कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
सुमिरनबोध
( १७ )
पुरुषनाम अबोल अडोल नाम । अजावन राय रनछोर नाम ॥
शम्भु सन्तोष नाम । उदैचन्द अक्षैराज नाम ॥
एते नाम रहै लौ लाय । यमराजा तिहि देखि डेराय ॥
अम्बू अपावननाम । अम्बू शम्भू नाम । एत सत्यकाया प्रकाश ॥
अजरनाम नरियर सचार ।
अम्बू नाम वे पुरुष कहावा । सोहं हंस तहाँ विलमावा ॥
सोतो धर्मदासबैठे हैं पुरुषपुरान । सोहं सुर्त तुम मोर सुजान ॥
बेहंग नाम तुम जगमें देहो । हंस छोडाय काल सो लेहो ॥
एही नाम जीव जो पावै । बोधे हंस लोकमें आवै ॥
मैकबीरदरवानीदरवाजेहौंठाठ । आवतजातसुखउपजैहंसनकोनहिंगाठ
एकोत्तरी नाम सुमिरे चितलाई । आवागमन रहित घर पाई ॥
स्मरण हस्तक्रिया
सुनो धर्मदास हस्तक्रिया सही । महापुरुष मुख अपने कही ॥
नरियर अंकुरमो जीव रहाई । तहाँ सुर्त राखो ठहराई ॥
नरियर उठाय हाथ के लेहू । नरियर मस्तिक हाथ जो देहू ॥
सुर्त समय जीवमो गयेऊ । नरियर अमरलोक ले राखेऊ ॥
महा पुरुषके दर्शन कियेऊ । चरण बन्दिके शीश नवायेऊ ॥
महा पुरुष लै अङ्क लगाये । तब हंसा लिये हर्ष समाये ॥
अंकुर अंश बिनवे करजोरी । महा पुरुष सुनी बिनती मोरी ॥
अंकुर अंश नाम लौ लाई । भवसागर ते लेऊ मुक्ताई ॥
महा पुरुष सुर्त उतपानी । जाय सुर्त कडिहार समानी ॥
कडिहार सुर्त लीन्ह चितलोई । सोई सुर्त हंसा मो आई ॥
माथे हाथ जीवके दियेऊ । सुर्त समय हंस मो गयेऊ ॥
गई समय रही ठहराई । बहुत अनंद हंस तब पाई ॥
( १८ )
बोधसागर
जब लग सुर्त रही बाँही । कोइकोइ सन्त सो जानत आही ॥
टीका मुदित पूजै जब आई । यह पिण्ड तबही खस जाई ॥
सुर्त हंस ले गये लेवाई । महा पुरुषके दर्शन पाई ॥
महा पुरुषके चरण छुवाई । करै वन्दगी शीश नवाई ॥
महा पुरुष लिये अंक लगाई । सुर्त हंस नाम तिन पाई ॥
अपने समसर लिये लगाई । महा पुरुष सम शोभा पाई ॥
सुर्त हंस बिनवे कर जोरी । महा पुरुष सुनो बिनती मोरी ॥
भवसागर कडिहार रहाई । तिनके शब्द सुक्त हम पाई ॥
धन्य शब्द धन्य कडिहारा । तिनके शब्द मो हंस उबारा ॥
महा पुरुष चितवे चितलाई । भवसागर ते लेव सुक्ताई ॥
सुक्त होय सतलोकें आवै । छिन छिन गुरुके दर्शन पावै ॥
महा पुरुष शब्द उचारा । वै कडिहार हैं सुर्त हमारा ॥
जहां जहां सुर्त चित लाई । सोई हंस लोकको आई ॥
भ्रमें जीव होय जसमाहीं । तिन सनकी गहे जो बाहीं ॥
भ्रमें जीवको नारियर लेई । हस्त किया नरियरको देई ॥
हस्त किया नरियर जब पाई । भ्रमें लोक हंस लै जाई ॥
जाहि खानमें जीव रहाई । जहां जाय सुर्त समाई ॥
गई समय रही ठहराई । हंस उधार लोक ले जाई ॥
जो कडिहार हस्त किया पावे । महापुरुष के सुरत समावे ॥
हस्त किया गहे चित लाई । कहैं कबीर हंस लोक सिधार्द ॥
स्मरण सिंहासन बैठनेका
अंगन गहे गहनी तहां पुरुष चेतो सन्त बिचार ।
सिंहासन है पुरुष को सुर्तसों रोपो पांव ॥
जीवन पार उतारों तुम्हारे शिर नहीं भार ।
आदि पवन सों बैठो मूलशोध कडिहार ॥
सुमिरनबोध
( १९ )
कहैं कबीर धर्मदास सों, सत्यपुरुष चित्तराख ।
