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ईशादि नौ उपनिषद्

Ishadi Nau Upanishad

ऋषिगण द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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ईशादि नौ उपनिषद्

[ वल्ली २ ]

एवम्=इस प्रकार (संतापका हेतु); वेद=जानता है; [सः] एषः=वह यह पुरुष; आत्मानम् स्पृणुते=आत्माकी रक्षा करता है; इति=इस प्रकार; उपनिषत्=उपनिषद् (की ब्रह्मानन्दवल्ली) पूरी हुई।

व्याख्या —इस वर्णनमें यह बात कही गयी है कि ज्ञानी महापुरुषको किसी प्रकारका शोक नहीं होता। भाव यह है कि परमात्माको ऊपर बताये अनुसार जाननेवाला विद्वान् कभी इस प्रकार शोक नहीं करता कि ‘क्यों मैंने श्रेष्ठ कर्मोंका आचरण नहीं किया, अथवा क्यों मैंने पाप-कर्म किया।’ उसके मनमें पुण्य-कर्मोंके फलस्वरूप उत्तम लोकोंकी प्राप्तिका लोभ नहीं होता और उसे पापजनित नरकादिका भय भी नहीं सताता। लोभ और भयजनित संतापसे वह ऊँचा उठ जाता है। उक्त ज्ञानी महापुरुष आसक्तिपूर्वक किये हुए पुण्य और पाप दोनों प्रकारके कर्मोंको जन्म-मरणरूप संतापका हेतु समझकर उनके प्रति राग-द्वेषसे सर्वथा रहित हो जाता है और परमात्माके चिन्तनमें संलग्न रहकर आत्माकी रक्षा करता है।

इस मन्त्रमें कुछ शब्दोंको अक्षरशः अथवा अर्थतः दुहराकर इस वल्लीके उपसंहारकी सूचना दी गयी है।

॥ नवम अनुवाक समाप्त ॥ १ ॥

॥ ब्रह्मानन्दवल्ली समाप्त ॥ २ ॥

— ✶ ✶ ✶ —

भृगुवल्ली *

प्रथम अनुवाक

भृगुर्वै वारुणिः, वरुणं पितरमुपससार अधीहि भगवो ब्रह्मेति। तस्मा एतत्प्रोवाच। अत्रं प्राणं चक्षुः श्रोत्रं मनो वाचमिति। तः होवाच। यतो वा इमानी भूतानि जायन्ते येन जातानि जीवन्ति। यत्प्रयन्यभिर्संविशन्ति। तद्विजिज्ञासस्व। तद् ब्रह्मेति। स तपोऽतप्यत। स तपस्तप्त्वा।

वै=यह प्रसिद्ध है कि; वारुणिः=वरुणका पुत्र; भृगुः=भृगु; पितरम्=अपने पिता; वरुणम् उपससार=वरुणके पास गया (और विनयपूर्वक बोला—); भगवः=भगवन्!; (मुझे) ब्रह्म अधीहि=ब्रह्मका उपदेश कीजिये; इति=इस प्रकार प्रार्थना करनेपर; तस्मै=उससे; (वरुणने) एतत्=यह; प्रोवाच=कहा; अत्रम्= अत्र; प्राणम्=प्राण; चक्षुः=नेत्र; श्रोत्रम्=श्रोत्र; मनः=मन; (और) वाचम्=वाणी; इति=इस प्रकार (ये सब ब्रह्मकी उपलब्धिके द्वार हैं), तम् ह उवाच=पुनः (वरुणने) उससे कहा; वै=निश्चय ही; इमानी=ये सब प्रत्यक्ष दीखनेवाले; भूतानि=प्राणी; यतः=जिससे; जायन्ते=उत्पन्न होते हैं; जातानि=उत्पन्न होकर; येन=जिसके सहारे; जीवन्ति=जीवित रहते हैं; (तथा) प्रयन्ति=(अन्तमें इस लोकसे) प्रयाण करते हुए; यत् अभिर्संविशन्ति=जिसमें प्रवेश करते हैं; तत्=उसको; विजिज्ञासस्व=तत्त्वसे जाननेकी इच्छा कर; तत्=वही; ब्रह्म=ब्रह्म है; इति=इस प्रकार (पिताकी बात सुनकर); सः=उसने; तपः अतप्यत=तप किया; सः=उसने; तपः तप्त्वा=तप करके—


  • वरुणने अपने पुत्र भृगु ऋषिको जिस ब्रह्मविद्याका उपदेश दिया था, उसीका इस वल्लीमें वर्णन है, इस कारण इसका नाम भृगुवल्ली है।

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ईशादि नौ उपनिषद्

[ वल्ली ३ ]

व्याख्या—भृगु नामसे प्रसिद्ध एक ऋषि थे, जो वरुणके पुत्र थे। उनके मनमें परमात्माको जानने और प्राप्त करनेकी उत्कट अभिलाषा हुई, तब वे अपने पिता वरुणके पास गये। उनके पिता वरुण वेदको जाननेवाले, ब्रह्मनिष्ठ महापुरुष थे; अतः भृगुको किसी दूसरे आचार्यके पास जानेकी आवश्यकता नहीं हुई। अपने पिताके पास जाकर भृगुने इस प्रकार प्रार्थना की— ‘भगवन्! मैं ब्रह्मको जानना चाहता हूँ, अतः आप कृपा करके मुझे ब्रह्मका तत्त्व समझाइये।’ तब वरुणने भृगुसे कहा ‘तात! अन्न, प्राण, नेत्र, श्रोत्र, मन और वाणी—ये सभी ब्रह्मकी उपलब्धिके द्वार हैं। इन सबमें ब्रह्मकी सत्ता स्फुरित हो रही है।’ साथ ही यह भी कहा—‘ये प्रत्यक्ष दिखायी देनेवाले सब प्राणी जिनसे उत्पन्न होते हैं, उत्पन्न होकर जिनके सहयोगसे, जिनका बल पाकर ये सब जीते हैं—जीवनोपयोगी क्रिया करनेमें समर्थ होते हैं और महाप्रलयके समय जिनमें विलीन हो जाते हैं, उनको वास्तवमें जाननेकी (पानेकी) इच्छा कर। वे ही ब्रह्म हैं।’ इस प्रकार पिताका उपदेश पाकर भृगु ऋषिने ब्रह्मचर्य और शम-दम आदि नियमोंका पालन करते हुए तथा समस्त भोगोंके त्यागपूर्वक संयमसे रहते हुए पिताके उपदेशपर विचार किया। यही उनका तप था। इस प्रकार तप करके उन्होंने क्या किया, यह बात अगले अनुवाकमें कही गयी है।

॥ प्रथम अनुवाक समाप्त ॥ १ ॥

द्वितीय अनुवाक

अन्नं ब्रह्मेति व्यजानात्। अन्नाद्ब्रह्मेव खल्विमानि भूतानि जायन्ते। अन्नैन जातानि जीवन्ति। अन्नं प्रयन्यन्थिर्संविशन्तीति। तद्विज्ञाय पुनरेव वरुणं पितरमुपससार। अधीहि भगवो ब्रह्मेति। तः होवाच। तपसा ब्रह्म विजिज्ञासस्व। तपो ब्रह्मेति। स तपोऽतप्यत। स तपस्तत्त्व।

अनु० २]

