ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
३७४
ईशादि नौ उपनिषद्
[ वल्ली २ ]
व्याख्या —इस मन्त्रमें मनुष्यके हृदयरूप गुफाका वर्णन करनेके उद्देश्यसे पहले मनुष्य-शरीरकी उत्पत्तिका प्रकार संक्षेपमें बताकर उसके अङ्गोंकी पक्षीके अङ्गोंके रूपमें कल्पना की गयी है। भाव यह है कि सबके आत्मा अन्तर्यामी परमात्मासे पहले आकाशतत्त्व उत्पन्न हुआ। आकाशसे वायुतत्त्व, वायुसे अग्नितत्त्व, अग्निसे जलतत्त्व और जलसे पृथ्वी उत्पन्न हुई। पृथ्वीसे नाना प्रकारकी ओषधियाँ—अनाजके पौधे हुए और ओषधियोंसे मनुष्योंका आहार अन्न उत्पन्न हुआ। उस अन्नसे यह स्थूल मनुष्य-शरीररूप पुरुष उत्पन्न हुआ। अन्नके रससे बना हुआ यह जो मनुष्य-शरीरधारी पुरुष है, इसकी पक्षीके रूपमें कल्पना की गयी है। इसका जो यह प्रत्यक्ष सिर है, वही तो मानो पक्षीका सिर है; दाहिनी भुजा ही दाहिना पंख है। बायीं भुजा ही बाँया पंख है। शरीरका मध्यभाग ही मानो उस पक्षीके शरीरका मध्यभाग है। दोनों पैर ही पूँछ एवं प्रतिष्ठा (पक्षीके पैर) हैं। अन्नकी महिमाके विषयमें यह आगे कहा जानेवाला श्लोक—मन्त्र है।
॥ प्रथम अनुवाक समाप्त ॥ १ ॥
द्वितीय अनुवाक
अन्नाद्वै प्रजाः प्रजायन्ते। याः काश्च पृथिवीः श्रिताः। अथो अन्नैव जीवन्ति। अथैनदपि यन्त्यन्ततः। अन्नः हि भूतानां ज्येष्ठम्। तस्मात्सर्वोषधमुच्यते। सर्वं वै तेष्वमानुवन्ति येष्वं ब्रह्मोपासते। अन्नः हि भूतानां ज्येष्ठम्। तस्मात्सर्वोषधमुच्यते। अन्नाद्भूतानि जायन्ते। जातान्यन्नेन वर्धन्ते। अद्यतेऽति च भूतानि। तस्मादन्नं तदुच्यत इति।
पृथिवीम् श्रिताः=पृथ्वीलोकका आश्रय लेकर रहनेवाले; याः काः च=जो कोई भी; प्रजाः=प्राणी हैं (वे सब); अन्नात्=अन्नसे; वै=ही; प्रजायन्ते=उत्पन्न होते
अनु० २ ]
तैत्तिरीयोपनिषद्
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हैं; अथो=फिर; अत्रेन एव=अत्रसे ही; जीवन्ति=जीते हैं; अथ=फिर; अन्ततः=अन्तमें; एनत् अपि=इस अत्रमें ही; यन्ति=विलीन हो जाते हैं; अत्रम्=(अतः) अत्र; हि=ही; भूतानाम्=सब भूतोंमें; ज्येष्ठम्=श्रेष्ठ है; तस्मात्=इसलिये (यह); सर्वोषधम्=सर्वोषधरूप; उच्यते=कहलाता है; ये=जो साधक; अत्रम् ब्रह्म=अत्रकी ब्रह्मभावसे; उपासते=उपासना करते हैं; ते वै=वे अवश्य ही; सर्वम्=समस्त; अत्रम्=अत्रको; आनुवन्ति=प्राप्त कर लेते हैं; हि=क्योंकि; अत्रम्=अत्र ही; भूतानाम्=भूतोंमें; ज्येष्ठम्=श्रेष्ठ है; तस्मात्=इसलिये; सर्वोषधम्=(यह) सर्वोषध नामसे; उच्यते=कहा जाता है; अत्रात्=अत्रसे ही; भूतानि=सब प्राणी; जायन्ते=उत्पन्न होते हैं; जातानि=उत्पन्न होकर; अत्रेन=अत्रसे ही; वर्धन्ते=बढ़ते हैं; तत्=वह; अद्यते=(प्राणियोंद्वारा) खाया जाता है; च=तथा; भूतानि=(स्वयं भी) प्राणियोंको; अन्ति=खाता है; तस्मात्=इसलिये; अत्रम्='अत्र'; इति=इस नामसे; उच्यते=कहा जाता है।
व्याख्या —इस मन्त्रमें अत्रकी महिमाका वर्णन किया गया है। भाव यह है कि इस पृथ्वीलोकमें निवास करनेवाले जितने भी प्राणी हैं, वे सब अत्रसे ही उत्पन्न हुए हैं—अत्रके परिणामरूप रज और वीर्यसे ही उनके शरीर बने हैं, उत्पन्न होनेके बाद अत्रसे ही उनका पालन-पोषण होता है, अतः अत्रसे ही वे जीते हैं। फिर अन्तमें इस अत्रमें ही—अत्र उत्पन्न करनेवाली पृथ्वीमें ही विलीन हो जाते हैं। तात्पर्य यह कि समस्त प्राणियोंके जन्म, जीवन और मरण स्थूलशरीरके सम्बन्धसे ही होते हैं; और स्थूलशरीर अत्रसे ही उत्पन्न होते हैं, अत्रसे ही जीते हैं तथा अत्रके उद्गमस्थान पृथ्वीमें ही विलीन हो जाते हैं। उन शरीरोंमें रहनेवाले जो जीवात्मा हैं, वे अत्रमें विलीन नहीं होते; वे तो मृत्युकालमें प्राणोंके साथ इस शरीरसे निकलकर दूसरे शरीरोंमें चले जाते हैं।
इस प्रकार यह अत्र समस्त प्राणियोंकी उत्पत्ति आदिका कारण है, इसीपर सब कुछ निर्भर करता है; इसलिये यही सबसे श्रेष्ठ है और इसीलिये यह सर्वोषधरूप कहलाता है; क्योंकि इसीसे प्राणियोंका शुधाजन्य संताप दूर होता है। सारे संतापोंका मूल शुधा है, इसलिये उसके शान्त होनेपर सारे संताप दूर
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ईशादि नौ उपनिषद्
[ वल्ली २ ]
हो जाते हैं। जो साधक इस अत्रकी ब्रह्मरूपमें उपासना करते हैं अर्थात् 'यह अत्र ही सर्वश्रेष्ठ है, सबसे बड़ा है' यह समझकर इसकी उपासना करते हैं, वे समस्त अत्रको प्राप्त कर लेते हैं। उन्हें यथेष्ट अत्र प्राप्त हो जाता है, अत्रका अभाव नहीं रहता। यह सर्वथा सत्य है कि यह अत्र ही सब भूतोंमें श्रेष्ठ है, इसलिये यह सर्वोपधमय कहलाता है। सब प्राणी अत्रसे उत्पन्न होते हैं और उत्पन्न होनेके बाद अत्रसे ही बढ़ते हैं—उनके अङ्गोंकी पुष्टि भी अत्रसे ही होती है। सब प्राणी इसको खाते हैं तथा यह भी सब प्राणियोंको खा जाता—अपनेमें विलीन कर लेता है, इसीलिये 'अद्यते, अति च इति अत्रम्' इस व्युत्पत्तिके अनुसार इसका नाम अत्र है।
