कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
बोधसागर
(१०३)
लोक दीपको ठौर बतायो । बैठक अस्नेह हंस चिन्हायो ॥
साखी-कैसे सरूप समर्थ हैं, कैसे हैं सब हंस ।
केहि करनीते पाइये, कैसे कटे कालकी फंस ॥
चौपाई-सतगुरु कबीर उवाच
कहे कबीर सुनो धर्मदासा । अल्पबुद्धि घटमाँह निवासा ॥
सत्य लोक है अधर अन्तुपा । तामें है सत्ताविस दीपा ॥
सत् शब्द का टेका दीना । अगम पोहुमीरचीतिन लीन्हा ॥
सागर सात ताहि विस्तारा । हंस चले तहाँ करै विस्तारा ॥
अग्रवास वह सुवरन कांती । तहाँ बैठे हंसनकी पांती ॥
पुहुपद्दीप है मध्य सिंहासन । करूपदीप हंसनको आसन ॥
अविगत भूषण अविगत सिंहारा । अविगत वस्त्र अविगत अहारा ॥
कमलस्वरूप भौम्य है भाई । कहाँकी उपमा देउ बताई ॥
आभा चन्द्र सूर्य नहीं पावहिं । भूल चूकके शीस नवावहिं ॥
कला अनेक सुख सदा होई । वह सुखभेद यहाँ लहे न कोई ॥
निरतै हंस पुरुषके सङ्ग । नखशिख रूप बन्यो बहु अंगा ॥
पुरुष रूपको बरनै भाई । कोटि भानु शशि पार न जाई ॥
छत्र सरूप को वरणै भाई । अविगत रूप सदा अधिकई ॥
सत्ताइस द्वीपमें करे अनन्दा । जो पहुँचे सो काटें फन्दा ॥
हंस हिरम्मर और सोहंगा । श्वेत अरुण रूप दोउ अंगा ॥
विमल जोतको है उजियारा । झलकै कला पुरुषमें भरा ॥
चारि शब्दका लोक बनावा । पाँच सरूप लै हंस समावा ॥
सत्य शब्दकी भूमि बनाई । क्षमा शब्द आसन निरमाई ॥
धिर्ज शब्दसों छत्र उजियारा । सुमत शब्दसों वस्त्र पसारा ॥
प्रेम शब्दसों हंस निरमाई । आप शब्दते लोक समाई ॥
दीपन करै दीप हंस बिहारा । तहाँ पुरुष निर्मल उजियारा ॥
जब विहंसे मुखमोड सुहाई । निरत हेरि विहंसे चितलाई ॥
(१०४)
कबीरबानी
चिकुरझलक बरनी नहिं जाई। कोटिनवार शशि वारन जाई॥
एति सिद्ध सतगुरु फरमाई। मानुष रूपन्हि लोके जाई॥
अविगति रूप है लोक हमारा। करनी भेद कहो निर्घांरा ॥
करनी भेद
काया करनी चार है भाई। मनकरनी दोई लेहों उठाई ॥
प्रथम करनी चौका है सारा। तिनकीसन्धतिनहुका विचारा॥
दुसरे पुनि चरणामृत कीन्हा। तिसरे शीत प्रसाद जो लीन्हा॥
चौथे साधुकी सेवा करहु। यम औ कालसों कबहु न डरहु॥
काया करनी कही विचारी। मन करनी सो हंस उबारी ॥
पारस परशे कञ्चन होई। लोहा वासों कहै न कोई ॥
स्वाति सनेहकी करनी है भाई। सो करनी काहु विरले पाई ॥
स्वाति बून्द सीप जो लेही। बून्द स्वरूपहि पलटे देही ॥
इक करनी है हंस सनैदा। पहुँचे लोक काँपि यमफंदा ॥
लोक वेद कुल जगत विसारे। बोलत वचन जीव निवारे ॥
माया चारि कालकी भाई। इनहि जीव राखे उरझाई ॥
इह छोडे सद्गुरुके ओटा। मेटे कर्म भर्म सब खोटा ॥
दोइ माया सद्गुरुके ठहराई। दौय करनीसे सत्य मिलाई ॥
हंस करनि तीनलोकसो न्यारी। सद्गुरु मिले तो कहै विचारी ॥
धर्मदास कर चौका प्रमाना। मेटो कुल पाखंड अभिमाना ॥
सोरा असंख्ययुग गयोसरसाई। काहु न खबरिसमर्थकी पाई ॥
जीव निकाल यमधरधर खाई। चारि वेद सब जक्त भ्रमाई ॥
धर्मदास तुम अंश हमारा। तुमसो वचन कहौं टकसारा ॥
सारखी-कहै कबीर
मैं कबीर बिचलौ नहीं, नाम मेरो समरत्थ ।
ताही लोक पठाइहों, जो चढ़ शब्दके रत्थ ॥
बोधसागर
( १०६ )
धर्मदास उवाच
धर्मदास तब सौंज मँगाई । सोरह अंश तब दीन्ह चिन्हाई॥
चौका पुरस तब युक्ति बनाई । तनुका तोड़े जल अचनाई ॥
लिख्यो पान समरथ सहिदानी । दीन्हो सन्देश सत्यकी बानी ॥
तीनि अंशकी लगन विचारी । नारीअर अंशको हंस उवारी ॥
नारी पुरुष होय एक संगा । सदगुरु बचन दीन्ह सोहंगा ॥
सोहँग शब्द है अगम अपारा । तुमसों धर्मनि कहौ विचारा ॥
पेड़ सोहँग और सब डारा । साखा सोहँ कीन्ह प्रकारा ॥
प्रथम सहज सोहँगकी बानी । दूसरि इच्छा सोह उपतानी ॥
तिसरे मूल सोहँ है भाई । चौथे सोहँ सोहँ निर्माई ॥
सोहँगते भये सोह अतीता । जाको नाम जो कह्यो अचित्ता ॥
अचित्तिते अक्षर सोहँगा । अक्षर सोहँगते कैल सोहँगा ॥
