गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
४१३ उत्तरकाण्ड राम-हिडोला राग मलार [ १८ ] आली री ! राधोके रुचिर हिंडोलना झूलन जैए ॥ फटिक-भीति सुधारु चहुँ दिसि, मंजु मनिमय पौरि । गच काँच लखि मन नाच सिखिनु, पाँचसर-सुफँसौरि ॥ तोरन-बितान-पताक-चामर-धुज-सुमन-फल-थोरि । प्रतिछांह-छबि कहि-साखिदै प्रति सों कहै गुरु हौं रि ॥ १ ॥ मदन-झयके खंभ-से रचे खंभ सरल बिसाल । पाटीर-पाटि विचित्र भँवरा बलित, बेलत लाल ॥ डांड़ो कनक कुंकुम-तिलक-रेख-सी मनसिज-माल । पटली पदिक रति-हृदय जनु कलधौत कोमल माल ॥ २ ॥ उनये सघन घनघोर, मृदु झरि सुखद सावन लाग । बगपांति, सुरधनु, दमक दामिनि हरित भूमि-बिभाग ॥ दांदुर मुदित, भरे, सरित-सर, महि उमग जनु अनुराग । पिक-मोर-मधुप-चकोर-चातक-सोर उपबन बाग ॥ ३ ॥ सो समौ देखि सुहावनो नवसत सँवारि सँवारि । गुन-रूप-जोबन-सींव सुंदरि चली झुंडनि भारि ॥ हिंडोल-साल बिलोकि सब अंचल पसारि पसारि । लागीं असीसन राम-सीतहि सुख-समाजु निहारि ॥ ४ ॥ झूलहिं, झुलावहिं, ओसरिन्ह गावैं सुहो, गौडमल्लार । मंजीर-नूपुर-बलय-धुनि जनु काम-करतल-तार ॥ अति मुचत स्रमकन मुखनि, बिथुरे चिकुर, बिलुलित हार । तम तड़ित उड़ुगन अरुन बिधु जनु करत ब्योम-बिहार ॥ ५ ॥
गीतावली ४१४ हिय हरषि, वरषि प्रसून निरखति बिबुध-तिय तृन तूरि । आनंद-जल लोचन, मुदित मन, पुलक तनु भरि पूरि ॥ सब कहहिं, अबिचल राज नित, कल्यान-मंगल मूरि । चिर जिया जानकिनाथ जग तुलसी-सजीवनिमूरि ॥ ६ ॥ अरी आली ! रघुनाथजीके मनोहर हिंडोलेमें झूलनेके लिये चलो । उसके चारों ओर स्फटिकमणिकी मनोहर भीतें हैं तथा मणियोंके सुन्दर दरवाजे हैं । उसकी काँचकी गचें देखकर मन मयूर- के समान नाचने लगता है, मानो वह कामदेवका फंदा ही हो । उस हिंडोलेमें जो बंदनवार, वितान, पताका, चमर, ध्वजा तथा पुष्प और फलोंकी आकृतियाँ बनायी गयी हैं, उनकी परछाँहीं मानो कवि- की साक्षी देकर अपने बिम्बोंसे [ जिसके अनुरूप उनकी प्रतिछाया मणि और काँचकी गचमें प्रतिबिम्बित है ] कहती हैं कि हम तुमसे बड़ी हैं ॥ १ ॥ उस हिंडोलेमें कामदेवके विजयस्तम्भके समान सीधे और बड़े-बड़े खम्भे बनाये गये हैं । उसमें विचित्र भौरों (आंकड़ों) में लटकी हुई चन्दनकी पाटी तथा लाल रंगका बेलन है । बेलनमें जो सोनेकी डंडी लगी हुई है वह ऐसी जान पड़ती है, मानो काम- देवके माथेपर कुंकुमके तिलककी रेखा हो तथा पटुली, मानो रतिके वक्षःस्थलपर पदिक तथा सोनेकी कोमल माला हो ॥ २ ॥ सुखदायक श्रावण मास आरम्भ हो गया है, घनघोर घटाएँ उमड़ी हुई हैं, जलकी मन्द-मन्द फुहारें पड़ रही हैं, बगुलोंकी पंक्ति और इन्द्रधनुष शोभायमान है, बिजली चमक रही है, सम्पूर्ण भू-भाग हरे-भरे होरहे हैं, मेढक बड़े प्रसन्न हैं तथा नदी और तालाबोंमें जल भरा हुआ है, मानो सम्पूर्ण पृथ्वीमें प्रेमकी बाढ़ आरही है । बाग-बगीचोंमें सब ओर कोयल
४१५ उत्तरकाण्ड मोर, भौंरे, चकोर और चातकोंका शोर होरहा है ॥ ३ ॥ वह सुहावना समय देखकर रूप, गुण और यौवनकी सीमारूप बहुत-सी सुन्दरी स्त्रियाँ सोलहों शृंगार करके दल बाँधकर चलीं और उस हिंडोलेकी शोभा देख अपने आँचल फैला-फैलाकर राम और सीताको— उनका सुख-समाज देखकर—आशीर्वाद देने लगीं ॥ ४ ॥ फिर वे सूहो, गौंडमलार आदि राग गाती हुई बारी-बारीसे झूलने और झुलाने लगीं उस समय जो मंजीर, नूपुर और कंकणोंकी ध्वनि होती थी, वह कामदेवके हाथोंकी ताल-सी जान पड़ती थी [झूलते समय श्रमकी अधिकताके कारण] उनके मुखपर छायी हुई पसीनेकी बूंदें, बिखरे हुए बाल और उलझे हुए हार ऐसे जान पड़ते थे, मानो अन्धकार, बिजली, नक्षत्रगण, बालसूर्य और चन्द्रमा आकाशमें विहार कर रहे हों [यहाँ बिखरे हुए बाल अन्धकार हैं, अङ्गकी कान्ति बिजली है, पसीनेकी बूंदें नक्षत्रगण हैं, हार बालसूर्य हैं तथा मुख चन्द्रमा है] ॥ ५ ॥ इस तरह देवाङ्गनाएँ हृदयमें हर्षित हो फूलोंकी वर्षा कर [नजर न लग जाय, इसलिये] तिनका तोड़ती हुई यह सब लीला देख रही हैं। उनके नेत्रोंमें आनन्दाश्रु छाये हुए हैं, मन प्रसन्न है तथा सम्पूर्ण शरीर अत्यन्त पुलकित हो रहा है। वे सब यही कह रही हैं कि यह अत्यन्त कल्याण और मंगलमय राज्य सर्वदा अविचल रहे तथा तुलसीदासजीके जीवनमूल जानकीनाथ भगवान् राम संसारमें दीर्घजीवी हों ॥ ६ ॥ अयोध्याकी रमणीयता वर्षा-वर्णन राग सूहो [ १९ ] कोसलपुरी सुहावनी सरि सरजूके तीर । भूपावली-मुकुटमनि नृपति जहाँ रघुबीर ॥
गीतावली ४१६ पुर-नर-नारि चतुर अति, धरमनिपुन, रत नीति। सहज सुभाय सकल उर श्रीरघुबर-पद-प्रीति॥ श्रीरामपद-जलजात सबके प्रीति अबिरल पावनी। जो चहत सुक-सनकादि, संभु-बिरंचि, मुनि-मन-भावनी॥ सबहीके सुंदर मंदिरांजिर,राउ-रंक न लखि परै। नाकेस-दुरलभ भोग लोग करहिं, न मन बिषयनि हरै ॥ १ ॥ सरयूनदीके तटपर अति सुहावनी अयोध्यापुरी है, जहाँके राजा महिपालमण्डली-मुकुटमणि महाराज राम हैं। नगरके सभी स्त्री-पुरुष बड़े चतुर, धर्मकुशल और नीतिपरायण हैं। उन सबके हृदयमें स्वभावसेही श्रीरघुनाथजीके चरणकमलोंमेंप्रीति है। श्रीरामचन्द्रजीके चरणसरोरुहमें उन सभीका अविच्छिन्न और पवित्र प्रेम है, जिसकी कि शुक, सनकादि, महादेव और ब्रह्मा आदि भी इच्छा करते हैं और जो मुनियोंके मनको भी प्रिय है। सभीके घर और आँगन बड़े सुन्दर हैं। उनमें राजा-रंककी कोई पहचान ही नहीं होती। जो भोग देवराजको भी दुर्लभ हैं, उन्हें वहाँके लोग भोगते हैं, तो भी उनका मन विषयोंके वशीभूत नहीं होता ॥ १ ॥ सब रितु सुखप्रद सो पुरी, पावस अति कमनीय। निरखत मनहि हरत हठि हरित अवनि रमनीय॥ बीरबहूटि बिराजही, दादुर-धुनि चहुँ ओर। मधुर गरजि घन बरषहिं, सुनि सुनि बोलत मोर॥ बोलत जो चातक-मोर, कोकिल-कीर पारावत घने। खग बिपुल पाले बालकनि कूजत, उड़ात सुहावने॥ बकराजि राजति गगन, हरिधनु, तड़ित दसदिसि सोहहीं। नभ-नगरको सोभा अतुल अवलोकि मुनि-मन मोहहीं॥ २ ॥
४१७ उत्तरकाण्ड वह पुरी यों तो सभी ऋतुओंमें सुखदायिनी है, परन्तु वर्षा ऋतुमें तो वह बड़ी ही सुहावनी जान पड़ती है। उस समय वहाँकी हरो-भरी रमणीय भूमि देखते ही बलपूर्वक चित्तको हर लेती है। चारों ओर बीरबहूटियाँ सुशोभित होती हैं, मेढकोंकी ध्वनि सुनायी देती है तथा मेघ मन्द-मन्द गरजकर वर्षा करते हैं और उनका शब्द सुन-सुनकर मयूर बोलने लगते हैं। उस समय चातक, मोर, कोकिल शुक और कबूतर आदि बहुत-से पक्षी बोलते रहते हैं तथा बालकोंके पाले हुए अनेकों पक्षी कूजते और सुहावनी उड़ान भरते हैं। आकाशमें बगुलोंकी पंक्ति और इन्द्रधनुष तथा दशा दिशाओंमें बिजली शोभायमान होने लगती है। उस समय आकाश और नगरकी वह अतुलित शोभा देखकर मुनियोंके मन भी मोहित हो जाते हैं॥ २॥ गृह-गृह रचे हिडोलना, महि गच कांच सुढार। चित्र बिचित्र चहू दिसि परदा फटिक-पगार ॥ सरल बिसाल बिराजहीं बिद्रुम-खंभ सुजोर। चारु पाटि पटी पुरटकी झरकत मरकत भौर ॥ रकत भवँर डांडी कनक मनि-जटित दुति जगमगि रही। पटुली मनहु बिधि निपुनता निज प्रगट करि राखी सही ॥ बहुरंग लसत बितान मुकुतादाम-सहित मनोहरा। नव-सुमन-माल-सुगंध लोभे मंजु गुंजत मधुकरा ॥ ३ ॥ घर-घरमें हिंडोले, पृथ्वीपर कांचकी सुन्दर और सुढाल गच तथा चारों दिशाओंमें स्फटिककी भीतोंपर चित्र-विचित्र परदे लटक रहे हैं। मूंगेके सीधे, विशाल और सुदृढ़ खंभे सुशोभित हैं तथा सोनेसे मढ़ी हुई सुन्दर पटलियोंपर मरकतमणिके भौंरे (आंकड़े) झिलमिला गी० २६—
