भारतकोश
संग्रह पर लौटें

ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary

आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished343 पृष्ठ

स्वामीजी ॐ नमःसच्चिदानन्दाय। ॐ श्री सद्गुरू परमात्मनेनमः विदेह कैवल्यमुक्त संवत १९३७ मार्गशीर्ष कृष्ण पक्ष ७ गुरुवार श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यं श्रोत्रियब्रह्मनिष्ठसच्चिदानन्दस्वरूप श्री१०८श्रीमत्सद्गुरु स्वामी माधवानन्द जी महाराज

इस पृष्ठ पर कोई पठनीय पाठ (Text) मुद्रित या लिखित नहीं है (यह एक रिक्त पृष्ठ है)।

FOREWORD Isvarapratyabhijna of Utpaladeva is an authoritative exposition of the principles of the pratyabhijna school—a system of philosophy that dominated people's thinking in Kashmir buring the 8th & 9th centuries A.D. Somananda laid the foundation of this school through his great and thought provoking work entitled Sivadrasi. Utpaladeva has religiously followed Somananda and presented the Siva Darsana in a succinct aphoristic style in the present work which comprises of 190 Karikas which are known as sutras because of their brevity and terseness. Utpaladeva himself has written a brief commentary ( Virtti ) as well as a Tika or Vivrti ( not extant ) on the Karika. The fact that so learned a man as Abhinavagupta chose to comment on the work bears testimoney to its authenticity. Pratyabhijna System was a prograssive branch of monistic Saivism, which was then prevalent in Kashmir. It is based on monistic Saiva Tantras. The main characteristic of this non-sectarian system is realization of the highest reality, i.e. recognition ( pratyabhijna) or a self-realization. Abhinavagupta who has commented on this work is a prolific writer who wrote on a number of subjectes with equal felicity and competence. His works on philosophy outnumber those on poetics. Amongst the writers on Indian dramaturgy, he shines as one of the brightest stars. His learned commentaries on Natyashastra of Bharata and Dhvanyaloka of Anandavardhana speak volumes for his learning, erudition and critical insight into the subject of poetics. He is also the greatest authority on

( VI ) ‘Realistic Idealism’, technically known as ‘Trike’. His present commentary entitled Vimarsini eloquently reveals his matchless scholarship. The original book written in Sanskrit aimed at showing the way to reach the essence of God or the essence of God Shiva. By translating in Hindi a book of this kind of great value to all devotees of Dharma, Acharya Shri Krishnanand Sagar has performed real public service. Quite obviously this valuable and rich volume will now become available to far more people, as so many more people know Hindi than Sanskrit. The work of translating Utpaladeva’s original book together with the commentary written by Acharya Abhinavagupta was not easy and Acharya Shri Krishnanand Sagar is to be congratulated for having accomplished the task so well. For him it has been a labour of love and duty. I am confident that it will inspire all who read it to think more deeply and sustainedly and thus come closer to God. H. M. Patel Ex—Finance Minister Govt. of India

प्रशस्तिः स्वयंप्रकाशस्य चिदात्मनो मे स्वातन्त्र्यमेतन्नहि किञ्चिदन्यत् । शिवादभूम्यन्तसमस्तविश्वरूपेण चैकोऽपि विभामि योऽहम् ॥ जगदिदं सच्चिदानन्दरूपम् । परमेश्वरोऽन्तर्बहिः पारिपूर्ण्येन समुच्छलत्तदनन्तविश्वलहरीनिर्भरः पूर्णोऽहं विमर्शमयचिच्चमत्कारशालिनि स्वमहिम्नि एव अवस्थितः न तु मनागपि संकोचकलनाभिन्नवेद्यवेदकाद्यात्मा त्रैकालिकी बाह्यत्वेन समुदेतीति । अथ च स एवानन्तघनतया समुच्छलत्स्वभावः स्वेच्छयैव स्वस्मादेव निरुपादान- सहकारिकरणादिसम्भारं विश्वक्रीडामुद्दिभासयिष्यन् स्व-स्वातन्त्र्येण शुद्धाशुद्धविमिश्ररूपाणि परस्परापोहनेन अवभासमानानि मातृ-मेयादीनि तत्सम्बन्धांश्च कार्यकारणभाववैचित्र्यादीन् दर्पणप्रतिबिम्बवदनतिरिक्तानपि अति- रिक्तवद्ववभासयति स्वात्मनि एव देशकालाद्युपहितान् । निर्भासितां च तेषां कालाद्यकलितः स एव पारमार्थिक- स्वभाव इति वस्तुतो हि सृज्यते स्थाप्यते संह्रियते चेति । आनन्दघनश्चिदाकाश एव पूर्णतापूर्णतरस्तथा तथा पूर्णमानश्चकास्तीति षडर्धशास्त्रापराख्यप्रत्यभिज्ञाशास्त्रसम्प्रदायः — श्रीसोमानन्ददेवैः परमशिवमतं ग्रन्थितं यत्पुराऽभूत् तत्र व्याख्योत्पलाचार्यैरपि पृथुरुदिता प्रत्यभिज्ञेश्वरस्य । तस्यां वैमर्शनाम्नाऽभिनवमृदुपदा सर्वगम्यैव हिन्दी श्रीकृष्णानन्दवर्यैः सुरगुरुमतिभिः सागरैरभ्यधायि ॥ इति शम् । पण्डितराजः राष्ट्रपतिसन्मानितः म. म. श्रीगोपालशास्त्रिदर्शन- केशरी

शुभाशंसन महामाहेश्वर आचार्यप्रवर श्रीमदुत्पलदेवाचार्य द्वारा विरचित 'ईश्वरप्रत्यभिज्ञा' ग्रन्थ का काश्मीरी, 'प्रत्यभिज्ञादर्शन' या 'शैवाद्वैतदर्शन' में अत्यन्त महत्त्वपूर्ण स्थान है। इस ग्रन्थ को उक्त दर्शन का प्रस्थान भी कह सकते हैं। श्रीमदुत्पलदेवाचार्य के प्रशिष्य 'तन्त्रालोककार', महामाहेश्वर श्रीमद्-अभिनवगुप्ताचार्य थे। 'तन्त्रालोक' प्रत्यभिज्ञादर्शन का सर्वाधिक महनीय, प्रामाणिक एवं विशाल ग्रन्थ है। श्रीमद्-अभिनवगुप्त- पादाचार्य के गुरु के गुरु श्रीमदुत्पलदेवाचार्य ने जिन मान्यताओं को अपने 'ईश्वरप्रत्यभिज्ञा' ग्रन्थ में प्रतिष्ठापित किया वे मान्यतायें उक्त दर्शन में आगे चलकर पल्लवित और पुष्पित हुई। उनके सब से बड़े व्याख्याकार श्रीमद्-अभिनवगुप्तपादाचार्य थे जिन्होंने भरत के 'नाट्यशास्त्र' की भी 'अभिनवभारती' टीका लिखी थी। उन्होंने ही अत्यन्त विशालकाय शैवदर्शन के सब से विशिष्ट ग्रन्थ 'तन्त्रालोक' की रचना द्वारा उक्त दर्शन को अमर बना दिया। महाराजा कश्मीर के राज्यद्वारा संचालित शैवदर्शन की ग्रन्थमाला में शैवदर्शन के पचासों महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ प्रकाशित हुए थे। 'तन्त्रालोक' भी इसी ग्रन्थमाला में प्रकाशित होकर प्रकाश में आया था। श्रीमद्- अभिनवगुप्तपादाचार्य की 'विमर्शिनी' व्याख्या सहित, 'ईश्वरप्रत्यभिज्ञा' भी वहीं प्रकाशित थी। परन्तु अत्यन्त स्वल्प मूल्यवाले उक्त माला के ग्रन्थ आज दुर्लभ हो रहे हैं। अभिनवगुप्तपादाचार्य को प्रामाणिक, 'विमर्शिनी' व्याख्या युक्त 'ईश्वरप्रत्यभिज्ञा' ग्रन्थ का सर्वदर्शनाचार्य श्रीकृष्णानन्द सागर की 'शिवरञ्जनी' टीका के साथ प्रकाशन स्तुत्य प्रयास है। यद्यपि 'ईश्वरप्रत्यभिज्ञा', पर लिखित अभिनवगुप्तपादाचार्य की 'विमर्शिनी', नामक टीका अत्यन्त पाण्डित्यपूर्ण है तथा 'ईश्वरप्रत्यभिज्ञा' की सूत्रात्मक कारिकाओं को समझने के लिए कुंजिका है तथापि संस्कृत न जाननेवालों के लिए वह अर्थहीन हो जाती है। आचार्य श्रीकृष्णानन्द सागर का हिन्दी व्याख्या के साथ प्रकाशन का यह कार्य निश्चय ही प्रशंसनीय और संस्कृत न जाननेवाले शैवाद्वैतदर्शन के समुत्सुक जिज्ञासुओं के लिए बड़ा सहायक सिद्ध होगा। हिन्दी टीकाकार को एतदर्थ मैं हार्दिक बधाई देता हूँ और विश्वास करता हूँ कि यह ग्रन्थ जिज्ञासु सुधीजनों में लोकप्रिय होगा। पं० करुणापति त्रिपाठी भूतपूर्व कुलपति—सम्पूर्णानन्द-संस्कृत-विश्वविद्यालय एवं वर्तमान अध्यक्ष—उत्तर-प्रदेश-संस्कृत-अकादमी