तैत्तिरीयोपनिषद्

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अन्नम्=अन्न; ब्रह्म=ब्रह्म है; इति=इस प्रकार; व्यजानात्=जाना; हि=क्योंकि; खलु=सचमुच; अन्नात्=अन्नसे; एव=ही; इमानि=ये सब; भूतानि=प्राणी; जायन्ते=उत्पन्न होते हैं; जातानि=उत्पन्न होकर; अन्नैन=अन्नसे ही; जीवन्ति=जीते हैं; (और) प्रयन्ति=(अन्तमें यहाँसे) प्रयाण करते हुए; अन्नम् अभिसंविशन्ति=अन्नमें ही प्रविष्ट होते हैं; इति=इस प्रकार; तत्=उसको; विज्ञाय=जानकर; (वह) पुनः=पुनः; पितरम्=अपने पिता; वरुणम् एव उपससार=वरुणके ही पास गया; (तथा अपनी समझी हुई बात उसने पिताको सुनायी; किंतु पिताने उसका समर्थन नहीं किया। तब वह बोला—) भगवः=भगवन्!; (मुझे) ब्रह्म अधीहि=ब्रह्मका बोध कराइये; इति=तब; तम् ह उवाच=उससे सुप्रसिद्ध वरुण ऋषिने कहा; तपसा=तपसे; ब्रह्म=ब्रह्मको; विजिज्ञासस्व=तत्त्वतः जाननेकी इच्छा कर; तपः=तप ही; ब्रह्म=ब्रह्म है; इति=इस प्रकार (पिताकी आज्ञा पाकर); सः=उसने; तपः अतप्यत=(पुनः) तप किया; सः=उसने; तपः तप्त्वा=तप करके—

व्याख्या—भृगुने पिताके उपदेशानुसार यह निश्चय किया कि अन्न ही ब्रह्म है; क्योंकि पिताजीने ब्रह्मके जो लक्षण बताये थे, वे सब अन्नमें पाये जाते हैं। समस्त प्राणी अन्नसे—अन्नके परिणामभूत वीर्यसे उत्पन्न होते हैं, अन्नसे ही उनका जीवन सुरक्षित रहता है और मरनेके बाद अन्नस्वरूप इस पृथ्वीमें ही प्रविष्ट हो जाते हैं। इस प्रकार निश्चय करके वे पुनः अपने पिता वरुणके पास आये। आकर अपने निश्चयके अनुसार उन्होंने सब बातें कहीं। पिताने कोई उत्तर नहीं दिया। उन्होंने सोचा—‘इसने अभी ब्रह्मके स्थूल रूपको ही समझा है, वास्तविक रूपतक इसकी बुद्धि नहीं गयी; अतः इसे तपस्या करके अभी और विचार करनेकी आवश्यकता है। पर जो कुछ इसने समझा है, उसमें इसकी तुच्छ बुद्धि कराकर अश्रद्धा उत्पन्न कर देनेमें भी इसका हित नहीं है, अतः इसकी बातका उत्तर न देना ही ठीक है।’ पितासे अपनी बातका समर्थन न पाकर भृगुने फिर प्रार्थना की—‘भगवन्! यदि मैंने ठीक नहीं समझा हो तो आप मुझे ब्रह्मका तत्त्व समझाइये।’ तब वरुणने कहा—‘तू तपके द्वारा ब्रह्मके तत्त्वको समझनेकी

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ईशादि नौ उपनिषद्

[ वल्ली ३ ]

कोशिश कर। यह तप ब्रह्मका ही स्वरूप है, अतः यह उनका बोध करानेमें सर्वथा समर्थ है।' इस प्रकार पिताकी आज्ञा पाकर भृगु ऋषि पुनः पहलेकी भाँति तपोमय जीवन बिताते हुए पितासे पहले सुने हुए उपदेशके अनुसार ब्रह्मका स्वरूप निश्चय करनेके लिये विचार करते रहे। इस प्रकार तप करके उन्होंने क्या किया, यह बात अगले अनुवाकमें कही गयी है।

॥ द्वितीय अनुवाक समाप्त ॥ २ ॥

तृतीय अनुवाक

प्राणो ब्रह्मेति व्यजानात्। प्राणाङ्ग्येव खल्विमानि भूतानि जायन्ते। प्राणेन जातानि जीवन्ति। प्राणं प्रयन्त्यभिर्संविशन्तीति। तद्विज्ञाय पुनरेव वरुणं पितरमुपससार। अधीहि भगवो ब्रह्मेति। तत् होवाच। तपसा ब्रह्म विजिज्ञासस्व। तपो ब्रह्मेति। स तपोऽतप्यत। स तपस्तप्त्वा।

प्राणः=प्राण; ब्रह्म=ब्रह्म है; इति=इस प्रकार; व्यजानात्=जाना; हि=क्योंकि; खलु=सचमुच; प्राणात्=प्राणसे; एव=ही; इमानि=ये समस्त; भूतानि=प्राणी; जायन्ते=उत्पन्न होते हैं; जातानि=उत्पन्न होकर; प्राणेन=प्राणसे ही; जीवन्ति=जीते हैं (और); प्रयन्ति=(अन्तमें यहाँसे) प्रयाण करते हुए; प्राणम् अभिर्संविशन्ति=प्राणमें ही सब प्रकारसे प्रविष्ट हो जाते हैं; इति=इस प्रकार; तत्=उसे; विज्ञाय=जानकर; पुनः=फिर; पितरम् वरुणम् एव उपससार=(अपने) पिता वरुणके ही पास गया (और वहाँ उसने अपना निश्चय सुनाया; जब पिताने उत्तर नहीं दिया, तब वह बोला—); भगवः=भगवन्! (मुझे); ब्रह्म अधीहि=ब्रह्मका उपदेश दीजिये; इति=इस प्रकार प्रार्थना करनेपर; ह तम् उवाच=सुप्रसिद्ध वरुण ऋषिने उससे कहा; ब्रह्म=ब्रह्मको; तपसा=तपसे; विजिज्ञासस्व=तत्त्वतः जाननेकी इच्छा कर; तपः=तप ही; ब्रह्म=ब्रह्म अर्थात् उनकी प्राप्तिका बड़ा साधन है; इति=इस प्रकार

अनु० ३ ]

तैत्तिरीयोपनिषद्

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पिताकी आज्ञा पाकर; सः=उसने (पुनः); तपः अतप्यत=तप किया; सः=उसने; तपः तप्त्वा=तप करके—

