गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)
Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi
महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)
४६२ गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० । ५ क० ४ मन इन प्राणों का अग्रणी [ आगे ले चलने वाला प्रधान ] होता है, मन से ही प्रेरणा किये हुये हम स्तोत्र के साथ स्तुति करें-इस प्रकार प्राणों को ही उससे मन के साथ वह मिलाता है। ( अथ यत् ब्रह्मा स्तुत इति उच्चैः अनुजानाति, मनः वै ब्रह्मा, मन एव तत् प्राणैः सन्दधाति ) फिर जब ब्रह्मा ऊंचे स्वर से अनुमति देता है-तुम स्तुति करो--मन ही ब्रह्मा है, मन को ही उससे प्राणों के साथ मिलाता है । ( अथ यत् प्रस्तोता प्रस्तौति, अपानम् एव तत् प्राणैः सन्दधाति ) फिर जब प्रस्तोता प्रस्तोत्र बोलता है, अपान को ही उससे प्राणों के साथ वह मिलाता है । ( अथ यत् प्रतिहर्त्ता प्रतिहरति, व्यानम् एव तत् अपानैः सन्दधाति ) फिर जब प्रतिहर्त्ता प्रतिहार स्तोत्र बोलता है, व्यान को ही उससे अपानों के साथ वह मिलाता है । ( अथ यत् उद्गाता उद्गायति, समानम् एव तत् प्राणैः सन्दधाति ) फिर जब उद्गाता [ उत्तम गाने वाला ] उद्गान [ उत्तम साम गान ] करता है, समान वायु को ही उससे प्राणों के साथ वह मिलाता है । ( अथ यत् होता साम्ना शस्त्रम् उपसन्तनोति, वाक् वै होता, वाचम् एव तत् प्राणैः सन्दधाति ) फिर जब होता साम गान के साथ शस्त्र [ स्तोत्र ] को अच्छे प्रकार फैलाता है, वाक् [ जिह्वा ] ही होता, [ हवन करने वाला ] है, जिह्वा को ही उससे प्राणों के साथ वह मिलाता है। ( अथ यत् सदस्यः ब्रह्माणम् उपासीदति, प्रजापतिः वै सदस्यः, प्रजापतिम् एव आप्नोति ) फिर जब सदस्य ब्रह्मा [ मन ] के पास बैठता है, प्रजापति [ प्रजापालक ] ही सदस्य है, प्रजापति [ प्रजापालक व्यवहार ] को ही वह पाता है । ( अथ यत् होत्राशंसिनः सामसन्ततिं कुर्वन्ति, अङ्गानि वै होत्राशंसिनः, अस्य अङ्गानि एव तत् प्राणैः सन्दधाति ) फिर जब होत्राशंसी लोग साम गान का फैलाव करते हैं, अङ्ग ही होत्राशंसी लोग हैं, इस [ यजमान ] के अङ्गों को उससे प्राणों के साथ वह मिलाता है। ( अथ यत् यजमानः स्तोत्रम् उपासीदति आत्मा वै यजमानः, अस्य आत्मानम् एव तत् कल्पयति ) फिर जब यजमान स्तोत्र को समीप से सेवता है, आत्मा ही यजमान है, इस [ यजमान ] के ही आत्मा को उससे वह [ ऋत्विज् ] समर्थ करता है । ( तस्मात् एनं बहिर्वेदि न अभ्याश्रावयेयुः ) इसलिये इससे [ आवश्यकता के लिये बाहिर जाने पर यजमान से ] वेदी से बाहिर स्थान में वे [ ऋत्विज् ] न बातचीत करें, ( न अभ्युदियात् न अभ्यस्तमियात् ) न [ उसको दूसरे स्थान में ] सूर्य उदय हो और न अस्त हो [ दिन रात यजमान यज्ञ शाला में रहे ], ( न अधिष्ण्ये प्रतपेत् ) वह [ यजमान ] धिष्ण्य [ यज्ञाग्नि ] से अन्यत्र न तापे, ( प्राणेभ्यः आत्मानम् अन्तः नेत् अगात् ) और प्राणों से [ अलग पदार्थों को ] अपने भीतर न आने दे ॥ ४ ॥ ( प्रसूता . ) प्रेरिताः ( स्तुयाम ) स्तुतिं कुर्याम ( अनुजानाति ) अनुमन्यते (साम- सन्ततिम् ) सामगानविस्तृतिम् ( कल्पयति ) समर्थयति (बहिर्वेदि) अपपरिवहिरञ्चवः पञ्चम्या ( पा० २ । १ । १२ ) समासान्तोऽव्ययीभावः । वेद्याः सकाशाद् बहिर्देशे ( अभ्याश्रावयेयुः ) अभ्याश्रावणम् अभितो वार्तालापं कुर्युः (अभ्युदिय'त्) उदयम् प्राप्नुयात् ( अस्तमियात् ) अस्तं गच्छेत् ( अधिष्ण्ये ) धिष्ण्यनामकाग्निसकाशाद् भिन्नदेशे ( अन्तः , ' मध्ये ( अगात् ) प्राप्नुयात् ॥
कण्डिका ५ ॥
गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० ५ । क० ५ ॥ ४६३ भावार्थः- जो मनुष्य प्राण अपान आदि प्राणों और जिह्वा नेत्र आदि इन्द्रियों को सावधान रखते हैं, वे अपने मनोरथ सिद्ध करते हैं ॥ विशेषः- प्रतीक वाला मन्त्र अर्थ सहित दिया जाता है ॥ १--सोमः पवते जनिता मतीनां जनिता दिवो जनिता पृथिव्याः । जनितारग्ने- र्जनिता सूर्यस्य जनितेन्द्रस्य जनितोत विष्णोः-ऋग्० ९ । ६६ । ५, साम० पू० ६ । ४ । ५ ॥ (सोमः) सोम [ सर्वोत्पादक परमेश्वर ] (पवते) शुद्ध है [ वा व्यापक है ], वह (मतीनाम्) मननशील मनुष्यों का (जनिता) उत्पन्न करने वाला, (दिवः) आकाश [ वा व्यवहार ] का (जनिता) उत्पन्न करने वाला, (पृथिव्याः) पृथिवी का (जनिता) उत्पन्न करने वाला, (अग्नेः) अग्नि का (जनिता) उत्पन्न करने वाला, (सूर्यस्य) सूर्य का (जनिता) उत्पन्न करने वाला, (इन्द्रस्य) बिजुली [ वा ऐश्वर्य ] का (जनिता) उत्पन्न करने वाला (उत) और (विष्णोः) विष्णु [व्यापक वायु आदि] का (जनिता) उत्पन्न करने वाला है ॥ कण्डिका ५ ॥ प्रथमेषु पर्यायिषु स्तुवते, प्रथमेषु पदेषु निनर्दयन्ति, प्रथमरात्रादेव तदसुरान्नि- र्घ्नन्ति । मध्यमेषु पर्यायिषु स्तुवते, मध्यमेषु पदेषु निनर्दयन्ति, मध्यमरात्रादेव तदसुरान्निघ्नन्ति । उत्तमेषु पर्यायिषु स्तुवते, उत्तमेषु पदे १षु निनर्दयन्ति, उत्तम- रात्रादेव तदसुरान्निघ्नन्ति । तद्यथाभ्याघारात् पुनः पुनः पाप्मानं निर्हरन्त्येवमेवैतत् स्तोत्रियानुरूपाभ्यामहोरात्राभ्यामेव तदसुरान्निघ्नन्ति । गायत्रीं शंसन्ति, तेजो वै ब्रह्मवर्चसं गायत्री, तेज एवास्मै तत् ब्रह्मवर्चसं यजमाने दधति । गायत्री [ गायत्रीं ] शस्त्वा जगतीं शंसन्ति, ब्रह्म ह वै जगती, ब्रह्मणैवास्मै तद् ब्रह्मवर्चसं यजमाने दधति । व्याह्वयन्ते गायत्रीञ्च जगतीञ्चान्तरेण, छन्दांस्येव तं नानावीर्याणि कुर्वन्ति । जगतीः शस्त्वा त्रिष्टुभः शंसन्ति पशवो वै जगती, पशूनेव तत् त्रिष्टुभः परिदधति । बलं वै वीर्यं त्रिष्टुप्, बलमेव तद्वीर्य्येऽन्ततः प्रतिष्ठापयति । अन्वस्वत्यो मद्वत्यः सुतवत्यः पीतवत्यस्त्रिष्टुभो याज्याः समृद्धा सुलक्षणाः, एतद्वै रात्रीरूपं जागृयात् । रात्रि यावदु ह वै न वा स्तुवते न वा शस्यते, तावदीश्वरा असुररक्षांसि च यज्ञमनुवन- र्यन्ति । तस्मादाहवनीयं समिधमाग्नीधीयं गार्हपत्यं धिष्ण्यं समुज्ज्वलयते । अति- भाषयेरन् ज्वलयेरन् प्रकाशमिव वै तस्यादारे भिन्नं सुवीरंस्तान् ह्रातःश्रेष्ठो वा इति पाप्मा नाभिवृणोति । ते तमःपाप्मानमपाघ्नते ते तमःपाप्मानमपाघ्नते ॥ ५ ॥ कण्डिका ५ ॥ यज्ञ के पर्यायों में स्तोत्रों और शस्त्रों के प्रयोग ॥ (प्रथमेषु पर्यायिषु स्तुवते, प्रथमेषु पदेषु निनर्दयन्ति, प्रथमरात्रात् एव तत् असुरान् निघ्नन्ति) पहिले पर्यायों में [ क० २ ] वे स्तोत्र पढ़ते हैं, पहिले पदों में ऊँचे बोलते हैं, रात्रि के प्रथम भाग से ही तब असुरों को निकाल मारते हैं । (मध्यमेषु पर्यायिषु ५--(स्तुवते) स्तुवन्ति (निनर्दयन्ति) उच्चैः शब्दयन्ति (निघ्नन्ति) १. पू० सं० "पदेषु" इति पाठः नास्ति ॥ सम्पा० ॥