सर्वदर्शनाचार्य श्रीकृष्णानन्द सागर जी महाराज

इस पृष्ठ पर कोई मुद्रित अथवा हस्तलिखित पाठ (text) उपलब्ध नहीं है (यह एक रिक्त पृष्ठ है)।

प्रस्तावना प्रत्यभिज्ञादर्शन की प्राचीनता एवं गुरुपर्वक्रम प्रत्यभिज्ञादर्शन एक अत्यन्त प्राचीन दर्शन है, जितना कि सच्चिदानन्द स्वरूप परम शिव। इस दर्शन का आदि और अन्त पाना कठिन है; क्योंकि शिव से इस प्रत्यभिज्ञाशास्त्र का गहन सम्बन्ध है जिसके स्वरूप का आदि और अन्त ब्रह्मा आदि देव भी नहीं पा सके हैं। इसलिए हम लोगों के मन एवं वाणी का अविषय ही है। यह संविद्रूप परम शिव सृष्टि से पूर्व 'अहम्' इस रूप में अव्यक्तरूप से रहा। 'आत्मा वा इदमेक एवाग्र आसीत् नान्यत् किंचन मिषत् ईक्षत लोकान्नु सृजा इति ॥१॥ स इमाँल्लोकानसृजत' (ऐत० १।२) इस श्रुति वाक्य से सिद्ध होता है कि यह एक मात्र परमात्मतत्त्व ही सृष्टि से पूर्व था, अतः परमात्मा ने ईक्षणरूप संकल्प किया कि मैं सम्पूर्ण लोकों की रचना करूँ। इस प्रकार वही परम शिव 'इदम्' इस नाम-रूपात्मक जगद्रूप से व्यक्त हो गया। इस दर्शन का तादात्म्य अद्वैत परक उपनिषदों से मिलता है। जिस अद्वैततत्त्व का प्रतिपादन उपनिषदों ने किया है, ठीक उसी तत्त्व का प्रतिपादन शैवाद्वैत वेदान्तदर्शन में हुआ है, केवल नाम-रूप की भिन्नता है, वस्तु सारूप्यत्व तो एक ही है जैसा कि पुष्पदन्ताचार्य ने महिम्नः स्तोत्र में उल्लेख किया है—'रुचीनां वैचित्र्यादृजु-कुटिलनानापथजुषां नृणामेको गम्यस्त्वमसि पयसामर्णव इव।' अर्थात् परमार्थ पथ के पथिकों का प्रस्थान भिन्न-भिन्न होने पर भी रुचि के वैचित्र्य से टेढ़ी-मेढी व सरल गतिपूर्वक गमन करनेवाली सरिताओं के लिए सागर के समान एक मात्र परमात्मा ही लक्ष्य रहता है। इस दर्शन में गुरु परम्परा के क्रम से भी अद्वैत-वेदान्त की भांति अतिप्राचीनता झलकती है। अद्वैत- वेदान्त में गुरु परम्परा का वर्णन भी ठीक इस शैवाद्वैत की प्राचीनता से मिलता है इससे सिद्ध होता है कि यह प्रत्यभिज्ञादर्शन भी प्राचीन ही है। अद्वैतवेदान्त की गुरु परम्परा में 'नारायणं पद्मभवं वशिष्ठं शक्तिं च तत्पुत्रपराशरं च व्यासं शुकं गोडपदं महान्तं गोविन्दयोगीन्द्रमथास्यशिष्यम् । श्रीशंकराचार्यमथास्य पद्मपादं च हस्तामलकं च शिष्यं तं तोटकं वार्तिक कारमन्यानस्मद्गुरून्सन्ततमानतोऽस्मि।' इस प्रकार से भगवान् नारायण से लेकर आचार्य भगवत्पाद शङ्कर के शिष्य सुरेश्वराचार्य तक एवं आगे विद्यारण्यमुनि इत्यादि शुद्धरूप से वेदान्तदर्शन के आचार्य माने जाते हैं। आज से सहस्रों वर्ष पूर्व, जबकि राम, परशुराम, कृष्ण इत्यादि अवतरित नहीं हुए थे, इन सबों से पूर्व इस सप्तद्वीपा वसुन्धरा पर शैवाद्वैतवेदान्त का ही अत्यधिक प्रचार-प्रसार था, चौबीस या जितने भी अवतार हुए हों, इन अवतारों के अनन्तर ही छोटे-मोटे सम्प्रदायों का उदय हुआ है और भिन्न-भिन्न दर्शनों का निर्माण हुआ है। 'कालक्रमेण जगतः परिवर्तमानाः' इस न्याय से संसार परिवर्तनशील है और ऐसा होना स्वाभाविक भी है, धीरे-धीरे इस दर्शन का लोप होने लगा। जैसा कि भगवान् ने गीता में कहा है 'एवं परम्पराप्राप्तमिमं राजर्षयो विदुः । स कालेनेह महता योगो नष्टः परंतप ॥४-२॥ हे अर्जुन ! मैंने इस अविनाशी आत्मविश्रान्तिरूप योग को कल्प के आदि में सूर्य के प्रति कहा था और सूर्य ने मनु के प्रति कहा और मनु ने इक्ष्वाकु को दिया। इस प्रकार परम्परा से प्राप्त हुए आत्मविश्रान्तिरूप योग को राजर्षियों ने प्राप्त किया किन्तु इस योग का धरातल पर प्रायः लोप हो गया था। इसे पुनः तुम्हारे लिए मैं कहता हूँ।