कैल सोहँगते त्रिगुण सोहँगा । सोहँगते सकल सृष्टिको रंगा ॥
अमृत वस्तुते नौ पकारा । सोहँग शब्दके सुमिरन सारा ॥
सो सोहँ अचीन्हि जो पावै । सोहँ डोर गहि लोक सिधावै ॥
जा घट होई सोहँ मतसारा । सोई आवहु लोक हमारा ॥
सुरति सोहँ हृदये महाँ राखो । परचे ज्ञान तुम जगमें भाषो ॥
एती सिद्धि सोहँकी भाई । धर्मदास तुम गहौ बनाई ॥
चौका करि दीन्य परमाना । तब जीवहि छूटे अभिमाना ॥
अजावन बीरा आवै हाथा । तब हंसा चले हमरे साथा ॥
ताकैं पुनि चहि आवै डोरी । टूटे घाट अठासी करोरी ॥
कुल करनी जिन्ह खोय निसाई । काटि फन्द निज घरकू जाई ॥
तन मन धनको मोह न आवै । सो जिव दर्स हमारा पावै ॥
गुरुसों अन्तर कबहुँ न कीजै । साधु सन्त सेवा मन दीजै ॥
एती सनद जीव उजियारा । ताको सुकृत आवै सठिहारा ॥
सोहँ करनी सोहँ विचारा । सोहँ शब्द है जिव उजियारा ॥
( १०६ )
कबीरबानी
सारखी-कहै कबीर
धर्मदास उन मन बसौ, करौ शब्दकी आस ।
सोहैं सार सुमरन करो, सुनिवर मरें पियास ॥
चौपाई-धर्मदास उवाच
सत्य नाम संतन सुखदाई । कथा अनूप कहौं चितलाई ॥
बन्दौं गुरु दोऊ कर जोरी । जिमि कलहिते तुम बँदे छोरी ॥
को प्रवीन है लोक तुम्हारा । सो मोसों सब कहौं विचारा ॥
बस्ती सून्य बिचकी सब भाखो । जो देखो सो गोय जिन राखो ॥
धर्मदास बचन
सारखी-जैसे है तैसी कहौं मैं बलिहारी जाऊँ ।
अंस वंस निवारके, जीव सकल मुक्ताऊँ ॥
चौपाई
तुमरे कारन भेद हम दावा । सर्वमूल गुरु समरथ आवा ॥
लोक परेलोक दोउ हम पाए । जब सद्गुरु मोहिं दर्श दिखाए ॥
पांजी भेद कहौं ससुझाई । कौन अंस कौन लोक बैठाई ॥
केते पवन इहाँते होई । जहाँ समर्थ बैठक सोई ॥
वेद कितेकी सन्ना दीजे । इतनी दया गुरु हमपर कीजे ॥
सारखी-लोक भेद केते वहै, पांजी भेद कहो ससुझाय ।
अंस वंस अस्थान बतावो, सब संशय मिट जाय ॥
सद्गुरु पेडी भेदः पठ्यते
धर्मदास मैं कहा ससुझाई । पांजी अंस को भेद बताई ॥
तज अंडवार पलंगबिस्तारा । मध्यमेशून्यदोयपालैंगअंधियारा ॥
मृतुलोकमें सालोक मुक्तिप्रमाना । ताकी नाम मानसरोवर स्थाना ॥
बांधसागर
(१०७)
चारिमुक्तिकी कमाई अस्थान
धीरज अंश तहाँ बैठारा । चौसठ कामिनी संग विहारा ॥
मध्यसरोवर पिंडसिला लै धारी । चौसठकामिनी निरते घरियारी ॥
जो कोई वाम मार्ग को ध्यावै । सो सालोक्य मुक्ति को पावै ॥
पेडी ॥१॥ तहाँते वैकुण्ठ चौवीस कोटी रहाई । तहाँ सुमेर रहचो
ठहराई ॥ तहाँ धर्मराय अविनासी रहही । जो पाप पुण्यका
लेखा लहही ॥ तहाँ रंभा सामीप्य मुक्त है सोई । नवसौ सखी
ताके सँग होई ॥
(पेडी २ वैकुण्ठको विस्तारा)
पांच सीखर सुमेरके रहही । पांचों अंसकाला तहाँ धरही ॥
ईशानकोन ध्रुव आशन कीन्हा । वायु कोन कुबेरको
दीना ॥ नैऋत कोन जमको अस्थाना । अग्नि कोन इन्द्रासन
ठाना ॥ जिनकूं धर्मराय मैं कही । मध्यसिंहासन विष्णुको
सही ॥ सहस्र साठजोजन वैकुण्ठ प्रमाना ॥ ६००००० तेहिके
आगे सुन्य डोर बन्धाना ॥ निर्वाणमारगको जो कोई ध्यावै ॥
सो सामीप्यमुक्ति वैकुण्ठको पावै ॥ पेडी ॥६॥ वैकुण्ठते शून्य
अठारह १८ करोरी ॥ तहाँ लागी सून्यकी डोरी । शून्यमध्य है दीप
अनूपा । आदि निरंजन तहाँ जोतिसरूपा ॥ तहाँ अँधियारी हैं
सुन्य मंझारा । दोय पलंग है सुन्य विस्तारा ॥ तहाँ कोटि
चारि है जोति उजियारी ॥ तहाँ अष्टंगी है शक्ति नारी ॥
सारूप्य मुक्ति सो तब पावै ॥ अघोर मार्गको जो कोई ध्यावै ॥
चौथी मुक्ति आगे अस्थान
ते अक्षर आगे अस्थाना । एक पलंग तहाँते परवाना ॥ तहाँ
अक्षर योग माया विस्तारा । चारि अंश जिनके अधिकारा ॥
तहाँते चार वेद परवाना । चौथी मुक्तिको येथि ठिकाना ॥ तहाँते
आगे कोह ना गएऊ । एहि मता चारों वेद मिलितयेऊ ॥ चारों
( १०८ )
कबीरबानी
मुक्ति सम्पूर्णन ॥ (पेडी) तहाँते चारी मुक्तिको जाना । तहाँते एक
इण्ड परवाना ॥ तहाँते है इण्डको छौरा ॥
