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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

( १३० )

बोधसागर

इन्द्रदौनकहँ वचन सुनावो । अहो राव तुम काम लगावो ॥
मण्डप शंक न राखो राजा । इहवों हम आये यहि काजा ॥
जाहु बेगि जनि लावहु बारा । निश्चय मानो वचन हमारा ॥
राजा मण्डप काम लगाई । मण्डप देखि उदधि तब धाई ॥
सागर लहरि उठै बिकरारा । आवै लहरि क्रोध चित धारा ॥
उदधि उमङ्ग क्रोध अति आई । लहरि आनि चौरा नियराई ॥
दरस हमार उदधि तब पाई । अतिभय मान रहा ठहराई ॥

समुद्र वचन

छन्द-रूप धान्यो विप्रको तब उदधि हमपै आइया ।
चरन गहिके माथ नायो मरम हम नहि पाइया ॥
जगन्नाथके भोर स्वामी ताने हम इत आइया ।
अपराध मेरो क्षमा कीजै मरम अब हमपाइया ॥
सोरठा-तुम प्रभु दीन दयाल, रघुपति ओल दिवाइये ।
वचन करो प्रतिपाल, कर जोरे बिनती करो ॥

चौपाई

कीनो गौन लंक रघुवीरा । उदधि बांधि उतरे रन धीरा ॥
जो कोइ करे जोर बरियाई । अलखरूप तिहि ओल दिवाई ॥
मोपर दया करो तुम स्वामी । लेव ओल उर अंतर्धामी ॥

कबीर वचन--चौपाई

ओल तुमार उदधि हम चीन्हा । बोरे नम्र द्वारिका दीना ॥

उदधि वचन

यह सुनि उदधि धरचो तब पाई । चरन टेकि तब चल हरषाई ॥
उदधि लहरि उमँगौ तब धाई । बोरचो नम्र द्वारिका जाई ॥
मंदिर काम पूर तब भयऊ । हरिको थापन तहवों कियऊ ॥

कृष्ण वचन--चौपाई

तब पंडन हरि स्वप्न जनायो । सत्य कबीर मोहिं पै आयो ॥

स्वसमवेदबोध

( १३१ )

आसन सागर तीर बनाईं । दरस कबीर उदधि उठि जाईं॥
यहि विधि मंदिर मोर थपाईं । कलि युगमें एक धाम बसाईं ॥

पंडा वचन--चौपाई

पंडा उदधि तीर तब जाईं । करि असनान मंडपहि जाईं ॥
पंडा मन अस पाखण्ड लाईं । प्रथमहि दरस मलेच्छ देखाईं॥
हरिको दरसन हम नहि पाईं । पहिले हम चौरा गनि आईं ॥
तब हम कौतुक एक बनाईं । पूजन मंडप पंडा जाईं ॥
तहवाँ एक चरित्र रहाईं । लखि पंडा चक्रुत है जाईं ॥
जहँ लगि सूरत मंदिर माहीं । भये कबीर रूप धरि ताहीं ॥
हरि मूरति कहैं पंडा देखा । भये कबीर रूप धरि भेखा ॥
अछत पुष्प लै विप्र भुलाईं । नहिं ठाकुरको पूजन पाईं ॥
देखि चरित्र विप्र शिर नावा । हम स्वामी तुम मर्म न पावा ॥
तुमकहैं देखि हीन मन लाईं । ताते मोहि चरित्र देखाईं ॥
छमा अपराध करो प्रभु मोरे । विनती करौं दोउ कर जोरे ॥

छन्द-बचन एक मैं कह्यौं ताते विप्र सुन तैं कान दे ।

पूज ठाकुर दीन आयसु दुबिधा मनकी छाड़ दे ॥

आंति भोजन करे जो जिव आगहीनो तासुको ।

करे भोजन छूति राखे शीश उलटै जासुको ॥

चौपाई

पंडौ मनमें मान्यौ हीना । ताते यह चरित्र गुरु कीना ॥
जगन्नाथकी छूति उठाईं । बर्न विवेक न तहाँ रहाईं ॥
सबहि जाति हरि भोग लगावैं । यकठे बैठके भोजन पावैं ॥
कछु नहिं छूति रही तिहि ठामा । सर्वजाति यकमय हरिधामा ॥
आचारिनि बहु कीन विचारा । जगन्नाथ है चलै अचारा ॥
तिनको तहैं आचार न चाले । सत्य कबीर वचन को टाले ॥

( १३२ )

बोधसागर

इमि गुरु हरि मंदिर थपवाई । पूरब कथा बहुरि अब आई ॥
श्वपच सुदर्शन तन तजि गयऊ । लोकजाय गुरु बिनती कियऊ ॥
हे सतगुरु अस दाया कीजै । मेरे मातु पिता गति दीजै ॥
श्वपचके मातु पिता जो रहेऊ । पूर्वदेह गुरु ज्ञान न कहेऊ ॥
ताते बहुरि देह सो धारी । द्विजकुलमें प्रकटे नर नारी ॥
पुत्रकि भक्ति प्रतापते सोई । श्वपच देह तजिके द्विज होई ॥
कुलपति नाम पिताको रहेऊ । श्रिया नाम माताको कहेऊ ॥
चन्दवार तेहि नयको नाँऊ । नारी पुरुष बसैं तेहि ठाँऊ ॥
जब दोनों द्विज कुल तन पाई । नरहरि लछमना नाम धराई ॥
जगन्नाथ के योग पग धारे । सत्य कबीर चले चँदवारे ॥
दोऊ जीव तारनके काजा । चँदवार गुरु आनि विराजा ॥