तस्माद्वा एतस्मादन्नरसमयादन्योऽन्तर आत्मा प्राणमयः। तेनैष पूर्णः। स वा एष पुरुषविध एव। तस्य पुरुषविधतामन्वयं पुरुषविधः। तस्य प्राण एव शिरः। व्यानो दक्षिणः पक्षः। अपान उत्तरः पक्षः। आकाश आत्मा। पृथिवी पुच्छं प्रतिष्ठा। तदप्येष श्लोको भवति।
वै=निश्चय ही; तस्मात्=उस; एतस्मात्=इस; अन्नरसमयात्=अन्नरसमय मनुष्यशरीरसे; अन्यः=भिन्न; अन्तरः=उसके भीतर रहनेवाला; प्राणमयः आत्मा=प्राणमय पुरुष है; तेन=उससे; एषः=यह (अन्नरसमय पुरुष); पूर्णः=व्याप्त है; सः=वह; एषः=यह प्राणमय आत्मा; वै=निश्चय ही; पुरुषविधः एव=पुरुषके आकारका ही है; तस्य=उस (अन्नरसमय) आत्माकी; पुरुषविधताम्=पुरुषतुल्य आकृतिमें; अनु=अनुगत (व्याप्त) होनेसे ही; अयम्=यह; पुरुषविधः=पुरुषके आकारका है; तस्य=उस (प्राणमय आत्मा) का; प्राणः=प्राण; एव=ही; शिरः=(मानो) सिर है; व्यानः=व्यान; दक्षिणः=दाहिना; पक्षः=पंख है; अपानः=अपान; उत्तरः=बार्या; पक्षः=पंख है; आकाशः=आकाश; आत्मा=शरीरका मध्यभाग है; (और) पृथिवी=पृथ्वी; पुच्छम्=पूँछ; (एवम्) प्रतिष्ठा=आधार है; तत्=उस प्राण (की महिमा)के विषयमें; अपि=भी; एषः=यह आगे बताया जानेवाला; श्लोकः भवति=श्लोक है।
अनु० ३ ]
तैत्तिरीयोपनिषद्
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व्याख्या —द्वितीय अनुवाकके इस दूसरे अंशमें प्राणमय शरीरका वर्णन किया गया है। भाव यह है कि पूर्वोक्त अत्रके रससे बने हुए स्थूलशरीरसे भिन्न उस स्थूलशरीरके भीतर रहनेवाला एक और शरीर है, उसका नाम 'प्राणमय' है; उस प्राणमयसे यह अत्रमय शरीर पूर्ण है। अत्रमय स्थूल शरीरकी अपेक्षा सूक्ष्म होनेके कारण प्राणमय शरीर इसके अङ्ग-प्रत्यङ्गमें व्याप्त है। वह यह प्राणमय शरीर भी पुरुषके आकारका ही है। अत्रमय शरीरकी पुरुषाकारता प्रसिद्ध है, उसमें अनुगत होनेसे ही यह प्राणमय शरीर भी पुरुषाकर कहा जाता है। उसकी पक्षीके रूपमें कल्पना इस प्रकार है—प्राण ही मानो उसका सिर है; क्योंकि शरीरके अङ्गोंमें जैसे मस्तक श्रेष्ठ है; उसी प्रकार पाँचों प्राणोंमें मुख्य प्राण ही सर्वश्रेष्ठ है। व्यान दाहिना पंख है। अपान बायाँ पंख है। आकाश अर्थात् आकाशमें फैले हुए वायुकी भाँति सर्वशरीरव्यापी 'समानवायु' आत्मा है; क्योंकि वही समस्त शरीरमें समानभावसे रस पहुँचाकर समस्त प्राणमय शरीरको पुष्ट करता है। इसका स्थान शरीरका मध्यभाग है तथा इसीका बाह्य आकाशसे सम्बन्ध है, यह बात प्रश्नोपनिषद्के तीसरे प्रश्नोत्तरके पाँचवें और आठवें मन्त्रोंमें कही गयी है तथा पृथ्वी पूँछ एवं आधार है; अर्थात् अपानवायुको रोककर रखनेवाली पृथ्वीकी आधिदैविक शक्ति ही इस प्राणमय पुरुषका आधार है। इसका वर्णन भी प्रश्नोपनिषद्के तीसरे प्रश्नोत्तरके आठवें मन्त्रमें ही आया है।
इस प्राणकी महिमाके विषयमें आगे कहा हुआ श्लोक—मन्त्र है।
॥ द्वितीय अनुवाक समाप्त ॥ २ ॥
तृतीय अनुवाक
प्राणं देवा अनु प्राणन्ति। मनुष्याः पशवश्च ये। प्राणो हि भूतानामायुः। तस्मात्सर्वायुषमुच्यते। सर्वमेव त आयुर्यन्ति ये प्राणं ब्रह्मोपासते। प्राणो हि भूतानामायुः। तस्मात्सर्वायुषमुच्यत इति। तस्यैष एव शारीर आत्मा यः पूर्वस्य।
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ईशादि नौ उपनिषद्
[ वल्ली २ ]
ये=जो-जो; देवाः=देवता; मनुष्याः=मनुष्य; च=और; पशवः=पशु आदि प्राणी हैं; [ ते ]=वे; प्राणम् अनु=प्राणका अनुसरण करके ही; प्राणन्ति=चेष्टा करते अर्थात् जीवित रहते हैं; हि=क्योंकि; प्राणः=प्राण ही; भूतानाम्=प्राणियोंकी; आयुः=आयु है; तस्मात्=इसलिये; (यह प्राण) सर्वायुषम्=सबका आयु; उच्यते=कहलाता है; प्राणः=प्राण; हि=ही; भूतानाम्=प्राणियोंकी; आयुः=आयु—जीवन है; तस्मात्=इसलिये; (वह) सर्वायुषम्=सबका आयु; उच्यते=कहलाता है; इति=यह समझकर; ये=जो कोई; प्राणम्=प्राणस्वरूप; ब्रह्म=ब्रह्मकी; उपासते=उपासना करते हैं; ते=वे; सर्वम् एव=निस्संदेह समस्त; आयुः=आयुको; यन्ति=प्राप्त कर लेते हैं; तस्य=उसका; एषः एव=यही; शरीरः=शरीरमें रहनेवाला; आत्मा=अन्तरात्मा है; यः=जो; पूर्वस्य=पहलेवालेका अर्थात् अत्ररसमय शरीरका अन्तरात्मा है।
व्याख्या —तृतीय अनुवाकके इस पहले अंशमें प्राणकी महिमाका वर्णन करनेवाली श्रुतिका उल्लेख करके फिर इस प्राणमय शरीरके अन्तर्यामी परमेश्वरको लक्ष्य कराया गया है। भाव यह है कि जितने भी देवता, मनुष्य, पशु आदि शरीरधारी प्राणी हैं, वे सब प्राणके सहारे ही जी रहे हैं। प्राणके बिना किसीका भी शरीर नहीं रह सकता; क्योंकि प्राण ही सब प्राणियोंकी आयु—जीवन है, इसीलिये यह प्राण 'सर्वायुष' कहलाता है। जो साधक यह प्राणियोंकी आयु है, इसलिये यह सबका आयु—जीवन कहलाता है; यों समझकर इस प्राणकी ब्रह्मरूपसे उपासना करते हैं, वे पूर्ण आयुको प्राप्त कर लेते हैं। प्रश्नोपनिषद्में भी कहा है कि जो मनुष्य इस प्राणके तत्त्वको जान लेता है, वह स्वयं अमर हो जाता है और उसकी प्रजा नष्ट नहीं होती है (३।११)। जो सर्वात्मा परमेश्वर अत्रके रससे बने हुए स्थूलशरीरधारी पुरुषका अन्तरात्मा है, वही उस प्राणमय पुरुषका भी शरीरान्तर्वर्ती अन्तर्यामी आत्मा है।
तस्माद्वा एतस्मात्प्राणमयादयोज्जर आत्मा मनोमयः। तैनेष पूर्णः। स वा एष पुरुषविध एव। तस्य पुरुषविधतामन्वयं पुरुषविधः।
