कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
ज्ञानस्थितिबोध
( १०३ )
जबसे दीन्ह मुक्तिकर बीरा । तीन ताप मिटि गई अधीरा ॥
साहब कहिये शब्द अनन्दा । जाते यमकर छूटै फन्दा ॥
चरणामृत कैसे कर लीजे । तौन शब्द मोसों कहि दीजे ॥
सद्गुरु वचन
धर्मदास मैं कहों विचारी । चरणामृत शब्दहि निरवारी ॥
यहि पाये निज करहि अहारा । जासों यमकी छूटै धारा ॥
प्रथम भोर मुख उठिके धोवे । काल कष्ट यमद्वार बिगोवे ॥
फेर करहिं शब्दको आशाना । वही शब्दसो मुक्ति निदाना ॥
बहुरि हिये महाँ नामहि आने । नाम विदेह दरश पहिचाने ॥
नाम विदेही कठिन अपारा । ताहि चीन्हि कर करहुँ अहारा ॥
ध्यान बीज गुरुचित महाँ आने । सुरति निरति पुरुषहि पहिचाने ॥
बहुरि शब्द आनंदित भाषे । मुख महाँ धोइ नाम रस चाखे ॥
साखी—इह गुण ज्ञानस्थितहिके, शब्द भेद निजसार ।
गुरुचरणामृत लेहि तब, होवे हंस उवार ॥
स्मरण
श्वेत मिठाई श्वेतहि पाना । श्वेत शब्द लेखनि परवाना ॥
योग सत्य इन दीन्हो बीरा । मनको उलटि खोज लै हीरा ॥
बीरा खाय भयो मुख भारी । प्रथम पुरुष ऊपर उजियारी ॥
दूसर सत्य गुरु नाम जो भावा । तीसर लक्ष्मी लै घर आवा ॥
चौथे जन्म मरण नहिं होई । जो चरणामृत पावै कोई ॥
साखी—कालफाँस नहिं आवही, तन्त्र मंत्र क्षयमान ।
वचन कबीर गुसाँइको, संत्य हि शब्द प्रमान ॥
मंत्रसम्पूर्ण
धर्मदास वचन
चरण टेक कर विनती लाई । कीन्ह कृतार्थ मोकहँ आई ॥
( १०४ )
बोधसागर
सब विधि धर्मदास पर दाय। मुक्ति मुक्ति गुरु सबै बताया ॥
साहिब कहिये शब्द उचारी । जौन शब्द मुखधोय निहारी ॥
सोइ शब्द गुरु कहो बखानी । जाते जरै कालकी खानी ॥
साखी--काल जरै कंटक जरै, राखौ चितमें नाम ।
मनसा वाचा कर्मणा, जाय हंस निज धाम ॥
सदगुरु वचन
धर्मदास यह शब्द उचारी । याही शब्दसों हंस उबारी ॥
काल जँजाल मिटत है जबही । शब्द लेय मुख धोवै तबही ॥
काया शुद्ध होइ निज वारा । मुख धोवै मोहे संसारा ॥
दिन दिन मुख उज्ज्वलतेहिकेरा । रविसमान मुख होय उजैरा ॥
अब मैं शब्द कहत मुख बानी । धर्मदास लीजे पहिचानी ॥
स्मरण
सिंधलद्रीप हंस कहां रहियऊ । पहले पार कबीर कहियऊ ॥
बसले पानी मुख धोय । चंदन काटिके धोय मुख ॥
सुरति करहि अस्नान।तेतिसकोटि सुरदेवता लखे अभ्यंतरधरिध्यान
मुख धोवे मनमोही । औ देह नहि जान ॥
मनमें ध्यान कबीर कहिये । रखे चित्त पहिचान ॥
मोरे माथे मन वसे । अवरहुँ मदिल कोइ ॥
सिंधलद्रीप दिग वैठके । कबहुँ न जाय विगोइ ॥
साखी--ज्ञानस्थितिके यह गुण, मुख धोवे सुर ज्ञान ।
कहे कबीर विचारिके, हंस होहि निर्बान ॥
चौपाई
धर्मदास यह धर्म अपारा । जासों होत दिगंबर भारा ॥
दिगंबर देह होत जब भाई । स्नान शब्द जब गुरुसों पाई ॥
यही शब्द धुंधलको दीन्हा । धुंधल राव मानि शिर लीन्हा ॥
ज्ञानस्थितिबोध
( १०६ )
मृतकहि देह धरे संसारा । बिना शब्द है काल अहारा ॥
स्नान शब्द हृदयमें धरहीं । जीवनमुक्ति होइ भव तरहीं ॥
यही शब्दसो धोवे अंगा । दिव्यदेह जानो परसंगा ॥
जो कोइ करे शब्द असनाना । ताकर धोखा जाय निदाना ॥
लक्षहि दान करै नर कोई । जीव दया बिन मुक्ति न होई ॥
जो धोवे निश्चय करि देहा । तबही कीजे शब्द सनेहा ॥
कहे शब्द अब कहो बखानी । धर्मदास लीजो शिर् मानी ॥
नित्य प्रीतिकर शब्द स्नाना । ताकर दोष न रहै निदाना ॥
स्मरण
साखी-अगम सरोवर विमल जल, हंस बैठिके न्हाइ ।
काया कंचन मनमगन, कर्म भर्म मिटि जाइ ॥
पिंडहिसों ब्रह्मांडहि जाना । मान सरोवर करि असनाना ॥
सोहं सोहं ताको जापा । लिखत न करै पुण्य औ पापा ॥
पुण्य पापसे रहत न न्यारा । पैठि संत जन करो विचारा ॥