व्याख्या —भृगुने पिताके उपदेशानुसार तपके द्वारा यह निश्चय किया कि प्राण ही ब्रह्म है; उन्होंने सोचा, पिताजीद्वारा बताये हुए ब्रह्मके लक्षण प्राणमें पूर्णतया पाये जाते हैं। समस्त प्राणी प्राणसे उत्पन्न होते हैं, अर्थात् एक जीवित प्राणीसे उसीके सदृश दूसरा प्राणी उत्पन्न होता हुआ प्रत्यक्ष देखा जाता है; तथा सभी प्राणसे ही जीते हैं। यदि शासका आना-जाना बन्द हो जाय, यदि प्राणद्वारा अन्न ग्रहण न किया जाय तथा अन्नका रस समस्त शरीरमें न पहुँचाया जाय तो कोई भी प्राणी जीवित नहीं रह सकता और मरनेके बाद सब प्राणमें ही प्रविष्ट हो जाते हैं। यह प्रत्यक्ष देखा जाता है कि मृत शरीरमें प्राण नहीं रहते; अतः निःसन्देह प्राण ही ब्रह्म है, यह निश्चय करके वे पुनः अपने पिता वरुणके पास गये। पहलेकी भाँति अपने निश्चयके अनुसार उन्होंने पुनः पितासे अपना अनुभव निवेदन किया। पिताने फिर भी कोई उत्तर नहीं दिया। उन्होंने सोचा कि यह पहलेकी अपेक्षा तो कुछ सूक्ष्मतामें पहुँचा है; परंतु अभी बहुत कुछ समझना शेष है; अतः उत्तर न देनेसे अपने-आप इसकी जिज्ञासामें बल आयेगा; अतः उत्तर न देना ही ठीक है। पिताजीसे अपनी बातका समर्थन न पाकर भृगुने फिर उनसे प्रार्थना की—‘भगवन्! यदि अब भी मैंने ठीक न समझा हो तो आप ही कृपा करके मुझे ब्रह्मका तत्त्व समझाइये।’ तब वरुणने पुनः वही बात कही—‘तू तपके द्वारा ब्रह्मको जाननेकी चेष्टा कर; यह तप ही ब्रह्म है, अर्थात् ब्रह्मके तत्त्वको जाननेका प्रधान साधन है।’ इस प्रकार पिताजीकी आज्ञा पाकर भृगु ऋषि फिर उसी प्रकार तपस्या करते हुए पिताके उपदेशपर विचार करते रहे। तपस्या करके उन्होंने क्या किया, यह अगले अनुवाकमें बताया गया है।

॥ तृतीय अनुवाक समाप्त ॥ ३ ॥

—◆◆◆—

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ईशादि नौ उपनिषद्

[ वल्ली ३ ]

चतुर्थ अनुवाक

मनो ब्रह्मेति व्यजानात्। मनसो ह्येव खल्विमानि भूतानि जायन्ते। मनसा जातानि जीवन्ति। मनः प्रयत्यन्थिभंसविशन्तीति। तद्विज्ञाय पुनरेव वरुणं पितरमुपससार। अधीहि भगवो ब्रह्मेति। तः होवाच। तपसा ब्रह्म विजिज्ञासस्व। तपो ब्रह्मेति। स तपोऽतप्यत। स तपस्तप्त्वा।

मनः=मन; ब्रह्म=ब्रह्म है; इति=इस प्रकार; व्यजानात्=समझा; हि=क्योंकि; खलु=सचमुच; मनसः=मनसे; एव=ही; इमानि=ये समस्त; भूतानि=प्राणी; जायन्ते=उत्पन्न होते हैं; जातानि=उत्पन्न होकर; मनसा=मनसे ही; जीवन्ति=जीते हैं; (तथा) प्रयन्ति=(इस लोकसे) प्रयाण करते हुए; (अन्तमें) मनः अभिसंविशन्ति=मनमें ही सब प्रकारसे प्रविष्ट हो जाते हैं; इति=इस प्रकार; तत्=उस ब्रह्मको; विज्ञाय=जानकर; पुनः एव=फिर भी; पितरम्=अपने पिता; वरुणम् उपससार=वरुणके पास गया (और अपनी बातका कोई उत्तर न पाकर बोला—); भगवः=भगवन्! (मुझे); ब्रह्म अधीहि=ब्रह्मका उपदेश दीजिये; इति=इस प्रकार (प्रार्थना करनेपर); ह तम् उवाच=सुप्रसिद्ध वरुण ऋषिने उससे कहा; ब्रह्म=ब्रह्मको; तपसा=तपसे; विजिज्ञासस्व=तत्त्वतः जाननेकी इच्छा कर; तपः=तप ही; ब्रह्म=ब्रह्म है; इति=इस प्रकार पिताकी आज्ञा पाकर; सः=उसने; तपः अतप्यत=तप किया; सः=उसने; तपः तप्त्वा=तप करके—

व्याख्या —इस बार भगुने पिताके उपदेशानुसार यह निश्चय किया कि मन ही ब्रह्म है; उन्होंने सोचा, पिताजीके बताये हुए ब्रह्मके सारे लक्षण मनमें पाये जाते हैं। मनसे सब प्राणी उत्पन्न होते हैं—स्त्री और पुरुषके मानसिक प्रेमपूर्ण सम्बन्धसे ही प्राणी बीजरूपसे माताके गर्भमें आकर उत्पन्न होते हैं, उत्पन्न होकर मनसे ही इन्द्रियोंद्वारा समस्त जीवनोंपयोगी वस्तुओंका उपभोग करके जीवित रहते हैं और मरनेके बाद मनमें ही प्रविष्ट हो जाते हैं—मरनेके बाद इस शरीरमें प्राण और इन्द्रियाँ नहीं रहतीं, इसलिये मन ही ब्रह्म है। इस प्रकार निश्चय करके वे पुनः पहलेकी भाँति अपने पिता वरुणके पास गये और उन्होंने अपने

अनु० ५ ]

तैत्तिरीयोपनिषद्

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अनुभवकी बात पिताजीको सुनायी। इस बार भी पितासे कोई उत्तर नहीं मिला। पिताने सोचा कि यह पहलेकी अपेक्षा तो गहराईमें उतरा है, परंतु अभी इसे और भी तपस्या करनी चाहिये; अतः उत्तर न देना ही ठीक है। पितासे अपनी बातका उत्तर न पाकर भृगुने पुनः पहलेकी भाँति प्रार्थना की—‘भगवन्! यदि मैंने ठीक न समझा हो तो कृपया आप ही मुझे ब्रह्मका तत्त्व समझाइये।’ तब वरुणने पुनः वही उत्तर दिया—‘तू तपके द्वारा ब्रह्मके तत्त्वको जाननेकी इच्छा कर। अर्थात् तपस्या करते हुए मेरे उपदेशपर पुनः विचार कर। यह तपरूप साधन ही ब्रह्म है। ब्रह्मको जाननेका इससे बढ़कर दूसरा कोई उपाय नहीं है।’ इस प्रकार पिताकी आज्ञा पाकर भृगुने पुनः पहलेकी भाँति संयमपूर्वक रहकर पिताके उपदेशपर विचार किया। विचार करके उन्होंने क्या किया, यह बात अगले अनुवाकमें कही गयी है।

॥ चतुर्थ अनुवाक समाप्त ॥ ४ ॥

पञ्चम अनुवाक

विज्ञानं ब्रह्मेति व्यजानात्। विज्ञानाच्छ्रेयं खल्विमानि भूतानि जायन्ते। विज्ञानेन जातानि जीवन्ति। विज्ञानं प्रयन्यन्थिभसंविशन्तीति। तद्विज्ञाय पुनरेव वरुणं पितरमुपससार। अधीहि भगवो ब्रह्मेति। तः होवाच। तपसा ब्रह्म विजिज्ञासस्व। तपो ब्रह्मेति। स तपोऽतप्यत। स तपस्तप्त्वा।

विज्ञानम्=विज्ञान; ब्रह्म=ब्रह्म है; इति=इस प्रकार; व्यजानात्=जाना; हि=क्योंकि; खलु=सचमुच; विज्ञानात्=विज्ञानसे; एव=ही; इमानि=ये समस्त; भूतानि=प्राणी; जायन्ते=उत्पन्न होते हैं; जातानि=उत्पन्न होकर; विज्ञानेन=विज्ञानसे ही; जीवन्ति=जीते हैं; (और) प्रयन्ति=अन्तमें यहाँसे प्रयाण करते हुए; विज्ञानम् अभिसंविशन्ति=विज्ञानमें ही प्रविष्ट हो जाते हैं; इति=इस प्रकार; तत्=उस ब्रह्मको; विज्ञाय=जानकर; पुनः एव=(वह) पुनः उसी प्रकार; पितरम्=अपने पिता; वरुणम् उपससार=वरुणके

