कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
भासगुञ्जार
( ७ )
एक पाँवते सेवा करहीं । पुरुष वचन शीशपर धरहीं ॥
सेवा करति रही लौलीना । पुरुषलोकते होहि ना मीना ॥
समय-सोरह सुतकी एक मूला, एकते एक अधीन ।
कर जोर सेवा करें, प्रेमभक्त लौलीन ॥
चौपाई
सेवा करत बहु दिन गयऊ । पुरुष अवाज अधरधुनि भयऊ ॥
अर्ध अवाज भई जब बानी । निकसी अगर बासकी खानी ॥
सबतर लोक द्वीप रहि छाई । बिमलवास भरपूरि रहाई ॥
अगर वास सब हंसन पाई । निर्मलवास सदा सुखदाई ॥
पीअत अमृत सब अघाने । आपु आपु पुर सबै सिधाने ॥
धर्मराय सेवा अधिकाने । सो सब तोहि कहौं सहिदाने ॥
छलके वचनपुरुष सो लीन्हौं । पाछे दूंद लोक महाँ कीन्हौं ॥
समय-और सबै सुत बैठे, अपने अपने स्थान ।
धरमरोष सबते कियो, ठाँम ठाँम विगरान ॥
धर्मदास वचन-चौपाई
धर्मदास बिनवैं करजोरी । साहव मेटेहु संशय मोरी ॥
और सब सुत अछप छिपाने । धर्मराय कैसे विगराने ॥
कैसे और सब सुत सब भारी । धर्मराय कैसे भये विकारी ॥
सतगुरु वचन
धर्मदास सुनहुँ चितलाई । कहौं सैंदेश आदि समझाई ॥
जब प्रकटे प्रभु अमर तारा । निकसी अघर निरक्षर धारा ॥
भई अवाज अधरसे बानी । निकसी अगर बासकी खानी ॥
पारस परिमल महक बसाई । सोई परिमल सुरति दुराई ॥
( ८ )
बोधसागर
अगर छिपाय आप महाराखा । सुरति स्नेह मुख प्रकटी भारखा ॥
प्रथम पुरुष मुख भाषा आई । भाषा अग्र पारस निरमाई ॥
भाषा बचन भया अधिकारा । भाषहिते भा सकल विस्तारा ॥
भाषा वचन पुरुष उच्चार । सो सब सत्यलोक व्यवहारा ॥
भाषा बोल पुरुष उच्चार । सेवहु सत्यलोकके द्वारा ॥
श्वासा सार तार जोरि आना । अधर अमान ध्वजा फहराना ॥
भाषा स्वर बानी अनुमाना । श्वास सार तार जुरि आना ॥
निमिष माहिं अनेक संचारा । बचन समान श्वास गुञ्जारा ॥
नाव स्नेह शब्द मैञ्जारा । (बचन समान श्वास गुञ्जारा) ॥
श्वासा नेह देह भई जबहीं । भाषा सहज बचन भा तबहीं ॥
आगेकी उत्पत्ति प्रकार
प्रथम श्वासकी निकसी खानी । उपजे सुत सुकृत सम आनी ॥
निमिषनेह प्रसन्न सुधारै । नाममूल टकसार उचारै ॥
भो विस्तार निमेश एक गयऊ । " " " " ॥
मूलगुप्त मस्तक नहिं देखा । आदि नाम अमरघर लेखा ॥
पेड़के गहे मूल धनु गाजा । सोई मूल फूल फल लागा ॥
पेड़हिं गये मूल औ शाखा । मूल मिले तबहि रचि शाखा ॥
गुप्त मूलते प्रकटी शाखा । पल्लव मूल पड़ै गहि राखा ॥
पेड़ देखि पल्लव फैलावै । पल्लव फैले अन्त नहिं पावै ॥
पल्लव चढ़े पेड़ चित राखा । मिले मूल तब फलरस चाखा ॥
आदि अन्त दुइ पेड़ समाना । आपहि राखा आप पहिचान ॥
जागि सुरति पुनि पेड़ निहारा । फलरसि चाखी बीजगहि डारा ॥
बीजाते सोई फल होई । फल रस लेह मूल तजि छाई ॥
जागि सुरति सपन मिट गयेऊ । दुई चितमेटि एकचित भयेऊ ॥
श्वासगुप्कार
( ९ )
दूजी श्वासा प्रभुकी देहा । उपजे सहज सुख नेहा ॥
तिसरी श्वासा फूल सनेही । जाते भई हमारी देही ॥
देह माँहि द्वे रहे विदेही । देह मन भये ज्ञान रस देही ॥
कायामे काया रही वासा । सब चौथी श्वासा परकाशा ॥
काया अविहर अविहर वासा । " " "
चौथी श्वासा निकरे चाहा । तब चिंता उपजी मनमाहा ॥
चिंता प्रकट भई दिल जबहीं । आपते आप भुलाने तबहीं ॥
आपु शरीर आपु तब झाका । विमलप्रकाशउदित तन ताका ॥
कायारूप भई उजियारी । निर्मलदेह विमल तन भारी ॥
विमल प्रकाश कीर्ती जब देखा । वर्णत बने न ताकर लेखा ॥
विमल प्रकाश किरण जब देखा । " " "
कला अनंत अंत नहीं पावे । बरणत जिह्वा लक्षण आवै ॥
देखत रूप लीला अधिकारा । आप आपनपौ कीन्ह विचारा ॥
कमलकरि महाँ भा उजियारा । देखा आदि अंत विस्तारा ॥
आपु बरन सब देखा जबहीं । दुविधा रूप झाँई भइ तबहीं ॥
कमल झांकी प्रभु देखा जबहीं । हमरे रूपको दो सर अबहीं ॥
इतना कहत बार नहीं लाये । निकसि कमलते बाहर आये ॥