इण्डके आगे अनहद अँजोरा । आगे असंख्य शून्य विस्तारा ॥
तहाँ अचिंतनाम अंस करे व्यौहारा । अधर दीप है ताकर नामा
प्रेम ध्यान ताकर विसरामा प्रेमसुरति नचि बारंबारा ॥ ताके
सँग लखिबारहजारा ॥ १२००० ॥ तहाँ आगे सोहं अस्थाना ।
तहाँ तीन असंख बीच सून्य प्रमाना । तहाँते आठअंस उप-
जाई उन्हे वंस अंसके स्थान बनाई ॥ तहाँ ओहं सोहं उजियारा ।
तिन संग हंस छतीस हजारा ॥ ३६००० ॥ ११ ॥ पेडी ॥ तेहि
आगे मूलगति अस्थाना । तहाँ बीच सून्य आग असंख्य
प्रमाना । हंसा तिन संग बावना हजारा ॥ ५२००० ॥ तिन्हते
पांच ब्रह्म उपजारा ॥ पेडी ॥ १२ ॥ आगे सुरति मूल इच्छाको
मूला । स्वाति सनेह जाको है स्थूला ॥ वीस सून्य चार असंख
निरधारा । तिन संग हंस पचीस हजारा ॥ २५००० पेडी १३ ॥
तिनके आगे सुरति निशानी । सर्वोत्पत्तीकी रजधानी ॥ बीचशून्य
दो असंख्य प्रमाना । तिन्ते भये अंकूर ठिकाना ॥ सोरा असंख्य
तिन्हते विस्तारा । हंस तिन्हि संग पांच हजारा ॥ ५०००० ॥ धर्म-
दास बचन सुन सांचे ! ताके संग हंस सब बांचे ॥ पेडी ॥ १४ ॥
तहाँ आगे अंकूरको प्रमाना । तिल प्रमान द्वार अनुमाना ॥
विहंग शब्दकी लागी डोरी । तेहि संग हंस गये पुरुषलगि सोरी ॥
पेडी ॥ १५ ॥ बीच अँधियारी घोर अपारा । एकअसंख्य दस-
लाख विस्तारा ॥ १०००००००००० १०००००० ॥ आगे हमार
निजलोक ठिकाना ॥ ताको मर्म काल नहिं जाना ॥ पेडी ॥ १६ ॥
सारखी—कहैं कबीर
इतना पांजी भेद है, धर्मनि सुनि चितलाइ ।
समरके प्रतापते सब, हंस लोके जाइ ॥
बोधसागर
( १०९ )
चौपाई
सोरा असंख्य उत्पत्ति पसारा । चार असंख्य शून्य विस्तारा ॥
सात शून्य दोउ बेशून्य कहावै । एकै शून्य कोई विरला पावै ॥
तहांते तीन शून्य भए प्रवाना । आदि अंश शून्य सुरत ठिकाना ॥
तिहिंते तीन भए परकारा । चार सुरतको सकल पसारा ॥
प्रथम शून्य लोकते लागी । तीनिसुरत भए शून्य अनुरागी ॥
आठ अंश अरु वंश पसारा । तहाँ लगि देखो शून्य विस्तारा ॥
इतना जीके होय निन्यारा । ताके आगे लोक हमारा ॥
हम चीन्है और गुरुको सेवै । कर्म तोड़ि के जुग जुग जावै ॥
लोक वेद कुल माया धारी । काल फंद यम फंद विचारी ॥
निसदिन सुरत सतगुरुसों लावै । साधु संतके चितहि समावै ॥
जनपर दाय़ा सतगुरु केरी । तिनकी कटै कर्मकी बेरी ॥
करनी कर अभिमान भुलाई । तब छूटै यम धरि ले आई ॥
करनी करिये गुरुके साथ । ताकु काल उठि नावै माथा ॥
करनी करी जो होय अधीना । ताको वासा लोकमें दीन्हा ॥
करनी करे निज सुतं लगावै । ताको सुकृत लोक पहुँचावै ॥
करनी करत कसरि होय आई । तबहि काल घर बाजु बंधाई ॥
सेवा करि राखे मन आसा । तन छूटै जीव परिहै सासा ॥
सद्गुरुसों अभिमान जो करिहै । तन छूटै जीव यमफंद परिहै ॥
बंस टेक औ नाम हमारा । पथ पूजा सद्गुरु कनहारा
चारों अंश चिन्है जो पावै । तनमन धनसों प्रीति लगावै ॥
माता पिता बंधु सब भाई । पुत्री पुत्र हेतु लोलई ॥
घरकी घरणी पुरुष है सोई । इनकी प्रीति न कारज होई ॥
तासों काल रहै मुख गोई । नारी पुरुष सुरति कारज होई ॥
( ११० )
कबीरबानी
गुरुसों अंतर कबहु न राखै । प्रेमप्रीतिसों दीनता भाखै ॥
गुरुको निंदै अक्षरकू ध्यावै । बिन गुरु अक्षर कैसे पावै ॥
गुरु संगाती शब्द लखावै । जाके बल हंसा घर आवै ॥
गुरुस्वाती, गुरुरूप स्वरूपा । गुरु पार्स है आदि अनूपा ॥
गुरुभृङ्गी गुरु सो बहुरंगी । कीटते करही आप हितसंगी ॥
गुरु है सांचे सिद्ध समाना । गुरु मलयागिर वास प्रमाना ॥
गुरु सदगुरु दीपक अस होई । ताको सनेह कहों मैं सोई ॥
गुरुसीखको सनेहवर्णन
जैसे स्नेह कमल और भौरा । जैसे स्नेह चन्द्र अरु कोरा ॥
जैसे स्नेह बीन जल अंगा । जैसे स्नेह है दीप पतंगा ॥
जैसे स्नेह मृगा और जन्त्री । जैसे स्नेह चकमक और पथरी ॥
जैसे स्नेह स्वाति और पपीहा । जैसे स्नेह चुम्बकअरु लोहा ॥
