भारतकोश
संग्रह पर लौटें

गुरुकुल शिक्षा: भारत-पुनर्निर्माण

Gurukul Shiksha: Bharat Punarnirman

राजीव दीक्षित / रोबिन सिराना द्वारा

स्रोत: Swadeshi Shiksha Series · Swadeshi Robin Sirana · 2017 (उद्गम)

DevanagariHindipublished78 पृष्ठ

पूरी प्राथमिक शिक्षा विश्व बैंक चला रही हैं

आप जब अपने बच्चे को अंग्रेजी माध्यम के स्कूल में भेजते हैं, तो उसे विदेशी संस्कृति का गुलाम बना देते हैं। वह बार्डबल के बारे में ज्यादा जानता है, मैकडोनाल्ड में जाने के लिए बैचेन रहता है और डनहिल के कश लगाना अपनी शान समझता है। थोड़ा बड़ा होने पर शुरू होते हैं – इंटरनेट पर चेटिंग, दिन में खुले रहने वाले डिस्को में मस्ती, मांसाहारी खान-पान की ओर झुकाव। आप अनजाने में अपने बच्चों पर एक ऐसी लाईफ स्टाइल थोप देते हैं, जो नैसर्गिक नियमों के खिलाफ हैं।

A black and white illustration showing six silhouettes of people walking in a group. Each person has a square icon on their head representing a different social media platform: Facebook (f), Twitter (bird), a group of people icon, YouTube (red play button), LinkedIn (in), and a checkmark icon. The icons are colored blue, light blue, white, red, blue, and blue respectively.

अपनी भाषा को छोड़ने का अर्थ है- अपने धर्म, अपनी परम्पराओं और अपने नैसर्गिक जीवन से विमुख होना। एक दिलचस्प उदाहरण देना चाहूँगा। अंग्रेजी माध्यम से पढ़ने वाला बच्चा दिन में कम-से-कम बीस बार एक शब्द जरूर बोलता है – ‘ओह, शीट!’ शीट का अर्थ होता है विछा, यानी टट्टी। हृदय तो तब हो गयी जब मंदिर में टाइट पेंट पहने एक लड़की अर्चना के लिए झुक नहीं पाई तो उसके मुँह से बरबस निकल पड़ा – ओह, शीट!!

बुनियादी सवाल मौजूदा व्यवस्था को बदलने का हैं।

अंग्रेजी भाषा का ज्ञान और अंग्रेजी माध्यम की शिक्षा प्रणाली, दो अलग-अलग चीजे हैं। कोई अंग्रेजी सीख कर कंप्यूटर पर महारत हासिल करना चाहता है, तो यह उसका निजी चुनाव है। शिक्षा का जिस तरह से

व्यापारीकरण हो रहा हैं, उससे वह स्पष्ट है कि यूरोप और अमेरिका को भारत के बाजार पर कब्जा जमाने के लिए नए दलालों और गुलामों की सख्त जरूरत है। अंग्रेजी माध्यम की तालीम लूट मचाने वाली मल्टीनेशनल कम्पनियों के लिए सैलसमैन तैयार कर रही है। पूरी प्राथमिक शिक्षा को विश्व बैंक चला रही है। बुनियादी सवाल मौजूदा व्यवस्था को बदलने का है।

आई.आई. टी., प्रोफेशनल्स के एक ग्रुप ने मुझे भाषण देने के लिए आमंत्रित किया था। क्वालिटी के मुद्दे पर मेरा कहना था – ‘हमारे बच्चों के मुकाबले यूरोप के बच्चे बेहद खूबसूरत, गोरे-चिट्ठे और हष्ट-पुष्ट होते हैं। क्या अपने बच्चों की क्वालिटी सुधारने के लिए यूरोप के मदों को हम बुलाना पंसद करेंगे? ऐसी स्पर्धा में शामिल होने का क्या तुक हैं, जो हमें हमारी पहचान से बेदखल कर दें?’