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ईशादि नौ उपनिषद्

[ वल्ली ३ ]

पास गया; (और अपनी बातका उत्तर न मिलनेपर बोला—) भगवः=भगवन्! ; (मुझे) ब्रह्म अधीहि=ब्रह्मका उपदेश दीजिये; इति=इस प्रकार कहनेपर; ह तम् उवाच=सुप्रसिद्ध वरुण ऋषिने उससे कहा; ब्रह्म=ब्रह्मको; तपसा=(तु) तपके द्वारा; विजिज्ञासस्व=तत्त्वतः जाननेकी इच्छा कर; तपः=तप ही; ब्रह्म=ब्रह्म है; इति=इस प्रकार पिताकी आज्ञा पाकर; सः=उसने; तपः अतप्यत=पुनः तप किया; सः=उसने; तपः तप्त्वा=तप करके—

व्याख्या— इस बार भृगुने पिताके उपदेशानुसार यह निश्चय किया कि यह विज्ञानस्वरूप चेतन जीवात्मा ही ब्रह्म है; उन्होंने सोचा—पिताजीने जो ब्रह्मके लक्षण बताये थे, वे सब-के-सब पूर्णतया इसमें पाये जाते हैं। ये समस्त प्राणी जीवात्मासे ही उत्पन्न होते हैं, सजीव चेतन प्राणियोंसे ही प्राणियोंकी उत्पत्ति प्रत्यक्ष देखी जाती है। उत्पन्न होकर इस विज्ञानस्वरूप जीवात्मासे ही जीते हैं; यदि जीवात्मा न रहे तो ये मन, इन्द्रियाँ, प्राण आदि कोई भी नहीं रह सकते और कोई भी अपना काम नहीं कर सकते तथा मरनेके बाद ये मन आदि सब जीवात्मामें ही प्रविष्ट हो जाते हैं—जीवके निकल जानेपर मृत शरीरमें ये सब देखनेमें नहीं आते। अतः विज्ञानस्वरूप जीवात्मा ही ब्रह्म है। यह निश्चय करके वे पहलेकी भाँति अपने पिता वरुणके पास आये। आकर उन्होंने अपने निश्चित अनुभवकी बात पिताजीको सुनायी। इस बार भी पिताजीने कोई उत्तर नहीं दिया। पिताने सोचा—‘इस बार यह बहुत कुछ ब्रह्मके निकट आ गया है, इसका विचार स्थूल और सूक्ष्म—दोनों प्रकारके जडतत्वोंसे ऊपर उठकर चेतन जीवात्मातक तो पहुँच गया है। परंतु ब्रह्मका स्वरूप तो इससे भी विलक्षण है, वे तो नित्य आनन्दस्वरूप एक अद्वितीय परमात्मा हैं; इसे अभी और तपस्या करनेकी आवश्यकता है, अतः उत्तर न देना ही ठीक है।’ इस प्रकार बार-बार पिताजीसे कोई उत्तर न मिलनेपर भी भृगु हतोत्साह या निराश नहीं हुए। उन्होंने पहलेकी भाँति पुनः पिताजीसे वही प्रार्थना की—‘भगवन्! यदि मैंने ठीक न समझा हो तो आप मुझे ब्रह्मका रहस्य बतलाइये।’ तब वरुणने पुनः वही

अनु० ६ ]

तैत्तिरीयोपनिषद्

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उत्तर दिया—‘तू तपके द्वारा ही ब्रह्मके तत्त्वको जाननेकी इच्छा कर। अर्थात् तपस्यापूर्वक उसका पूर्वकथनानुसार विचार कर। तप ही ब्रह्म है।’ इस प्रकार पिताजीकी आज्ञा पाकर भगुने पुनः पहलेकी भाँति संयमपूर्वक रहते हुए पिताके उपदेशपर विचार किया। विचार करके उन्होंने क्या किया, यह आगे बताया गया है।

॥ पञ्चम अनुवाक समाप्त ॥ ५ ॥

षष्ठ अनुवाक

आनन्दो ब्रह्मेति व्यजानात्। आनन्दाद्धयेव खलि्वमानि भूतानि जायन्ते। आनन्देन जातानि जीवन्ति। आनन्दं प्रयन्त्यभिंसंविशन्तीति। सैषा भार्गवी वारुणी विद्या परमे व्योमन् प्रतिष्ठिता। स य एवं वेद प्रतितिष्ठति। अन्नवानन्नादो भवति। महान् भवति प्रजया पशुभिर्ब्रह्मवर्चसेन। महान् कीर्त्या।

आनन्दः=आनन्द ही; ब्रह्म=ब्रह्म है; इति=इस प्रकार; व्यजानात्=निश्चय-पूर्वक जाना; हि=क्योंकि; खलु=सचमुच; आनन्दात्=आनन्दसे; एव=ही; इमानि=ये समस्त; भूतानि=प्राणी; जायन्ते=उत्पन्न होते हैं; जातानि=उत्पन्न होकर; आनन्देन=आनन्दसे ही; जीवन्ति=जीते हैं; (तथा) प्रयन्ति=इस लोकसे प्रयाण करते हुए; (अन्तमें) आनन्दम् अभिसंविशन्ति=आनन्दमें ही प्रविष्ट हो जाते हैं; इति=इस प्रकार (जाननेपर उसे परब्रह्मका पूरा ज्ञान हो गया); सा=वह; एषा=यह; भार्गवी=भगुकी जानी हुई; वारुणी=और वरुणद्वारा उपदेश की हुई; विद्या=विद्या; परमे व्योमन्=विशुद्ध आकाशस्वरूप परब्रह्म परमात्मामें; प्रतिष्ठिता=प्रतिष्ठित है अर्थात् पूर्णतः स्थित है; यः=जो कोई (दूसरा साधक) भी; एवम्=इस प्रकार (आनन्दस्वरूप ब्रह्मको); वेद=जानता है; सः=वह; (उस विशुद्ध आकाशस्वरूप परमानन्दमें) प्रतितिष्ठति=स्थित हो जाता है; (इतना ही नहीं; इस लोकमें लोगोंके

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ईशादि नौ उपनिषद्

[ वल्ली ३ ]

देखनेमें भी वह) अत्रवान्=बहुत अत्रवाला; अत्राद्=और अत्रको भलीभाँति पचानेकी शक्तिवाला; भवति=हो जाता है; (तथा) प्रजया=संतानसे; पशुभिः=पशुओंसे; (तथा) ब्रह्मवर्चसेन=ब्रह्मतेजसे सम्पन्न होकर; महान्=महान्; भवति=हो जाता है; कीर्त्या [ अपि ]=उत्तम कीर्तिके द्वारा भी; महान्=महान्; [ भवति ]=हो जाता है।

