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काल मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - काल-तत्त्व, मुहूर्त एवं युगाब्द दार्शनिक मीमांसा)

Kaal Mimansa of Dharma Samrat Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished115 पृष्ठ

( ३ ) और द्विगुणित निष्ठा से वह पहले का लिखा हुआ अंश पुनः बड़े परिश्रम से तैयार किया है । इस प्रस्तुत निबन्ध में रामायण-महाभारत काल गणना के साथ-साथ कुछ अंश बढ़ा है जो कि विचारकों के लिये तथा जिज्ञासुओं के लिये परम उपयोगी होगा । विषय-सूची खण्ड दो में वह सारा विषय दिया हुआ है । प्रोफेसर ग. वा. कवीश्वरजी ने अपनी पुस्तक 'महाभारत युद्ध के काल गणनात्मक रहस्य ) में युद्ध काल में अवकाश मान कर महाभारत के वचनों के आधार पर तिथियों और नक्षत्रों का तालमेल मिलाने का प्रशंसनीय प्रयास किया है । उसकी समालोचना करके वस्तुतः महाभारत के अन्तःसाक्ष्य के आधार पर जो तिथियाँ गीता जयन्ती, युद्धकाल एवं भीष्म निर्वाण की ठहरती हैं, वह अन्तिम लेख परिशिष्ट में दी हुई है । इस लघु कलेवर पुस्तक में विचार सम्पूर्ण पूज्यपाद गुरुदेव श्री स्वामी करपात्रीजी महाराज के हैं । हम लोगों ने उसी विचार को लेखनी द्वारा उपनिबद्ध किया है । यह सारा ही ग्रन्थ पूज्यपाद गुरुदेव का ही है और इसे उन्होंने अक्षरणक्षरण अकारणकरण करुणावरुणालय कर्तुमकर्तुमन्यथाकर्तुं समर्थ रामकृष्णेश्वर भगवान् के चरणों में अर्पित कर दिया है, जिनकी स्थापना इसी संवत् २०३५ में दशहरा के दिन वेद शास्त्रानुसन्धान भवन में हुई है । श्रीकृष्ण जन्माष्टमी संवत् २०३५ मार्कण्डेय ब्रह्मचारी धर्मसङ्घ, दुर्गाकुण्ड, वाराणसी ५ स्मरीतिर्महातेजाः परब्रह्म सनातनः। जयताज्जानकीनाथो वेदवेद्यो महामतिः॥ ankurnagpal108@gmail.com

॥ श्रीहरिः ॥ श्रीरामायण-महाभारत काल-मीमांसा ( खण्ड १ ) कुछ पाश्चात्त्य विद्वान् और उनके अनुयायी कतिपय भारतीय विद्वान् भी महाभारत के पात्र युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन आदि को ऐतिहासिक पुरुष न मानकर काल्पनिक मानते हैं । एवं महाभारत के युद्ध को प्रत्येक पुरुष के मन में उठनेवाली दैवी-आसुरी वृत्तियों का युद्ध अथवा धर्म-अधर्म का युद्ध मानते हैं । इससे वे यह कहना चाहते हैं कि महाभारत कोई इतिहास नहीं है । किन्तु ऐसा मानने में उन लोगों के पास कोई प्रमाण नहीं है । हम आगे उन्हीं प्रमाणों का सङ्कलन करने जा रहे हैं जो उनकी ऐतिहासिकता के पोषक हैं । ऐतिहासिकता के पोषक प्रमाण— प्रतिदिन प्रातः स्मरण में उन लोगों का स्मरण ही यह बतलाता है कि वे ऐतिहासिक हैं । धर्मो विवर्धति युधिष्ठिरकीर्तनेन । पापं प्रणश्यति वृकोदरकीर्तनेन ॥ शत्रुर्विनश्यति धनञ्जयकीर्तनेन । माद्रीसुतौ कथयतां न भवन्ति रोगाः ॥' [

( २ ) महाराज युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ से ही माघ कवि ने अपना शिशुपालवध काव्य लिखा है । संवत् ९७७ के इस ग्रन्थ के टीकाकार वल्लभदेव महाभारत ग्रन्थ को सवा लाख श्लोकों का मानते हैं। वे शिशुपालवध के २।३८ की टीका में लिखते हैं 'सपादलक्षं श्री महाभारतम् ।' सवा लाख श्लोकों वाला महाभारत वाविला प्रेस मद्रास-१ से भी छप चुका है । संवत् ९५७ के राजशेखर भी अपनी काव्यमीमांसा (अ० ३) में महाभारत को शतसाहस्रीसंहिता कहते हैं । विक्रम की आठवीं शताब्दी के आचार्य आनन्दवर्धन अपने ध्वन्यालोक में महाभारत के शान्तिपर्व के १५२ अध्याय के गृध्रगोमायुसंवाद का उल्लेख करते हैं। वे महाभारत के आदि पर्व के पहले अध्याय (अनुक्रमणी) को एवं हरिवंश को भी महाभारत का अंश मानते हैं— 'ननु महाभारते यावानपि विवक्षाविषयः सोऽनुक्रमण्यां सर्व एवानुकान्तः.... महाभारतावसाने हरिवंशवर्णनेन समाप्ति विदधता तेनैव कविबेधसा कृष्णद्वैपायनेन सम्यक् स्फुटीकृतः' (ध्वन्यालोक ४ उद्योत कारिका ५) । संवत् ६८७ के वल्लभी निवासी ऋग्वेदभाष्यकार आचार्य स्कन्दस्वामी अपने भाष्य में महाभारत के अनेक आख्यानों का निर्देश करते हैं— 'भारते तु ऋषयः शापात् सरस्वतीं मोचयामासुरित्याख्यानम्' (ऋ० सं० १।११२।९) यह आख्यान शल्य पर्व के ४४ वें अध्याय में है । सप्तम शताब्दी में विद्यमान आचार्य दण्डी कवि अपनी अवन्तिसुन्दरी में महाभारत एवं उसके रचयिता महर्षि वेदव्यास का स्मरण करते हैं— 'मर्त्ययत्नेषु चैतन्यं महाभारतविद्यया । अर्पयामास तत्पूर्वं यस्तस्मै मुनये नमः ॥' (मङ्गलाचरण श्लोक ३) दण्डी से पूर्वभावी बाण अपने प्रसिद्ध ग्रन्थ कादम्बरी एवं हर्षचरित में महाभारत की कथाओं का अनेक प्रकार स्मरण करते हैं ।