गीतावली ४१८ रहे हैं। इस प्रकार हिंडोलोंमें मरकतमणिके भौंरे और सोनेकी मणि- जटित डंडियोंकी कान्ति जगमगा रही है और पटली तो ऐसी सुशोभित होती है मानो विधाताने सचमुच ही अपनी रचनाचातुरीको प्रकट करके रक्खा हो। उन हिंडोलोंमें मोतियोंकी लड़ियोंके सहित अनेकों रंग-बिरंगे मनोहर चँदोवे शोभायमान हो रहे हैं तथा उनमें लटकी हुई नवीन पुष्पोंकी मालाओंकी सुगन्धपर लुब्ध होकर भ्रमरगण मनोहर गुंजार कर रहे हैं ॥ ३ ॥ झुंड झुंड झूलन चलीं गजगामिनि वर नारि । कुसुंभी चीर तनु सोहहीं, भूषन बिबिध सँवारि ॥ पिकबयनी मृगलोचनी, सारद ससि सम तुंड । रामसुजस सब गावहीं सुसुर सुसारँग गुंड ॥ सारंग, गुंड-मलार, सोरठ, सुहव सुघरनि बाजहीं । बहु भाँति तान-तरंग सुनि गंधरब किंनर लाजहीं ॥ अति मचत, छूटत कुटिल कच, छबि अधिक सुंदरि पावहीं । पट उड़त, भूषन खसत, हँसि हँसि अपर सखी झुलावहीं ॥ ४ ॥ [उन हिंडोलेमें] झुंड-की-झुंड गजगामिनी सुन्दर नारियाँ झूलनेके लिये जा रही हैं। उनके शरीरपर कुसुंभी साड़ी तथा तरह- तरहसे सजाये हुए आभूषण शोभायमान हैं। उनके मुख शरदचन्द्रके समान हैं, वे कोकिलके समान स्वरवाली, मृगनयनी बालाएँ सुन्दर स्वरसे सारंग और गौंड रागमें भगवान् रामका सुयश गान कर रही हैं। इस प्रकार अयोध्याके सुन्दर घरोंमें सारंग, गौंडमलार, सोरठ और सूहो रागोंमें मनोहर बाजे बज रहे हैं। उनकी अनेक प्रकारकी तान- तरंगावली सुनकर गन्धर्व और किन्नर भी लज्जित हो जाते हैं। इस
४१६ उत्तरकाण्ड प्रकार खूब झूला मचता है, झूलनेवाली नारियों की घुंघराली अलकें बिखर जाती हैं, जिससे उन रमणियों की सुन्दरता और भी बढ़ जाती है। हवा लगने से उनके वस्त्र उड़ने लगते हैं और आभूषण खिसक जाते हैं। इसपर अन्यान्य सखियाँ उन्हें हँस-हँसकर झुलाने लगती हैं ॥ ४ ॥
फिरि फिरि झूलहिं भामिनी अपनी अपनी बार। बिबुध-बिमान थकित भए देखत चरित अपार ॥ बरषि सुमन हरषहिं उर, बरनहिं हरिगुन-गाथ । पुनि पुनि प्रभुहि प्रसंसहीं 'जय जय जानकिनाथ' ॥ जय जानकीपति, बिसद कीरति सकल-लोक-मलापहा ॥ सुरबधू देंहि असीस, चिरजिव राम, सुख-संपत्ति महा ॥ पावस समय कछू अवध बन्नत सुनि अघौघ नसावहीं । रघुबीरके गुनगन नवल नित दास तुलसी गावहीं ॥ ५ ॥
सब सखियाँ अपनी-अपनी बारी से पुनः-पुनः झूलती हैं। इस अपार चरित को देवताओं के विमान थकित होकर देख रहे हैं। वे पुष्प बरसाकर हृदय में हर्षित हो श्रीहरि की गुणगाथा बखान करते हैं और 'जानकीनाथ की जय हो, जय हो' ऐसा कहते हुए बारंबार प्रभु की प्रशंसा करते हैं। जानकीनाथ की जय हो; उनकी विशद कीर्ति सम्पूर्ण कलि-कल्मषों को नष्ट करनेवाली है। इस प्रकार देवाङ्गनाएँ भी 'भगवान् राम चिरजीवी हों और उनका सुख और वैभव बढ़ता रहे' ऐसा कहती हुई उन्हें आशीर्वाद देती हैं। वर्षाकालीन अयोध्या- का वर्णन सुनने से सब पापसमूह नष्ट हो जाते हैं। तुलसीदास कहते हैं कि रघुनाथजी के नित्य-नूतन गुणगण को दास सदा ही गाते रहते हैं ॥ ५ ॥