व्याख्या —इस बार भृगुने पिताके उपदेशपर गहरा विचार करके यह निश्चय किया कि आनन्द ही ब्रह्म है। ये आनन्दमय परमात्मा ही अत्रमय आदि सबके अन्तरात्मा हैं। वे सब भी इन्हींके स्थूलरूप हैं। इसी कारण उनमें ब्रह्मबुद्धि होती है और ब्रह्मके आंशिक लक्षण पाये जाते हैं। परंतु सर्वशसे ब्रह्मके लक्षण आनन्दमें ही घटते हैं; क्योंकि ये समस्त प्राणी उन आनन्दस्वरूप परब्रह्म परमात्मासे ही सृष्टिके आदिमें उत्पन्न होते हैं—इन सबके आदि कारण तो वे ही हैं तथा इन आनन्दमयके आनन्दका लेश पाकर ही ये सब प्राणी जी रहे हैं—कोई भी दुःखके साथ जीवित रहना नहीं चाहता। इतना ही नहीं, उन आनन्दमय सर्वांतर्त्यामी परमात्माकी अचिन्त्यशक्तिकी प्रेरणासे ही इस जगत्के समस्त प्राणियोंकी सारी चेष्टाएँ हो रही हैं। उनके शासनमें रहनेवाले सूर्य आदि यदि अपना-अपना काम न करें तो एक क्षण भी कोई प्राणी जीवित नहीं रह सकता। सबके जीवनाधार सचमुच वे आनन्दस्वरूप परमात्मा ही हैं तथा प्रलयकालमें समस्त प्राणियोंसे भरा हुआ यह ब्रह्माण्ड उन्हींमें प्रविष्ट होता है—उन्हींमें विलीन होता है, वे ही सब प्रकारसे सदा-सर्वदा सबके आधार हैं। इस प्रकार अनुभव होते ही भृगुको परब्रह्मका यथार्थ ज्ञान हो गया। फिर उन्हें किसी प्रकारकी जिज्ञासा नहीं रही। श्रुति स्वयं उस विद्याकी महिमा बतलानेके लिये कहती है—वही यह वरुणद्वारा बतायी हुई और भृगुको प्राप्त हुई ब्रह्मविद्या (ब्रह्मका रहस्य बतानेवाली विद्या) है। यह विद्या विशुद्ध आकाशस्वरूप परब्रह्म परमात्मामें स्थित है। वे ही इस विद्याके भी आधार हैं। जो कोई मनुष्य भृगुकी भाँति तपस्यापूर्वक इसपर विचार करके परमानन्दस्वरूप परब्रह्म परमात्माको जान लेता है, वह भी उन विशुद्ध परमानन्दस्वरूप परमात्मामें स्थित हो जाता

अनु० ७ ]

तैत्तिरीयोपनिषद्

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है। इस प्रकार इस विद्याका वास्तविक फल बताकर मनुष्योंको उस साधनकी ओर लगानेके लिये उपर्युक्त प्रकारसे अन्न, प्राण आदि समस्त तत्त्वोंके रहस्य विज्ञानपूर्वक ब्रह्मको जाननेवाले ज्ञानीके शरीर और अन्तःकरणमें जो स्वाभाविक विलक्षण शक्तियाँ उत्पन्न हो जाती हैं, उनको भी श्रुति बतलाती है। वह अन्नवान् अर्थात् नाना प्रकारके जीवन-यात्रोपयोगी भोगोंसे सम्पन्न हो जाता है और उन सबको सेवन करनेकी सामर्थ्य भी उसमें आ जाती है। अर्थात् उसके मन, इन्द्रियाँ और शरीर सर्वथा निर्विकार और नीरोग हो जाते हैं। इतना ही नहीं, वह संतानसे, पशुओंसे, ब्रह्मतेजसे और बड़ी भारी कीर्तिसे समृद्ध होकर जगत्में सर्वश्रेष्ठ समझा जाता है।

॥ षष्ठ अनुवाक समाप्त ॥ ६ ॥

सप्तम अनुवाक

सम्बन्ध— छठे अनुवाकमें ब्रह्मज्ञानीके अन्न और प्रजा आदिसे सम्पन्न होनेकी बात कही गयी; इसपर यह जिज्ञासा होती है कि ये सब सिद्धियाँ भी क्या ब्रह्मसाक्षात्कार होनेपर ही मिलती हैं या इन्हें प्राप्त करनेका दूसरा उपाय भी है। इसपर इन सबकी प्राप्तिके दूसरे उपाय भी बताये जाते हैं—

अन्नं न निन्द्यात्। तद्भुतम्। प्राणो वा अन्नम्। शरीरमन्नादम्। प्राणे शरीरं प्रतिष्ठितम्। शरीरं प्राणः प्रतिष्ठितः। तदेतदन्नमन्ने प्रतिष्ठितम्। स य एतदन्नमन्ने प्रतिष्ठितं वेद प्रतितिष्ठति। अन्नवानन्नादो भवति। महान् भवति प्रजया पशुभिर्ब्रह्मवर्चसेन। महान् कीर्त्या।

अन्नम् न निन्द्यात्=अन्नकी निन्दा न करे; तत्=वह; व्रतम्=व्रत है; प्राणः=प्राण; वै=ही; अन्नम्=अन्न है; (और) शरीरम्=शरीर; (उस प्राणरूप अन्नसे जीनेके कारण) अन्नादम्=अन्नका भोक्ता है; शरीरम्=शरीर; प्राणे=प्राणके आधारपर; प्रतिष्ठितम्=स्थित हो रहा है; (और) शरीरे=शरीरके आधारपर; प्राणः=प्राण;

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ईशादि नौ उपनिषद्

[ वल्ली ३ ]

प्रतिष्ठितः=स्थित हो रहे हैं; तत्=इस तरह; एतत्=यह; अत्रे=अत्रमें ही; अत्रम्=अत्र; प्रतिष्ठितम्=स्थित हो रहा है; यः=जो मनुष्य; अत्रे=अत्रमें ही; अत्रम्=अत्र; प्रतिष्ठितम्=प्रतिष्ठित हो रहा है; एतत्=इस रहस्यको; वेद=जानता है; सः=वह; प्रतिष्ठितः=उसमें प्रतिष्ठित हो जाता है; (अतः) अत्रवान्=अत्रवाला; (और) अत्रादः=अत्रको खानेवाला; भवति=हो जाता है; प्रजया=प्रजासे; पशुभिः=पशुओंसे; ब्रह्मवर्चसेन=(और) ब्रह्मतेजसे सम्पन्न होकर; महान्=महान्; भवति=बन जाता है; (तथा) कीर्त्या=कीर्तिसे (सम्पन्न होकर भी); महान्=महान्; [ भवति ]=हो जाता है।

व्याख्या —इस अनुवाकमें अत्रका महत्त्व बतलाकर उसे जाननेका फल बताया गया है। भाव यह है कि जो मनुष्य अत्रादिसे सम्पन्न होना चाहे, उसे सबसे पहले तो यह व्रत लेना चाहिये कि ‘मैं कभी अत्रकी निन्दा नहीं करूँगा।’ यह एक साधारण नियम है कि जिस किसी वस्तुको मनुष्य पाना चाहता है, उसके प्रति उसकी महत्त्वबुद्धि होनी चाहिये; तभी वह उसके लिये प्रयत्न करेगा। जिसकी जिसमें हेयबुद्धि है, वह उसकी ओर आँख उठाकर देखेगा भी नहीं। अत्रकी निन्दा न करनेका व्रत लेकर अत्रके इस महत्त्वको समझना चाहिये कि अत्र ही प्राण है और प्राण ही अत्र है; क्योंकि अत्रसे ही प्राणोंमें बल आता है और प्राणशक्तिसे ही अत्रमय शरीरमें जीवनी शक्ति आती है। यहाँ प्राणको अत्र इसलिये भी कहा है कि यही शरीरमें अत्रके रसको सर्वत्र फैलाता है। शरीर प्राणके ही आधार टिका हुआ है, इसीलिये वह प्राणरूप अत्रका भोक्ता है। शरीर प्राणमें स्थित है अर्थात् शरीरकी स्थिति प्राणके अधीन है और प्राण शरीरमें स्थित है—प्राणोंका आधार शरीर है, यह बात प्रत्यक्ष है ही। इस प्रकार यह अत्रमय शरीर भी अत्र है। यह अनुभवसिद्ध विषय है कि प्राणोंको आहार न मिलनेपर वे शरीरकी धातुओंको ही सोख लेते हैं। और शरीरकी स्थिति प्राणके अधीन होनेसे प्राण भी अत्र ही हैं। अतः शरीर और प्राणका अन्योन्याश्रयसम्बन्ध होनेसे यह कहा गया है कि अत्रमें ही अत्र स्थित हो रहा है। यही इसका तत्त्व है। जो मनुष्य इस रहस्यको समझ लेता है, वही शरीर और प्राण—इन दोनोंका