याहीविधि जो करि असनाना । सो हंसा करै लोक पयाना ॥
धर्मदास सुन शब्द विशेषा । गंगवारु इतने है लेखा ॥
स्मरण सम्पूर्ण
आदि अंत सब कहों बखानी । धर्मदास कीजो बिलछानी ॥
मूलपुरुष काहू नहिं जाना । सो तुमसो सब कहों बखाना ॥
मूलशब्द तहाँ अग्र कहावा । अग्र विदेह अस्थूल सुभावा ॥
मूलभेद काहू नहिं पावा । मूलनाममें गुप्त छिपावा ॥
कहैं प्रतीत देखी मैं तोरी । तातैं कहों मूल निज डोरी ॥
मूलहि शब्द असंभव नामा । कहैं सुनै नहिं पावै ठाना ॥
चारलोक चार है नाऊँ । चार चार सो बरन सुनाऊँ ॥
सीख गुरु या बिचि जो धरहीं । जैसी विधि तुम हम सो करहीं ॥
( १०६ )
बोधसागर
तन मन शीस न्योछावर डारै । तब गुरु शिष्य हृदय संचारै ॥
रंचक कपट हियेमहैं राखे । गुरुसनेह रस कैसे चाखे ॥
मुखसे बातें मीठी करहीं । अर्थद्रव्य मन कृत्रिम धरहीं ॥
गुरुलोभी शिष्यलालचि जानी । परमारथ नहीं पहिचानी ॥
कैसे ताकर होय उबारा । बूढ़हि भवसागरकी धारा ॥
साखी-युक्ति मुक्तिकी को कहे, नरकहु नहीं ठोर ।
पिशाचरूप भरमत फिरै, बाँधे यमकी पोर ॥
चौपाई
धन्य भाग्य तुम हमको चीन्हा । तन मन धन न्यौछावर कीन्हा ॥
यहि कारण मैं कीन्हो नेहा । मूलशब्दसों करहु सनेहा ॥
साखी-कहियत वचन विचारिके, तुम सुनियो चितलाय ॥
धीरज दृढता ठानिके, अमृत पिये अघाय ॥
चौपाई
जब प्रभु हते मूल अस्थाना । हंस सुजन जन नहिं उत्पाना ॥
सो निज ठांम लखावों तोही । धर्मदास जो पूछै मोही ॥
तब ना हतो अग्रको मूला । तब ना हतो विदेह स्थूला ॥
तब नहिं हंस सुजन जनकीन्हों । तब यह हंस बास कहाँ लीन्हों ॥
तब साहब समसर उपराजा । समसर अग्र कीन्ह सबसाजा ॥
दश ग्यारह नहीं ब्रह्मंडा । तब नहिं हते लोक अरु अंडा ॥
तब नहिं अमी अमी रस छंदा । तब नहिं दिवस रैन अरु चंदा ॥
सो अब कहौं मूल नहिं कन्दा । मूल विदेह नाम आनन्दा ॥
कहेउ भेद लहेउ निज नामा । जासों पूरण है सब कामा ॥
जैसे जलमें दिनकर ज्योती । यों घट भीतर लखिये मोती ॥
धर्म नाम असंभव नाऊं । निरालम्ब अग्रिम है गाऊं ॥
निरालंब आलंब ठिकाना । याविधि साहबको पहिचाना ॥
ज्ञानस्थितिबोध
( १०७ )
सोमैं देखि तोहि समझाऊँ । यह तुम राखो हिय छिपाऊँ ॥
वह प्रभु निरालंब बतलाई । नाम प्रभाव पुरुष लखिपाई ॥
सार नाम जिन हिये समोई । काल जाल सब जाय बिगोई॥
निरालंब है अधर अकाशा । पृथ्वी पवनहि माँहि निवासा॥
सारखी-निरालंबहि प्रभाव यह, सकल सृष्टि बिन नाम ।
अजर अमर विनसे नहि, बिन थूनी बिन धाम ॥
चौपाई
सो विधि ताको मैं समुझाई । अविनाशी या विधि प्रगटाई ॥
बिना तत्त्व तत्त्व जो भयऊ । बिना प्रतीति भेद किमि लहेऊ॥
करि प्रतीति तजि अन्य उपाई । आनंद गांव अनंद कराई ॥
तब हंसा आनंद हो जाई । आनन्द शब्द हृदयलों लाई ॥
जीवतही नर मुक्ति होई । अक्षर गहि निर अक्षर होई ॥
येहि प्रताप अग्रको लहिए । स्थूल विदेह वाहिमो कहिए ॥
निरालम्बसो सो भए अलंबा । शब्द सरूप सृष्टि सब थंभा ॥
सारखी-निरालंबके खोजमें, सब जग परो लुभाइ ।
जब सतगुरु दाय़ा करै, तबही परै लखाइ ॥
चौपाई
धर्मदास जो विनती करही । चरणि पकरि शिर ऊपर धरही॥
तुम समर्थ मैं दास तुम्हारा । चरण प्रसाद भयो बिस्तारा ॥
एक विवेक कही समुझाई । वचन सुधा सुनि तृषा बुझाई॥
अब साहिब कहिये व्यवहारा । मृतक जीव गुरुड संचारा ॥
जेहि विधि जीवहिगुरुडजियावा । सोई भेद गुरु मोहि बतावा ॥
मूलशब्द अक्षर पहिचानी । अगमहि नाम अकाशे जानी ॥
सो कहिए प्रभु भेद बखानी । बाल जिवाइ गुरुड नहि आनी॥
( १०८ )
बोधसागर
सद्गुरु वचन
धर्मदास बूझा व्यवहारा । यहै भेद अति कठिन अपारा ॥
योगी जंगम रहे लखाई । याहि भेदको अंत न पाई ॥
कलियुग महमदको अवतारा । तिनसो होय म्लेच्छ अपारा ॥