गीतावली ४२० दीपमालिका राग आसावरी [ २० ] साँझ समय रघुबीर-पुरीकी सोभा आजु बनी। ललित दीपमालिका बिलोकहिं हित करि अवधधनी ॥ १ ॥ फटिक-भीत-सिखरन-पर राजति कंचन-दीप-अनी। जनु अहिनाथ मिलन आयो मनि-सोभित सहसफनी ॥ २ ॥ प्रति मंदिर कलसनिपर भ्राजहिं मनिगन दुति अपनी। मानहुँ प्रगटि बिपुल लोहितपुर पठइ दिये अवनी ॥ ३ ॥ घर घर मंगलचार एकरस हरषित रंक-गनी। तुलसिदास कल कीरति गावहिं, जो कलिमल-समनी ॥ ४ ॥ आज सायंकालमें रघुनाथजीकी राजधानीकी खूब शोभा हो रही है। आयोध्यानाथ रामचन्द्रजी प्रीतिपूर्वक मनोहर दीपामालिका देख रहे हैं॥ १॥ स्फटिकमणिकी भीतोंके ऊपर सुवर्णमय दीपकोंकी पंक्ति ऐशी शोभायमान है मानो [रघुनाथजीसे] मिलनेके लिये मणिविभूषित सहस्रफणधारी शेषजी आये हों॥ २॥ प्रत्येक महलके कलशोंके ऊपर मणिगण अपनी कान्तिसे इस प्रकार शोभा पा रहे हैं मानो बहुत से मङ्गललोक उत्पन्न करके पृथ्वीपर भेद दिये गये हों॥ ३॥ घर-घरमें मङ्गलाचार हो रहा है तथा निर्धन और धनी सभी एक समान आनन्दित हैं। तुलसीदास भगवान्की पवित्र कीर्ति गाता है, जो कलियुगके पापों का नाश करनेवाली है॥ ४॥
४२१ उत्तरकाण्ड बसन्त बिहार राग गौरी [ २२ ] अवध नगर अति सुंदर बर सरिताके तीर । नीति-निपुन नर-तिय सबहिँ, धरम-धुरंधर, बीर ॥ १ ॥ सकल रितुन्ह सुखदायक, तामहँ अधिक बसंत । भूप-मौलि मनि जहँ बस नृपति जानकीकंत ॥ २ ॥ बन उपवन नव किसलय, कुसुमित नाना रंग । बोलत मधुर मुखर खग पिकबर, गुंजत भृंग ॥ ३ ॥ समय बिचारि कृपानिधि, देखि द्वार अति भीर । खेलहुँ मुदित नारि-नर, बिहँसि कहेउ रघुबीर ॥ ४ ॥ नगर-नारि-नर हरषित सब चले खेलन फागु । देखि राम-छबि अतुलित उमगतउर अनुरागु ॥ ५ ॥ स्याम-तमाल-जलदतनु निरमल पीत दुकूल । अरुन-कंज-दल-लोचन सदा दास अनुकूल ॥ ६ ॥ सिर किरीट श्रुति कुंडल, तिलक मनोहर भाल । कुंचित केस, कुटिल भ्रू, चितवनि भवन-कृपाल ॥ ७ ॥ कल कपोल, सुक नासिक, ललित अधर द्विज जोति । अरुन कंज महँ जनु जुग पाँति रुचिर गज-मोति ॥ ८ ॥ बर दर-ग्रीव अमितबल बाहु सुपीन बिसाल । कंकन-हार मनोहर, उरसि लसति बनमाल ॥ ६ ॥ उर भृगु-चरन बिराजत, द्विज-प्रिय चरित पुनीत । भगत हेतु नर बिग्रह सुरबर गुन-गोतीत ॥ १० ॥ उदर त्रिरेख मनोहर, सुंदर नाभि गँभीर । हाटक-घटित, जटित मनि कटितट रट मंजीर ॥ ११ ॥
गीतावली ४२२ उरु अरु जानु पीन, मृदु, मरकत खंभ समान। नूपुर मुनि-मन मोहत, करत सुकोमल गान ॥१२॥ अरुनबरन पदपंकज, नखदुति इंदु-प्रकास। जनक-सुता-करपल्लव-लालित बिपुल बिलास ॥१३॥ कंजकुलिस-धुज-अंकुस-रेख चरन सुभ चारि। जन-मन-मीन हरन कहँ बंसी रची सँवारि ॥१४॥ अंग अंग प्रति अतुलित सुषमा बरनि न जाइ। एहि सुख मगन होइ मन फिरि नहि अनत लोभाइ ॥१५॥ खेलत फागु, अवधपति, अनुज-सखा सब संग। बरषि सुमन सुर निरखहिं सोभा अमित अनंग ॥१६॥ ताल, मृदंग झाँझ, डफ बाजहिं पनव-निसान। सुघर सरल सहनाइन्ह गावहिं समय समान ॥१७॥ बीना-बेनु-मधुर-धुनि सुनि किंनर-गन्धर्ब। निज-गुन गरुअ ह्रदय अति मानहिं मन तजि गर्ब ॥१८॥ निज निज अटनि मनोहर गान करहिं पिकबैनि। मनहुँ हिमालय-सिखरनि लसहिं अमर-मृगनैनि ॥१९॥ धवल धामतें निकसहिं जहँ तहँ नारि-बरूथ। मानहुँ मथत पयोनिधि बिपुल अपसरा-जूथ ॥२०॥ किसुकबरन सुअंगक सुषमा सुखनि समेत। जनु बिधु-निबह रहे करि दामिनि-निकर निकेत ॥२१॥ कुंकुम सुरस अबीरनि भरहिं चतुर बर नारि। रितु सुभाय सुठि सोभित देहिं बिबिध बिधि गारि ॥२२॥ जो सुख जोग, जाग, जप, अरु तीरथतें दूरि। राम-कृपाते सोइ सुख अवध गलिन्ह रह्यो पूरि ॥२३॥ खेलि बसंत कियो प्रभु मज्जन सरजूनीर। बिबिध भाँति जाचक जन पाए भूषन चीर ॥२४॥