अमी अंक जो जानै, जासु जहाँ तत भाष ॥
स्मरण दल अर्पणका
अपोँ दिल चौकामें उत्तिम दल बनाय ।
कहैं कबीर धर्मदास सो सब अवगुण मिट जाय ॥
स्मरण पाषाण रखनेका
पान पुराण हाथकर लीन्ह। सब साहेबका सुमिरण कीन्ह। ॥
सत्य पुरुष बोले परवाना । वैठे पुरुष मध्य जो स्थाना ॥
रेखा लिखो पाषाणमें, अचित्य नाम घंट बोल ।
कहैं कबीर धर्मदाससों, तब हँसा होय अडोल ॥
स्मरण नरियर रखनेका
नरियर नरियर नरियर खरी । नरियर मोरे सत्य कबीर ॥
औरसों नरियल मोर न जाई । पांच शब्द लै नरियरमोरेकबीर
धर्मदास आई ॥
स्मरण नरियर मोरनेका
जलदल लेके नरियर मोरा । सत्य शब्द गहतिनका तोरा ॥
मोरो नरियर ढुकुम कबीर । सत्य नाम गहि लागो तीर ॥
पुरुष नाम है अमी अमोल । नरियर मोरो खसमनिहोर ॥
स्मरण नरियर मोडनेका
अमी सींचके नरियर कीन्हों । सो नरियर धर्मदासको दीन्हों ॥
धर्मदास मृत्तु मण्डल आये । सकल सन्तमिलि मंगल गाये ॥
नरियर मोरकेसत्यमुक्तकोशिरनाये । निकुतनामलेहंस बचाये ॥
कहैं कबीर धर्मदास सों । नरियर मोरे वंश तुमार ॥
स्मरण तिनका तोरनेका
यह विरवा चीन्हे जो कोय । जरा मरण रहित घर होय ॥
( २० )
बोधसागर
कौन विरवा जो बोलत है ताको चीन्हो । कबीरगोसाईकी आज्ञा
सों । जिवसो यमसो तिनका टूट यमके मुखमें थूक ॥
स्मरण ज्योती शीतलकरनेका
साखी-आदि अन्त यक ज्योति है, अस्थिर थीर है नीर ।
सात द्रौप नौ खण्डमें, एकहि सत्य कबीर ॥
स्मरणमिठाई मालूम करनेका
श्वेत मिठाई उत्तम पाना । लौंग लायची श्वेत प्रधाना ॥
केरा कदली और सुगन्धा । तबही हंसा होय अनन्दा ॥
यहिविधिकरोमिठाई । कहै कबीरधर्मदाससोतबहमकोभोगलगाई
स्मरण पानप्रसाद मालूमकरनेका
चौँका लेय मिठाई धरी नरियर धोती पान ।
हंसा बैठे आसन पर पूर्वहि आज्ञामान ॥
पुरुष बैठे आसन हंसहि नाही मार ।
कहै कबीर मिठाई मालूममानसरोवरपार ॥
स्मरण आरती सौपनेका
जोई आरती वारे, सोई बुझावै आन ।
जहां ज्योतिझिलमिल करे, सोई पहिचान ॥
अपनो तन मन खोजो, आप करो चितएक ।
शीतल करो आरती, पुरुषनाम गहिटेक ॥
कहै कबीर यह सुमिरण, सन्तो करो विवेक ।
अबकी बेरा चेतहु, तारों कुटुम समेत ॥
स्मरण आरती प्रकाश करनेका
सोहंग नामले आरती वारे आपतरे औरनको तारे ॥
सोहंग नामनिज सुमिरके, करो आरती प्रकाश ॥
कहै कबीर धर्मदाससों मिट गये यमके त्रास ॥
सुमिरनबोध
( २१ )
स्मरण प्रवाना लिखनेका
अमी अंककी लिखनी कीन्हा । सो लिखनी धर्मदासको दीन्हा ॥
उलटी लिखनी सीयेल द्वार । कटे कर्म भये जर छार ॥
खोजतखोजतखोजिया, यह सन्तनको काम ।
पुरुष देह धर देखिया, और एकोत्तर नाम ॥
स्मरण प्रवाना साजनेका
अहो साहेब कौन अङ्गप्रवान साजो । भाषो लेखा अंगमो ताको ॥
अहीधर्मदासमध्यअङ्गश्वानासाजो । अंक चढाय नाम सुखभाषो ॥
अजावन नाम पानके लीन्हा । सुर्त सम्हार अङ्ग तुम चीन्हा ॥
कहैंकबीरधर्मदाससोयहबीरा अंकनामविदेहचढावहुँहंसहोकेनिशंक
स्मरण पवाना साजनेका
अमी अंकका वीरा शब्द, सोहंगम डोर ।
कबीरहंस लोकलैराखो, यमसे बन्दी छोर ॥
सुर्त चढी आकाशको, उनमुनमहल बनाय ।
सोई हंस उजागर, जामो अमी समाय ॥