सत्यकबीर वचन-चौपाई

जगन्नाथसे जब पग धारे । तबहि आनि पहुँचे चँदवारे ॥
बालक रूप धरयो तिहि ठामा । कीनेहु तालमाहि विश्रामा ॥
कमल पत्र पर आसन लाई । आठ पहर हम तहाँ रहाई ॥
नरहरि नारि लछमना जोई । तालके ऊपर पहुँची सोई ॥
पुत्र हेत सों आस लगाई । करि असनान विनय रविराई ॥
अञ्जल ले विनवै कर जोरी । सुन्दर पुत्रहेत चित दौरी ॥
ततछन हम अंचल पर आवा । हमकहँ देखि नारि हरषावा ॥
बालरूप है भेटयो ओही । विप्र नारि यह ले गई मोही ॥
बहुत धौस तिहि संग रहाऊ । नारि पुरुष मिलि सेवा लाऊ ॥
जब हम उठै पलँग झटकोरा । सुवरन मिलै तिन्हें यक तोरा ॥
तिनके हृदय न शब्द समार्ई । बालक जानि प्रतीत न आई ॥
ताहि देह नहि चीन्हो मोही । भयो गुप्त तबही तन ओही ॥
नरतिय जब दोनों तन त्यागे । जन्म लीन जोलहा है जागे ॥

स्वतमवेदबोध

( १३३ )

नीरू नीमा जोलह जोलाही । काशी नग्र बसै दोड ताही ॥
ताही नग्र कवीर तलाई । कमल पुष्प तामें रह छाई ॥
बालक रूप तहाँ हम लीने । कमल पुष्प पर आसन कीने ॥
तहैं बारह बालक पौढाऊ । करे कुटूहल बाल सुभाऊ ॥
तिहि औसरमें नीरू जोलाहा । नारि गौन सँग ल्यावै ताहा ॥
तृषावंत जब मै सो नारी । तालपै जल अँचवन पग धारी ॥
नीमा दृष्टि बाल पर परेऊ । देखत दृश मोद मन भरेऊ ॥
जिमिरविदृश पद्म विकशाना । धाय धरचो धन रंक समाना ॥
तब सो बालक लियौ उठाई । ले बालक नीरूपहैं आई ॥
क्रोधवन्त जोलहा तब भैऊ । नीमासे तब ऐसे कहेऊ ॥
काको बालक तैं लै आई । नग्रमें मेरी होय हँसाई ॥
नग्रके लोग हँसैगे मोही । गौनहि तिय बालक सँग जोही ॥
जोलहा रोष कीन तिहि वारी । बेगि देहु तुम बालक हारी ॥
हर्ष गुना बनि नारी लाई । तब हम तासे बचन सुनाई ॥

बाल वचन

छन्द-सुनहु बचन हमार नीमा तोहि कहीं समुझायके ।
पिछली प्रीतिके कारने तोहि दृस दीनो आयके ॥
आपने गृह लै चलो मोहि चीन्हिके जौँ गुरु करो ।
देहुँ नाम दृढाय तुमको फंद यमके नहि परो ॥
सोरठा-सुनत बचन अस नारि, नीरू त्रास न राखेऊ ।
ले गई नग्र मझार, काशी नगर पहुँचेऊ ॥

चौपाई

लै बालक जब घरको गैऊ । नग्र लोग सब देखत भैऊ ॥
नग्र नारि नर हाँसी लाई । नारि गौन सँग बालक ल्याई ॥
जोलहा सुनि सुनि लाजित होई । बाल वृतांत कहै सब सोई ॥

( १३४ )

बोधसागर

यह बालक तलावमें पाईं । नीमा देखि ताहि लै आई ॥
कमलपुष्प शिशु सेज बनाई । हरषित नारि सो लियौ उठाई ॥
जोलहा यद्यपि कथा प्रकासी । तऊ लोग सब करते हाँसी ॥
बहुत घौस तिहि भौन रहाऊ । जोलहा जाने बालक भाऊ ॥
बालक रूप तासु ग्रह रहते । खानपान तहँ नहिं कछु गहते ॥
बिन भोजन तन छवि सरसाई । दिन दिन देहकी दीरघताई ॥
जोलहा पुनि पंडितन बोलाये । बालक नाम धरनको आये ॥
पंडित करन जो लगे बिचारा । तब शिशु निजमुख बचन उचारा ॥
नाम कबीर हमारा अहई । और नाम जनि पंडित कहई ॥
यह सुनिके सब चकृत भैऊ । शिशु निजनाम आपते कहेऊ ॥
कोइ कहै यह दानौ देवा । कोई कहै यह अलख अभेवा ॥
कोई ईश्वर अंश बतावा । कोइ कह आप देह धरि आवा ॥
पंडित निज निज भौन सिधारा । बिन भोजन बीते बहु बारा ॥
जोलहा तब मनमें दुख पाईं । भोजन करो कबीर गोसाईं ॥
जोलहजोलाही दुखित निहारी । तब हम तिनते बचन उचारी ॥
कोरी यक बछिया ले आवो । कोरा भांडा एक मँगावो ॥
ततछन सो जोलहा चलि जाई । गऊ कि बछिया कोरी ल्याई ॥
कोरा भांडा एक गहाई । भांडा बछिया शीघ्रही आई ॥
दोऊ कबीरके सम्मुख आना । बछिया दिशाहछि निज ताना ॥
बछिया हेठ सो भांडा धरेऊ । ताके थनहि दूधते भरेऊ ॥
दूध हमारे आगे धरही । यहिबिधि खानपान नित करही ॥
तबसे जोलहा डरै बहुत । हमरे घर है अचरज पूता ॥
केते दिन यहि विधि चलिगैऊ । संग बालकन खेलत भैऊ ॥
कथै बालकन प्रति विज्ञाना । सो जड़वत नहिं कछु पहिचाना ॥
तब साधुन सँग गोछि कराही । अगम ज्ञान कथ तिनके पाही ॥