अंग्रेजी सीखने वाला बच्चा स्मार्ट इंटेलीजेन्ट और एक्टिव होता है, ऐसी मान्यता धोखाधड़ी का पर्याय हैं। हमें अपनी औकात से रूबरू होना चाहिए। हम जैसे हैं, उसे स्वीकार करना ही हमारे जीवन का आनंद है। जिसे अपनी भाषा और रीति-रिवाजों और अपने पुरखों से मिलें जीवन-मूल्यों पर गर्व होगा, वही स्वाभिमान से जी सकता है। अपने बच्चों को अमेरिकन या यूरोपीयन बनाने के मोह से बचाइये।

-अक्षय जैन

स्कूल में बाजार....

अब वक्त आ गया है, जब हमें अपने बारे में सोचना चाहिए। क्या अपने समय का थोड़ा हिस्सा हर रोज अपने बारे में सोचने के लिए नहीं निकाल सकते? क्या हमें इस बात पर नहीं सोचना चाहिए कि हमारे बच्चों के साथ स्कूलों में क्या हो रहा हैं?

आईसक्रीम बनाने वाली एक कंपनी स्कूलों में एक इनामी प्रतियोगिता आयोजित करती है। जो बच्चा प्रमोटर कंपनी की आइसक्रीम के

ज्यादा से ज्यादा रैपर इकट्ठा कर सकता है, उसे कैमरा या कॉमिक्स इनाम में दिया जाता है। मुंबई के किसी मशहूर रेस्टोरेंट में किसी प्रसिद्ध कार्टून चरित्र के साथ लंच या डिनर का इंतजाम भी हैं।

टूथपेस्ट बनाने वाली एक कंपनी स्कूलों में एक फिल्म दिखाती है। बच्चों को बताया जाता है कि दांत कैसे खराब होते हैं। फिर यह बताया जाता है कि उनके द्वारा बनाई हुई टूथपेस्ट से दांत कितने सुरक्षित रहते हैं। कितने ज्यादा मजबूत हो जाते हैं। हर बच्चे को कोलगेट की एक ट्यूब मुफ्त में दी जाती है।

A green school bag with a yellow zipper and a green handle. The bag is open, revealing various school supplies: a yellow notebook with a cartoon face, a spiral-bound notebook, a red apple with a face, a yellow ruler, a pair of orange scissors, and several pencils in different colors (yellow, orange, green, blue). The bag is set against a plain white background.

बाजार की गिरफ्त से अब तक स्कूल बचे थे। अब वे भी इस बाजार की लपेट में आ गये हैं। बाजार पर कब्जा मल्टीनेशनल कंपनियों का है। मकसद और निष्कर्ष दोनों साफ हैं। बच्चों को एक ऐसी दुनिया में धकेला जा रहा है, जिसमें वे कुछ खास उत्पादों के आदी और गुलाम हो जाएं।

कालेज डे मल्टीनेशनल कंपनियाँ स्पॉंसर कर रही हैं। आइसक्रीम, टूथपेस्ट से लेकर कोल्ड ड्रिंक्स नूडल्स और पिज्जा की मार्केटिंग के लिए बच्चों को टारगेट बनाया जा रहा है। जंक फूड को मासूमों के कंधों पर लादने के लिए मल्टीनेशनल कंपनियाँ उनके क्लास रूम तक पीछा कर रही है। हेपेटाइटिस के टीके से लेकर फन पार्क या 'जेल पेन' के प्रचार के लिए हमारे मासूम बच्चे इस्तेमाल किये जा रहे हैं।

अगर बच्चे आपके हाथ से निकल गए, तो समझिए

आपका सब कुछ नष्ट हो गया।

इसीलिए मैं कहता हूँ कि थोड़ा सा समय निकालिए और ठंडे दिमाग से सोचिए। स्कूलों के संचालकों और प्रधानाचार्यों पर मुकदमा ठोकिए, मानवाधिकार आयोग में शिकायत दर्ज कराईये या अखबारों में विरोध करिए। आपके बच्चों की परवरिश का अधिकार आपका है। आप बच्चों की पढ़ाई की फीस अदा करते हैं। वह आपका हक बनता है कि स्कूलों में आपका बच्चों के साथ खेलवाड़ न हो।