[ १० ] भगवान् परमशिव ने निम्न प्रकार से आदेश दिया है—मूर्त्या श्रीकण्ठरूपया चोदयामास मुनि दुर्वाससं नाम । ततः स भगवान् देवादेशं प्राप्य यत्नवान् । ससर्ज मानसं पुत्रं त्र्यम्बकादित्यनामकम् । यावत्पञ्चदशः पुत्रः । स कदाचिद्रागवशात् । ब्राह्मणीमानयामास ततो जातस्तथा विधः । तनयः स च कालेन कश्मीरेष्वागतो अभवत् । नाम्ना स संगमादित्यो वर्षादित्यस्तु तत्सुतः । तस्याप्यभूत्स भगवानरुणादित्यसंशकः । आनन्द संज्ञकस्तस्मात् । तस्मादस्मि समुद्भूतः सोमानन्दाख्य ईदृशः ॥ इस प्रकार भगवान् श्रीकण्ठ मूर्त्ति से लेकर श्री सोमानन्दपाद पर्यन्त एवं आगे भी इस दर्शन की परम्परा अनवच्छिन्न धारावत् चली । इन्होंने सर्व-प्रथम शैवाद्वैतधारा को ग्रन्थ का प्रारूप दिया, इस प्रकार श्री सोमानन्दपाद ने 'शिवदृष्टिशास्त्र' की रचना करके मुमुक्षुजन के मानसपटल को अमृतधारा से सींच दिया । इस प्रत्यभिज्ञादर्शन की प्रखरता का सूर्य धरातल पर प्राणियों को प्रकाशित करता हुआ चला आ रहा है। आचार्य उत्पलदेव ने 'शिवदृष्टिशास्त्र' जो कि आगमशास्त्ररूप है इसके अनुसार ईश्वरप्रत्यभिज्ञा का निर्माण किया है। ईश्वरप्रत्यभिज्ञा का उपसंहार करते हुए आचार्य ने अपना जीवन क्रम का परिचय दिया है। जैसा कि—'जनस्यायत्नसिद्ध्यर्थमुदयाकर सूनुना । ईश्वरप्रत्यभिज्ञेयमुत्पलेनोपपादिता ।। श्री उदयाकर इनके पिता थे । इस ईश्वरप्रत्यभिज्ञा के ऊपर आचार्य अभिनवगुप्त ने विमर्शिनी टीका की है। इस प्रकार अभिनवगुप्त ने गुरुपरम्परा क्रम के अनुसार विद्याध्ययन करके अनेकानेक ग्रन्थों का निर्माण किया । इन्होंने उल्लेख किया है कि 'ईश्वरप्रत्यभिज्ञोक्त विस्तरे गुरुनिर्मिते । शिवदृष्टिप्रकरणे करोमि पदसंगतिम् । श्रीसोमानन्दनाथस्य विज्ञानप्रतिबिम्बकम् । बुद्ध्वाभिनवगुप्तोऽहं श्रीमल्लक्ष्मणगुप्ततः । श्री लक्ष्मणगुप्त से विद्याध्ययन करके ईश्वरप्रत्यभिज्ञा के ऊपर विमर्शिनी एवं बृहत्प्रत्यभिज्ञाविवृत्ति-विमर्शिनी का निर्माण आचार्य अभिनवगुप्त ने किया है । इन टीकाओं का निर्माण करके आचार्य अभिनवगुप्त ने इस दर्शन की कहीं अधिक शोभा बढायी है और इसके उत्थान में विमर्शिनीकार का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है। प्रत्यभिज्ञादर्शन का नामान्तर इस दर्शन को शैवाद्वैत वेदान्तदर्शन; स्वातन्त्र्यदर्शन, प्रत्यभिज्ञादर्शन और षडर्ध अर्थात् त्रिकदर्शन भी कहते हैं । शैवाद्वैत इसलिए कहते हैं कि इस दर्शन में जीव एवं शिव की अद्वैतरूपता का प्रतिपादन है । स्वतन्त्ररूप से विचार-विमर्श इस दर्शन में किया गया है अतः यह स्वातन्त्र्य दर्शन है । प्रत्यग् अभिन्न अपने स्वरूप की प्रत्यभिज्ञा होती है कि मैं वही सच्चिदानन्द परम शिव हूँ इस प्रकार शक्ति और शक्तिमान् की अभिन्नता से भगवान् परम शिव ही पशु, पशुपति और पाश है अत एव इस शास्त्र को त्रिक शास्त्र नाम से कहा है । इसी त्रिक शास्त्र को सामान्यजन ईश्वर, जीव और प्रकृति कहते हैं और अद्वैत-वेदान्ती ब्रह्म, जीव और माया कहते हैं । इस दर्शन की दृढ़-प्रतिज्ञा यह प्रत्यभिज्ञा शास्त्र आत्मरूप वैभव देनेवाला है; क्योंकि 'कथंचिदासाद्य महेश्वरस्य...समस्त संपत्समवासिहेतुं...।' महेश्वर की दासता सम्पूर्ण आत्म-विश्रान्तिरूप ऐश्वर्य देने में कारण है । भौतिक स्वार्थ में संलग्न व्यक्ति परमार्थ पथ का पथिक हो एवं हृदयकमल में विद्या ज्ञान का प्रदीपप्रकाशपुञ्ज प्रकट करें अपनी संकीर्ण अकिंचन भावना का त्याग करते हुए मैं स्वयं परमेश्वर स्वरूप हूँ, यह समझे । किन्तु मोहवशादस्मिन्दृष्टेऽप्यनुपलक्षिते । शक्त्याविष्करणे नेयं प्रत्यभिज्ञोपदर्श्यते ।' अर्थात् मोह माया के आवरण से घेरा हुआ प्राणी अपने स्वरूप को देखता हुआ भी स्व-स्वरूप की उपेक्षा कर देता है । ज्ञान-शक्ति का हृदय

[ ११ ] पर प्रकाश करने के लिए इस प्रत्यभिज्ञा का स्मरण कराया जाता है कि मैं महेश्वर हूँ मैं जडभूत नहीं हूँ; क्योंकि जड का स्वभाव परिच्छिन्न है । संविद्रूप ज्ञान जड से विलक्षण है 'जडाद्विलक्षणो बोधः ।' इसलिए संविद्रूप का परिच्छेद नहीं होता है तथा इच्छा और क्रिया ज्ञानपूर्वक ही हुआ करती है, सम्पूर्ण स्थावर- जङ्गम समुदाय महेश्वर का ही वैभव है । ज्ञान-शक्ति का स्वरूप परमेश्वर अपनी हृदयरूपी गुहा के भीतर स्थावर-जङ्गमरूप सम्पूर्ण पदार्थराशि को ज्ञान-शक्तिरूप प्रदीप से आभासित करते हैं, इस प्रकार ज्ञान-शक्ति से ही स्मृति-शक्ति का जीवन रहता है, विशिष्ट देश एवं काल के आभास से युक्त होकर वर्तमान काल में भिन्न-भिन्न रूपों में आभासित होना ही ज्ञान-शक्ति का स्वरूप माना जाता है आन्तर अवस्थित पदार्थों का बाह्यरूप से भासित होना ही घटता है किन्तु वे पदार्थ माया प्रमाता में भेदपूर्वक भासते हैं और शुद्ध चिद्रूप में 'अन्तःस्थिताम्' अर्थात् अन्तर से सम्बन्ध रखते हुए उसके साथ एकताभाव को प्राप्त कर प्रकाशता की स्थिति सदैव बनाये रखते हैं इसलिए चिद्रूप की भिन्नता को न छोड़नेवाले पदार्थों के आरोपित प्रमाता की अपेक्षा भेद से अवभासित होना ही तो महेश्वर देव की ज्ञान-शक्ति है । पदार्थों की प्रकाशात्मता इस प्रकार प्रकाश ही तो अर्थों का स्वरूप है, अपने स्वरूप की प्रकाशता प्रकाश से अभिन्न रहती है; क्योंकि अर्थ ही नीलादि पदार्थ है और वही नीलादि रूपता को प्रकाशता है माहेश्वर प्रकाश से भी प्रकाश भिन्न है इससे तो फिर अनुसन्धान का योग ही नहीं बैठ सकता है इसलिए अर्थ का स्वरूप प्रकाशमानत्व प्रकाश से अभिन्न है । इस प्रकार चिद्रूप आत्मा में असद्रूप के समान रहते हुए की जड समुदाय प्रकाश का ही स्वरूप है; क्योंकि प्रकाश न तो प्रकाश से भिन्न है और न अर्थ से ही भिन्न है स्वयं प्रकाशरूप ज्ञान से अर्थ अभिन्न ही रहता है इसलिए बोधरूप प्रकाश से अभेदपूर्वक ही अर्थ अवस्थित रहता है । चिदात्मैव हि देवोऽन्तःस्थितमिच्छावशाद्बहिः । योगीव निरुपादानमर्थजातं प्रकाशयेत् ॥ सच्चिदानन्द देव ही अपने आन्तर स्थित तत्त्व-समुदाय को इच्छा-शक्तिवशात् बाहर की ओर आभासित करते हैं । जैसे योगो उपादानकारण आदि के बिना भी पदार्थराशि को अभिव्यक्त करते हैं अर्थात् स्वप्न, संकल्प, मनोराज्य आदि में बाह्य उपकरणों के बिना भी यथार्थ विचित्र रूपों में प्रकाशित हो जाते हैं उसी प्रकार प्रमाताओं में भी आभासविचित्रता यद्यपि स्थिर नहीं है तो भी पूर्वकालीन संस्कार समूह को लेकर उनमें यथाकाल उत्पन्न हो जाती है; क्योंकि योगी अपने योग-शक्ति से समस्त पदार्थों का निर्माण क्षणमात्र में उपादानकारण के बिना भी पुर, सेना, किला आदि के रूप में सृजन कर देते हैं । इस विषय में भट्ट दिवाकरवत्स का कथन है कि 'न दृश्यते त्वत्प्रतिभासनासतेः स्वप्नेऽर्थवैचित्र्यनिमि- त्तमन्यत् । तद्दृष्टसामर्थ्यतया सदैव विश्वप्रपञ्चप्रथनैकहेतुः ॥ अर्थात् हे महेश्वर ! तुम्हारी ज्ञान-शक्ति से अतिरिक्त कोई पदार्थों को विचित्र-चित्र रूपों में आभासित करने के लिए स्वप्न में भी दूसरा कारण दिखायी नहीं देता है । इस नाम-रूपात्मक विश्व का विस्तार करने में एकमात्र हेतु संविद्रूप की सामर्थ्य- शक्ति ही है ।