स्वसमवेदबोध

( १३५ )

सुनि साधुन मन अचरज होई । यह तो सिद्ध पुरुष है कोई ॥
सब जोलहा मिलके एक बारा । नीरू ते अस बचन उचारा ॥
बालककी सुन्नत करवावो । तिहि कारन सब साज मँगावो ॥
ताहि काल अस कथा कहाई । नाई सुन्नतको बोलवाई ॥
तब नाई कबीर ढिग आया । ले अस्तुरा निकट नियराया ॥
पांच इंद्री ताको दिखलावो । काटि लेहु जो तोहि मनभावो ॥
यह लखि भभरिके नाई भागा । सुन्नत नहीं कीन डर लागा ॥
पुनि जोलहन अस कौतुककीना । तब बोलाय काजीको लीना ॥
एक गाय तिहि काल मँगाई । काजी ताको जबह कराई ॥
जिहि औसर अस कौतुक ठाना । सत्यकबीर मरम सब जाना ॥
खेलत रहे बालकन माहीं । तेहि छन धायके पहुँचे ताहीं ॥
गऊ घात जब देखत भैऊ । दया धारि काजीते कहेऊ ॥
बहुबिधि काजीको समुझाई । महापाप जिव घात बताई ॥
काजी लज्जित है शिर नायौ । बिनती करै न उत्तर आयौ ॥
तबहि कबीर गऊ ढिग जाई । मरी गाय तिहि काल जिवाई ॥
तब जोलहा गृह तजे कबीरा । अब नहिं रहौं तुमारे तीरा ॥
विकल भये तब नीमा नीरू । नग्र चहुँ दिश बालक हेरू ॥
दूँदत सुत न लहौ नर नारी । रुदन बिलाप करै दोउ भारी ॥
विकल विलोकि दया उर आई । तब कबीर तेहि दियो देखाई ॥
नीरू नीमा बिनती करही । प्रभु हमरे गृह पुनि पग धरही ॥
तब हम तिनते बचन उचारी । ऐसो पाप कीन तुम भारी ॥
तब जोलहा बोलै शिर नाई । नहिं यह पाप मेरी समताई ॥
मिल जोलहन कीनी बरियाई । ताकी खबर न मैं कहु पाई ॥
तापर कृपा बढुरिकै कीना । पुनि ताके गृहमें पग दीना ॥
बाल चरित्र है विविधि विधाना । सो संकेत न होय बखाना ॥

( १३६ )

बोधसागर

चरचा जग अनेक परचारा । कछुकसोलिखौं होय विस्तारा॥
रामानंद गुरु जिमि गहेऊ । वेद मते प्रथमै सो कहेऊ ॥
केते ध्योस जोलहा गृह बासा । अजौं न ता हिय ज्ञान प्रकासा॥
बार बार तेहि नाम हटाई । तिनको नहिं प्रतीत गुरु आई॥
बालक जानि न गुरुपद गहेऊ । ताते परमधाम नहिं लहेऊ ॥
जोलहाकी जब आयु पुराई । मथुरा नग्र देह घर जाई ॥
सकल कथा मैं कीन प्रकाशा । जिमिगुरुकर जोलहा गृहवासा॥
श्वपचके मातु पिता जो रहेऊ । श्रीपाकुलपति नाम सोकहेऊ॥
बहुरि लछमना नरहर सोई । नीमा नीरू सोई होई ॥
तिन दुहुँके तारणके काजा । जोलहा गुरुगृह आनि विराजा॥
गर्भवास कबहुँ नहिं आवै । निज इच्छा नर तन दरसावै ॥
हिंदू मुसलमान नहिं सोई । बाल बृद्ध अरु युवा न होई ॥
दाय़ा करै देह नर धरही । जीव अनंत कोटि ले तरही ॥
जरा मरण कबहुँ नहिं ताही । सदा समान एकरस आही ॥
सो वृतांत अब करो बखाना । जिमि कबीर काशी कथ ज्ञाना॥
षट् दरसन झगरनको आवै । अगम ज्ञान सबको समुझावै ॥
सत्यपथको कीन प्रचारा । हिंसा कर्म निंद निरधारा ॥
तीरथ व्रत अरु मूरति पूजा । जीव हने ईश्वर कथ दूजा ॥
जीवघात करिहै जो कोई । वासा तासु नरकमें होई ॥
पाहन को पूजै पाखंडी । गल काटै जो सम्मुख चंडी ॥
बकरा मुरगा जबह जो करही । विस्मिच्छह कहि धर्म उचरही॥
सो सब पापकर्म बतलाये । हिंदू तुर्क सुनत दुख पाये ॥
वैरभाव दोनों कुल धरहीं । सत्यकबीर टेक नहिं टरहीं ॥
मिलि विप्रन अस युक्ति बनाई । किमि कबीरकी हुरमत जाई ॥
ऐसी गोष्ठि सबन मिलि ठाना । करि प्रपंच अस कीन बहाना॥