जैसे स्नेह मीन अरु नीरा । जल बिछुरै वह तजै शरीरा ॥
ऐसे गुरु शिष्यको सन्देशा । मुक्तिहोय गुरुमिटचो अँदेशा ॥
एते स्नेह सीख सहिदानी । इतने गुरुके तत्व बखानी ॥
गुरुसनेह सीख जो पावै । गुरु रूप होय शिष्य समुद्भावै ॥
गुरुकी दया चलौ रे भाई । बिन गुरु पार न पावै कोई ॥
गुरु सोई सत्य शब्द बतावै । और गुरु कोई काम न आवै ॥
साखी- उपमा कहा दीजिये, पटतर कोहु नाहि ।
पलपल करो जु बन्दगी, छिन छिन देखो ताहि ॥
धर्मदास उवाच
धर्मदास विनती चितलाई । कहनी योग गुरु देहु बताई ॥
योग ध्यान भाखो टकसारा । जीव उतारौ भवजल पारा ॥
कायास्थान आदि ते भाखो । कमलभेद गोयें निजराखो ॥
बोधसागर
( १११ )
साखी-कहै धर्मदास
तुमही करता आदि हो, जिन सब रचना कीन्ह ।
सत्य शब्द सार निर्मौलिके, सतगुरु साँचे दीन्ह ॥
कहै कबीर योग विधि बानी । जाते पुरुष सो हो पहिचानी ॥
प्रथम कमल कहूँ रे भाई । चारि पंखुरी तोहि बनाई ॥
सिद्ध पवन गनेस है सोई । छेसे जाप अखंडित होई ॥
दुतिय कमल नाभी तर होई । षष्ठ पंखुरी ताकर सोई ॥
ब्रह्मवास तेहि कमलमें होई । छे हजार जाप तहां सोई ॥
६००० । २ तिसरे कमलकी आठ पंखुरी । लक्ष्मीनारायण
मूर्ति तहां धरी ॥ छे हजार जप तहां प्रमाना । जो कोई साधू साधे
प्राणा ॥ ६००० चौथे कमल शक्ति शिव रहिऊ ॥ षट सहस्र
जप तहां कहिऊ ६००० ॥ बारा पँखुरी ताकर भाई । सोहैं तत्त्वमें
ध्यान लगाई ॥ पांचे कमल अकाशको बासा । सोरा पँखुरी
तहां निवासा ॥ अमी चन्द्र है ताकर नामा । सहस्र जाप ताको
विश्रामा ॥ १००० ॥ तहांते कला अवतारकी आवै । चारि वेद ताके
गुण गावै ॥ अबमें छठो कमल कहि भाखों । तीन पंखुरी ताकी
पुनि राखों ॥ परमात्मा ताहि कमलमें रहई । एक सहस्र जाप
तहँ करई ॥ १००० ॥ ६ सहस्र जाप दोए पँखुरी १००० षष्ठ ध्यान-
तिहिभीतर धरी ॥ गम्य अगम्य अंश दो रहई । तीन देव तहँ
लगि कहई ॥ आठेक मल दश पखुरी कहिये । अगिन वान ताके
बल कहिये ॥ कामदहन ताको है नामा । जो लखेसो पावै विश्रामा
प्रकाश
नामो कमलकी अविगत बानी । अन्त पाँखुरी ताकर प्रानी ॥
ता मैं पूर्ण ब्रह्म अखण्डा । निसवासर धरणी नहिँ चन्दा ॥
एक नाम सत्य है बानी । ताहि नाम सृष्टी उत्पानी ॥
( ११२ )
कबीरबानी
उनकी छाया सबको भाई । तौन छांह घटहि सब समाई ॥
दो सरूप आदि सहेदानी । दो सरूप काया बन्धानी ॥
तिसरा रूप रहित हैं आपै । भेद लखो तिहिगुरु प्रतापै ॥
तेहि प्रतिमा दोय हैं भाई । एक नारि एक पुरुष कहाई ॥
जिसका भेद कहो समुझाई । एक नाद एक बिंदु कहाई ॥
नाद सनेही सुरति हमारी । बिंदु सनेही शब्द बिचारी ॥
माया नारि सुरति है नादा । चार नाम है एक समादा ॥
नरमन शब्द और कहि बिंदा । चार नाम भये कहि बिंदा ॥
नरही नाम मनुष्य बिचारां । मन नाम काल अवतारां ॥
शब्द नाम सूर्यको दीन्हां । बिंदू नाम नीरको लीन्हां ॥
मेदी नाम इक्षीको चीन्हां । माया नाम भूतक जो कीन्हा ॥
सुरति नाम चन्द गहि दीन्हा । याहि सूरती मम करि लीन्हा ॥
रज्जु नाम श्वासाघट राज्यो । पुरुषहिं एक सुरतिको साज्यो ॥
शब्दको धातू जाही थापा । बनावन हारौ आपै आपा ॥
खुद होई कहैं कबीर
जहां तहां हमही है भाई । दुविधा छोड़े काल भगाई ॥
दुविधा काल बढ़ो अन्याई । तन छूटेते लेह धरि खाई ॥
पिंडका लेखा दीन्ह चिन्हाई । पिंड ब्रह्माण्ड लेहु अर्थाई ॥
अनंत पंखुरीका कमल है भाई । शुक्ल हंस तेहि माहि समाई ॥
आपै कमल उत्पत्ति पसारा । तेहिमें जीवकीन्ह विस्तारा ॥
दुसरो कमल सहज है स्थाना । तिन्हते सृष्टि भई बन्धाना ॥
तृतीय कमल इच्छा उत्पानी । चौथा मूल ले बोले बानी ॥
पांचये सुरति सोहंग बँधाना । आठ अंश तिनके परवाना ॥
छठो कमल आर्चन्यको बासा । निसवासर जहैं प्रेम विलासा ॥
ताते कमल अक्षर ठहराई । तिनकी तो अस्तुति वेदन गाई ॥
बोधसागर
( ११३ )
अठवें कमल कैल को वासा । नाम निरञ्जन तहाँ निवासा ॥