वेद अथर्वनको मत लावहिं । मानस मारिसाख बतलावहिं ॥
पीर पैगम्बर अजमत धारी । जीव दया नहिं कीन्ह विचारी ॥
अनकठ वचन कहे दिन राता । माता पिता पूछे नहिं बाता ॥
येहि वचन सुनि हृदय लगावो । समझि बूझिके गुप्त छिपावो ॥
आपा माडि थाप सब कीन्हा । आतम संधि कृष्णकहि दीन्हा ॥
अंबुजते अमृतहो आवा । अंबुजते जल पृथ्वी ठावा ॥
सारखी—कहै कबीर विचारिके, धर्मदास सुनि लेव ।
दृढ़ हो अमृत पीजियो, सब जीवन कहि देव ॥
स्मरण
ॐअकार न्याव सों सारा । अजब अतीत अचिन्त व्यवहारा ॥
अजर अहार अती है उज्ज्वल । स्थित उत्पन्न वही है निर्मल ॥
अर्थ ऊर्ध्व याहिमें सही । बर्कत फर्क याहिमें कही ॥
भयो अलखते सब संसारा । लयो अर्थ ऊर्ध्व पर भारा ॥
सारखी—अर्थ ऊर्ध्व आलेख सब, मैं मैं रहैं समाय ।
कहै कबीर धर्मदाससों, सोहि रहे घर आय ॥
बोल अडोल आप जो कहेऊ । दीप अदीप एक नहिं रहेऊ ॥
अष्ट मुष्टि कहि पंच प्रभाऊ । ये सब वाहीसो होइ आऊ ॥
कस नहिं जीव मुक्तिको लहेऊ । एक घरीक जो बोल कहेऊ ॥
करि प्रणाम देहमें आवा । अजर अमर अटल घर पावा ॥
पुरुष संयोग जो सेय बिछावा । अर्थ ऊर्ध्व ऊपर सच पावा ॥
रसना पाय अमृत जब चापे । तब उठि जीव वचन मुख भापे ॥
ज्ञानस्थितिबोध
( १०९ )
साखी—यह गुन ज्ञानस्थितिके, जीव जीव तन आव ॥
कहे कबीर धर्मदास सों, अर्ध ऊर्ध्व संभाय ॥
सम्पूर्ण स्मरण—चौपाई
भाषों जो प्रभु अमृत कीन्हैं । जेहि विधि अमृत सिरजेलीन्हैं॥
धर्मदास यह कहों बुझाई । जेहि विधि अमृत कीन्ह बनाई॥
आपहि आप अधर जो आवा । अमृत वही कर्म जो पावा ॥
कर्म जाय रीति जेहि बैठ। धर्म सहितसों कीन्हों पैठा ॥
सहज निरंजन भेद बतावा । भाषो भेद बरण सब पावा ॥
धर्मराय कूर्महिपर आए । कूर्मनाथ जहाँ अग्र रहाए ॥
मस्तक काटिय पेट विदारा । कूर्म दुखित भए शक्ति निसारा ॥
प्रकट समुद्र तभीसों भयऊ । जबही पेट विदारि लयेऊ ॥
अमृत धर्मराय कछु पावा । कछु गिरपरा समुद्र समावा ॥
अमृत विष्णु तबही जो लीन्हा । जबही मथन समुद्रहि कीन्हा ॥
अमृत तबहि निरंजन पावा । सोई अग्र सुकृतहि समावा ॥
धर्मशील काट्यो है तबही । विषम सरोवर उपजो जबही ॥
धर्मराय अमृत जो पावा । तेहि कारणसों अलख कहावा ॥
अग्र शीश कूर्मके पाई । ब्रह्मा विष्णु तबै उपजाई ॥
जीव जंतु पृथ्वी उपजावा । यह बल विष्णु राजसों पावा ॥
इंद्र जाय तब सेवा करहीं । भांति भांतिके सुख अनुसरहीं॥
तृप्त कीन्ह देवन सब अंगा । विष्णु दया कीन्ही परसंगा ॥
साखी—सूक्ष्म इंद्र दया करी, इंद्र साजि विस्तार ।
ब्रह्मा विष्णु महेश मिलि, कीन्हों सकल पसार ॥
चौपाई
धर्मदास जो बिनती लावा । गुरुड़ अमृत केहि कारण पावा ॥
सतगुरु वचन
पूर्व कथा अब कहों बखानी । धर्मदास लीजो बिलछानी ॥
( ११० )
बोधसागर
नागहि लोक इंद्र जो गयऊ । सुधा हेतु कारज तेहि ठयऊ ॥
डारेउ नाग फाँसते तबहीं । कौन छुड़ावे याते अबहीं ॥
नागदेवके मात रहीया । गरुड मातसोंहीं छल करिया ॥
माथे लीन्ह गरुड़की जीती । छलसों भई दयाकी रीती ॥
गरुड़ मात कहि वचन सुनाई । दासी भाव कहां तुम पाई ॥
तब उठि माता वचन उचारा । सुनो पुत्र एक भेद हमारा ॥
नाग मात मोहि वचन हरावा । यातें दासी भाव रहावा ॥
पीतबरण शशि हम कहि सोई । श्याम बरण उन करो विलोई ॥
यह छल जानि परा नहीं मोही । सुनो तात समुझावों तोही ॥
कोपि गरुड तब गये पताला । नागलोक जहाँ विषकी ज्वाला ॥
देखत गरुड नाग सब भागे । मातासो छल कीन्ह अभागे ॥
माँगो सो हम तुम कह देही । हम कहैं त्रास देव जिन एही ॥
गरुड अहिन तब वचन उचारा । अमृतकुण्ड देव सब धारा ॥
नाग आइ तब कीन्ह निहोरी । गरुड इंद्रकी बंधन छोरी ॥