[ १२ ] श्रुतिगतप्रामाण्य इस विषय में उपनिषद् वाक्य का भी प्रमाण मिलता है—'मायां तु प्रकृतिं विद्यान्मायिनं तु महेश्वरम् । तस्यावयवभूतैस्तु व्याप्तं कृत्स्नमिदं जगत् ॥' इस नाम-रूपात्मक विश्व का सृष्टा महेश्वर है माया को प्रकृति और मायाधीश को महेश्वर समझो, उस परमात्मा के अवयवरूप से ही यह सारा का सारा विश्व व्याप्त है । 'तस्माद्वा एतस्मादात्मनः आकाशः' इत्यादि अर्थात् उस सच्चिदानन्द पूर्ण परमात्मा से ही आकाश, वायु आदि तत्त्वों की उत्पत्ति श्रुतियों से सुनी जाती है । इससे सिद्ध होता है कि उस संविद्रूप सच्चिदानन्द देव के भीतर ही यह सारा का सारा तत्त्व समूह आकर के रूप में रहता है और अपनी इच्छा- शक्ति से बाहर की ओर प्रकाशित होता है; क्योंकि परमात्मा ने इच्छा कि 'एकोऽहं बहुस्याम्' मैं अकेला हूँ अनेकों रूपों में विभक्त हो जाऊँ; महेश्वर की स्वातन्त्र्य-शक्ति से ही तत्त्व-समूह बाहर भासित होते हैं । परमेश्वर को सृष्टि रचना में बाह्य उपकरणों की अपेक्षा नहीं होती है जैसे कि कुंभकार को बाह्य उपकरणों की अपेक्षा होती है । उन्हीं से कुंभकार घट का निर्माण कर सकता है। किन्तु परमेश्वर में यह बात नहीं है वह तो स्वतः इस विश्व प्रपञ्च का निर्माण करते हैं किसी अन्य की अपेक्षा रखनेवाले नहीं है। अतः महेश्वर को अभिन्ननिमित्तोपादान कारण कहा जाता है । इसमें श्रुति वाक्य प्रमाण है—यथोर्णनाभिः सृजते गृह्णते च यथा पृथिव्यामोषधयः संभवन्ति । यथा सतः पुरुषात् केशलोमानि तथाऽक्षरात्संभवतीह विश्वम् ॥ ( मु० १-७ ) जिस प्रकार मकड़ी अपने शरीर से ही तन्तुओं को बाहर की ओर निकालती है उसे किसी अन्य की इसमें अपेक्षा नहीं होती है और प्रसारित तन्तुओं को पुनः अपने में समेट लेती है । जैसे भूमि से व्रीहि, यव, ओषधि, अन्न आदि उत्पन्न होते हैं जीवित प्राणी से केश-आदि उत्पन्न होते हैं उसी प्रकार अक्षर ब्रह्म से यह अखिल संसार उत्पन्न होता है और पुनः प्रलय काल में उसी में समाहित हो जाता है। इसीलिए बाह्य-पदार्थों की प्रकाशता में चिदात्मा देव की हो ज्ञान-शक्ति कारण है । परम शिव का स्वातन्त्र्य आन्तर स्थित अर्थ समूह का ही बाहर की ओर प्रकाश होता है यदि ऐसी बात है तो फिर वह क्यों स्वतः प्रकाशित नहीं होता है ? इसका समाधान यह है कि संविद्रूप सच्चिदानन्द देव में रहनेवाली पदार्थराशि निरन्तर आभासित होती रहती है किन्तु 'अस्त्येव न विना तस्मादिच्छामर्शः प्रवर्तते ।' परमेश्वर की इच्छा के बिना प्रत्यवमर्श नहीं होता है । चिदात्मा में संपूर्ण पदार्थ समूह निरन्तर भासित होते रहना यह उसका स्वरूप नहीं है किन्तु अपनी स्वातन्त्र्य-शक्ति से, स्वामीपन से एवं ऐश्वर्य से, चित्र-विचित्र प्रकार से, कार्य-कारणभाव के क्रम व अक्रम से संविद्रूप ज्ञान ही इस पदार्थराशि को बाहर की ओर आभासित करते हैं प्रमाताओं के भेद से विस्तारपूर्वक उसमें भी आभास को कहीं पर एकत्रित कर देते हैं । जैसा कि नृत्याङ्गना अपने स्वाङ्ग से विविध प्रकार की भावभङ्गी दिखा करके प्रेक्षक वर्ग की दृष्टि को अपनी ओर आकर्षित करती हुई एकत्रित कर लेती है, उतने अंश में ही आभासों की एकरूपता बनी रहती है; क्योंकि परमेश्वर का विभाग अवस्था में भी वैसा स्वरूप रहता है । शरीर, प्राण आदिकों का आभासों के अंशों में 'चितिशक्तिरपरिणा- मिनी ।' अर्थात् चिति-शक्ति परिणामशील नहीं होती है । यद्यपि प्रकाश एवं अप्रकाश दोनों ही आत्मा में रहते हैं तो भी प्रकाश की कुछ तो विलक्षणता नहीं दिखायी देती है वैसे ही विमर्श एवं अविमर्श भी तो आत्मा में रहते हैं इससे जड एवं अजड की प्रतीति कैसे होगी ?

