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हिन्द स्वराज (आत्म-निर्भरता एवं स्वराज्य दर्शन)

Hind Swaraj by Mahatma Gandhi

मोहनदास करमचन्द गाँधी (महात्मा गाँधी) द्वारा

DevanagariHindipublished150 पृष्ठ

हिन्द स्वराज में ऐसा विचार करते हैं। खून करके जो लोग राज करेंगे, वे प्रजा को सुखी नहीं बना सकेंगे। धींगड़ा ने जो खून किया है उससे या जो खून तमाम हिन्दुस्तानियों को हिन्दुस्तान में हुए हैं उनसे देश को फायदा हुआ हथियारबंद करना तो है, ऐसा अगर कोई मानता हो तो वह बड़ी हिन्दुस्तान को यूरोप सा भूल करता है। धींगड़ा को मैं देशाभिमानी मानता बनाने जैसा होगा। अगर हूँ, लेकिन उसका देश प्रेम पागलपन से भरा ऐसा हुआ तो आज यूरोप था। उसने अपने शरीर का बलिदान गलत तरीके के जो बेहाल हैं वैसे ही से दिया। उससे अंत में तो देश को नुकसान ही हिन्दुस्तान के भी होंगे। होने वाला है। थोड़े में हिन्दुस्तान को पाठक : लेकिन आपको इतना तो कुबूल करना यूरोप की सभ्यता अपनानी ही होगा कि अंग्रेज इस खून से डर गये हैं और होगी। ऐसा ही होने वाला लॉर्ड मॉर्ले ने जो कुछ हमें दिया है वह ऐसे डर से हो तो अच्छी बात यह होगी ही दिया है। कि जो अंग्रेज उस सभ्यता संपादक : अंग्रेज जैसे डरपोक प्रजा हैं वैसे में कुशल हैं। बहादुर भी हैं। गोला-बारूद का असर उन पर तुरन्त होता है, ऐसा मैं मानता हूँ। संभव है, लॉर्ड मॉर्ले ने हमें जो कुछ दिया वह डर से दिया हो, लेकिन डर से मिली हुई चीज जब तक डर बना रहता है तभी तक टिक सकती है। 100

आश्चर्य है, वैद्य मरते हैं, डॉक्टर मरते हैं, उनके पीछे हम भटकते हैं। लेकिन राम जो मरता नहीं है, हमेशा जिन्दा रहता है और अचूक वैद्य है, उसे हम भूल जाते हैं। 101

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गोला-बारूद पाठक : डर से दिया हुआ जब तक डर रहे तभी तक टिक सकता है, यह तो आपने विचित्र बात कही। जो दिया सो दिया। उसमें फिर क्या हेरफेर हो सकता है ? संपादक : ऐसा नहीं है। १८५७ की घोषणा बलवे अंग्रेजों ने जो कुछ पाया के अंत में लोगों में शान्ति कायम रखने के लिए की वह मार-काट करके गई थी, जब शान्ति हो गई और लोग भोले दिल के पाया, इसलिए हम भी बन गये तब उसका अर्थ बदल गया। अगर मैं सज़ा वैसा ही करके मनचाही के डर से चोरी न करूँ, तो सज़ा का डर मिट जाने चीज पाएँ। अंग्रेजों ने पर चोरी करने की मेरी फिर से इच्छा होगी और मैं मार-काट की और हम चोरी करूँगा। भी कर सकते हैं, यह यह तो बहुत ही साधारण अनुभव है, इससे बात तो ठीक है, लेकिन इनकार नहीं किया जा सकता। हमने मान लिया है मार-काट से जैसी चीज कि डाँट-डपटकर लोगों से काम लिया जा सकता उन्हें मिली वैसी ही हम है और इसलिए हम ऐसा करते आए हैं। भी ले सकते हैं। आप पाठक : आपकी यह बात आपके ख़िलाफ़ जाती कुबूल करेंगे कि वैसी है, ऐसा आपको नहीं लगता ? आपको स्वीकार चीज हमें नहीं चाहिए। करना होगा कि अंग्रेजों ने खुद जो कुछ हासिल किया है, वह मार-काट करके ही हासिल किया है। आप कह चुके हैं कि मार-काट से उन्होंने जो कुछ हासिल किया है वह बेकार है, यह मुझे याद है इससे मेरी दलील को धक्का नहीं पहुँचता। उन्होंने बेकार चीज पाने का सोचा और उसे पाया। मतलब यह कि उन्होंने अपनी मुराद पूरी की। साधन क्या था, इसकी चिन्ता हम क्यों करें ? अगर हमारी मुराद अच्छी हो तो क्या उसे हम चाहे जिस साधन से, मार-काट करके भी पूरा नहीं करेंगे ? चोर मेरे घर में घुसे तब क्या मैं साधन का विचार करूँगा ? मेरा धर्म तो उसे किसी भी तरह बाहर निकालने का ही होगा। 103