अमृत लेइ दर्शनको गयऊ । नाग गरुड पहुँचावत भयऊ ॥
गरुड मात नाग जब देखा । दासहि भाव तजब तुम रेखा ॥
अमृत पाइ गरुड बरियाना । तब छल इंद्र गरुसों ठाना ॥
गरुड महाबल सुख लहलीन्हां । बोई बंबूर अमृत किमि चीन्हां ॥
ज्यों मलयागिरि निकट रहावा । तास्वरूप काहू नहीं पावा ॥
कूर्म उदरसे सो चलि आवा । सुधा समुद्र मथे तब पावा ॥
गुरु द्रोहसों जन्म बिगोई । नाम पाइ अस्थिर नहीं होई ॥
चंचरीक चंचल है बहई । मलयागिरिकी सुगँध न लहई ॥
मलयागिरिको यहि प्रकाशू । विष नहीं बेधे वास सुबासू ॥
साखी—मलयागिरिके वाससे, सब दुम होइ सुवास ।
बासन कबहुँ बेधही, सदा रहत है पास ॥
ज्ञानस्थितिबोध
( १११ )
तबहि सुकृत बिनवे करजोरी । कृपासिंधु सुनि बिनती मोरी ॥
प्रथम तत्त्व प्रभु भाषव तुमहीं । सो सब बूझ पुरैगी हमहीं ॥
पाँच प्रगट गुप्त हैं पाचा । प्रगट समझि लीन्हें हम साँचा ॥
पाँच गुप्तको कहिये लेखा । पाँच प्रगट ये सब हम देखा ॥
पृथ्वि तेज जल पवन अकाशा । सो प्रभु मोहि कहो परकाशा ॥
जिहिं विधि ए प्रभु प्रगटे आई । सो प्रभु भाव कहेउ समझाई ॥
सतगुरु वचन
धर्मदास तुम जो कछु बूझा । सो सब भिन्न २ हम सूझा ॥
पृथ्वी रही गुप्तके नेहा । बहुरि प्रकट हुये शब्द सनेहा ॥
पृथ्वी अंग वैराटहि जानी । पाँव पताल शीस अनुमानी ॥
इच्छा सुरति शक्ति उपजाई । वैराट रूपमें जाय मिलाई ॥
अलख निरंजन यासों कहिये । यहीरूयाल अविगतको लहिये ॥
मन माया जब एके भयऊ । सकल सृष्टि उत्पन्नै लयऊ ॥
साखी-जब दोई एके भये, भयो लीन मन ठौर ।
नाभिकमल ब्रह्मा भए, सब रचनाको मौर ॥
चौपाई
धर्मदास अब कहों बखानी । तुम हिरदै कीजो बिलछानी ॥
पाँच तत्त्व जे गुप्त रहावा । सो सब भेद तोहि समझावा ॥
पाँचहि अमी पुरुषने कीन्हों । पाँच तत्त्व ताही सो चीन्हों ॥
अचल अमी जो अकाश बखानी । शब्द अमी वायु उत्पानी ॥
अजर अमी सो तेज पसारा । अकह अमी जलतत्त्व सम्हारा ॥
रंग अमी सो पृथ्वी भयऊ । रचना सब याही पय ठयऊ ॥
पाँचों अमृत तहँवा छाजै । पाँचतत्त्व तासों उपराजै ॥
पाँच तत्त्व सों देह सँवारी । तीनों गुण तामें अनुसारी ॥
( ११२ )
बोधसागर
देही गति काहू नहिं पावा । देह धरै यम काम सतावा ॥
आतमरूप रंग जिन जाना । प्रफुलित होय कमल विकसाना ॥
हर्षित भयउ बुन्द जो ठारा । परै अगाध सिंधु मझधारा ॥
परतहि बुंद रंग सब छाजा । जलतरंग जल रंग विराजा ॥
सारखी—यह गुण ज्ञानस्थितिहिके, जलतरंग उपजाइ ।
जलसों सब जग ऊपजो, जलधौं कहा समाइ ॥
चौपाई
नाम तत्त्वजल तत्त्वहि कीन्हा । अस्तुति जलहि रंगकर लीन्हा ॥
जल ऊपरहि कूर्म उपराजा । कूर्मपीठि वाराह विराजा ॥
पीठ वराह शेष जो रहई । शेषहि फनपर पृथ्वी धरई ॥
कूर्म सुरति पुरुषकी अहई । उनको अंश कूर्म इह लहई ॥
महापुरुष आसन जहाँ आई । स्वासा शब्द पुरुष उपजाई ॥
बहुरि तेज पुरुष परकाशा । सुरके घर हो तेज निवासा ॥
आनंद रूप लोचन जब कहे । तेज हर्षपर घट हो चहे ॥
हरष तेज सूर्य उतपानी । सो सब जगमें कीन्ह पयानी ॥
तेज अंग सूर्य कर रूपा । शीतलता शशिके रसरूपा ॥
या विधि दो अंश उतपानी । धर्मदास लीजो बिलछानी ॥
अंग सूर्य शशि लयो बनाई । तेज हर्ष गुण उभय बताई ॥
सारखी—कूर्म उदरसों प्रगट है, रहे जगतमें छाय ।
बिन सतगुरु नहिं पावही, कहे कबीर समझाय ॥
चौपाई
जो अज्ञान ज्ञान नहिं जाना । तासों भेद न कहब सुजाना ॥
बहे बाये मन थिर नहिं जेही । सार शब्द कहा करै सनेही ॥
स्वासासार पुरुष उपजाई । सुरहो थासहि समसर छाई ॥
समसर भेद जानि नहिं कोई । अग्र थास तेहि कहिए सोई ॥
ज्ञानस्थितिबोध
( ११३ )
वहे गुप्त यह प्रकट बताई । यामें फर्क न जानहु भाई ॥
