कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
उग्रगीता
( ५३ )
साधु संत सेवा चित राखै । सदगुरु शब्द अमीरस चाखै॥ चाखत अमी अमर सो होई । अजर अमर सत्यलोक समोई॥
छन्द-धर्मदास तुम सुनो चित दै कर्म न लागे दासको । पाप पुण्य बंधा रहै जो छुटन चाहै फंद सो ॥ सुवा नलिनी पकरि अरझो आपनी मति मंद सो ।
सोरठा-सदा अहेरी काल, पाप पुण्य फंदा रचो । सदगुरु दीन दयाल, कर्म काटि मुक्ता करो ॥
इति श्रीमदुग्रगीताब्रह्मज्ञानयोगमते कबीरधर्मदाससंभादे देवा- सुरसंप्रदायाख्यानां नाम षोडशोऽध्यायः ॥ १६ ॥
अथ सप्तदशोऽध्यायः
अर्जुन उवाच
अर्जुन कहेउ सुनौ यदुराई । कछु मोरे जिय संशय आई ॥ सो अब प्रगट कहौ भगवाना । आगे सूक्ष्म सुना मैं काना ॥ शास्त्र धर्म छाड़ि जिन दीन्हा । तिनकी गति तुम कैसे कीन्हा॥ रूप सरूप कौन है ताही । सत रज तमगुण ये को आही॥
श्रीभगवानुवाच
कहैं कृष्ण सुतु कुंतिकुमारा । भली बात कर कीन्ह विचार॥ जग रचना शास्त्र मत आही । तेहि मारग सब लागे जाही ॥ शास्त्र न वेद पुराण न छोडे । सो तौ नर्कवास में बोडे ॥ जब लगि ब्रह्मज्ञान नहि आवे । तब लगि शास्त्र धर्म मन लावे॥ जब आवे याको ब्रह्मज्ञाना । शास्तर वेद कितेव हेराना ॥ ता कह कर्म न लागे भाई । निशि दिन रहै नाम लौलाई ॥ जब आतम परमातम जानै । कर्म धर्मते भे निरवानै ॥
( ६४ )
बोधसागर
मोक्ष सरूपी आपे होई । ना फिर जन्मे मरै न सोई ॥ ऐसी भांति जो साधु रहाई । ना कहँ आवै ना कहँ जाई ॥ अब तीनों गुण वर्नि सुनावौं । सकल कामना तोर मिटावौं ॥
त्रिगुणको वर्णन
सत रज तमगुण तीनि बखाना । तीनते तीनि २ औ जाना ॥ पूजा तीनि अब कहौं बखानी । पूजहिं सुर नर सुनि औ ज्ञानी ॥ सात्त्विकी देवा पूजैं भाई । राजस पूजैं यक्ष बनाई ॥ तामस भूत प्रेत पूजावहिं । नर्कवास लै सो मुक्तावहिं ॥
त्रिगुण अहारको वर्णन
अहार तीन अब सुनले भाई । सबमें सत रज तम जो आई॥ खीर खांड घृत करै अहारा । यह लक्षण सतगुण व्यवहारा॥ साधु सरूपी सदा सु चाला । सन्तनको बहुविधि प्रतिपाला॥ करुवा खट्टा लोनु तीक्षण । ये अहार राजस लक्षण ॥ दुख सुख ताहि जो व्यापे भाई । नाना व्यञ्जन करै बनाई ॥ तमगुणके आहार बखाना । भई रसोई पहर सेराना ॥ भोजन करि २ लोक सिधवै । स्वाद अनेक रहै ना पावै ॥ होइ उछिष्ट अन्न अब भाई । तामसि तामस करि २ खाई॥
त्रिगुण यज्ञ वर्णन
द्रव्य यज्ञ प्रथम है भाई । बिन फल इच्छा यज्ञ कराई ॥ प्रभुके सुमिरन रहै समाई । ताकी बुद्धि सात्त्विकी भाई ॥ राजस यज्ञ करै फल चाहे । दंभ करै यश कृत्रिम समाहै ॥ यज्ञ विधि निह तामसी होई । अन चूने बिनु करै रसोई ॥ जैसे तैसे यज्ञ करै पूरा । दक्षिना देत बहुत कै घूरा ॥ खरच करै औ कल्पे भाई । ताते नर्क बास चलि जाई ॥
उग्रगीता
(५५)
त्रिगुण तपस्या वर्णन
तनसो देवता पूजा लावै । गुरु और ज्ञानी पूज पुजावै ॥ शुचि संयम जो कोमल रहई । ताकर काल पला नहिं गहई ॥ ब्रह्मचर्य पुत्रि आनि जेवावै । रहै अनिच्छा सत्य न खोवै ॥ यह तन पूजा करै सुजाना । गुरु गोविन्द को धारे ध्याना ॥ सत्त्विक मन तप कहौं बुझाई । इन्द्री सबै हाथ जेहि आई ॥ प्रथमै प्रसन्न जो राखै । मौन रहै अमृत रस चाखै ॥ आतम निग्रह करै सुजाना । अन्तर्भाव सुधा निर्वाना ॥ तपस्या मनकी कही सुनाया । सुधा सरूपी सतगुण भाया ॥
सात्त्विकी वचन तपस्या वर्णन