छोँडी कमल प्रभु भये निनारा । तबहीं कमल भया अंधियारा ॥
कमल झाँकि देख्यो सबन्यारा । भये तिमिर तनतेज अपारा ॥
अँधकार प्रभु देखा जबहीं । काया ज्योति मलिन भइ तबहीं ॥
निमिषि एकम संशय आवै । निमिषि एक आनंद जानावै ॥
विस्मय हर्ष दोउ एक ठाऊँ । एक पुरुषकर दोउ सुभाऊँ ॥
आपुते आय भया अतिचारा । तेहि अवसर प्रभु वचन उचारा ॥
उठि अब जो शब्द सतभाऊ । कमलमध्ये कस शून्य रहाऊ ॥
घटही वचन पुरुष संधाना । तब चौथी श्वासा बंधाना ॥
( १० )
बोधसागर
तेज पूँज भौ गर्भ शरीरा । फूँकी नालदेखा बल वीरा ॥
कमल नाल धरि फूँका जबही । चौथी श्वासा निकसी तबही ॥
फूँका कमल तेजके नेहा । चला प्रसेव पुरुषकी देहा ॥
फूँकत कमल बार नहिँ लागा । भयउजियार तिमिर सब भागा ॥
कारण काल पट यहँ धोका । दुई चित मूल तेजमह रोका ॥
चौथी श्वासा विषयी सनेही । मोह विकार धर्मकी देही ॥
मोह विकार तिमिर अधिकारा । ता सँग भयउ धर्म औतारा ॥
तिसरी श्वासा गुप्तहि राखा । तासो जोर निरञ्जन भाखा ॥
फूँकत कमल तेज गरि गयऊ । तेहितेकाल ज्योति धरि भयऊ ॥
महा बलि देह धरिके बैठा । जानो धर्महीं हौ जेठा ॥
तेज लगन श्वासा अनुसारा । ताते धर्मराय बरियारा ॥
तेजतिमिर संग शून्य निवासा । सबतर भयो काल परकाशा ॥
समय-आसा धरे बहुत दिन बीते, प्रेम भक्ति लौलीन ।
आश धरे बहुतयुग गये, भक्तिभाव आधीन ॥
(ज्योति तहाँ लगिज्वालतेभाखा । तेहि ते नाम निरञ्जन राखा) ॥
निराकार आकार धराये । जोति काल बहुनाम कहाये ॥
चौदह द्वार काल जो भाखै । सुनि सो सबै नाम मन राखै ॥
सांकित अण्ड भयो प्रचंडा । फूटत अण्ड भयो बहु खण्डा ॥
चौदह बुन्द अमि ढरि गयऊ । चौदह अंश ताहिते भयऊ ॥
चौदह पौरिया ढरि बैठारा । इन चौदह बहु ज्ञानपसारा ॥
आपसमान सबै रचि राखे । चौदह कोटि ज्ञान तिन भाखे ॥
चौदह अंस धरम तहाँ पाये । ते चौदह विद्या तहाँ पाये ॥
वही चौदह अगम अपारा । तापर काल धरम बटपारा ॥
धरम समाधि चितही यमधारा । चौदह मोह को तनवारा ॥
शवासुखार
( ११ )
ताकी कला कहै को पारा । जेहिके सुतकोटिन उजियारा ॥
कोटिन कला करै बहु भारी । आपहि पुरुष आपही नारी ॥
आपहि वेद आपही वानी । आपहि कोटिन ज्ञानवरखानी ॥
आप अजर आवै गाह कहावै । मूल नाम गहि धोख लगावै ॥
नाना ज्ञान कथे बहु वानी । प्रकटचोआदि आपगुणजानी ॥
कहैं लगि कहो ज्ञानके भाऊ । बहुत काल बहु नाम धराऊ ॥
सुरति सरोतर जागे नाहीं । मनपथ पवन चञ्चला ताहीं ॥
एक पाव सन्मुख खडे, कर जोरे लौलीन ।
एक पाव सन्मुख खडे, कर जोरे आधीन ॥
धर्मदास वचन—चौपाई
धर्मदास विनवै चितलाई । समरथ मोहि कहो समुझाई ॥
(धरमदास विनवहि कर जोरी । दया करो प्रभु बन्दी छोरी ॥
धर्मराइ उत्पति जस पाई । " " " " ॥
ऊपजै तस भये कसाई । उपज्यो चित चंचल दुखदाई ॥
पुरुष तेज सम शून्य संचारा । ता संग भया धर्म औतारा ॥
शील विकार सहित तन पाई । प्रथमें भक्ति दूजे अन्याई ॥
भक्ति कियसिजब रहा अकेला । अघके संग भया अपेला ॥
सो अघ उन कैसे पाई । केहि विधिपुरुषताहिनिरमाई ॥
साहब कहौ भेद समुझाई । कैसे कन्या पुरुष बनाई ॥
कैसे धर्मराय तेहि पाई । तौन भेद तुम कहो गुसाई ॥
कहौ बिचारि दोऊ कर भाऊ । दुइ कर जोरिके वन्दो पाऊ ॥
सतगुरु वचन
धर्मदास मैं तुम्हे लखावो । आदि अन्त सब भेदबताओ ॥
चौथी श्वासा संग अधिकारी । शून्यते जग भये उजियारी ॥
पुरुष कमलपर बैठे आई । गई गर्म उपजी शितलाई ॥
( १२ )
बोधसागर
पुरुष कमलपर बैठे जबहीं । परिमल उदित भयातन तबही ॥
शीतल पवन सोहावन खानी । मूल कमलपर आसन ठानी ॥
सिंहासनपर सत्य विराजे । पार सनेह देह महाँ गाजे ॥
पारस तेज भया तन माही । पैंचई श्वासा उपजी ताही ॥
उपजन श्वासा देह निहारा । तन पसेव भइ मैल निनारा ॥
कायां मैल पुरुष जब जाना । मीजी मैल अबला बलठाना ॥
गण्ड तेज भा अबल शरीरा । पाछै भई स्वास गंभीरा ॥