[ १३ ] 'अहम्' प्रत्यवमर्श ही इसका वास्तविक स्वरूप है वह अपने ही रस से परावाणी के रूप में उदित रहता है, यही परमात्मा का मुख्य स्वातन्त्र्य है। चिति-शक्ति का परामर्श स्मरण करना ही स्वभाव है; क्योंकि जड वस्तु स्वयं अपने आप से प्रकाशित नहीं होती है और न तो किसी अन्य को प्रकाशित कर सकती है। चैत्र आदि व्यक्ति तो स्वयं अपना परामर्श करते हैं और स्वयं अपने से प्रकाशित भी रहते हैं। इसलिए यह परावाणी आद्य-शक्ति अभिन्न स्वभाववालो है, निरन्तर संविद्रूप से स्फुरित रहने के कारण उत्पत्ति-विनाश से रहित रहती है, अन्य की अपेक्षा न रखनेवाली होने से इसे स्वातन्त्र्य-शक्ति भी कही जाती है। वह सम्पूर्ण परामर्शों का आश्रयरूप होने से एवं अपने में पूर्ण होने से परावाणी परामर्श द्वारा सारे विश्व को अपने स्वरूप में देखती है और 'अहं' इस परामर्शरूप से निरन्तर स्फुरित रहती है यही सच्चिदानन्द परमात्मा का परम स्वातन्त्र्य है। 'सा स्फुरता महासत्ता देशकालाविशेषिणी। सैषा सारतया प्रोक्ता हृदयं परमेष्ठिनः ।। वह भवन कर्तृता महासत्ता निरन्तर विस्फुरित रहती है इसे देश एवं काल स्पर्श नहीं करता इसलिए सच्चिदानन्द देव प्रतिक्षण सृष्टि, स्थिति एवं प्रलयादि के द्वारा प्रमातृ-वर्ग के संयोजन-वियोजन की विचित्रता से सम्पूर्ण विश्व को प्रपञ्चित किया करते हैं। इस प्रकार आचार्यपाद का कथन है 'सदा सृष्टि विनोदाय सदा स्थितिसुखासिने सदा त्रिभुवनाहारतृप्ताय भवते नमः।' श्रीभट्टनारायण ने भी कहा है—मुहुर्मुहूर्विश्रान्तस्त्रैलोक्यं कल्पनाशतैः । कल्पयन्नपि कोऽप्येको निर्विकल्पो जयत्यजः ।। अर्थात् अनेक प्रकार से तीनों लोकों की निरन्तर कल्पना करते हुए स्व-स्वरूप में विश्रान्त रहनेवाले निर्विकल्प अजन्मा की जय हो। इससे सिद्ध होता है कि संविद्रूप भगवान् सच्चिदानन्द देव में पदार्थतत्त्व रहते हैं किन्तु उनकी इच्छा-शक्ति के बिना बाहर में प्रकाशित नहीं होते हैं। परामर्श का नाम ही विकल्प है और वह भगवान् सच्चिदानन्द देव में कैसे सम्भव हो सकता है ? आभास का स्वभाव ही प्रत्यवमर्श है, इसे स्वरूप का प्रत्यवमर्श कर्ता ही भली-भाँति जानता है इसका दूसरा नाम अहम्, स्वातन्त्र्य स्वभाववाला एवं असांकेतिक है, नहीं तो अर्थ से उपरक्त होने पर भी प्रत्यवमर्श से रहित होकर प्रकाश स्फटिकादि के समान जड ही हो जाता है। संविद्रूप तत्त्व को विमर्शयुक्त अन्य आगमशास्त्रों ने भी अङ्गीकार किया है। इस विषय में कहते हैं कि 'आत्मात एव चैतन्यं चित्क्रिया चित्कर्तृता। जडात्स हि विलक्षणः ।।' अर्थात् आत्मतत्त्व सच्चिद्रूप है चिद्रूप क्रिया भी चेतन कर्ता से युक्त रहती है। इसलिए आत्म-तत्त्व जड वस्तु से विलक्षण है। चिति-क्रिया ही वही विश्वरूप परमेश्वर का स्वात्म प्रतिष्ठा रूप हृदय है। देश एवं कालादि के भाव से तो उसकी व्यापकता समाप्त होती है। किन्तु व्यापक तो वही है जो सम्पूर्ण दिशाओं में व्यापकभाव रखता हो अर्थात् देश एवं कालादि से अनवच्छिन्न स्वरूपवाला ही व्यापक कहलाता है। विभु परमेश्वर की माया-शक्ति के द्वारा विमर्शात्मिका चिति-शक्ति ही भिन्न-भिन्न संवेद्य विषयों में विभक्त होकर ज्ञान, संकल्प एवं अध्यवसाय आदि संज्ञाओं से पुकारी जाती है। परमेश्वर ही पशु प्रमाता अपनी माया-शक्ति से बन जाते हैं इस प्रकार विमर्शात्मिका शक्ति भी माया-शक्ति के द्वारा विषयों के उपराग से संकुचित होकर ज्ञान-स्मरण आदि रूपों में परिणत हो आती है। परमार्थतः विमर्शात्मिका-शक्ति से अतिरिक्त कुछ भी तो नहीं। इस प्रकार अतिसूक्ष्मरूप से विमर्श प्रकाशवपु में आविष्ट होकर भासता है जिसमें स्थूलरूप से विकल्पता प्रस्फुट होती है उसमें तो नीलादि-पदार्थ के समान भिन्नरूप में प्रतिभासित होने लगता है। जैसा कि यह नील है, वह प्रकाश स्वरूप से अभिन्न होकर कैसे भासित होगा ? वह मायामय संसार में तो प्रकाश से अभेद रखता हुआ भासता है वही यह घट है जो कि अध्यवसाय ज्ञान नामरूपात्मक प्रपञ्च से भिन्न है,