हिन्द स्वराज्य ऐसा लगता है कि आप यह तो कुबूल करते हैं कि हमें सरकार के पास अर्जियां भेजने से कुछ नहीं मिला है और न आगे कभी मिलने वाला है। तो फिर उन्हें मारकर हम क्यों न लें ? ज़रूरत हो उतनी मार का डर हम हमेशा बनाये रखेंगे। बच्चा अगर आग में पैर रखे और उसे आग से बचाने के लिए हम उस पर रोक लगाएँ, तो आप भी इसे दोष नहीं मानेंगे। किसी भी तरह हमें अपना काम पूरा कर लेना है। साधन और साध्य, ज़रिया संपादक : आपने दलील तो अच्छी की। वह और मुराद के बीच कोई ऐसी है कि बहुतों ने उससे धोखा खाया है। मैं संबंध नहीं है। यह बहुत भी ऐसी ही दलील करता था, लेकिन अब मेरी बड़ी भूल है। इस भूल के आँखें खुल गई हैं और मैं अपनी गलती समझ कारण जो लोग धार्मिक सकता हूँ। आपको वह गलती बताने की कहलाते हैं, उन्होंने घोर कर्म कोशिश करूँगा। किये हैं। यह तो धतूरे का पहले तो इस दलील पर विचार करें कि पौधा लगाकर मोगरे के अंग्रेजों ने जो कुछ पाया वह मार-काट करके फूल की इच्छा करने जैसा पाया, इसलिए हम भी वैसा ही करके मनचाही हुआ। मेरे लिए समुद्र पार चीज पाएँ। अंग्रेजों ने मार-काट की और हम भी करने का साधन जहाज़ ही कर सकते हैं, यह बात तो ठीक है, लेकिन मार- हो सकता है। अगर मैं पानी काट से जैसी चीज उन्हें मिली वैसी ही हम भी में बैलगाड़ी डाल दूँ तो वह ले सकते हैं। आप कुबूल करेंगे कि वैसी चीज गाड़ी और मैं दोनों समुद्र के हमें नहीं चाहिए। तले पहुँच जाएँगे। जैसे देव आप मानते हैं कि साधन और साध्य, ज़रिया वैसी पूजा। और मुराद के बीच कोई संबंध नहीं है। यह बहुत बड़ी भूल है। इस भूल के कारण जो लोग धार्मिक कहलाते हैं, उन्होंने घोर कर्म किये हैं। यह तो धतूरे का पौधा लगाकर मोगरे के फूल की इच्छा करने जैसा हुआ। मेरे लिए समुद्र पार करने का साधन जहाज़ ही हो सकता है। अगर मैं पानी में बैलगाड़ी डाल दूँ तो गाड़ी और मैं दोनों समुद्र के तले पहुँच जाएँगे। जैसे देव वैसी पूजा यह वाक्य बहुत सोचने लायक है। उसका गलत अर्थ करके लोग भुलावे में पड़ गए हैं। साधन बीज है और साध्य (हासिल करने की चीज) पेड़ है। 104

हिन्द स्वराज इसलिए जितना सम्बन्ध बीज और पेड़ के बीच है, उतना ही साधना और साध्य के बीच है। शैतान को भजकर मैं ईश्वर भजन का फल पाऊं, यह कभी हो ही नहीं सकता। इसलिए यह कहना कि हमें तो ईश्वर को ही भजना है, साधन भले शैतान हो, बिल्कुल अज्ञान की बात है। जैसी करनी वैसी भरनी। अंग्रेजों ने मार-काट करके १८३३ में वोट के विशेष अधिकार पाए। क्या मार-काट करके वे अपना फ़र्ज समझ सके ? उनकी मुराद अधिकार पाने की थी, इसलिए उन्होंने मार-काट मचाकर अधिकार पा लिए। सच्चे अधिकार तो फ़र्ज के फल हैं, वे अधिकार उन्होंने नहीं पाए। नतीजा यह हुआ कि सबने अधिकार पाने का प्रयत्न किया, लेकिन फ़र्ज सो गया। जहाँ सभी अधिकार की बात करें, वहाँ कौन किसको दे ? वे कोई भी फ़र्ज अदा नहीं करते, ऐसा कहने का मतलब यहाँ नहीं है, लेकिन जो अधिकार वे माँगते थे उन्हें हासिल करके उन्होंने वे फ़र्ज पूरे नहीं किये जो उन्हें करने चाहिए थे। उन्होंने योग्यता प्राप्त नहीं की, इसलिए उनके अधिकार उनकी गर्दन पर जुए की तरह सवार हो बैठे हैं। इसलिए जो कुछ उन्होंने पाया है, वह उनके साधन का ही परिणाम है। जैसी चीज उन्हें चाहिए थी वैसे साधन उन्होंने काम में लिये। मुझे अगर आपसे आपकी घड़ी छीन लेनी हो, तो बेशक आपके साथ मुझे मार-पीट करनी होगी, लेकिन अगर मुझे आपकी घड़ी खरीदनी हो, तो आपको दाम देने होंगे। अगर मुझे बख्शीश के तौर पर आपकी घड़ी लेनी होगी, तो मुझे आपसे विनती करनी होगी। घड़ी पाने के लिए मैं जो साधन काम में लूँगा, उसके अनुसार वह चोरी का माल, मेरा माल या बख्शीश की चीज होगी। तीन साधनों के तीन अलग परिणाम आएँगे। तब आप कैसे कह सकते हैं कि साधन की कोई चिन्ता नहीं ? --- [दाएँ हाशिए का पाठ / Sidebar Text] --- साधन बीज है और साध्य हासिल करने की चीज पेड़ है। इसलिए जितना सम्बन्ध बीज और पेड़ के बीच है, उतना ही साधना और साध्य के बीच है। शैतान को भजकर मैं ईश्वर भजन का फल पाऊं, यह कभी हो ही नहीं सकता। इसलिए यह कहना कि हमें तो ईश्वर को ही भजना है, साधन भले शैतान हो, बिल्कुल अज्ञान की बात है। जैसी करनी वैसी भरनी। 105