नौमे कमल तीन लोक बनाई । तीनि देव तहाँ रहे भुलाई ॥
पिंड ब्रह्मांडको लेखा सारा । ज्ञानी पंडित करौ विचारा ॥
साखी-कहै कबीर
पिंड ब्रह्माण्डको लेखा, हम दियो प्रकट बताय ।
कहै कबीर धर्मदाससों, तुम निर्भय लोक जाय ॥
धर्मदास वचन-चौपाई
धर्मदास पूछे चित लाई । सदगुरुसे उठि विनती लाई ॥
सांचे साहबकी बलिहारी । कैल पुरुषकी जुगति विहारी ॥
पन्थ विकट कोइ भेद न पावै । जो नहिं सदगुरु आप लखावै ॥
प्रपंची है कैल अपारा । मोसो चलै न पन्थ तुम्हारा ॥
कैसे कै गुरुवाई करहुँ । कैल पुरुषसो मैं बहु डरहुँ ॥
जम्बुद्वीप है यम को देशा । कैसे चलिहै मुक्ति उपदेशा ॥
चार वेदमें सब जीव राचै । कैल फांसते कोइ न बांचै ॥
हम सेवक हैं आज्ञाकारी । सोइ करों मोहिं लेहु उबारी ॥
साखी-कहैं धर्मदास
हमसो पन्थ चलै नहीं, काल अपरबल बीर ।
घाट बाट सब रोक है, जिय कस लागे तीर ॥
चौपाई-सदगुरु कबीर उवाच
धर्मदास तुम्हें सांच न आवा । अन्तर खोली मैं तुम्हे बुझावा ॥
का पुनि करिहै काल तुम्हारा । सिरपर समरथ है रखवारा ॥
मारहु कैल रसातल जाई । केती कै हमही निर्माई ॥
केतिक कैल भये मम आगे । केति सृष्टि उत्पत्ति प्रलै भागे ॥
सत्य वचन सुनिये चितलाई । कैल जुगति मैं देहुँ लखाई ॥
सत् चल्ला है सबते न्यारी । तीनहि लोक प्रपंच पसारी ॥
नं. ७ कबीर सागर - ५
( ११४ )
कबीरबानी
कैल सकल युग डारो खाई । एकौ जीव लोक नहिं जाई ॥
ताते समरथ मोहिं फरमाई । सांचै जीव आतु मुक्ताई ॥
कर्म काल है बहुत अपारा । तुमसों धर्मनि कहौं विचारा ॥
तीन सुरतिका खेल नियारा । भिन्न भिन्न तिनको विस्तारा ॥
चार प्रकारके ज्ञान
अचित अंश समरथको भाई । बारा पलंग राज तिन पाई ॥
ताते ब्रह्म सृष्टि भई भाई । ब्रह्म ज्ञाति नहीं उपजाई ॥
ब्रह्महि लरनि ब्रह्मकी वानी । एके मारग एक रहानी ॥
तिनको चिह्न चले संसारा । अक्षर अतीत नाम है सारा ॥
जो कोई येहि मारगको ध्यावे । अचित लोकमें जाय समावे ॥
प्रेम सुरति उहाँ मंगलचारा । तिनके सँग सखि बार हजारा ॥
अब अक्षरको कहूँ विचारा । अक्षर कीन्हा अविगतिविस्तारा ॥
जीव सृष्टिको कीन्ह पसारा । अनभै ज्ञान कीन्ह विस्तारा ॥
अनभै करनी अनभै बानी । अनभै चाल है अनभै रानी ॥
तिनके चार अंश हैं भाई । आठहि सुरति नहीं ठहराई ॥
नी पवन दोउ गहो निसानी । सुरतियोग अनहद सहिदानी ॥
यह प्रकार जो ध्यान लगावै । अक्षर लोकमें जाय समावै ॥
सुरति योग है महा हितकारी । बीस हजारतिन जीव उबारी ॥
तिसरे कैल निरञ्जन गई । तिन पुनि माया सृष्टि उपजाई ॥
माया सृष्टि है तीस हजार । त्वचा ज्ञानको कीन्ह विचारा ॥
तीर्थ व्रत जप तप है करनी । क्रिया कर्म आचार है रहनी ॥
इच्छा वाञ्छित जो करनी कही । सो फललेहि जन्म जब धरही ॥
जोगहि दान यज्ञ मन लावै । चारिहुँ वेद साखी ससुझावै ॥
कोउ राजा कोउ पंडित भाई । कोउ सिद्ध कोउ साध कहाई ॥
चार अंश चारों फल पाई । माया सृष्टिको धरधर खाई ॥
बोधसागर
( ११६ )
ताके संग सखी बारा हजार । तहाँ महंमद गये सुखसारा ॥
तेहि सुखको उन्ह लहे भाना । आगे ओहं सोहंके स्थाना ॥
चौथी सृष्टि त्रिगुण परकासा । जो उपज्यो अक्षरकी श्वासा ॥
तिनके ज्ञान क्षुद्र है भाई । जन्त्र मन्त्र औ वेद भनाई ॥
राग रँग पूजा चतुराई । अहंकार मद गर्भ भुलाई ॥
जीव भोजते करे अहारा । नौलाखजीव सँग तिनके धारा ॥
तैंहिके ज्ञान जग रहे समाई । घर घर आये कुल बरन दड़ाई ॥
कोई उग्र कोइ क्षुद्र कहावै । कोइ जीवकोइ नारियर खावै ॥
कोई रोगी औषध भावै । कोई देवी कोई देव कहावै ॥
कोई प्रेत होय बोले आई । इह विधि सकल जीव भरमाई ॥
त्री देवा गुण रूप निवासा । इन सब भेद कीन्ह परकासा ॥
पाहन पूजा तिन ठहराई । कई विष्णु तहैं शम्भु कहाई ॥
ब्रह्मा तहाँ वेद धुन करहीं । विष्णु रूप तहैं पूजा धरहीं ॥
शम्भु भये फलके अधिकारी । तीन देव यह युक्ति विचारी ॥