अनु० ३ ]
तैत्तिरीयोपनिषद्
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तस्य यजुरेव शिरः। ऋगदक्षिणः पक्षः। सामोत्तरः पक्षः। आदेश आत्मा। अथर्वाङ्गिरसः पुच्छं प्रतिष्ठा। तदप्येष श्लोको भवति।
वै=यह निश्चय है कि; तस्मात्=उस; एतस्मात्=इस; प्राणमयात्=प्राणमय पुरुषसे; अन्यः=भिन्न; अन्तरः=उसके भीतर रहनेवाला; मनोमयः=मनोमय; आत्मा=आत्मा (पुरुष) है; तेन=उस मनोमय शरीरसे; एषः=यह प्राणमय शरीर; पूर्णः=व्याप्त है; सः=वह; एषः=यह मनोमय शरीर; वै=निश्चय ही; पुरुषविधः=पुरुषके आकारका; एव=ही है; तस्य=उसकी; पुरुषविधताम् अनु=पुरुषतुल्य आकृतिमें अनुगत (व्याप्त) होनेसे ही; अयम्=यह मनोमय शरीर; पुरुषविधः=पुरुषके आकारका है; तस्य=उस (मनोमय पुरुष)का; यजुः=यजुर्वेद; एव=ही; शिरः=(मानो) सिर है; ऋक्=ऋग्वेद; दक्षिणः=दाहिना; पक्षः=पंख है; साम=सामवेद; उत्तरः=बायाँ; पक्षः=पंख है; आदेशः=आदेश (विधिवाक्य); आत्मा=शरीरका मध्यभाग है; अथर्वाङ्गिरसः=अथर्वा और अङ्गिरा ऋषिद्वारा देखे गये अथर्ववेदके मन्त्र ही; पुच्छम्=पूँछ; (एवं) प्रतिष्ठा=आधार हैं; तत्=उसकी महिमाके विषयमें; अपि=भी; एषः=यह आगे कहा जानेवाला; श्लोकः भवति=श्लोक है।
व्याख्या—इस तृतीय अनुवाकके दूसरे अंशमें मनोमय पुरुषका वर्णन किया गया है। भाव यह है कि पहले बताये हुए प्राणमय पुरुषसे भिन्न, उससे भी सूक्ष्म होनेके कारण उसके भीतर रहनेवाला दूसरा पुरुष है; उसका नाम है मनोमय। उस मनोमयसे यह प्राणमय शरीर पूर्ण है अर्थात् वह इस प्राणमय शरीरमें सर्वत्र व्याप्त हो रहा है। वह यह मनोमय शरीर भी पुरुषके ही आकारका है। प्राणमय पुरुषमें अनुगत होनेसे ही यह मनोमय शरीर पुरुषके समान आकारवाला है। उसकी पक्षीके रूपमें इस प्रकार कल्पना की गयी है—उस मनोमय पुरुषका मानो यजुर्वेद ही सिर है, ऋग्वेद दाहिना पंख है, सामवेद बायाँ पंख है, आदेश (विधिवाक्य) मानो शरीरका मध्यभाग है तथा अथर्वा और अङ्गिरा ऋषियोंद्वारा देखे हुए अथर्ववेदके मन्त्र ही पूँछ और आधार हैं।
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ईशादि नौ उपनिषद्
[ वल्ली २ ]
यज्ञ आदि कर्मोंमें यजुर्वेदके मन्त्रोंकी ही प्रधानता है। इसके सिवा जिनके अक्षरोंकी कोई नियत संख्या न हो तथा जिनकी पाद-पूर्तिका कोई नियत नियम न हो, ऐसे मन्त्रोंको ‘यजुः’ छन्दके अन्तर्गत समझा जाता है। इस नियमके अनुसार जिस किसी वैदिक वाक्य या मन्त्रके अन्तमें ‘स्वाहा’ पद जोड़कर अग्रिममें आहुति दी जाती है, वह वाक्य या मन्त्र भी ‘यजुः’ ही कहलायेगा। इस प्रकार यजुर्मन्त्रोंके द्वारा ही अग्रिको हविष्य अर्पित किया जाता है, इसलिये वहाँ यजुः प्रधान है। अङ्गोंमें भी सिर प्रधान है, अतः यजुर्वेदको सिर बतलाना उचित ही है। वेद-मन्त्रोंके वर्ण, पद और वाक्य आदिके उच्चारणके लिये पहले मनमें ही संकल्प उठता है; अतः संकल्पात्मक वृत्तिके द्वारा मनोमय पुरुषके साथ वेद-मन्त्रोंका घनिष्ठ सम्बन्ध है। इसीलिये इन्हें मनोमय पुरुषके ही अङ्गोंमें स्थान दिया गया है। शरीरमें जो स्थान दोनों भुजाओंका है, वही स्थान मनोमय पुरुषके अङ्गोंमें ऋग्वेद और सामवेदका है। यज्ञ-यागदिमें इनके मन्त्रोंद्वारा स्तवन और गायन होता है, अतः यजुर्मन्त्रोंकी अपेक्षा ये अप्रधान हैं; फिर भी भुजाओंकी भाँति यज्ञमें विशेष सहायक हैं, अतएव इनको भुजाओंका रूप दिया गया है। आदेश (विधि) वाक्य वेदोंके भीतर हैं, अतः उन्हें ही मनोमय पुरुषके अङ्गोंका मध्यभाग बताया गया है। अथर्ववेदमें शान्तिक-पौष्टिक आदि कर्मोंके साथक मन्त्र हैं, जो प्रतिष्ठाके हेतु हैं; अतः उनको पुच्छ एवं प्रतिष्ठा कहना सर्वथा युक्तिसंगत ही है। संकल्पात्मक वृत्तिके द्वारा मनोमय पुरुषका इन सबके साथ नित्य सम्बन्ध है, इसीलिये वेदमन्त्रोंको उसका अङ्ग बताया गया है—यह बात सदा स्मरण रखनी चाहिये।
इस मनोमय पुरुषकी महिमाके विषयमें भी यह आगे चतुर्थ अनुवाकमें कहा जानेवाला श्लोक अर्थात् मन्त्र है।
॥ तृतीय अनुवाक समाप्त ॥ ३ ॥
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अनु० ४ ]
तैत्तिरीयोपनिषद्
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चतुर्थ अनुवाक
यतो वाचो निवर्तन्ते । अप्राप्य मनसा सह । आनन्दं ब्रह्मणो विद्वान् । न विभेति कदाचनेति । तस्यैष एव शारीर आत्मा यः पूर्वस्य ।
यतः=जहाँसे; मनसा सह=मनके सहित; वाचः=वाणी आदि इन्द्रियाँ; अप्राप्य=उसे न पाकर; निवर्तन्ते=लौट आती हैं; [ तस्य ] ब्रह्मणः=उस ब्रह्मके; आनन्दम्=आनन्दको; विद्वान्=जाननेवाला पुरुष; कदाचन=कभी; न विभेति=भय नहीं करता; इति=इस प्रकार यह श्लोक है; तस्य=उस मनोमय पुरुषका भी; एषः एव=यही परमात्मा; शारीरः=शरीरान्तर्वर्ती; आत्मा=आत्मा है; यः=जो; पूर्वस्य=पहले बताये हुए अन्नरसमय शरीर या प्राणमय शरीरका है।