तेहि स्वासा संग पारस भारी । कायाते मथि मैल निकारी ॥
तनते मैल काठि प्रभु लीन्हा । सोई मैल रचि पुत्री कीन्हा ॥
करी पुत्री कर ऊपर लीन्हा । उपज्यो प्रेम सहजको चीन्हा ॥
भई पुत्री प्रभु देखा जबहीं । सुरति कीन्ह पारसके तबहीं ॥
निर्मल पारस श्वासा पाँचा । रहा सँभारा मैलकी बाँचा ॥
आप मैलते श्वासा कीन्हाँ । ता ऊपर बहुरंग जो दीन्हाँ ॥
देके रंग बरन सब फेरा । भीतर मैल मोह मद घेरा ॥
ऊपर शोभा रंग बनावा । भीतर लाल रंग तेहि छावा ॥
पांच अमीकर पांच सुभाऊ । पाँचतत्त्व तेहि संग बनाऊ ॥
पांच अमीते पुरुष शरीरा । ताते पांच तत्व भए धीरा ॥
पांच अमी ते तत्व बनावा । पांच अमी तेहिसंगनिरमावा ॥
पांच तत्व पांचो व्यवहारा । तेहिते भयउ सकल विस्तारा ॥
पुरुष मेलते पुत्री कीन्हाँ । पांच तत्व तेहि भीतर दीन्हाँ ॥
आप सुरती ते पुत्री कीन्हाँ । " " " " ॥
भीतर बाहर तत्व पसारा । पांचों तत्व रंग अधिकारा ॥
पांच रंग तत्वकी धारा । चौथ तत्व रंग बहु धारा ॥
पांच तत्व पांचों रंग भारी । पांचों रंगते कला पसारी ॥
तत्व रंगते लीला धारी । पांच तत्व पांचों रंग धारी ॥
श्वासगुआर
( १३ )
तत्त्व रंग बहु लीला धारी । पुत्री बहुत विचित्र संवारी ॥
तासु कला अनंत पसारी । ताते बहुत भई विस्तारी ॥
वरणि न जाय रूप उजियारी । सुन धर्मनि मैं कहौं विचारी ॥
काल अनंत प्रभु पुत्री कीन्हा । पारस सार ताहि मैं दीन्हा ॥
उत्पति पारस पुत्री पावा । प्रकटी कला अनंत सुभावा ॥
नखशिख देहसुधा प्रभु कीन्हा । पैचई श्वासा भीतर दीन्हा ॥
जब थासा काया मैंह आई । प्रकटी ज्योति जगामग झाई ॥
अजब अङ्ग बना बहु रंगा । पारस सार ताहि के संग ॥
निर्मल उदित ताहि सो दंता । चमकै बिछुली कला अनंता ॥
तत्त्व रंगकी उठै तरंगा । शोभा विशद मनोहर संग ॥
पैचई श्वास जब बाहर कीन्हा । उत्पन पारस ता संग दीन्हा ॥
श्वासा परस मिलि भये एका । शोभा वरन रूप रस ठेका ॥
उपजी कन्या कला अपारा । रूप अनूप भया उजियारा ॥
जब कन्याप्रभु उत्पन कीन्हा । पाँचो श्वासा तासङ्ग दीन्हा ॥
ता श्वासामह पारस भारी । पांचतत्त्व सङ्ग देह सँवारी ॥
उपजी कन्या अगम स्वभावा । अष्टांगी कहि पुरुष बुलावा ॥
आठों अङ्ग बना निरवाना । शोभा सुरति रूप सुख साना ॥
जब कन्या प्रभु देखा हेरी । कला अनंत रूपकी ढेरी ॥
देखि रूप चितहर्षित कीन्हा । उत्पति पारस ता संग दीन्हा ॥
जाने शब्द मूल रहि वासा । सुरतिनिरतिकीन्हातहां पासा ॥
पुरुष रचा जब आपु शरीरा । उपजी सुरति निरति गंभीरा ॥
कायाके दलके व्यवहारा । जो चाही सो सबही सुधारा ॥
दहिने अंग तेज कर दाऊ । बाये शीतल सबै सुधाऊ ॥
मध्यम पुरुष सुरति अंकुरा । ताहि सुरति संग पारस पूरा ॥
ताही दिन तीनों गुण ठयऊ । इंगलापिंगला सुखमनकियऊ ॥
( १४ )
बोधसागर
तीनों घर कर तीन सुभाऊ । शीतल तेज सत्यकर भाऊ ॥
अमी अग्रभा तेज शरीरा । उपजे चंद्र सूर दोऊ वीरा ॥
अग्रतेज औ सत्य सुरंगा । तीन शक्ति उपजी तेहि संगा ॥
कला अनंता शक्तिके पास। लीला बहुत विचित्र प्रकाशा ॥
तिनहु संग अहै द्वौ वीरा । इक शीतल इक तेज शरीरा ॥
तीनों शक्ति अंग दोउ वीरा । काया मथिकथि कहै कबीरा ॥
अभयहि शक्ति है चन्द्र सनेहा । ईगला नारी संग उरेहा ॥
उलँगनी शक्ति रहे सुख मरना । चैतन शक्ती सूर्य प्रमाना ॥
सबसे मध्य जहाँ सुरति तरंगा । सुरति निरति कायाके संगा ॥
नख शिख ज्योति विराजे अंगा । शोभा विशद मनोहर संगा ॥
पांचतत्व तिया शक्ती राजै । ताहि सङ्क दोय वीर विराजै ॥
तत्वरैंग शक्ती न घर कीन्हौ । तेहि मई उपजनि पारस दीन्हौ ॥
उपजनि पारस भा परसंगा । उपजी ज्योति कला बहुरैंगा ॥
पैचई श्वासा देह समाई । उपजी रूपकला अधिकार्ई ॥
जागी देह अखंडित अंगा । शोभित भई कला प्रसैंगा ॥