४६४ गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० ५ । क० ५ ॥ स्तुवते, मध्यमेषु पदेषु निनर्द॑यन्ति, मध्यमरात्रात् एव तत् असुरान् निघ्नंन्ति ) मध्यम पर्य्यायों में वे स्तोत्र पढ़ते हैं, मध्यम पदों में ऊँचे बोलते हैं, रात्रि के मध्य से ही तब असुरों को निकाल मारते हैं। ( उत्तमेषु पर्य्यायेषु स्तुवते, उत्तमेषु पदेषु निनर्द॑यन्ति, उत्तम- रात्रात् एव तत् असुरान् निघ्नंन्ति ) पिछले पर्य्यायों में वे स्तोत्र पढ़ते हैं, पिछले पदों में ऊँचे बोलते हैं, रात्रि के पिछले भाग से ही तब असुरों को निकाल मारते हैं। ( तत् यथा अभ्याघारात् पुनः पुनः पाप्मानं निर्हरन्ति, एवम् एव एतत्, स्तोत्रियानुरूपाभ्याम् अहोरात्राभ्याम् एव तत् असुरान् निघ्नंन्ति ) सो जैसे बड़े प्रकाश से बार बार पाप को निकाल देते हैं, वैसे ही यह है, स्तोत्रिय और अनुरूप [ विषय के सदृश स्तोत्र ] के द्वारा दिन और रात से ही तब से असुरों को निकाल मारते हैं ॥ ( गायत्रीं शंसन्ति, ब्रह्मवर्चसं तेजः वै गायत्री, ब्रह्मवर्चसं तेजः एव अस्मै तत् यजमाने दधति ) गायत्री [ गायत्री मन्त्र और छन्द ] को वे पढ़ते हैं, ब्रह्मवर्चस तेज [ वेद पढ़ने से पाया हुआ तेज ] ही गायत्री है, ब्रह्मवर्चस तेज को ही इस [ जगत् के ] हित के लिए तब यजमान में वे धारण करते हैं। ( गायत्री [ गायत्रीं ] शस्त्वा जगतीं शंसन्ति, ब्रह्म ह वै जगती, ब्रह्मणा एव अस्मै तत् ब्रह्मवर्चसं यजमाने दधति ) गायत्री बोलकर जगती [ जगती छन्द वा जगत् उपकारिका ऋचा ] वे बोलते हैं, ब्रह्म [ वेद ज्ञान ] ही जगती है, ब्रह्म [वेदज्ञान] से ही इस [ जगत् ] के हित के लिए तब ब्रह्मवर्चस् को यजमान में वे धारण करते हैं। ( गायत्रीः च जगतीः च अन्तरेण व्याह्वयन्ते, छन्दांसि एव तं नानावीर्याणि कुर्वन्ति ) गायत्री छन्दों और जगती छन्दों को अलग अलग वे विविध प्रकार बोलते हैं, छन्द ही उस [ यजमान ] में बहुत से सामर्थ्य करते हैं। ( जगतीः शस्त्वा त्रिष्टुभः शंसन्ति, पशवः वै जगती, पशून् एव तत् त्रिष्टुभः परिदधति ) जगती छन्दों को बोलकर वे त्रिष्टुभों को बोलते हैं, पशु ही जगती [ जगत् उपकारिका शक्ति ] हैं, पशुओं को ही तब त्रिष्टुम् धारण करते हैं। ( बलं वै वीर्य्यं त्रिष्टुप्, बलम् एव तत् वीर्ये अन्ततः प्रतिष्ठापयति ) बल वीर्य ही त्रिष्टुप् [ तीन कर्म, उपासना और ज्ञान का ठहराव ] है, बल को ही तब वीर्य [ धातु पुष्टि ] में अन्त में वह स्थापित करता है। ( अन्धस्वत्यः, मद्वत्यः, सुतवत्यः, पीतवत्यः त्रिष्टुभः याज्याः समृद्धाः सुलक्षणाः, एतत् वै रात्रीरूपं जागृयात् ) अन्धस्वती [ अन्धस्, अन्न शब्द वाली ], मद्वती [ मद अर्थात् हर्ष शब्द वाली ]; सुतवती [ सुत, निचोड़े हुए सोम शब्द वाली ] पीतवती [ पीत, पीये हुये सोम रस शब्द वाली ], त्रिष्टुभ ऋचायें यज्ञ करने योग्य, समृद्ध और सुन्दर लक्षण वाली हैं, इनसे ही रात्रि रूप [ अन्धकार ] में वह जागता रहे। ( रात्रिं यावत् उ ह वै न वा स्तुवते, निःसार्य नाशयन्ति ( अभ्याघारात् ) अभि+आ+घृ क्षरणे दीप्तौ च—घञ् । सर्वतः प्रकाशात् ( निर्हरन्ति ) नाशयन्ति ( ब्रह्मवर्चसम् ) वेदाध्ययनजन्यतेजः ( दधति ) धारयन्ति ( ब्रह्म ) वेदज्ञानम् (व्याह्वयन्ते ) विविधमाह्वयन्ति कथयन्ति ( नानावीर्याणि ) विविधवीरकर्माणि ( वीर्ये ) धातुपुष्टौ ( सुलक्षणाः ) सुलक्षणयुक्ताः ( जागृयात् ) प्रबुध्येत् ( ईश्वरा ) शेलुंक् । ईश्वराणि समर्थानि ( अनुवनयन्ति ) वन हिंसायाम् । निरन्तरं नाशयन्ति ( सम् ) सम्भूय ( उ ) एव ( तस्य ) दृश्यमानस्य सूर्यस्य ( आदारे ) आदारयन्ति शत्रून् यत्र । आ+दृ विदारणे-
कण्डिका ६ ॥
गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० ५ । क० ६ ४६५ न वा शस्यते, तावत् ईश्वरा असुररक्षांसि च यज्ञम् अनुवनयन्ति ) रात्रि में जब ही वह न तो स्तोत्र पढ़ता है और न शस्त्र पढ़ता है, तब समर्थ होते हुये असुर और राक्षस यज्ञ को नष्ट कर डालते हैं । (तस्मात् आहवनीयं समिधम् आग्नीध्रीयं गार्हपत्यं धिष्ण्यं सम्- उज्ज्वलयते ) इसलिए आहवनीय, समिध्, आग्नीध्रीय, गार्हपत्य और धिष्ण्य [ पांच अग्नियों ] को ठीक ठीक ही जलाता रहे । ( तस्य प्रकाशम् इव वै आदारे भिन्नं सुवीरम् अतिभाषयेरन्, ज्वलयेरन्, स्तान् हातः श्रेष्ठः वै इति, पाप्मा न अभिवृणोति) उस [ सूर्य ] के प्रकाश के समान ही संग्राम में प्रफुल्ल बड़े वीर पुरुष को आदर से बोलें और प्रकाशित करें—यह अव्याकुल [ दृढ़ स्वभाव ], गतिमान् [ पुरुषार्थी ] और श्रेष्ठ है— [ उसको ] पाप नहीं पकड़ता है । ( ते तमः पाप्मानम् अपाघ्नते ते तमः पाप्मानम् अपाघ्नते ) वे [ शूर लोग ] अन्धकार रूप पाप को नष्ट कर देते हैं वे [ शूर लोग ] अन्धकार रूप पाप को नष्ट कर देते हैं [ अवश्य ही नष्ट करते हैं ] ॥ ५ ॥ भावार्थः—जैसे संग्राम के पड़ाव में मित्र और शत्रु की पहिचान के लिए विशेष बोलियां बोली जाती हैं, वैसे ही यज्ञ में सिद्धि पाने और विघ्नों के हटाने के लिये विशेष स्तोत्र और शस्त्र बोले जाते हैं ॥ ५ ॥ कण्डिका ६ ॥ विश्वरूपं वै त्वाष्ट्रमिन्द्रोऽहन्स त्वष्टा हतपुत्रोऽभिचरणीयमपेन्द्रं सोममाहरत् । तस्येन्द्रो जज्ञिरे । स संस्कृत्या प्रासहा सोममपिबत् स विष्वङ् व्यार्च्छत् । तस्मात् सोमो नानुपहूतेन पातव्यः । सोमपीथोऽस्य द्व्यृद्धिको भवति । तस्य मुखात् प्राणेभ्यः श्रीर्यशांस्यूर्ध्वान्युदक्रामन् । तानि पशून् प्राविशन् । तस्मात् पशवो यशो यशो ह भवति, य एवं वेद । ततोऽस्मा एतदश्विनौ च सरस्वती च यज्ञं समभरन् सौत्रामणिं भेषज्याय । तयेन्द्रमभ्यषिञ्चन् । ततो वै स देवानां श्रेष्ठोऽभवत् । श्रेष्ठः स्वानां चान्येषां च भवति, य एवं वेद यश्चैवं विद्वान् सौत्रामण्याभिषिच्यते ॥ ६ ॥ कण्डिका ६ ॥ आख्यायिका—त्वष्टा का इन्द्र से सोमरस छीनना और सौत्रामणी इष्टि ॥ ( इन्द्रः विश्वरूपं त्वाष्ट्रं वै अहन् ) इन्द्र [ सूर्य ] ने विश्वरूप [ संसार में व्यापक ] त्वाष्ट्र [ त्वष्ट्रा प्रकाशमान सूर्य के पुत्र मेघ वा अन्धकार ] को मार डाला । ( हतपुत्रः सः त्वष्टा अभिचरणीयम् इन्द्रम् सोमम् अप आहरत् ) मरे पुत्र वाले उस त्वष्टा ने सब प्रकार घञ् । संग्रामे ( भिन्नम् ) प्रस्फुटितम् । विकसितम् ( स्तान् ) ष्टम अवैकलव्ये—क्विप् । अनुनासिकस्य क्विझलोः क्ङिति ( पा० ६ । ४ । १५ ) उपधादीर्घः । मो नो धातोः ( पा० ८ । २ । ६४ ) मस्य नः । अव्याकुलः । दृढ़स्वभावः ( हातः ) हसिमृग्रिण्व० ( उ० ३ । ८६ ) ओहाङ् गतौ—तन् । गतिमान् ( अभिवृणोति ) वृक आदाने—लट् । स्वागणदित्वमार्षम् । अभिवर्कते । अभिगृह्णाति ॥ ६—( विश्वरूपम् ) सर्वजगद्व्यापकरूपयुक्तम् ( त्वष्टारम् ) नप्तृनेष्टृ- त्वष्टृह्रोतृपोतृ० ( उ० २ । ६५ ) त्विष दीप्तौ वा त्वक्षू तनूकरणे—तृच्, इकारस्य ३०
४६६ गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० ५ । क० ६ प्राप्ति योग्य इन्द्र [सूर्य्य] से सोम रस [जल] को छीन लिया । (इन्द्रः तस्य जज्ञिरे) इन्द्र ने उसे जान लिया । (सः संस्कृत्वा प्रासहा सोमम् अपिबत्, सः विष्वङ् व्यर्च्छत्) उस [त्वष्टा] ने शुद्ध करके बलात्कार सोमरस पी लिया, और वह [सोम को] प्रवेश करता हुआ मूर्छित हो गया । (तस्मात् सोमः अनुपहूतेन न पातव्यः) इसलिये सोमरस [यज्ञ में ओषधियों का तत्त्वरस] बिना बुलाये पुरुष को न पीना चाहिये। (अस्य सोमपीथः द्व्यृद्धिकः भवति) इस [यजमान] का सोमरस पान दो ऋद्धि वाला होता है। (तस्य मुखात् प्राणेभ्यः श्रीः यशांसि ऊर्ध्वानि उदक्रामन्) उसके मुख और प्राणों से श्री और अनेक यश [दोनों ऋद्धियां] ऊंचे चढ़ते हैं । (तानि पशून् प्राविशन्) वे [श्री और यश] पशुओं में प्रवेश करते हैं। (तस्मात् पशवः यशो यशः ह [तस्मै] भवति, यः एवं वेद) इसलिये पशु [सब प्राणी] बहुत यश रूप [उसके लिये] होते हैं, जो ऐसा विद्वान् है। (ततः अस्मै एतत् अश्विनौ च सरस्वती च सौत्रामणिं यज्ञं भैषज्याय सम् अभरन्) इसी से इस [यजमान] के लिये इस प्रकार दोनों अश्वी [दिन रात वा सूर्य्य चन्द्रमा] और सरस्वती [विज्ञान वाली वेद विद्या] सौत्रामणी [अच्छे प्रकार रक्षक ईन्द्र परमात्मा की भक्ति युक्त क्रिया] यज्ञ को ओषध के लिये यथावत् पुष्ट करते हैं । (तया इन्द्रम् अभ्यषिञ्चन्) उस [सौत्रामणी इष्टि] से इन्द्र [बड़े ऐश्वर्य्य वाले पुरुष को उन्होंने अभिषेक किया है । (ततः वै सः देवानां श्रेष्ठः अभवत्) इसलिये ही वह देवों [विद्वानों] में श्रेष्ठ हुआ है। (स्वानां च अन्येषां च श्रेष्ठः भवति, यः एवं वेद, यः च एवं विद्वान् सौत्रामण्या अभिषिच्यते) वह अपने और दूसरे लोगों में श्रेष्ठ होता है, जो ऐसा जानता है, और जो ऐसा विद्वान् सौत्रामणी [बड़े रक्षक परमात्मा की भक्ति वाली इष्टि] से अभिषेक किया जाता है ॥ ६ ॥ भावार्थः--जैसे सूर्य्य वृत्रासुर अर्थात् मेघ को हटाकर पृथिवी के जल को खींचकर समृद्ध होता है, वैसे ही वीर पुरुष शत्रुओं को मारकर संसार में यश पाता है ॥ ६ ॥ विशेषः--इस आख्या का मूल वेदमन्त्र है, जो अर्थ सहित लिखा जाता है-- अकारः । त्वष्ट्र-अण् । त्वष्टुः सूर्य्यस्य पुत्रम् इव मेघम् अन्धकारं वा (इन्द्रः) सूर्य्यः (अहन्) हतवान् (त्वष्टा) सूर्य्यः (अभिचरणीयम्) अभितः प्रापणीयम् (सोमम्) रसम् । मेघजलम् (जज्ञिरे) ज्ञा अवबोधने-लिट् । बहुवचनमार्षम् । जज्ञे । ज्ञातवान् (संस्कृत्वा) संस्कृत्य । संशोध्य (प्रासहा) प्रसह्य । बलात्कारेण (विष्वङ्) विष्लृ व्याप्तौ वा विश प्रवेशे-क्तः । विष्ट इति नामधातुः, ततः शतृः । विष्टं प्रवेशं कुर्वन् । (व्यर्च्छत्) वि+ऋच्छ गतीन्द्रियप्रलयमूर्त्तिभावेषु-लङ्, मूर्छामगात् (द्व्यृद्धिकः) द्विधासम्पत्तियुक्तः (यशो यशः) बहुकीर्तिरूपम् (अश्विनौ) गौ० उ० ५ । ३ । अहोरात्रौ । सूर्य्याचन्द्रमसौ (सरस्वती) विज्ञानवती वेदविद्या (सौत्रामणिम्) संबंधात्तुम्यो मनिन् (उ० ४ । १४५) सु+त्रैङ् पालने-- मनिन् । साऽस्य देवता (पा० ४ । २ । २४) सुत्रामन्--अण्, टिलोपौभावः स्त्रियां ङीप् । ईकारस्य ह्रस्वत्वमार्षम् । महारक्षकयोग्यां भक्तिं पूजां वा । इष्टिविशेषम् (स्वानाम्) ज्ञातीनां बन्धूनाम् ॥