वचन तपस्या करो बखाना । यह तप मुखते भया प्रवीना ॥ अभय वाक्य ताकूं भइ नाहीं । सत्ति सरोत्तर जस मुख माहीं ॥ प्रिय हित साधु वचन सो कहहीं । पाठ करी करि जन्म सुधरही ॥ एते वचन तपस्या होई । मुखते करे करावै सोई ॥ तीनि तपस्या सतगुण भावा । सो तौ वर्नक वर्नि सुनावा ॥ रजस तपस्या त्रे प्रकारा । ताकूं अब मैं करो प्रचारा ॥ तीनि तपस्या राजस भाई । तनसों तपकरि लोक देखाई ॥ मनसों कपट कबहुँ नहिं छूटै । वचन सदा मुख बोले झूटै ॥ तीनि तपस्या राजस होई । ऐसी भांति करे जो लोई ॥ तामस तप है तीन प्रकारा । शुभ अशुभ कछु नाहिं विचारा ॥ हठ करि तपसो तनको गारै । मनमें कोध सदा जो धोरै ॥ वचन कठोर बहुत सो बोले । तामस ताप अहं लिये डोलै ॥ तीन तपस्या त्रिगुण सुभावा । सो तौ वर्नक वर्नि सुनावा ॥
त्रिगुण दानका वर्णन
तीनि प्रकार दान अब वनौं । उत्तम सेवा ब्रह्महि चीन्हौं ॥
( ५६ )
बोधसागर
अन आश्रित को देइ जो दाना । तीरथ उत्तम ठौर ठेकाना ॥ दान देइ फल चाहै नाहीं । सात्त्विक दान सो कहिये ताहीं ॥
राजस दानका वर्णन
जत अश्रेको दान जो देई । लाहा कारण संशय लेई ॥ यह तौ राजसको व्यवहारा । दान देइ चित कल्पै भारा ॥
तामस दानका वर्णन
तामस अशुचिको देइ जो दाना । नटुवा वेश्या हित करि जाना ॥ ब्राह्मण देत क्रोध मन करई । इच्छा बहुतै फलको धरई ॥ यह लक्षण तामस कर होई । तीनि प्रकार दान है सोई ॥
तीनि नाम त्रिगुणको वर्णन
तीनि नाम वर्णौ मैं त्रिगुणा । जाते सृष्टि होत है सगुना ॥ वह अंतुतु है मति सोई । तीनिउ नाम एक सम होई ॥ निज मंत्रहि मैं भाषि सुनाया । ताको मर्म न काहू पाया ॥ पाक रसोइ छूति जो होई । वो अंततू सति है सोई ॥ पातक छूति रहैं नहिं कोई । यह तौ मंत्र पवित्र कराई ॥ पावै प्रसाद जो सकल जहाना । सुमिरे पावै पद निर्वाना ॥ सब कारज सुमिरे त्रे नामा । पूर्ण होइ सकल विधि कामा ॥ योग सिद्धि सत्रह अध्याई । सो तौ पूर्ण वर्णि सुनाई ॥
कबीर उवाच
कहै कबीर सुनु धर्मनिराया । तीनिउ गुण वरतै संसारा ॥ साधू कहैं कोइ कर्म न लगै । तन मनते इच्छा कह त्यागै ॥ कर्म करै कर्ता न कहावै । मन सो कुमारग जान न पावै ॥ मारग अगम साधुकर होई । कृष्ण अपने मुख भाषा सोई ॥ वेद पुराण पार नहिं पावै । जहँवा साधू ध्यान लगावै ॥ वेद कितेब दोउ है फन्दा । यहि ते लागि रहै जग धन्या ॥
उग्रगीता
( ९७ )
ज्ञानहि कहि २ कर्म हटावै । यज्ञ दान फिरि जन्म धरावै ॥ हम तौ कहौ अगोचर ज्ञाना । जाते होइ हंस निर्वाना ॥
छन्द—अगम अगोचर भेद सदगुरु साधु रहै समाइ कै । हंस होइ सत्यलोक आवै दरस सद्वरु पाइ कै ॥ पूरा गुरु जो पावई तौ मिटै यम फंद को । हंसको मुक्ताइ यमसो मिलै अच्युतानंदको ॥
सोरठा—ऐसा शब्द अपार, वार पार बिच भेद को । सत्य शब्द निर्धार, सद्वरु सोइ बताइया ॥
इति श्रीमदुग्रगीताब्रह्मज्ञानयोगमते कबीरधर्मदाससंवादे योग-
सिद्धव्याख्यानो नाम सप्तश्लोऽध्यायः ॥ १७ ॥
अथ अष्टादशोऽध्यायः
अर्जुन उवाच
अर्जुन कहैं सुनो यदुनाथा । जो पूछौं सो कगै सनाथा ॥ सन्यास कर्म काहे सो कहिये । त्याग रूप सब वर्णन चहिये ॥
संन्यासको वर्णन
सुनु महाबाहु मैं कहौं बखाना । कर्म नाश संन्यास समाना ॥ कर्म धर्मको मारग छोंडै । ब्रह्म ध्यान अभ्यन्तर मांडै ॥ सब परपंचते न्यारा होई । कर्म संन्यास कहावै सोई ॥
त्यागरूप दर्शन
त्याग रूप है अगम अलेखा । कर्म करै नहिं आपु विशेषा ॥ निशि दिन कर्म धर्म जो होई । रहै अलिस लिस नहिं होई ॥ अपनेको कर्ता नहिं जानै । फल औ फल मनहिं नहिं आनै ॥ ताकहैं त्याग कहीये भाई । निशि दिन रहै नाम लौलाई ॥
( ५८ )
बोधसागर
संन्यास त्रिप्रार वर्णन