उपजनि अँश पुरुषके संग। भाखों भेद कला बहु रैंगा ॥
जब कायामो आई श्वासा । जागि ज्योति पुहुप प्रकाशा ॥
उपजा रूप अखंडित बानी । बोले बचन पुहुपकी खानी ॥
मधुर बचन और लीला धारी । देखि रूप तब पुरुष दुलारी ॥
हुये मधुर पुनि लीला धारी । वचनरूप लखि आप दुलारी ॥
समय-पांचतत्त्वतिये शक्ती संग, चन्द्र सूर्य दोऊ वीर ।
तीनों घर श्वासा रमें, बाहर भीतर तीर ॥
चौपाई
उपजी रूप रंग की खानी । बोले अमी विरहकी बानी ॥
उपजी कन्या कला अनूपा । पुरुष उत्पन औ पुरुष स्वरूपा ॥
श्वसगुञ्जार
( १५ )
जेहि पारस सब उत्पत्ति कीन्हों । सो पारस कन्या कहैं दीन्हा ॥
पारस हाथ महा बल जाना । तब कन्या कहभा अभिमाना ॥
उपजा रंग रोस गंभीरा । बैठी अमी सरोवर तीरा ॥
यहि विधि सोरह सुतनिरमाया । भिन्न भिन्न अस्थान बनाया ॥
जेहिको जेता तन विस्तारा । तेहिको तैसा लोक सुधारा ॥
काहुको लोक सत्ताइस दीन्हों । काहुको सात पांचदशचीन्हों ॥
काहु चौदह काहु बीशा । काहु सत्रह काहु उनीशा ॥
काहुके बारह पन्द्रह तीसा । काहु इकइस बाइस चौबीसा ॥
काहु छतीस बतीसहि भारी । दीन्हों वास भये अधिकारी ॥
सब कह दीन्हों लोक बनाई । आपु रहे प्रभु अच्छप छिपाई ॥
उत्पनि पारस पुत्रिहि दीन्हा । सौपेछ तेज धर्म सों लीना ॥
ताते धर्म भये बली बंड़ा । बैठो सात द्वीप नौ खंड़ा ॥
जिहि विधि रचनापुरुष बनाई । तैसी कला धर्म निरभाई ॥
रचना रचि मनमें पछिताई । शून्य शरीर जीव कहैं पाई ॥
जीवन बिना जीव नहीं होई । रचि अस्थल बैठो सुख गोई ॥
जेहि विधि रचनापुरुषदिकीन्हों । तैसहि धर्म रचा सब चीन्हों ॥
पुरुष समान रची अस्थाना । बैठि शून्यमें करे अनुमाना ॥
जेहि पारस प्रभु लोक बनाया । सो पारथ प्रभु कहाँ छुपाया ॥
सो पारस अब कहवाँ पाऊँ । जेहि पारसते जिव निरमाऊँ ॥
हेरत पारस आये तहवाँ । बैठि सरोवर कामिनि जहवाँ ॥
कामिनि धर्म भये एक ठाँऊ । अंकमिलाय कीन्हबहु भाऊ ॥
शील रंग रस कीन्ह मिलापा । धर्म रोष हो कीन्ह विलापा ॥
कौर विलाप कला बहु भारी । सुख चतुराई हृदय विकारी ॥
कामिनसों कीन्हों व्यवहारा । उपजा रंग रूप रसधारा ॥
धर्म कहैं कामिनिसो बाता । गहे अंग चमकावै गाता ॥
( १६ )
बोधसागर
कामिनि देह कामकी खानी । बोले मधुर विरहकी बानी ॥
उपजा मोह महा मद भारी । कामिनि कामकला अनुसारी ॥
देखि कला अनुसार भुलाना । व्याकुल भये रंग अभिमाना ॥
कामिनि देखि धर्म अकुलाना । उपजा रंग रोष अभिमाना ॥
धर्म कहे कामिनि सों बानी । तोंरे है पारस सहिदानी ॥
सो पारस अब तुमरे पास । जाते पूजे मनकी आसा ॥
सो पारस देहू मोरे हाथा । तुमहू रहो हमारे साथा ॥
धर्मराय जब कही कुवानी । तब कामिनि चितशंकाआनी ॥
कामिनि कहै धर्मसों बानी । काहे धर्म होउ अज्ञानी ॥
हम तुम एक पुरुषकर कीन्हों । तुमकहँदीन्हसोहमहुकोदीन्हों ॥
हम लहुरे तुम जेठे भाई । हमसों कहा करहु अधिकाई ॥
” ” ” । एकै नाल कुमारग वानी ॥
वहनिहिं भाइहि होत कुवानी । आगे चलिहै यहि सहिदानी ॥
जब कामिनि कही असबानी । धर्मराय चित दुविधा आनी ॥
कामिनि चलहु हमारे देशा । कहा करहु मानहु उपदेशा ॥
छल बल करि अपने पुरलावा । तहाँ आनिकै रारि बढ़ावा ॥
धर्मराय कामिनसों बोला । शोभा सुरति अमीरस डोला ॥
निरखि नैन कामिनिसों बोले । शक्ति अधीन बैन बहु खोले ॥
सोलह शशि कला शशि पूरी । तीनों शक्ति कर छूरी ॥
नैन निरखि मूर्ति होय झांके । तत्व निःतत्व आप तनताके ॥
विधि लैलाइवधिकविधि बोले । निरखत अंग २ तनु डोले ॥
अंतरगति विधिविधिहिमनायो । कुमति हाथपरसाजनिआयो ॥
विधि वर दीन्ह बुन्दचुक आई । चितमकार एक रच्यो उपाई ॥
यहि पुर एक अचंभो ठयऊ । पारसको सुप्रताप जनयऊ ॥
इच्छा रूप हर्ष चित जागी । श्वेत सरोवर वार न लागी ॥
शवासग्रन्थ
( १७ )
भूलयो धरम चितहि अकुलाना । ऐसो सरवर मैं नहि जाना ॥