समसर पवन है सकल सुगंधा । ता बिन जगत आय सब धंधा ॥
गंध विगंध रची यह देही । समसर पवन सुगंध सनेही ॥
समसर अंग अग्रको आहे । समसर गहे पुरुषको लाहै ॥
अग्ररंग बाँए उपराजा । उनसों होत रंगको साजा ॥
रंग रेख सब उनसों होई । मृतकर रंग डार उन खोई ॥
रंग बाँएसे हरियल कीन्ह । हरियल रंग जात सब लीन्ह ॥
जीव जन्तु औ कीट पतङ्गा । दुम औ बेली सबके सङ्ग ॥
घास पात जिव सकल बिहङ्ग । हरियल राखो सबके अङ्ग ॥
सारखी-यह नहिं होतो जगतमें, मरत सकल कुम्हलाय ।
ज्ञानहि अस्थित पुरुषकी, कहै कबीर समुझाय ॥
चौपाई
एहि वायु हरियर जो कही । हरियर वायु तुहांसों सही ॥
अकाशमंदिरमें कीन्ह निवासा । जेहि मंडलते उपजी खासा ॥
याविधि उपजन भौ सब ठौरा । संसारी भेद कहां कहु औरा ॥
कालफंद फाँसी बड़ डारी । तासों परै न वस्तु विचारी ॥
जब स्वासा साहँहि उठाई । मूल दीक्षा प्रथम कहाई ॥
जब बालकको दीक्षा दीजे । बीरा देकर अस्थित कीजे ॥
सार नाम तब देव लखाई । जरा मरण सुस्थित घरपाई ॥
जो निज करै नाममें बासा । जासो स्वासा नाम प्रकाशा ॥
बिना नाम कालकी फाँसी । दीक्षा मूल यही परकाशी ॥
सारखी-मूल दीक्षा संग इह, लेहु संत चित लाय ।
धन्य भाग्य वा हंसके, नाम संधि जो पाय ॥
बिना शब्द संधी बिना, काहु न पाई बास ।
संधि नाम हंसा गहै, करै काल नहिं त्रास ॥
( ११४ )
बोधसागर
सत्य सुकृतकी रहनि रहि, गंह अर्जमन नाम ।
कहै कबीर धर्मदाससों, सत्य शब्द परमान ॥
सत्य सुकृत लों मेंड़ है, ग्यान ध्यान धर धीर ।
शब्द अजानन है वही, सोई संत कबीर ॥
अजर अमर वह पुरुष है, सत्यनाम बैधि छोर ।
कहे कबीर धर्मदाससों, थाह शब्द शिरमोर ॥
चौपाई
अब मैं कहौ अकाश बिचारा । जिहिबिधि भयव तासु विस्तारा ॥
अकाश अंड मध्य जो रहेऊ । अकाश भेद बिरले जन रहेऊ ॥
अकाश अंग सो सब निर्मावा । शून्य मंदिरतें नाभी आवा ॥
पृथिव अकाश योग अब कीन्हौ । शब्द हेतु काहु बिरले चीन्हा ॥
तालमृदंग अकाशते होई । रहित शब्द पुनि सुनी समोई ॥
अकाशबीच असहोय गुजारा । बिना मृदंग शब्द झनकारा ॥
अकाश पेट अकाशहि चीन्हा । सुरति सुनी आकाशहि दीन्हा ॥
सखी—कहै कबीर अकाशगुण, बूझत बिरला कोय ।
लीलारंग अकाशका, सुनिनो सत्य बिलोय ॥
चौपाई
जो मंदिर अकाश नहि देखे । तबलगि शब्द रहत अनपेखे ॥
पाँच अकाश तबै लखिपाई । जबै मंत्र गायत्री आई ॥
सारखी—भेदाकाश गुण अधरहै, ज्यों लखि पावै कोइ ॥
नहिं अक्षर लखि आवही; पहुँचे निज सोइ ॥
मंत्र गायत्री
धर्मदास विनवे करजोरी । भाषों शब्द गायत्री डोरी ॥
भेद गायत्री बालकको दीजे । प्रेम सुफल बालकको कीजे ॥
ज्ञानस्थितिबोध
( ११५ )
यापर कीरत कैसे जाई । प्रकृति अंग मायाको भाई ॥
माया अंग अष्टांगी कीन्हौं । अष्टांगी गायत्री चीन्हौं ॥
यह शब्द हम कहो बुझाई । लीजो संतो शिरहिं चढ़ाई ॥
बारा योजन बुड़े जाइत्री । पल पल छूटे इहीठों गायत्री ॥
भ्रमनाको आगो यह टूटे । ब्रह्म कथौ हिरदय रस लूटे ॥
जार बार कालहिकर छीरा । करकर निर्मल अंग शरीरा ॥
बास अमरपुर शब्द संधाना । कहै कबीर काल पछिताना ॥
सम्पूर्ण
न्यास
रक्षा प्रथम न्यास जो करई । सुर गंधर्व न्याससों डरई ॥
कालजाल निज बंदन होई । निर्मल रहै काल कहैं खोई ॥
भूतहि प्रेत वीर वेताला । वायु बतास और सैताला ॥
साठ तीनसौ ऊखत कहिये । हगन्यास कर एक न रहिये ॥
साखी—यह गुन हग अन्यासके, कहै कबीर बखानि ॥
प्रथम रक्ष या कह पढे, बढ़ि हितचित्त पहिचानि ॥
चौपाई
दुष्टनको बंधन है येही । हंस मुक्त मन मुक्ति सनेही ॥
हगन्यास प्रथम जो पढ़ई । तब रक्षा मन शब्दहि दृढ़ई ॥
हगन्यास बालकको चाही । संशै अंश रहित हो ताही ॥