संन्यास त्याग तीनि गति होई । अनिष्ट इष्ट मिश्र गति सोई ॥ अनिष्ट नर्ककी योनी भुक्ते । देव योनिको इष्ट संयुक्ते ॥ मिश्र मानुषकी देह जो पावै । तीनों गति गीता बतलावै ॥
त्रिप्रकार क्रिया वर्णन
कहौ क्रिया तीनिहु समुझाई । ज्ञान कर्म कर्ता जो आई ॥
ज्ञान क्रिया त्रिप्रकार
प्रथमैं ज्ञान सुनौ चितलाई । ताकर लक्षण तीनि बताई ॥ जबही ज्ञान हृदयमें आवै । सर्व त्यागि प्रभुको लवलवै ॥ सर्व व्यापि जो ब्रह्महि जानै । सात्त्विक लक्षण ज्ञान बखानै ॥ राजस लक्षण जानै प्रभु न्यारा । न्यारा २ ब्रह्म विचारा ॥ तामस लक्षण एक ठौरहि जानै । मूरति प्रतिमा पूजा ठानै ॥ ताहि एहै ठाकुर है येही । परम पुरुषते नाहिं सनेही ॥ जेहि देवा कौ जो कोई ध्यावै । तेहि देवहि ठाकुर ठहरावै ॥ यह लक्षण तम गुण व्यवहारा । तामैं वास है नरक दुबारा ॥
कर्म क्रिया त्रिप्रकार वर्णन
दोसर कर्म लक्षण है तीनि । जानै कोउ साधू परबीनी ॥ कर्म करै फल चहैन ताको । पुत्र कलत्र असंग सदाको ॥ राग द्वेष जाके नहिं आवै । एतौ सत्त्वगुण कर्म सुभावे ॥ राजस कर्म सुनावौं मीता । करि २ कर्म कामना प्रीता ॥ कर्म अधिकार आपु ना होई । फल वांछै मन राजस सोई ॥ तामस कर्म सुनौ तुम भाई । तप स्नान औ जप लर जाई ॥ हठ करि कर्म करै बहु भाई । दुख सुख अह निशि लहै सदाई ॥ ता प्रकार क्रोधहु बहु होई । तामस नर्क वास है सोई ॥
कर्ता लक्षण त्रै प्रकार
तीसर कर्ता रूप बखानौं । कारण करण करै सोइ जानौं ॥
उग्रगीता
( ५९ )
सात्त्विक कर्ता जो कछु करई । आपु मेटि प्रभुको चित धरई ॥ आपुको कर्ता नहिं जानै । कर्ता पूरण पुरुष बखानै ॥ ऐसी रहनि रहै जो दासा । नर्क स्वर्गकी ताहि न आसा ॥ सो सत्त्व गुण लक्षण है भाई । जाते कहिये साधु सुभाई ॥ राजस कर्ता आपुको जानै । दाराहित सुत आपको मानै ॥ बहुतै हर्ष शोक तेहि भावै । थोर करै बहुतै फल धावै ॥ तामस कर्ता लक्षण भाई । आलस निद्रा बहुत रहाई ॥ आपु अयोग चाहै पुरुषारथ । ह्वै अधीन नहिं चाहै स्वारथ ॥ कारज होइ गये अब जाको । दिन औ राति बतावै ताको ॥ भोर होइ सो दिवस बतावै । तामसकर यह सदा सुभावै ॥
त्रिप्रकार बुद्धिको वर्णन
तीनि प्रकार बुद्धि है भाई । प्रथमैं सुमिरन मैं ठहराई ॥ निवृत्ति प्रवृत्ति जो मारग जानै । करै विचार धर्म पहिचानै ॥ काज अकाज न बंध न मोक्षण । सो साध्वी है सात्त्विक लक्षण ॥ दुसरी बुद्धि तो धर्म अधर्मा । काज अकाज जाने सब पर्मा ॥ राजस बुद्धि लक्षण यह भाई । मनमें सहा विचार कराई ॥ तामसबुद्धि अब सुनहु सुजाना । क्रोध लिये मन विषय सुजाना ॥ धर्महि सो अधरम करि जानै । करै अधर्म धर्म पहिचानै ॥ ता अधरम कह धर्म जो कहई । सदा तामसी बहु दुख सहई ॥
त्रिप्रकार धीरज
सात्त्विक धीरज वरणि सुनाऊ । संशय तोर जो सकल मिटाऊं ॥ पांच तत्त्व मन संयम साधै । सकल कामना यह अवराधै ॥ इंद्री सकल एक सम कराई । सात्त्विक ऐसो धीर धराई ॥ राजस धीरज है परसंगा । पारस लागे धर्म उमंगा ॥ कर्म करै संगति ते सोई । औ फल चाहै राजस होई ॥
( ६० )
बोधसागर
धीरज तामस सपना देखै । भय अभय सकलौ में पेखै ॥ शोक विषाद बसै मन माहीं । तामस धीरज लक्षण आहीं ॥
त्रिप्रकार सुख वर्णन
अब सुख लक्षण कहौ जो सोई। तीनि भांति सुख व्यापक होई॥ प्रथमहि सात्त्विक सुख सुनु भाई। सुख कहैं विषके जानै सोई ॥ सुखसो कबही हेत न जानै । विष समान ताकह पहिचानै ॥ अंत समय विषसो सुख होई । सात्त्विक लक्षण बरनौ सोई ॥ दूसर इन्द्री सुख संयोगा । परनारी सो करै जो भोगा ॥ यही प्रकार महा सुख करई । सो सुखी अंत जो विषसो होई॥ राजस सुख लक्षण यह भाई । दुख बहुतक व्यापै जाई ॥ तीसर तामस सुखहि बखानो । विवेक विचार हृदय नहि अनो॥ आलस निद्रा बहु सुख मानै । सपने कबहीं राम न जानै ॥ तामस सुख यह कहिये भाई । जाते नर्क सदा भर्माई ॥