जिस देश में गुरुकुल की परम्परा रही हो, विद्यालयों को ज्ञान मंदिर माना जाता रहा हो, सरस्वती की पूजा की जाती हो, वहाँ कारपोरेट जगत के दलालों के प्रवेश पर पांबदी लगनी चाहिए। कालेजों और स्कूलों के प्रबंधको कोइस बात की चेतावनी दी जानी चाहिए कि वे चंद पैसें की खातिर बच्चों के स्वास्थ्य और भविष्य को दांव पर नहीं लगा सकते।

बाजार आपकी जिंदगी को बेहतर नहीं बना सकता, तो यह कोशिश जरूर कीजिए कि बाजार आपको अपना गुलाम भी न बना सके। अगर बच्चे आपके हाथ से निकल गए, तो समझिए आपका सब कुछ नष्ट हो गया।

पढ़-लिख करके क्या करेगा

ओ मूर्ख नादान

मैं इस देश के लोगो को आज तक समझ नहीं पाया। कोई काम सलीके से नहीं करते। एक चपरासी की नौकरी के लिए पाँच हजार स्नातक लाइन लगाकर खड़े हो जाते हैं। जिस देश ने शून्य का अविष्कार किया, उस देश के लोग झाड़ू लगाने के लिए मारकाट पर उतारू हो जाएँ, तो इससे बड़ा क्रूर मजाक और क्या हो सकता है?

हमारे यहाँ सरस्वती की पूजा होती है। हमारे पास दुर्लभ ज्ञान विज्ञान के खजाने हैं, उपलब्धियाँ गिनाने जाएं, तो खत्म होने का नाम न लें। जो देश सोने की चिड़िया कहलाने वाला था, वहाँ चपरासी की एक अदद नौकरी अराजकता के दृश्य पैदा कर दे तो विश्व बैंक यकीनन हमें कर्ज देना बंद कर देंगे।

हर काम का एक सलीका होता है। अगर झाड़ू ही लगाना था, तो कॉलेज में पढ़ने ही क्यों गए? हैरत की बात तो यह है कि देश में एक भी विश्व विद्यालय ऐसा नहीं हैं, जहाँ एक कुशल चपरासी बनने के लिए कोई पाठ्यक्रम चलाया जाता हो। साहित्य में एम.ए. करने के बाद चपरासी की नौकरी करनी पड़े तो किस कदर अफरा-तफरी मच जाएगी, यह सोचकर ही मेरी रुह कांप जाती है। चपरासियों के रूतबे में कमी आएगी और साहित्य में चपरासियों की मोनोपोली हो जाएगी।

जो पढ़े-लिखे नहीं है, उनका भविष्य उज्ज्वल है। आप पढ़े लिखे नहीं हैं तो फिल्मों में चले जाइए। किसी जमाने ऐसी सीख दी जाती था – ‘पढ़-लिख कर के क्या करेगा, ओ मूरख नादान, अपनी किस्मत आजमा, जाके फिलिमस्तान’।। या फिर आप राजनीति में चले जाइए। एक बिना पढ़ी-लिखी औरत बिहार की मुख्यमंत्री बन सकती है।

ऐसी शिक्षा-प्रणाली को छोड़ने का समय आ गया है, जो हर साल लाखों बेकारों को पैदा करती है। अगर इस देश के नवजवान की नियति चपरासी बनना है, तो यही सही। यह लोकतंत्र की विफलता है या सरकार की अक्षमता, इस पर 68 सालों के बाद अब बहस करने से कोई फायदा नहीं है। हाँ, यह कबूल करने का वक्त जरूर आ गया है कि हमें अपने परम्परागत हुनर वाले कामों को फिर से अपनाना है। स्वरोजगार के लिए सीबीएससी या आईसीएससी में दखिला लेने की जरूरत नहीं।

-ले.अक्षय जैन

यह बच्चा आपका कैसे हो गया?