( ३ ) 'पार्थरथपताकेव वानराक्रान्ता, विराटनगरीव कीचकशतावृता (पृष्ठ ६७) 'भीष्ममिव शिखण्डिशत्रुम्,. पराशरमिव योजनगन्धानुसारिणम् (पृष्ठ १०७ तथा पृष्ठ १०८) 'महाभारते शकुनिवधः, (पृष्ठ १४३) महाभारत-पुराण- रामायणानुरागिणा, (पृष्ठ १७९) 'आस्तीकतनुरिवानन्दितभुजङ्गलोका, (पृ० १८८) 'महाभारते दुःशासनापराधाकर्णनम्, (पृ० १९९) 'महाभारत- पुराणेतिहासरामायणेषु (पृ० २६३) महाभारतमिवानन्तगीताकर्णनानन्दितनरं (पृ० ३१४) (इत्यादि कादम्बरी पूर्वभागे-हरिदास कृत कालिकाता संस्करणे शाके १८५७) । एवमेव 'एकाकी तपस्वी वनमृगैः सह संवर्धितः.........समग्रमुद्यतमेक- विंशतिकृत्वः कृत्तवंशमुत्खातवान् राजन्यकं रामः' (षष्ठ उच्छ्वास पृ० २९१) 'हिडिम्बामुखचुम्बनास्वादितमिव रिपुरुधिरामृतमपायि पवनात्मजेन (षष्ठ उच्छ्वास पृ० २९२) 'जामदग्न्येन च शाम्यन्मन्युशिखिशिखासञ्ज्वरसुखाय- मानस्पर्शशीतलेषु क्षत्रियक्षतजमहाह्रदेषु अस्नायि' (षष्ठ उच्छ्वास पृ० २९२) । 'नमः सर्वविदे तस्मै व्यासाय कविवेधसे । चक्रे पुण्यं सरस्वत्या यो वर्षमिव भारतम् ॥' ४ 'किं कवेस्तस्य काव्येन सर्ववृत्तान्तगामिना । कथेव भारतो यस्य न व्याप्नोति जगत्त्रयम् ॥' १० 'कवीनामगलद्दर्पं नूनं वासवदत्तया । शक्त्येव पाण्डुपुत्राणां गतया कर्णगोचरम् ॥' १२ इति हर्षचरित उपोद्घाते । प्रायः बाण के समकालिक जयादित्य और वामन द्रोणपर्वत० सूत्र में महा- भारत के द्रोण का स्मरण करते हैं । 'द्रोणपर्वतजीवन्तादन्यतरस्याम्' (पा० सू० ४।१।१०३) इतिसूत्रे 'नैवात्र महाभारतद्रोणो गृह्यते' यह लिखा है । काशिकायां 'ईदूद्वेद्विवचनं प्रगृह्यम्' (पा० सू० १।१।११) सूत्र पर महाभारत शान्तिपर्व का 'मणीवोष्ट्रस्य लम्बेते प्रियो वत्सतरौ मम ।' (१७७।१२) श्लोक उद्धृत है । इनसे भी प्राचीन मीमांसाशास्त्र व्याख्याता भट्टपाद कुमारिल अपने...

औत्पत्तिकसूत्र के वार्तिक में लिखते हैं—'प्रसिद्धो हि तथा चाह पाराशर्योऽत्र वस्तुनि । इदं पुण्यमिदं पापमित्येतस्मिन् पदद्वये ।'......' धर्म और अधर्म दोनों ही प्रसिद्ध हैं । यह बात पराशरपुत्र व्यास ने महाभारत में कही है । इनके समकालिक बौद्ध विद्वान् धर्मकीर्ति अपने प्रमाण वार्तिक में 'भारता- दिष्वपि इदानीन्तनानामशक्तावपि कस्यचित् शक्तिसिद्धेः ।' ( प्रमाणवार्तिक पृ० ४४७-४४८ ) महाभारत का स्मरण करता है । इनसे पूर्ववर्ती वाक्यपदीयकार प्रथमकाण्ड श्लोक १४२ में 'गौरिव प्रक्षरत्येका' महाभारत का यह श्लोक इतिहास नाम से उद्धृत कर रहे हैं । इनसे प्राचीन कविकुल गुरु कालिदास जिनके सम्बन्ध में नवभारत टाइम्स ९ जुलाई, १९७६ अपने दैनिक पत्र में लिखता है कि 'उज्जैन के प्रसिद्ध पुरातत्त्ववेत्ता डा० वी० एस० वाकांकर ने बतलाया कि उज्जैन के प्राचीन भाग में गढ़कालिका के निकट मिली ईसापूर्व शताब्दी की मुहर से महाराज विक्रमादित्य के सही काल का पता लगता है । इस मुहर पर स्वस्तिक चिह्न के साथ ईसापूर्व प्रथम शताब्दी की ब्राह्मी लिपि में उज्जैन के राजा कीर्ति का नाम खुदा हुआ है । विक्रम संवत् को पहले कीर्ति संवत् कहा जाता था । ईसा- पूर्व प्रथम शताब्दी में पश्चिमी क्षत्रिय शासकों ने उज्जैन पर आक्रमण किया और युद्ध में उनकी हार होने के बाद विजयस्मृति के रूप में कीर्ति संवत् प्रारम्भ हुआ । वहीं एक मिट्टी की मूर्ति में शेर के दाँत गिनते हुए भरत की आकृति बनी है । यह मूर्ति ईसा बाद पहली शताब्दी की है । यह प्रसङ्ग महाकवि कालिदास ने अभिज्ञान शाकुन्तल में वर्णन किया है । यह मुहर और मूर्ति प्रथम ऐतिहासिक प्रमाण है जिनसे महाराज विक्रमादित्य तथा कालिदास का समय ईसापूर्व प्रथम शताब्दी और ईसा बाद प्रथम शताब्दी के बीच नियत करने में सहायता मिलती है । अपने मेघदूत में भी कालिदास— 'क्षेत्रं क्षत्रप्रधनपिशुनं कौरवं तद्भजेथाः' क्षत्रियों के विनाश की सूचना देनेवाले कुरुक्षेत्र में जाना । इससे कौरव पाण्डवों का युद्ध स्मरण कर रहे हैं ।