अनु० ८]

तैत्तिरीयोपनिषद्

४१७

ठीक-ठीक उपयोग कर सकता है। इसीलिये यह कहा गया है कि वह शरीर और प्राणोंके विज्ञानमें पारङ्गत हो जाता है और इसी विज्ञानके फलस्वरूप वह सब प्रकारकी भोगसामग्रीसे युक्त और उसे उपभोगमें लानेकी शक्तिसे सम्पन्न हो जाता है। इसीलिये वह संतानसे, नाना प्रकारके पशुओंसे और ब्रह्मतेजसे भी सम्पन्न होकर महान् बन जाता है। उसकी कीर्ति, उसका यश जगत्में फैल जाता है और उसके द्वारा भी वह जगत्में महान् हो जाता है।

॥सप्तम अनुवाक समाप्त॥ ७॥

अष्टम अनुवाक

अत्रं न परिच्छीत। तद् व्रतम्। आपो वा अन्नम्। ज्योतिरन्नादम्। अप्सु ज्योतिः प्रतिष्ठितम्। ज्योतिष्यापः प्रतिष्ठिताः। तदेतदन्नमन्ने प्रतिष्ठितम्। स य एतदन्नमन्ने प्रतिष्ठितं वेद प्रतिष्ठिष्ठति। अन्नवानन्नादो भवति। महान् भवति प्रजया पशुभिर्ब्रह्मवर्चसेन। महान् कीर्त्या।

अन्नम् न परिच्छीत=अन्नकी अवहेलना न करे; तत्=वह; व्रतम्=एक व्रत है; आपः=जल; वै=ही; अन्नम्=अन्न है; (और) ज्योतिः=तेज; अन्नादम्=(रसस्वरूप) अन्नका भोक्ता है; अप्सु=जलमें; ज्योतिः=तेज; प्रतिष्ठितम्=प्रतिष्ठित है; ज्योतिषि=तेजमें; आपः=जल; प्रतिष्ठिताः=प्रतिष्ठित है; तत्=वही; एतत्=यह; अन्ने=अन्नमें; अन्नम्=अन्न; प्रतिष्ठितम्=प्रतिष्ठित है; यः=जो मनुष्य; (इस प्रकार) अन्ने=अन्नमें; अन्नम्=अन्न; प्रतिष्ठितम्=प्रतिष्ठित है; एतत्=इस रहस्यको; वेद=भलीभाँति समझता है; सः=वह; (अन्तमें) प्रतिष्ठिष्ठति=(उस रहस्यमें) परिनिष्ठित हो जाता है; (तथा) अन्नवान्=अन्नवाला; (और) अन्नादः=अन्नको खानेवाला; भवति=हो जाता है; प्रजया=(वह) संतानसे; पशुभिः=पशुओंसे; (और) ब्रह्मवर्चसेन=ब्रह्म-तेजसे; महान्=महान्; भवति=बन जाता है; (तथा) कीर्त्या=कीर्तिसे (सम्बद्ध होकर भी); महान्=महान्; [ भवति ]=हो जाता है।

४१८

ईशादि नौ उपनिषद्

[ वल्ली ३ ]

व्याख्या —इस अनुवाकमें जल और ज्योति—दोनोंको अन्नरूप बताकर उन्हें जाननेका फल बतलाया है। भाव यह है कि जिस मनुष्यकी अन्नादिसे सम्पन्न होनेकी इच्छा हो, उसे यह नियम ले लेना चाहिये कि ‘मैं कभी अन्नकी अवहेलना नहीं करूँगा अर्थात् अन्नका उल्लङ्घन, दुरुपयोग और परित्याग नहीं करूँगा एवं उसे जूठा नहीं छोड़ूँगा।’ यह साधारण नियम है कि जो जिस वस्तुका अनादर करता है, उसके प्रति उपेक्षाबुद्धि रखता है, वह वस्तु उसका कभी वरण नहीं करती। किसी भी वस्तुको प्राप्त करनेके लिये उसके प्रति आदरबुद्धि रखना परमावश्यक है। जिसकी जिसमें आदर बुद्धि नहीं है, वह उसे पानेकी इच्छा अथवा चेष्टा क्यों करेगा। इस प्रकार अन्नकी अवहेलना न करनेका व्रत लेकर फिर अन्नके इस तत्त्वको समझना चाहिये कि जल ही अन्न है; क्योंकि सब प्रकारके अन्न अर्थात् खाद्य वस्तुएँ जलसे ही उत्पन्न होती हैं और ज्योति अर्थात् तेज ही इस जलरूप अन्नको भक्षण करनेवाला है। जिस प्रकार अग्नि एवं सूर्यरश्मियाँ आदि बाहरके जलका शोषण करती हैं, उसी प्रकार शरीरमें रहनेवाली जठराग्नि शरीरमें जानेवाले जलीय तत्त्वोंका शोषण करती है। जलमें ज्योति प्रतिष्ठित है। यद्यपि जल स्वभावतः ठंडा है, अतएव उसमें उष्ण ज्योति कैसे स्थित है—यह बात समझमें नहीं आती, तथापि शास्त्रोंमें यह माना गया है कि समुद्रमें बड़वानल रहता है तथा आजकलके वैज्ञानिक भी जलमेंसे बिजली-तत्त्वको निकालते हैं। इससे यह बात सिद्ध होती है कि जलमें तेज स्थित है। इसी प्रकार तेजमें जल स्थित है, यह तो प्रत्यक्ष देखनेमें आता ही है; क्योंकि सूर्यकी प्रखर किरणोंमें स्थित जल ही हमलोगोंके सामने वृष्टिके रूपमें प्रत्यक्ष होता है। इस प्रकार ये जल और तेज अन्योन्याश्रित होनेके कारण समस्त अन्नरूप खाद्य पदार्थोंके कारण हैं; अतः ये ही उनके रूपमें परिणत होते हैं; इसलिये दोनों अन्न ही हैं। इस प्रकार अन्न ही अन्नमें प्रतिष्ठित है। जो मनुष्य इस तत्त्वको समझ लेता है, वह इन दोनोंके विज्ञानमें प्रतिष्ठित अर्थात् सिद्ध हो जाता है; क्योंकि वही इन दोनोंका ठीक उपयोग कर सकता है। इसीके

अनु० ९ ]

तैत्तिरीयोपनिषद्

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फलस्वरूप वह अत्रसे अर्थात् सब प्रकारकी भोग-सामग्रीसे सम्पन्न और उन सबको यथायोग्य उपभोगमें लानेकी सामर्थ्यसे युक्त हो जाता है और इसीलिये वह संतानसे, नाना प्रकारके पशुओंसे और ब्रह्मतेजसे सम्पन्न हो महान् हो जाता है। इतना ही नहीं, इस समृद्धिके कारण उसका यश सर्वत्र फैल जाता है, वह बड़ा भारी यशस्वी हो जाता है और उस यशके कारण भी वह महान् हो जाता है।