जो बच्चा जन्म ले रहा है, वह आपका नहीं हो सकता। गर्माधान से ही माँ को विलायती दवाईयाँ खानी पड़ती है। बच्चे को स्वस्थ रखने के लिए खाने-पीने का सारा सामान विदेशी कंपनियों का होता है। जूते फ्रांस से आए, खिलौने जापान के हों और कपड़े तो भई इंग्लैण्ड के बने हैं। वह जन्मदिन ही कैसा, जिसमें मोमबत्तियां न बुझाई जाएं और अंडा से बना केक न काटा जाए। प्लेगुप और नर्सरी से शुरू होने वाली यह लिस्ट इतनी लम्बी है कि खत्म होने का नाम ही नहीं लेती। क्या अब भी आप यह कहने की हिम्मत करेंगे कि ‘यह बच्चा आपका है?’ माँ-बाप भारतीय हो सकते हैं, लेकिन बच्चा भी भारतीय है, यह कौन कह सकता है?

वेंटीलेटर पर हिन्दी

हिन्दी आई.सी.यू. में भर्ती है। जब भी सितम्बर में हिन्दी दिवस आता है, उसे वेंटीलेटर पर रख दिया जाता है, ताकि सरकार जनता को यह एहसास करा सके कि हिन्दी अभी जिंदा है, हिन्दी मरी नहीं है। आत्म छलना का यह सालाना जश्न पिछले साठ सालों से जारी हैं।

उसे क्या कहा जाए? राष्ट्रीय शर्म या अंग्रेजों की गुलामी?

  • • यदि मैं तानाशाह होता तो आज ही विदेशी भाषा में शिक्षा दिया जाना बंद कर देता। सारे अध्यापकों को स्वदेशी भाषाएँ अपनाने को मजबूर कर देता। जो आनाकानी करते उन्हें बर्खास्त कर देता। -गांधी जी
  • • मुझे लगता है कि जब हमारी संसद बनेगी, तब हमें फौजदारी कानून में एक धारा जुड़वाने का आन्दोलन करना पड़ेगा। यदि

दो व्यक्ति भारत की एक भाषा जानते हों और इस पर भी उनमें से कोई दूसरे को अंग्रेजी में पत्र लिखे ये एक-दूसरे से अंग्रेजी में बोले तो उसे कम से कम छः महीने की सख्त सजा दी जाएगी।।

-गांधी जी

(‘स्वभाषा लाओ, अंग्रेजी हटाओ’ पुस्तक से साभार)

जो शिक्षा हमें अच्छे-बुरे का भेद करना और अच्छे को ग्रहण करना तथा बुरे का त्याग करना नहीं सिखाती, वह शिक्षा सच्ची शिक्षा नहीं है।

-गांधी जी

जब मैं राष्ट्रपति बनकर यहाँ आया तो हिंदी, उर्दू और गुरुमुखी के अखबार पढ़ने की इच्छा हुई, लेकिन ये अखबार मुझे नहीं मिले। मुझसे यह कहा गया कि राष्ट्रपति भवन में केवल अंग्रेजी के अखबार आते हैं। मुझे बहुत तकलीफ हुई। आजाद भारत में राष्ट्रपति भवन में जब भारतीय भाषाओं का कोई स्थान नहीं तो देश की एकता कैसे रह सकती है?

-पूर्व राष्ट्रपति ज्ञानी जैलसिंह

कम पढ़े तो गाँव छोड़ दे, ज्यादा पढ़े तो देश छोड़ दे।

अमेरिका से लौटते समय पत्रकारों ने स्वामी विवेकानंद से पूछा- ‘अमेरिका की अमीरी देखने के बाद गरीबी से त्रस्त भारत के बारे में आप क्या सोचते हैं?’ स्वामीजी का जवाब इतिहास में अंकित हो गया – ‘अब तक मैं अपने देश की इज्जत करता था, लेकिन अब पूजा करूँगा।

गुरुकुल की शिक्षा जीवन-विज्ञान से जुड़ी थी। या यूं कहें कि मात्र जीवन का वैज्ञानिक स्वरूप ही विद्यार्थियों को सिखाया जाता