वर्णका वर्णन
चारि वर्ण अब वर्णौ भाई । तिनके ये गुण प्रगट सुनाई ॥ ब्राह्मण सत्त्वगुण रूप विराजै । कर्म स्वभाव ताहि तन छाजै ॥ शम दम तव शून्या सो करई । ज्ञान विज्ञान सत्य मन धरई ॥ स्थिर मनमें कठोर तन होई । ब्राह्मण कर्म स्वभाव जो सोई॥ क्षत्रिय सत्वरज दुइ गुण धारी। शूरबीर दाता अधिकारी ॥ तीक्ष्ण धीरज बुद्धि हे जागी । युद्ध करत कबहूँ नहि भागी ॥ वैश्य राजसी कहौ बुझाई । कृषी गऊ रक्षक है भाई ॥ वणिज व्योहार बहुत संसारा । यह तौ लक्षण वणिज व्यवहारा॥ शूद्र वर्ण सेवकाई करई । सेवक होइ भवसागर तरई ॥ सेवा फल है अगम अपारा । आवागमनते होई निनारा ॥ जो अभिमान तौ जन्म गवाँवै । सेवा विना नहीं बनि आवै ॥
उग्रगीता
( ६१ )
चारि वर्णको कर्म सुनाई । अर्जुन तोहि कहौं ससुझाई ॥ जो कोइ अपने धर्महि चाहे । प्रीति भाव सदा चित लाहे ॥ भला जानि पर धर्म न लेई । आपन धर्म छांड़ि नहि देई ॥ निज कुल छांड़ि ऊंच मन धरई । सो पुनि भवसागरमें परई ॥ कुलके कर्म सदा सुख पावै । नवनिधि लक्ष्मी ता घर आवै ॥ ताते तोहि कहौं ससुझाई । युद्ध करो तुम अर्जुन भाई ॥ कहा हमार चित नहि धरिहौ । हमरे कहे युद्ध नहि करिहौ ॥ तौ अब कर्म रेख उठि धावै । तोसो युद्ध अनेक करावै ॥ तब तुम करो युद्ध संग्रामा । करो मारि क्षत्रियके कामा ॥ तब तोहि रोख अधिक होइ भाई । हमरी प्रीति भंग होइ जाई ॥ जो नीका सो करो सुजाना । ज्ञान अज्ञान सब करेउँ बखाना ॥ यह गीता मैं कहि जो सुनावा । पै कछु भेद और ससुझावा ॥ गीता मता गुप्त है भाई । चारिहु जनको कहि ससुझाई ॥
चारि अवर्णको वर्णन
भक्ती हीना तपसो हीना । सेवा बिना नहीं आधीना ॥ निद्रा रूप सदासों रहई । तासो गीता कबहु न कहई ॥ तासों संगति कबहु न कीजे । इच्छा प्रभुकी गहिकै लीजे ॥ गुप्त ज्ञान है कथा पियारी । तहाँ कहो जहँ होइ हितकारी ॥ भक्त साधु जहँ हरि यश गावै । गीता कथा तहाँ अर्थोवै ॥ सुनत सुनावत बहु सुख होई । कोटिक अश्वमेध फल होई ॥ अर्जुन गीता तुम्है सुनावौं । ज्ञान कथा कहि बहु ससुझवौं ॥ मोह तुम्हार छूटि की नाही । सो तुम बोलौं हमरे पाहीं ॥ जो कछु तुम्हरे मनमें होई । करो जाइ तुम अर्जुन सोई ॥ अर्जुन सुनत दंडवत कीन्हा । विनय भांति ते बहु सुख दीन्हा ॥ मोह मोरि सब दूरि परानै । वचन तुम्हार ज्ञान करि मानै ॥ अन्न लीन तब हाथ उठाई । महा कोप होइ धनुष चढाई ॥
( ६२ )
बोधसागर
अध्याय अठारह कहा बखानी । योग सन्यास नाम तेहि जानी॥ अर्जुन गीता भयो समापति । जो कछु कही आपुकमलापति॥
कबीर उवाच
कहै कबीर सुन धर्मनि हीता । तुम्हरे लिये बखानेउँ गीता ॥ तुम तौ भक्त जत्तते न्यारा । आवागमनके बीज तुम्हारा ॥ अब तुम परम भक्ति चितलावौ । निशिदिनसतगुरुशब्द समावौ ॥ धर्मदास बिनती इठि लाई । सुनि गीता संशय उपजाई ॥ गीता कही कृष्ण केहि कारण । अर्जुन उठे कुटुम्ब संचारण ॥ ज्ञान सुने मति निर्मल होई । मित्र औ दुष्ट एक सम होई ॥ ज्ञान सुने कछु कोध न आवै । परम पुरुषते मन चितलावै ॥ गीता कृष्ण जो कहेउ बखाना । ज्ञान सुनाइ कोध मन आना ॥ कोधविना सो युद्ध न होई । नर्क द्वार कृष्ण कहेउ सोई ॥ कोध किये अज्ञान कहावै । यह सब भेद मोहि समुझावै ॥ कृष्णमता कहि प्रकट देखाऊ । ज्ञान सुने अज्ञान न आऊ ॥
कबीर उवाच