( ५ ) संवत् १९१ से संवत् २१४ पर्यन्त महाराज सर्वनाथ का शासन था । उनका शिलालेख मिला है जिसमें 'एक लाख श्लोकों वाला महाभारत परा- शरसुत व्यास ने बनाया' लिखा हुआ है । उक्तं च महाभारते—शतसाहस्र्यां संहितायां परमर्षिणा पराशरसुतेन व्यासेन ।' अब ईसवी सन् से पहले के वचन सङ्कलित किये जा रहे हैं— वासवदत्ता में उद्धृत न्यायवार्तिककार उद्योतकर ( ४।१।२१ ) गौतम सूत्र में महाभारत वन पर्व का श्लोक उद्धृत करते हैं :— 'अज्ञो जन्तुरनीशोऽयमात्मनः सुखदुःखयोः । ईश्वरप्रेरितो गच्छेत् स्वर्गं नरकमेव वा ॥' ( वनपर्व ३०।२८ ), यह जीव अज्ञानी है अपने लिए सुख दुःख सम्पादित करने में स्वयं असमर्थ है । ईश्वर की प्रेरणा से ही वह स्वर्ग और नरक जाता है । योगभाष्यकार पतञ्जलि अपने योगभाष्य में :— 'प्रज्ञाप्रासादमारुह्य अशोच्यः शोचतो जनान् । भूमिष्ठानिव शैलस्थः सर्वान् प्राज्ञोऽनुपश्यति ॥ ( यो० सू० १।४७ ) मीमांसाभाष्यकार शबरस्वामी ने अपने मीमांसा भाष्य ( ८।१।१ ) में आदि पर्व का यह श्लोक उद्धृत किया है । 'विस्तीर्य हि महज्जालमृषिः संक्षिप्य चाब्रवीत् । इष्टं हि विदुषां लोके समासव्यासधारणम् ॥ ( आदिपर्व १।५१ ) ऋषियों ने विस्तार और संक्षेप में दोनों प्रकार से वर्णन किया है क्योंकि विद्वानों को दोनों ही पद्धति प्रिय है । 'एष चाख्यानसमयः' ( नि० ७।७ ) की व्याख्या में दुर्गाचार्य लिखते हैं—'भारते आख्यानसमयः' अर्थात् महा- भारत में यही सिद्धान्त (आख्यान की परिपाटी) स्वीकार किया गया है । (अर्थात् पुरुष रूप वाले देवता का सिद्धान्त माना गया है ) पृथ्वी ने अपना भार हल्का

( ६ ) करने के लिये स्त्री रूप धारण कर ब्रह्मा से प्रार्थना की ( महाभारत आदि पर्व ६४ ) । अग्नि ने ब्राह्मण रूप धारण कर वासुदेव ( भगवान् श्री कृष्ण ) और अर्जुन दोनों से खाण्डव बन जलाने के लिये याचना की । ( म० भा० आ० प० २२४-२२५ ) पुरुष रूप से ( म० भा० आ० प० २३० ) तथा अग्नि रूप से ( म० भा० आ० प० २२७ ) खाण्डव वन को जलाया; इत्यादि स्थलों में मिलता है । स्वयं महाभारत की पुष्पिका में 'शतसाहस्र्यां संहितायाम्' सौ हजार वाली संहिता में ऐसा लिखा है । ये सब, महाभारत एक लाख श्लोक का है, इस में प्रबल प्रमाण हैं । मुसलमान इतिहास लेखक अलबेरूनी के अनुसार महाभारत १८ पर्वों का एक लाख श्लोक वाला ग्रन्थ है । दण्डी ने 'भूतभाषामयीं प्राहुरद्भुतार्थां बृहत्कथाम्' से जिस बृहत्कथा का स्मरण किया तथा 'प्राहुः' परोक्षभूत का रूप देकर उनसे बहुत पहले बृहत्कथा की स्थिति बतायी दण्डी से पूर्वभावी भट्ट बाण ने भी कादम्बरी के प्रस्तावनामय मङ्गलाचरण में अतिद्वयी कथा लिख कर ( वासदत्ता और बृहत्कथा ) दो कथाओं की ओर संकेत किया है । उस वृहत्कथा के लेखक गुणाढ्य के समय में महाभारत विद्यमान था । उसमें से उन्होंने रुरुमुनि कथा, सुन्दोपसुन्द कथा, कुन्ती दुर्वासा कथा, पाण्डु द्वारा मुनि वध कथा आदि महा- भारत से ली । इसी लिये बृहत्कथा के अनुवाद स्वरूप कथा सरित्सागर में क्षेमेन्द्रकृत वृहत्कथा मंजरी में भी रुरुमुनि कथा १४।७५ में हे, जो महाभारत आदि पर्व आठवें अध्याय में की हैं । सुन्दोपसुन्द कथा १५।१३५ में है जो आदिपर्व २०१ अध्याय में है । कुन्ती दुर्वासा कथा १६।३६ में हैं जो आदिपर्व ११३।३२ में है । पाण्डु मुनिवध कथा २१।२० में है जो आदिपर्व १०८ अध्याय में है । शकुन्तला की कथा ३२।१०८ में है जो आदिपर्व ६२ अध्याय में है ! महाभारत में ही महाभारत का रचनाकाल देखें तो अन्तरङ्ग परीक्षा से पता चलता है कि —

( ७ ) 'त्रीनग्नीनिव कौरव्व्यान् जनयामास वीर्यवान् । उत्पाद्य धृतराष्ट्रं च पाण्डुं विदुरमेव च ॥ जगाम तपसे धीमान् पुनरेवाश्रमं प्रति । तेषु तातेषु वृद्धेषु गतेषु परमां गतिम् ॥ अब्रवीद् भारतं लोके मानुषेऽस्मिन् महानृषिः । जनमेजयेन पृष्टः सन् ब्राह्मणैश्च सहस्रशः ॥ शशास शिष्यमासीनं वैशम्पायनमन्तिके । स सदस्यैः सहासीनः श्रावयामास भारतम् ॥' ( म० भा० आ० प० ) अर्थात् महर्षि व्यास तीन अग्नियों के समान तेजस्वी कुरुवंशीय धृतराष्ट्र पाण्डु तथा विदुर को उत्पन्न कर तप करने वन में स्थित अपने आश्रम में चले गये । उनके उत्पन्न होने, बढ़ने और परम गति को प्राप्त होने के अनन्तर महर्षि व्यास ने मनुष्य लोक में महाभारत का निरूपण किया । हजारों ब्राह्मणों के साथ जनमेजय के प्रश्न करने पर अपने शिष्य वैशम्पायन को महाभारत सुनाने की आज्ञा दी । वैशम्पायन यज्ञ के सदस्यों के साथ आसीन होकर यज्ञ के मध्य-मध्य के विराम में उनसे प्रेरित होकर महाभारत सुनाया करते थे । इससे स्पष्ट है कि जनमेजय के सर्पयज्ञ समाप्ति के पूर्व और धृतराष्ट्र पाण्डु एवं विदुर के देहावसान के अनन्तर महाभारत संहिता की रचना हुई । यद्यपि पाण्डु का निधन पहले ही हो चुका था तो भी धृतराष्ट्र को युद्ध के बाद बीसवें वर्ष में परम पद प्राप्त हुआ । १५ वर्ष तक तो धृतराष्ट्र युधिष्ठिर के साथ ही रहे । सोलहवें वर्ष में भीम के वाग्बाण से निर्विण्ण होकर विदुर के साथ वन चले गये । 'ततः पञ्चदशे वर्षे समतीते नराधिपः । राजा निर्वेदमापेदे भीमवाग्बाणपीड़ितः ॥' ( म० भा० आश्रमवासिकपर्व २।१२ ) वहाँ धर्माचरण करते हुए एक वर्ष बीतने पर देवर्षि नारद ने युधिष्ठिर