कण्डिका ७ ॥
गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० ५ । क० ७ ४६७ अहन् वृ॒त्रं वृ॑त्र॒तरं॒ व्यं॑सम॒िन्द्रो वज्रे॑ण मह॒ता व॒धेन॑ । स्कन्धा॑ंसीव कुलि॒शेना॒ विवृ॑क्णाऽहिः॑ शयत उप॒पृक् पृ॑थि॒व्याः—ऋ० १ । ३२ । ५ ॥ (इन्द्रः) इन्द्र [ सूर्य वा बिजुली ] ने (वृत्रतरम्) अत्यन्त ढक लेने वाले (वृत्रम्) वृत्र [ रोकने वाले मेघ ] को (महता वधेन) बड़े हथियार, (वज्रेण) वज्र [ कुल्हाड़े के समान छेदने वाले किरण समूह ] से (व्यंसम्) बिना कन्धे करके (अहन्) मार डाला (कुलि- शेन) कुल्हाड़े से (विवृक्णा) काट डाले गये (स्कन्धांसि इव) वृक्ष दण्डों के समान (अहिः अहि [ सब ओर चलता हुआ मेघ ] (पृथिव्याः) पृथिवी से (उपपृक्) छूता हुआ (शयते) सोता है [ अर्थात् सूर्य की किरणों से मेघ छिन्न_भिन्न होकर पृथिवी पर बरसता है ] ॥ कण्डिका ७ ॥ अथ साम गायति ब्रह्मा, क्षत्रं वै साम, क्षत्रेणैवैवं तदभिषिञ्चति । अथो साम्राज्यं वै साम, साम्राज्येनैवैनं तत् साम्राज्यं गमयति । अथो सर्वेषां वा एष वेदानां रसः, यत् साम, सर्वेषामेव तद्वेदानां रसेनाभिषिञ्चति । बृहत्यां गायन्ति, बृहत्यां वा असावादित्यः श्रियां प्रतिष्ठायां प्रतिष्ठितस्तपति । ऐन्द्र्यां बृहत्यां गायति । ऐन्द्रो वा एष यज्ञऋतुर्यत् सौत्रामणिः । ऐन्द्रायतन एष एतर्हि यो यजते, स्व एवैनं तदायतने प्रीणाति । अथ कस्मात् संश्यानानि नाम, एतैर्वै सामभिर्देवा इन्द्रमिन्द्रियेण वीर्येण समश्यन्, तथैवैतद्यजमाना एतैरेव साम- भिरिन्द्रियेणैव वीर्येण संश्यन्ति । संश्रवसे विश्रवसे सत्यश्रवसे श्रवस इति सामानि भवन्ति । एष्वेवैनं लोकेषु प्रतिष्ठापयति । चतुर्निधनं भवति, चतस्रो वै दिशः, दिक्षु तत् प्रतितिष्ठन्ते । अथो चतुष्पादः पशवः, पशूनामाप्त्यै । तदाहुः, यदेतत् साम गीयते, अथ क्वैतस्य साम्न उक्थं, का प्रतिष्ठा । त्रयो देवा एका- दशेत्यूहुः, एतद्वा एतस्य साम्न उक्थमेषा प्रतिष्ठा । त्रयस्त्रिंशं ग्रहं गृह्णाति, साम्नः प्रतिष्ठायै प्रतिष्ठायै ॥ ७ ॥ कण्डिका ७ ।, साम सब वेदों का रस है, सौत्रामणी यज्ञ में साम गान ॥ ( अथ ब्रह्मा साम गायति ) फिर ब्रह्मा [ चतुर्वेदी ऋत्विज् ] साम [ वेदों के सा-, मोक्षज्ञान ] को गाता है । ( क्षत्रं वै साम, क्षत्रेण एव एनम् तत् अभिषिञ्चति ) राज्य ही साम [ मोक्ष ज्ञान ] है, राज्य के साथ ही इस [ यजमान ] को तब वह अभिषेक करता है । ( अथो साम्राज्यं वै साम, साम्राजDomain/साम्राज्येन एव एनं तत् साम्राज्यं गमयति ) फिर साम्राज्य [ चक्रवर्ती राज्य ] ही साम गान है, साम्राज्य [ साम्राज्य के समान साम- गान ] के साथ ही इस [ यजमान ] को तब साम्राज्य वह पहुँचाता है । ( अथो सर्वेषां वेदानां वै एषः रसः, यत् साम ) फिर सब वेदों का ही यह रस है, जो साम गान है । ७—(सामं) मोक्षज्ञानम् ( क्षत्रम् ) राज्यम् ( साम्राज्यम् ) सम्राज्— ण्यम् । चक्रवर्त्तिराज्यम् । सार्वभौमराज्यम् ( गमयति ) प्रापयति ( रसः ) सारः
४६८ गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० ५ । क० ७ ( सर्वेषां वेदानाम् एष रसेन तत् अभिषिञ्चति ) सब ही वेदों के रस से तब वह [ यज- मान को ] अभिषेक करता है । ( बृहत्यां गायन्ति ) बृहती [ बड़े विषय वाली वेद विद्या वा बृहती छन्द ] में वे [ साम ] गाते हैं । ( बृहत्यां वै असौ आदित्यः श्रियां प्रतिष्ठा- याम् प्रतिष्ठितः तपति ) बृहती [ बड़े विषय वाली वेद वाणी ] में ही वह चमकने वाला सूर्य शोभा और प्रतिष्ठा में ठहरा हुआ तपता है । ( ऐन्द्र्यां बृहत्यां गायति ) इन्द्र [ परमेश्वर ] देवता वाली बृहती [ वेदवाणी ] में वह [ साम ] गाता है । ( ऐन्द्रः वै एषः यज्ञक्रतुः यत् सौत्रामणिः ) इन्द्र देवता वाला ही यह यज्ञ कर्म है जो सौत्रामणी [ सुत्रामा बड़े रक्षक इन्द्र परमेश्वर देवता वाली इष्टि ] है । ( ऐन्द्रायतनः एषः, एतर्हि यः यजते, स्वे एव आयतने एनं तत् प्रीणाति ) इन्द्र देवता वाले आश्रय से युक्त यह [ यजमान ] है जो अब यज्ञ करता है, अपने ही आश्रय में इस [ यजमान ] को तब वह [ इन्द्र ] प्रसन्न करता है ॥ ( अथ कस्मात् संश्यानानि नाम, एतैः वै सामभिः. देवाः इन्द्रम् इन्द्रियेण वीर्येण समश्यन्, तथा एव एतत् यजमानाः एतैः एव सामभिः इन्द्रियेण एव वीर्येण संश्यन्ति ) फिर किसलिये संश्यान [ आपस में मिले हुये साम ज्ञान ] प्रसिद्ध हैं । [ उत्तर ] इन ही सामज्ञानों से विद्वानों ने इन्द्र [ बड़े ऐश्वर्य वाले जीव ] को इन्द्रपन [ ऐश्वर्य ] और वीर्य [ पराक्रम ] के साथ अच्छे प्रकार तीक्ष्ण किया है वैसे ही अब यजमानों को इन ही साम ज्ञानों से ऐश्वर्य और पराक्रम के साथ वे सब प्रकार तीक्ष्ण करते हैं । ( संश्रवसे विश्रवसे सत्यश्रवसे श्रवसे इति सामानि भवन्ति ) संश्रव [ अच्छे प्रकार अन्न, धन और यश ] के लिये, विश्रव [ विविध अन्न धन और यश ] के लिये, सत्यश्रव [ सत्य अन्न धन और यश ] के लिये और श्रव [ सामान्यतः अन्न धन और यश ] के लिये यह सामज्ञान होते हैं । ( एषु एव लोकेषु एनं प्रतिष्ठापयति ) इन ही लोकों में इस [ यजमान ] को वह प्रतिष्ठित करता है । ( चतुः निधनं भवति, चतस्रः वै दिशः, दिक्षु तत् प्रतितिष्ठन्ते ) चार बार निधन [ अन्तिम यज्ञ कर्म ] होता है, चार ही दिशायें हैं, दिशाओं में तब वे प्रतिष्ठा पाते हैं । ( अथो चतुष्पादः पशवः, पशूनाम् आप्त्यै ) फिर चार पांव वाले पशु हैं, पशुओं की प्राप्ति के लिये [ साम है ] ॥ ( बृहत्याम् ) बृहद्विषयायां वेदवाण्याम् ( सौत्रामणिः ) सर्वधातुभ्यो मनिन् ( उ० ४ । १४५ ) सु+त्रैङ् पालने-मनिन् । साऽस्य देवता ( पा० ४ । २ । २४ ) सुत्रामन्—अण्, टिलोपो न, ङीप्, अत्र पुंलिङ्गः । सौत्रामणी । महारक्षकयोग्या भक्तिः । इष्टिविशेषः (ऐन्द्रायतनः) इन्द्रदेवताकस्याश्रययुक्तः (संश्यानानि) सम्+श्यैङ् गतौ-क्तः । संगतानि सामानि ( समश्यन् ) शो तनूकरणे—लङ् । सम्यक् तीक्ष्णीकृतवन्तः ( यजमानाः ) यजमानान् ( संश्यन्ति ) सम्यक् तीक्ष्णीकुर्वन्ति ( संश्रवसे ) श्रु श्रवणे—असुन् । श्रवः=अन्नम्—निघ० २ । ७, धनम्—२ । १० । सम्यग् अन्नस्य धनस्य यशसो वा प्राप्तये ( चतुः ) चतुर्वारम् ( निधनम् ) अन्तिमयज्ञकर्म ( साम्नः ) सामन्
कण्डिका ८ ॥ आख्यायिका—वाजपेय यज्ञ का वर्णन ॥
गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० ५ । क० ८ ४६९ ( तत्, आहुः, यत् एतत् साम गीयते, अथ क्व एतस्य साम्नः उक्थम्, का प्रतिष्ठा ) फिर वे कहते हैं—जो यह साम गाया जाता है, तब कहां इस साम का उक्थ है और क्या प्रतिष्ठा है। ( त्रयः देवाः एकादश इति, आहुः, एतत् वै एतस्य साम्नः उक्थम्, एषा प्रतिष्ठा ) [ उत्तर ] तीन [ तीन बार ] ग्यारह [ तैंतीस ] देवता हैं [ देखो गो० उ० २ । १३ ]—ऐसा कहते हैं, यह ही इस साम का उक्थ है, यही प्रतिष्ठा है। ( त्रयस्त्रिंशं ग्रहं साम्नः प्रतिष्ठायां प्रतिष्ठायै गृह्णाति ) तैंतीस अवयव वाला पात्र वह [ यजमान ] साम से प्रतिष्ठा के लिये, प्रतिष्ठा के लिये ग्रहण करता है ॥ ७ ॥ भावार्थः—बुद्धिमान् चतुर्वेदी ब्रह्मा के वेदज्ञान के उपदेश से मनुष्य चक्रवर्ती राज्य आदि पाकर संसार में प्रतिष्ठा बढ़ाता है ॥ ७ ॥ ॰ कण्डिका ८ ॥ प्रजापतिरकामयत, वाजमाप्नुयाम्, स्वर्गं लोकमिति । स एतं वाजपे- यमपश्यत् । वाजपेयो वा एषः, य .एष तपति, वाजमेतेन यजमानः स्वर्गं लोकमाप्नोति । शुक्रवत्यो ज्योतिष्मत्यः प्रातःसवने भवन्ति, तेजो ब्रह्मवर्चसं ताभिराप्नोति । वाजवत्यो माध्यन्दिने सवने स्वर्गस्य लोकस्य समष्ट्यै । अन्नवत्यो गणवत्यः पशुमत्यस्तृतीयसवने भवन्ति, भूमानं ताभिराप्नोति । सर्वः सप्तदशो भवति, प्रजापतिर्वै सप्तदशः, प्रजापतिमेवाप्नोति । हिरण्यस्रज ऋत्विजो भवन्ति, महस एव तद्रूपं क्रियते । एष मेऽमुष्मिंल्लोके प्रकाशोऽसदिति, ज्योतिर्वै हिरण्यं, ज्योतिषैवेनमन्तर्दधत्याजिं धावन्ति यजमानमुज्जापयन्ति, नाके रोहति, स महसे रोहति, विश्वमहसे रोहति, सर्वमहसे रोहति, मनुष्यलोकादेवैनमन्तर्दधति । देवस्य सवितुः सवं स्वर्गं लोकं वर्षिष्ठं नाकं रोहेयमिति ब्रह्मा रथचक्रं सर्पति, सवितृप्रसूत एवैनं तत् समर्पयति । अथो प्रजापतिर्वै ब्रह्मा, प्रजापतिमेवैनं वज्रादधिप्रसुवति, नाक- स्योज्जित्यै वाजिनां सन्तत्यै । वाजिसामाभिगायति, वाजिमान् भवति । वाजो वै स्वर्गो लोकः, स्वर्गमेव तं लोकं रोहति । विष्णोः शिपिविष्टवतीषु बृहदुत्तमं भवति, स्वर्गमेव तं लोकं रूढ्वा ब्रध्नस्य विष्टपमतिक्रामत्यतिक्रामति ॥ ८ ॥ कण्डिका ८ ॥ आख्यायिका—वाजपेय यज्ञ का वर्णन ॥ ( प्रजापतिः अकामयत, वाजम् आप्नुयाम्, स्वर्गं लोकम् इति ) प्रजापति [ प्रजा- पालक चतुर्वेदी ऋत्विज् ] ने चाहा—मैं वाज [ ज्ञान वा बल ] प्राप्त करूं, और स्वर्गलोक पाऊं । ( सः एतं वाजपेयम् अपश्यत् ) उसने इस वाजपेय [ ज्ञान रक्षक यज्ञ ] को देखा । ( वाजपेयः वै एषः, यः एषः तपति ) वाजपेय ही यह है जो यह तपता है [ हवन —अणु, सामयुक्तस्य (त्रयस्त्रिंशम्) त्रयस्त्रिंशावयवोपेतम् (ग्रहम्) पात्रम् (साम्नः) सामसकाशात् ॥ ८-—( एति ) इयात् । प्राप्नुयात् ( वाजपेयम् ) वज गतौ-—घञ् । अचो यत्
४७० तोपयब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० ५ । क० ७ किया जाता है ] । ( एतेन यजमानः वाजं स्वर्गं लोकम् आप्नोति ) इससे यजमान ज्ञानयुक्त स्वर्गलोक पाता है। ( शुक्रवत्यः ज्योतिष्मत्यः प्रातःसवने भवन्ति ) शुक्रवती [ शुक्र शब्द वाली ऋचायें जैसे १—वायो शुक्रो अयामि ते ‥ ऋग्० ४ । ४७ । १] और ज्योतिष्मती [ ज्योतिः शब्द वाली ऋचायें जैसे २—अस्य देवाः प्रदिशि ज्योतिरस्तु ...... अथर्व० १ । ६ । २ ] प्रातःसवन में होती हैं। ( ताभिः ब्रह्मवर्चसं तेजः आप्नोति ) उन [ ऋचाओं ] से ब्रह्मवर्चस् तेज वह पाता है। ( वाजवत्यः माध्यन्दिने सवने स्वर्गस्य लोकस्य समष्टयै ) वाजवती [ वाज शब्द वाली ऋचायें जैसे ३—मरुतां मन्वे अधि मे ब्रुवन्तु प्रेमं वाजं वाजसाते अवन्तु । ..... अथर्व० ४ । २७ । १ ] माध्यन्दिन सवन में स्वर्ग लोक की प्राप्ति के लिये हैं। ( अन्नवत्यः गणवत्यः पशुमत्यः तृतीयसवने भवन्ति, ताभिः भूमानम् आप्नोति ) अन्नवती [ अन्न शब्द वाली ऋचायें जैसे ४—यत् ते अन्नं भूवस्पत आक्षियति पृथिवीमनु । अथर्व० १० । ५ । ४५ ], गणवती [गण शब्द वाली ऋचायें जैसे ५—मरुतो मा गणैरवन्तु ‥‥‥ अथर्व० १६ । ४५ । १०] और पशुमती [पशु शब्द वाली ऋचायें जैसे ६—सं सं स्रवन्तु पशवः—अथर्व० २ । २६ । ३ ] तृतीय सवन में होती है, उन से वह [ उन सबकी ] बहुतायत पाता है। ( सर्वः सप्तदशः भवति, प्रजापतिः वै सप्त- दशः, प्रजापतिम् एव आप्नोति ) यह सब सत्रह अवयवं [ मन्त्र ] वाला होता है, प्रजापति [ प्रजापालक यज्ञ ही ] सत्रह अवयव वाला है, [ उससे ] प्रजापति [ प्रजापालक परमेश्वर ] को ही वह पाता है। ( हिरण्यस्रजः ऋत्विजः भवन्ति, महसे एव तत् रूपं क्रियते ) सुवर्ण की माला वाले ऋत्विज् होते हैं, महत्त्व के लिये ही वह रूप किया जाता है। ( एषः प्रकाशः मे अमुष्मिन् लोके असत् इति ) यह प्रकाश मेरे लिये उस लोक में होवे—यह प्रयोजन है। ( ज्योतिः वै हिरण्यं, ज्योतिषा एव एनम् अन्तः दधति ) ज्योति ही सुवर्ण है, ज्योति के साथ ही इस [ यजमान ] को भीतर धारण करते हैं, ( आजिं धावन्ति यजमानम् उज्जापयन्ति ) संग्राम को वे धावा करते हैं और यजमान को अच्छे प्रकार जिताते हैं। (सः नाके आरोहति,महसे रोहति,विश्वमहसे रोहति,सर्वमहसे रोहति, मनुष्यलोकात् एव एनम् अन्तः दधति ) वह सुख के लिये चढ़ता है, महत्त्व के लिये चढ़ता है, व्यापक महत्त्व ( पा० ३ । १ । ६७ ) पा रक्षणे वा पा पाने—यत् । ईद्यति ( पा० ६ । ४ । ६५ ) आकारस्य ईकारः, गुणश्च । वाजो विज्ञानं बलं च पेयं रक्षणीयं यस्मिन् स वाजपेयः । विज्ञानस्य बलस्य च रक्षकं यज्ञम् ( वाजम् ) । वाज—अर्शआद्यच् । विज्ञानवन्तम् । बलवन्तम् ( शुक्रवत्यः ) शुक्रशब्दयुक्ताः ऋचः, ( भूमानम् ) पृथ्वादिभ्य इमनिज् वा ( पा० ५ । १ । १२२ ) बहु इमनिच् । बहोर्लोपो भू च बहोः ( पा० ६ । ४ । १५८ ) इकारलोपः, बहोर्भूः । बहुत्वम् ( सप्तदशः ) बहुव्रीहौ संख्येये डजबहुगणात् ( पा० ५ । ४ । ७३ ) सप्तदशन्—डच् । सप्तदशावयवयुक्तः ( हिरण्यस्रजः ) सुवर्णमालायुक्ताः (महसे) महत्त्वाय ( असत् ) भवेत् (अन्तः) मध्ये ( आजिम् ) अज्यतिभ्यां च ( उ० ४ । १३१) अज गतिक्षेपणयोः—इण् । संग्रामम्—निघ० २ । १७ (उज्जापयन्ति) जि जये— णिच् । उत्कृष्टजयं कारयन्ति ( विश्वमहसे ) व्यापकमहत्वाय संसारे महत्त्वाय । ( सवितुः ) प्रेरकस्य परमेश्वरस्य ( सवम् ) सव—अर्शआद्यच् । ऐश्वर्योपेतम् ( वर्षि-
गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० ५ । क० ४ ४७१ के लिये चढ़ता है, सम्पूर्ण महत्त्व के लिये चढ़ता है, मनुष्य लोक से [अलग करके शूरवीरों में]ही इस [यजमान] को भीतर धारण करते हैं। (देवस्य सवितुः सवं स्वर्गं लोके वर्षिष्ठं नाकं रोहे- यम् इति ब्रह्मा रथचक्रं सर्पति, सवितृप्रसूतः एव एनं तत् समर्पयति ) प्रकाशमान प्रेरक परमात्मा के ऐश्वर्य युक्त स्वर्ग लोक और सबसे बड़े सुख में मैं चढूँ-[यह ब्राह्मण वचन बोलकर ] ब्रह्मा रथ के पहिये के पास जाता है, सर्वप्रेरक परमात्मा से प्रेरणा किया हुआ ही वह इस [ यजमान ] को उसे [ रथ ] सौंप देता है। (अथो प्रजापतिः वै ब्रह्मा, प्रजापतिम् एव एनम् वज्रात् नाकस्य उज्जित्यै वाजिनां सन्तत्यै अधि प्रसुवति ) फिर प्रजापति [ प्रजापालक ] ही ब्रह्मा [ चतुर्वेदी ऋत्विज् ] है, प्रजापति [ प्रजापालक ] इस [ यजमान ] को ही वज्र से सुख के लाभ के लिये और ज्ञानियों के विस्तार के लिये वह अधिकार पूर्वक प्रेरणा करता है । ( वाजिसाम अभिगायति, वाजिमान् भवति ) ज्ञानियों का साम वह [ ब्रह्मा ] भली भांति गाता है, ज्ञानी पुरुषों वाला वह [ यजमान ] होता है। (वाजः वै स्वर्गः लोकः, तं स्वर्गं लोकम् एव रोहति ) वाज [ ज्ञान ] ही स्वर्गलोक है, उस स्वर्ग लोक को ही वह [ यजमान ] चढ़ता है। ( विष्णोः शिपिविष्टवतीषु बृहत् उत्तमं भवति, तं स्वर्गं लोकम् एव रूढ्वा ब्रध्नस्य विष्टपम् अतिक्रामति अतिक्रामति ) विष्णु देवता [ सर्वव्यापक परमेश्वर ] की शिपिविष्टवती ऋचाओं में [ शिपिविष्ट, प्रकाशयुक्त परमेश्वर शब्द वाली ऋचाओं में जैसे ७-किमित्ते विष्णो परिचक्ष्यं मूत्......ऋग् ७ । १०० । ६ ] बहुत बड़ा सबसे पिछला [ अन्तिम यज्ञ भाग ] होता है, उस स्वर्ग लोक को ही चढ़कर ब्रघ्न [ लोकों को आकर्षण में बांधने वाले सूर्य ] के लोक को वह [ यजमान ] लांघ जाता है, लांघ जाता है ॥ ८ ॥ भावार्थः-मनुष्य को चाहिये कि महाविद्वानों की सम्मति से ज्ञानपूर्वक पराक्रमी होकर संसार में बड़ी से बड़ी प्रतिष्ठा पावे ॥ ८ ॥ विशेषः-सङ्केतित मन्त्र अर्थ सहित लिखे जाते हैं ॥ १:-शुक्रवती ऋचा-वायो शुक्रो अयामि ते मध्वो अग्रं दिविष्टिषु । आ याहि सोमपीतये स्पार्हो देव नियुत्वता-ऋग् ० ४ । ४७ । १ ॥ ( वायो ) हे वायु ! [ वायु के समान वेग वाले वीर ( शुक्रः ) शुक्र [ शुद्ध-स्वभाव वाला वा वीर्यवान् ] मैं ष्ठम् ) वृद्ध-इष्ठन् । वृद्धतमम् ( सर्पति ) प्राप्नोति ( समर्पयति ) ऋ गतौ-णिच् । सम्प्रददाति ( वाजिनम् ) ज्ञानिनाम् ( वाजिसाम ) वाजिनो ज्ञानिनः परमेश्वरस्य मोक्षज्ञानम् ( वाजिमान् ) ज्ञानिपुरुषैर्युक्तः ( विष्णोः ) व्यापकस्य परमेश्वरस्य ( शिपिविष्टवतीषु ) शिपिविष्टशब्दयुक्तासु । सर्वधातुभ्य इन् ( उ० ४ । ११८ ) शितृ निशाने, छेदने-इन् कित् पुक् च, शिपि + विश प्रवेशने-क्तः । शिपिविष्टोऽस्मीति प्रतिपन्नरश्मिः । शिपयोऽत्र रश्मय उच्यन्ते तैराविष्टो भवति-निरु० ५ । ८ । रश्मि- भिर्युक्तः । प्रकाशयुक्तः परमेश्वरः ( ब्रध्नस्य ) बन्धेर्बंधिबुधौ च ( उ० ३ । १५ ) बन्ध बन्धने-नक्, ब्रधादेशः । लोकानां बन्धकस्य आकर्षणे धारकस्य सूर्यस्य ( विष्टपम् ) विटपविष्टपविशिपोलपाः ( उ० ३ । १४५) विश प्रवेशने-कपनप्रत्ययः तुट् च । भुवनम् । लोकम् ( अतिक्रामति ) अतीत्य गच्छति ॥
४७२ गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० ५ । क० ८ ॥ (दिविष्टिषु) विजय की इच्छाओं में (ते) तेरे लिये (मध्वः) मधु [तत्त्व ज्ञान] का (अग्रम्) प्रधान अंश (अयामि) लाता हूं। (देव) हे देव ! [विजय चाहने वाले शूर] (स्पार्हंः) चाहने योग्य तू (सोमपीतये) सोम [तत्त्वरस] पीने के लिये (नियुत्वता) नित्य मेल वाले व्यवहार के साथ (आ याहि) आ ॥ २—ज्योतिष्मती ऋचा—अस्य देवाः प्रदिशि ज्योतिरस्तु सूर्यो अग्िनरुत वा हिरण्यम् । सपत्ना अस्मदधरे भवन्तूत्तमं नाकमधि रोहयेमम्—अथर्व० १ । ६ । २ ॥ (देवाः) हे व्यवहार जानने वाले महात्माओ ! (अस्य) इसके [मेरे] (प्रदिशि) शासन में (ज्योतिः) तेज, [अर्थात्] (सूर्यः) सूर्य, (अग्निः) अग्नि, (उत वा) और भी (हिरण्यम्) सुवर्ण (अस्तु) होवे । (सपत्नाः) सब वैरी (अस्मत्) हमसे (अधरे) नीचे (भवन्तु) होवें । (उत्तमम्) अति ऊंचे (नाकम्) सुख में (इमम्) इसको [मुझको] (अधि) ऊपर (रोहय = रोहयत) तुम चढ़ाओ ॥ ३--वाजवती ऋचा—मरुतां मन्वे अधि मे ब्रुवन्तु प्रेमं वाजं वाजसाते अवन्तु । आशून्निव सुयमानह्व ऊतये ते नो मुञ्चन्त्वंहसः—अथर्व० ४ । २७ । १ ॥ (मरुताम्) शत्रुनाशक वीरों का (मन्वे) मैं मनन करता हूं। (मे) मेरे लिये (अधि) अनुग्रह से (ब्रुवन्तु) वे बोलें और (इमम्) इस (वाजम्) बल को (वाजसाते) अन्न के सुख वा दान के निमित्त (प्र) अच्छे प्रकार (अवन्तु) तृप्त करें। (आशून् इव) शीघ्रगामी घोड़ों के समान (सुयमान्) उन सुन्दर नियम वालों को (ऊतये) अपनी रक्षा के लिये (अह्वं) मैंने पुकारा है। (ते) वे (नः) हमें (अंहसः) कष्ट से (मुञ्चन्तु) छुड़ावें ॥ ४--अन्नवती ऋचा—यत् ते अन्नं भुवस्पत आक्षियति पृथिवीमनु । तस्य नस्त्वं भुवस्पत संप्रयच्छ प्रजापते--अथर्व० १० । ५ । ४५ ॥ (भुवः पते) हे भूपति [राजन् !] (यत्) जो (ते) तेरा (अन्नम्) अन्न (पृथिवीम् अनु) पृथिवी पर (आक्षियति) रहा करता है। (भुवः पते) हे भूपति ! (प्रजापते) हे प्रजापति [राजन् !] (त्वम्) तू (.नः) हमें (तस्य) उस [अन्न] का (संप्रयच्छ) दान करता रह ॥ ५--गणवती ऋचा—मरुतो मा गणैरवन्तु प्राणायापानायायुषे वर्चस ओजसे तेजसे स्वस्तये सुभूतये स्वाहा—अथर्व० १६ । ४५ । १० ॥ (मरुतः) शूर पुरुष (मा) मुझे (गणैः) सेना दलों के साथ (अवन्तु) बचावें, (प्राणाय) प्राण के लिये, (अपानाय) अपान के लिये, (आयुषे) जीवन के लिये, (वर्चसे) प्रताप के लिये, (ओजसे) पराक्रम के लिये, (तेजसे) तेज के लिये, (स्वस्तये) स्वस्ति [सुन्दर सत्ता] के लिये और (सुभूतये) बड़े ऐश्वर्य्य के लिये (स्वाहा) स्वाहा [सुन्दर वाणी] हो ॥ ६—पशुमती ऋचा—सं सं स्रवन्तु पशवः समश्वाः समु पूरुषाः । सं धान्यस्य या स्फातिः संस्राव्येण हविषा जुहोमि--अथर्व० २ । २६ । ३ ॥ (पशवः) गो आदि पशु (सम्) मिलकर, (अश्वाः) घोड़े (सम्) मिल कर, (उ) और (पूरुषाः) सब पुरुष (सम् सम्) मिल मिल कर (स्रवन्तु) चलें । और (या) जो (धान्यस्य) धान्य [अन्न] की (स्फातिः) बढ़ती है, [वह भी] (सम् सम् स्रवन्तु) मिल मिलकर
कण्डिका ९ ॥
चले । (संस्त्राव्येण) कोमलता से युक्त (हविषा) भक्ति वा अन्न के साथ [ उन सब को ] ( जुहोमि ) मैं ग्रहण करूं ॥ ७—शिपिविष्टवती ऋचा—किमित्ते विष्णो परिचक्ष्यं भूत् प्र यद् ववक्षे शिपि- विष्टो अस्मि । मा वर्पो अस्मदप गूह एतद् यदन्यरूपः समिथे बभूथ-ऋग्० ७ । १०० । ६ ॥ (विष्णो) हे विष्णो ! [ व्यापक परमेश्वर ] ( किम् इत् ) क्या ही [ अद्भुत वर्णन ] ( ते ) तेरा ( परिचक्ष्यं भूत् ) कथन योग्य है, ( यत् ) जो ( प्र ववक्षे ) तू कहता है ( शिपिविष्टः अस्मि ) मैं शिपिविष्ट [ तेज में प्रवेश किये हुये ] हूं— ( अस्मत् ) हम से ( एतत् वर्पः ) इस रूप को ( मा अप गूहः ) तू मत छिपा, ( यत् ) जब ( समिथे ) संग्राम में ( अन्यरूपः ) दूसरे रूप वाला तू ( बभूथ ) होता है ॥ कण्डिका ९ ॥ अथातो अप्तोर्यामाः, प्रजापतिर्वै यत् प्रजा असृजत, ता वै तां ता असृ- जत । ताः सृष्टाः पराच्य एवासन्नोपावर्तन्त । ता एकेन स्तोमेनोपागृह्णात् । ता अत्यरिच्यन्त, ता द्वाभ्यान्ताः सर्वैः । तस्मात् सर्वस्तोमः, ता एकेन पृष्ठेनोपागृ- ह्णात् । ता अत्यरिच्यन्त, ता द्वाभ्यां ताः सर्वैः, तस्मात् सर्वस्पृष्टः । ता अतिरि- क्तोक्थे वारवन्तीयेनावारयन्, तस्मादेषोऽतिरिक्तोक्थवान् भवति । तस्माद्वार- वन्तीयं ता यदाप्त्वाऽव्यच्छत्, अतो वा अप्तोर्यामाः । अथो प्रजावाप्नुरित्याहुः, प्रजानां यमन इतीहैवैतदुक्थं छं, ता नर्हिः प्रजाः स्नायेरंस्तर्हि हैतेन यजते, स एषोऽष्टापृष्ठो भवति, तद्यथान्यस्मिन् यज्ञे विश्वजितः पृष्ठमनुसञ्चरं भवति, कथमेत- देवमत्रेति । पितैष यज्ञानां तद्यथा श्रेष्ठिनि संवशेयुरपि विद्विषाणाः, एवमेवैतच्छ्रष्ठिनो वशैयान्नमन्नस्यानुचर्याय क्षमन्ते ॥ ६ ॥ कण्डिका ९ ॥ आख्यायिका—अप्तोर्याम यज्ञ का वर्णन ॥ ( अथ अतः अप्तोर्यामाः ) अब यहां अप्तोर्याम [ पायी हुई प्रजा के नियम, यज्ञ विशेष—गो० पू० ५ । २३, कहे जाते हैं ] । ( प्रजापतिः वै यत् प्रजाः असृजत, ताः वै तान् ताः असृजत ) प्रजापति [ प्रजापालक परमेश्वर ] ने जब प्रजाओं को सृजा, और ( ताः ) उन [ प्रजाओं ] को ही ( तान् ) वे [ पुरुष ] और ( ताः ) वे [ स्त्रियां ] बनाया । ( ताः सृष्टाः पराच्यः एव आसन्, न उपावर्तन्त ) वे उत्पन्न हुये [ प्रजायें ] पराङ्मुख [ मुँह फेरे हुये ] ही हुये और न लौटे । ( ताः एकेन स्तोमेन उपागृह्णात् ) उनको एक स्तोम से उस [ प्रजापति ] ने ग्रहण किया । ( ताः अत्यरिच्यन्त ) वे प्रजायें और आगे निकल गये । ( ताः द्वाभ्यां ताः सर्वैः, तस्मात् सर्वस्तोमः ) उनको दो [ स्तोम ] से उनको सबसे [ सब स्तोमों से उसने ग्रहण किया ], इसलिये वह सर्वस्तोम ६—(अप्तोः) गो० पू० ५ । २३ । आप्तायाः प्राप्तायाः प्रजायाः ( यामाः ) गो० पू० ५ । २३ । नियमाः ( ताः ) प्रजाः ( तान् ) पुरुषान् ( ताः ) स्त्रियः ( पराच्यः ) परा + अञ्चु गतिपूजनयोः—क्विन्, ङीप् । पराङ्मुख्यः ( उपावर्तन्त ) निवृत्ता अभवन् ( अत्यरिच्यन्त ) रिच वियोजनसंपर्चनयोः, रिचिर् विरेचने च—लङ् ।