सुनि धर्मनि यह भेद है बंका । जानत नहीं राउ औ रंका ॥ कृष्ण ठगौरी जत्त लगाई । ताते भेद न बूझौ भाई ॥ यह प्रपंच कृष्णकर आही । तीनिहु लोक सदा भर्माई ॥ चाहै छल बल युद्ध करावै । अर्जुन कैसे धनुष उठावै ॥ महामोह तेहि रहा समाई । और भांति नहि मानै भाई ॥ छलहि मता किन्हौ आपै सोई । ज्ञान सुनाइ मोह कह खोई ॥ यह तौ ज्ञान कहो परमारथ । जेहिते युद्ध होइ पुनि स्वारथ ॥ जैसी इच्छा करै जो ज्ञाना । फल पावै सेवा अनुमाना ॥ नहिं अर्जुन मनपुरुष मिलापा । कैसे कर्म होइ निष्पापा ॥ पुरुष मिलाय न कृष्ण सुनावै । कैसे अगम अगोचर पावै ॥
उग्रगीता
( ६३ )
पावै अगम कृष्ण को मानै । तीनि लोकको भूपति जानै ॥ ताते ज्ञान कहि कर्म दृढ़ावै । फिरि २ भवसागर भटकावै ॥
धर्मदास उवाच
धर्मदास कहैं सुनो गोसाई । मारग साधु जो अगम सुनाई ॥ कर्म धर्म कह पाछे मेलै । ज्ञान रूप अभ्यन्तर खेलै ॥ परम अनंद पुरुषको दर्शै । सेवक स्वामी चरण न पशैं ॥ गीता कहै औ कर्म दृढ़ावै । केहि कारण इनको भटकावै ॥ कौन ज्ञान जो भर्म बतावै । फिरि २ भवसागर भटकावै ॥
कवीर उवाच
धर्मदास मैं कहौ बुझाई । मूरुख लोग नहीं पतिआई ॥ तीनिउ लोक पुरुषपहि दीन्ह। राजे काज करावन कीन्ह। ॥ जो चाहै सो रचे बनावै । तीनि लोकते जान न पावै ॥ ज्ञानोपदेश देह जो भाई । तौ यह सृष्टि वैराग उठाई ॥ तब यह रचना सबही थाके । इनको कौन गोसाईया थापे ॥ तेहि कारण इन कर्म दृढ़ाई । अरुझी सृष्टि सकल भर्माई ॥ सतगुरु शब्द सुना कहैं दरसै । जाते प्रभु पूरण कहैं परसे ॥ गीता कहि जो कृष्ण सुनाई । तबहु न अंधा मोहि पतिआई ॥
धर्मदास उवाच
धर्मदास बिनती अनुसारि । हे सतगुरु मैं तव बलिहारी ॥ जब कर अर्जुन धनुष संभारा । कहा कीन्ह सो कहौ विचारा ॥
कवीर उवाच
सुनो संत धर्मनि निर्वाना । अंत युद्ध सब करों बखाना ॥ बहुते भांति युद्ध तिन कीन्ह। युद्ध जीति राजहि मन दीन्ह। ॥ राज युधिष्ठिर मनहि विचारा । बहुते भांति बंधु हम मारा ॥ कस प्रायश्चित्त मोक्षण होई । कहो व्यास हमसों तुम सोई ॥
( ६४ )
बोधसागर
व्यास कृष्ण मिलि मत अर्थाई । कुल हत्या कैसे मुक्ताई ॥ करो विचार अश्वमेध जो करई । यज्ञ करत हत्या परिहरई ॥ सब मिलि ऐसा मता विचारा । बहुत भांति यज्ञ करौ संभारा ॥ ताते पाप मोक्ष होइ भाई । यज्ञ करनको मता हटाई ॥ करौ यज्ञ मन भयो विश्रामा । राज मनोरथ पूर्ण कामा ॥
धर्मदास उवाच
धर्मदास विनवै कर जोरी । संशय उपजी मेटेउ मोरी ॥ पांडव कृष्णहि बहुत पियारे । किया यज्ञ तब कहाँ सिधारे ॥ कैसे गति मति उन पुनि पाई । कृष्ण सरीखो रहै समाई ॥
कबीर उवाच
धर्मदास तुम चतुर सुजाना । पूछेउ सो अब करौ बखाना ॥ कृष्ण देह जब छांडन लागे । तिनसों कहो ताहिंते आगे ॥ अवधि हमारि आय नियराई । तुम हूँ गरो हेवारे जाई ॥ अर्जुन कहहु सुनौ गोसाई । कारण कवन हेवारे जाई ॥ कृष्ण कही तब ऐसी बाता । तुम तौ बंधु कीन्ह है घाता ॥ पातक बहुत जो तुमसे भयऊ । गरै हेवारे ताते कहेऊ ॥ कहैं अर्जुन सुनु पुरुष पुराना । मारण बंधु न हम चित आना ॥ गीता ज्ञान मोहि समुझाया । युद्ध करनको अस्त्र बँधाया ॥ तुमको पातक नाहीं लागे । कर्ता करै आपु अनुरागे ॥ तुम्हरे कहे युद्ध हम कीन्हा । पातक हम शिर काहे दीन्हा ॥ पुनि तुम कह अश्वमेधहि करहू । सब पातक पाछिल परिहरहू ॥ तापर हम अश्वमेध जो कीन्हा । तबहू पातक हम शिर दीन्हा ॥ कहैं कृष्ण अर्जुन सुनु भाई । कर्म रेख मेटो नहिं जाई ॥ कर्म रेखते सब जग आवै । बार बार दुख सुख भुक्तावै ॥ चारिउ युग फिरि याहै आई । हम तुम ऐसे संग रहाई ॥
उद्गीता
( ६५ )