था। राजपुत्रों से लेकर सामान्य परिवारों की संतानों के साथ प्रशिक्षण और अनुशासन पालन में कोई भेदभाव नहीं होता था। राजपुत्रों से लेकर सामान्य परिवारों की संतानों के साथ प्रशिक्षण और अनुशासन पालन में कोई भेदभाव नहीं होता था। खेती करना, गाय पालना, अपना भोजन स्वयं तैयार करना, जंगलों से लकड़ियाँ काट कर लाना, कुटिया लीपना या धोती-दुपट्टा पहन कर नंगे पैर घूमना, सूर्य नमस्कार करना, शिक्षा की बुनियादी बातें थीं। इस शिक्षा ने अभिमन्यु, लव-कुश, श्रवणकुमार और चाणक्य पैदा किए। महावीर और गौतमबुद्ध दिए। विवेकानंद और दयानंद सरस्वती बनाए।

आज तो यह हाल है कि जो कम पढ़ लिख लेता है, वह गाँव छोड़ देता है, ज्यादा पढ़-लिख लेता है, वह देश छोड़ देता है।

आज का लाड़ला बच्चा.....

पहले समय पर उठते थे, बड़ों को नमन करते थे। मुख से राम-राम कहते थे, पढ़ते भी थे और खेतों खलियानों और घरों में खट के काम करते थे। समय पर खाते थे, खेलते थे और समय पर आराम करते थे। अब उठते हैं देर से उठते ही शिकवे करते हैं ढेर से।

‘प्रणाम’ की जगह ‘हाय’ और ‘गुडमोर्निंग’ कहते हैं। आंखे मसलते उबासी लेते, बिना मुंह धोये ही रामू को जोर से चिल्लाकर चाय का आर्डर देते हैं काम करना तो हीनता है, अखबार के पन्ने पलटते पलटते कितने घंटे बीत गए गिनता है। फिर दोस्तो से बातें करने फोन की लार्डिन मिलाएँ स्कूल से ही कौन सी पिक्चर जाएं फिर कौन से होटल में खाएं कहाँ-कहाँ घूमने जाएँ। मार्केट से क्या-क्या खरीद कर लाएँ, इन्हीं सब कामों की सूची बनाएं। जब इस तरह की दिनचर्या में पलता है भारत का भावी कर्णधार भारत का होनहार आज का लाडला बच्चा। तो इस पीढ़ी की जब निकलेगी जमात जिससे बनेगा भावी भारत का समाज देश कितना करेगा तरक्की सोचकर सिंहल जाता हूँ।

हे भगवान्! इनको कहीं पीसने न पड़े फिर किसी फ़िरंगी की चक्की। मेरा दर्द कह उठता है। वतन को फिर कहीं गिरवी न राख देना नादानों! शहीदों ने बड़ी मुश्किल से ये कर्ज चुकाए हैं, अपनी जिंदगी के चिराग बुझा कर हमारे घरों के दीप जलाए हैं।

सुराज्य के महाअभियान में शामिल होइए

यह एक प्रमाणित तथ्य है कि कुछ सौ वर्ष पूर्व यह देश संसार का शिरमोर था। कृषि, शिक्षा, स्वास्थ्य, साहित्य, संगीत, कला, तकनीक, अर्थव्यवस्था, प्रशासन आदि सभी दृष्टिओं से हम अग्रणी थे। इस देश की सम्पूर्ण धरोहर को विदेशी आक्रांताओं द्वारा बार-बार बुरी तरह रौंद दिये जाने की भरसक कोशिशों के बाद भी महारौली का सीना ताने खड़ा बिना जंग लगा लौह स्तंभ, देश के कोने-कोने में बिखरे पड़े वास्तु कला के उत्कृष्ट नमूने, चरक-सुश्रुत में वर्णित आधुनिक चिकित्सा विज्ञान को भी चुनौती देने वाला शल्य-क्रिया विज्ञान, आज भी जहाँ-तहाँ दिख जाने वाला लोककलाओं का अद्भुत संसार, ढाका के मलमल सरीखे वस्त्रों की बानगी- आदि अनगिनत ऐतिहासिक-तथ्य अगर आज भी अपनी गौरवगाथा सुनाते दिख रहे हैं, तो कल्पना कीजिए कि विदेशी आक्रमणों से पूर्व भारत का अतीत कितना वैभवशाली रहा होगा।