अक्षयअयूनविधि पारसयामा । कहा अचम्भो आनितुलाना ॥
देखो तेहि पारसको चीन्हौं । जेहिते मानसरोवर कीन्हौं ॥
शूर मलीन उदय शशि जोना । बानी बरन अंग तुअलोना ॥
जादिन पुरुष रचा तुअदेहा । तादिन मोहिं तोहिं जुरासनेहा ॥
मोहिं कारण तोहिं पुरुष बनावा । तू कुलमोते अंग छिपावा ॥
तोहि कारण मैं रचना कीन्हौं । रचिकेखानितोहि चित दीन्हौं ॥
" " " मोहि कारण तोहिं रचना कीन्हौं ॥
देहनात हमरे घर नाहीं । हम तुम रहे एक घर माहीं ॥
उत्पति पारस तुमरे पास । जाते पूजे मनकी आसा ॥
देह सबै हम रचा बनाई । पारस दै तुम लेहु जियाई ॥
हम तुम खानि रची बहु बानी । जाते होय ना एकौ हानी ॥
जैसी रचना पुरुष प्रकाशा । तैसी रची लोक रहिवासा ॥
जीव सीव रचि खानि बनाई । जाते ज्योति ज्ञान फैलाई ॥
( जीव रची सब खानि बनाई । जागे ज्योति ज्ञान फैलाई ) ॥
लाज सकुचि औ रची सगाई । बरण बिचारि छूत बिगराई ॥
ठांव ठांव रचि राखी आपा । माता पिता शोक संतापा ॥
भशुर भसुर औ भर्मित भाई । शिवशक्ती रचि पूजा लगाई ॥
" " " हंसन लाज भाव नात वैधाई ॥
रची अचार कपट विस्तारा । तीरथ व्रत प्रतिमा देवहारा ॥
" " " तीरथ व्रत औ नेम अचारा ॥
वेद कितेब धरि फंद सँवारी । रची दीनों वोय पर्वत भाँरी ॥
हुओ दीन हुए राह चलाई । झगर करै रहै अरुझाई ॥
एक एकते रारि बढ़ाई । मुक्तिपंथते रहै भुलाई ॥
दोउ दिन बाँधी मरजादा । रची बाद ममता औ स्वादा ॥
( १८ )
बोधसागर
एहि विधि रची सकल दुनियाई । लोभ मोह लालच बरिआई ॥
रचिकै खानि करिय रजधानी । राज पाठ सिंहासन ठानी ॥
तुम आद्या अरु हम अभिमानी । बारह खण्ड छह लोकके बानी ॥
( तुम अंश हमही अविनाशी । बारह खण्ड छः लोकके बासी ) ॥
पाप पुण्य दोष रची अपारा । जाकहैं सेवै यह संसारा ॥
पाप पुण्य हठ फन्दा होई । जामहैं अरुझि रहै सब कोई ॥
योग ज्ञान व्रत संयम पूजा । सोलहमहीं और नहिं दूजा ॥
रची क्षुधा मायादि विकारा । पुरुष लोकको मूँदिये द्वारा ॥
रची क्रोध माया विकरारा । पुरुष लोकको सुँद्यो द्वारा ॥
पुरुषलोक इहई रचि लीजै । इकछत राज हमहि तुम कीजै ॥
तुमरे, संग है पारस सूर। जाते होय सकल विधि पूरा ॥
जेहि ते लोक पुरुष प्रकाश। सो पारस है तुमरे पास ॥
सो पारस अब हमको देहू। रंग हमारा सबै तुम लेहू ॥
कामिनी कहे वचन बुद्धि धीरा । उपजेहु कालरूप बलवीरा ॥
जो जो वचन कहेउ तुम भाई । सो हमरे चित्त एक न आई ॥
पुरुष लोक कस मुदा दुदयारा । लेउ आप अपने शिरभारा ॥
जो छल हमते कीन्हहु भाई । तैसो छल तुम्ह भुगतहु जाई ॥
पारस कामिनी धरा दुराई । हाथ मले शिर धुनी पछताई ॥
हाथ मिजि छिन छिन पछिताई । कहे कामिनि धर्महि समुझाई ॥
कामिनि कहै कुबुद्धि समझाई । हम तुम चलहुँ पुरुष पहुँ जाई ॥
बकसै पुरुष दयाकरि तोही । शीश नवायके लीन्हसि मोही ॥
विन दीयें बरिआई लेहौं । पुरुष लोक पुनि जाए न पैहौं ॥
कामिनि कहा वचन परवाना । धर्मरायके भयो अभिमाना ॥
कामिनि तोरि बुद्धि है थोरी । अबना जाऊ पुरुषशकी खोरी ॥
पुरुषलोक इहई रचि राखा । रच्यो बिचारि बुद्धि बलभाखा ॥
श्वासगुञ्जार
( १९ )
अब तौ पुरुषप्रास नहिं मोही । गहौं बांहको राखा तोही ॥
तैं कन्या का डहकसि मोही । रचा पुरुष मम कारण तोही ॥
(तैं कामिनि कठोर निर्मोही । ) " " " " " ॥
पहिले वचन विरहते बोली । लागी कठिन कामकी गोली ॥
काम सतावै निश दिन मोही । दे पारसकी लीलहुँ तोही ॥
कामिनि कहै धर्म सुनु बाता । चढि कालिमा तोहरे गाता ॥
इठ निग्रह कामिनि किहु ताही । धर्मराय पकरी तब बाँही ॥
गही बांह कामिनिकी जबही । काम बाण घट व्यापे तबही ॥
धर्मरोष कामिनिपर कीन्हौं । गहिपगर्शासलीलतेहि लीन्हौं ॥
लीलत कामिनि शब्द उचारा । पुरुष २ करि कीन्ह पुकारा ॥
कामिनि पुरुष नामजब लीन्हौं । आज्ञा पुरुष अंशही दीन्हौं ॥