ताते कछु संदेह न कीजै । वेगि हेवारे पयाना दीजै ॥
धर्मदास उवाच
धर्मदास पूछै सुनु भाई । आगे कैसे भई गुसाई ॥
कबीर उवाच
कहै कबीर यह सर्ग बखाना । तुमसों वर्णन कहौं निदाना ॥ पांडव जाइ हेवारे गलिया । देह समेत युधिष्ठिर चलिया ॥ करेउ पुण्य जप तप औदाना । ताते पहुँचे स्वर्ग स्थाना ॥ और पांडवा नर्क समाने । हत्याके फल नर्क रहाने ॥ तहां जाइ कोइ बंधु न देखा । पूछेउ सबै देव मुनि शेषा ॥ कहां हमारे चारिउ भाई । केहि कारण मोहि इहां ले आई ॥ इहां कहां वे बसवे पाई । जाके खोजौं चारिउ भाई ॥ तुम राजा हो धर्म अवतारा । ताते पहुंचै स्वर्ग दुआरा ॥ बंधु तुम्हार पातक बड़ कीन्हा । ताते बास नर्कमें दीन्हा ॥
युधिष्ठिर उवाच
की उनको इहवां लै आवहु । की हमको उहवां लै जावहु ॥ जब यह विष्णु सुनो मन जानी । इनकह पुण्य बहुत पहिचानी ॥ उपजो मोह बंधु हित भाई । जाइ ले आवहु बंधु देखाई ॥ नर्क कुण्ड तेहि जाइ देखाई । बूड़ देखे चारिउ भाई ॥ और सकल परिवार घनेरा । काहू सुधि नहिं काहू केरा ॥ चारिउ भाई रोवन लागे । कर्म हीन हम बड़े अभागे ॥ राइ युधिष्ठिर मोह जनाऊ । मोह नर्क कुंड ले नाऊ ॥ दूत विष्णु सों बहुरि जनार्द । आपु युधिष्ठिर नर्कमें जाई ॥ जो कछु आज्ञा होइ गोसाई । आज्ञा मानि करौ सोइ जाई ॥ कहै विष्णु यह धर्म सरूपा । करो युधिष्ठिर पुण्य अत्रुपा ॥ जो कबहीं वे नर्क में जैहैं । अघ जीवन सब ले उत्तरे हैं ॥
नं. ८ कबीर सागर - ३
( ६६ )
बोधसागर
क्षण अंगुरी ले नर्कमो डारो । एते चारिउ बन्धु उबारो ॥ फिर लै आवहु कुंती जहवां । स्वर्ग स्थान वैकुंठ हैं जहवां ॥ ऐसी भांति करौ तहैं जाई । क्षणहि अंगुरी नर्क बुझाई ॥ ता कहैं लागि बंधु सब आये । राइ अनंद बहुत सुख पाये ॥ गये युधिष्ठिर धर्म स्थाना । धर्म पुत्र रहे धर्म ठेकाना ॥ भीम जाइकै पवन समाई । पवन पुत्र जेहि कहिये भाई ॥ अर्जुन इन्द्र पुत्र जो रहिया । इंद्रलोकमें बासा करिया ॥ सहदेव नकुल जो दूनों भाई । अश्विनि कुमार पुत्र हितलाई ॥ ऐसे स्वर्ग लोक जो किय बासा । पुण्य घटै भवसागर आसा ॥
धर्मदास उवाच
धर्मदास कहैं सुनो गोसाँई । पांडव मित्र विष्णुके आहीं ॥ गीता भागवत वेद पुकारा । दर्शन प्रभु जिन नेक निहारा ॥ ताकर आवागमन न होई । सुर नर सुनि सब भाषै सोई ॥ साधु संत मिले सब गुणगवैं । जो कोइ हरिके दर्शन पावैं ॥ ताकी मोक्ष मुक्ति होइ भाई । जरा मरणको बीज नसाई ॥ साक्षादर्शन कृष्णको लहिया । और विराट देखायो तहिया ॥ मोक्ष मुक्ति उन काहे न पाई । साहेब कहौ मोहि समुझाई ॥
कबीर उवाच
कहै कबीर सुनौ धर्मदासा । पुरुष एक आदि रहि वासा ॥ तिन्ह पुनि खासा कीन्ह प्रकाशा । धर्म धीर एक अंश नेवासा ॥ तिनते उपजेउ ॐॐकारा । माया प्रकट भई विस्तारा ॥ ब्रह्मा विष्णु उपजे तब भाई । जिन यह रची सृष्टि दुनियाई ॥ इनकह तीनलोक जो दीन्हा । राज रूप रचना तिन कीन्हा ॥ सकल बीज जो पुरुषते आया । जाते सकल सृष्टि निर्माया ॥ कामिनि जबै धर्म निज कीन्हा । कर्मरेख जो भया अधीना ॥ दश अवतार कर्म सो भयऊ । कारण कर्म इन्है निर्मयऊ ॥
उग्रगीता
( ६७ )