[ १४ ] परमेश्वर की चिति-शक्ति आत्मा के समान 'अहम्' इस अनवच्छिन्नरूप में निरन्तर भासती है । इदन्तया अर्थात् परिच्छिन्नभाव से नहीं भासती है । संवित्तत्त्व का कोई क्रम नहीं है, किन्तु परमेश्वर की माया-शक्ति से भिन्न-भिन्न रूपों में जितने भी आभासित होनेवाले पदार्थ हैं उन सबों को मूर्त्ति भेदकृत दूर-समीप एवं संकुचित-विशाल आदि देश भेद और क्रिया भेद से शीघ्र-विलम्ब इत्यादि को कालकृत भेद से आभासित करते हैं उन सबों के अनुरोध से ज्ञान, स्मृति और अध्यवसाय आदि क्रम से प्रकाशित होते हैं । इसलिए कहा है कि 'ज्ञानादयोऽस्य भगवतः शक्तयः' अर्थात् ज्ञान, स्मृति एवं अध्यवसाय आदि भगवान् परम शिव की ही शक्तियाँ है । अपोहनशक्ति का स्वरूप जो सच्चिदानन्दघन परम शिव अपने स्वरूप में अवस्थित पदार्थराशि को प्रस्फुरित होने से रोकते हुए अपनी स्वातन्त्र्यरूप इच्छा-शक्ति के द्वारा वैचित्र्यभाव प्रकट करते हैं ज्ञान-शक्ति और स्मृति-शक्ति इन दोनों पर अनुग्रह करनेवाली परमेश्वर को ही अपोहन-शक्ति है; क्योंकि गीता में भगवान् ने भी कहा है कि 'मत्तः स्मृतिर्ज्ञानमपोहनञ्च ।' अर्थात् मुझ से ही स्मृति, ज्ञान एवं अपोहन होता है ऊह का अर्थ तर्क, संशय- विपर्यय होता है जो उससे रहित हो वही अपोहन है । स्व-स्वरूप में निरन्तर प्रस्फुरित रहना ही अपोहन है और वहो परमात्मा की शक्ति है । इसलिए अपोहन-शक्ति का शुद्ध अहं प्रत्यवमर्श प्रकाश स्वरूप है उसका परावाग्रूपता ही वपु है उसमें विकल्पता नहीं रहती है, वह तो द्वित्व की अपेक्षा रखनेवाला चिद्रूपसार तत्त्व है । किसी अन्य को अपेक्षा न रखनेवाला, स्व-स्वरूप में स्थिर रहनेवाला अहं प्रत्यवमर्श है । वह विकल्पित नहीं होता है । शुद्ध अहं परामर्श में जो घटादि प्रतियोगिरूप अपोहनीय है । इसमें तो अवश्य विकल्पता रहती है परमेश्वर भी माया-शक्ति के चित्तत्त्व को प्रच्छन्न कर जो कि भिन्न-भिन्न रूपों से देह, बुद्धि एवं प्राण आदि में गगन के सदृश आरोपित हो जाते हैं । इस प्रकार प्रमातृरूप से अहं अन्य प्रतियोगी के अवभास से उत्पन्न हुआ विकल्प ही माना जायेगा । अहं विमर्श शुद्ध एवं अशुद्ध के भेद से दो प्रकार के होते हैं शुद्ध सच्चिदानन्द परम शिव में यह सारा का सारा विश्व अभिन्नरूप से प्रतिबिम्बित होकर झलकता है और उसमें तो कुछ भी दूर करने योग्य होता ही नहीं है । इस प्रकार घटादि का कोई प्रतियोगी न होने से कोई अपोह्य का विषय भी नहीं बनता है । किन्तु अशुद्ध प्रमाताओं में ऐसी बात नहीं है अपने स्वरूप को अप्रधान बना करके अपने से भिन्न देह-गेहादि में मिथ्या अभिमान कर लेता है इसलिए विकल्पकरूपता बन जाती है और इसी का नाम विकल्प है । परमार्थतः देह, बुद्धि, प्राण आदिकों की अभिमानदशा में भी प्रकाश स्वरूप परमेश्वर ही प्रमाता है और वही परमेश्वर ही सब का जीवन तत्त्व है । स्मृति, अपोहन प्रधान विकल्प, अनुभव और आन्तर पदार्थों का ही आभास प्रकाशरूप से रहता है, परमात्मा तो सब कुछ सहनेवाला होता है इसलिए उसमें विश्व की अन्तर्लीनता सदैव बनी रहती है । 'निष्प्रपञ्चो निराभासः शुद्धः स्वात्मान्यवस्थितः । सर्वातीतः शिवो ज्ञेयो यं विदित्वा विमुच्यते ।।' अर्थात् अपने आप में परिपूर्ण रहनेवाला शुद्ध, निराभास, निष्प्रपञ्च सब से अतीत शिव स्वरूप को जान करके साधक मुक्त हो जाता है । इस प्रकार व्यवहार दशा में भी परमेश्वर देहादि में प्रवेश कर अन्तःस्थित पदार्थ समूह को अपनी स्वातन्त्र्य-शक्ति से बाहर की ओर अभिव्यक्त करते हैं । कीट-पतङ्ग आदि सम्पूर्ण प्रमाताओं में अवभासनरूप ज्ञान-शक्ति और उल्लेखनरूप क्रिया-शक्ति नैसर्गिक रहती है ।

[ १५ ] एकाश्रय एवं माहैश्वर्य का निरूपण समस्त शक्तिरूपी पदार्थ-रत्नों का एकमात्र आश्रय महेश्वर ही है। इस नाम-रूपात्मक विश्व महेश्वर की शक्ति से ही अवस्थित है शक्तिमान् से शक्ति किसी अन्य जगह नहीं रहती परन्तु उसी में तद्रूप होकर रहती है जैसा कि हिम से भिन्न शीतलता नहीं रहती एवं वह्नि से भिन्न उष्णता नहीं रहती है। 'शिवः शक्तस्तथा भावनिच्छया कर्तुमीहते । शक्त्योऽस्य जगत् कृत्स्नम्।' शक्ति शक्तिमान् से भिन्न नहीं होती है। 'या चैषा प्रतिभा तत्तत्पदार्थक्रयरूषिता । अक्रमानन्तचिद्रूपः प्रमाता स महेश्वरः ॥' तत्-तत् वस्तु-पदार्थों में क्रमशः यह जो घटादि की प्रतिभा अनुरञ्जित हो रही है। अनन्त-शक्ति सम्पन्न, अक्रमरूप, सच्चिदानन्द महेश्वर ही प्रमातृरूप से उन सभी में रहते हैं। इस विषय में कठश्रुति का भी कथन है कि—'न तत्र सूर्यो भाति न चन्द्रतारकं नेमा विद्युतो भान्ति कुतोऽयमग्निः । तमेव भान्तमनुभाति सर्वं तस्य भासा सर्वमिदं विभाति ॥' अर्थात् उस परम ब्रह्म परमात्मा को सूर्य, चन्द्र एवं नक्षत्रगण भी प्रकाशित नहीं कर सकते हैं तो फिर यह अग्नि कैसे उसे प्रकाशित कर सकेगी ? उसी के प्रकाश से यह सब प्रकाशित है। जीव एवं शिव की एकरूपता के बिना संविद्रूप ज्ञानों का लोकोत्तर व्यवहार सिद्ध नहीं हो सकेगा; क्योंकि संविद्रूप प्रकाश की एकरूपता से ही ज्ञानों में एकरूपता बन सकती है और वह एकमात्र परमार्थ- स्वरूप प्रमाता से ही संभव है। क्रिया-शक्ति का प्राधान्य सच्चिदानन्द स्वरूप परम शिव को क्रिया-शक्ति अत्यन्त प्रिय है अपनी ज्ञान-शक्ति के द्वारा यह क्रीडा-क्षेत्ररूप जगत् विविध भावभङ्गी से युक्त होकर क्रिया-शक्ति से देशरूप एवं कालरूप से बाहर की ओर फैलता है। संविद्रूप परम शिव में क्रिया-शक्ति अक्रमपूर्वक रहती है और जीवों में क्रिया-शक्ति क्रम से युक्त होकर रहती है। क्रम से युक्त होकर भासित होने का नाम ही क्रिया है वह काल आदि परिच्छेद से रहित परमेश्वर में कैसे क्रम से युक्त होकर रहेगी ? अक्रम स्वभाववाले परमेश्वर में क्रमशील क्रिया का होना घटना नहीं है। यह बात नहीं है, काल-शक्ति से लौकिक क्रिया में क्रमरूपता तो संभव है। निरन्तर निर्वाध्य- रूप से होनेवाले परमेश्वर की क्रिया में क्रमरूपता नहीं होती है। जैसा कि परमेश्वर में क्रमरूपता अभाव मिलता है अर्थात् लौकिक क्रिया की सक्रमरूपता काल-शक्ति के आभास विच्छेदन सामर्थ्य का प्रदर्शन ही प्रभु की शक्ति से होता है। किन्तु परमेश्वर से तादात्म्य रखनेवाली अभेदात्मिका क्रिया-शक्ति को काल का स्पर्श भी नहीं होता है जिस प्रकार परमेश्वर में क्रमरूपता नहीं बन सकती है। उसी प्रकार परमेश्वर की क्रिया में भी क्रमरूपता नहीं होती है; क्योंकि वह तो उन्हीं की जैसी शाश्वत् रहती है। कालक्रम एवं देशक्रम का विवेचन तब फिर काल किस को कहा जाय ? जगत् के पदार्थों की उत्पत्ति, आम्रमञ्जरी को होना एवं क्रमशः षड् ऋतुओं का आगमन तथा मयूर एवं कोकिलों के मद-विलासादि होने से जो ज्ञान होता है वही काल है अर्थात् सूर्य, चन्द्र, नक्षत्रादिकों का क्रमशः गतिशील रहना ही काल कहलाता है। 'काल एव क्रमः, क्रम एव कालः ।' अर्थात् काल ही क्रम है एवं क्रम ही काल है। नैयायिकों का काल पदार्थ यह है कि 'जन्यानां जनकः कालो जगतामाश्रयो मतः' सम्पूर्ण उत्पत्ति-शील पदार्थों का जनक काल है