हॉर्न धीरे बजाएं देश सो रहा है

लेकिन वर्तमान स्थिति यह है कि विदेशी लुटेरों के चलते महादानीयों का यह देश भिखारी बन चुका है। खास बात यह है कि लूट के लंबे इतिहास में भी हमारी सबसे ज्यादा लूट अंग्रेजों ने की। अंग्रेजों की गुलामी के दौर में सम्पत्ति-संसाधनों के साथ-साथ हमारी संस्कृति को भी तबाह करने की साजिश रची गई। अपने साम्राज्य की जड़ें मजबूत करने के लिए अंग्रेजों ने भारत की सारी व्यवस्थाओं को ही अपने अनुसार बदलने की मुहिम चलाई। इस मुहिम में वे काफी हद तक सफल भी रहें। अगर कुछ कसर बाकी रह गया था, तो आजादी के बाद अंग्रेजों के मानसपुत्रों ने आजादी के दीवानों के लाखों बलिदानों को बेमानी बना दिया हो।

कटु सत्य यह है कि हम आजादी के भ्रम में जी रहे हैं। अंग्रेज चाहते थे कि हम मानसिक रूप से गुलाम हो जाएँ, तो उन्हें बंदूकों-तोपों की भाषा न बोलनी पड़े, सो अब वही हो गया है। हमारा शासन-प्रशासन और विकास का संपूर्ण ढाँचा अब भी लगभग जस-का-तस है। इसी का नतीजा है कि आज हम कहीं ज्यादा बड़ी लूट के शिकार हो रहे हैं। जब हम एक ईस्ट इंडिया कंपनी की जेब अनिच्छा के बावजूद अंग्रेजी कोड़ों-बंदूकों के डर से भरते थे, पर अब मानसिक गुलामी के वशीभूत हम हजारों बहुराष्ट्रीय कंपनियों की जेब स्वेच्छा से भर रहे हैं।

देश लगातार कंगाल हो रहा है और नतीजे के रूप में बेरोजगारी भुखमरी का भयावह दृश्य सामने है। विकास के पश्चिमी तौर-तरीके के

चलते संस्कृति का संकट भी अब भयानक रूप में दिखने लगा है। हिंसा, भ्रष्टाचार, बलात्कार, देश-समाज के प्रति संवेदनहीनता जैसी ढेरों समस्याएँ इसी की अनिवार्य परिणतियाँ हैं।

सवाल यह है कि क्या इस देश के वजूद को तिल-तिल कर समाप्त होते हुए हम देखते रहेंगे?

संसाधनों के अकूत भंडार से समृद्ध भारत की धरती पर रहते हुए और मेहनत कश होते हुए भी क्या इस देश की एक बड़ी आबादी फुटपाथों पर जिंदगी गुजारने और भूख से पेट मरोड़ने को ही हमेशा अभिशास रहेगी? ऋषि-मुनिओं के इस देश में क्या अब माइकल जैक्सनों और मेडोनाओं के कार्टून ही तैयार होते रहेंगे?

अगर आप देश की इस वर्तमान दिशा और दशा से संतुष्ट हैं तो हमें आपसे कुछ नहीं कहना है। लेकिन यदि आप भी हमारी तरह चाहते हैं कि यह राष्ट्र स्वावलम्बी बनें, यहाँ का समाज खुशहाल हो, हर तरफ अमन-चैन हो, दया-करुणा-ईमानदारी-संयम का सांस्कृतिक प्रवाह इस देश में फिर कायम हो, तो हमें आपकी जरूरत है। हमारी अपील है कि आप भी सच्चे सुराज्य के लिए चल रहे इस महायज्ञ में शामिल होइए।

यदि भारत की अर्थव्यवस्था, कृषि-व्यवस्था, शिक्षा व्यवस्था, स्वास्थ्य-व्यवस्था तथा न्याय-व्यवस्था का सम्पूर्ण स्वदेशीकरण हो जाए तो यह देश स्वावलंबी बन जाएगा, बेरोजगारी की समस्या नहीं रहेगी और सच्चे अर्थों में हमें स्वराज्य प्राप्त होगा। इस देश के विकास का ढाँचा, इस देश के सांस्कृतिक मूल्योंं भौगोलिक परिस्थितियों, संसाधनों और यहाँ की जनता की समझ व जरूरतों को ध्यान में रखकर ही बनाय जाना चाहिए, तभी अनगिनत समस्याओं से मुक्ति मिल पाएगी और एक बार फिर हम दुनिया के मार्गदर्शक की भूमिका में आ सकेंगे।