व्याख्या—इस मन्त्रमें ब्रह्मके आनन्दको जाननेवाले विद्वान्की महिमाके साथ अर्थान्तरसे उसके मनोमय शरीरकी महिमा प्रकट की गयी है। भाव यह है कि परब्रह्म परमात्माका जो स्वरूपभूत परम आनन्द है, वहाँतक मन, वाणी आदि समस्त इन्द्रियोंके समुदायरूप मनोमय शरीरकी भी पहुँच नहीं है; परंतु ब्रह्मको पानेके लिये साधन करनेवाले मनुष्यको यह ब्रह्मके पास पहुँचानेमें विशेष सहायक है। ये मन-वाणी आदि साधनपरायण पुरुषको उन परब्रह्मके द्वारतक पहुँचाकर, उसे वहाँ छोड़कर स्वयं लौट आते हैं और वह साधक उनको प्राप्त हो जाता है। ब्रह्मके आनन्दमय स्वरूपको जान लेनेवाला विद्वान् कभी भयभीत नहीं होता। इस प्रकार यह मन्त्र है।
मनोमय शरीरके भी अन्तर््यामी आत्मा वे ही परमात्मा हैं, जो पूर्वोक्त अन्नरसमय शरीर और प्राणमय शरीरके अन्तर््यामी हैं।
तस्माद्वा एतस्मान्नमनोमयादन्योऽन्तर आत्मा विज्ञानमयस्तेनेष पूर्णः । स वा एष पुरुषविध एव । तस्य पुरुषविधतामन्वयं पुरुष-विधः । तस्य श्रद्धैव शिरः । ऋतं दक्षिणः पक्षः । सत्यमुत्तरः पक्षः । योग आत्मा । महः पुच्छं प्रतिष्ठा । तदप्येष श्लोको भवति ।
वै=निश्चय ही; तस्मात्=उस पहले बताये हुए; एतस्मात्=इस; मनोमयात्=
३८२
ईशादि नौ उपनिषद्
[ वल्ली २ ]
मनोमय पुरुषसे; अन्यः=अन्य; अन्तरः=इसके भीतर रहनेवाला; आत्मा=आत्मा; विज्ञानमयः=विज्ञानमय है; तेन=उस विज्ञानमय आत्मासे; एषः=यह मनोमय शरीर; पूर्णः=व्याप्त है; सः=वह; एषः=यह विज्ञानमय आत्मा; वै=निस्संदेह; पुरुषविधः एव=पुरुषके आकारका ही है; तस्य=उसकी; पुरुषविधत्वात् अनु=पुरुषाकृतिमें अनुगत होनेसे ही; अयम्=यह विज्ञानमय आत्मा; पुरुषविधः=पुरुषके आकारका बताया जाता है; तस्य=उस विज्ञानमय आत्माका; श्रद्धा=श्रद्धा; एव=ही; शिरः=(मानो) सिर है; व्रतम्=सदाचारका निश्चय; दक्षिणः=दाहिना; पक्षः=पंख है; सत्यम्=सत्यभाषणका निश्चय; उत्तरः=बायाँ; पक्षः=पंख है; योगः=(ध्यानद्वारा परमात्मामें एकाग्रतारूप) योग ही; आत्मा=शरीरका मध्यभाग है; महः='महः' नामसे प्रसिद्ध परमात्मा ही; पुच्छम्=पुच्छ; (एवं) प्रतिष्ठा=आधार है; तत्=उस विषयमें; अपि=भी; एषः=यह आगे कहा जानेवाला; श्लोकः=श्लोक; भवति=है।
व्याख्या —चतुर्थ अनुवाकके इस दूसरे अंशमें विज्ञानमय पुरुषका अर्थात् विज्ञानमय शरीरके अधिष्ठाता जीवात्माका वर्णन है। भाव यह है कि पहले बताये हुए मनोमय शरीरसे भी सूक्ष्म होनेके कारण उसके भीतर रहनेवाला जो आत्मा है, वह अन्य है। वह है विज्ञानमय पुरुष अर्थात् बुद्धिरूप गुफामें निवास करनेवाला और उसमें तदाकार-सा बना हुआ जीवात्मा। उससे यह मनोमय शरीर पूर्ण है। अर्थात् वह इस मनोमय शरीरमें सर्वत्र व्याप्त है और मनोमय अपनेसे पहलेवाले प्राणमय और अन्नमयमें व्याप्त है। अतः यह विज्ञानमय जीवात्मा समस्त शरीरमें व्याप्त है। गीतामें भी यही कहा है कि जीवात्मारूप क्षेत्रज्ञ शरीररूप क्षेत्रमें सर्वत्र स्थित है (१३।३२)। वह विज्ञानमय आत्मा भी निश्चय ही पुरुषके आकारका है। उस मनोमय पुरुषमें व्याप्त होनेसे ही वह पुरुषाकार कहा जाता है। उस विज्ञानमयके अङ्गोंकी पक्षीके रूपमें इस प्रकार कल्पना की गयी है। श्रद्धा कहते हैं बुद्धिकी निश्चित विश्वासरूप वृत्तिको; वही उस विज्ञानात्माके शरीरमें प्रधान अङ्गरूप सिर है; क्योंकि यह दृढ़ विश्वास ही प्रत्येक विषयमें उन्नतिका कारण है। परमात्माकी प्राप्तिमें तो सबसे पहले और सबसे अधिक इसीकी आवश्यकता है। सदाचरणका निश्चय ही इसका दाहिना पंख है, सत्य-भाषणका निश्चय ही इसका बायाँ पंख है। ध्यानद्वारा परमात्माके साथ संयुक्त
अनु० ५ ]
तैत्तिरीयोपनिषद्
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रहना ही विज्ञानमय शरीरका मध्यभाग है और 'महः' नामसे प्रसिद्ध* परमात्मा पुच्छ और आधार है; क्योंकि परमात्मा ही जीवात्माका परम आश्रय है।
इस विज्ञानात्माकी महिमाके विषयमें भी यह आगे पञ्चम अनुवाकमें कहा जानेवाला श्लोक अर्थात् मन्त्र है।
॥ चतुर्थ अनुवाक समाप्त ॥ ४ ॥
पञ्चम अनुवाक
विज्ञानं यज्ञं तनुते। कर्माणि तनुतेऽपि च। विज्ञानं देवाः सर्वे। ब्रह्म ज्येष्ठमुपासते। विज्ञानं ब्रह्म चेद्देव। तस्माच्छेन्न प्रमाद्यति। शरीरे पाप्मनो हित्वा। सर्वाङ्कामान्समशनुत इति। तस्यैष एव शारीर आत्मा यः पूर्वस्य।
विज्ञानम्=विज्ञान ही; यज्ञम् तनुते=यज्ञोंका विस्तार करता है; च=और; कर्माणि अपि तनुते=कर्माँका भी विस्तार करता है; सर्वे=सब; देवाः=इन्द्रियरूप देवता; ज्येष्ठम्=सर्वश्रेष्ठ; ब्रह्म=ब्रह्मके रूपमें; विज्ञानम् उपासते=विज्ञानकी ही सेवा करते हैं; चेतु=यदि; (कोई) विज्ञानम्=विज्ञानको; ब्रह्म=ब्रह्मरूपसे; वेद=जानता है; (और) चेतु=यदि; तस्मात्=उससे; न प्रमाद्यति=प्रमाद नहीं करता, उस निश्चयसे कभी विचलित नहीं होता (तो); पाप्मनः=(शरीराभिमानजनित) पापसमुदायको; शरीर=शरीरमें ही; हित्वा=छोड़कर; सर्वाङ्कामान्=समस्त भोगोंका; समशनुते=अनुभव करता है; इति=इस प्रकार यह श्लोक है; तस्य=उस विज्ञानमयका; एषः=यह परमात्मा; एव=ही; शारीर=शरीरान्तर्वर्ती; आत्मा=आत्मा है; यः=जो; पूर्वस्य=पहलेवालेका है।
- शीक्षावल्ली पञ्चम अनुवाकमें 'भूः','भुवः','स्वः' और 'महः'—इन चार व्याहृतियोंमें 'महः'को ब्रह्मका स्वरूप बताया गया है, अतः 'महः' व्याहृति ब्रह्मका नाम है और ब्रह्मको आत्माकी प्रतिष्ठा बतलाना सर्वथा युक्तिसंगत है।