इहि प्रपंच पांच मुख बानी । तेहि प्रपंचमें जीव भुलानी ॥
शुक्लहि पांच काल सहेदानी । जाये ले देह नर्ककी खानी ॥
धर्मदास तुम विन राचौ । सत्य चाल उहिकैलसों बांचौ ॥
चारि सुरतिका लेखा
चार सुरतिका भेद निन्यारा । सो सब खोलि कहूं भण्डारा ॥
तिनकी सनद एक है भाई । तेहि सनद ले जाय लेवाई ॥
यह ज्ञान ताकी चारों बानी । पांचे समर्थक पांच प्रमानी ॥
चारों गुरु चारी हैं बानी । पांचे शब्द सुरति सहिदानी ॥
पांचों भेद हैं अगम अपारा । इह पांचों सर्वांग विचारा ॥
चार अंश चार अण्ड प्रमाना । एके सनद एक बन्धाना ॥
चारों गुरु है जगमें आवा । तिन भवसागर पंथ चलावा ॥
( ११६ )
कबीरबानी
चारों गुरुकी पेडी
प्रथम धर्मदास तुम्हैं भाई । वंश बयालिस है अधिकाई ॥
दुसरे सत्त्व बंकेजी राजा । सत्ताइस अंश तेहसंगबिराजा ॥
तिसरे गुरु चतुर्भुज हैं भाई । सोरा अंश तेहि संग समाई ॥
चौथे गुरु सहतेजी भाई । सात अंस मत तत्त्व बनाई ॥
चारहि गुरु मता अर्थावा । जीव सरूप है जगमें आवा ॥
चार बानी
चार बानि ले तुम्हें समुझावा । प्रथमहि कोटिज्ञान कहि आवा ॥
धर्मदास तुम करो विचारा । कोटिबान है ज्ञान पसारा ॥
दुसरे है टकसारकी बानी । रायबंके जैसे निरणय ठानी ॥
टकसार भेद चढ़ि हारी लेखा । जो पेखे सो सत्यलोकहि देखा ॥
नीर पवनको कीन्ह विवेका । तिसरे मूल ज्ञानका एका ॥
राय चतुर्भुज लीन्ह प्रमानी । चारों गुरु मुक्ति फलदानी ॥
चारि गुरु मुक्ति कडिहारा । बहु जीवनको करिहैं उबारा ॥
सारखी-कहे कबीर चारि बानि, खानी चार ज्ञान निधान ।
चारि पदारथ चारि वेद, चारि गुरु प्रमान ॥
धर्मदास उवाच
हम चारोंको गुरुकर थापै । पांचे अर्चित राजा है आपै ॥
तीन अंश वे कहाँ रहे छाई । तौन भेद गुरु कहो समुझाई ॥
तिन्हकी कला कहो गुरु सांचै । औ पुनि कौन खेलमें रांचै ॥
साखी-सत्य सत्य मोसो कहो, कछु ना राखै गोंय ।
सुर नर मुनि ऋषि सबही ठगे, रीते चले सब रोय ॥
चौपाई-सद्गुरु कबीर
धर्मदास घटभय उजियारा । ताते आगम्य मुर्ति विचारा ॥
आठ अंश सब जमा है भाई । चारि अंश सब ठाँव बनाई ॥
अविगति मोसन कहा न जाई । मैं जो कहों तुम धरौ समाई ॥
बोधसागर
( ११७ )
पाँचों सुत पाँचों अण्ड पाईं । दोईं अंश लै गुप्त बैठाईं ॥
अर्चित वृंद तब तिनहीं दियऊ । तिनको नाम अक्षर तिन ठयऊ ॥
पांच अंश नहीं पावत लेखा । और अंशको कहूँ विवेखा ॥
चार अंश अक्षर सेहेदानी । जिनते उपजी चारों खानी ॥
देखि अंश मोह तब आवा । दूसर अंश घट आय समावा ॥
त्रिगुण शक्ति घट गई समाईं । तब अक्षरको निद्रा आईं ॥
सोरा चौकड़ी सोये सिराईं । आठवो अंश जलमाँहि समाईं ॥
अंडजरूप जो जलमाँ दीन्ह। यह अविगति सब समरथ कीन्ह।
अक्षर जग्यौ निद्रा गई भाई । देखि अंड व्याकुलता आईं ॥
तेहि अंडमें एक निशानी । सो अक्षर पाईं सहिदानी ॥
अक्षर दृष्टिसों अंड बिहराना । तिहिंते कैल भयो अभिमाना ॥
तिन्हके चार वेद भये बंशा । चौथे अंश कलानिधि तंसा ॥
मनमें अक्षर संख्या आईं । यह तो काल समर्थनिरमाईं ॥
तेहिंते शक्ति कीन्ह तिवाना । श्वाससुरति अन्तर बिलखाना ॥
आठों अंश घट रहे समाईं । स्वास संग घट बाहर आईं ॥
सोरा कला अष्टांगी अंगा । रूपकला वाही सब सुख संग। ॥
अक्षर कन्या दीन्ह पठाईं । तिनते तीन पुत्र भये भाईं ॥
अविगति गति काहु नहीं पावा । समरथ सत्य प्रपंच बनावा ॥
सारखी-कहे कबीर
इहविधि सब रचना करी, काहु न जाने भेद ।
जैसे है तैसे तब हती, अब कोकरै निखेद ॥
सारखी-अविगति निषेदकी-धर्मदास उवाच ।
धर्मदास बिनती अनुसारी । साहब बिनती सुनौ हमारी ॥
आठ अंशको भेद हम पावा । गति अवगति दूनों हम गावा ॥
चारि अंश एके मत ठाना । चारि अंश भिन्न भिन्न मत ठाना ॥
( ११८ )
कबीरबानी
तेहि कारण सबमोहि बतावहु । केहि कारण प्रपञ्च उर लावहु ॥
सारखी-चार सुरति सब मूल है, तुम समरथ परवान ।