जिनमें अकेले चलने के हौंसले होते हैं, उनके पीछे एक दिन काफिले होते हैं।

हम जो इंजीनियरिंग करते हैं, ये अंग्रेजों का बनाया पाठ्यक्रम है, ताकि अंग्रेज अपने लिए इंजीनियर तैयार कर सके, और हम भी उनके के लिए काम करते हैं, ज्यादातर इंजीनियर या तो देश के बाहर काम करता है, या फिर देश के अन्दर विदेशी कम्पनी में जिसे हम मल्टीनेशनल कम्पनी कहते हैं, हमारे देश में सन् 1200 से इंजीनियरिंग चली आ रही है, जब 18 विषय होते थे, ये बात कोई नहीं जानता क्योंकि अंग्रेजों ने हमारे सारे दास्तावेज जला दिये थे। हमारे भारत में सबसे कम खर्चे पर इंजीनियर तैयार हो जाते हैं, इसलिए अमेरिका और यूरोप वाले भारत में अपने लिए इंजीनियर तैयार करते हैं, और उनका ऐसा ही पाठ्यक्रम पढ़ाते हैं जो उनके देश के काम आ सके, यह पाठ्यक्रम कभी भी भारत के लिए काम नहीं आ सकता। इसलिए हमारी मानसिकता ऐसी बन जाती है कि हम या तो विदेश में जाकर काम करते हैं या फिर अपने देश में बहुराष्ट्रीय कम्पनी में। अमेरिका और यूरोप वालों का कहना है की भारतीयों को सबसे कम आय पर सबसे अच्छी सर्विस देते हैं, वे तो बस डॉलर में सैलरी सुनते हैं खुश हो जाते हैं।

A black and white line drawing. On the left, a man in a suit and tie stands with his right hand pointing towards a person on the ground. The person on the ground is in a crawling or kneeling position. To the right, another man in a suit stands with his hands on his hips, looking towards the person on the ground. A small ball is on the ground between them, with a dotted line extending from it towards the man on the right.

अब जागो और अपने देश के लिए काम करो।

जापान का इंजीनियर जापान के लिए काम करता है.

चीन का इंजीनियर चीन के लिए काम करता है.

जर्मनी का इंजीनियर जर्मनी के लिए काम करता है.

इसी तरह लगभग सारे देश अपने देश के लिए काम करते हैं.

लेकिन हमारे देश के लोगों को गुलाम बनने की आदत हो गयी है।

अब जागो और स्वदेश अपनाओं, गुरुकुल में ही शिक्षा दें।।

-रोबिन सिराना

दोस्तो आप वेस्टर्न कल्चर अपना रहे है तो कोई दिक्कत नहीं लेकिन यह जरूर याद रखें – सूरज जब भी वेस्ट(पश्चिम) में गया है, तब हमेशा डूबा ही हैं।

सौजन्य से हेमचन्द्राचार्य गुरुकुलम्

हीरा जैन सोसायटी के निकट, रामनगर, साबरमती, अहमदाबाद, गुजरात दूरभाष – 9033543543

संग्रहकर्ता रोबिन सिराना

स्वदेशी अपनाओं, देश बचाओ

स्वदेशी अपनाओं, देश बचाओ

अमर शहीद राजीव दीक्षित जी

आज भी गुलाम

भाषा - अंग्रेजी भूषा - अंग्रेजी स्वनापीना - अंग्रेजी चिकित्सा - अंग्रेजी जरूरतें - अंग्रेजी

दिमाग में सोच भी अंग्रेजी, किस मुहँ से कहते हो हम आजाद हैं। अधिकांश भारतीय वो मानसिक गुलाम है जिसका आज तक इलाज नहीं हुआ