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ईशादि नौ उपनिषद्
[ वल्ली २ ]
व्याख्या —इस मन्त्रमें विज्ञानात्माकी महिमाका वर्णन और उसकी ब्रह्मरूपसे उपासना करनेका फल बताया गया है। भाव यह है कि यह विज्ञान अर्थात् बुद्धिके साथ तद्रूप हुआ जीवात्मा ही यज्ञोंका अर्थात् शुभ-कर्मरूप पुण्योंका विस्तार करता है और यही अन्यान्य लौकिक कर्मोंका भी विस्तार करता है। अर्थात् जीवात्मासे ही सम्पूर्ण कर्मोंको प्रेरणा मिलती है। सम्पूर्ण इन्द्रियाँ और मनरूप देवता सर्वश्रेष्ठ ब्रह्मके रूपमें इस विज्ञानमय जीवात्माकी ही सेवा करते हैं, अपनी-अपनी वृत्तियोंद्वारा इसीको सुख पहुँचाते रहते हैं। यदि कोई साधक इस विज्ञानस्वरूप आत्माको ही ब्रह्म समझता है और यदि यह उस धारणासे कभी च्युत नहीं होता अर्थात् उस धारणामें भूल नहीं करता या शरीर आदिमें स्थित, एकदेशीय एवं बद्धस्वरूपमें ब्रह्मका अभिमान नहीं कर लेता तो वह अनेक जन्मोंके संचित पापसमुदायको शरीरमें ही छोड़कर समस्त दिव्य भोगोंका अनुभव करता है। इस प्रकार यह श्लोक है।
उस विज्ञानमयके भी अन्तर्यामी आत्मा वे ही परब्रह्म परमेश्वर हैं, जो पहलेवालोंके अर्थात् अन्नरसमय स्थूलशरीरके, प्राणमयके और मनोमयके हैं।
तस्माद्वा एतस्माद्विज्ञानमयादन्योऽन्तर आत्माऽऽनन्दमयः । तेनैष पूर्णः । स वा एष पुरुषविध एव । तस्य पुरुषविधतामन्वयं पुरुषविधः । तस्य प्रियमेव शिरः । मोदो दक्षिणः पक्षः । प्रमोद उत्तरः पक्षः । आनन्द आत्मा । ब्रह्म पुच्छं प्रतिष्ठा । तदप्येष श्लोको भवति ।
वै =निश्चय ही; तस्मात् =उस पहले कहे हुए; एतस्मात् =इस; विज्ञानमयात् =विज्ञानमय जीवात्मासे; अन्यः =भिन्न; अन्तरः =इसके भी भीतर रहनेवाला आत्मा; आनन्दमयः आत्मा =आनन्दमय परमात्मा है; तेन =उससे; एषः =यह विज्ञानमय; पूर्णः =पूर्णतः व्याप्त है; सः =वह; एषः =यह आनन्दमय परमात्मा; वै =भी; पुरुषविधः =पुरुषके समान आकारवाला; एव =ही है; तस्य =उस विज्ञानमयकी; पुरुषविधताम् अनु =पुरुषाकारतामें अनुगत होनेसे ही; अयम् =यह (आनन्दमय परमात्मा); पुरुषविधः =पुरुषाकार कहा जाता है; तस्य =उस आनन्दमयका; प्रियम् =प्रिय;
अनु० ५ ]
तैत्तिरीयोपनिषद्
३८५
एव=ही; शिरः=(मानो) सिर है; मोदः=मोद; दक्षिणः=दाहिना; पक्षः=पंख है; प्रमोदः=प्रमोद; उत्तरः=बायाँ; पक्षः=पंख है; आनन्दः=आनन्द ही; आत्मा=शरीरका मध्यभाग है; ब्रह्म=ब्रह्म; पुच्छम्=पूँछ; (एवं) प्रतिष्ठा=आधार है; तत्=उसकी महिमाके विषयमें; अपि=भी; एषः=यह; श्लोकः भवति=श्लोक है।
व्याख्या —पञ्चम अनुवाकके इस दूसरे अंशमें आनन्दमय परमपुरुषका वर्णन किया गया है। भाव यह है कि पहले अंशमें कहे हुए विज्ञानमय जीवात्मासे भिन्न, उसके भी भीतर रहनेवाला एक दूसरा आत्मा है; वह है आनन्दमय परमात्मा। उससे यह विज्ञानमय पुरुष व्याप्त है अर्थात् वह इसमें भी परिपूर्ण है। बृहदारण्यक-उपनिषद् (३।७।२३) में भी परमात्माको जीवात्मारूप शरीरका शासन करनेवाला और उसका अन्तरात्मा बताया गया है। वे ही वास्तवमें समस्त पुरुषोंसे उत्तम होनेके कारण 'पुरुष' शब्दके अभिधेय हैं। वे विज्ञानमय पुरुषके समान आकारवाले हैं। उस विज्ञानमय पुरुषमें व्याप्त होनेके कारण ही वे पुरुषाकार कहे जाते हैं। पक्षीके रूपकमें उन आनन्दमय परमेश्वरके अङ्गोंकी कल्पना इस प्रकार की गयी है। प्रियभाव उनका सिर है। तात्पर्य यह कि आनन्दमय परमात्मा सबके प्रिय हैं। समस्त प्राणी 'आनन्द'से प्रेम करते हैं, सभी 'आनन्द' को चाहते हैं, परंतु न जाननेके कारण उन्हें पा नहीं सकते। यह 'प्रियता' उन आनन्दमय परमात्माका एक प्रधान अंश है; अतः यही मानो उनका प्रधान अङ्ग सिर है। मोद दाहिना पंख है, प्रमोद बायाँ पंख है, आनन्द ही परमात्माका मध्य अङ्ग है तथा स्वयं ब्रह्म ही इनकी पूँछ एवं आधार हैं। परमात्मा अवयवरहित होनेके कारण उनके स्वरूप और अङ्गोंका वर्णन वास्तविकरूपसे नहीं बन सकता। फिर ऐसी कल्पना क्यों की गयी? इसका समाधान करते हुए ब्रह्मसूत्र (३।३।१२ से ३।३।१४ तक) में यह स्पष्ट कर दिया गया है कि ब्रह्मके विषयमें ऐसी कल्पना केवल उपासनाकी सुगमताके लिये की जाती है, दूसरा कोई प्रयोजन नहीं है। इस प्रकरणमें विज्ञानमयका अर्थ जीवात्मा और आनन्दमयका अर्थ परमात्मा ही लेना चाहिये, यह बात
३८६
ईशादि नौ उपनिषद्
[ वल्ली २ ]
ब्रह्मसूत्र (१।१।१२ से १९ तकके विवेचन)में युक्तियों तथा श्रुतियोंके प्रमाणोंद्वारा सिद्ध की गयी है।
इन आनन्दमय परमात्माके विषयमें भी आगे षष्ठ अनुवाकमें कहा जानेवाला श्लोक अर्थात् मन्त्र है।
॥पञ्चम अनुवाक समाप्त॥५॥
षष्ठ अनुवाक
असत्रेव स भवति। असद्व्रहोति वेद चेत्। अस्ति ब्रहोति चेद्देद। सन्तमेनं ततो विदुरिति।
चेत्=यदि; (कोई) ब्रह्म=ब्रह्म; असत्=नहीं है; इति=इस प्रकार; वेद=समझता है; (तो) सः=वह; असत्=असत्; एव=ही; भवति=हो जाता है; (और) चेत्=यदि; (कोई) ब्रह्म=ब्रह्म; अस्ति=है; इति=इस प्रकार; वेद=जानता है; ततः=तो; एनम्=इसको; (ज्ञानीजन) सन्तम्=संत—सत्पुरुष; विदुः=समझते हैं; इति=इस प्रकार यह श्लोक है।