तुमरे अंगते उपजि कहु, चारहुको अनुमान ॥
सारखी-बीजके कलसाकी-कीसा सतगुरु उवाच ।
धर्मदास मैं कहु न छिपाऊँ । तुमको सकलहि भेद बताऊँ ॥
प्रथमहि समरथ आप हते, दूसरो कोई न हुए । तब समरथके
मुखते, सहजहि सुरति भये ॥ सोह सुरति स्वरूप धरि सहजहि
बुन्ददयो । तेहिते सहजहि सुरतिका सहज अंकूर भयो ॥ तेहि
अंकुरते सप्त करि भए ॥ दूसरे समर्थके अंशते क्षमास्वरूप सुरति
भये ॥ तब स्वाती सरूप बूँद दियो जौन कारन सुनो ॥ जैसो
सांचो तैसो स्वरूप जैसो घात तैसो अनूप ॥ एतो ठेका बँधे
जब भयऊ इच्छासात । ७ ) अंड पांच ( २ ) चारी अंड एक
सिद्धके ॥ ४ ॥ १ ॥ चारों स्वरूप भिन्न भिन्न हैं ॥ पांचो अण्ड
प्रचण्ड भयो । दोउ करीमें अण्ड ना भयो ॥
ताहिकरीमें दो अंशहते । एक करीमें अक्षर हतो एक करीमें माया
हती । एहि मता अवगति हतो । आगे तिसरी सुरतिको लेखासु-
नो अविवगति सुरत अशून्य । तीसरी सुरतिका लेखा सो सुरति सखन
उपजाई । तेहिको नाम मूल सुरति है ताह सुरतिको अंगल बूँद
दीन्हाँ तेहि पांच ब्रह्म भये तिनको आज्ञा दर्ई एक एक ब्रह्म
एक एक अंडन में आए, एते ब्रह्मते पांच अंश भये । तेही तत्त्वके
घर भये । अण्ड फूटो पांच तत्त्व प्रगट भये । ६ । चौथी सुरती
श्वासाते भये । ४ । तेहिको नामसोहं दियो । तेहिसोहंके ओहं बुद
कन्हहाँ तेहिमें आठ अंस भये । सो एती रचना चारिकीरति कियो
बोधसागर
( ११९ )
प्रथम अंगते भए आगे सब निकास कई । सात इच्छा सातहीं अंश । अनइच्छाते आठों अंश भए । आठवाँ अंश भए । ते लोक भयो सर्व सृष्टिका संहार करे ।
बीजक सारकी साखी-कहैं कबीर ।
सात इच्छाके सात अंश भए, अपने अपने भाव ।
आठवा अंश विन इच्छा उपजै, ताको धर्म लखाव ॥
धर्मदास उवाच-एह धर्मदास ने पूछी ।
आहो साहेब काहेते समर्थ कहत हैं ? काहेते अचिन्त कहत हैं ॥
काहेते अक्षर कहत हैं ? काहेते जोगमाया कहत हैं ॥
काहेते कल कहत हैं ? इतना भेद कहो समुझाई ॥
भिन्न गुरु देह बताई । एहिकी शास्त्र गुरु कहैं ॥
सुनो धर्मदास तखतके धनी । तासो समर्थ कहत हैं ॥
तिनते आठ अंश भए । आठमें जेठ अचिन्त भये ॥
तिनके चिन्ता नाहीं । ताहिते अचिन्त कहाये ॥
तिनके प्रेम सुरति भई । तेहि प्रेममें अक्षर आनिसमानो ॥
तब मोह तत्व उपज्यो । तेहि मोहते चार अंश भए ॥
तेहिते चौरासी लक्ष्य जोनी भई । ८४००००० । तेहिते अक्षर ॥
कहाये । अब कैलकी हकी कत सुनो । तब अक्षरके मोहतत्त्व ॥
उपज्यो तेहि कारणते कैल भयो । मनसाते बुन्द पैदा कियो ॥
सो जहाँ अक्षर बैठो हतो । तहाँ जल तत्त्व हतो ॥
तेहि जलमें एक बुन्द आनिपडो । तेहि बुन्दते एते एक अंड भयो ॥
तब अक्षरने देखा उठिके । तब अण्ड लंगि आयो ॥
एक हकीकत लिखी हती । अंडके मुख ऊपर छाप हतो ॥
कहैं सृष्टिकी रचना करौ । और एक अंश हम पठायो है ॥
सो तुमते दूसरी करी है । सो तुम जिन पतियावो । जहाँ लंगि
( १२० )
कबीरबानी
आवै तहां लगि जिन रोको । आवने दीजो जिन काहु भेद ॥
बतावो । आगे सत्रासौ तीस हजारा युग कैल युगका प्रमाण है ॥
युग सो भुगति लेहे तेहि पीछे । हमारी आठै सुरती आई है ॥
तब हमारो महातम होई है । तब कालसों जीव छुड़ाई है ॥
तब कैलको महातम घटि जैहै । एती सनद अक्षर भेदकी ॥
साखी-कहैं कबीर
सात इच्छाके सात अंश भए, सातहि सुरति प्रकार ।
अन इच्छाते कैल भए, जीवको करै अहार ॥
चौपाई-धर्मदास उवाच
धर्मदास जिव शंका आई । उठि सदगुरुसों विनती लाई ॥
धन्य भाग्य मोहि मिले गुसाई । अपना करि मोहि लीन्ह मुक्ताई ॥
इच्छा सातके समरथ कर्ता । अत इच्छा वहां कहांते बरता ॥
सो निजु भेद बतावो मोही । इह सनद गुरु पूछौ तोही ॥
सात करी अंकुर बन्धाना । सात इच्छा तेहि माँहि समाना ॥
सात सुरतिमें थांका राखा । सात अंश तहां बोली भाखा ॥
आठवाँ अंश वह कहाते आवा । कौन भाँति वो अंश निमाँवा ॥
साखी-अविगति भेदकी धर्मदास पूछे ॥