हिन्द स्वराज अब चोर को घर से निकालने की मिसाल लें। मैं आपसे इसमें सहमत नहीं हूँ कि चोर को निकालने के लिए चाहे जो साधन काम में लिया जा सकता है। अगर मेरे घर में मेरा पिता चोरी करने आएगा, तो मैं एक साधन काम में लूँगा। अगर कोई मेरी पहचान को चोरी करने आएगा, तो मैं यही अंग्रेजों ने मार-काट साधन काम में नहीं लूँगा और कोई अनजान आदमी करके १८३३ में वोट आएगा, तो मैं तीसरा साधन काम में लूँगा। अगर के विशेष अधिकार वह गोरा हो तो एक साधन और हिन्दुस्तानी हो तो पाए। क्या मार-काट दूसरा साधन काम में लाना चाहिए, ऐसा भी शायद करके वे अपना फ़र्ज़ आप कहेंगे। अगर कोई मुर्दार लड़का चोरी करने समझ सके ? उनकी आया होगा, तो मैं बिल्कुल दूसरा ही साधन काम मुराद अधिकार पाने में लूँगा। की थी, इसलिए अगर वह मेरी बराबरी का होगा, तो और ही कोई उन्होंने मार-काट साधन मैं काम में लूँगा और अगर वह हथियारबंद मचाकर अधिकार पा तगड़ा आदमी होगा, तो मैं चुपचाप सो रहूँगा। इसमें लिये। सच्चे पिता से लेकर ताकतवर आदमी तक अलग-अलग अधिकार तो फ़र्ज़ के साधन इस्तेमाल किये जाएँगे। पिता होगा तो भी मुझे फल हैं, वे अधिकार लगता है कि मैं सो रहूँगा और हथियार से लैस कोई उन्होंने नहीं पाये। होगा तो भी मैं सो रहूँगा। पिता में भी बल है, नतीजा यह हुआ कि हथियारबंद आदमी में भी बल है। दोनों बलों के बस सबने अधिकार पाने होकर मैं अपनी चीज को जाने दूँगा। का प्रयत्न किया, पिता का बल मुझे दया से रुलाएगा। हथियारबंद लेकिन फ़र्ज़ सो आदमी का बल मेरे मन में गुस्सा पैदा करेगा, हम गया। कट्टर दुश्मन हो जाएँगे। ऐसी मुश्किल हालत है। इन मिसालों से हम दोनों साधनों के निर्णय पर तो नहीं पहुँच सकेंगे। मुझे तो सब चोरों के बारे में क्या करना चाहिए यह सूझता है, लेकिन उस इलाज से आप घबरा जाएँगे, इसलिए मैं आपके सामने उसे नहीं रखता। आप इसे समझ लें और अगर नहीं समझेंगे तो हर वक्त आपको अलग साधन काम में लेने होंगे, लेकिन आपने इतना तो देखा कि चोर को निकालने के लिए चाहे जो साधन काम नहीं देगा और जैसा साधन आपका होगा उसके मुताबिक नतीजा आयेगा। 106

हिन्द स्वराज आपका धर्म किसी भी साधन से चोर को घर से निकालने का हरगिज नहीं है। जरा आगे बढ़ें। वह हथियारबंद आदमी आपकी चीज ले गया है। आपने उसे याद रखा है। आपके मन में उस पर गुस्सा भरा है। आप उस लुच्चे को अपने लिए नहीं, लेकिन लोगों के कल्याण के लिए सज़ा देना चाहते हैं। आपने कुछ आदमी जमा किए। अच्छे नतीजे लाने के उसके घर पर आपने धावा बोलने का निश्चय किया। लिए अच्छे ही साधन उसे मालूम हुआ। चाहिए और अगर सब वह भागा। उसने दूसरे लुटेरे जमा किये। वह भी नहीं तो ज्यादातर खीजा हुआ है। अब तो उसने आपका घर दिन-दहाड़े मामलों में हथियार लूटने का संदेशा आपको भेजा है। आप उसके बल से दयाबल मुकाबले के लिए तैयार बैठे हैं। इस बीच लुटेरा ज्यादा ताकतवर आपके आसपास के लोगों को हैरान करता है। वे साबित होता है। आपसे शिकायत करते हैं। आप कहते हैं: "यह सब हथियार में हानि है, मैं आप ही के लिए तो करता हूँ मेरा माल गया उसकी दया में कभी नहीं। तो कोई बिसात ही नहीं" लोग कहते हैं: "पहले तो वह हमें लूटता नहीं था। आपने जब से उसके साथ लड़ाई शुरू की है तभी से उसने यह काम शुरू किया है।" आप दुविधा में फँस जाते हैं। गरीबों के ऊपर आपको रहम है। उनकी बात सही है। अब क्या किया जाए? क्या लुटेरे को छोड़ दिया जाए? इससे तो आपकी इज़्ज़त चली जायेगी। इज़्ज़त सबको प्यारी होती है। आप गरीबों से कहते हैं: "कोई फिक्र नहीं। आइये, मेरा धन आपका ही है। मैं आपको हथियार देता हूँ। मैं आपको उनका उपयोग सिखाऊंगा। आप उस बदमाश को मारिए, छोड़िए नहीं", यों लड़ाई बढ़ी। लुटेरे बढ़े। लोगों ने खुद होकर मुसीबत मोल ली। चोर से बदला लेने का परिणाम यह आया कि नींद बेचकर जागरण मोल लिया। जहाँ शांति थी वहाँ अशांति पैदा हुई। पहले तो जब मौत आती तभी मरते थे। अब तो सदा ही मरने के दिन आए। लोग हिम्मत हारकर पस्तहिम्मत बने। इसमें मैंने बढ़ा- चढ़ाकर कुछ नहीं कहा है, यह आप धीरज से सोचेंगे तो देख सकेंगे। यह एक साधन हुआ। 107

हिन्द स्वराज अब दूसरे साधन की जाँच करें। चोर को आप अज्ञानी मान लेते हैं। कभी मौका मिलने पर उसे समझाने का आपने सोचा है। आप यह भी सोचते हैं कि वह भी हमारे जैसा आदमी है। उसने किस इरादे से चोरी की, यह आपको क्या मालूम ? आपके लिए अच्छा रास्ता तो यही है कि जब मौका मिले तब आप उस आदमी के भीतर से चोरी का बीज ही निकाल दें। ऐसा आप सोच रहे हैं, इतने में वे भाई साहब फिर से चोरी करने आते हैं। आप नाराज नहीं होते। आपको उस पर दया आती है।