योगजीत आये तेहि वारा । सुर्त बान सो कालहि मारा ॥
पुरुष कोपि ताऊपर कीन्हा । कन्या उगलधर्मतब दीन्हौं ॥
(उगली कन्या बाहेर आई । ) " " " " " ॥
हाहाकार रोषके धावा । कामिनि पारस कहाँ चोरावा ॥
कामिनि कम्प देख विषधारा । पारस मानसरोवर डारा ॥
मानसरोवर झलतै अंगा । गयउ पताल जहाँ जलरंगा ॥
परीक्षा चार पारस परवाना । उपजी चारखान निरवाना ॥
एक परीक्षाते सरबर गयऊ । पारसके सम पारस ठयऊ ॥
दूजो अंश भयो निरवाना । शिला सिंध पर्वत परमाना ॥
रतन शिला ताहिकी धारा । सो पाजी वारे संचारा ॥
तीसर अंश नार प्रगटयऊ । अंशहि अंश चत्रगुन भयऊ ॥
चौथा अंश कामिनिअनुमाना । जाते स्वर्ग नर्क परवाना ॥
अंशहि अंश अंशते मानी । एक प्रती चौगुना उत्पानी ॥
चार २ गुण गुणहि समाना । अंशते अंश चत्र परवाना ॥
( २० )
बोधसागर
पारस मानसरोवर माही । पारस बुद्धि आपही आहीं ॥
पारस कामी न बहुत डुरावे । सुर्त सनेह तहां फिर आवे ॥
पारस अंत नाहे ठहराई । बासरूप कामिनिसंग धाई ॥
कामिन कालपुरुष पद परसे । पारसनीर नेत्र मह दरसे ॥
नैन निरख मूरत अतुरागी । धर्म अंश कामिनितन लागी ॥
पारस अंश चितै नहीं डोले । बहुरि २ कामिनसों बोले ॥
पारस अंशघट रक्षा छपाई । निकसी कन्या बाहर आई ॥
जेहि कारणकामिनि हठ कीना । पारस संग छान सो लीना ॥
उत्पत्ति पारस धर्म तब पावा । कन्या रही ताहिके ठाँवा ॥
जब लगि कन्या भइ सियानी । तब लगि धर्म रची सब खानी ॥
खानि वानी रचि कीन पसारा । बेदवाद बहुमत विस्तारा ॥
दोहा-रचना रची लोककी, शांशि घर रहा समय ।
पुरुष नाम जानै नहीं, ताते लोक न जाय ॥
(रचा रची लोककी, नख सिख रहा समाइ ।)
पुरुष नाम जाने विना, सत्य लोक नहीं जाइ ॥)
चौपाई
पुरुष नाम ज्ञानी जो पावे । लोक दीप पलमौंहि ढहावे ॥
पुरुष नाम जानै नहीं भेदा । रचे खानि चौरासी फन्दा ॥
” ” ” (चित चंचलऔअन्धअभेदा) ॥
दुख सुख सबै रची बहुभांती । जरा मरण पूजा औ पाती ॥
रचि सब खानिबैठि अभिमानी । तब लगि पुत्री भई सयानी ॥
उपजा जोबन रसको भावा । तब कन्या कहँ विरह सतावा ॥
कामिनी कहे धर्मसो बानी । हमतो तुमरे हाथ विकानी ॥
सुर्त डोला एके पारस लीन्हा । मदन भुवङ्गमके वसि कीन्हा ॥
जोबन विरह महामद गाजे । विनु संयोग गर्भ नहीं छाजे ॥
श्वसगुञ्जार
( २१ )
मोह महाञ्जर बरषे लागी । मन समाध कामिनि सों लागी॥
गर्भ किये मा करदी राजा । कामिनि सोह दुहु दिशवाजा ॥
मनसालहर उद मद मन भएउ । काम दहन धन आहुत दयेऊ ॥
उपजा मदन मोह औगाहा । पुत्री पितासों भयउ विवाहा ॥
साखी-बहनीसे बेटी भई, बेटीसों भइ नार ।
नारीसों माता भई, मनसा लहर पसार ॥
चौपाई
बरबस धर्मराय हरलीन्हा । बिन लेखा रजधानी कीन्हा ॥
विषया वेद व्याह जमनाता । चौदह काल संघ उतपाता ॥
चौदह पारस लोक निसानी । शब्द व्याह चौदह यमहानी ॥
मनसा व्याह देव तिषगंधी । हंसना हंस भगत युगबंधी ॥
सुतें हंस घट रचो विदानी । धर्म समाध वसाए आनी ॥
उपजा मदन मोह औगाहा । कन्या पिताहितबभयाविवाहा ॥
(कन्या व्याकुल भई तेहि माहा ।) " " " "
धर्मराजको उपज्यो भावा । कामिनि हृदय हाथ बतलावा ॥
उपजी रंग रोषकी खानी । कामिनि चरण गहो तब जानी ॥
मनसा लहरि ताहि तेह दीन्हा । उपजी तीन लोककर चीन्हा ॥
कामिनि संग करे मुख भारी । उपजा तीनि लोक अधिकारी ॥
तीनहि शक्ति पुरुष संघ दीन्हा । तीनों सुत उपजावे लीन्हा ॥
(पांच तत्त्व तीन गुण चीन्हा ।) " " " "
तीनउ सुत उपजे बहुरंगा । पारस रहा धर्मके संगा ॥
( पारस रहा ताके संगा ।) " " " "
तीनहुँ सुत उपजे अधिकाा । धर्मराय तब भया निरारा ॥
तीनों सुत कहँ दीन्ही भारा । धर्मराय ऊंच भये निरारा ॥
राजपाट कामिनि कहँ दीन्हा । आपन बास शून्यमहँ लीन्हा ॥
( २२ )
बोधसागर
कामिनि दर्श सदा लौ लावै । राज पाट सब कीर्ति बनावै ॥