४७४ गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० ५ । क० १ [ सब स्तोभ वाला यज्ञ ] है । ( ताः एकेन पृष्ठेन उपागृह्णात् ) उनको एक पृष्ठ [ नाम वाले स्तोत्र ] से उसने ग्रहण किया । ( ताः अत्यरिच्यन्त ) वे और आगे निकल गये । ( ताः द्वाभ्यां ताः सर्वैः, तस्मात् सर्वस्पृष्टः ) उनको दो [ पृष्ठ ] से, उनको सबों से [ सब पृष्ठों से उसने ग्रहण किया ], इसलिये वह सर्वस्पृष्ट [ सर्वस्पृष्टों वा पृष्ठों वाला यज्ञ ] है । ( ताः अतिरिक्तोक्थे वारवन्तीयेन अवारयन्, तस्मात् एषः अतिरिक्तोक्थवान् भवति ) उनको अतिरिक्त उक्थ [ औरों से अधिक स्तोत्र वाले यज्ञ ] में वारवन्तीय [ रोकने के कर्म सेचने वाले स्तोत्र ] से उसने रोका, इसलिये वह [ यज्ञ ] और से अधिक स्तोत्र वाला होता है । ( तस्मात् यत् वारवन्तीयं ताः आप्त्वा अयच्छत् अतः वै अतोर्यामाः ) इसलिये जब वारवन्तीय [ स्तोत्र ] से प्राप्त करके [ प्रजाओं ] को उसने नियम में किया, इस- लिये वे अप्तोर्याम [ प्राप्त हुये प्रजा के नियम वाले यज्ञ ] हैं । ( अथो प्रजावाप्नुः इति आहुः, प्रजानां यमनः इति, इह एव एतत् उक्थम् ) फिर वह [ प्रजापति ] प्रजाओं का प्राप्त करने वाला और प्रजाओं का नियम में करने वाला है—ऐसा कहते हैं—इसलिये यहाँ ही यह उक्थ [ अप्तोर्याम ] है । ( ताः प्रजाः बर्हिः स्नायेरन्, तर्हि ह एतेन यजते, सः एषः अष्टापृष्ठः भवति ) उन प्रजाओं ने बर्हि [ वृद्धिकारक कर्म वा कुश तृण ] को शुद्ध किया, तब ही इस [ बर्हि ] से वह यज्ञ करता है, वह ही यह [ यज्ञ ] आठ पृष्ठों [ स्तोत्रों ] वाला होता है । ( तत् यथा अन्यस्मिन् यज्ञे विश्वजितः अनुसञ्चरं पृष्ठं भवति, कथम् एतत् एवम् अत्र इति ) सो जैसे दूसरे यज्ञ में विश्वजित् के पीछे चलने वाला पृष्ठ होता है, कैसे यह [ पृष्ठ ] ऐसा यहाँ है [ उत्तर ] ( एषः यज्ञानां पिता ) यह [ विश्वजित् ] यज्ञों का पिता है । [ देखो गो० पू० ४ । १४ ] ( तत् यथा श्रेष्ठिनि अपि विद्विषाणाः संवशेयुः, एवम् एतत् श्रेष्ठिनः वशेयान्नम् अन्नस्य आनुचर्य्याय क्षमन्ते ) सो जिस प्रकार से श्रेष्ठी [ श्रेष्ठ कर्म वाले महाधनी सेठ ] में ही द्वेष छोड़े हुये पुरुष कामना करते हैं, ऐसे ही यह है, श्रेष्ठी पुरुष के कामना योग्य अन्न को अन्न के अनुचरण [ प्राप्ति के लिये ] सहते हैं ॥ ६ ॥ अतिक्रान्ताः पृथग्भूता अभवन् ( वारवन्तीयेन ) वृञ् वरणे—घञ् । हसिमृगृण्० ( उ० ३ । ८६ ) वन संभक्तौ—तन् । वारवन्त—छ । निवारणसेवनीयेन यज्ञेन ( अयच्छत् ) यम नियमे—लङ् । नियमितवान् ( प्रजावाप्नुः ) दाभाभ्यां नुः ( उ० ३ । ३२ ) प्रजा+अव+आप्लृ लम्भने—नुः । प्रजानां लम्भकः प्रापकः ( यमनः ) यम नियमे—ल्युट् । नियामकः ( स्नायेरन् ) ष्णै वेष्टनशोभाशौचेषु— भ्वा० वि० लि०, सस्य शः । स्नायेयुः । शोधयेयुः ( अनुसञ्चरम् ) पश्चाद्गमनशीलम् ( श्रेष्ठिनि ) श्रेष्ठं कर्म अस्य—इनिः । श्रेष्ठकर्मकारके महाधनिके ( संवशेयुः ) वश कान्तौ—वि० लि० । सम्यक् कामनां कुर्युः ( विद्विषाणाः ) द्विष अप्रीतौ-- शानच् । विगतद्वेषाः ( वशेयान्नम् ) ढश्छन्दसि ( पा० ४ । ४ । १०६ ) वशा--ढप्रत्ययो बाहुलकात् । कामनार्हमन्नम् ( आनुचर्य्याय ) अनुचर--ष्यञ् । अनुचरणाय । प्रापणाय ( क्षमन्ते ) सहन्ते । लभन्ते ॥
कण्डिका १० ॥
गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० ५ । क० १० ४७५ भावार्थः-जैसे प्रजापति परमात्मा प्रजाओं और अन्नों को उत्पन्न करके सबको अपने वश में रखता है, वैसे ही प्रजापालक वीर पुरुष सब लोगों को अन्न दान आदि से सन्तुष्ट करके परस्पर अनुकूल रक्खे ॥ ६ ॥ कण्डिका १० ॥ तद्यथैवादोऽह्न उक्थानामाग्नेयं प्रथमं भवति, एवमेवैतदत्राप्याग्नेयं प्रथमं भवति । ऐन्द्रे वाव तत्रोत्तरे ऐन्द्रे वा एते ऐन्द्रावैष्णवमच्छावाकस्योक्थं भवति । चतुराहावान्यतिरिक्तोक्थानि भवन्ति, चतुष्टया वै पशवः, अथो चतुष्पादः पशवः, पशूनामाप्त्यै । त एते स्तोत्रियानुरूपास्तृचा अर्द्धर्चशस्याः । प्रतिष्ठा वा अर्द्धर्चः प्रतिष्ठित्यै एव । अथैतेषामेवाश्विनानां सूक्तानां द्वे द्वे समाहावमेकैकमहरहः शंसति, अश्विनौ वै देवानां भिषजौ, तस्मादाश्विनानि सूक्तानि शꣳसन्ति, तदश्विभ्यां प्रददुरिदं भिषज्यतमिति । क्षेत्रवत्यः परिधानीया भवन्ति, यत्र हतस्तत्प्रजा अशनायन्तीः पिपासन्तीः संरुद्धा स्थिता आसन्, ता दीना एताभिर्यथाक्षेत्रं पाययाञ्चकार, तर्पयाञ्चकार, अथो इयं वै क्षेत्रं पृथिवी, अस्यामदीनायामन्ततः प्रतिष्ठास्यामहा इति । त्रिष्टुभो याज्या भवन्ति, यत्र हतस्तत्प्रजा अशनायन्तीः पिपासन्तीः संरुद्धा स्थिता बभूवुः, ता हैवैना एताभिर्यथौकसं व्यवसाययाञ्चकार, तस्मादेता याज्या भवन्ति तस्मादेता याज्या भवन्ति ॥ १० ॥ कण्डिका १० ॥ अप्तोर्याम यज्ञ का अधिक वर्णन ॥ ( तत् यथा एव अह्नः उक्थानाम् अदः आग्नेयं प्रथमं भवति, एवम् एव एतत् अत्र अपि आग्नेयं प्रथमं भवति ) सो जैसे ही दिन के [ यज्ञों के ] उक्थों में अब अग्नि देवता वाला स्तोत्र पहिले होता है, वैसे ही यहां [ अप्तोर्याम में—क० ६ ] भी यह अग्नि देवता वाला स्तोत्र पहिले होता है । ( तत्र ऐन्द्रे वाव, उत्तरे ऐन्द्रे वै एते ) वहां [ उक्थों में ] दो इन्द्र देवता वाले स्तोत्र ही हैं और पिछले [ अप्तोर्याम ] में दो इन्द्र देवता वाले ही यह [ स्तोत्र ] हैं । ( अच्छावाकस्य ऐन्द्रावैष्णवम् उक्थं भवति ) अच्छावाक ऋत्विज् का इन्द्र और विष्णु देवता वाला उक्थ होता है । ( चतुराहावानि अतिरिक्तोक्थानि भवन्ति, चतुष्टयाः वै पशवः, अथो चतुष्पादः पशवः, पशूनाम् आप्त्यै ) चार आवाहन मन्त्र वाले अतिरिक्त उक्थ [ औरों से अधिक मन्त्र वाले उक्थ ] हैं, चार अङ्ग वाले ही पशु यज्ञ हैं, फिर चार पांव वाले पशु हैं, पशुओं की प्राप्ति के लिये [ यह यज्ञ है ] । ( ते एते स्तोत्रियानुरूपाः तृचाः अर्धर्चशस्याः ) सो यह ही स्तोत्रिय और अनुरूप वाले तृच [ सामवेद उत्तराचिक देखो ] आधी आधी ऋचाओं में बोलने योग्य हैं । ( प्रतिष्ठा वै अर्धर्चः, प्रतिष्ठित्यै एव ) प्रतिष्ठा [ स्थिति समान ] ही आधी ऋचा है, प्रतिष्ठा के लिये ही [ यह विधान है ] । ( अथ एतेषाम् एव आश्विनानां सूक्तानां द्वे द्वे, एकैकं संमाहावम् १०—( अदः ) इदानीम् ( आग्नेयम् ) अग्नेर्ढक् ( पा० ४ । २ । ३३ ) अग्नि—ढक् । अग्निदेवताकम् ( चतुराहावानि ) चतुरावाहनयुक्तानि ( चतुष्टयाः ) चतुर्—तयप् । चतुरवयवाः ( पशवः ) पशुनामकयज्ञाः । गवादयः ( समाहावम् )
४७६ गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० ५। क० ११
अहरहः शंसति ) फिर इन ही आश्विन [ अश्वि देवता वाले ] सूक्तों के दो दो [ स्तोत्र ] हैं, एक एक समाहाव [ आवाहन स्तोत्र ] को दिन दिन वह बोलता है। (अश्विनौ वै देवानां भिषजौ, तस्मात् आश्विनानि सूक्तानि शंसन्ति ) दोनों अश्वी [ दिन रात ] ही विद्वानों के दो वैद्य हैं, इसलिये अश्वियों के सूक्तों को वे बोलते हैं। ( तत् अश्विभ्यां प्रददुः, इदं भिषज्यतम् इति ) वह [ यज्ञकर्म दोनों अश्वियों को उन्होंने दिया--इसकी तुम दोनों ओषधि करो। ( क्षेत्रवत्यः परिधानीयाः भवन्ति ) क्षेत्रवती [ क्षेत्र शब्द वाली ऋचायें जैसे-शं नो देवः सविता......... अथर्व १६ । १० । १० ] परिधानीया [ अन्तिम इष्टि ] होती हैं। ( यत्र हतः तत् प्रजाः अशनायन्तीः पिपासन्तीः संरुद्धाः स्थिता आसन् ) जहां वह [ यज्ञ ] मारा गया [ परिधानीय स्तोत्र ठीक न हुआ ], वहां प्रजायें भूख की मारी और प्यास की मारी रुकी हुई स्थित होती हैं। ( ताः दीनाः एताभिः यथाक्षेत्रं पाययाञ्चकार तर्पयाञ्चकार ) उन दीन [ दुखिया प्रजाओं ] को इन [ परिधानीया ऋचाओं ] से खेत के अनुसार उस [ यजमान ] ने जलपान कराया और तृप्त किया। (अथो इयं वै पृथिवी क्षेत्रम्, अस्याम् अदीनायाम् अन्ततः प्रतिष्ठास्यामहै इति ) फिर यह ही पृथिवी खेत है, इस अदीना [ बलवती और उपजाऊ पृथिवी ] पर अन्त में [ पुरुषार्थ के पीछे ] हम प्रतिष्ठा पावेंगे। ( त्रिष्टुभः याज्याः भवन्ति ) त्रिष्टुप् [ तीन कर्म, उपासना, ज्ञान के सहारे वाली, वा त्रिष्टुप् छन्द वाली स्तुतियां ] याज्या [ यज्ञ करने योग्य ] होती हैं। (यत्र हतः, तत् प्रजाः अशनायन्तीः पिपासन्तीः संरुद्धाः स्थिताः बभूवुः ) जहां वह [ यज्ञ ] मारा गया है [ याज्या स्तोत्र ठीक नहीं होते ], वहां प्रजायें भूख की मारी, प्यास की मारी और रुकी हुई स्थित होती हैं। (ताः ह एव एनाः एताभिः यथौकसं व्यव- साययाञ्चकार ) उन ही इन [ प्रजाओं ] को इन [ याज्या स्तुतियों ] से घर घर के अनुसार उस [ यजमान ] ने उद्यमी बनाया। (तस्मात् एताः याज्याः भवन्ति, तस्मात् एताः याज्याः भवन्ति ) इसलिये यह [ प्रजायें ] याज्या [ पूजने योग्य ] होती हैं इस- लिये यह [ प्रजायें ] याज्या [ पूजनीया ] होती हैं ॥ १० ॥ भावार्थः-विचारशील पुरुष ही अपनी प्रजाओं अर्थात् सन्तानों और अन्य लोगों को उत्तम उत्तम उपायों द्वारा भूख प्यास से बचाकर सुखी रखते हैं ॥ १० ॥ विशेषः-सङ्केतित मन्त्र अर्थ सहित दिये जाते हैं। १- आश्विन सूक्त--इमा उ वां दिविष्ठ्य......। देखो गो० उ० ५ । ३ । विशेषः ४ । २-क्षेत्रवती ऋचा--शं नो॑ दे॒वः स॑वि॒ता त्रा॒य॑माणः शं नो॑ भवन्तू॒षसो॑ वि॒भाती॑ः। शं नः॑ प॒र्जन्यो॑ भवतु प्र॒जाभ्यः॑ शं नः॑ क्षे॒त्रस्य॒ पति॑रस्तु श॒म्भुः-अथर्व० आवाहनमन्त्रयुक्तम् ( क्षेत्रवत्यः ) क्षेत्रपदयुक्ताः ( अशनाय तीः ) अशन-क्यच् शत्, ङीप् । अशनायन्त्यः । बुभुक्षिताः ( पिपासन्तीः ) पिपासन्त्यः । पिपासिताः ( दीनाः ) दुःखिताः ( पाययाञ्चकार ) जलपानं कारितवान् ( तर्पयाञ्चकार ) तर्पितवान् ( अदीनायाम् ) बलवत्याम् । शस्योत्पादिकायाम् ( प्रतिष्ठास्यामहै ) प्रतिष्ठिताः भविष्यामः ( व्यवसाययाञ्चकार ) व्यवसायमुद्योगं कारितवान् ॥
कण्डिका ११ ॥
गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० ५ । क० ११ ४७७ १६ । १० । १० ॥ (देवः) प्रकाशमान (सविता) लोकों का चलाने वाला सूर्य (त्राय- माणः) रक्षा करता हुआ (नः) हमें (शम्) सुखदायक हो, (विभातीः) जगमगाती हुयी (उषसः) प्रभात वेलायें (नः) हमें (शम्) सुखदायक (भवन्तु) हों। (पर्जन्यः) सींचने वाला मेघ (नः) हमें और (प्रजाभ्यः) प्रजाओं के लिये (शम्) सुख- दायक (भवतु) हो, (शंभुः) मङ्गल दाता (क्षेत्रस्य) खेत का (पतिः) स्वामी (नः) हमें (शम्) सुखदायक (अस्तु) हो ॥ कण्डिका ११ ॥ अथातो नैकाहिकं श्वःस्तोत्रियमद्यस्तोत्रियस्थानुरूपं कुर्वन्ति, प्रातःसवने- ऽहीनमेव तत्सन्तन्वन्त्यहीनस्य सन्तत्यै । तद्यथा ह वा एकाहःसुत एवमहीनः सुतः, तद्यथैकाहस्य सुतस्य सवनानि सन्तिष्ठमानानि यन्ति, एवमहीनस्य सुतस्याहानि सन्तिष्ठमानानि यन्ति । तद्यच्छ्वःस्तोत्रियमद्यस्तोत्रियस्थानुरूपं कुर्वन्ति, प्रातःसवनेऽहरेव तदह्नो रूपं कुर्वन्ति । अपरेणैव तदह्नापरमहरम्यार- भन्ते, तत्तथा न माध्यन्दिने सवने । त्रीवै पृष्ठानि तानि तस्मिन्नेवावस्थितानि भवन्ति । एतेनैव विधिना तृतीयसवने न श्वःस्तोत्रियमद्यस्तोत्रियस्थानुरूपं कुर्वन्ति ॥ ११ ॥ कण्डिका ११ ॥ अनैकाहिक वा अहीन अर्थात् अनेक दिनों में होने वाले यज्ञ का वर्णन ॥ (अथ अतः अनैकाहिकम्) अब यहां अनैकाहिक [वा अहीन अर्थात् अनेक दिनों में होने वाला वा सम्पूर्ण अङ्ग वाला यज्ञ कर्म कहा जाता है ] । (श्वःस्तोत्रियम् अद्यस्तो- त्रियस्य अनुरूपं कुर्वन्ति) आगामी दिन में होने वाले स्तोत्रिय [ स्तोत्र ] को आज होने वाले स्तोत्रिय के अनुरूप [छन्द, देवता आदि से सदृश ] करते हैं । (प्रातःसवने अहीनम् एव तत् अहीनस्य सन्तत्यै सन्तन्वन्ति) प्रातःसवन में अहीन [ बहुत दिनों में होने वाले वा सम्पूर्ण अङ्ग वाले यज्ञ ] को ही तब अहीन के फैलाव के लिये फैलाते हैं [ क० १५ ] । (तत् यथा ह वै एकाहः सुतः एवम् अहीनः सुतः) सो जैसे ही एकाह [ एक दिन में होने वाला यज्ञ ] निचोड़ा जाता है, वैसे ही अहीन [ बहुत दिन में होने वाला यज्ञ ] निचोड़ा जाता है । (तत् यथा एकाहस्य सुतस्य सवनानि सन्तिष्ठमानानि यन्ति, एवम् अहीनस्य सुतस्य अहानि सन्तिष्ठमानानि यन्ति) सो जैसे एकाह यज्ञ के निचोड़े हुए सोम के ११--(अनैकाहिकम्) कालाट्ठञ् (पा० ४।३।११) एकाह्-ठञ्, नञ्समासः । अनेकदिनवर्त्तमानं यज्ञकर्म । अहीननामकयज्ञः (श्वःस्तोत्रियम्) आगामिदिने क्रियमाणं स्तोत्रम् (अद्यस्तोत्रियस्य) अस्मिन् दिने क्रियमाणस्य स्तोत्रस्य (अनुरूपम्) छन्दोदेवतादिना सदृशम् (अहीनम्) गो० ब्रा० उ० २।८। अहर्गणसाध्यसुत्याकम् । बहुदिनेषु क्रियमाणं यज्ञविशेषम् । सम्पूर्णाङ्ग- यज्ञम् (सन्तन्वन्ति) सम्यग् विस्तारयन्ति । अनुतिष्ठन्ति (एकाहः) राजाह- सखिभ्यष्टच् (पा० ५।४।६१) एकाहन्-टच् । उत्तमेकास्याञ्च (पा० ५।
कण्डिका १२ ॥
४७८ गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० ५ । क० १२ ॥ [ तीन ] सवन साथ साथ वर्तमान होकर चलते हैं, वैसे ही अहीन यज्ञ के निचोड़े हुये सोम के दिन [ दिनों में होने वाले यज्ञ कर्म ] साथ साथ वर्तमान होकर चलते हैं । ( तत् यत् श्वःस्तोत्रियम् अद्यस्तोत्रियस्य अनुरूपं कुर्वन्ति, प्रातःसवने अहः एव तत् अह्रः रूपं कुर्वन्ति ) सो जब आगामी दिन में होने वाले स्तोत्रिय को आज होने वाले स्तोत्रिय के अनुरूप [ समान रूप ] करते हैं, प्रातः सवन में दिन को ही तब दिन के अनुरूप करते हैं । ( अपरेण एव अह्रा तत् अपरम् अहः अभ्यारभन्ते, तत् तथा न माध्यन्दिने सवने ) दूसरे ही दिन के साथ तब दूसरे दिन को आरम्भ करते हैं, सो वैसा माध्यन्दिन सवन में नहीं [ आरम्भ करते ] । ( श्रीः वै पृष्ठानि तानि तस्मिन् एव अवस्थितानि भवन्ति ) श्री ही पृष्ठ [ स्तोत्र ] हैं, वे [ पृष्ठ ] उस [ माध्यन्दिन सवन ] में ही ठहरे हुये हैं । ( एतेन एव विधिना तृतीयसवने श्वःस्तोत्रियम् अद्यस्तोत्रियस्य अनुरूपं न कुर्वन्ति ) इस ही विधि से तीसरे सवन में आगामी दिन में होने वाले स्तोत्रिय को आज होने वाले स्तोत्रिय के अनुरूप नहीं करते हैं ॥ ११ ॥ भावार्थः—यज्ञों को यथा विधान करना चाहिये ॥ ११ ॥ विशेषः १—इस कण्डिका को मिलाओ—ऐ० ब्रा० ६ । १७ ॥ विशेषः २—( प्रातःसवने ऽहीनमेव तत् सन्तन्वन्त्यहीनस्य सन्तत्यै ) ऐसा पाठ राजेन्द्रलाल मित्र एशियाटिक सोसैट़ी के पुस्तक से और आगे वाली कण्डिका १५ के पाठ से ( प्रातःसवनेऽहीनस्य सन्तत्यै ) जीवानन्द विद्यासागर के पाठ के स्थान पर शुद्ध किया है । ( तद्यश्वः ) के स्थान पर ( तद्यच्छ्वः ) ऐतरेय ब्राह्मण में है ॥ कण्डिका १२ ॥ अथात आरम्भणीया एव, ऋजुनीती नो वरुण इति मैत्रावरुणस्य । मित्रो नयतु विद्वानिति, प्रणेता वा एष होत्रकाणां, यन्मैत्रावरुणः, तस्मादेषा प्रणेत्रिमती [ प्रणेतृमती ] भवति, इन्द्रं वो विश्वतस्परीति ब्राह्मणाच्छंसिनः । हवामहे जनेभ्य इति, इन्द्रमेवैतयाहरहर्निंग्र्हीयन्ते, न हैवेषां विह्वेडैऽन्य इन्द्रं वृङ्क्ते, यत्रैवं विद्वान् ब्राह्मणाच्छंस्येतामहरहः शंसति । यत् सोम आ सुते नर इत्यच्छावाकस्य । इन्द्राग्नी अजोहवुरितीन्द्राग्नी एवैतयाहरहर्निंग्र्हीयन्ते, न हैवैषां विह्वेडैऽन्य इन्द्राग्नी वृङ्क्ते । यत्रैवं विद्वानच्छावाक एताम् अहरहः शंसति, ता वा एताः स्वर्गस्य लोकस्य नावः सन्तारण्यः । स्वर्गमेवैताभिर्लोकमनुसञ्चरन्ति ॥ १२ ॥ कण्डिका १२ ॥ अहीन [ अहर्गण यज्ञ ] में आरम्भणीया ऋचाओं का वर्णन ॥ ( अथ अतः आरम्भणीयाः एव ) अब यहां आरम्भणीया [ अहर्गण यज्ञ की पहिली ऋचायें ] ही हैं । ( ऋजुनीती नो वरुणः इति मैत्रावरुणस्य ) ऋजुनीती नो ४।६० ) अहन् इत्यस्य अह्र इत्ययमादेशो न । एकस्मिन् दिने क्रियमाणो यज्ञः ( सन्तिष्ठमानानि ) सहवर्तमानानि ( यन्ति ) गच्छन्ति । अनुष्ठीयन्ते ॥
ब्राह्मणाच्छंसिनः) इन्द्रं वो विश्वतस्परि ... ... २, अथर्व० २० । ३६ । १ । यह
गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० ५ । क० १२ ॥ ४७६ वरुणः ... १ ऋ० १ । ६० । १ । यह ऋचा मैत्रावरुण ऋत्विज् की [ आरम्भणीया ] है । (मित्रो नयतु विद्वान् इति, एषः वै होत्रकाणां प्रणेता, यत् मैत्रावरुणः ) मित्रो नयतु विद्वान् [ यह उसी मन्त्र का दूसरा पाद है, उसमें नयतु ले चले—यह पद णीञ् = ले चलना, धातु से है ] इससे यह होता लोगों का प्रणेता [ प्रवर्त्तक, ले चलने वाला ] है, जो मैत्रावरुण ऋत्विज् है । ( तस्मात् एषा प्रणेतृमती [ प्रणेतृमती ] भवति ) इसलिये यह ऋचा प्रणेतृ [ ले चलने वाले शब्द ] वाली है । (इन्द्र वो विश्वतस्परि इति ब्राह्मणाच्छंसिनः) इन्द्रं वो विश्वतस्परि ... ... २, अथर्व० २० । ३६ । १ । यह ब्राह्मणाच्छंसी की [ आरम्भणीया ] है । (हवामहे जनेभ्यः इति, इन्द्रम् एव एतया अहरहः निह्व॑यन्ते ) हवामहे जनेभ्यः [ यह उसी मन्त्र का दूसरा पाद है, उसमें हवामहे— हम बुलाते हैं—यह पद है ] इस ऋचा से इन्द्र को ही दिन दिन वे बुलाते हैं । (एषां ह एव विह्ववे अन्यः इन्द्रं न वृङ्क्ते, यत्र एवं विद्वान् ब्राह्मणाच्छंसी एताम् अहरहः शंसति ) इन [ यजमानों ] के विशेष आवाहन में दूसरा कोई इन्द्र को नहीं रोकता है, जहां ऐसा विद्वान् ब्राह्मणाच्छंसी इस ऋचा को दिन दिन बोलता है । ( यत् सोम आ सुते नरः इति अच्छावाकस्य ) यत् सोम आ सुते नरः ... ३, ऋ० ७ । ६४ । १० । यह अच्छावाक ऋत्विज् की [ आरम्भणीया ] है । (इन्द्राग्नी आजोहवुः इति, इन्द्राग्नी एव एतया अहरहः निह्व॑यन्ते ) इन्द्राग्नी आजोहवुः [ यह उस मन्त्र का दूसरा पाद है उसमें आजोहवुः—वे बुलाते हैं—यह पद है ] इससे इन्द्र और अग्नि को ही इस ऋचा से दिन दिन वे बुलाते रहते हैं । (एषां ह एव विहवे इन्द्राग्नी न वृङ्क्ते यत्र एवं विद्वान् अच्छावाकः एताम् अहरहः शंसति ) इन ही [ यजमानों ] के विशेष आवाहन में दूसरा कोई इन्द्र और अग्नि को नहीं रोकता है, जहां ऐसा विद्वान् अच्छावाक इस [ ऋचा ] को दिन दिन बोलता है । (ताः वै एताः स्वर्गस्य लोकस्य सन्तारण्यः नावः ) वे ही यह [ तीनों ऋचायें ] स्वर्ग लोक की तरा देने वाली नावें हैं । (स्वर्गम् एव लोकम् एताभिः अनुसञ्चरन्ति ) स्वर्ग लोक को ही इन [ ऋचाओं ] से वे निरन्तर चले जाते हैं ॥ १२ ॥
१२—( आरम्भणीयाः) अहर्गणे आरब्धुमर्हाः ऋचः (ऋजुनीती ) सुपां सुलुक्० (पा० ७ । १ । ३६ ) तृतीयायाः पूर्वसवर्णदीर्घः । ऋजुनीत्या । सरलनयनेन ( नः ) अस्मान् (वरुणः ) श्रेष्ठः (मित्रः) सर्वोपकारी (नयतु ) गमयतु ( प्रणेता ) प्रवर्त्तकः (प्रणेतृमती ) प्रणेतृवाचकशब्दवती (इन्द्रम् ) परमैश्वर्य्य- वन्तं परमात्मानम् (वः ) युष्मभ्यम् (विश्वतः) सर्वेभ्यः (परि ) सर्वतः (हवा- महे ) आह्वयामः (जनेभ्यः ) प्राणिनां हिताय (निह्व॑यन्ते ) नितराम् आह्वयन्ते (एषाम् ) यजमानानाम् (विहवे ) विशेषाह्वाने (वृङ्क्ते ) वर्जयति (अजो- हवुः ) आहूतवन्तः । आह्वयन्ते ( सन्तारण्यः) सम्पारण्यः । सम्यक् पारण्यः (अनुसञ्चरन्ति ) निरन्तरं गच्छन्ति ॥
कण्डिका १३ ॥
४८० गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० ५ । क० १३ भावार्थः—जहां यज्ञ में ऋत्विज् लोग मन्त्रों का प्रयोग ठीक२ करते हैं, वहां यजमान परमानन्द पाते हैं ॥ १२ ॥ विशेषः १—इस कण्डिका को मिलाओ—ऐ० ब्रा० ६ । ६ ॥ विशेषः २--शुद्धिपत्र नीचे है । अशुद्ध शुद्व प्रमाण प्रणेत्रिमंती प्रणेतृमती ऐ० ब्रा० ६ । ६ आ सते आ सुते वेद और ऐ० ब्रा० अच्छावाकस्येता अच्छावाक एता ऐ० ब्रा० ६ । ६ विशेषः ३—प्रतीक वाले मन्त्र अर्थ सहित लिखे जाते हैं ॥ १--ऋजुनीती नो वरुणो मित्रो नयतु विद्वान् । अर्यमा देवैः सजोषाः ॰॰ ऋ० १ । ६० । १ ॥ (वरुणः) श्रेष्ठ गुण वाला (मित्रः) सबका उपकारी, (विद्वान्), जानकार, (अर्यमा) न्यायकारी पुरुष, (देवैः) दिव्य गुण वाले विद्वानों से (सजोषाः) समान प्रीति करता हुआ (नः) हमको (ऋजुनीती) सीधी नीति से (नयतु) ले चले ॥ २—इन्द्रं वो विश्वतस्परि हवामहे जनेभ्यः । अस्माकमस्तु केवल.—अथर्व० २० । ३९ । १, ऋ० १ । ७ । १०, साम० उ० ८ । १ । २ । [हे मनुष्यो !] (इन्द्रम्) इन्द्र [बड़े ऐश्वर्य वाले परमेश्वर] को (वः) तुम्हारे लिये और (विश्वतः जनेभ्यः) सब प्राणियों के लिये (परि) सब प्रकार (हवामहे) हम बुलाते हैं वह (अस्माकम्) हमारा (केवलः) सेवनीय (अस्तु) हो ॥ ३—यत्सोम आ सुते नर इन्द्राग्नी अजोहवुः । सप्तीवन्ता सपर्यवः—ऋ० ७ । ६४ । १० ॥ (यत्) जब (सोमे सुते) सोम [तत्त्वरस] निचोड़ने पर (सप- र्यवः) सत्कार करने वाले (नरः) नर [नेता लोग] (सप्तीवन्ता) उत्तम घोड़ों वाले (इन्द्राग्नी) इन्द्र और अग्नि [सूर्य और अग्नि के समान राजा और मन्त्री] को (आ अजोहवुः) बुलाते हैं [तब वे दोनों सहायता करते हैं] ॥ कण्डिका १३ ॥ अथातः परिधानीया एव, ते स्याम देव वरुणेति, मैत्रावरुणस्य । इषं स्वश्च धीमहीति, अयं वै लोक इषमित्यसौ वै लोकः स्वरिति, उभावेवैनौ तौ लोकाञ्चारभते । व्यन्तरिक्षमतिरदिति ब्राह्मणाच्छंसिनो विवृतृचम् । स्वर्गमेवै- ताभिर्लोकं विवृणोति । मदे सोमस्य रोचनेन्द्रो यदभिनद्व लमिति, सिषासवो ह वा एते यद् दीक्षिताः, तस्मादेषा वलवती भवति । उदगा आजदङ्गिरोभ्य आवि- ष्कृण्वन् गुहासतीः । अवाञ्चं नुनुदे वलमिति, सनिमेतेभ्य एतयावरुन्धे । इन्द्रेण रोचना दिवो दृढानि बृंहितानि च । स्थिराणि न पराणुद इति, स्वर्गमेवैतयाहर-
कण्डिका १३ ॥ अहीन वा अहर्गण यज्ञ में परिधानीया अर्थात्
गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० ५ । क० १३ ४८१ हलोंकमवरुन्धे । आहं सरस्वतीवतोरित्यच्छावाकस्य । इन्द्राग्न्योरवो वृण इति, एतद् ह वा इन्द्राग्न्योः प्रियं धाम यद्भागिति, प्रियेणैवेनो तद्धाना समद्धंयति । प्रियेणैव धाम्ना समृद्धयते, य एवं वेद ॥ १३ ॥ कण्डिका १३ ॥ अहीन वा अहर्गण यज्ञ में परिधानीया अर्थात् समाप्ति वाली ऋचाओं का वर्णन ॥ ( अथ अतः परिधानीयाः एव ) अब यहाँ परिधानीया ही [ समाप्ति वाली ऋचायें कही जाती हैं ] । ( ते स्याम देव वरुण इति, मैत्रावरुणस्य ) ते स्याम देव वरुण ॰॰॰॰॰१, ऋग्० ७ । ६६ । ६, यह मैत्रावरुण की [ परिधानीया ] है । ( इषं स्वश्च धीमहि इति, अयं वै लोकः इषम् इति, असौ वै लोकः स्वः इति, उभो एव एनौ तौ लोकात् च आरभते ) इषं स्वश्च धीमहि--अन्न और सुख को हम धारण करें [ यह उस मन्त्र का तीसरा पाद है ], यह ही लोक अन्न है, वह ही लोक सुख है, इससे दोनों ही उन [ दो लोकों ] को इस लोक से वह अवश्य पाता है । ( व्यन्तरिक्षमतिरत् इति ब्राह्मणाच्छंसिनःविवृतृचम् ) व्यन्तरिक्षम् अतिरत् ॰॰॰॰॰अथर्व० २० । २८ । १-३, यह ब्राह्मणाच्छंसी का विवृतृच् [ विवृ-खोलना, शब्द वाला तीन मन्त्रों का समूह, परि- धानीया ] है । ( स्वर्गम् एव लोकम् एताभिः विवृणोति ) स्वर्ग ही लोक को इन [ तीन ऋचाओं ] से वह खोल देता है [ विवृ शब्द का अर्थ--खोलना-है, मन्त्र के वि शब्द से विवृ-खोलना-लिया है ] ( मदे सोमस्य रोचना, इन्द्रो यदभिनद् वलम् इति, सिषा- सवः ह वै एते यत् दीक्षिताः, तस्मात् एषा बलवती भवति ) मदे सोमस्य रोचना, इन्द्रः यन् अभिनद् वलम् [ तृच के पहिले मन्त्र के यह दूसरे और तीसरे पाद हैं, तीसरे पाद में वल शब्द है ], देने की इच्छा वाले ही यह सब हैं जो दीक्षा पाये हुये हैं, इसलिये यह ऋचा बलवती [ वल शब्द वाली ] है । ( उद्गा आजदङ्गिरोभ्य आविष्कृण्वन् गुहा सतीः, अवाञ्चं नुनुदे वलम् इति, सनिम् एतेभ्यः एतया १३--( परिधानीयाः ) समाप्तिसाधनभूता ऋचः ( इषम् ) अन्नम् (स्वः) सुखम् ( धीमहि ) धारयामहे ( लोकात् ) अस्माल्लोकात् ( च ) अवधारणे ( आरभते ) आलभते । प्राप्नोति ( वि ) विविधम् । वियुक्तम् । (अतिरत् ) पारं कृतवान् (विवृतृचम् ) विवृशब्दयुक्त तृचम् ( विवृणोति ) विवृतं करोति ( मदे ) आनन्दे ( सोमस्य ) ऐश्वर्यस्य ( रोचना ) विभक्तेराकारः । रोचनया । प्रीत्या ( इन्द्रः ) परमेश्वर्यवान् परमात्मा ( यत् ) यदा ( अभिनत् ) व्यदारयत् ( वलम् ) हिंसकम् । विघ्नम् ( सिषासवः ) षणु दाने वा षण संभक्तौ-सनि उप्रत्ययः । सनीवन्तर्द्धं० ( पा० ७ । २ । ४६ ) इटो विकल्पनाद् अभावपक्षे जनसनखनां० ( पा० ६ । ४ । ४२ ) आत्वम् । सनितुं दातुं वेच्छवः ( वलवती ) वलशब्दयुक्ता ऋक् ( उद् ) ऊर्ध्वम् ( गाः ) वाणीः । विद्याः ( आजत् ) अज गतिक्षेपणयोः-लङ् । अगमयत् ( अङ्गिरोभ्यः ) विज्ञानिभ्यः ( आविष्कृण्वन् ) प्रकटयन् (गुहा ) गुहायाम् । गुप्तावस्थायाम् ( सतीः ) विद्यमानाः ( अर्वाञ्चम् ) ३१