[बायाँ स्तंभ/हाशिया:] जहाँ जो भी आदमी नीच काम करता होगा वहाँ-वहाँ पहुँचना होगा और सामने वाले के बच्चों के प्राण लेने के बजाय अपने प्राणों की आहुति देनी पड़े, इतना पुरुषार्थ आप करना चाहें तो कर सकते हैं, आप स्वतंत्र हैं। पर यह बात बिल्कुल असंभव है।

[मुख्य पाठ:] आप सोचते हैं कि यह आदमी रोगी है। आप खिड़की- दरवाजे खुले कर देते हैं। आप अपनी सोने की जगह बदल लेते हैं। आप अपनी चीजें झट ले जाई जा सकें इस तरह रख देते हैं। चोर आता है। वह घबराता है। यह सब उसे नया ही मालूम होता है। माल तो वह ले जाता है, लेकिन उसका मन चक्कर में पड़ जाता है। वह गाँव में जाँच-पड़ताल करता है। आपकी दया के बारे में उसको मालूम होता है। वह पछताता है और आपसे माफी माँगता है। आपकी चीजें वापस ले आता है। वह चोरी का धंधा छोड़ देता है। आपका सेवक बन जाता है। आप उसे काम-धंधे से लगा देते हैं। यह दूसरा साधन है। आप देखते हैं कि अलग-अलग साधनों के अलग- अलग नतीजे आते हैं। सब चोर ऐसा ही बरताव करेंगे या सब में आपका-सा दया भाव होगा, ऐसा मैं इससे साबित नहीं करना चाहता, लेकिन यही दिखाना चाहता हूँ कि अच्छे नतीजे लाने के लिए अच्छे ही साधन चाहिए और अगर सब नहीं तो ज्यादातर मामलों में हथियार बल से दयाबल ज्यादा ताकतवर साबित होता है। हथियार में हानि है, दया में कभी नहीं। अब अर्जी की बात लें, जिसके पीछे बल नहीं है वह अर्जी निकम्मी है, इसमें कोई शक नहीं। फिर भी स्व. न्यायमूर्ति रानडे कहते थे कि अर्जी लोगों को तालीम देने का एक साधन है। उससे लोगों को अपनी स्थिति का भान कराया जा सकता है और राजकर्ता को चेतावनी दी जा सकती है। यों सोचें

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हिन्द स्वराज्य तो अर्जी निकम्मी चीज है। बराबरी का आदमी अर्जी करेगा तो वह उसकी नम्रता की निशानी मानी जाएगी। गुलाम अर्जी करेगा तो वह उसकी गुलामी की निशानी होगी। जिस अर्जी के पीछे बल है वह बराबरी के आदमी की अर्जी है और वह अपनी माँग अर्जी के रूप में रखता है, यह उसकी खानदानियत को बताता है। अर्जी के पीछे दो तरह के बल होते हैं, "अगर आप नहीं देंगे तो हम आपको मारेंगे।" यह गोला-बारूद का बल है। इसका बुरा नतीजा हम देख चुके। दूसरा बल यह है: "अगर आप नहीं देंगे तो हम आपके अर्जदार नहीं रहेंगे। हम अर्जदार होंगे तो आप बादशाह बने रहेंगे। हम आपके साथ कोई व्यवहार नहीं रखेंगे।" इस बल को चाहे दयाबल कहें, चाहे आत्मबल कहें या सत्याग्रह कहें। यह बल अविनाशी है और इस बल का उपयोग करने वाला अपनी हालत को बराबर समझता है। इसका समावेश हमारे बुजुर्गों ने 'एक नहीं सब रोगों की दवा' में किया है। यह बल जिसमें है उसका हथियार बल कुछ नहीं बिगाड़ सकता। बच्चा अगर आग में पैर रखे, तो उसको दबाने की मिसाल की छानबीन करने में तो आप हार जाएँगे। बच्चों के साथ आप क्या करेंगे ? मान लीजिए कि बच्चा ऐसा जोर करे कि आपको मारकर वह आग में जा पड़े, तब तो आग में पड़े बिना वह रहेगा ही नहीं। इसका उपाय आपके पास यह है: या तो आग में पड़ने से रोकने के लिए आप उसके प्राण ले लें या उसका आग में पड़ना आपसे देखा नहीं जाता इसलिए आप स्वयं आग में पड़कर अपनी जान दे दें।

[हाशिए का पाठ / Sidebar Text]: बच्चों को रोकने में आप सिर्फ़ बच्चों का स्वार्थ देखते हैं। जिसके ऊपर आप अंकुश रखना चाहते हैं, उस पर उसके स्वार्थ के लिए ही अंकुश रखेंगे। यह मिसाल अंग्रेजों पर जरा भी लागू नहीं होती। आप अंग्रेजों पर जो हथियार बल का उपयोग करना चाहते हैं, उसमें आप अपना ही यानी प्रजा का स्वार्थ देखते हैं। उसमें दया जरा भी नहीं है।

[मुख्य पाठ (जारी)]: आप बच्चों के प्राण तो नहीं ही लेंगे। आपमें अगर संपूर्ण दया भाव न हो, तो मुमकिन है कि आप अपने प्राण नहीं देंगे, तो फिर लाचारी से आप बच्चों को आग में कूदने देंगे। इस तरह आप बच्चों पर हथियार-बल का उपयोग नहीं करते हैं। बच्चों को आप और किसी तरह रोक सकें तो रोकेंगे 109