स्वसमवेदबोध

( १३७ )

जहाँ तहाँ बहु विप्र सिधारा । सत्यकबीर केर भंडारा ॥
निवता दियो चहुँ दिश जाई । साधुनकी जमाति चलिआई ॥
भीर भई साधुनकी भारी । गृह तजि सत्यकबीर सिधारी ॥
आयके विष्णु भये भंडारी । साधुनको आदर कर भारी ॥
पोषन भरना विष्णुको कर्मा । आयके गहि लीनों निजधर्मा ॥
सत्य कबीर कर्मते न्यारा । मायाको सब खेल पसारा ॥
माया सदा जासुकी दासी । सकै कौन करि ताकी हाँसी ॥
सब साधुनको हरि सनमाने । विप्र सकल देखत खिसियाने ॥
मर्म न कोई लरुयो तिहि बारा । धन्य कबीर धन्य भंडारा ॥
दोहा-काशी कुटी कबीरपर, भई साधुनकी भीर ।
जो कलु किया सो हरि किया, होय कबीर कबीर ॥

चोपाई

आदर भोजन दछिना पाई । धन्य धन्य कहि साधु सिधाई ॥
काजी पंडित करें विचारा । जाय कबीर कौन विधि मारा ॥
काशीमें तेहि काल बताई । शाह सिकन्दर पहुँचा आई ॥

इति

ग्रंथनिरंभयज्ञान-सत्यकबीर वचन

साखी-कलिमहँ काशी प्रकटचौ, सुनो सन्त धर्मदास ।
सत्य पंथ परचारैऊ, निंदक भये उदास ॥
शाह शिकंदरके तन, भयो ज्वाल उत्पान ।
दुखग्याकुल अति विकलतन, काशी पहुँचा आन ॥

चोपाई

पूछै शाह ऐसा कोइ भाई । जाते मेरो कष्ट दुराई ॥
साखी-काजी पंडित मिलिके, कहा शाहसे जाय ।
है कबीर दरवेश यक, ताको लेहु बुलाय ॥

( १३८ )

बोधसागर

चौपाई

कहैं शाह तेहि तुरत ले आवो । साइत एक विलंब न लावो ॥
सारखी-आये धायके लोग बहु, आतुर बोले वैन ।
चलो कबीरा शाहपै, हम आये तोहि लैन ॥

चौपाई

गये शाहके सन्मुख जबही । ज्वाला देह दूर भइ तबही ॥
उठिके शाह भयो तब ठाढा । मोहिते अधिक प्रेम तब बाढा ॥
सारखी-शाह न छोडे हमकहँ, बढचो प्रेम मनमाहिँ ।
शेखतकी तेहि पीर थे, सो सुरझे मनमाहिँ ॥

चौपाई

कहैं तकी सुन शाह सिकंदर । हमते कियो तफाउत अंतर ॥
जोलहाते तुम कीनेहु यारी । हमते अन्तर कियो विगारी ॥
कह सिकंदर तुम हमरे पीरा । वह द्रदमंद द्रवेश फकीरा ॥
कहैं मारफत राहकी बाते । राखा जान जो मेरा जाते ॥
ऐसे शाह कह्यो समुझाई । तबहुँ न शेखतकी शरमाई ॥
काशीके पंडित अरू काजी । शेखतकी मिली परपैच साजी ॥
कह काजी सुनु शाहके पीरा । कैसेहु मारा जाय कबीरा ॥
यह जोलहा जौँ मारा जाई । तौ हम सबकी टरै बलाई ॥
कहैं तकी सुन पंडित काजी । क्या कबीर जोलहा है पाजी ॥
चाहो तो आतशमें जारो । चाहो टूक टूक करि डारो ॥
चाहो जलके बीच डुबाओ । चाहो देगमें आँच दिलावो ॥
चाहो हाथीसे चिरवाओ । चाहो खाक त्वचा भरवावो ॥
चाहो तो देवालमें साटो । चाहो बोटी बोटी काटो ॥
चाहो मोहडे तोप उडावो । चाहो कूपमें जितत दबावो ॥
सारखी-मेरा नाम शेख तकी, मैं सिकंदरको पीर ।
देखो कैसे बाचिहैं, कैसा फकर कबीर ॥

स्वसमवेदबोध

( १३९ )

काजी पंडित सब हरषाना ।जिमि पंकज विकसे लखि भाना॥
कह काजी तुमते सब होई । तुम ऐसा दूजा नहीं कोई ॥
इस जोलहेने कुपुत्र मचाया । दोनों दीनकी अदल मिटाया ॥

साखी-तीरथ व्रत एकादशी, रोजा और नमाज ।
ये सब कछु न मानई, कहै एक शिरताज ॥
खसी वो सुरगी गायनी, पीर निमित्त हम देह ।
सबको कहै कसाइ है, ऐसा काफिर येह ॥

चौपाई

काशीके लोग हमैं नहीं मानें । जोलहाकी सब सिफत बखानें ॥

साखी-भाग हमारे शेखजी, तुम इहँ पहुँचे आय ।
जौं यह जोलहा मारहुँ, सबको कंटक जाय ॥
कहै तकी सुन काजी, हमते बाढी रार ।
जीअत कबहुँ छोड़ो, न अब यहि डारो मार ॥
शेखतकी परंपंच करि, गये शाहके पाहँ ।
हमें देख तहँ बैठे, अधिक जरे मनमाहँ ॥
कहै तकी चित रोष धरि, सुनो सिकन्दर बात ।
कहा हमारा मानहुँ, तब होवै कुशलात ॥