व्याख्या —इस मन्त्रमें ब्रह्मकी सत्ता माननेका और न माननेका फल बताया गया है। भाव यह है कि यदि कोई मनुष्य यह समझता है या ऐसा निश्चय करता है कि 'ब्रह्म असत् है' अर्थात् ब्रह्म या ईश्वर नामकी कोई चीज नहीं है तो वह 'असत्' हो जाता है, अर्थात् स्वेच्छाचारी होकर सदाचारसे भ्रष्ट नीच प्रकृतिका हो जाता है। यदि कोई मनुष्य ब्रह्मके यथार्थ तत्त्वको न जानकर भी यह समझता है कि 'निसंदेह ब्रह्म है', अर्थात् शास्त्र और महापुरुषोंपर दृढ़ विश्वास होनेके कारण यदि उसके मनमें ईश्वरकी सत्तापर पूरा विश्वास हो गया है तो ऐसे मनुष्यको ज्ञानी और महापुरुष 'संत' अर्थात् सत्पुरुष समझते हैं; क्योंकि परमात्माके तत्त्वज्ञानकी पहली सीढ़ी उनकी सत्तामें विश्वास ही है। परमात्माकी सत्तामें विश्वास बना रहे तो कभी-न-कभी किन्हीं महापुरुषकी कृपासे साधनमें लगकर मनुष्य उन्हें प्राप्त भी कर सकता है।
अनु० ६ ]
तैत्तिरीयोपनिषद्
३८७
तरयैष एव शारीर आत्मा यः पूर्वस्य।
तस्य=उस (आनन्दमय) का भी; एषः एव=यही; शारीरः=शरीरान्तर्वर्ती; आत्मा=आत्मा है; यः=जो; पूर्वस्य=पहलेवाले (विज्ञानमय)का है।
व्याख्या —पछ अनुवाकके इस दूसरे अंशमें पहलेके वर्णनानुसार आनन्दमयका अन्तरात्मा स्वयं आनन्दमयको ही बताया गया है। भाव यह है कि उन आनन्दमय ब्रह्मके वे स्वयं ही शरीरान्तर्वर्ती आत्मा हैं; क्योंकि उनमें शरीर और शरीरीका भेद नहीं है। जो पहले बताये हुए अन्नरसमय आदि सबके अन्तर्यामी परमात्मा हैं, वे स्वयं ही अपने अन्तर्यामी हैं; उनका अन्तर्यामी कोई दूसरा नहीं है। इसीलिये इनके आगे किसी दूसरेको न बताकर उस वर्णनकी परम्पराको यहीं समाप्त कर दिया गया है।
सम्बन्ध —ऊपर कहे हुए अंशमें ब्रह्मको 'असत्' मानने और 'सत्' माननेका फल बताया गया है; उसे सुनकर प्रत्येक मनुष्यके मनमें जो प्रश्न उठ सकते हैं, उन प्रश्नोंका निर्णय करके उन ब्रह्मकी सत्ताका प्रतिपादन करनेके लिये श्रुति स्वयं ही प्रश्न उपस्थित करती हैं—
अथातोऽनुप्रश्नाः । उताविद्वानमुं लोकं प्रेत्य कश्चन गच्छती ३ । आहो विद्वानमुं लोकं प्रेत्य कश्चित्समश्रुता ३ उ ।
अथ=इसके बाद; अतः=यहाँसे; अनुप्रश्नाः=अनुप्रश्न आरम्भ होते हैं; उत=क्या; अविद्वान्=ब्रह्मको न जाननेवाला; कश्चन=कोई पुरुष; प्रेत्य=मरकर; अमुम् लोकम् गच्छति=उस लोकमें (परलोकमें) जाता है; आहो=अथवा; कश्चित्=कोई भी; विद्वान्=ज्ञानी; प्रेत्य=मरकर; अमुम्=उस; लोकम्=लोकको; समश्रुते=प्राप्त होता है; उ=क्या ?
व्याख्या —अब यहाँसे अनुप्रश्न* आरम्भ करते हैं। पहला प्रश्न तो यह है कि यदि ब्रह्म हैं तो उनको न जाननेवाला कोई भी मनुष्य मरनेके अनन्तर
- अनुप्रश्न उन प्रश्नोंको कहते हैं, जो आचार्यके उपदेशके अनन्तर किसी शिष्यके मनमें उठते हैं या जिन्हें वह उपस्थित करता है।
इस अनुवाकमें जो अनुप्रश्न पूछे गये हैं, वे दोके रूपमें तीन हैं—(१) वास्तवमें ब्रह्म है या नहीं ? (२) जब ब्रह्म आकाशकी भाँति सर्वगत तथा पक्षपातरहित—सम हैं,
३८८
ईशादि नौ उपनिषद्
[ वल्ली २ ]
परलोकमें जाता है या नहीं? दूसरा यह प्रश्न है कि ब्रह्मको जाननेवाला कोई भी विद्वान् मरनेके बाद परलोकको प्राप्त होता है या नहीं?
सम्बन्ध —इन प्रश्नोंके उत्तरमें श्रुति ब्रह्मके स्वरूप और शक्तिका वर्णन करती है तथा पहले अनुवाकमें जो संक्षेपसे सृष्टिकी उत्पत्तिका क्रम बताया था, उसे भी विशदरूपसे समझाया जाता है—
सोऽकामयत्। बहु स्यां प्रजायेयेति। स तपोऽतप्यत। स तपस्तप्त्वा इदः सर्वमसृजत यदिदं किं च। तत्सृष्ट्वा तदेवानु प्राविशत्। तदनुप्रविश्य सच्च त्यच्चाभवत्। निरुक्तं चानिरुक्तं च। निलयनं चानिलयनं च। विज्ञानं चाविज्ञानं च। सत्यं चानुतं च सत्यमभवत्। यदिदं किं च। तत्सत्यमित्याचक्षते। तदप्येष श्लोको भवति।
सः =उस परमेश्वरने; अकामयत् =विचार किया कि; प्रजायेयः =में प्रकट होऊँ; (और अनेक नाम-रूप धारण करके) बहु =बहुत; स्याम् इति =हो जाऊँ; सः =(इसके बाद) उसने ; तपः अतप्यत =तप किया अर्थात् अपने संकल्पका
तब वे अविद्वान् (अपना ज्ञान न रखनेवाले) को भी प्राप्त होते हैं या नहीं? (३) यदि अविद्वान्को नहीं प्राप्त होते, तब तो सम होनेके कारण वे विद्वान्को भी नहीं प्राप्त होंगे। इसलिये यह तीसरा प्रश्न है कि विद्वान् पुरुष ब्रह्मका अनुभव करता है या नहीं? इनके उत्तरमें ब्रह्मको सृष्टिका कारण बतलाकर अर्थतः उनकी सत्ता सिद्ध कर दी गयी। फिर 'तत् सत्यम् इत्याचक्षते'……' इस वाक्यद्वारा श्रुतिने स्पष्टरूपसे भी उनकी सत्ताका प्रतिपादन कर दिया। सातवें अनुवाकमें तो और भी स्पष्ट वचन मिलता है—'को होवान्यात्? कः प्राण्यात्? यदेष आकाश आनन्दो न स्यात्।' अर्थात् यदि ये आकाशरूप आनन्दमय परमात्मा न होते तो कौन जीवित रहता और कौन चेष्टा भी कर सकता? अर्थात् प्राणियोंका जीवन और चेष्टा परमात्मापर ही निर्भर है। दूसरे प्रश्नके उत्तरमें सप्तम अनुवाकमें यह बात कही गयी है कि जबतक मनुष्य परमात्माको पूर्णतया नहीं जान लेता, उनमें थोड़ा-सा भी अन्तर रख लेता है, तबतक वह जन्म-मरणके भयसे नहीं छूटता। तीसरे प्रश्नके उत्तरमें आठवें अनुवाकके उपसंहारमें श्रुति स्वयं कहती है—'स एर्ववित्'……' आनन्दमयमात्मानमुपसंक्रामति' अर्थात् 'जो इस प्रकार (परमात्माको) जानता है, वह क्रमशः अन्तमय, प्राणमय आदिको प्राप्त करता हुआ अन्तमें आनन्दमय परमेश्वरको प्राप्त कर लेता है।'