“ ” ” ( । तीनों सुतको राज सिखावै ) ॥
राज नीति सुत चित्तिहि धरहीं । मनसा ध्यान पिताको करहीं ॥
खोजत खोजत बहु युग गयऊ । पिता पुत्रसों भेट न भयऊ ॥
ध्यान धरत बहुते युग गयऊ । ) ” ” ” ”
कामिनि पुरुष एकसंग रहऊ । सुतकी बात पुरुष सों कहऊ ॥
वहाँकी बात न सुतसों भाखे । करै दुलार सदासँग राखे ॥
इहि विधिबहुतदिवसचलिगयऊ । सुत न खोज पिताकर कियऊ ॥
धरत ध्यान बहुते युग गयऊ । पिताको खोज करत तब भयऊ ॥
मातासों पूछे सुत बाता । पिता हमार कहाँ गये माता ॥
माता कहै सुतन्हसों बानी । पिता तुम्हार हमहुँ नहि जानी ॥
रचना सकल हमहीं होई । हमसो दूसरा और न कोई ॥
रचना सब मोहीते होई । दूसर जान परो नहि कोई ॥
हमही पिता हमही हैं माता । हमही तीनि लोककी दाता ॥
हमहीं छाँडि कोइ दूसर नाही । तुम जो पूछहुँ सो कहँ काहीं ॥
तीन लोक महाँ दूसर नाही । माता कपट करै मन माहीं ॥
तब सुत सोच कीन्ह मनमाहीं । पिताका भेद बतावत नाही ॥
आपु आपु कह सुत सब हूठे । माता वचन कहै सब झूठे ॥
तब माता कहै बचन रिसाई । पिताको दर्श करहु तुम जाई ॥
माता कहै फूल लै धावहु । पिताके शीस परसिके आवहु ॥
पुढुप सामाधि वासले धाओ । पिताके शीस परसिके आओ ॥
चले पुत्र पिताकी आसा । पिता रहे पुत्रनके पास ॥
खोजत बहुत दिवस चलिगयऊ । पिताको दर्श कतहुँ नहि भयऊ ॥
तीनों सुत सो दर्शन भयऊ । ” ” ” ” ॥
पिता निकट सुत दूरि सिधाये । खोजत कतहुँ अन्त नहि पाये ॥
शवासुखार
( २३ )
खोजि थाकि माता पई आए । काहु साँच काहु झूठ सुनाए ॥
ब्रह्महि भाषा झूठ संदेशा । सकुचि वचननहिं कहेवोमहेशा ॥
भाषा विष्णु सत्यकी रेखा । खोजि थाकि पिता नहिं देखा ॥
माता बिहँसि कही तब बानी । ब्रह्मा झूठ झूठ तौ खानी ॥
शिव लजाय शिर नीचे राखा । साँच झूठ एको नहिं भाषा ॥
ताते करहु योग तप जाई । जटा बढाय विश्रुति रमाई ॥
( तुम सुत करो योग तप जाई । शीश जटा तन भवम चढाई ) ॥
लेहु आमण्डल भेषसो कीन्हौ । शिवको थापि भवनी दीन्हा ॥
साखी—जप तप योग समै हठ, आगे ध्यान पसार ।
माना कह्यो क्रोध करि, चतुरमुख अन्ध अहार ॥
मातहि कीन्ह विष्णु पर दाय। मुखहि चूमके कण्ठ लगाया ॥
सत्य वचन सुत बोलेउ बानी । तीनहु लोक करहु रजधानी ॥
शिव ब्रह्मा करिहैं तोर सेवा । गण गन्धर्व ऋषि मुनि देवा ॥
ब्रह्मा मोसों झूठ लगावा । तेहि कारण विधि झूठ कहावा ॥
ब्रह्मा वेद पढ़े बहु भांति । कुकरम कर दिवस औ राती ॥
( विद्या वेद पढ़े बहु भांती । कुकरम करे दिवस औ राती ) ॥
एहि अवगुण गायत्री गार्ई । ब्रह्मा दोष शाप तिन पाई ॥
मृत्यु लोक गो धरे शरीरा । अघ भुगते चौरासी थीरा ॥
गोय होय नारी कल्यारी । अघनिचोए होए पातक भारी ॥
जहाँ लग पुहुप खान परकाशा । निरधिन ठारे तुम्हारो बासा ॥
झूठी बात वेद में निर्माई । च्यार वर्णमें बड़ी बड़ाई ॥
पहिले चारों वरन पुजावै । दक्षिणा कारण गरा कटावै ॥
गरा कटाए करावे पूजा । गायलै सभे ब्रह्मा नहीं दूजा ॥
लए मूँड पडिवो रमाई । ब्राह्मण भए सो काल कसाई ॥
( २४ )
बोधसागर
खाए अखज चले एडाई । जस मडवाको स्थान अघाई ॥
ब्राह्मणहुको झूठी आसा । हरि नहिं भजे न हरिके दासा ॥
कहके बिर ब्रह्मा करोए । उत्तम जन्म पाय जड खोए ॥
जूठी बात वेद निरमाई । चार वर्ण आश्रमहिं दृढ़ाई ॥
ऋषि अगसी सहस्र बखानी । ते ब्रह्माके सुत उतपानी ॥
जेते ऋषि तेते मतधारी । अस्तुति करि हसेब तुम्हारी ॥
ब्रह्मादिक सुनि देव गण भारी । अस्तुति करिहैं विष्णु तुम्हारी ॥
निशिदिन ध्यानपिताकोधरिहो । किंचित ध्यानजोतअनुसरिहो ॥
साखी-विचलि गयउ निजनामको, गहे कुमारग जानि ।
तीनलोकगुण विस्तरेऊ, निरञ्जन आदि भवानि ॥
चौपाई
कहै कबीर सुनौ धर्मदासा । दोऊमिलि यह मत परकाशा ॥
यह सब खेल कामनी कीन्हा । निरञ्जन बास झून्यभी लीन्हा ॥