४२३ उत्तरकाण्ड तुलसिदास तेहि अवसर मांगी भगति अनूप । मृदु मुसुकाइ दीन्हि तब कृपादृष्टि रघुभूप ॥ २५ ॥ श्रेष्ठ नदी सरयूके तटपर बसा हुआ अयोध्या नगर बड़ा ही सुन्दर है। वहाँके सभी स्त्री-पुरुष नीति-निपुण, धर्मधुरन्धर और धैर्यशाली हैं॥ १॥ यों तो वह नगर जहाँ नृपतिशिरोमणि जानकीनाथ भगवान् राम निवास करते हैं, सभी ऋतुओंमें सुखदायक है, किन्तु बसन्त ऋतुमें उसकी शोभा अधिक बढ़ जाती है ॥ २ ॥ वहाँके वन और उपवनोंमें नवीन पत्ते और कई रंगके पुष्प खिले हुए हैं, चहचहाते हुए पक्षी और सुन्दर कोकिल सुमधुर बोली बोल रहे हैं तथा भौंरे गूंज रहे हैं ॥३॥ कृपानिधान भगवान् रामने अनुकूल समय समझकर और द्वारपर बहुत भीड़ लगी देखकर हँसते हुए कहा, 'सब स्त्री-पुरुष प्रसन्नतापूर्वक होली खेलो' ॥ ४ ॥ यह सुनकर नगरके सब नर नारी प्रसन्न होकर फाग खेलने चले । उस समय महाराज रामकी अनुपम छबि देखकर उनके हृदयमें अपार प्रेम उमड़ने लगा ॥ ५ ॥ भगवान् रामका शरीर श्याम-तमाल अथवा श्माम मेघके समान शोभायमान है। उसपर अति निर्मल पीताम्बर है। उनके नेत्र अरुण कमलदलके समान हैं और वे सदा ही अपने सेवकोंपर कृपादृष्टि रखते हैं ॥ ६ ॥ प्रभुके सिरपर किरीट, कानोंमें कुण्डल और मनोहर मस्तकपर तिलक सुशोभित है । उनकी अलकावली कुञ्चित, भ्रुकुटि बाँकी और चितवन भक्तोंपर कृपाकरने- वाली है ॥ ७ ॥ उनके कपोल बड़े सुन्दर हैं, नासिका तोतेकी चोंचके समान है तथा मनोहर ओठोंके बीचमें दाँतोंकी ज्योति इस प्रकार जगमगा रही है, मानो अरुण-कमलके बीचमें गजमुक्ताओंकी दो
गीतावली ४२४ मनोहर पंक्तियाँ हो ॥ ८ ॥ भगवान्की शंखके समान सुन्दर ग्रीवा है तथा उनकी स्थूल और लंबी-लंबी भुजाओंमें अपार बल है। प्रभु मनोहर कंकण और हार धारण किये हुए हैं तथा उनके वक्षःस्थलमें वनमाला विराज रही है ॥९॥ भगवान् ब्राह्मणप्रिय और पवित्रचरित्र हैं। उनके वक्षःस्थलमें भृगुजीके चरणका चिह्न सुशोभित है, वे गुण और इन्द्रियोंसे अतीत देवश्रेष्ठ अपने भक्तोंके लिये ही मनुष्यशरीर धारण करते हैं ॥ १० ॥ प्रभुके उदरदेशमें मनोहर त्रिवली और अति सुन्दर गम्भीर नाभि है। उनके कटिप्रदेशमें सोनेकी बनी हुई मणिजटित करधनी मनोहर शब्द कर रही है ॥ ११ ॥ उनके जंघा और जानु मरकतमणि खंभोंके समान स्थूल और मृदुल (चिकने) हैं तथा सुमधुर ध्वनि करते हुए नूपुर मुनियोंके मन मोह लेते हैं ॥१२॥ प्रभुके चरण-कमल अरुणवर्ण हैं, उनके नखोंकी कान्ति चन्द्रमा- के प्रकाशके समान है तथा वे श्रीजनकनन्दनीके पाणिपल्लवोंद्वारा बड़ी बिलासितासे ललित हो रहे हैं ॥ १३ ॥ उन चरणोंमें जो कमल, वज्र, ध्वजा और अंकुशकी चार शुभ रेखाएँ हैं, वे मानो भक्तोंके मनरूप मत्स्योंको पकड़नेके लिये सँवाकर बनायी हुई बंसी (मछली पकड़नेका काँटा) ही हैं ॥ १४ ॥ इस प्रकार प्रभुके अङ्ग-अङ्गकी अतुलित शोभा है। उसका वर्णन नहीं किया जा सकता। मन इस सुखमें मग्न हो जानेपर फिर दूसरी जगह नहीं फँसता ॥ १५ ॥ जिस समय अयोध्यापति भगवान् राम अपने छोटे भाई और सखाओंके साथ फाग खेलते हैं, उस समय देवतालोग फूलों- की वर्षा करते हुए उनका अनन्त कामदेवोंके समान शोभा निहारते हैं ॥ १६ ॥ उस समय [नगरनिवासी] करताल, मृदंग