यही शब्द मैं कहों बखानी । यही भेद बिरले पहिचानी ॥
साखी—उत्तम मध्यम अधम जो, सबहि करै निर्वाह ॥
हगन्यासके यह गुण, कुशल क्षेम प्रवाह ॥
धर्मदान वचन
धर्मदास बिनती उठि कीन्हा । पुरुषहि भेदसकल हम चीन्हा ॥
निश दिन चरण चित्त तव धरहूँ । अन्य उपाय सबै परिहरहूँ ॥
( ११६ )
बोधसागर
येहि वचन प्रभु कहो बुझाई । जाते काल दंड दुख जाई ॥
इंडुमती कह काल सतावा । रहि सचेत शब्द लखि पावा ॥
सो मोहि भेद बतावहु स्वामी । करहु कृपा गुरु अन्तयार्मी ॥
सद्गुरु वचन
धर्मदास भल पूछन कीन्हौ । सो अब भेद तोहिकहि दीन्हौ ॥
रानी काल कीन्ह जब त्रासा । तब हम शब्द कीन्ह परकाशा ॥
साधु संत सेवा चित धरहीं । भक्ति प्रेमबहु बिधि सों करहीं ॥
हमहिं छोड़ि नहि जाने दूजा । कुलकरनीकीं छोड़े पूजा ॥
तजि कुल करनि अमरपदपावा । येही सात नाम चित लावा ॥
तोसों शब्द विरहुली भाखी । तव कारण हिरदेमें राखी ॥
येही शब्द लेहु शिर मानी । मनसा वाचा निश्चय जानी ॥
विरहुली
आदि अन्त तब न हते विरहुली । भूमि अकाशहु न हते विरहुली ॥
तब विष नहि अवतार विरहुली । विषकीकयारितुमबाहिबिरहुली ॥
बिषका कीन्ह अहार विरहुली । सवा लक्ष पर्वत थे विरहुली ॥
तहाँ विषको अवतार विरहुली । गड़िगड़िशंकर बोह विरहुली ॥
पर्वति डारेउ पानि विरहुली । सोविष संतहि खाइ विरहुली ॥
विष माटि होय जाय विरहुली । मउरी संसय करिय विरहुली ॥
आफूयों हरतार विरहुली । सबसों शब्द निरंत विरहुली ॥
भागु विषपैठि पताल विरहुली । बनहि कंदविषविकल विरहुली ॥
पोस्त धतूरा भाँग विरहुली । गुरु वचन धरि बाँध विरहुली ॥
विष न संचरे अंग विरहुली । उदमदविष मदराज विरहुली ॥
यह विष बिरलैसम्हारबिरहुली । जब नहि स्वर्ग पताल विरहुली ॥
तबविष नहि अवतारबिरहुली । दूत भूत सब भगे विरहुली ॥
जहाँ बसे साधू संग विरहुली । भोगा कीयो तैं कहां विरहुली ॥
ज्ञानस्थितिबोध
( ११७ )
कहाँ ये डसवत आये बिरहुली । सास्वी नामकी चले बिरहुली ॥
सब दुख तुरत नशाये बिरहुली । नामकी कहाउतपाति बिरहुली॥
सबहि तुच्छ कह जाय बिरहुली । वचनादिके अकार बिरहुली ॥
मन विष दूर पराय बिरहुली । तनसों दूर है जाय बिरहुली ॥
शब्दमुनत विष जाय बिरहुली । हरि प्रकटै संसार बिरहुली ॥
साहिब कीयो संसार बिरहुली । दूत भूत सब हारि बिरहुली ॥
पहुँचे सत्य कबीर बिरहुली । भई यम जिय पीर बिरहुली ॥
इन तन विषन समाय बिरहुली । उत्तर रानी पाय बिरहुली ॥
उठिके आसन दीन्ह बिरहुली । विरहुली दुःख नशाय बिरहुली॥
वार वार शिरनाय बिरहुली । कबीर गुण गाय बिरहुली ॥
बिरहुली संपूर्ण
धर्मदास वचन
धर्मदास फिर विनती करहीं । सतगुरु चरण शीश पर धरहीं॥
अब प्रभु कहिए लोक सुरूपा । दीन दयाल कृपाल अन्नापा ॥
सदगुरु वचन
धर्मदास मैं कहाँ बुझाई । विना भेद लोके नहीं जाई ॥
अंधी सुरति शब्द बिन जानौ । लोक दीप कैसे पहिचानौ ॥
शब्द पाय जब सुस्थिर होई । थान मुकाम लखै पुनि सोई ॥
जो लखि पावै थान मुकामा । सुरति चले तब पावै नामा ॥
विना नाम नहीं ठौर ठिकाना । अंध सुरति हो रहे ठगाना ॥
सोहंगत सब छहौं बखानी । एक चित्त है गहे जु प्रानी ॥
पुहुप दीप सब दीप निवासा । छब्बिस दीप रचौ तेहि पासां ॥
कंचन दीप पाहु पर सोहै । रत्न अन्नाप कोटि रवि मोहै ॥
तहां पुरुष पर कीर्ति विराजै । उत्पति प्रलय तेहिपर छाजै ॥
लीलगर दीप पुरुषको वासा । जहां पहुँचे न कालकी त्रासा ॥
( ११८ )
बोधसागर
कालहि गमी वहाँ नहिं आवै । सहज पुरुष जहाँ बैठि रहावै ॥
विनती सहज कीन्ह कर जोरी । जीवन बंध वेगि प्रभु छोरी ॥
बीज शब्दमें सोहं वीरा । यह उत्पति गुरु कहै कबीरा ॥
यहाँ गमी कोऊ नहिं पावै । जहाँ लीलगर द्रौप रहावै ॥