॥ अष्टम अनुवाक समाप्त ॥ ८ ॥

नवम अनुवाक

अत्रं बहु कुर्वीत । तद् व्रतम् । पृथिवी वा अत्रम् । आकाशोऽत्रादः । पृथिव्यामाकाशः प्रतिष्ठितः । आकाशे पृथिवी प्रतिष्ठिता । तदेतदत्रमत्रे प्रतिष्ठितम् । स य एतदत्रमत्रे प्रतिष्ठितं वेद प्रतितिष्ठति । अत्रवानत्रादो भवति । महान् भवति प्रजया पशुभिर्ब्रह्मवर्चसेन । महान् कीर्त्या ।

अत्रम्=अत्रको; बहु कुर्वीत=बढ़ाये; तत्=वह; व्रतम्=एक व्रत है; पृथिवी=पृथ्वी; वै=ही; अत्रम्=अत्र है; आकाशः=आकाश; अत्रादः=पृथ्वीरूप अत्रका आधार होनेसे (मानो) अत्राद है; पृथिव्याम्=पृथ्वीमें; आकाशः=आकाश; प्रतिष्ठितः=प्रतिष्ठित है; आकाशे=आकाशमें; पृथिवी=पृथ्वी; प्रतिष्ठिता=प्रतिष्ठित है; तत्=वही; एतत्=यह; अत्रे=अत्रमें; अत्रम्=अत्र; प्रतिष्ठितम्=प्रतिष्ठित है; यः=जो मनुष्य; (इस प्रकार) अत्रे=अत्रमें; अत्रम्=अत्र; प्रतिष्ठितम्=प्रतिष्ठित है; एतत्=इस रहस्यको; वेद=भलीभाँति जान लेता है; सः=वह; (उस विषयमें) प्रतितिष्ठति=प्रतिष्ठित हो जाता है; अत्रवान्=अत्रवाला; (और) अत्रादः=अत्रको खानेवाला अर्थात् उसे पचानेकी शक्तिवाला; भवति=हो जाता है; प्रजया=(वह) प्रजासे; पशुभिः=पशुओंसे; (और) ब्रह्मवर्चसेन=ब्रह्मतेजसे; महान्=महान्; भवति=बन जाता है; कीर्त्या=कीर्तिसे; [ च ]=भी; महान्=महान्; [ भवति ]=हो जाता है।

४२०

ईशादि नौ उपनिषद्

[ वल्ली ३ ]

व्याख्या —इस अनुवाकमें पृथ्वी और आकाश दोनोंको अनरूप बताकर उनके तत्त्वको जाननेका यह फल बताया गया है। भाव यह है कि जिस मनुष्यको अत्रादिसे समृद्ध होनेकी इच्छा हो, उसे पहले तो यह व्रत लेना चाहिये—यह दृढ़ संकल्प करना चाहिये कि ‘मैं अत्रको खूब बढ़ाऊँगा।’ किसी वस्तुका अभ्युदय—उसका विस्तार चाहना ही उसे आकर्षित करनेका सबसे श्रेष्ठ उपाय है। जो जिस वस्तुको क्षीण करनेपर तुला हुआ है, वह वस्तु उसे कदापि नहीं मिल सकती और मिलनेपर टिकेगी नहीं। इसके बाद अत्रके इस तत्त्वको समझना चाहिये कि पृथ्वी ही अत्र है—जितने भी अत्र हैं, वे सब पृथ्वीसे ही उत्पन्न होते हैं और पृथ्वीको अपनेमें विलीन कर लेनेवाला इसका आधारभूत आकाश ही अत्राद अर्थात् इस अत्रका भोक्ता है। पृथ्वीमें आकाश स्थित है, क्योंकि वह सर्वव्यापी है; और आकाशमें पृथ्वी स्थित है—यह बात प्रत्यक्ष सिद्ध है। ये दोनों ही एक-दूसरेके आधार होनेके कारण अत्रस्वरूप हैं। पाँच भूतोंमें आकाश पहला तत्त्व है और पृथ्वी अन्तिम तत्त्व है; बीचके तीनों तत्त्व इन्हींके अन्तर्गत हैं। समस्त भोग्यपदार्थरूप अत्र इन पाँच महाभूतोंके ही कार्य हैं; अतः ये ही अत्रके रूपमें स्थित हैं। इसलिये अत्रमें ही अत्र प्रतिष्ठित है। जो मनुष्य इस बातको तत्त्वसे जानता है कि पृथ्वीरूप अत्रमें आकाशरूप अत्र और आकाशरूप अत्रमें पृथ्वीरूप अत्र प्रतिष्ठित है, वही आकाश आदि पाँचों भूतोंका यथायोग्य उपयोग कर सकता है और इसीलिये वह इस विषयमें सिद्ध हो जाता है। इसी विज्ञानके फलस्वरूप वह अत्रसे अर्थात् सब प्रकारके भोग्य पदार्थोंसे और उनको उपभोगमें लानेकी शक्तिसे सम्पन्न हो जाता है। इसीलिये वह संतानसे, नाना प्रकारके पशुओंसे और विद्याके तेजसे समृद्ध हो महान् बन जाता है। उसका यश समस्त जगत्में फैल जाता है, अतः वह यशके द्वारा भी महान् हो जाता है।

॥ नवम अनुवाक समाप्त ॥ १ ॥

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अनु० १० ]

तैत्तिरीयोपनिषद्

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दशम अनुवाक

न कञ्चन वसतौ प्रत्याचक्षीत। तद् व्रतम्। तस्माद्यया कया च विधया बह्व्रं प्राप्नुयात्। आराध्यस्मा अन्नमित्याचक्षते। एतद्वै मुखतोऽन्नः राह्मम्। मुखतोऽस्मा अन्नः राध्यते। एतद्वै मध्यतोऽन्नः राह्मम्। मध्यतोऽस्मा अन्नः राध्यते। एतद्वा अन्ततोऽन्नः राह्मम्। अन्ततोऽस्मा अन्नः राध्यते। य एवं वेद।

वसतौ=अपने घरपर (ठहरनेके लिये आये हुए); कञ्चन=किसी (भी अतिथि) को; न प्रत्याचक्षीत=प्रतिकूल उत्तर न दे; तत्=वह; व्रतम्=एक व्रत है; तस्मात्=इसलिये; (अतिथि-सत्कारके लिये) यया कया च विधया=जिस किसी भी प्रकारसे, बहु=बहुत-सा; अन्नम्=अन्न; प्राप्नुयात्=प्राप्त करना चाहिये; (क्योंकि सदगृहस्थ) अस्मै=इस (घरपर आये हुए अतिथि) से; अन्नम्=भोजन; आराधि=तैयार है; इति=यों; आचक्षते=कहते हैं; (यदि यह अतिथिको) मुखतः=मुख्यवृत्तिसे अर्थात् अधिक श्रद्धा, प्रेम और सत्कारपूर्वक; एतत्=यह; राह्मम्=तैयार किया हुआ; अन्नम्=भोजन (देता है तो); वै=निश्चय ही; अस्मै=इस (दाता)को; मुखतः=अधिक आदर-सत्कारके साथ ही; अन्नम्=अन्न; राध्यते=प्राप्त होता है; (यदि यह अतिथिको) मध्यतः=मध्यम श्रेणीकी श्रद्धा और प्रेमसे; एतत्=यह; राह्मम्=तैयार किया हुआ; अन्नम्=भोजन (देता है तो); वै=निःसंदेह; अस्मै=इस (दाता) को; मध्यतः=मध्यम श्रद्धा और प्रेमसे ही; अन्नम् राध्यते=अन्न प्राप्त होता है; (और यदि यह अतिथिको) अन्ततः=निकृष्ट श्रद्धा-सत्कारसे; एतत्=यह; राह्मम्=तैयार किया हुआ; अन्नम्=भोजन (देता है तो); वै=अवश्य ही; अस्मै=इस (दाता) को; अन्ततः=निकृष्ट श्रद्धा आदिसे; अन्नम्=अन्न; राध्यते=मिलता है; यः=जो; एवम्=इस प्रकार; वेद=इस रहस्यको जानता है (वह अतिथिके साथ बहुत उत्तम बर्ताव करता है)।