४२५ उत्तरकाण्ड झांझ, डफ, ढोल और दुन्दुभी आदि बाजे बजाते हैं तथा सुन्दर और सरस शहनाइयोंपर समयानुकूल गाना गाते हैं ॥ १७ ॥ वीणा और बाँसुरीकी सुमधुर ध्वनि सुनकर किन्नर और-गन्धर्वगण अपने बड़े गुणको भी, अभिमान छोड़कर मन-ही-मन अत्यन्त तुच्छ मानने लगते हैं ॥ १८ ॥ कोकिलभाषिणी कामिनियाँ अपनी-अपनी अटारियोंपर चढ़कर मनोहर गान कर रही हैं, मानो हिमालयके शिखरोंपर सुर-सुन्दरियाँ विराजमान हों ॥ १९ ॥ जहाँ-तहाँ अपने अपने उज्ज्वल भवनोंसे स्त्रियोंके झुण्ड निकलते हैं, मानो बहुत-सी अप्सराएँ मिलकर समुद्र-मन्थन कर रही हों ॥ २० ॥ वे सुन्दरता और आनन्दसहित बसन्ती साड़ी ओढ़े ऐसी जान पड़ती हैं, मानो चन्द्रमाओंके समूह बिजलियोंके घरोंमें बसे हुए हों ॥ २१ ॥ वे सुचतुर सुन्दरी स्त्रियाँ अबीर घोलकर कुंकुमोंमें भरती हैं तथा ऋतुके स्वभावानुसार तरह-तरहकी पवित्र और सुन्दर गालियाँ देती हैं॥२२॥ जो सुख, योग, यज्ञ, जप और तीर्थ आदिसे परे है वही श्रीरामचन्द्रजी की कृपासे अयोध्याकी गलियोंमें भरा हुआ है ॥ २३ ॥ इस प्रकार फाग खेलनेके अनन्तर भगवान्ने सरयू नदीके जलमें स्नान किया। तदनन्तर याचकोंको तरह-तरहके वस्त्र और आभूषण प्राप्त हुए ॥२४॥ उसी समय तुलसीदासने प्रभुकी अनुपम भक्ति माँगी, तब श्रीरघुनाथ- जीने मृदुल मुसकान करते हुए कृपादृष्टिपूर्वक वह दे दी ॥ २५ ॥ राग बसंत [ २२ ] खेलत बसंत राजाधिराज । देखत नभ कौतुक सुर-समाज ॥१॥ सोहैं सखा-अनुज रघुनाथ साथ । झोलिन्ह अबीर, पिचकारि हाथ२
गीतावली ४२६ बाजहिं मृदंग,डफ,ताल,बेनु । छिरकैं सुगंधभरे मलय-रेनु ॥ ३ ॥ उत जुवति-जूथ जानकी संग । पहिरे पट भूषन सरस रंग ॥ ४ ॥ लिये छरी बेंत सोंधैंविभाग । चांचरि झूमक कहैं सरस राग ॥ ५ ॥ नूपुर-किंकिनि-धुनि अति सोहाइ । ललना-गन जब जेहि धरइँधाइ ॥६ लोचन आँजहि फगुआ मनाइ । छाड़हिं नचाइ, हाहा कराइ ॥७॥ चढ़े खरनि बिदूषक-स्वाँग साजि । करें कूटि, निपट गइ लाज भाजि॥८॥ नर-नारि परस्पर गारि देत । सुनि हँसत रामभाइन समेत॥९॥ बरषत प्रसून बर-बिबुध-वृंद । जय-जय दिनकर-कुल-कुमुदचंद १० ब्रह्मादि प्रसंसत अवध बास । गावत कलकीरति तुलसिदास ॥११॥ राजाधिराज भगवान् राम फाग खेल रहे हैं, आकाशमें देवता लोग यह कौतुक देख रहे हैं ॥ १ ॥ रघुनाथजीके साथ उनके सखा और छोटे भाई शोभायमान हैं। उनकी झोलियोंमें अबीर है और हाथोंमें पिचकारियाँ ॥ २ ॥ इस समय मृदंग, डफ, करताल और बाँसुरी आदि बाजे बज रहे हैं तथा चन्दनकी रजसे मिला हुआ सुगन्धित जल छिटका जा रहा है ॥ ३ ॥ उधर जानकीजीके साथ रंगबिरंगे वस्त्र और आभूषण पहने युवतियोंका झुंड हाथमें बेंतकी छड़ी लिये रास्ता खोजता है और अत्यन्त सरस चाँचर और झूमक राग गा रहा है ॥ ४-५ ॥ जब वे स्त्रियाँ दौड़कर किसीको पकड़ती हैं तो उनके नूपुर और करधनीकी ध्वनि बड़ी ही मनोहर जान पड़ती है ॥ ३ ॥ वे जिसे पकड़ती हैं, उसके नेत्रोंमें अञ्जन लगा देती हैं तथा उससे फगुआ मनाकर और नाच नचाकर बहुत प्रार्थना करने- पर छोड़ती हैं ॥ ७ ॥ बहुत-से लोग मसखरेका स्वाँग रचकर गधों- पर चढ़े हुए हैं। वे तरह-तरहकी कूटोक्तियाँ बोलते हैं, इस
४२७ उत्तरकाण्ड समय उनकी लज्जा बिल्कुल चली गयी है ॥ ८ ॥ स्त्री-पुरुष आपसमें गालियाँ देते हैं, उन्हें सुन-सुनकर श्रीरामचन्द्रजी भाइयोंके सहित हँसते हैं ॥ ९ ॥ 'सूर्यकुल-कुमुदकलाधर भगवान् रामकी जय हो, जय हों' ऐसा कहते हुए देवतालोग फूलोंकी वर्षा कर रहे हैं ॥ १० ॥ अयोध्याके निवासकी ब्रह्मादिक भी प्रशंसा कर रहे हैं। तुलसीदास भी प्रभुकी पवित्र कीर्तिका गान करता है ॥ ११ ॥ अयोध्या का आनन्द राग केदारा [ २३ ] देखत अवधको आनन्द । हरषि बरषत सुमन दिन दिन देवतनिको वृंद ॥ १ ॥ नगर-रचना सिखनको विधि तकत बहु बिधि-वृंद । निपट लागत अगम, ज्यों जलचरहि गमन सुछंद ॥ २ ॥ मुदित सुरलोगनि सराहत निरखि सुषमाकंद । जिन्हके सुअलि-चख पियत राम-मुखारबिंद-मरंद ॥ ३ ॥ मध्य ब्योम बिलंबि चलत दिनेस-उडुगन-चंद । रामपुरी बिलोकि तुलसी मिटत सब दुख-द्वंद ॥ ४ ॥ अयोध्याका आनन्द देखकर देवतालोग हृदयमें हर्षित हो नित्य- प्रति फूलोंकी वर्षा करते हैं ॥ १ ॥ नगरकी रचना सीखनेके लिये ब्रह्माजी उसके तरह-तरहके भेद देखते हैं, परन्तु उन्हें यह इस प्रकार अत्यन्त दुर्गम जान पड़ती है जैसे जलचरको पृथ्वीपर स्वच्छन्द विचरना* ॥ २ ॥ जिनके नेत्ररूप भौंरे सुषमाकन्द भगवान् *क्योंकि ब्रह्माजी मायिक सृष्टिके अधिकारी हैं और यह दिव्य रचना है ।