पुरुष मोहर अकह कबीर । कालमें सोहँ धर्मदास कबीर ॥
स्मरण प्रवाना देनेका
श्वेत पान अम्मर है छाया । सोपान अमोदिक पुरुष पठाया ॥
भरमत पवन फिरे संसारा । पवन निर्मल होय असवारा ॥
अमी अंक पुरुष लिखि दीन्हा, कमल पंखुरी सार ।
कहैं कबीर कछु शंका नाही, रहो पुरुषके आधार ॥
स्मरण प्रवाना देनेका
अजर मूलसो बोरी उत्तारी सुर्त सोहंगम डोर ।
एही सुमिरणपायके, हँसा उत्तर लक्ष करोड ॥
एही स्मरण हाथले, काल रहो सुरझाय ।
कहैं कबीर धर्मदाससों, हंसलोक पहुँचाय ॥
( २२ )
बोधसागर
स्मरण कण्ठी बाँधनेका
कण्ठी कण्ठ विराजे, सतगुरु तिलक कर दीन्ह ।
जगसों तितुका तोरिके, हँस आपन करि लीन्ह ॥
माला कण्ठी नामकी, सतगुरु शब्द विचार ।
बादविवाद जो बालक, सो करै, ताकेमुख परे छार ॥
कहैं कबीर धर्मदाससों, बालक कबहुन न होय निनार ।
स्मरण पाँच नाम
आदिनाम अजरनाम अमीनाम । पताले सदा सिंधु नाम ॥
अकाशे अदली निरनाम । एही नाम हँसको काम ॥
खाले कूची खोली कपाट । पांजी चढे मूलके घाट ॥
भर्म भूतको बांधो, गोला कहैं कबीर प्रवान ॥
पाँच नाले हँसा, सत्यलोक समान ॥
स्मरण दक्षायंत्र
सत्यमुक्तकी रहनी रहै अजर अमर गहै सत्यनाम ।
कहैं कबीर मूलदशा, सत्य शब्द परवान ॥
स्मरण तितुका तोरनेका
दहिने छोड़ो धर्मका स्थाना । बायें चित्रगुप्तको जाना ॥
सन्मुख नासिका देव पयाना । तब यम चले देखके पाना ॥
टूटे घाट अठासी करोरी । हँसा चढे नामकी डोरी ॥
सो जीवत हँसा भये, लिये प्रेमकी डोर ।
सो जिव चले सत्यलोकको, यमसों तितुका तोर ॥
आसन वासन मन कल्पना औ सर्वा भूत ।
एकोतरसे पुरुष के, यमसों तितुका टूट ॥
कहैं कबीर सदगुरुमिलै, मिथ्याके मुख चूक ॥
सुमिरनबोध
( २३ )
तिनुका तोरनेका
मनपाप मनसा पाप महापाप पाप पुरविला पाप ।
नोग्रह ब्रह्मा जाई । हम सद्गुरुके शरण आई ।
आसन वासन मन कल्पना, एतो सर्वाभूत ।
कहै कबीर सद्गुरु मिले, मिथ्याके मुख थूक ।
तिनुका तोरनेका
आसन वासन मन कल्पना, देवो सर्वाभूत ।
यमसों तिनका टूट साहब शब्द प्रगटे भागेभूतयमदूत ।
ये जीव भये कबीर साहेबके यमसों तिनका टूट ॥
कालके मुख थूक यमसों तिनका टूट ॥
शब्दहिनेहलगावैकहै कबीर धर्मदाससों कालदगामिटजाय ॥
तिनुका तोरनेका
आसन बासन मन कल्पना, खेदो सर्वा भूत ।
कहै कबीर सतगुरु मिले, मिथ्याके मुख थूक ॥
जँजीरा तिनका तोरनेका
भूतहि बांधों पिशाचहि बांधों बांधों धीमर धोखा ।
तीन निरंतर मन्तर बांधों मारों नाहर चोखा ॥
बोझा बांधों बोझइता बांधों पूजित बांधों पुजेरी बांधों ।
मरहिया मनसा बांधों हाटक बांधों फाटक बांधों ।
औघट बांधों बाट बांधों नेहर बांधों सासुर बांधों ।
अरोसिन बांधों परोसिन बांधों बांधों डंकन डोरी ।
कहै कबीर भर्म सब बांधों निर्गुन तिनका तोरी ॥
स्मरण प्रवाना पावनेका
अजरकी लिखनी हीरा पाना । सत्य सुकृत लिखे परवाना ॥
देह पान लेवो कण्ठ लगाई । बालक देहु गर्भ मैं भाई ॥
( २४ )
बोधसागर
भाषा भाषों अपर्बल; परे अजर की छाया ।
मुक्तके अक्षर मुक्ता मन, होय चुरामनि नाय ॥
स्मरण प्रवाना पावनेका