सोरठा-यहि जोलहै तू मार, नहीं तो देगा बददुआ ।
तुमको करें खुवार, जान माल सब गलैगा ॥

साखी-कहै सिकन्दर पीर सुन, मोहि तुमारि पनाह ।
जो चाहो सो करो यहि, तुमें कोई रोकै नाह ॥

चौपाई

कहो कबीरके मारन ताँई । इहवाँ मेरी कछु न बसाई ॥
पीर फकीर जात अल्लाहा । मेरो जोर न पहुँचे ताहा ॥

( १४० )

बोधसागर

साखी—जौँ वह होतो रैअत, तौ हम करते जोर ।
वह अलमस्त फकीर है, तहाँ न फावै मोर ॥
तुमहु कही समुझायके, पीर फकीर अल्लाह ।
अब तुम कहते मारने, यह न होय हमपाह ॥

चौपाई

अहो पीरजी तुम वह एका । अपने मनमें करो विवेका ॥
उन तुमरो कछु नाहिं बिगारा । काहे तुमने कुफुर पसारा ॥
बुजरूग सब नेकी फरमावै । जोर जुलुम कछु नाहीं भावै ॥

साखी—कहा हमारा मानिये, छोड़ि दीजिये रार ।
कुलह सुलह दे बैठिये, अल्लह ओर निहार ॥
कहै तकी सुलतान सुन, तुमे नहीं कछु दोष ।
जो मैं कहों सो मानिये, कर मेरो संतोष ॥
कहै सिकंदर पीर सुन, मेरो शिर बरु लेहु ।
फकिर कबीर न मारिये, यह मांगे मोहि देहु ॥

चौपाई

सुनतहि तकी कोध परजारा । शिरते ताज जमीन दे मारा ॥
निपटहि बिकल देखि तिहि भाई । तब हम शाहसे कहा बुझाई ॥
कहै कबीर सुनो सुलताना । करो पीरको बचन प्रमाना ॥
कहै सिकंदर सुनो हो पीरा । मन मानै सो करो कबीरा ॥

साखी—डारहु मारि कबीरको, हम नहिं मानै उन ।
ताका कबहु न भला हो, करे फकरको खून ॥

चौपाई

शेखतकी तब उठे रिसाई । है कोई बांध कबीरहि भाई ॥
साखी—शेखतकी आपै उठै, काजी पंडित झार ।
बाँध बाँध सब कोई कहै, कोई न करे गोहार ॥

स्वसमवेदबोध

( १४१ )

बाहँ बांधि पग बांधिके, बोर गंगजल नीर ।
निःसंशय निश्चित सो, निरभय सदा कबीर ॥
गंगाजलपर आसन, वंद परे खहराय ।
जन कबीर सतनाम बल, निरभय मंगल गाय ॥
शाह सिकंदर देखही, अरु ठाढे सब लोग ।
धनि कबीर सब कोइ कहै, शेखतकी भा सोग ॥

चौपाई

शेखतकी तब मीजै हाथा । सुखे सुख नहिं आवै वाता ॥
शेखतकी तब कहै बनाई । अबकी कसनी बढ़ौ न भाई ॥
अबकी बार कबीरहि पावो । देगि मूढ़िके आच दिलावो ॥
देग आंचते बचै कबीरा । तो जानौ अल्लाहको नूरा ॥
कहै कबीर नाम परकासा । तासो गयौ सिकंदरके पास ॥
शाह सिकंदर उठिभे ठाढे । अधिको प्रेम तासु उर बाढे ॥
शेखतकी कह क्रोधित बैना । धुनै शीस राते भये नैना ॥
सुन कबीर कह तकी मयाना । तुम कीनो चेटक हम जाना ॥

सारखी-अबहि तोहि कीमा करे, देग मूढ़ि देव आँच ।
देव आँचदे बाँचिहो, तो कबीर तुम साँच ॥
कहै कबीर सुन शेखतकि, करो जो तुम मनभाव ।
हम जैसेको तैसा, देग आँच दिलवाव ॥

चौपाई

तुम नाटक चेटक मन लावा । हमरे चेटक नाम प्रभावा ॥
शेखतकी तुम आप हो जैसे । हमको तुम मति जानो तैसो ॥

सारखी-कीमा करने कारने, शेख घालो तरवार ।
खांडा गहि शिर ना कटै, शेखतकी गे हार ॥
कहै तकी इहि जोलहा, बाँध्यौ खांडा मोर ।

( १४२ )

बोधसागर

ताते देही ना कटै, लगै अत्र हो भोर ॥
देग मुसल्लम मूँदेहूँ, मोहड़ा मूँद रिसाय ॥
आप आँच दिलवावई, ठाढ़ कतहुँ नहिं जाय ॥

चौपाई

देख लोग सब बहुत तमासा । हम पुनि गये सिकन्दर पास ॥
साखी-शाह सिकन्दर पीरपै, खबरि पठाई साँच ।
है कबीर पास हमारे, काहि दिलावो आँच ॥