( ८ ) से कहा था कि धृतराष्ट्र के जीवन के अभी तीन वर्ष शेष हैं । 'तत्राहमिदमश्रौषं शक्रस्य वदतः स्वयम् । वर्षाणि त्रीणि शिष्टानि राज्ञोऽस्य परमायुषः ॥' ( म० भा० आश्रमवासिक पर्व २०।३२ ) । महाभारत का युद्ध कलि और द्वापर की सन्धि में हुआ । 'अन्तरे समनुप्राप्ते कलिद्वापरयोरभूत् । समन्तपञ्चके युद्धं कुरुपाण्डवसेनयोः ॥' ( महाभारत आदिपर्व २।१९ ) अर्थात् द्वापर और कलि के मध्य में कौरव-पाण्डवों का युद्ध हुआ । महा- भारत युद्ध के ३६ वर्ष बीतने पर परीक्षित का राज्याभिषेक हुआ । परीक्षित ने ६० वर्ष तक राज्य किया । महाभारत युद्ध से ९६ वर्ष पर बाल्यकाल में ही जनमेजय का राज्या- भिषेक हुआ । वयस्क होने पर विवाह हुआ । विवाह के कुछ ही दिनों बाद उत्तङ्क की प्रेरणा से जनमेजय ने सर्पसत्र आरम्भ किया । उसी यज्ञ में वैश- म्पायन ने महाभारत सुना था । उसी महाभारत को महर्षि व्यास ने जय नामक महाकाव्य कहा । यह 'जय' ही विविध उपाख्यानों के सहित लिखा हुआ भारतीय युद्ध का विशद् इतिहास है । महाराज युधिष्ठिर के विजय के उपलक्ष्य में लिखे जाने के कारण उनके समय में ही इसका लिखा जाना उचित है । तथा धृतराष्ट्र के समक्ष उनका पराभव लिखना उचित न होता, अतः महाराज धृतराष्ट्र को परमपद प्राप्त होने के अनन्तर महाभारत युद्ध के बीस वर्ष बाद और ३६ वें वर्ष के पहले ही महाभारत संहिता निर्माण का समय है। अहं तु कीर्तिमेतेषां कुरूणां भरतर्षभ । पांडवानां च सर्वेषां प्रथयिष्यामि मा शुचः ॥ ( म० भा० मौ० प० २।१३ )

१. प्रथम खण्ड: काल का स्वरूप, नित्यत्व एवं दार्शनिक लक्षण

( ९ ) इसका निष्कर्ष यह है कि—महाभारत के ही प्रमाण वचनों से सिद्ध होता है कि महाभारत युद्धकाल से बीस वर्ष बाद धृतराष्ट्र का परलोक-वास हुआ था। धृतराष्ट्र के मरने के बाद और जनमेजय के सर्पसत्र के पूर्व महा- भारत की रचना हुई है। जनमेजय का अभिषेक कलि के ६० वर्ष अथवा ९६ वर्ष बीतने पर हुआ। महाभारत आदि पर्व ४९।१७ और सौप्तिक पर्व १६।१५ में लिखा है कि राजा परीक्षित ने ६० वर्षों तक राज्य किया और कलि गताब्द ३६ के बाद उनका शासन आरम्भ हुआ। इसके अनुसार महाराज जनमेजय का अभिषेक काल कलिगताब्द ९६ वर्ष प्रमाणित होता है। आदिपर्व ४९।२६ के अनुसार ६० वर्ष की व्यवस्था में परीक्षित का देहान्त हुआ। परीक्षित का जन्म काल और कलियुग का आरम्भ काल एक ही है। इसके अनुसार जनमेजय का अभिषेक कलि गताब्द ६० में ही प्रमाणित होता है। जिन श्लोकों में ६० वर्षों तक शासन करने की बात कही गयी है उनका अभिप्राय भी ६० वर्षों तक की व्यवस्था से ही समझना चाहिये। जनमेजय का राज्या- भिषेक छोटी ही अवस्था में हुआ था। अतएव अभिषेक के २४ वर्ष बाद सर्प सत्र हुआ था। इससे यह भी प्रमाणित हो जाता है कि महाभारत की रचना कलिगताब्द २० वर्ष के बाद और कलिगताब्द ८४ वर्ष के पूर्व हुई। महाराज युधिष्ठिर कलिगताब्द ३६ में भगवान् श्रीकृष्ण के परम धाम पधारने के पश्चात् दिवंगत हुए थे। यह महाभारत संहिता युधिष्ठिर के विजयोपलक्ष्य में जयेतिहास के रूप में अनेक उपाख्यानों के साथ रची गई थी। अतः उसकी रचना युधिष्ठिर के राजत्व काल और भगवान् कृष्ण के परम धाम पधारने से पहले ही हुई थी। यह स्वाभाविक बात है कि जिस राजा का विजय इतिहास लिखा जाता है, वह प्रायः उसके शासन काल में ही लिखा जाता है। अतएव कलिगताब्द २० वर्ष बाद महाराज धृतराष्ट्र के स्वर्गवास के पश्चात् युधिष्ठिर के शासन काल में ही कलिगताब्द ३६ के पूर्व ही महाभारत की रचना प्रमाणित होती है। महाभारत की रचना तीन वर्षों में पूर्ण हुई थी। श्री गणेश जी ने उसे लिखा था। इस प्रकार महाभारत का रचना काल विक्रम

( १० ) संवत् पूर्व ३०२४ और विक्रम संवत् पूर्व ३००८ के मध्य एवं ई० सन् पूर्व ३०८१ और ई० पूर्व ३०६५ के बीच में ही प्रमाणित होता है, और महर्षि वैशम्पायन ने उसी महाभारत को कलियुगारम्भ से ८४ वें वर्ष विक्रम संवत् पूर्व २९६०, ई० सन् पूर्व ३०१७ में महाराज जनमेजय को सर्पसत्र के अवसर पर सुनाया था। महाभारत युद्ध काल ही कलिप्रारम्भ (कलि संवत्) अथवा युधिष्ठिर संवत् कहा जाता है। ज्योतिष ग्रन्थों, पञ्चाङ्गों में परम्परा से वही संवत् चला है। इसके अतिरिक्त कुछ शिलालेखों में भी इस कलि संवत् का उल्लेख है। इसका आरम्भ ईसवी सन् से ३१०२ वर्ष पूर्व माना जाता है। दक्षिण के चालुक्यवंशी राजा पुलकेशी के समय एहोल की पहाड़ी पर के जैन मन्दिर का शिलालेख भारत युद्ध से ३७३५ वर्ष बीतने पर और शक राजाओं के ५५६ वर्ष बीतने पर बना है। वहाँ के श्लोक हैं— 'त्रिंशत्सु त्रिसहस्रेषु भारतादाहवादितः । सप्ताब्दशतयुक्तेषु गतेष्वब्देषु पञ्चसु ॥ पञ्चाशत्सु कलौ काले षट्सु पञ्चशतीषु च । समासु समतीतासु शकानामपि भूभुजाम् ॥' यह मन्दिर आज से १३४२ वर्ष पहले बना है। ३७३५ में १३४२ मिलाने पर ५०७७ वर्ष होता है। यही सं० २०३३ तथा शाके १८९८ के पञ्चाङ्ग में गतकलि ५०७७ वर्ष लिखा है। पाश्चात्यों के आक्षेप क्रिश्चियन लासेन ने सन् १८३७ में अपनी पुस्तक 'इण्डियन एक्टीविटीज्' में कहा कि—"जिस भारत को सूत ने कहा था वह वास्तव में मूल पुस्तक भारत का द्वितीय संस्करण है। इसीलिए 'आश्वलायन गृह्यसूत्र' में भारत और महाभारत का उल्लेख मिलता है। आश्वलायन का समय ईसवी सन् पूर्व ३५० हो सकता है, इस प्रकार महाभारत का निर्माण काल ईसापूर्व ४६० वर्ष से पहले का नहीं हो सकता।"