कर्मरेख रघुपति दुख पायउ । सीता शोक बहु पछितायउ ॥ नरसिंह शूकर रूप धरावा । मच्छ कच्छ सर्व कर्म बनावा ॥ वामन होइ बलि छलिया जाई । परशुराम होइ युद्ध कराई ॥ कर्मरेख यदुपति दुख पावा । बन २ घेनु चरावन धावा ॥ गोपी षोडश सहस्र अनंदा । तिन सँग नाचे बाल सुकुन्दा ॥ कर्मरेख भे बोध शरीरा । आवा गमन मिटो नहीं पीरा ॥ निष्कलंक है दश अवतारा । कर्मरेख भय प्रलय संचारा ॥ इनते अधिक और को आही । कर्मरेखते भुक्तत जाही ॥ अंकुरी कोइ जीव रहे भाई । सो अंकुर पुरुष ते आई ॥ तिन कह पुरुष जो चितवन कीन्हा । कैसे लोक होइ लव लीना ॥ सतगुरु यहि कारण उपजावा । हंसन कारण मोहिं पठावा ॥ मूर्खा शब्द नहिं मानै भाई । अंकुरी परवाना पाई ॥ कर्मरेख पांडव दुख पावा । कर्मरेख छूटै न छुटावा ॥ इन कहैं सब जग करता जाने । ताते आवा गमन नसाने ॥ सतगुरु मिले सत्य शब्द लखावै । कर्मरेख बंधन सुक्तावै ॥
छंद-धर्मदास तुम बूझि देखौ छल मता भगवानहो ।
मूर्ख जन उपदेश कारण गीता कियो बखान हो ॥
पांच पांडव परम मंत्री तिनको गति कैसी दर्ई ।
नर्क स्वर्गमें वास करि २ जन्म फिरि २ तिन लई ॥
सोरठा-बूझो संत सुजान, गीता कथा जो सब सुनी ।
चेतनि हंस अमानि, और सकल भरमें दुनी ॥
इति श्रीमदुग्रगीताब्रह्मज्ञानयोगमते कबीरधर्मदाससंवादे
त्यागसंन्यासव्याख्यानं नामाष्टादशोऽध्यायः ॥ १८ ॥
( ६८ )
बोधसागर
अथ उपसंहार
धर्मदास उचाव
धर्मदास विनवै कर जोरी । तुम दयालु बंदी मोरि छोरी ॥ गीता जो तुम कही बखानी । पांडवकी गति सब मैं जानी ॥ ऐसे सब जीव भरमाई । कैसेहु भांति मुक्ति नहिं थाई ॥ सोइ ज्ञान मोहिकहि समुझावौ । जरा मरण को बीज नसावौ ॥
कबीर उचाव
सुनु धर्मदास हंस पतिराया । हंसन कारण पुरुष की दया ॥ अंकुरी जिव आपु बोलाया । ताते हम कह लेन पठाया ॥ सत्य शब्द अब करौ प्रकाशा । पावै हंसा लोक निवासा ॥ उग्र ज्ञान है मता निनारा । सुक्ष्म वेद जो पुरुष संचारा ॥ पुरुष दया आनेउ संसारा । जेहिते पावै मुक्ति दुवारा ॥ अध्याय उनइस कहौं ये भाई । सुर नर मुनि जाने नहिं ताई ॥ मुक्त होइ सत्यलोकहि जावै । आदि पुरुषके दर्शन पावै ॥ प्रथमै रहनी हंस बखानो । निशि दिन रहै नाम लपटानो ॥ तीनों गुण है विषके मूला । ताते दुख सुख भये स्थूला ॥ दुइ गुण कबहीं चित नहिं धारै । रज तमको परंपच विसारै ॥ वासा करै सत्यके माहीं । आसा ताकी राखै नाहीं ॥ प्रकृति पचीस पंच तत्त्व रहई । तीनिउ गुण कारण यह वहई ॥ जो तीनिउ गुण वश करै आपै । पंच पचीस कोइ नहिं व्यापै ॥ तीनिउ गुणते न्यारा खेले । मनुआ सत्य सुमिरनमें मेले ॥ श्वास मुर्ति एक डोरी लावै । अजर अमर होइ हंस मिलावै ॥ मन पवना ले सुख मनि राखै । सोहं हंस अमीरस चाखै ॥ तहवां अनहद होइ झनकारा । विन दीपक मंदिर उजियारा ॥ अनहद सुने अकह गुप्त गावै । मन चित गहि २ सुरति लगावै ॥ तहवां रैन दिवस नहिं होई । पुरुष २ सो सुरति समोई ॥
उग्रगीता
( ६९ )
ऐसी रहनी हंस रहावै । बहुरि न योनी संकट आवै ॥
धर्मदास उवाच
धर्मदास कहै सुनो गोसाई । पुरुष नाम कहऊ समुझाई ॥ सहस्रनाम जो देव बखाना । नेति २ कह बहुरि निदाना ॥ कौन नाम को सुमिरन करई । कैसे सदा पुरुष चित धरई ॥ कैसे आवागमन मिटाई । क्षर निर अक्षर कह समुझाई ॥
कबीर उवाच
सुनु धर्मनि तुम हंस पियारे । तुम्हरो काज सकल हम सारे ॥ सुमिरन आदि मैं तुम्है सुनावौँ । सकल कामना तोर मिटावौँ ॥ नाम एक जो पुरुषको आही । अगम अपार पार नहिं जाही ॥ वेद पुराण पार नहिं पावै । ब्रह्मा विष्णु महेश्वर धावै ॥ जानि कहौँ तौ को पतिआई । अंत कहौँ तौ परलै जाई ॥ आंदे अंतमें बासा होई । निर अक्षर पावै जन सोई ॥ अक्षर कह सब जक्त बखानै । निरअक्षरको मर्म न जानै ॥ कहो न जाई लिखो ना जाई । बिन सद्गुरु कोउ नाहीं पाई ॥ सद्गुरु मिलै तो अगम लखावै । हंस अमी पीबत घर आवै ॥ अंकुरी जीव लहे निर्बाना । पावत हंस लोक पहिचाना ॥ सुतिवंत पावै निज वीरा । संग रहौँ मैं दास कबीरा ॥ जो कोई हंस प्रवाना लेई । अग्र नाम सद्गुरु कहि देई ॥ बिन सद्गुरु कोइ नाम न पावै । पूरा गुरु अकह समुझावै ॥ अकह नाम वह कहा न जाई । अकह कहि कहि गुरु समुझाई ॥ समुझत लोक परै पुनि चीन्हा । जाते लोक होइ लवलीना ॥ हरदम सुमिरे चित लगाई । लोक दीपमें जाइ समाई ॥ अजर अमर होइ लोक सिधावै । चौरासी बंधन मुक्तावै ॥ आवागमन ताहि नहिं भाई । जरा मरणका बीज नसाई ॥