चौपाई

सो सुनि तकी देग मुख खोला । सुन्न देखि वाको मन डोला ॥
आतुर तकी शाहपै आये । हमैं देखि पुनि शीश डोलाये ॥
बहुरि तकी लज्जित है कहई । जोलहापै कल्लु चेटक अहई ॥
साखी-देग अत्र जल बांचेऊ, नहिं व्यापै तन पीर ।
बहुरि अग्नि जरि बाचिहौ, तो तुम साँच कबीर ॥

चौपाई

विहँसि कबीर कहै सुन शेखा । करो जो आवैं तुमरे लेखा ॥
शेखतकी बहु काठ मँगाया । अति विस्तार अँबार लगाया ॥
साखी-ताहि बीच मोहि मूँदके, दीन्हेसि अग्नि लगाय ।
अग्नी धाय बुतानी, जन कबीर गुन गाय ॥

चौपाई

कहै तकी यह बाँध्यौ आगी । याको चेटक सब पर लागी ॥
तब जानो तुम साँच फकीरा । धरती गाड़े बचे कबीरा ॥
कहैं कबीर सत नाम प्रतापा । कतहुँ नहिं व्यापै तनतापा ॥
साखी-तुम मति चूको शेखजी, करो जो तुव मन होय ।
कहैं कबीर मोहि डर नहीं, निर्भय नाम समोय ॥

चौपाई

शेखतकी पुनि कूप खुदाये । गर पग बाँधि ताहिमें नाये ॥

स्वसमवेदबोध

( १४३ )

साखी-ईटा पाथरते भरे, दीनो रूप सुँदाय ।
कहै तकी अबकी मरे, ऐसो करे खुदाय ॥

चौपाई

शेखतकी अल्लाह मनावै । अबकी बार न जीअत आवै ॥
हम पुनि गये शाहके पास । तबहि सिकन्दर वचन प्रकासा ॥

साखी-कहै सिकन्दर पीर सुन, किसको गाड़ो रूप ।
सो कबीर इहँ बैठ हैं, अदभुत ख्याल अनूप ॥

चौपाई

शेखतकी व्याकुल है बोले । नैन नासिका मस्तक डोले ॥
साखी-यहि जोलहाके पासमें, तारो गुटका आहि ।
ताते गाड़े नहीं मड़े, जरे न काटा जाय ॥
अब गहि कर पग बांधिके, हाथी देव हुलाय ।
हाथी धरि धरि चीरि है, तब कछु नाहि बसाय ॥
खूनी पील मँगायकै, दीन्हेसि मद्य पिलाय ।
कर पग बँधि हाथी हुले, हाथी चला पराय ॥
केतनो करै महाउत, गज सम्मुख नहीं आव ।
कहै तकी अब तोपके, मोहड़े राखि उड़ाव ॥
गोला दारू भरि दिहसि, राखे मोहड़े तोप ।
कहै कबीर सतनाम बल, निर्भय रहौ निशोक ॥
चले सिकन्दर निज घरे, हमकहँ लीने साथ ।
शेखतकी झूँसी रहे, शाह इलाहाबाद ॥

चौपाई

काशीके ब्रह्मन अरु काजी । मुरछि रहे सब हिरफत बाजी ॥
साखी-एक घौस गंगा तटे, बैठ सिकन्दर शाह ।
शेखतकी हमहू तहाँ, मुरदा यक बहा जाय ॥

नं. ९ कबीरसागर - ६

( १८४ )

बोधसागर

चौपाई

कहै तकी सुन फकर कबीरा । मुरदा फेर जिलावहु धीरा ॥

साखी-कहै कबीर गरीब हम, तुम बादशाहके पीर ।

मुरदा तुमहि जिलावहु, सतगुरु कहै कबीर ॥

चौपाई

शेखतकी चितवै चित लाई । अल्लह मुरदा देहु जिलाई ॥

साखी-अल्लह पीर मनाइया, शेखतकी बहु बार ।

मुरदा जिंदा न हुवा, बहिगो रेत मझार ॥

चौपाई

शेखतकी कह सुनो कबीरा । मुरदा तुमहि जिलावहु फीरा ॥

साखी-उठि मुरदाहि हम चितवा, दूरते नरे आय ।

कुदरत निर्भय नामके, मुरदा फेर जिलाय ॥

मुरदेको अस बोलेऊ, उठ कुदरत कम्माल ।

कर कुबड़ी धर टेकिऊ, सजि जिव भया सो बाल ॥

चौपाई

सुत कमाल कहि उत्तर दीना । उठि कमाल तब अस्तुति कीना ॥

गुरु सत्त जो कही कमाला । गुरु कबीर मोहि कीन निहाला ॥

साखी-कहै कमाल पुकारिके, गुरु हैं सत्य कबीर ।

मुरदेसे जिंदा किया, गन्दी गली शरीर ॥

शेखतकी मन मूछिके, कह धनि धन्य कबीर ।

तुम अल्लाह खुदाय हो, तुम मेरे गुरु पीर ॥

कहै कबीर सुन शेखजी, तुम औलियाकि जात ।

रोजा निमाज कर बंदगी, बैठो नबी जमात ॥

जो अल्लह फरमाया, सो नहिं करता कोय ।

हलाल हराम चीन्है नहीं, कैसे मुसलिम होय ॥

स्वसमवेदबोध

( १४५ )

सारखी-जबतक दर्द पराई, दिलमें आवै नाहिं ।
कोटि बंदगी खता है, परै सो दोजखमाहिं ॥
जैसा दिल है आपना, तैसा सबका जान ।
दर्दमन्द अल्लह मिलै, कहै कबीर प्रमान ॥
शाह सिकंदर तकी मिलि, ठाढ़ भये करजोर ।
बकसो चूक कबीर तुम, जो कछु औगुन मोर ॥