( ११ ) बेवर की दृष्टि में पाणिनि के साहित्य से वासुदेव, अर्जुन आदि का उल्लेख होने पर भी भारत या महाभारत का उल्लेख नहीं है; अतः पाणिनि के समय तक महाभारत की रचना नहीं हुई । मेगस्थनीज ने भी भारत महाभारत का उल्लेख नहीं किया, सुतरां पाणिनि पूर्वभावी आश्वलायन के गृह्यसूत्र में भारत, महाभारत का उल्लेख प्रक्षिप्त है । लुडविग ने सन् १८८४ से महाभारत पर विचार प्रारम्भ किया । उनकी राय में न तो महाभारत कोई इतिहास है और न तो पाण्डव ऐतिहासिक पुरुष । पाण्डु का अभिप्राय है पीला सूर्य, धृतराष्ट्र के अन्धेपन का अर्थ है शरत्कालीन सूर्य और गान्धारी की आंखों पर पट्टियां बांधने का अर्थ है सूर्य का बादलों में छिप जाना तथा वसन्त के सूर्य का नाम कृष्ण । होज्यान ने कहा है कि--'पाण्डव और उनके पक्षपाती कृष्ण छली कपटी थे । उन्हीं लोगों की ओर से युद्ध में छल हुआ । कौरवों का नाम वेद और ब्राह्मणों में आता है अतः वे प्राचीन हैं । वे ही धर्मभीरु और न्यायप्रिय हैं । 'किसी ने बौद्ध राजा, सम्भवतः अशोक, की प्रशंसा में एक काव्य लिखा । ब्राह्मणों द्वारा बौद्धधर्म का पराभव होने पर ब्राह्मणों ने उस काव्य में कुछ हेर-फेर कर उसे अपने साँचे में ढाल लिया तथा कौरवों की प्रशंसा पाण्डवों के नाम कर दी और धीरे-धीरे बौद्धधर्म का नाम भी उड़ा दिया ।' मैक्समूलर ने कुछ अंशों में लासेन के मत का अनुसरण किया और उनकी दृष्टि में महाभारत एक कवि की कृति नहीं है । परन्तु उसके सभी रचयिता- गण मनुप्रोक्त धर्म के पक्के अनुयायी ब्राह्मण रहे होंगे । ब्राह्मण सम्प्रदाय में शिक्षा होने पर भी पाँचो भाई एक स्त्री से विवाह कर बैठे । प्रत्यक्ष धर्म विरुद्ध इस घटना पर ब्राह्मण सम्पादकों ने तरह-तरह के रङ्ग चढ़ाये परन्तु यह छिपा न रह सका । बुल्हर के अनुसार महाभारत कोई इतिहास या पुराण नहीं । ब्राडर का कहना है कि ईसा के जन्म से ५०० या ४०० वर्ष पहले जब ब्रह्मा सर्वप्रधान देवता माने जाते थे, उस समय आदि कवि ने कुरुभूमि में जन्म

( १२ ) ग्रहण किया होगा । वह गायक रहा होगा । उसने लोगों के मुख से अज्ञात जाति के साथ कुरुवंश की पराजय सुनी होगी । उसी वियोगान्त घटना के आधार पर उसने स्वदेशी वीरों को क्षात्रधर्म के मूर्तिमान् आदर्श तथा यदुवंशी वीर कृष्ण के साथ पाण्डव, मत्स्य आदि विजातियों को नीच कुलोद्भव और अन्याय से विजयी बतलाकर चित्रित किया होगा । वही प्राचीन भारतगान आश्वलायनगृह्यसूत्र में उल्लिखित है । उसके बहुत समय बाद कृष्णजन्म के अनन्तर कृष्णभक्त पुरोहितों ने बुद्ध के विरुद्ध कृष्ण या विष्णु को खड़ा किया । पाण्डुवंशियों की सहायता से पुरोहितो की चेष्टाएँ सफल हुईं, और चौथी शताब्दी में विष्णु ही प्रधान देव हुए । फिर तो पुरोहितों ने आदि महाभारत में पाण्डवों की अपकीर्ति को कीर्तिरूप में और उनके विपक्षी कुरुओं की कीर्ति को निन्दारूप में बदलकर आदि महाभारत का कलेवर परिवर्तित कर दिया, और दाक्षिणात्य पाण्डुवंश की एक शाखा के रूप में मान लिया ।' डेन्मार्क के डाक्टर सोर्यनसन कोपेन हेगेन विश्वविद्यालय के अध्यापक थे । 'महाभारत और भारतीय संस्कृति में उसका स्थान' शीर्षक निबन्ध लिखने के कारण उन्हें आचार्य पदवी मिली । वे महाभारत का मूल कोई प्राचीन पौराणिक गाथा और उसका रचयिता एक ही व्यक्ति मानते हैं ।' बुल्हर कोजे नेसिस दे ने महाभारत को कई पीढ़ियों में धीरे-धीरे विकसित काव्य माना है । किन्तु उसकी रचना एक ही समय में सम्पादक मण्डल द्वारा वे मानते हैं । वे युद्ध को कोरी कवि कल्पना मानते हैं । उनका कहना है कि महाभारत एक रूपक है, जिसमें पाण्डव धर्म के कौरव अधर्म के प्रतिनिधि रूप में दिखाये गये हैं । उनके शिष्य डालमान ने उनके सिद्धान्तों की पूर्ण व्याख्या करते हुए बताया है कि पहले दो प्रकार के साहित्य रहे होंगे:--( १ ) राजवंशों की पौराणिक गाथायें और ( २ ) उपदेशपरक कवितायें । सर्वसाधारण में प्रचार की दृष्टि से इन दोनों भावों को मिलाकर कविमण्डल ने एक नवीन रचना कर दी, वही महाभारत है । यह सब पाश्चात्यों का आक्षेप है ।