तहाँ सुजन जन बैठे ज्ञानी । सत्य सुकृत दोई अगवानी ॥
अब मैं कहौं दीपकर लेखा । जाविधि रचिव रंग औ रेखा ॥
बीज शब्दमें सोहं बीरा । ये उत्पन्न सुन धरौं शरीरा ॥
जगमगज्योति सदा उजियारा । शब्दरूप काया कर प्यारा ॥
शब्दहि हेत वचन है वोटा । रत्न शिला चहुँ दिशि है कोटा ॥
लोक नाम है लोक अनन्दा । उडगन महाँ सोहत जस चन्दा ॥
आस पास कंचनकी बारी । हीरा लाल रत्न अवतारी ॥
कहा कहीं मंदिर कर रेखा । खम्भा कंचनके आहि विशेषा ॥
सिंहासन अति तहाँ विराजै । कंचन जडित लाल बहु छाजै ॥
लगै कोटि वहुँ दिश रूपा । चन्द्र प्रकाश ही जान स्वरूपा ॥
तेतिस कोटि सूर्यकी पांती । बीच बीच देखो अस क्रांती ॥
तापर सोहत अधर अटारी । हीरा मोती बहुत सँवारी ॥
ता ऊपर शोभित कस रेखा । कोटि रत्न दमकत जनु लेखा ॥
मोतिक चौक पूर जनु डारी । शोभित चौक कलित विस्तारी ॥
ता ऊपर जु रंग अस सोहै । मानहु रत्न मणी मय होवै ॥
जगर मगर सोहै उजियारी । उपमा बरण सके को प्यारी ॥
बहुत हि उपमा को कह दीजे । कोटिन भाग सूर्य शशि कीजे ॥
पालँगरूप काकहिके बखानी । हीरा रतन बीच बिच खानी ॥
सेजरूप शोभित शशि खानी । चन्द्र सूर्यकी ज्योति छिपानी ॥
चन्द्र सूर्य नाहीं वह तारा । नाहिं रत्न कञ्चन महि भारा ॥
साखी-ज्ञानस्थितिके यह गुण, पुरुष रूप उजियार ।
पलमें इच्छाते भए, लोक दीप विस्तार ॥
ज्ञानस्थितिबोध
( ११९ )
चौपाई
तहाँ पुरुषने सेज विछाई । चन्द्र सूर्य जहाँ रहे लजाई ॥
तिलभर सिज्याको परवाना । सोहें सुरति अभयपद ज्ञाना ॥
तहवाँ पुरुष करहिँ आनन्दा । जिनसों अमी भए सब छन्दा ॥
तहाको बरन कहे को भाई । लक्ष जीवसों नाहिँ कहाई ॥
अमर चीर सोहें अस अंगा । सूर्यमणीसों अधिक सुरंगा ॥
यही व्रत हंसनको भाई । पुरुष रूपको कहै बनाई ॥
शोभा कहो दोऊ कर पानी । चन्द्र सूर्यकी ज्योति छिपानी ॥
सर्व वरणको कहो बुझाई । उभे सूर्य मानो उमगाई ॥
दंत सुरंग शोभित अति भारी । मानो मणि बत्तीस विचारी ॥
बालरूप का कहों बखानी । चन्द्र किरण मानो लपटानी ॥
इक २ चरित वरणि नहि जाई । मानहु सुकृत सत्य उमगाई ॥
अधर नासिका सोहत कैसा । उभय हंस बिहरत है जैसा ॥
साखी-बरणन सबका याहको, मोसों कहो न जाय ।
उपमा केहिको, दीजिये, पटतर नाहि दिखाय ॥
सूर्य होय समुद्र भर, भू अकाश भरि चंद ।
तबहु न पटतर पाइये, पुरुष वदन आनंद ॥
राई भर वह वस्तु है, अधराई अस्थूल ।
लहर लहर घटमेंकरै, वही पुरुष निजमूल ॥
इह गुण ज्ञानस्थितिहिके, कहे कबीर समुझाइ ।
पुरुष ध्यान जबही करै, सब दुख जाय पराइ ॥
धर्मदास वचन
धर्मदास तब बिनती ठाना । दीन्हों मोहि मुक्ति फलदाना ॥
साहेब कहिए मोहि बखानी । सत्ताइस दीप कहो बिलछानी ॥
दीपनको कहिये मोहि लेखा । जामे परचे शब्द विवेका ॥
( १२० )
बोधसागर
धर्मदास जो पूछिब आई । सो अब कथा कहो समुझाई ॥
पुहुप द्रौप जहाँ पुरुष रहाई । अलोप दीप तासों कहि भाई ॥
आस पास है छविबस दीपा । तहाँ पुरुष रहै अधर समीपा ॥
तीन दीपनको नाम बखानों । धर्मदास मनमें बिलछानों ॥
अजर द्रौप पुरुषके पास । कुसुम दीप सतगुरु निवासा ॥
अमरदीप सुजन जन जाना । सुमन द्रौप अब कहौ बखाना ॥
सहस्र नेत्र द्रौप सुनि लीजे । अलोक द्रौप सुनिके चितदीजे ॥
कंचन दीप बखानों आई । कंचन दीप सुनो चितलाई ॥
सुरजन द्रौप कहौ सम्भारा । अजर द्रौप निर्मल उजियारा ॥
हेत द्रौप सुनियो चितलाई । लवंग द्रौप द्रौप अति छाई ॥
अबहि निरक्षर कहिये द्रौपा । कमल द्रौप तहाँ पुरुष समीपा ॥
अंबु द्रौप बहुत उजियारा । सुरति द्रौप अब कहौ पसारा ॥
भिरत द्रौप सोही जन जानै । निग्रह द्रौप करै पहिचानै ॥