अनु० ६ ]
तैत्तिरीयोपनिषद्
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विस्तार किया; सः=उसने; तपः तप्त्वा=इस प्रकार संकल्पका विस्तार करके; यत् किम् च=जो कुछ भी; इदम्=यह देखने और समझनेमें आता है; इदम् सर्वम् असृजत=इस समस्त जगत्की रचना की; तत् सूष्टा=उस जगत्की रचना करनेके अनन्तर; तत् एव=(वह स्वयं) उसीमें; अनुप्राविशत्=साथ-साथ प्रविष्ट हो गया; तत् अनुपविश्य=उसमें साथ-साथ प्रविष्ट होनेके बाद (वह स्वयं ही); सत्=मूर्त; च=और; त्यत्=अमूर्त; च=भी; अभवत्=हो गया; निरुक्तम् च अनिरुक्तम्=बतानेमें आनेवाले और न आनेवाले; च=तथा; निलयनम्=आश्रय देनेवाले; च=और; अनिलयनम्=आश्रय न देनेवाले; च=तथा; विज्ञानम्=चेतनायुक्त; च=और; अविज्ञानम्=जड पदार्थ; च=तथा; सत्यम्=सत्य; च=और; अनुत्तम्=छूट (इन सबके रूपमें); च=भी; सत्यम्=वह सत्यस्वरूप परमात्मा ही; अभवत्=हो गया; यत् किम् च=जो कुछ भी; इदम्=यह दिखायी देता है और अनुभवमें आता है; तत्=वह; सत्यम्=सत्य ही है; इति=इस प्रकार; आचक्षते=ज्ञानीजन कहते हैं; तत्=उस विषयमें; अपि=भी; एषः=यह; श्लोकः=श्लोक; भवति=है।
व्याख्या —सर्गके आदिमें परब्रह्म परमात्माने यह विचार किया कि मैं नानारूपमें उत्पन्न होकर बहुत हो जाऊँ। यह विचार करके उन्होंने तप किया अर्थात् जीवोंके कर्मानुसार सृष्टि उत्पन्न करनेके लिये संकल्प किया। संकल्प करके यह जो कुछ भी देखने, सुनने और समझनेमें आता है, उस जडचेतनमय समस्त जगत्की रचना की, अर्थात् इसका संकल्पमय स्वरूप बना लिया। उसके बाद स्वयं भी उसमें प्रविष्ट हो गये। यद्यपि अपनेसे ही उत्पन्न इस जगत्में वे परमेश्वर पहलेसे ही प्रविष्ट थे—यह जगत् जब उन्हींका स्वरूप है, तब उसमें उनका प्रविष्ट होना नहीं बनता—तथापि जडचेतनमय जगत्में आत्मारूपसे परिपूर्ण हुए उन परब्रह्म परमेश्वरके विशेष स्वरूप—उनके अन्तर््यामी स्वरूपका लक्ष्य करानेके लिये यहाँ यह बात कही गयी है कि ‘इस जगत्की रचना करके वे स्वयं भी उसमें प्रविष्ट हो गये।’ प्रविष्ट होनेके बाद वे मूर्त और अमूर्तरूपसे अर्थात् देखनेमें आनेवाले पृथ्वी, जल और तेज—इन भूतोंके रूपमें तथा वायु और आकाश—इन न दिखायी देनेवाले भूतोंके रूपमें प्रकट हो गये। फिर
३९०
ईशादि नौ उपनिषद्
[ वल्ली २ ]
जिनका वर्णन किया जा सकता है और नहीं किया जा सकता; ऐसे विभिन्न नाना पदार्थोंके रूपमें हो गये। इसी प्रकार आश्रय देनेवाले और आश्रय न देनेवाले, चेतन और जड—इन सबके रूपमें वे एकमात्र परमेश्वर ही बहुत-से नाम और रूप धारण करके व्यक्त हो गये। वे एक सत्यस्वरूप परमात्मा ही सत्य और झूठ—इन सबके रूपमें हो गये। इसीलिये ज्ञानीजन कहते हैं कि ‘यह जो कुछ देखने, सुनने और समझनेमें आता है, वह सब-का-सब सत्यस्वरूप परमात्मा ही है।’
इस विषयमें भी यह आगे सप्तम अनुवाकमें कहा जानेवाला श्लोक अर्थात् मन्त्र है।
॥ षष्ठ अनुवाक समाप्त ॥ ६ ॥
सप्तम अनुवाक
असद्वा इदमग्र आसीत्। ततो वै सदजायत। तदात्मानः स्वयमकुरुत। तस्मात्तत्सुकृतमुच्यत इति।
अग्र=प्रकट होनेसे पहले; इदम्=यह जड-चेतनात्मक जगत्; असत्=अव्यक्तरूपमें; वै=ही; आसीत्=था; ततः=उससे; वै=ही; सत्=सत् अर्थात् नामरूपमय प्रत्यक्ष जगत्; अजायत=उत्पन्न हुआ है; तत्=उसने; आत्मानम्=अपनेको; स्वयम्=स्वयं; अकुरुत=(इस रूपमें) प्रकट किया है; तस्मात्=इसीलिये; तत्=वह; सुकृतम्=‘सुकृत’; उच्यते=कहा जाता है; इति=इस प्रकार यह श्लोक है।
व्याख्या—सूक्ष्म और स्थूलरूपमें प्रकट होनेसे पहले यह जड-चेतनमय सम्पूर्ण जगत् असत्—अर्थात् अव्यक्तरूपमें ही था; उस अव्यक्तावस्थामें ही यह सत् अर्थात् नामरूपमय प्रत्यक्ष जड-चेतनात्मक जगत् उत्पन्न हुआ है। परमात्माने अपनेको स्वयं ही इस जड-चेतनात्मक जगत्के रूपमें बनाया है; इसीलिये उनका नाम ‘सुकृत’ (अपने-आप बना हुआ) है।*
- गीतामें कई प्रकारसे इस जड-चेतनात्मक जगत्का अव्यक्तसे उत्पन्न होना और उसीमें
अनु० ७ ]
तैत्तिरीयोपनिषद्
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यद्वै तत्सुकृतं रसो वै सः। रसः होवायं लब्ध्वाऽऽनन्दी भवति। को होवान्यात्मः प्राणयाद् यदेष आकाश आनन्दो न स्यात्। एष होवानन्दयाति।
वै=निश्चय ही; यत्=जो; तत्=वह; सुकृतम्=सुकृत है; सः वै=वही; रसः= रस है; हि=क्योंकि; अयम्=यह (जीवात्मा); रसम्=इस रसको; लब्ध्वा=प्राप्त करके; एव=ही; आनन्दी=आनन्दयुक्त; भवति=होता है; यत्=यदि; एषः= यह; आकाशः=आकाशकी भाँति व्यापक; आनन्दः=आनन्दस्वरूप परमात्मा; न स्यात्=न होता; हि=तो; कः एव=कौन; अन्यात्=जीवित रह सकता; (और) कः=कौन; प्राणयात्=प्राणोंकी क्रिया (चैष्टा) कर सकता; हि=निःसंदेह; एषः= यह परमात्मा; एव=ही; आनन्दयाति=सबको आनन्द प्रदान करता है।