समाधान वस्तुतः वे लोग ईसाई मत के प्रचार को ध्यान में रखकर हम लोगों के साहित्यों को देखते हैं, विचार करते हैं और मनमानी कल्पना की उड़ान भरते हैं किन्तु प्रमाण कुछ भी उपस्थित नहीं करते जिससे उनकी बात प्रमाण की कसौटी पर खरी उतरे । वस्तुतः अतीत व्यक्तियों एवं घटनाओं के सम्बन्ध में इतिहास को छोड़कर और कोई भी दूसरा प्रमाण हो नहीं सकता । अटकल मात्र से न तो कुछ सिद्ध ही होगा और न विद्वानों को सन्तोष ही । जबकि जिस ग्रन्थ के विषय में अटकल लगायी जा रही है उस ग्रन्थ से ही वह अटकल विरुद्ध ठहरता है । महाभारत में ही जय, भारत या महाभारत का निर्माता कृष्णद्वैपायन व्यास को ही कहा गया है तथा महाभारत के निर्माण का समय भी उसमें दिया है । फिर उसके विरुद्ध अटकलबाजी का क्या महत्त्व हो सकता है ? इन सभी पाश्चात्यों की अटकलबाजी भी परस्पर विरुद्ध ही हैं । कोई महा- भारत को एक कर्तृक, कोई अनेक कर्तृक, कोई एक काल में निर्मित और कोई भिन्न-भिन्न काल में निर्मित मानते हैं । उनकी दुरभिसन्धि का यह जाज्वल्यमान उदाहरण है कि पाणिनि ने अष्टाध्यायी में 'महान् व्रीह्यपराह्णगृष्टीष्वासजाबालभारभारतहैलहिलरौरव- प्रवृद्धेषु' ( पा० ६।२।३८ ) में महाभारत का स्मरण किया है, अतः पाणिनि द्वारा उल्लेख न होने से आश्वलायन गृह्यसूत्र में भारत-महाभारत का नाम क्षेपक हैं यह ठीक नहीं । व्रीहि, अपराह्ण, गृष्टि, इष्वास, जाबाल भार भारत हैलहिल, रौरव और प्रवृद्ध शब्द परे ( बाद में ) रहें तो महान् शब्द को अन्तोदात्त स्वर होता है । जैसे महाव्रीहि, महापराह्ल आदि में अन्तोदात्त होता है, वैसे ही महाभारत में भारत शब्द परे रहते महान् शब्द को अन्तोदात्त होता है । इस सूत्र से पाणिनि ने महाभारत शब्द बनाया है । फिर बेवर द्वारा यह कहना कि पाणिनि ने भारत-महाभारत का स्मरण नहीं किया यह अत्यन्त प्रमाद है ।

( १४ ) उनके पास एक भी ठोस प्रमाण नहीं है जिससे वे लोग अपनी अटकलबाजी को प्रमाण की कसौटी पर खरी उतार सकें । उसके विपरीत हमारे महाभारतानन्तर भावी सभी साहित्यों में महाभारत का और उसके व्यास कर्तृत्व का उल्लेख मिलता है; जिसका उल्लेख पहले किया जा चुका है । श्रुतियों में जहाँ विरोधाभास दीखता है अर्थात् परस्पर विरुद्धार्थक दो श्रुतियाँ दीखती हैं वहाँ समन्वय से उनका अर्थ किया जाता है । उत्तरमीमांसा में तो समन्वयाध्याय एक अध्याय ही व्यास जी ने रखा है । पूर्व मीमांसा में भी समन्वय बताया गया है । उसी पद्धति से महाभारतादि में भी समन्वय करना चाहिए । जो हमारी चीज है; हमारे लाखों पीढ़ी करोड़ों पीढ़ी के पूर्वजों से हमें प्राप्त है उसके अर्थ का प्रकार हमलोगों से ही समझना चाहिए । मनमानी अटकल नहीं भिड़ानी चाहिए । धर्म में वही इतिहास प्रमाण रूप से आदरणीय होते हैं जो धर्मशास्त्र के अविरुद्ध होते हैं । आधुनिक समय में भी संविधान व्यवहार के अनुसार होता है, इतिहास के अनुसार नहीं । क्योंकि इतिहास दुर्भाग्यपूर्ण भी हो सकता है । भारतीयों के अनुसार जो महाभारत में है, वही अन्यत्र है । जो महाभारत में नहीं वह कहीं नहीं । “यदिहास्ति तदन्यत्र यन्नेहास्ति न तत् क्वचित्” । आश्वलायन गृह्यसूत्र के तर्पण के प्रसङ्ग में ‘सुमन्तुजैमिनिवैशम्पायनपैल- सूत्रभाष्यभारतमहाभारतधर्माचार्याः’ यह कहा है । इसका अर्थ है कि सुमन्तु, जैमिनि, वैशम्पायन, पैल, सूत्र, भाष्य, भारत और महाभारत नाम के धर्माचार्य तृप्त हों । ये भारत और महाभारत धर्माचार्य हैं, कोई ग्रन्थ नहीं । देवी भागवत महापुराण के ग्यारहवें स्कन्ध के बीसवें अध्याय में इस सूत्र की व्याख्या है । ‘सुमन्तुजैमिनिवैशम्पायनः पैलसूत्रयुक् । भाष्यभारतपूर्णश्च महाभारत इत्यपि ॥ धर्माचार्या इमे सर्वे तृप्यन्त्विति च कीर्तयेत् ॥ २० ॥’ इसकी टीका में नीलकण्ठ कहते हैं—सुमन्तु जैमिनि वैशम्पायनपैलसूत्र- भाष्यभारतमहाभारतधर्माचार्यास्तृप्यन्तु इत्येको मन्त्रः सूत्रानुरोधात् । अर्थात् ये