चौपाई

कहै कबीर सुनो शाह प्यारे । तुम हमार कछु नाहिं बिगारे ॥
तुमरे पीर जो कसनी लीना । खरा खोट हम सबही चीन्हा ॥
हम नाहिं देहि बददुवा काहू । जो मम अरि हम सेवत वाहू ॥
हमरे मित्र दुष्ट कोइ नाहीं । सब हमरेमें हम सबमाहीं ॥
हम काहूको कहा सरापै । करै सो तैसो फल ले आपै ॥

सारखी-जैसो बीज कोइ बोइहै, तस फल चाखै आप ।
कह कबीर सत कहत हौं, मोहिं पुण्य नाहिं पाप ॥
कहर कुफुर दिल दोजखी, मोम दिलमें हर फकीर ।
निरभय नामसो समरथ, सतगुरु कहैं कबीर ॥

चौपाई

ऐसे कहि काशी चलि आये । धर्मदास तोहि सैन बुझाये ॥

सत्यकबीर वचन--चौपाई

रोग सोग बहु दुःख हटाये । केते परचाको देखलाये ॥
मृतकको दीनो जिव दाना । सो कछु इहां न करौं बखाना ॥
सोइ प्रसंग बढ़ुरि अब गार्ई । कलिमें जिमि प्रभु पंथ चलाई ॥
सत्य कबीरके शिष्य सुजाना । चार गुरु जो कीन प्रमाना ॥
तिनमें धर्मदास बड़ अंशा । वंश बयालिस जासु प्रशंसा ॥

बो० सा० १/

( १४६ )

बोधसागर

धर्मदास धरनीमें आये । करि प्रपंच तिहि काल भ्रमाये ॥
धर्मदास सुकृत औतारा । भूलयौ पुरुष नाम निज सारा ॥
प्रतिमा पूजामें लपटाई । परमपुरुषकी सुधि विसराई ॥
तीरथ व्रत आचार अपारा । क्रम उपाह्लाको व्योहारा ॥

पुरुष वचन--चौपाई

पुरुष अवाज उठी तिहि बारा । ज्ञानी बेगि जाहु संसारा ॥
सुकृत भवसागर चलि जाई । काल जालते गये झुलाई ॥
तिनकहैं जाय चेतावहु ज्ञानी । जाते वंश चले रजधानी ॥
वंश बयालिस अंश हमारा । सुकृत गेह लेहै अवतारा ॥
ज्ञानी बेगि जाहु तुम अंसा । धर्मदास उर मेटहु शंसा ॥

ज्ञानी वचन--चौपाई

चले ज्ञानी तब शीस नवाई । धर्मदास हम तुम लगि आई ॥
पुरुष अवाज कहा तुम पासा । चीन्हो शब्द गहो विश्वासा ॥

धर्मदास वचन--चौपाई

धनि सतगुरु तुम मोहिं चेतावा । काल जालते मोहि बचावा ॥
मैं किंकर तुव दासके दासा । लीन उबारि काटि यम फांसा ॥
मेरे चित अति हर्ष समाना । तुव गुण मोहिं न जात बखाना ॥
भागी जीव शब्द तुम माने । पूरण भागते तुव वर ठाने ॥
मैं अघकर्मों कुटिल कठोरा । रहचो अचेत भर्म चित भोरा ॥
मोहि आय तुम लीन जगाई । धन्य भाग तुव दरशन पाई ॥
कहिये मोहि जीवके मूला । रविके उदय कमल मन फूला ॥
भवसागर कौनी विधि छूटे । यमबंधन कौनी विधि टूटे ॥
करौं भक्ति कै योग कमावौं । देउँ दान कै तीर्थ नहावौं ॥
करौं यज्ञ कै इंद्री साथौं । बाहर फिरौं कि मनको बांधौं ॥
करौं अचार कि साधन साथौं । बर्त करौं कै हरि अवराधौं ॥

स्वसमवेदबोध

( १४७ )

जो तुम कहो सोइ सो करऊं । वचन तुमार हृदयमें धरऊं ॥

सत्यकबीर वचन-चौपाई

सुन धर्मदास मैं सत्य बतावों । भवसागरको दुःख मिटावों ॥
सुन धर्मदास भक्ति पद उँचा । इहि सीठी कोइ विरला पहुँचा॥
योगी योग साधना करई । भवसागर तेऊ नहिं तरई ॥
दान देय सोई फल पावै । भवसागर भुक्तैको आवै ॥
तीर्थ नहाये जो फल होही । सर्व मर्म समझावों तोही ॥
जन्म लेय सुन्द तन पावै । संपति दौरि बहुरि जग आवै॥
ऊँचे घर लेवै औतारा । ब्राह्मण क्षत्रीको व्यौहारा ॥
इंद्री साधन है अति नीका । बिना भक्ति जानो सब फीका॥
इंद्री साधन है तप भारी । तामस तेज क्रोध हंकारी ॥
कोध किये गति मुक्ति न पावै । भक्ति महातम हाथ न आवै ॥
बर्त एक भक्तिको पूरा । और बर्त कीजै सब दूरा ॥
और बर्त सब यमकी फाँसी । भक्तीबर्त मिलै अविनाशी ॥
हरि अवराधनकी सुनि बाता । कहो भेद तुम सुनियो ज्ञाता ॥
हरिहर नाम सदा शिव केरा । तातै मिटे न भवको फेरा ॥
बहुत प्रेमते शिवको ध्यावै । रिध अरु सिद्ध द्रव्य बहु पावै॥
जो मन चित निश्चय करि धरई । गिरि कैलास में बासा करई ॥
फिरके काल झपेटै ताही । डारि देय भव चक्रर माही ॥