हिन्द स्वराज और वह बल कम दर्जे का, लेकिन हथियार बल ही होगा ऐसा भी आप न समझ लें। वह बल और ही प्रकार का है। उसी को समझ लेना है। बच्चों को रोकने में आप सिर्फ़ बच्चों का स्वार्थ देखते हैं। जिसके ऊपर आप अंकुश रखना चाहते हैं, उस पर उसके स्वार्थ के लिए ही अंकुश रखेंगे। यह मिसाल अंग्रेजों पर जरा भी लागू नहीं होती। आप अंग्रेजों पर जो हथियार बल का उपयोग करना चाहते हैं, उसमें आप अपना ही यानी प्रजा का स्वार्थ देखते हैं। उसमें दया जरा भी नहीं है। अगर आप यों कहें कि अंग्रेज जो नीच काम करते हैं वह आग है, वे आग में अज्ञान के कारण जाते हैं और आप दया से अज्ञानी को यानी बच्चों को उससे बचाना चाहते हैं, तो इस प्रयोग को आजमाने के लिए आपको जहाँ-जहाँ जो भी आदमी नीच काम करता होगा वहाँ-वहाँ पहुँचना होगा और सामने वाले के बच्चों के प्राण लेने के बजाय अपने प्राणों की आहुति देनी पड़े, इतना पुरुषार्थ आप करना चाहें तो कर सकते हैं, आप स्वतंत्र हैं। पर यह बात बिल्कुल असंभव है। 110

देश भक्ति मनुष्य का पहला गुण है। इसके बिना वह संसार में सिर उठाकर नहीं चल सकता। उस देशभक्ति का त्याग करना चाहिए जो दूसरे राष्ट्रों को आफ़त में डालकर बड़प्पन पाना चाहती है।

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सत्याग्रह-आत्मबल पाठक : आप जिस सत्याग्रह या आत्मबल की बात करते हैं, उसका इतिहास में कोई प्रमाण है ? आज तक दुनिया का एक भी राष्ट्र इस बल से ऊपर चढ़ा हो, ऐसा देखने में नहीं आता। मार-काट के बिना बुरे लोग सीधे रहेंगे ही नहीं, ऐसा विश्वास अभी भी मेरे मन में बना हुआ है। संपादक : कवि तुलसीदास जी ने लिखा है : दया धरम को मूल है, पाप मूल अभिमान, तुलसी दया न छाँड़िये, जब लग घट में प्रान। मुझे तो यह वाक्य शास्त्र-वचन जैसा लगता है। जैसे दो और दो चार ही होते हैं, उतना ही भरोसा मुझे ऊपर के वचन पर है। दयाबल आत्मबल है, सत्याग्रह है और इस बल के दुनिया में इतने लोग प्रमाण पग-पग पर दिखाई देते हैं। अगर यह बल नहीं आज भी जिन्दा हैं, यह होता, तो पृथ्वी रसातल (सात पातालों में से एक) में बताता है कि दुनिया पहुँच गई होती। का आधार हथियार लेकिन आप तो इतिहास प्रमाण चाहते हैं। इसके बल पर नहीं है, बल्कि लिए हमें इतिहास का अर्थ जानना होगा। सत्य, दया और 'इतिहास' का शब्दार्थ है : 'ऐसा हो गया।' ऐसा आत्मबल पर है। अर्थ करें तो आपको सत्याग्रह के कई प्रमाण दिये जा सकेंगे। 'इतिहास' जिस अंग्रेजी शब्द का तरजुमा है और जिस शब्द का अर्थ बादशाहों या राजाओं की इतिहास होता है, उसका अर्थ लेने से सत्याग्रह का प्रमाण नहीं मिल सकता। जस्ते की खान में आप अगर चाँदी ढूँढने जाएँ, तो वह कैसे मिलेगी ? 'हिस्टरी' में दुनिया के कोलाहल की ही कहानी मिलेगी। इसलिए गोरे लोगों में कहावत है कि जिस राष्ट्र की 'हिस्टरी' (कोलाहल) नहीं है वह राष्ट्र सुखी है। राजा लोग कैसे खेलते थे, कैसे खून करते थे, कैसे बैर रखते थे, यह सब 'हिस्टरी' में मिलता है। अगर यही इतिहास होता, अगर इतना ही हुआ होता, तब तो यह दुनिया कब की डूब गई होती। अगर दुनिया की कथा लड़ाई से शुरू हुई होती, तो 113

हिन्द स्वराज्य आज एक भी आदमी जिंदा नहीं रहता। जो प्रजा लड़ाई का ही भोग (शिकार) बन गई, उसकी ऐसी ही दशा हुई है। आस्ट्रेलिया के हब्शी लोगों का नामोनिशान मिट गया है। आस्ट्रेलिया के गोरों ने उनमें से शायद ही किसी को जीने दिया है। जिनकी जड़ ही खत्म हो गई, वे लोग सत्याग्रही नहीं थे। जो ज़िंदा रहेंगे वे देखेंगे कि आस्ट्रेलिया के गोरे लोगों के भी यही हाल होंगे। 'जो तलवार चलाते हैं उनकी मौत तलवार से ही होती है।' हमारे यहाँ ऐसी कहावत है कि 'तैराक की मौत पानी में'। दुनिया में इतने लोग आज भी ज़िन्दा हैं, यह बताता है कि दुनिया का आधार हथियार बल पर नहीं है, बल्कि सत्य, सरकार तो कहेगी कि हम दया या आत्मबल पर है। इसका सबसे बड़ा उसके सामने नंगे होकर प्रमाण तो यही है कि दुनिया लड़ाई के हंगामे के नाचें। तो क्या हम नाचेंगे ? बावजूद टिकी हुई है। इसलिए लड़ाई के बल अगर मैं सत्याग्रही होऊँ तो के बजाय दूसरा ही बल उसका आधार है। सरकार से कहूँगा "यह हजारों बल्कि लाखों लोग प्रेम के बस रहकर कानून आप अपने घर में अपना जीवन बसर करते हैं। करोड़ों कुटुम्बों का रखिए। मैं न तो आपके क्लेश प्रेम की भावना में समा जाता है, डूब सामने नंगा होने वाला हूँ जाता है। सैकड़ों राष्ट्र मेलजोल से रहे हैं, इसको और न नाचने वाला हूँ।" 'हिस्टरी' नोट नहीं करती, 'हिस्टरी' कर भी नहीं लेकिन हम ऐसे असत्याग्रही सकती। जब इस दया की, प्रेम की और सत्य हो गये हैं कि सरकार के की धारा रुकती है, टूटती है, तभी इतिहास में जुल्म के सामने झुककर नंगे वह लिखा जाता है। एक कुटुम्ब के दो भाई होकर नाचने से भी ज्यादा लड़े। इसमें एक ने दूसरे के ख़िलाफ सत्याग्रह नीच काम करते हैं। का बल काम में लिया। दोनों फिर से मिल- जुलकर रहने लगे। इसका नोट कौन लेता है? अगर दोनों भाइयों में वकीलों की मदद से या दूसरे कारणों से वैरभाव बढ़ता और वे हथियारों या अदालतों (अदालत एक तरह का हथियार-बल, शरीर-बल ही है) के ज़रिये लड़ते तो उनके नाम अखबारों में छपते, (अड़ौस-पड़ौस के लोग जानते और शायद इतिहास में भी लिखे जाते। जो बात कुटुम्बों, जमातों और इतिहास के बारे में सच है, वही राष्ट्र के बारे में भी समझ लेना चाहिए। कुटुम्ब के लिए एक कानून और राष्ट्र के लिए दूसरा, ऐसा मानने का कोई कारण नहीं है। 'हिस्टरी' 114