गीतावली ४२८ रामको निहारकर उनके मुखकमलका मकरन्द पान करते हैं, उन अयोध्यावासियोंकी वे प्रसन्नतापूर्वक सराहना करते हैं ॥ ३ ॥ तुलसीदासजी कहते हैं, भगवान् रामकी पुरीको देखनेसे सारे दुःख और द्वन्द्व नष्ट हो जाते हैं, अतः सूर्य, तारे और चन्द्रमाभी उसे देखनेके लिये] मध्य आकाशमें कुछ ठहरकर चलते हैं ॥ ४ ॥ रामराज्य राग सोरठ [ २४ ] पालत राज यों राजीं राम धरमधुरींन । सावधान, सुजान, सब दिन रहत नय-लयलीन ॥ १ ॥ स्वान-खग-जति-न्याउ देख्यो आपु बैठि प्रबीन । नीचु हति महिदेव-बालक कियो मीचुबिहीन ॥ २ ॥ भरत ज्यों अनुकूल जग निरुपाधि नेह नवीन । सकल चाहत रामही, ज्यों जल अगाधहि मीन ॥ ३ ॥ गाइ राज-समाज जांचत बास तुलसी दीन । लेहु निज करि देहु निज-पद-प्रेमपावन पीन ॥ ४ ॥ इस प्रकार धर्मधुरन्धर महाराज राम अपने राज्यका पालन करते हैं । वे परम सुजान सर्वदा सावधान रहकर नीतिमें तत्पर रहते हैं ॥ १ ॥ प्रवीण रामचन्द्रजीने श्वान, पक्षी और यतिका न्याय स्वयं बैठाकर देखा तथा शूद्रको मारकर ब्राह्मणके बालकको जीवन दान दिया ॥ २ ॥ भरतजीके समान सारा संसार ही भगवान्से अहैतुक और नित्यनूतन प्रेम करता था। मछली जिस प्रकार अगाध जलको ही चाहती है उसी प्रकार सभी लोग रामचन्द्रजीको ही चाहते
४२६ बालकाण्ड थे ॥ ३ ॥ भगवान्के राजसमाजका वर्णन करके दीन तुलसीदास भी यही माँगता है कि मुझे अपनाकर अपने चरणोंका परम पवित्र और सुदृढ़ प्रेम दीजिये ॥ ४ ॥ सीता-बनवास [ २४ ] संकट सुकृतको सोचत जानि जिय रघुराउ । सहस द्वादस पंचसतमें कछुक है अब आउ ॥ १ ॥ भोग पुनि पितु-आयुको, सोउ किए बनै बनाउ । परिहरे बिनु जानकी नहि और अनघ उपाउ ॥ २ ॥ पालिबे असिधार-ब्रत, प्रिय प्रेम-पाल सुभाउ । होइ हित केहि भांति, नित सुबिचारु, नहि चित चाउ ॥ ३ ॥ निपट असमंजसहु बिलसति मुख मनोहरताउ । परम धीर-धुर्रीन हृदय किं हरष-बिसमय काउ ? ॥ ४ ॥ अनुज-सेवक-सचिव हैं सब सुमति, साध सखाउ । जान कोउ न जानकी बिनु अगम अलख लखाउ ॥ ५ ॥ राम जोगवत सीय-मनु, प्रिय-मनहि प्रानप्रियाउ । परम पावन प्रेम-परमिति समुझि तुलसी गाउ ॥ ६ ॥ एक समय श्रीरघुनाथजी धर्मसंकट उपस्थित होनेपर मन-ही- मन इस प्रकार सोचने लगे—‘अब मेरी बारह हजार पाँच सौ वर्षकी आयुमें कुछ ही और शेष है ॥ १ ॥ उसके पश्चात् पिताकी आयुका भोग है, और उसे भोगनेसे ही काम चलेगा; किन्तु उसे भोगनेके लिये सीताजीको त्यागे बिना और कोई निर्दोष उपाय नहीं
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हैं'* ॥ २ ॥ अब खांड़ेकी धारके समान कठोर व्रतका तो पालन करना है, और प्रेमको निभानेका भगवान्का प्रिय स्वभाव है । ऐसी अवस्थामें किस प्रकार हित हो—इस सतत विचारके कारण उनके चित्तमें उत्साहका अभाव हो गया ॥ ३ ॥ किन्तु ऐसे असमंजसके समय भी मुखपर मनोहरता छायी हुई थी । भला, परम धीरधुरन्धर भगवान् रामके हृदयमें भी कभी हर्ष या विषाद हो सकता था ? ॥ ४ ॥ छोटे भाई, सेवक, मन्त्री और मित्रगण—ये सभी बड़े बुद्धिमान् और साधु-चरित हैं; परंतु भगवान्की इस दुर्गम और अदृश्य गतिको जानकीजीके सिवा और कोई नहीं जानता था ॥ ५ ॥ क्योंकि भगवान् राम सीताजीके मनको देखते रहते हैं और प्राणप्रिया सीताजी भी अपने प्रियतमका मन देखती रहती हैं । तुलसीदास भी इस परम पवित्रप्रेमकी मर्यादाको समझकर इसका गान करता है ॥६॥