व्याख्या —दसवें अनुवाकके इस अंशमें अतिथि-सेवाका महत्त्व और फल बताया गया है। भाव यह है कि जो मनुष्य अतिथि-सेवाका पूरा लाभ

४२२

ईशादि नौ उपनिषद्

[ वल्ली ३ ]

उठाना चाहे, उसको सबसे पहले तो यह नियम लेना चाहिये कि 'मेरे घरपर जो कोई अतिथि आश्रयकी आशासे पधारेगा, मैं कभी उसको सूखा जवाब देकर निराश नहीं लौटाऊँगा।' 'अतिथिदेवो भव'—अतिथिकी देवताबुद्धिसे सेवा करो—यह उपदेश गुरुके द्वारा स्नातक शिष्यको पहले ही दिया जा चुका है। इस प्रकारका नियम लेनेपर ही अतिथि-सेवा सम्भव है। यह व्रत लेकर इसका पालन करनेके लिये—केवल अपना तथा कुटुम्बका पोषण करनेके लिये ही नहीं—जिस किसी भी न्यायोचित उपायसे बहुत-से अन्नका उपार्जन करे। धन-सम्पत्ति और अन्नदि, जो शरीरके पालन-पोषणके लिये उपयोगी सामग्री हैं, उन्हें प्राप्त करनेके लिये जितने भी न्यायोचित उपाय बताये गये हैं तथा पूर्वके तीन अनुवाकोंमें भी जो-जो उपाय बताये गये हैं, उनमेंसे किसीके भी द्वारा बहुत-सा अन्न प्राप्त करना चाहिये। अर्थात् अतिथि-सेवाके लिये आवश्यक वस्तुओंका अधिक मात्रामें संग्रह करना चाहिये; क्योंकि अतिथि-सेवा गृहस्थोचित सदाचारका एक अत्यावश्यक अङ्ग है। अच्छे प्रतिष्ठित मनुष्य घरपर आये हुए अतिथिसे यही कहते हैं—'आइये, बैठिये, भोजन तैयार है, भोजन कीजिये' इत्यादि। वे यह कदापि नहीं कहते कि हमारे यहाँ आपकी सेवाके लिये उपयुक्त वस्तुएँ अथवा रहनेका स्थान नहीं है। जो मनुष्य अपने घरपर आये हुए अतिथिकी अधिक आदर-सत्कारपूर्वक उत्तम भावसे विशुद्ध सामग्रियोंद्वारा सेवा करता है—उसे शुद्धतापूर्वक तैयार किया हुआ भोजन देता है, उसको भी उत्तम भावसे ही अन्न प्राप्त होता है अर्थात् उसे भोग्य-पदार्थोंके संग्रह करनेमें कठिनाईका सामना नहीं करना पड़ता। अतिथि-सेवाके प्रभावसे उसे किसी बातकी कमी नहीं रहती। अनायास उसकी सारी आवश्यकताएँ पूर्ण होती रहती हैं। यदि वह आये हुए अतिथिकी मध्यमभावसे सेवा करता है, साधारण रीतिसे भोजनादि तैयार करके विशेष आदर-सत्कारके बिना ही अतिथिको भोजन आदि कराके उसे सुख पहुँचाता है, तो उसे भी साधारण रीतिसे ही अन्न प्राप्त होता है। अर्थात् अन्न-वस्त्र आदि पदार्थोंका संग्रह करनेमें उसे साधारणतया

अनु० १० ]

तैत्तिरीयोपनिषद्

४२३

आवश्यक परिश्रम करना पड़ता है। जिस भावसे वह अतिथिको देता है, उसी भावसे उतने ही आदर-सत्कारके साथ उसे वे वस्तुएँ मिलती हैं। इसी प्रकार यदि कोई अन्तिम वृत्तिसे अर्थात् बिना किसी प्रकारका आदर-सत्कार किये तुच्छ भावसे भाररूप समझकर अतिथिकी सेवा करता है—उसे निकृष्ट भावसे अश्रद्धापूर्वक तैयार किया हुआ भोजन आदि पदार्थ देता है, तो उसे वे पदार्थ वैसे ही भावसे प्राप्त होते हैं। अर्थात् उनकी प्राप्तिके लिये उसे अधिक-से-अधिक परिश्रम करना पड़ता है, लोगोंकी खुशामद करनी पड़ती है। जो मनुष्य इस प्रकार इस रहस्यको जानता है, वह उत्तम रीतिसे और विशुद्धभावसे अतिथिसेवा करता है; अतः उसे सर्वोत्तम फल, जो पहले तीन अनुवाकोंमें बताया गया है, मिलता है।

सम्बन्ध— अब परमात्माका विभूतिरूपसे सर्वत्र चिन्तन करनेका प्रकार बताया जाता है—

क्षेम इति वाचि । योगक्षेम इति प्राणापानयोः । कर्मेति हस्तयोः । गतिरिति पादयोः । विमुक्तिरिति पायौ । इति मानुषीः समाज्ञाः । अथ दैवीः । तृप्तिरिति वृष्टौ । बलमिति विद्युति । यश इति पशुषु । ज्योतिरिति नक्षत्रेषु । प्रजातिरमृतमानन्द इत्युपस्थे । सर्वमित्याकाशे ।

[ सः परमात्मा ]=वह परमात्मा; वाचि=वाणीमें; क्षेमः इति=रक्षाशक्तिके रूपसे है; प्राणापानयोः=प्राण और अपानमें; योगक्षेमः इति=प्राप्ति और रक्षा—दोनों शक्तियोंके रूपमें है; हस्तयोः=हाथोंमें; कर्म इति=कर्म करनेकी शक्तिके रूपमें है; पादयोः=पैरोंमें; गतिः इति=चलनेकी शक्तिके रूपमें स्थित है; पायौ=गुदामें; विमुक्तिः इति=मलत्यागकी शक्ति बनकर है; इति=इस प्रकार (ये); मानुषीः समाज्ञाः=मानुषी समाज्ञा अर्थात् आध्यात्मिक उपासनाएँ हैं; अथ=अब; दैवीः=दैवी उपासनाओंका वर्णन करते हैं; (वह परमात्मा) वृष्टौ=वृष्टिमें; तृप्तिः इति=तृप्ति शक्तिके रूपमें है; विद्युति=बिजलीमें; बलम् इति=बल (पावर) बनकर स्थित है; पशुषु=पशुओंमें; यशः इति=यशके रूपमें स्थित है; नक्षत्रेषु=ग्रहों और