साखी-शिव साधनकी यह गति, शिव हैं भवके रूप ।

बिन समझे यह जक्त सब, पन्यौ महा भ्रमकूप ॥

चौपाई

हरिहर नाम विष्णुको भाखा । शुभ अरु अशुभ कर्म द्वे राखा॥
इनमें करे कलोल सदाई । करे भोग जीवन भरमाई ॥
बहुत प्रीतिसे विष्णुहि ध्यावै । सो जिव विष्णुपुरीमें जावै ॥
विष्णुपुरी सो निरभय नाही । फिरि कै डारि देइ भव माही ॥

( १४८ )

बोधसागर

साखी-हरीहर नाम जो विष्णुको, जाने किय जिव जेर ।
चौरासी भरमै सदा, मिटै न भवको फेर ॥

चौपाई

हरिहर ब्रह्माको है नाऊँ । रजगुण व्यापि रहा सब ठाऊँ ॥
ब्राह्मणको पूजै संसारा । सो जिव होय न भवके पारा ॥

साखी-यहि तिनगुनकी भक्तिमें, मति भूलो भ्रमदास ।
इनके ऊपर निरगुन, तहाँ योगीको बास ॥

चौपाई

निर्गुण धाम निरञ्जन भाई । जिन सगरी उपपत्ति बनाई ॥
निर्गुणते मन भया प्रचंडा । ताते बसै सकल ब्रह्मण्डा ॥
निर्गुण अंश सकल औतारा । पीर पगंबर सब तन धारा ॥
यही निरञ्जनके पसारा । तामें अटका सब संसारा ॥
धर्मदास तुम भक्त सनेही । इनमें जनि अटकावो देही ॥
भक्त अनेक भये जग माहीं । निरभय घर कोइ पावत नाहीं ॥
भक्ति करे तब भक्त कहावै । भगतिसे रहित बचनको पावै ॥
चौदह लोक बसै भग माहीं । भगसे न्यारा कोई नाहीं ॥
सत्य नामकी खबरि न पाई । क्या करि भक्ति करो रे भाई ॥
जगमें भक्त दोय भै भारी । धू प्रहलाद सदा अधिकारी ॥
ये दोनों जन द्वै व्रत साधा । एकहि एक इष्ट आराधा ॥
ध्रुव तौ गृह तजि बाहर गयऊ । नारदको उपदेशी भयऊ ॥
छठे मास प्रकटे हरि आई । राज दियो वैकुंठ पठाई ॥
साठि हजार वर्ष करि राजू । कुट्टैब सहित वैकुंठ विराजू ॥
एक दौस जब परलय आई । ताहि बासते देय गिराई ॥
दुतिय भक्त प्रहलाद कहाई । इंद्रासनको सुख जो पाई ॥
स्वर्ग दोन चौकरी भुक्ती । बन्धनभावते भई न भुक्ती ॥

स्वसमवेदबोध

( १४९ )

साखी-इंद्रराजको भोगिके, फिर भवसागरमाहिं ।
यह सर्गुनकी भक्ति है, निर्भय कबहुँ नाहिं ॥

धर्मदास वचन-चौपाई

कौन भांतिते करिये भक्ती । सतगुरु मोहि बतावो युक्ती ॥
निर्गुन सद्गुण पार लखावो । तीसर न्यारा मोहि लखावो ॥

सत्य कबीर वचन-चौपाई

एक पुरुष है अगम अपारा । सब घट व्यापक सबसे न्यारा ॥
ताको भक्ति करै जो कोई । ताको आवागमन न होई ॥
आदि ब्रह्म नहिं था ओंकारा । निर्गुन रूप नहीं विस्तारा ॥
नहिं तब बीज नहीं अंकुरा । आदि भवानी चन्दन सूरा ॥
पुरुष कहो तो पुरुषो नहीं । पुरुष भया मायाके माहीं ॥
शब्द कहो तो शब्दो नहीं । शब्द भया मायाके माहीं ॥
द्वै विन होय न अधर अवाजा । कहो काहिं यह काज अकाजा ॥
नाम कहो तो नाम न ताको । नामराय काल है जाको ॥
है अनाम अक्षरके माहीं । निह अक्षर कोइ जानत नाहीं ॥
धर्मदास तहैं बास हमारा । काल अकाल न पावै पारा ॥

धर्मदास वचन

धर्मदास कह सुनो गोसाँई । इन बातें बनबेकी नाहीं ॥
संशय किये एक ही ओरा । तुम ही हते कि है कोइ ओरा ॥

सत्य कबीर वचन चौपाई

जौ परतीति होय उर तोरे । भवको मेटि संग रहु मोरे ॥
आदि पुरुष निहअक्षर जानो । देही धरि मैं प्रकट बखानो ॥
मोहि न व्यापो जगकी माया । कहन सुननको है यह काया ॥
देह नहीं अरु दरसे देही । रहौं सदा जहँ पुरुष विदेही ॥
गुप्त रहौं नाहीं लखि पाया । सो मैं जगमें आनि चेताया ॥