अध्याय १६-२०: सत्याग्रह, आत्मबल, शिक्षा, चरखा व उपसंहार

हिन्द स्वराज्य अस्वाभाविक बातों को दर्ज करती है। सत्याग्रह स्वाभाविक है, इसलिए उसे दर्ज करने की ज़रूरत ही नहीं है। पाठक : आपके कहे मुताबिक तो यही समझ में आता है कि सत्याग्रह की मिसालें इतिहास में नहीं लिखी जा सकतीं। इस सत्याग्रह को ज्यादा समझने की ज़रूरत है। आप जो कुछ कहना चाहते हैं, उसे ज्यादा साफ़ शब्दों में कहेंगे तो अच्छा होगा। संपादक : सत्याग्रह या आत्मबल को अंग्रेजी में 'पैसिव रेजिस्तेन्स' कहा जाता है। जिन लोगों ने अपने अधिकार पाने के लिए खुद दुःख सहन किया था, उनके दुःख सहने के ढंग के लिए यह शब्द बरता गया है। उसका ध्येय लड़ाई अगर लोग एक बार के ध्येय से उल्टा है। जब मुझे कोई काम पसन्द न सीख लें कि जो आये और वह काम मैं न करूँ, तो उसमें मैं सत्याग्रह कानून हमें अन्यायी या आत्मबल का उपयोग करता हूँ। मालूम हो उसे मानना मिसाल के तौर पर मुझे लागू होने वाला कोई नामर्दगी है, तो हमें कानून सरकार ने पास किया। वह कानून मुझे किसी का भी जुल्म पसन्द नहीं है। अब अगर मैं सरकार पर हमला बाँध नहीं सकता। यही करके यह कानून रद्द करवाता हूँ, तो कहा जाएगा स्वराज्य की कुंजी है। कि मैंने शरीर बल का उपयोग किया। अगर मैं उस कानून को मंजूर ही न करूँ और उस कारण से होने वाली सज़ा भुगत लूँ, तो कहा जाएगा कि मैंने आत्मबल या सत्याग्रह से काम लिया। सत्याग्रह में मैं अपना ही बलिदान देता हूँ। यह तो सब कहेंगे कि दूसरे का बलिदान लेने से अपना बलिदान देना ज्यादा अच्छा है। इसके सिवा सत्याग्रह से लड़ते हुए अगर लड़ाई गलत ठहरी तो सिर्फ़ लड़ाई छेड़ने वाला ही दुःख भोगता है यानी अपनी भूल की सज़ा वह खुद भोगता है। ऐसी कई घटनाएँ हुई हैं जिनमें लोग गलती से शामिल हुए थे। कोई भी आदमी दावे से यह नहीं कह सकता कि फलां काम खराब ही है, लेकिन जिसे वह खराब लगा, उसके लिए तो वह खराब ही है। अगर ऐसा ही है तो फिर उसे वह काम नहीं करना चाहिए और उसके लिए दुःख भोगना, कष्ट सहन करना चाहिए। यही सत्याग्रह की कुंजी है। 115