श्वेतद्रौप समझो हो ज्ञानी । निश्चित द्रौपमें जाय समानी ॥
सुस्थिर द्रौप चित जो राखा । कीरति द्रौपकरे अभिलाषा ॥
अकृत द्रौप आहि उजियारा । अक्ष द्रौप मह शब्द पसारा ॥
द्रौपचंद्र मन कहौ अनन्दा । पतंग द्रौप उमगै रवि चन्दा ॥
कुरअ द्रौप धर्मनि लघु जानी । सताइस द्रौपके नाम बखानी ॥
साखी-इतने द्रौपक गुम हैं, कोइ न जानत नांव ।
कहैं कबीर धर्म दाससों, सोई ठांव लखाव ॥
चौपाई
धर्मदास तुम सबै बिचारा । सार शब्द नाहिं अनुसारा ॥
जब लगि सार शब्द नाहिं होई । तौ जिय केता जन्म बिगोई ॥
काम कपाल भोज बसु नारी । सो साधू जिन नाम सँभारी ॥
ज्ञानस्थितिबाध
( १२१ )
इकोत्तरसे पुरुष तर जाई । इहि विधि रहन गहे चितलाई॥
नारि पराई चित मन देही । जन्म सात कुछी कर लेही ॥
नारि पराई अंग छुवावै । कशमल लगै तत्त्व घटि जावै॥
लाख वर्ष रहैं भूतकी खानी । भुगते नर्क घोर सो प्रानी ॥
बिना शब्द जो भुगवहि नारी । तो सब परै कालकी वारी ॥
बिना शब्द निरञ्जन लीन्हौं । ताते पुरुष माथ पुनि छीन्हौं॥
नर्कहिकी कहा बात जु कहिये । सुर नर सबै काम वश रहिये॥
धर्मदास सुनि लीजे हमसों । उत्पति सकल कही हम तुमसों॥
राजा युग घिर पास मैं गहिऊं । बालकरूप तहां पुनि रहिऊं ॥
घरन कुमार तासकी रानी । प्रीतभाव बहु सेवा ठानी ॥
पुत्र भाव उन हमकह जाना । कपट भाव नहिं तजौं निदाना॥
ज्ञान पुण्य वे बहुतहि करहीं । राज गुमान गर्व अति धरहीं ॥
शब्द हमार नहीं उन चीन्हौं । कुंजर देह जायसों लीन्हौं ॥
कनक सिंह तिनके सुत कहिये । राज तिलक उनके शिर रहिये॥
भाग्यवन्त भयेऊ बड़ राजा । पिता पीड करही सब साजा ॥
बहुतक दिवस तहां चलियऊं । एक दिवस कौतुक अस भयऊं॥
आधी रात बीति गइ जबही । राजा स्वप्न दीन्ह पुनि तबही ॥
कुंजर देह धरै तब आवा । कनक सिंह कहैं स्वप्न जनावा ॥
अहो पुत्र सुनु बचन हमारा । यहि घर आय तू सिरजनहारा॥
आतारूप उन्है जिनि जानो । सतगुरु आप लेव परमानो ॥
जब तुम भक्ति करो चितलाई । कुंजर देह छूटि मम जाई ॥
चटपट परत राति नियरानी । मीन करत जो पानी पानी ॥
प्रात आइ पद शीश लगाऊँ । हम नहिं चीन्ह तुम्हारा भाऊँ॥
चूक परी हमसे गुरु साई । मरम तुम्हार चीन्ह नहिं पाई ॥
आतारूप हम तुम कह जाना । तुम तो ब्रह्म आहु निरवाना ॥
( १२२ )
बोधसागर
पिता हमार कुंजरहि भयऊ । आधी रात खबर मोहि दयऊ॥
क्षमा अपराध कीजिये स्वामी । कृपा सिंधु हो अंतरयामी ॥
साहब दया करौ अति भारी । सकल जीव हैं शरण तुम्हारी॥
दाया करि दीजै वर सोई । जाते आवागमन न होई ॥
जिहिमो होय मोर निस्तारी । सो प्रभु करिहों तब बलिहारी॥
तब हम उनपर दाया कीन्ह । संधिक नाम उनहि कह दीन्ह॥
विधिपर भक्त कीन्ह चितलाई । धनकर मनकर तनकर भाई ॥
सतरहसै रानी परवाना । कर्मनि काहु कहा नहि माना ॥
कइक उहागिल हती जो रानी । सोउठि चली शब्द पहिचानी॥
सकल रूप कर चली सिंगारा । भक्ति हेत कारन पग धारा ॥
लीलावती नाम तिहि केरा । सो हम जीवन कीन्ह उबेरा ॥
सोरह रानी सत्रहों राजा । पहुँचे लोकहि पुरुष समाजा ॥
सोई कथा कुंजर में आई । धर्मदास परखो चित लाई ॥
साखी--यह गुन ज्ञान स्थितिहिके, सेव शब्द निजसार ।
या विधि हंस करनी करै, उत्तै भवजल पार ॥
सजेको शब्द
साखी--अक्षय नामके सेजपर, हंसा पारस दीन्ह ।
कालमें यम लूटिके, हंस आपन कर लीन्ह ॥
अक्षय सुख सेज आदी बानी । जापर हंसा पारस आनी ॥
साखी--जो हंसा पारस परसि, कहे कवीर सत बोल ।
ताकहँ चोर डहके नहीं, युग २ आहि अमोल ॥
ते हंसागये अमर लोककहँ, अक्षय अंक हमपारसलीन्ह ।
कहै कवीर सतलोक बैठकर, जीमें चीन्होती दीन्ह ॥
धर्मदास बचन-चौपाई
धर्मदास चित सेवा ठाने । दोइ कर जोरि चरण लपटाने ॥