अविगतिकी गति सब कहो, मैं बलिहारी जाऊँ ।
मेटि अँदेशा जीवका, पल पल परसो पाऊँ ॥
चौपाई-सदगुरु कबीर उवाच
कहैं कबीर सुनो धर्मदासा । वहिसमर्थ गति अजब तमासा ॥
इतना तत्त्व जिन पूछौ भाई । और सकल शब्द देहों बताई ॥
इच्छा सात शक्ति उत्पानी । स्वाति सनेह भए परमानी ॥
एक अंकुरते सब कछु कीन्हां । सब भण्डार तिहि माहे दीन्हां ॥
तिहि अंकुरकी सात भै करी । सात इच्छा तेहि माँहि लै धरी ॥
बोधसागर
( १२१ )
सेहजंकर तिह नाम कहाई । सात सुरैति तिहि मांहि रहाई॥
टेकाज्ञान कहतहों भाई । जेहि सुनि हंमा लोके जाई ॥
धर्मदास सुनिये चितलाई । यहि कलसा सब ज्ञानके भाई ॥
बीजक ज्ञान सब कहूँ निशानी । तेहिपर बीजक निश्चय ठानी ॥
सात करीके निर्णय सुनिहौ । बिना भेद तुम कछु न गुनिहौ ॥
भेदमें भेद हम राखौ गोई । सो पर सून्य लखो ना कोई ॥
इच्छा सीप स्वरूप उतपानी । सोवाती स्नेह भये परसानी ॥
बुंद एक आनंद स्वरूपी । इच्छा सात भये भिन्न स्वरूपी ॥
इच्छा सात रुचि अपने भाई । तेहि प्रमान बुंद तिन्ह पाई ॥
तेहिते पाँच अंड निर्माई । दोए करी तहाँ गुप्त छिपाई ॥
तेहिमें गुप्त अंश रहे वासा । प्रथम करीने बुंद निवासा ॥
तेज अण्ड तहाँ भयो प्रकाशा । तेहिमें सब है जीव निवासा ॥
इच्छाके नाम
मुख्य इच्छा तेहि इच्छाको नामा । आदि बुंद तिहि बुन्दको धामा ॥
दूसरी इच्छा नेत्र भरी हरे । सुकृत अण्ड भए तेहि केरे ॥
नेत्र इच्छाते नेत्र बुन्द पावा । तेहिमें सुकृत अंश निरमावा ॥
तिसरी इच्छा अविगत बानी । श्रवण इच्छामें आनि समानी ॥
श्रवन बुन्द अंश तिन्ह लीन्हा । अबोलनाम तेहि बुन्दको दीन्हा ॥
चौथे अण्डमें सत्य पसारा । चौथी इच्छा सो वास उच्चार ॥
स्वाती इच्छा तेहि करिको नामा । स्वाती बुन्द स्वाति सब धामा ॥
स्वतिते क्षमा अण्ड निरमाई । अण्ड पाँचमों कहुँ समुझाई ॥
पाँचही इच्छा निमिष ठेहेराई । करा एकमें जीवन पराई ॥
स्वाति प्रसन इच्छा उपजाई । जलहि अंड तहाँ उपज्यो भाई ॥
पाँच इच्छाके पाँच अण्ड निरमाई । दोये इच्छा वेही गुप्त रहाई ॥
छठि इच्छा है करता भाई । करति बुन्द तेहि मांहि समाई ॥
( १२२ )
कबीरबानी
सातें इच्छा सर्वत्र रहाई । सात बुन्द सब कला है भाई ॥
सातों इच्छा के करता अंकूला । सात करी सब दृष्टिको मूला ॥
तिनके सोरा अंश प्रमाना । एक वचनके सबही बंधाना ॥
आनंद बुन्द है सदा समीपा । तेहि अंकुरको भिन्न है दीपा ॥
एक सुरति एक अंकुर कहाई । तिहिको नाम सहजश्रुति भाई ॥
सात करी मो थाका बनाई । ताकी गतिमति काहु न पाई ॥
दो सुरति इच्छांकुर निर्माई । आठ इच्छा तेहि माँहि उपजाई ॥
सात इच्छा करि सात समानी । आठमी इच्छा काल उत्पानी ॥
तिसरी सुरति मूल प्रकाशा । मूलकीर्ति मूलअंकुर निवासा ॥
सुरतिमूल तिहि माँहि समानी । पांच ब्रह्म तहाँ भये उत्पानी ॥
सहजब्रह्मके पांचतत्त्व भये भाई । तरव सनेही सर्व उत्पन्न आई ॥
दुसरी इच्छा ब्रह्मको चीन्हा । सुकृत चिन्ह उत्पन्न कीन्हा ॥
तिसरो ब्रह्म मूल परवानी । मूल सुरति सब सृष्टि उत्पानी ॥
चौथे सोहं ब्रह्म कहावा । तेहि अण्डमों सर्व समावा ॥
पाँचों ब्रह्म जलाहल भयऊ । चौदह अंश गुप्त निर्मयऊ ॥
तीनि सुरतिकी एती रचना । चौथे सोहं कठे अमृत बचना ॥
सुरति अभयबुन्द तिन्ह पावा । तेहमें आठ अंस निरमावा ॥
चार गुप्त चार प्रगट पसारा । आपसहूपमिल आठों अमी अपारा ॥
तिनके भिन्न भिन्न परमाना । चार अंश भये सृष्टि बंधाना ॥
चार अंश भये मुक्त प्रमाना । तिन्हको भेद न काहु जाना ॥
अंशाहि अंश काहु नहीं देखा । शब्द स्वरूपी सबको पेखा ॥
तेहिके सनद अब कहां समुझाई । जेष्ठो अंश अचित्त है भाई ॥
तिनके प्रेम सुरति घट आई । तेहि प्रेममें मोह समाई ॥
तेहि मोहमें अक्षर उत्पानी । अक्षर जारि वेद सहेदानी ॥
अक्षर तेहि ते चारे भये दीपा । चार अंशने रहे समीपा ॥