ज्योति निरंजन ध्यान लखाई । शिव ब्रह्माको भेद सुनाई ॥
सेवहु विष्णु निरञ्जन ध्याना । हे सुत वचन निश्चय मम जाना ॥
ताते ज्ञान अगम फैलाहो । जाते तामस सिद्ध कहा हो ॥
सिद्ध न कामत होइहै भारी । ज्ञान अगम गुण होहि भिखारी ॥
अंश दहन तन तामस भारी । असुरभाव पशु वासु वतारी ॥
मतपा खंड ठगोरी टोना । षट् दर्शन पाखंड खिलोना ॥
यंत्र मन्त्र विखया अधिकारी । अन्तर ध्यान भक्त बुव धारी ॥
तव गुण सहस्र नाम ऊचरिहे । एक अंश चौसठ योगिन होइहे ॥
कर खपरलें मंगल गैहे । यह उपदेश महादेव देहे ॥
( शंकर चिह्न इहै सो पैहैं । ) " " " " ॥
रजशुचि सतगुन दया समानी । असुरहतन भक्तन रजधानी ॥
आगम कहो संघ सुनि लिन्हेउ । जहां जसभावतहांतस कीन्हेउ ॥
शवासुआर
( २५ )
चारि खानि ब्रह्मे निरमाई । चामहि त्वचा लुब्ध लौ लाई ॥
शिवको वरन भेद नहीं होई । क्रोधरूप धरि भेष विगोई ॥
मात विष्णुपर दाया कीन्हौ । पिता दिखाय निकटहि दीन्हौ ॥
(अनुभव दया विष्णु परकीन्हौ । )
पिताको दर्श विष्णु जब पावा । तब माता कह शीश नवावा ॥
माता पिता एक है गयऊ । विष्णु देखि चित हर्षित भयऊ ॥
माता पिता एक मिलि गयऊ । विष्णु समाय जोति महाँगयऊ ॥
तेहि पाछे जग सिरजे लेऊ । ताको वरण सविस्तर कहेऊ ॥
प्रथमें चारि खानि निरमाई । लक्ष चौरासी योनि बनाई ॥
चारि खानिकी चारिउ बानी । उपजी तीनिलोक सहिदानी ॥
चारि खानि रचि कियो पसारा । चारि वरन पाखण्ड सँवारा ॥
(चौदहभुवन करचो विस्तारा । )
लक्ष चौरासी योनी कीन्हौ । चारि खानि महाँ एकही चीन्हौ ॥
लक्ष चौरासी बचन बखाना । चारि खानि जीव एकै साना ॥
रचना रची सखा बहु रंगा । सुर नर मुनि गणका मतरंगा ॥
कामदेवकी कला अंगंगा । पशु पक्षी सुर नर मुनि संगा ॥
कामकला सबही भरमावै । शिव शक्ती संग काम लगावै ॥
उत्पति प्रलय रची अविनाशी । कामिनि काम कालकी फाँशी ॥
कनक कामिनी फन्द बनावा । तेहि फन्दे सबही अरुझावा ॥
कनक कामिनी फंदा कीन्हा । चार खानिमें एकै चीन्हा ॥
नर बानर कीट पतंग सँवारी । सबके सँग करै रखवारी ॥
(नर नारि जत खान सँवारी । सब घट काम करै रखवारी ॥
पशु पक्षी जत कीट पतंगा । रक्षक भक्षक सबके सङ्गा ॥
शवासा सार होय गुआरी । पांचों तत्त्व सँग विस्तारी ॥
पांचों तत्त्व तुरै बल जोरा । तापर चढ़े साहु औ चौरा ॥
( २६ )
बोधसागर
चारिउ खानि होय गुञ्जारा । स्वासा चलै अखंडित धारा ॥
देहदशा जस पुरुष सवारा । तैसी देह रची करतारा ॥
पांच तत्त्व तीनों गुण साजा । आठ काठ पिंजरा उपराजा ॥
( अष्टधातु पिंजरा उपराजा ) ॥
पिंजरामें सुगना एक रहई । वाकी गति मञ्जारी लहई ॥
(यामध्य सुवना एक रहई । दावपरे मैजारी गहई ) ॥
सुगना पढ़ै दिवस औ राती । रक्षक पिंजरा ऊपर सँघाती ॥
रक्षक भक्षक सङ्ग रहावै । सदा पढ़ावै घात लगावै ॥
) एक घातक एक सुआ पढ़ावै ॥
जस सुअना पिंजरा महाँ गहई । ऐसो देह प्राण दुख सहई ॥
नख सिख रचाकाल फुलवारी । फूली वास कुबास सवारी ॥
कनक कामिनी काल बनाई । चारि खानि महाँ रहा समाई ॥
कामिनि काम सँवारे जानी । चारिउ बखानि रहा विकशानी ॥
चारि खानि महाँ श्याम अमाना । काल कुटिल तेहि माहि समाना ॥
काल कलाकी खानि बनाई । शिव शक्ती महाँ रहा समाई ॥
(दया क्षमाकी खानि बनाई । नर नारि महाँ रहा समाई ) ॥
सुरनर मुनि सबही कह डहकै । चारिखानि सबके घट महकै ॥
चारिखानिकी सब उत्पानी । जेतिक तीन कोक सहिदानी ॥
तीन लोक श्वासा विस्तारा । स्वासाते भा सकल पसारा ॥
श्वासा संग काल अवतारा । विष अमृत दोनों संचारा ॥
श्वासा संगम काल औकाली । श्वास संग भये वनमाली ॥
प्रकृति पचीस सङ्ग जञाली । पञ्च पांचदश माल तमाली ॥
चन्द्र सूर श्वासा संग पूरा । इंगला पिंगला सुष्मनि जोरा ॥
दोहा-श्वासा संग श्वासा, तेहिसे उपजा बरि आर ।
चन्द्रसूर्य हैं श्वासामध्ये, सकल विधिविस्तार ॥