( ७० )
बोधसागर
धर्मदास उवाच
धर्मदास भये बहुत अधीना । सद्गुरु पूरा तुम कहैं चीन्हा ॥ तुम्हरी दया नाम हम पावा । बन्दी छोड हंस मुक्तावा ॥ करहु दया अब अंतर्ध्यामी । लोक दीपको वरण बखानी ॥ जहवां सत्य पुरुष रह जोई । हंसा तहवाँ दर्शन होई ॥ पुरुष शोभा वरणि सुनावो । दया करो अब भेद लखावो ॥
कबीर उवाच
कहै कबीर सुनौ धर्मदासा । ऐसा भेद नहीं परकाशा ॥ यह तौ भेद अगम है भाई । वेद कितेव कहूँ नहिं पाई ॥ शेष महेश न कोई जाने । ब्रह्मा खोजत ताहि भुलाने ॥ विष्णु सदा मन सुमरिन करई । पै काहू नहिं परकट करई ॥ ज्ञान कहै तब पुरुष बतावै । सुनि पुनि आपा लै ठहरावै ॥ यह जग मूरख महा अचेता । परम पुरुषते नाहिन हेता ॥ हेत बिहूना जो नर आही । यह तौ भेद कही नहिं ताही ॥ सुरतिवंत हंसा जो होई । तासे भेद न राखेहु गोई ॥ उपज्ञान यह भेद अपारा । तुमसे कहा आज हम सारा ॥ सूक्ष्म वेद भेद जो पावै । अजर अमर होइ लोकसिधायै ॥ लोक दीप औ प्रकट बखानौ । धर्मनिसुरति रनिति सो ठानौ ॥ तीनिलोकते भिन्न पसार । सत्य लोक पुरुष दरबारा ॥ पुष्प दीप जहँ पुरुष स्थाना । आदि पुरुष जहँ बैठ अमाना ॥ सूर्य सोरह जोति निवासा । ऐसा एक हँस परकाशा ॥ श्वेतै दीप श्वेत विस्तारा । श्वेतै मंदिर श्वेतै द्वारा ॥ अजर हंस है श्वेतै भाई । सदा अनंद रहै सुखछाई ॥ श्वेत छत्र सिंहासन छाजै । अनहद शब्द सदा धुनिगाजै ॥ अक्षय वृक्ष जहँ श्वेत सोहावन । श्वेत पुरुष श्वेत फल पावन ॥ श्वेतै पान श्वेत पनवेरा । श्वेत सुपारी नरिअर केरा ॥
उग्रगीता
(७१)
श्वेत मिठाई कदली मेवा । अजर आरती हंसक मेवा ॥ सदा आरती हंस जो करई । अपने पुरुष चरणन रई ॥ असंख्यकमलश्वेत तहँ रहिया । सप्त पाखुरी कमल जो रहिया ॥ पुरुष गुप्त होइ रहे समाई । सूक्ष्म शीश तहां दरसाई ॥ संपुट पञ्च लाख है भाई । बानि उठै संपुट बिहराई ॥ उघरे संपुट दर्शन पावै । अजर हंस तहवाँ सन्तु पावै ॥ करत अनन्द सदा सुख भोगा । जरा मरण नहिं संशय सोगा ॥ जग मग जोति सदा उजियारा । कोटि सूर्यते वर्ण अपारा ॥ जहँ देखो तहँ शोभा छाजै । पूर्ण शोभा पुरुष विराजै ॥ कहा बखानौ पुरुष सरूपा । वरणि न जाइ वह रूप अनूपा ॥ जब लग तियापुरुष नहिं परसै । कहा बखाने सुख बिनु तरसै ॥ तिया पुरुष जब मिलिया भाई । तब सुख कछू कही न जाई ॥ जिन जाना तिनही पहिचाना । जैसे गूंगा सपना जाना ॥ कहा बखानौ वरणि न जाई । गूंगा गूंगे सैन लखाई ॥ ऐसा सतगुरु भेद लखावै । सुरतिवंत हंसा सन्तुपावै ॥ वाहू नदी अठारह गंडा । जेते तारा है ब्रह्मंडा ॥ एते सूर्य जो वसै अकाशा । तऊ न पुरुषके सम परकाशा ॥ पटतर तहां पुरुषकी दीजै । सतगुरु सैन समुझिकै लीजै ॥
छन्द-पुरुष शोभा कह बखानो कछु नहीं सम तूल हो ।
असंख्य सूर्य प्रकाशते वहँ जोति अगम स्थूल हो ॥
सैन करि करि नैन भरि भरि शब्द सतगुरु पर्व हो ।
पुरुष अवर न रूप जाको शोभा हंस लग दर्श हो ॥
सोरठा-उग्रगीत यह सार, गुप्त अध्याय उन्नीसमें ।
शब्द सुरति आधार, हंसा पहुँचे लोकको ॥
इति श्रीमदुग्रगीतायां एकौनविंशोऽध्यायः ॥ १९ ॥
इति श्रीबोधसागरान्तर्गत श्रीमदुग्रगीता समाप्ता