हिन्द स्वराज्य पाठक : तब तो आप कानून के ख़िलाफ होते हैं ! यह बेवफाई कही जाएगी । हमारी गिनती हमेशा कानून को मानने वाली प्रजा में होती है । आप तो 'एक्स्ट्रीमिस्ट' से भी आगे बढ़ते दीखते हैं । 'एक्स्ट्रीमिस्ट' कहता है कि जो कानून बन चुके हैं उन्हें तो मानना ही चाहिए, लेकिन कानून खराब हो तो उनके बनाने वालों को मारकर भगा देना चाहिए । संपादक : मैं आगे बढ़ता हूँ या पीछे रहता हूँ, इसकी परवाह न आपको होनी चाहिए, न मुझे । हम तो जो अच्छा है उसे खोजना चाहते हैं और उसके मुताबिक बरतना चाहते हैं । ठगों के गाँव में अगर हम कानून को मानने वाली प्रजा हैं, इसका सही बहुत से लोग यह कहें अर्थ तो यह है कि हम सत्याग्रही प्रजा हैं । कानून जब कि ठग विद्या सीखनी पसन्द न आये तब हम कानून बनाने वालों का सिर ही चाहिए, तो क्या नहीं तोड़ते, बल्कि उन्हें रद्द कराने के लिए खुद कोई साधु ठग बन उपवास करते हैं, खुद दुःख उठाते हैं । जाएगा ? हरगिज़ नहीं । हमें अच्छे या बुरे कानून को मानना चाहिए, ऐसा अन्यायी कानून को अर्थ तो आजकल का है । पहले ऐसा नहीं था । तब मानना चाहिए, यह चाहे जिस कानून को लोग तोड़ते थे और उसकी सज़ा वहम जब तक दूर नहीं भोगते थे । होता तब तक हमारी कानून हमें पसन्द न हो तो भी उनके मुताबिक गुलामी जाने वाली नहीं चलना चाहिए, यह सिखावन मर्दानगी के ख़िलाफ है और इस वहम को है, धर्म के ख़िलाफ है और गुलामी की हद है । सिर्फ़ सत्याग्रही ही दूर सरकार तो कहेगी कि हम उसके सामने नंगे कर सकता है । होकर नाचें । तो क्या हम नाचेंगे ? अगर मैं सत्याग्रही होऊँ तो सरकार से कहूँगा “यह कानून आप अपने घर में रखिये । मैं न तो आपके सामने नंगा होने वाला हूँ और न नाचने वाला हूँ।” लेकिन हम ऐसे असत्याग्रही हो गये हैं कि सरकार के जुल्म के सामने झुककर नंगे होकर नाचने से भी ज्यादा नीच काम करते हैं । जिस आदमी में सच्ची इन्सानियत है, जो खुदा से ही डरता है, वह और किसी से नहीं डरेगा । दूसरे के बनाये हुए कानून उसके लिए बंधन कारक नहीं होते । बेचारी सरकार भी नहीं कहती कि 'तुम्हें ऐसा करना ही पड़ेगा' वह कहती है कि 'तुम ऐसा नहीं करोगे तो तुम्हें सज़ा होगी ।' हम अपनी अधम दशा के कारण मान लेते हैं कि हमें 'ऐसा ही करना चाहिए,' यह हमारा 116

हिन्द स्वराज फ़र्ज है, यह हमारा धर्म है। अगर लोग एक बार सीख लें कि जो कानून हमें अन्यायी मालूम हो उसे मानना नामर्दगी है, तो हमें किसी का भी जुल्म बाँध नहीं सकता। यही स्वराज्य की कुंजी है। ज्यादा लोग जो कहें उसे थोड़े लोगों को मान लेना चाहिए, यह तो अनीश्वरी बात है, एक वहम है। ऐसी हजारों मिसालें मिलेंगी, जिनमें बहुतों ने जो कहा वह गलत निकला हो और थोड़े लोगों ने जो कहा वह सही निकला हो। सारे सुधार बहुत से लोगों के ख़िलाफ जाकर कुछ लोगों ने ही किसान किसी की तलवार दाखिल करवाए हैं। ठगों के गाँव में अगर बहुत बल के बस न तो कभी से लोग यह कहें कि ठग विद्या सीखनी ही हुए हैं और न होंगे। वे चाहिए, तो क्या कोई साधु ठग बन जाएगा ? तलवार चलाना नहीं हरगिज नहीं। अन्यायी कानून को मानना चाहिए, जानते, न किसी की यह वहम जब तक दूर नहीं होता तब तक हमारी तलवार से वे डरते हैं। वे गुलामी जाने वाली नहीं है और इस वहम को मौत को हमेशा अपना सिर्फ़ सत्याग्रही ही दूर कर सकता है। तकिया बनाकर सोने शरीर बल का उपयोग करना, गोला-बारूद वाली महान प्रजा हैं। काम में लाना, हमारे सत्याग्रह के कानून के उन्होंने मौत का डर छोड़ खिलाफ है। इसका अर्थ तो यह हुआ कि हमें जो दिया है, इसलिए सबका पसंद है वह दूसरे आदमी से हम जबरन करवाना डर छोड़ दिया है। चाहते हैं। अगर यह सही हो तो फिर वह सामने वाला आदमी भी अपनी पसंद का काम हमसे करवाने के लिए हम पर गोला-बारूद चलाने का हकदार है। इस तरह तो हम कभी एक राय पर पहुँचेंगे ही नहीं। कोल्हू के बैल की तरह आँखों पर पट्टी बाँधकर भले ही हम मान लें कि हम आगे बढ़ते हैं, लेकिन दरअसल तो बैल की तरह हम गोल-गोल चक्कर ही काटते रहते हैं। जो लोग ऐसा मानते हैं कि जो कानून खुद को नापसन्द है उसे मानने के लिए आदमी बँधा हुआ नहीं है, उन्हें तो सत्याग्रह को ही सही साधन मानना चाहिए, वरना बड़ा विकट नतीजा आयेगा। पाठक : आप जो कहते हैं उस पर से मुझे लगता है कि सत्याग्रह कमज़ोर आदमियों के लिए काफी काम का है, लेकिन जब वे बलवान बन जाएँ तब तो उन्हें तोप ही चलाना चाहिए। 117