और जगत् के पदार्थों का आश्रय माना गया है । इस प्रकार पामर प्राणियों का काल मृत्यु है और ज्ञानियों का काल उससे एक विलक्षण ही है । इस प्रकार आभास-पदार्थों को स्व-स्वरूप से बाहर की ओर फैलनेवाली जो परमेश्वर की शक्ति है वही काल-शक्ति है । परमेश्वर मूर्ति के रूप से देशक्रम को एवं क्रिया की विचित्र- रूपता के आभास से कालक्रम को प्रकाशित करते हैं । जो आभास का विषय देश एवं काल का क्रम है वह किसी अन्य से भासित होनेवाला प्रमाता नहीं है; क्योंकि इसी से सब कुछ वस्तुएँ आभासित होती हैं इस प्रकार देशक्रम और कालक्रम प्रमाता में कैसे रहेंगे ? अभी मैं इस स्थान विशेष में हूँ यह देशक्रम है और भूत-भविष्यादि को लेकर कालक्रम प्रमाता में दीख पड़ता है, परमेश्वर तो स्वयं देश एवं काल क्रम से शून्य है, आभासों के भेद से कालक्रम भासता है और जो विच्छिन्नाभास है वह स्वयं शून्यादि प्रमाता के बिना आभासित नहीं हो सकता है, परिमित प्रमाताओं के द्वारा ही पदार्थों का भासन होता है, संविद्रूप आत्मस्वभाव से स्वयं अपने में परिपूर्ण है विद्वान् परमेश्वर की निर्माण-शक्ति से ज्ञाता, ज्ञान और ज्ञेय का भेद प्रकाशित होता है । प्रत्यभिज्ञादर्शन का तत्त्वक्रम सच्चिदानन्द परम शिव के गर्भ में ‘मयूराण्डवत्’ सदाशिव से लेकर पृथिवी पर्यन्त पदार्थतत्त्व झलकते हैं । प्रत्यभिज्ञादर्शन में छत्तीस तत्त्व संग्रहीत हैं इनके नाम निम्न प्रकार से हैं— १. शिव, २. शक्ति, ३. सदाशिव, ४. ईश्वर, ५. शुद्धविद्या, ६. माया, ७. कला, ८. विद्या, ९. राग, १०. नियति, ११. काल, १२. पुरुष, १३. प्रकृति, १४. बुद्धि, १५. अहङ्कार, १६. मन, १७. श्रोत्र, १८. त्वक्, १९. चक्षु, २०. रसना, २१. घ्राण, २२. वाक्, २३. पाणि, २४. पाद, २५. पायु, २६. उपस्थ, २७. शब्द, २८. स्पर्श, २९. रूप, ३०. रस, ३१. गन्ध, ३२. आकाश, ३३. वायु, ३४. तेज, ३५. जल, ३६. पृथिवी । ‘ईश्वरो बहिरुन्मेषो निमेषोऽन्तः सदाशिवः’ । परम शिव तत्त्व एक होता हुआ भी भिन्न-भिन्न विशेषताओं के लिए हुए अपनी स्वातन्त्र्य-शक्ति से अनेक रूपों में विभक्त हो जाता है विश्व को बाहर की ओर स्फुटरूप से अभिव्यक्त करना ही उन्मेष है जिसमें इदमंश अर्थात् ईश्वरतत्त्व की प्रधानता रहती है । अस्फुटरूप से अन्तःकरण में सपेट लेने का नाम निमेष है और निमेष ही सदाशिवतत्त्व है जिससे जगत् का प्रलय भी होता है और अहम् अंश की प्रधानता रहती है । अहम् एवं इदम् इन दोनों बुद्धियों का सामाना- धिकरण्य विद्यातत्त्व में रहता है । किसी अन्य की ओर उन्मुखता न रखनेवाला ‘अहम्’ विमर्श है और इदम् अंश को परप्रकाश की अपेक्षा रहती है । इदम् अंश के विमर्श से उपपन्न वेद्य अवस्था को अङ्गीकार किये हुए परापश्यमान पदार्थों को ठीक-ठीक समझ लेना ही शुद्ध विद्या है । परमेश्वर के स्वातन्त्र्य से उपजीवित होनेवाली विद्येश्वर-शक्ति शुद्धविद्या है । जिसमें ‘अहम्’ और ‘इदम्’ इन दोनों अंशों का ज्ञान पृथक्-पृथक्, रहता है । जबकि भेद का प्रारम्भ तो यहाँ से हो होता है फिर भी भेद के भीतर अभेद बना रहता है इसमें क्रिया की प्रधानता रहती है ‘मन्त्र’ इस तत्त्व का प्रमाता माना जाता है इसका विमर्श ‘इदं च अहम् च’ इस रूप से होता है विश्व भिन्न रूप से भासता है परन्तु सर्वथा नहीं, इसलिए यह शुद्धविद्या है विद्यातत्त्व में अवस्थित रहने के कारण विद्येश्वरों को ईश्वर, सर्वज्ञ भी कहा जाता है । त्रिविधमल का विवेचन और उपसंहार माया से विमोहित होकर जीव कर्मबन्धन में बद्ध हो जाता है और विद्या से विमुक्त हो जाता है; क्योंकि जीव कालादि पञ्चकञ्चुकों से आवेष्टित होकर शून्य, प्राणादि संकुचितरूप में संसरण करता है इसलिए संसारी

[ १७ ] पशु हो जाता है। यही पशु जीव आणव, कार्म और मायीय इन मलों से युक्त रहता है। ज्ञान स्वरूप को छिपानेवाला आणवमल है जिस में जीव अणुमात्र अर्थात् संकुचितरूप को प्राप्त हो जाता है। जन्म और भोग को देनेवाला मायीयमल है और माया-शक्ति द्वारा कर्ता की अज्ञानता में कार्यमल रहता है। शून्यादि प्रमा- ताओं को प्रलयाकल से पुकारा है इनमें कार्यमल तो रहता ही है किन्तु मायीय विकल्प से रहता है। विज्ञेश्वर लोग वेद्य को भिन्न रूप से देखते है जैसे तन्तुवाय वस्त्र की दृष्टि से अत्यन्त भिन्न ही उसे देखता है इसलिए विज्ञेश्वरों में मायामल का सम्बन्ध माना जाता है। इस प्रकार पशु जीव और देव त्रिविधमल से युक्त होते हैं। संसार के लिए एक मात्र कारण कार्यमल को माना गया है। इस प्रकार यह छत्तीस तत्त्व से युक्त विश्व भगवान् सच्चिदानन्द देव की प्राणादि शक्तियों के रूप में स्थित है। भगवान् परम शिव प्राण-अपान, समान, उदान और व्यानरूप से सम्पूर्ण पशु जीवों में उल्लासपूर्वक प्रवेश करने के कारण प्रलयाकल, विज्ञानाकल आदि विविध रूपों में विभक्त हो जाते हैं। ‘स्वात्मैव सर्वजन्तूनामेक एव महेश्वरः ।’ सम्पूर्ण जड-जङ्गम प्राणियों का आत्मा महेश्वर ही है और वह गगनवत् व्याप्त है। यह सारा का सारा वैभव मेरा ही है इस प्रकार जाननेवाले का विमर्श दृढ़ हो जाने पर जीवन्मुक्त हो जाता है। अर्वाचीन युग के महर्षि श्री गोपालशास्त्री दर्शनकेशरी के आशीर्वाद से इस ग्रन्थ को नया रूप प्राप्त हुआ है एवं यह कार्य पूर्ण हुआ है। साहित्यवेदान्ताचार्य श्रीवंशपति द्विवेदी एम. ए., एवं डॉ० श्री चन्द्रकान्त द्विवेदी के हार्दिक प्रोत्साहन से मेरा मनोबल सदैव बढा है। भारतीय संस्कृत- संस्कृति में उत्कृष्ट श्रद्धा-भावना रखनेवाले मफतलालग्रुप एवं हमारे सेवक-मण्डल ने इस ग्रन्थ के प्रकाशन के लिए धनराशि व्यय की है। स्वच्छ मुद्रणकार्य के लिए प्रेस के अध्यक्ष श्री पं० विश्वम्भरनाथ द्विवेदी को धन्यवाद । भगवान् परम शिव इन लोगों का कल्याण करें । कृष्णानन्दसागर.