( १५ ) सब धर्माचार्य हैं एक ही में सबका नाम लेकर तर्पण करना चाहिए। क्योंकि सूत्र में वैसा ही कहा गया है। इसी प्रकार कलियुग में कब्र की पूजा होगी; लोग देवता पूजन नहीं करेंगे। स्थान-स्थान पर कब्र ही दृष्टिगोचर होंगी, मन्दिर कम दीखेंगे। यह सब महाभारत में देखकर कुछ लोगों ने कहा कि बुद्ध के मरने के बाद उनका शरीर दफनाया गया उसके बाद ये श्लोक पीछे से जुड़े हैं। किन्तु ऐसी बात नहीं है। मार्कण्डेयमहर्षि कलियुग में भविष्य कैसा होता है यह बता रहे हैं। उन्होंने कई प्रलय देखे हैं उस प्रसङ्ग में ये श्लोक कहे गये हैं। 'एडूकान् पूजयिष्यन्ति वर्जयिष्यन्ति देवताः।' ६५।७ ( म० भा० वनपर्व १९० ) 'एडूकचिह्ना पृथ्वी न देवगृहभूषिता।' भविष्यति युगे क्षीणे तद्युगान्तस्य लक्षणम्॥ ( ६७।७ ( म० भा० वनपर्व १९० ) इसी का समर्थन विष्णु, वायु, मत्स्य पुराण से होता है। महाभारत से आज तक पौराणिक राजवंशावलियों और महाभारत संहिता आदि संस्कृत ग्रन्थों से प्रमाणित कलियुगारम्भ काल (जो कि विक्रमसंवत् पूर्व ३०४५ से ईस्वी सन् पूर्व ३१०२ है) वह ही महाभारत युद्ध काल है और वह ही परीक्षित का जन्मकाल है। महाराज युधिष्ठिर के समकालीन मगध देश के महाराज जरासन्ध के पौत्र और महाराज रुद्रदेव के पुत्र सोमाधि (अथवा सोमापि) से लेकर इस वंश के २२ वें राजा अरिंजय (अथवा रिपुंजय) तक का राज्यकाल एक सहस्र वर्ष ही पुराणों के अनुसार सिद्ध होता है। इस वंश के अनन्तर प्रद्योत वंश प्रारम्भ होता है। इस वंश में प्रद्योत वंश से लेकर नन्दिवर्धन तक ५ राजा हुए हैं। इनका राजत्व (शासन) काल १३८ वर्ष है।

( १६ ) प्रद्योत वंश के अनन्तर शिशुनाग वंश का राज्य प्रारम्भ होता है। इस वंश में शिशुनाग से लेकर महानन्दी तक १० राजा हुये हैं। इनका शासन काल ३६२ वर्ष है। यह सब संख्या १०० + १३८ + ३६२ = १५०० होती है। इन १५०० वर्षों के बाद महापद्मानन्द के वंश का राज्य है। स्वयं महा- पद्मनन्द का राज्य ८८ वर्ष और उनके सुमाल्यादि ८ लड़कों का राज्य १२ वर्ष अर्थात् लड़कों सहित महापद्मानन्द के राज्य का समय १०० वर्ष है। यह युधिष्ठिर संवत् या कलि संवत् १६०० वर्ष तक का राज्यकाल है। कलि संवत् १६०१ में मौर्य वंश ( चन्द्रगुप्त ) का राज्यकाल प्रारम्भ होता है। यह काल विक्रम संवत् पूर्व १४४५ वर्ष और ईसा पूर्व १५०२ वर्ष होता है। इस प्रकार कलि संवत् प्रारम्भ के समय से मगध राजवंश के २२, प्रद्योत वंश के ५ और शिशुनाग वंश के दश तथा महापद्मानन्द के दो कुल ३९ राजा होते हैं। चालीसवाँ राजा मौर्य वंश का चन्द्रगुप्त है। इस वंश में दश राजा हुये हैं जिनका शासन काल १३७ वर्ष है। यहाँ तक का समय युधिष्ठिर संवत् अथवा कलि संवत् १७३७ तक होता हैं। इसके बाद शुङ्गवंश का राजत्व काल है जिसमें पुष्यमित्रादि दश राजा हुए हैं। इनका शासन काल ११२ वर्ष है। इसके बाद कण्व वंश का राजत्व काल है। इसमें वसुदेवादि चार राजा हुए हैं। इनका शासन काल ४५ वर्ष है। इसके अनन्तर आंध्रवंश का शासन काल है। इसमें बलिपुच्छकादि तीस राजा हुए हैं। इनका शासन काल ४५६ वर्ष है। ११२ + ४५ + ४५६ = ६१३ वर्ष। यह समय युधिष्ठिर संवत् २३५० तक होता है। युधिष्ठिर संवत् २३५१ में आभीरवंशी राजाओं का राज्य प्रारम्भ होता है जो विक्रम संवत् पूर्व ६९५ वर्ष और ईसा पूर्व ७५२ वर्ष है। ऊपर कहा जा चुका है कि मौर्य वंशीय चन्द्रगुप्त का राज्यकाल युधिष्ठिर संवत् अथवा कलि संवत् १६०१ से प्रारम्भ होता है। इसका शासन काल २४ वर्ष है। अर्थात् विक्रम संवत् पूर्व १४४४ और ईसा पूर्व १५०१ वर्ष में चन्द्रगुप्त का शासन काल प्रारम्भ होकर कलि संवत् (या युधिष्ठिर संवत्) १६२४ विक्रम पूर्व १४२० ईसा पूर्व १४७७ में समाप्त होता है। कलि संवत्

( १७ ) (या युधिष्ठिर संवत्) १६२५ विक्रम पूर्व संवत् १४२१ वर्ष तथा ईसा पूर्व १४७७ में विन्दुसार का शासन प्रारम्भ होता है। इसके बाद अशोक का शासन काल कलि संवत् (या युधिष्ठिर संवत्) १६५०, विक्रम संवत् पूर्व १३९५, ईसा पूर्व १४५२ से प्रारम्भ होकर २६ वर्ष अर्थात् कलि संवत् (या युधिष्ठिर संवत्) १६७६ तक अर्थात् विक्रम संवत् पूर्व १३६९ ईसा पूर्व १४२६ वर्ष तक है। ऐसी स्थिति में पाश्चात्य विद्वानों के अनुसार चन्द्रगुप्त मौर्य का शासन काल ईसा पूर्व ३२३ वर्ष की कल्पना निराधार है। भारतीय इतिहासों के अन्वेषण के लिए सर्वप्रथम 'एशियाटिक सोसाइटी' कलकत्ता, संस्था की स्थापना हुई। इसमें सर विलियम जोन्स ने भारतीय इतिहास के विषय में सर्वप्रथम एक वक्तव्य दिया था। उसमें उन्होंने यूनानी इतिहास लेखकों की नगरी 'पालिबोथ्रा' को पाटलिपुत्र का अपभ्रंश और 'सेण्ड्रा कोटस' को पौराणिक मौर्य वंशीय चन्द्रगुप्त का अपभ्रंश बताया था तथा चन्द्रगुप्त का राज्यारोहण काल ईस्वी सन् पूर्व ३२२ वर्ष सिद्ध किया था। अब इस पर विचार करना चाहिए कि यह कहाँ तक उचित है? मेगस्थनीज का भारत भ्रमण (जो हिन्दी में आचार्य पं० रामचन्द्र शुक्ल द्वारा अनूदित हुआ है) में लिखा है—'डायनुशस पश्चिम से आया। .... .... .... .... उसी वंश में हेराक्लीज .... .... .... भी हुआ था, जो साधारण मनुष्यों से बल बुद्धि में बड़ा था और उसने बहुत सी स्त्रियों से विवाह करके बहुत से पुत्र उत्पन्न किये .... ....। उसने बहुत से नगर बसाये, जिसमें सबसे बड़ा और विख्यात नगर पालिबोथ्रा है। महाभारत मीमांसा पृ० ९१ में मेगस्थनीज की पुस्तक का अवतरण दिया हुआ है। उसमें हेराक्लीज से सेण्ड्राकांटस तक १३८ पीढ़ियां दी हैं। इसका तात्पर्य यह हुआ कि सेण्ड्राकांटस से १३८ पीढ़ी पहले 'पालिबोथ्रा' बसी थी। प्रसिद्ध इतिहास विशारद प्लायनी ने लिखा है कि पालिबोथ्रा नगर गंगा और इरानावोसस के संगम से २०० मील ऊपर की ओर स्थित था। एस० डी० आनविल्ले के मत से 'ईरानावोसस' यमुना नदी है। इससे यह सिद्ध २

