रखा। रामचन्द्रजीका रुख देखकर सीता, लक्ष्मण तथा शत्रुघ्न—इन सबने भी उसका निर्वाह किया ॥ २ ॥ तुलसीदासजी कहते हैं, भरतजीने तो रामप्रेमको ही सुन और समझकर उसीकी रक्षा की। उन्होंने लोक या वेदकी मर्यादा अथवा गुण-दोषकी गतिकी ओर न तो कभी चित्त ही लगाया और न दृष्टिपात ही किया ॥ ३ ॥ रामचरितका उल्लेख राग रामकली [३८] रघुनाथ तुम्हारे चरित मनोहर गावहिं सकल अवधबासी। अति उदार अवतार मनुज-वपु धरे ब्रह्म अज अबिनासी ॥ १ ॥ प्रथम ताड़का पति, सुबाहु-बधि मख राख्यो, द्विज-हितकारी। देखि दुखी अति सिला सापबस रघुपति बिप्रनारि तारी ॥ २ ॥ सब भूपनको गरब हरयो, भंज्यो संभु-चाप भारी। जनकसुता समेत आवत गृह परसुराम अति मदहारी ॥ ३ ॥ तात-बचन तजि राज-काज सुर चित्रकूट मुनिबेष धरयो। एक नयन कीन्हों सुरपति-सुत, बधि बिराधरिषि-सोक हरयो ॥ ४॥
४४३ | उत्तरकाण्ड
पंचबटी पावन राघव करि सूपनखा कुरुप कीन्ही । खर-दूषन संहारे कपटमृग-गीधराज कहँ गति दीन्ही ॥ ५ ॥ हति कबंध, सुग्रीव सखा करि, बेधे ताल, बालि मारचो । बानर रीछ सहाय, अनुज सँग सिंधु बाँधि जस बिस्तारयो ॥ ६ ॥ सकुल पुत्र बल सहित दसानन मारि अखिल सुर-दुख टारयो । परमसाधु जिय जानि बिभीषन लंकापुरी तिलक सारयो ॥ ७ ॥ सीता अरु लछिमन सँग लीन्हे औरहु जिते दास आए । नगर निकट बिमान आए, सब नर-नारी देखत धाए ॥ ८ ॥ सिद्ध-बिरंचि, सुक-नारदादि मुनि अस्तुति करत बिमल बानी । चौदह भुवन चराचर हरषित, आए राम राजधानी ॥ ९ ॥ मिले भरत, जननी, गुरु, परिजन, चाहत परम अनंद भरे । दुसह-बियोग-जनित, दारुन दुख रामचरन देखत बिसरे ॥ १० ॥ बेद-पुरान बिचारि लगन सुभ महाराज अभिषेक कियो । तुलसिदास जिय जानि सुअवसर भगति-दान तब माँगि लियो ॥११॥ हे रघुनाथजी ! आप परम उदार और अवताररूपसे मनुष्यदेह धारण किये अजन्मा और अविनाशी परब्रह्म ही हैं। आपके पवित्र चरित्रोंको समस्त अयोध्यावासी इस प्रकार गाते हैं—॥ १ ॥ विप्रहितकारी भगवान् रामने पहले ताड़काको मार और सुबाहुका वध करके विश्वामित्रजीके यज्ञकी रक्षा की, फिर शापके कारण शिलारूप अहल्याको बहुत दुखी देखकर उसका उद्धार किया ॥ २ ॥ जनकपुरमें शिवजीका भारी धनुष तोड़कर सब राजाओंका गर्व दूर किया, फिर सीताजीके सहित घरको लौटते समय परशुरामजी- का मान मर्दन किया ॥ ३ ॥ तदनन्तर पिताजीके वचनसे राज्य त्याग कर देवताओंका कार्य करनेके लिये मुनिवेष धारणकर चित्रकूट पर्वतपर रहे । वहाँ इन्द्रके पुत्र जयन्तको एक नेत्रवाला बनाया तथा विराधका वध करके ऋषियोंका शोक दूर किया ॥ ४ ॥ फिर
गीतावली ४१४ रामचन्द्रजीने पंचवटीको पवित्र कर शूर्पणखाको कुरूप किया तथा खर, दूषणको मारकर मारीच तथा जटायुको शुभ गति दी ॥ ५ ॥ वहाँसे चलकर कबन्धका वधकिया तथा सुग्रीवसे मित्रता कर तालवृक्षोंको बेधकर बालिका वध किया । फिर रीछ और वानरोंकी सहायतासे भाई लक्ष्मणके सहित समुद्रपर पुल बाँधकर अपना सुयश फैलाया ॥ ६ ॥ तत्पश्चात् रावणको उसके कुटुम्ब और पुत्रोंके सहित मारकर देवताओंका सारा दुःख दूर किया और अपने हृदयमें विभीषणको अत्यन्त साधु जान लंकापुरीमें उसका राज्याभिषेक किया ॥ ७ ॥ फिर सीता, लक्ष्मण---और जितने सेवक साथमें आये थे, उन सबको संग लेकर विमानपर अयोध्यापुरीके निकट आये । उस समय सब स्त्री-पुरुष भगवान्का दर्शन करनेके लिये दौड़े गये ॥ ८ ॥ तब चौदहों लोकोंके सम्पूर्ण चराचर प्राणी आनन्दित हो गये तथा शिव, ब्रह्मा, शुकदेव और नारदादि मुनिगण विमल वाक्योंसे स्तुति करते हुए भगवान् रामकी राजधानी अयोध्यापुरीमें आये ॥ ९ ॥ उस समय रामदर्शनके लिये लालायित भरतजी, सब माताएँ, गुरुजी और परिवारके लोग अति आनन्दमें भरकर मिले । उनके दुःसह वियोग-जनित दारुण दुःख भगवान् रामके चरण देखते ही विस्मृत हो गये ॥ १० ॥ तब वसिष्ठजीने वेद और पुराणसे विचारकर शुभलग्नमें भगवान्का राज्याभिषेककिया । उसी समय तुलसीदासने अपने हृदयमें सुअवसर जानकर प्रभुसे भक्ति- का दान माँग लिया ॥ ११ ॥ श्रीसीतारामचन्द्रार्पणमस्तु
(मुहर) तुलसी दास बरसिहपुर-गोरखपुर
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Sri Ramakrishna Ashram L I B R A R Y SRINAGAR ⎯⎯ Extract from the Rules :-
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नाहिन भजिबे जोग बियो । श्रीरघुवीर समान आन को पूरन कृपा हियो ॥ १ ॥ कहहु कौन सुर सिला तारि पुनि केवट मीत कियो ? कौने गीध अधमको पितु-ज्यों निजकर पिंड दियो ? ॥ २ ॥ कौन देव सबरीके फल करि भोजन सलिल पियो ? बालित्रास-वारिधि बूड़त कपि केहि गहि बाँह लियो ? ३ ॥ भजन प्रभाउ बिभीषन भाष्यौ, सुनि कपि-कटक जियो। तुलसिदासको प्रभु कोसलपति सब प्रकार वरियो ॥ ४ ॥ ( गीतावली )