इस पृष्ठ पर कोई पठनीय पाठ (पाठ्य सामग्री) उपलब्ध नहीं है (यह पृष्ठ रिक्त है)।

ॐ नमः सच्चिदानन्दाय अथ ईश्वरप्रत्यभिज्ञा महामाहेश्वराचार्यवर्यश्रीमदुत्पलदेवाचार्यविरचिता श्रीमदभिनवगुप्ताचार्यवर्यविरचित- विमर्शिनी- व्याख्यासंवलिता अथ प्रथमः ज्ञानाधिकारः अथ प्रथमे ज्ञानाधिकारे उपोद्घाताख्यं प्रथममाह्निकम् निराशंसात्पूर्णादहमिति पुरा भासयति यद्- द्विशाखामाशास्ते तदनु च विभङ्क्तुं निजकलाम् । स्वरूपादुन्मेषप्रसरणनिमेषस्थिति Call/जुषस्- तदद्वैतं वन्दे परमशिवशक्त्यात्मनिखिलम् ॥ १ ॥ सर्वदर्शनाचार्य-श्रीकृष्णानन्दसागर-विरचिता हिन्दी-व्याख्या शिवरञ्जनी सृष्टि के पूर्व 'अहम्' परमशिव परिपूर्णरूप होने के कारण किसी भी प्रकार की आकांक्षा से रहित होकर भासता रहा है; और उसके बाद में अपनी स्वातन्त्र्यशक्ति को विभक्त करने के लिए दो शाखाओं [ 'अहमिदम्' सदाशिव-ईश्वर ] को जो अव्यक्तरूप में रही उसे व्यक्त करने की इच्छा की। अपने चिन्मय स्वरूप से उन्मेष-फैलाव और निमेष-स्थिति से युक्त; उस परमशिवशक्तिरूप अखिल अद्वैत की हमलोग वन्दना करते हैं ॥ १ ॥ १. शुद्ध चिन्मय स्वभाव वाले परमशिव ही परिपूर्ण अपने स्वरूप में रहे; इसीलिए किसी भी तरह की इच्छा न रखते हुए अपनी स्वातन्त्र्य शक्ति की महिमा से एवं परमानन्द चमत्कार के तारतम्य से बाहर की ओर उल्लसित होने की इच्छा की; जो कि सृष्टि के आदि में 'अहम्' इस परामर्शरूप से विस्फुरित

२ ] ईश्वर्प्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-१, का.-१ श्रीत्रैयम्बकसद्वंशमध्यमुक्तामयस्थितेः । श्रीसोमानन्दनाथस्य विज्ञानप्रतिबिम्बकम् ॥ २ ॥ अनुत्तरानन्यसाक्षिपुमर्थोपायमभ्यधात् । ईश्वरप्रत्यभिज्ञाख्यं यः शास्त्रं यत्सुनिर्मलम् ॥ ३ ॥ श्री त्र्यम्बक के विशिष्ठगुणों वाले वंश के मध्य में रखे गये मुक्तामणि के सदृश श्रीसोमानन्द- पाद विराजमान रहें ॥ २ ॥ अनुत्तर, स्वसंवित्, अनन्यसाक्षी एवं मोक्ष का उपाय दिखाने वाला जो अत्यन्त निर्मल शैव आगम रहस्य ‘शिवदृष्टिाशास्त्र’ है उसे आचार्य उत्पलदेव ने ‘ईश्वरप्रत्यभिज्ञा’ के रूप में विरचित किया है ॥ ३ ॥ होते रहे और उसके बाद ‘अहम्’ और ‘इदम्’ परामर्शरूप इन दो शाखाओं को भासित किया। एवं शुद्ध चिन्मय के अधिकरण ‘अहम्’ अंश में ही जब परमेश्वर ‘इदम्’ अंश को उल्लसित करते हैं, तब तो उसका पदार्थों में खींचे गये चित्र के तुल्य ही मात्र अस्फुट स्वरूप रहता है इसी कारण सदाशिव तत्त्व कहलाता है। जो कि उसमें इच्छा विशेष रखते हैं, ‘अहमिदम्’ सदाशिव ईश्वर के पदार्थवर्ग में स्फुटित होने पर उसी के ही अधिकरण ‘इदम्’ भाग में ‘अहम्’ भाग को सींचता है, तब फिर उसमें उस समय ज्ञानशक्ति की प्रधानता रहती है इसी को ‘इदमहम्’ ईश्वर तत्त्व कहा जाता है, इसीलिए अहं विमर्श की विशेषता न रहने पर भी ‘इदमहम्’ में ‘इदम्’ भाग की स्फुट और अस्फुट रूप से भी प्रधानता रहती है। जब फिर पदार्थों में बढ़े हुए भेद-भाव वाले ‘इदम्’ अंश की स्फुरण अवस्था में शुद्धचिन्मात्र का उसमें चले जाने पर ‘अहम्’ अंश उल्लासित होता है, तब तो फिर द्वैतवादियों के ईश्वर के समान ‘समधृत तुला’ न्याय से शुद्ध विद्या तत्त्व में ‘अहम्’ और ‘इदम्’ ये दोनों परामर्श समान होते हैं, जैसे तुला के दोनों पलड़े। जिस अभेद ज्ञान की भूमिका में समान स्फुट रूप से ‘अहम् और इदम्’ रूप प्रकाश में अंशों का जो प्रत्यवमर्श होता है उसका नाम ही शुद्ध विद्या है। इस दशा में क्रिया- शक्ति की प्रधानता रहती है। मंत्र और विद्येश्वर इसके प्रमाता है। ‘अहम्’ ऐसा ही परामर्श होगा; जिसमें क्रिया शक्ति की प्रधानता रहती है—इसलिए इसे विद्या तत्त्व कहा जाता है। यद्यपि परमशिव का ही यह सारा ऐश्वर्य है तो भी उसका ही यह सारा का सारा स्वरूप बाहर की ओर जिस तरह से दिखायी देता है वही शक्तितत्त्व का व्यापार है। उसी प्रकार सदाशिव और ईश्वर में भी विद्यातत्त्व रहता है। इस प्रकार किसी भी प्रकार की आकांक्षा न रखते हुए अहन्ता-इदन्ता के प्रतिभास न रहने पर भी बाहर की ओर सृष्टि शक्ति के उन्मेष और निमेष रूप अवस्था के तारतम्य से उद्भासनरूप चमत्कार करने वाले और वहाँ पर अपने अन्तर्गत जो शक्तिभाग है उसका शिवभाग से पृथक् भासन करना ही प्रसरण कहलाता है जिसका शिव आदि से लेकर पृथिवी तत्त्व तक संचार होता रहता है और अपने अन्तर भाग में मिला देने से निमेष स्थिति कहलाती है। एवं चिदानन्दमय अपने स्वरूप से अभिन्नरूप होने के कारण पूर्ण अहन्ता के उद्भासन करने में स्वातन्त्र्य शक्ति रूप अपनी कला को भासित करने के लिए सदाशिव और ईश्वर इन दोनों स्वरूपों की इच्छा प्रकट की। अर्थात् अपनी स्वातन्त्र्य शक्ति से ही यह सारा-का-सारा विश्व बिना किसी सामग्री