व्याख्या—ये जो ऊपरके वर्णनमें ‘सुकृत’ नामसे कहे गये हैं, वे परब्रह्म परमात्मा सचमुच रसस्वरूप (आनन्दमय) हैं, ये ही वास्तविक आनन्द हैं; क्योंकि अनादिकालसे जन्म-मृत्युरूप घोर दुःखका अनुभव करनेवाला यह जीवात्मा इन रसमय परब्रह्मको पाकर ही आनन्दयुक्त होता है। जबतक इन परम प्राप्य आनन्दस्वरूप परमेश्वरसे इसका संयोग नहीं हो जाता, तबतक इसे किसी भी स्थितिमें पूर्णानन्द, नित्यानन्द, अखण्डानन्द और अनन्त आनन्द नहीं मिल सकता। इसीसे उन वास्तविक आनन्दस्वरूप परमात्माका अस्तित्व निःसंदेह सिद्ध होता है; क्योंकि यदि ये आकाशकी भाँति व्यापक आनन्दस्वरूप परमात्मा
लय होना बताया गया है (८।१८; ९।७; २।२८)। परंतु भगवान् जब स्वयं अवतार लेकर लीला करनेके लिये जगत्में प्रकट होते हैं; तब उनका वह प्रकट होना अन्य जीवोंकी भाँति अव्यक्तसे व्यक्त होने अर्थात् कारणसे कार्यरूपमें परिवर्तित होनेके समान नहीं है, वह तो अलौकिक है। इसलिये यहाँ भगवान्ने कहा है कि जो मुझे अव्यक्तसे व्यक्त हुआ मानते हैं, वे बुद्धिहीन हैं (७।२४); वहाँ जडतत्त्वोंका और उनके नियमोंका प्रवेश नहीं है। भगवान्के नाम, रूप, लीला, धाम—सब कुछ अप्राकृत हैं, चिन्मय हैं। उनके जन्म-कर्म दिव्य हैं। भगवान्के प्राकट्यका रहस्य बड़े-बड़े देवता और महर्षिलोग भी नहीं जानते (गीता १०।२)।
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ईशादि नौ उपनिषद्
[ वल्ली २ ]
नहीं होते तो कौन जीवित रह सकता और कौन प्राणोंकी क्रिया—हिलना-डुलना आदि कर सकता ? अर्थात् समस्त प्राणी सुखस्वरूप परमात्माके ही सहारे जीते और हलन-चलन आदि चेष्टा करते हैं। इतना ही नहीं, सबके जीवन-निर्वाहकी सब प्रकारसे सुव्यवस्था करनेवाले भी वे ही हैं; अन्यथा इस जगत्की समस्त भौतिक क्रिया, जो नियमित और व्यवस्थितरूपसे चल रही है, कैसे हो सकती ? अतः मनुष्यको यह दृढ़तापूर्वक विश्वास करना चाहिये कि इस जगत्के कर्ता-हर्ता परब्रह्म परमेश्वर अवश्य हैं तथा निःसंदेह ये परमात्मा ही सबको आनन्द प्रदान करते हैं। जब आनन्दस्वरूप एकमात्र परमात्मा ही हैं, तब दूसरा कौन आनन्द दे सकता है ?
यदा ह्यैव एतस्मिन्नदृश्येऽनात्म्येऽनिरुक्तेऽनिलयनेऽभयं प्रतिष्ठां विन्दते। अथ सोऽभयं गतो भवति।
हि=क्योंकि; यदा एव=जब कभी; एषः=यह जीवात्मा; एतस्मिन्=इस; अदृश्ये=देखनेमें न आनेवाले; अनात्म्ये=शरीररहित; अनिरुक्ते=बतलानेमें न आनेवाले; (और) अनिलयने=दूसरेका आश्रय न लेनेवाले परब्रह्म परमात्मामें; अभयम्=निर्भयतापूर्वक; प्रतिष्ठाम्=स्थिति; विन्दते=लाभ करता है; अथ=तब; सः=वह; अभयम्=निर्भयपदको; गतः=प्राप्त; भवति=हो जाता है।
व्याख्या —क्योंकि उन परब्रह्म परमेश्वरको पानेकी अभिलाषा रखनेवाला यह जीव जब कभी देखनेमें न आनेवाले, बतलानेमें न आनेवाले और किसीके आश्रित न रहनेवाले शरीररहित परब्रह्म परमात्मामें निर्भय (अविचल) स्थिति लाभ करता है, उस समय वह निर्भयपदको प्राप्त हो जाता है—सदाके लिये भय एवं शोकसे रहित हो जाता है।
यदा ह्यैव एतस्मिन्नदृशमन्तरं कुरुते। अथ तस्य भयं भवति। तत्त्वेव भयं विदुषो मन्वानस्य। तदप्येष श्लोको भवति।
हि=क्योंकि; यदा एव=जबतक; एषः=यह; उदरम्=थोड़ा-सा [ बै= ] भी;
अनु० ७ ]
तैत्तिरीयोपनिषद्
३९३
एतस्मिन् अन्तरम्=इस परमात्मासे वियोग; कुरुते=किये रहता है; अथ=तबतक; तस्य=उसको; भयम्=जन्म-मृत्युरूप भय; भवति=प्राप्त होता है; तु=तथा; तत् एव=वही; भयम्=भय; (केवल मूर्खको ही नहीं होता, किंतु) मनवानस्य=अभिमानी; विदुषः=शास्त्रज्ञ विद्वान्को भी अवश्य होता है; तत्=उसके विषयमें; अपि=भी; एषः=यह (आगे कहा हुआ); श्लोकः=श्लोक; भवति=है।
व्याख्या —क्योंकि जबतक यह जीवात्मा उन परब्रह्म परमात्मासे थोड़ा-सा भी अन्तर किये रहता है—उनमें पूर्ण स्थिति लाभ नहीं कर लेता या उनका निरन्तर स्मरण नहीं करता—उन्हें थोड़ी देरके लिये भी भूल जाता है, तबतक उसके लिये भय है, अर्थात् उसका पुनर्जन्म होना सम्भव है; क्योंकि जिस समय उसकी परमात्मामें स्थिति नहीं है, वह भगवान्को भूला हुआ है, उसी समय यदि उसकी मृत्यु हो गयी तो फिर उसका अन्तिम संस्कारके अनुसार जन्म होना निश्चित है; क्योंकि भगवान्ने गीतामें कहा है—‘जिस-जिस भावको स्मरण करता हुआ मनुष्य अन्तकालमें शरीर छोड़ता है, उसीके अनुसार उसे जन्म ग्रहण करना पड़ता है (८।६)’ और मृत्यु प्रारम्भके अनुसार किसी क्षण भी आ सकती है। इसीलिये योगभ्रष्टका पुनर्जन्म होनेकी बात गीतामें कही गयी है (६।४०—४२)। जबतक परमात्मामें पूर्ण स्थिति नहीं हो जाती अथवा जबतक भगवान्का निरन्तर स्मरण नहीं होता, तबतक यह पुनर्जन्मका भय—जन्म-मृत्युका भय सभीके लिये बना हुआ है—चाहे कोई बड़े-से-बड़ा शास्त्रज्ञ विद्वान् क्यों न हो और चाहे कोई अपनेको बड़े-से-बड़ा ज्ञानी अथवा पण्डित क्यों न माने। वे परमेश्वर सबपर शासन करनेवाले हैं, उन्हींकी शासन-शक्तिके जगत्की सारी व्यवस्था नियमितरूपसे चल रही है। इसी विषयपर यह आगे अष्टम अनुवाकमें कहा जानेवाला श्लोक अर्थात् मन्त्र है।
॥ सप्तम अनुवाक समाप्त ॥ ७ ॥
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