हिन्द स्वराज्य संपादक : यह तो आपने बड़े अज्ञान की बात कही। सत्याग्रह सर्वोपरि बल है। वह जब तोप बल से ज्यादा काम करता है, तो फिर कमज़ोरों का हथियार कैसे माना जाएगा ? सत्याग्रह के लिए जो हिम्मत और बहादुरी चाहिए, वह तोप का बल रखने वाले के पास हो ही नहीं सकती। क्या आप यह मानते हैं कि डरपोक और कमज़ोर आदमी नापसन्द कानून को तोड़ सकेगा ? 'एक्स्टीमिस्ट' तोपबल-पशुबल के हिमायती हैं। वे क्यों कानून को मानने की बात कर रहे हैं ? मैं उनका दोष नहीं निकालता। वे दूसरी कोई बात कर ही नहीं सकते। वे खुद जब अंग्रेजों को मारकर राज्य करेंगे तब आपसे और हमसे जबरन् कानून मनवाना चाहेंगे। उनके तरीके के जो सत्य का सेवन नहीं लिए यही कहना ठीक है, लेकिन सत्याग्रही तो करता, वह सत्य का बल, कहेगा कि जो कानून उसे पसन्द नहीं हैं उन्हें वह सत्य की ताक़त कैसे स्वीकार नहीं करेगा, फिर चाहे उसे तोप के मुँह पर दिखा सकेगा ? इसलिए बाँधकर उसकी धज्जियाँ क्यों न उड़ा दी जाएँ। सत्य की तो पूरी- आप क्या मानते हैं ? तोप चलाकर सैकड़ों को पूरी ज़रूरत रहेगी ही। बड़े मारने में हिम्मत की ज़रूरत है या हँसते-हँसते तोप से बड़ा नुकसान होने पर के मुँह पर बँधकर धज्जियाँ उड़ने देने में हिम्मत भी सत्य को नहीं छोड़ा जा की ज़रूरत है ? खुद मौत को हथेली में रखकर जो सकता। सत्य के लिए चलता-फिरता है वह रणवीर है या दूसरों की मौत कुछ छिपाने को होता ही को अपने हाथ में रखता है वह रणवीर है ? नहीं। इसलिए सत्याग्रही यह निश्चित मानिए कि नामर्द आदमी घड़ी के लिए छिपी सेना भर के लिए भी सत्याग्रही नहीं रह सकता। की ज़रूरत नहीं होती। हाँ, यह सही है कि शरीर से जो दुबला हो वह भी सत्याग्रही हो सकता है। एक आदमी भी सत्याग्रही हो सकता है और लाखों लोग भी हो सकते हैं। मर्द भी सत्याग्रही हो सकता है, औरत भी हो सकती है। उसे अपना लश्कर तैयार करने की ज़रूरत नहीं रहती। उसे पहलवानों की कुश्ती सीखने की ज़रूरत नहीं रहती। उसने अपने मन को काबू में किया कि फिर वह वनराज सिंह की तरह गर्जना कर सकता है और जो उसके दुश्मन बन बैठे हैं उनके दिल इस गर्जना से फट जाते हैं। सत्याग्रह ऐसी तलवार है, जिसके दोनों ओर धार है। उसे चाहे जैसे काम में लिया जा सकता है। जो उसे चलाता है और जिस पर वह चलाई जाती है, वे दोनों सुखी होते हैं। वह खून नहीं निकालती, लेकिन उससे 118

हिन्द स्वराज्य भी बड़ा परिणाम ला सकती है। उसको जंग नहीं लग सकती। उसे कोई चुराकर ले नहीं जा सकता। अगर सत्याग्रही दूसरे सत्याग्रही के साथ होड़ में उतरता है, तो उसमें उसे थकान लगती ही नहीं। सत्याग्रही की तलवार को म्यान की ज़रूरत नहीं रहती। उसे कोई छीन नहीं सकता। फिर भी सत्याग्रह को आप कमज़ोरों का हथियार मानें तो उसे अंधेर ही कहा जाएगा। पाठक : आपने कहा कि वह हिन्दुस्तान का खास हथियार है। तो क्या हिन्दुस्तान में तोप के बल का कभी उपयोग नहीं हुआ है? संपादक : आप हिंदुस्तान का अर्थ मुट्ठीभर राजा कहते हैं। मेरे मन में तो हिन्दुस्तान का अर्थ वे करोड़ों किसान हैं, जिनके सहारे राजा और हम सब जी रहे हैं। राजा तो हथियार काम में लाएँगे ही। उनका जान बचाने के लिए झूठ वह रिवाज ही हो गया है। उन्हें हुक्म चलाना है, बोलना चाहिए या नहीं, लेकिन हुक्म मानने वाले को तोपबल की ज़रूरत ऐसा सवाल यहाँ मन में नहीं है। दुनिया के ज्यादातर लोग हुक्म मानने नहीं उठाना चाहिए। जिसे वाले हैं। उन्हें या तो तोप बल या सत्याग्रह का झूठ का बचाव करना है, बल सिखाना चाहिए। जहाँ वे तोपबल सीखते हैं वही ऐसे बेकार सवाल वहाँ राजा-प्रजा दोनों पागल जैसे हो जाते हैं। उठाता है। जिसे सत्य की जहाँ हुक्म मानने वालों ने सत्याग्रह करना सीखा ही राह लेनी है, उसके है वहाँ राजा का ज़ुल्म उसकी तीन गज की सामने ऐसे धर्म-संकट तलवार से आगे नहीं जा सकता और हुक्म मानने कभी आते ही नहीं। वालों ने अन्यायी हुक्म की परवाह भी नहीं की है। किसान किसी के तलवार बल के बस न तो कभी हुए हैं और न होंगे। वे तलवार चलाना नहीं जानते, न किसी की तलवार से वे डरते हैं। वे मौत को हमेशा अपना तकिया बनाकर सोने वाली महान प्रजा हैं। उन्होंने मौत का डर छोड़ दिया है, इसलिए सबका डर छोड़ दिया है। यहाँ मैं कुछ बढ़ा- चढ़ाकर तस्वीर खींचता हूँ, यह ठीक है लेकिन हम जो तलवार के बल से चकित हो गए हैं, उनके लिए यह कुछ ज्यादा नहीं है। बात यह है कि किसानों ने, प्रजा मंडलों ने अपने और राज्य के कारोबार में सत्याग्रह को काम में लिया है। जब राजा जुल्म करता है तब प्रजा रूठती है। यह सत्याग्रह ही है। 119