[ २६ ] राम बिचारि कै राखी ठीक दै मन माँहि । लोक-बेद-सनेह पालत पल कृपालहि जाहि ॥ १ ॥ प्रियतमा, पतिदेवता, जिहि उमा रमा सिहाहिं । गुरुविनी सुकुमारि सियतियमनि समुझि सकुचाहिं ॥ २ ॥ मेरे ही सुख सुखो, सुख अपनो सपनहुँ नाहिं । गेहिनी गुन गेहनी गुन सुमिरि सोच समाहिं ॥ ३ ॥
*महाराज दशरथ अपनी अवस्था पूरी होनेसे पूर्व ही स्वर्गवासी हो गये थे । उनकी शेष आयु श्रीरामचन्द्रजीने भोगी । परंतु पिताकी आयुमें सीताजीको साथ रखना उन्हें अनुचित जान पड़ा । इसलिये उन्होंने उनका परित्याग कर दिया ।
४३१ उत्तरकाण्ड राम-सीय-सनेहु बरनत अगम कबि सकाहिं । रामसीय-रहस्य तुलसी कहत राम-कृपाहिं ॥ ४ ॥ अन्तमें रामचन्द्रजीने बहुत सोच-विचारकर मन-ही-मन उन्हें त्याग देना निश्चित कर लिया। अब परम कृपालु रघुनाथजीके सभी क्षण लौकिक-वैदिक स्नेहका पालन करनेमें बीतने लगे ॥ १ ॥ 'सीताजी मुझे परम प्रिय हैं, उनके अलौकिक पातिव्रतको देखकर पार्वती और लक्ष्मीजी भी ईर्ष्या करती हैं, इस समय वे गर्भवती हैं तथा परम सुकुमारी नारीरत्न हैं' यह विचारकर प्रभु उन्हें त्यागनेमें सकुचाते हैं ॥ २ ॥ 'सीताजी मेरे ही सुखमें सुखी रहती हैं, इन्हें अपने सुखका स्वप्नमें भी ध्यान नहीं है' इस प्रकार अपनी गुणखानि गृहिणीके गुणोंको याद कर-करके वे सोचमें डूब जाते हैं ॥ ३ ॥ श्रीराम और सीताजीके अगम स्नेहका वर्णन करनेमें बड़े-बड़े कवि भी शङ्कित हो जाते हैं। तुलसीदास तो श्रीरामचन्द्रजीकी कृपासे ही राम और सीताके गूढ़ रहस्यका वर्णन करता है ॥ ४ ॥ - [ २७ ] चरचा चरनिसों चरती जानमनि रघुराइ । दूत-मुख सुनि लोक-धुनि घर घरनि बूझी आइ ॥ १ ॥ प्रिया निज अभिलाष रुचिकहि कहति सिय सकुचाइ । तीये-तनयसमेत तापस पूजिहौं बन जाइ ॥ २ ॥ जानि करुनासिंधु भाबी-बिबस सकल सहाइ । धीर धरि रघुबीर भोरहि लिए लषन बोलाइ ॥ ३ ॥ 'तात तुरतहि साज स्यंदन सीय लेहु चढ़ाइ । बालमीकि मुनीस आश्रम आइयहु पहुँचाइ ॥ ४ ॥
गीतावली ४३२ 'भलेहि नाथ,' सुहाथ माथे राखि राम-रजाइ । चले तुलसी पालि सेवक-धरम अवधि अघाइ ॥ ५ ॥ चतुरशिरोमणि श्रीरामचन्द्रजीने अपने चरोंसे गुप्त समाचारकी बातें कीं । दूतोंके मुखसे लोकमतको जानकर अपने महलमें आ श्रीसीताजीसे पूछा—॥ १ ॥ 'प्राणप्रिये ! तुम अपनी अभीष्ट रुचि बतलाओ ।' तब सीताजीने सकुचाकर कहा—'मैं वनमें जाकर स्त्री और बालकोंके सहित तपस्वियोंका पूजन करना चाहती हूँ' ॥ २ ॥ तब करुणासागर भगवान् रामने होनहारके वश सारी सहायता उपस्थित देख, धैर्य धारणकर सवेरा होते ही लक्ष्मीजीको बुलाया ॥ ३ ॥ और कहा—'भैया ! तुम इसी समय रथ सजाकर उसपर सीताजीको बिठा वाल्मीकि मुनिके आश्रमपर पहुँचा आओ' ॥ ४ ॥ तब 'प्रभो ! बहुत अच्छा' इस प्रकार कह अपने हाथोंको माथेपर रखा (दुःख किया) और भगवान् रामकी आज्ञा शिरोधार्य की । वे सेवकधर्मका पूर्णतया पालन करते हुए वहाँसे चल दिये ॥ ५ ॥ [ २८ ] आइ लषन लै सौंपी सिय मुनीसहि आनि । नाइ सिर रहे पाइ आसिष जोरि पंकजपानि ॥ १ ॥ बालमीकि बिलोकि ब्याकुल लषन गरत गलानि । सरबबिद बूझत न, बिधिकी बामता पहिचानि ॥ २ ॥ जानि जिय अनुमानही सिय सहस बिधि सनमानि । राम सदगुन-धाम, परमिति भई कछुक मलानि ॥ ३ ॥ दीनबंधु दयालु देवर देखि अति अकुलानि । कहति बचन उदास तुलसीदास त्रिभुवन-रानि ॥ ४ ॥