( १८ ) होता है कि गंगा, यमुना के संगम से २०० मील ऊपर की ओर पालिबोधा बसी थी । सर विलियम जोंस के वक्तव्य के अनुसार आरायन के मत से गंगा और ईरानावोअस का संगम प्रसई ( प्रस्सी ) जनपद में था । कर्टियस का मत है कि मेगस्थनीज का पालिबोधा प्रमद्रक ( या पारिभद्रक ) जनपद है । उपर्युक्त विवरण से यह सिद्ध होता है कि गंगा यमुना के संगम से ऊपर २०० मील पर पालिबोधा नगरी सेण्ड्राकांटस से लगभग २८ सौ वर्ष पहले बसाई गई थी । आधुनिक विद्वानों के अनुसार प्रतिपीढ़ी २० वर्ष मानने पर १३८ पीढ़ी में २७६० वर्ष होते हैं । वर्तमान में पाटलिपुत्र प्रयाग से लगभग ढाई सौ मील नीचे की ओर है । पुराणों के अनुसार शिशुनाग वंश के आठवें राजा उदायी (अथवा उदासी) ने जिसका राज्याभिषेक कलि संवत् ( युधिष्ठिर संवत् ) १३८५ ( अर्थात् १६५९ वर्ष विक्रम संवत् पूर्व, तथा १७१७ वर्ष ईस्वी सन् पूर्व) में हुआ था अपने अभिषेक से चौथे वर्ष में उसने गंगा के दक्षिण तट पर कुसुमपुर ( अर्थात् पाटलिपुत्र ) बसाया ! इसके विपरीत पालिबोधा के बसाये जाने का समय ईसा पूर्व ३०८२ वर्ष के लगभग होता है और उसके बसाने वाले का नाम हेराक्लीज लिखा है तथा पाटलिपुत्र के बसाये जाने का समय ईसवी पूर्व १७१५ है और उसका बसाने वाला शिशुनाग वंशीय आठवाँ राजा उदायी ( अथवा उदासी ) है । अतः पालिबोधा किसी भी तरह पाटलिपुत्र नहीं हो सकती और न तो सेण्ड्रा- कॉट्स चन्द्रगुप्त मौर्य ही हो सकता है । इसी प्रकार 'जैन पुस्तक परिशिष्ट' पटवन में भी पाटलिपुत्र को शिशुनाग वंशीय आठवें राजा द्वारा बसाये जाने का उल्लेख है । बृहत्संहिता में लिखा है— आसन् मघासु मुनयः शासति पृथ्वीं युधिष्ठिरे नृपतौ । षड्द्विकपञ्चद्वियुतः शककालः तस्य राज्ञश्च ॥ ( अध्याय १३ श्लोक ३ ) अर्थात् महाराज युधिष्ठिर के शासन काल में सप्तर्षि मघा नक्षत्र में थे। महाराज युधिष्ठिर के सं० २५२६ वर्ष में शक प्रवृत्त हुआ है । इसके समर्थन में

भट्टोत्पल ने अपनी बृहत्संहिता की विवृत्ति में वृद्धगर्ग के निम्न वचन का उल्लेख है-- कलिद्वापरसन्धौ तु स्थितास्ते पितृदैवतम् । मुनयो धर्मनिरता........................ ॥ उपर्युक्त वाराही-संहिता में शक शब्द से सम्प्रति प्रचलित शालिवाहन शक नहीं समझना चाहिए । किन्तु शक का अर्थ है संवत् । कल्हण ने उसका अर्थ भ्रमवश शालिवाहन शक समझ लिया । अर्थात् २५२६ कलिगताब्द ( अथवा युधिष्ठिर गताब्द ) में शक का प्रारम्भ हुआ । उस संवत् में शक का प्रारम्भ समझकर कल्हण ने ६५३ वर्ष अधिक देखा और उतनी संख्या सभी संवतों में घटाकर प्रयोग किया । पाश्चात्य विद्वानों में विशेषकर जेनरल प्रिंसेप और जेनरल बर्किंघम ने सर विलियम के वक्तव्य को प्रमाणित मानकर जिन गुहाभिलेखों, स्तम्भाभिलेखों तथा शिलालेखों की खोज की है । उनमें चौदह प्रज्ञापनवाले लेख में अन्तियोक आदि पाँच नामों को यूनान के भिन्न-भिन्न भागों के राजाओं की कल्पना की है । उनको ईसवी संवत् पूर्व २५८, या प्रज्ञापनों का अंकित होना मानकर अभिलेखों के लिखाने वाले राजा को अशोक के समय का प्रतिपादित किया है । वस्तुतः अशोक के शिलालेख धर्म लेख नाम से प्रसिद्ध है देवानां प्रिय, प्रियदर्शी राजा तथा देवानां प्रिय अथवा प्रियदर्शी । बिना किसी व्यक्ति के नाम के द्वारा लिखाये गये जितने धर्मलेख अब तक गुहाओं, स्तम्भों तथा शिलाओं में पाये गये हैं वे धर्मलेख कब लिखे गये ? इसका उनमें कोई उल्लेख नहीं है । और न तो संवत् का ही उल्लेख मिलता है । एक में अशोक्स ये चार अक्षर मिलते हैं । शेष किसी भी लेख में अशोक का नाम नहीं है । इतना ही नहीं अभिलेखों में देवानां प्रियः, प्रियदर्शी राजा की द्विरुक्ति, त्रिरुक्ति तो की गई है, किन्तु अशोक इन तीन अक्षरों का उल्लेख नहीं है । अतः वे सब धर्मलेख अशोक वर्धन के माने जाने में कोई तर्क नहीं है । क्योंकि जिन विषयों का वर्णन सातवें स्तम्भाभिलेख के दूसरे तथा तेरहवें प्रज्ञापन में है ठीक उसी प्रकार का वर्णन चीनी