अजर नाम अजर है प्राना । अजर नाम सत्यलोक पयाना ॥
अजर नाम गुरु दिया बताय । कर्म भर्म सर्व दिया बहाय ॥
कहैं कबीर सुनो धर्मदास । अजर नामते लोक निवास ॥
स्मरण माथा पंजा देनेका
ठाढे दूत करत है गोला । धर्मदास सुख अजरे बोला ॥
धर्मदास सुख बोले बानी । दूत भूत गयेकुम्हिलानी ॥
अजर लोक अजर है नाम । अजर पुरुष अजर पुरुषको नाम ॥
येही नाम हृदयमें राखो । जादिकाल दगापरे तादिनसुख भाषो ॥
उत्तर दिशा जगन्नाथके ठाई ।
कहैं कबीर धर्मदास सों अजर बोल तुम जीवको सुनावो ॥
स्मरण दल प्रसाद लेनेका
अमृतदल अमरापुरी, तिरख नाम निज चीन्ह ।
अजर नाम कबीरका, अमृत दल करि दीन्ह ॥
इति सुभिरन चौकाको गुरुवाई विधि सम्पूर्ण
अथ लिख्यते चौका विस्तार विधि
स्मरण चँदोवा ताननेका
सत्यसुकृतको समझके, कीजै मनको स्थीर ।
छत्र तनायो प्रेमसो, सद्गुरु कहैं कबीर ॥
पांच सुपारी पांच खूँटमें; स्वेत चँदेवा सोय ।
कहैं कबीर धर्मदास सो, आवागमन न होय ॥
स्मरण खडीसो चौका पोतनेका
स्वेत मृत्तिका निर्मल पानी । चौका पोते सुकृत ज्ञानी ॥
सुमिरनबोध
( २५ )
चौका पोतके चन्दन चढावा । सत्य सुकृत जिनलोक पठावा ॥
कहैं कबीर सुनो धर्मदास । हँसा गये पुरुषके पास ॥
चन्दन चौका पोतनेका
सिन्धु नीर घट अमी मँगावा । सत्यसुकृतको शीश नवावा ॥
सोहैं पवन लै कीन्ह पसारा । निकुत नाम लै हंस उबारा ॥
तन मन दैके चीन्ह शरीर । अंकनाम कहि दीन्ह कबीर ॥
स्मरण कनिक चौका पोतनेका
कनक छानके निर्मल कीन्हौँ । सहज नाम ह्दे चित दीन्हौँ ॥
चौका पूरे युक्ति बनाई । सतगुरु दीन्हौ भेद लखाई ॥
कहैं कबीर चौका है सारा । चौका बैठो सिरजन हारा ॥
स्मरण मानिक बनावनेका
अग्र आरती कर मन जाना । कीन पवनसो निकसे पाना ॥
शब्द अन्त है ताकर सार । सो जीवनका करै उबार ॥
उबारे हंस करै लोक निवास । बाहर तत्त्वजाने अंशवंश हमार ॥
सत्यनाम मगन जेहि भीतर । कहैं कबीर हम प्रगट शरीर ॥
स्मरण थारमें परवाना धरनेका
थार परवाना कर सम तूला । आदि नाम भाषो मुख मूला ॥
मानिक सवार थारमें धरो । परवाना को सुमिरण करो ॥
कहैं कबीर सत्य है सार । अंश वंश हंस उतारे पार ॥
स्मरण मानिक धरनेका
स्थिरहि थारमें मानिक धरो । एकनाम सुस्थिर दृढ गहो ॥
कहैं कबीर गहो नाम आधार । निश्चल हंस साधि कडिहार ॥
स्मरण कपूर घृत परसेको
अग्र कपूर अग्र घृत धाइ । सो कदली है वाहा नेह ॥
शब्द कपूर तहाँ लै धरो । सतगुरु दयासों निर्भय रहो ॥
कहैं कबीर सुनो धर्मदास । अग्र वासमें करी निवास ॥
नं. १० बोधसागर - १०
( २६ )
बोधसागर
स्मरण पान धोबनेका
सुख सागर है मूल स्थान । तहाँ ऊपजे श्वेत पान ॥
श्वेत पानकी अंमर छाया । अमी पुरुष संदेश पठाया ॥
कहैं कबीर सुनो संत सुजान । यहि विधि करो पान औ स्नान ॥
स्मरण पान चढावनेका
श्वेत पान लोकते आया । श्वेत पान पुरुष निर्माया ॥
दिया वंश धर्मदास को । दीन्हों पान चलाय ॥
लेहु पान तुम शीश चढाय । श्वेत पान पावे निज मूल ॥
दृढ मनचित कोराखोथीर । कहैं कबीर धर्मदास सों पहुँचे लोक अस्थूल ॥
स्मरण दल बाँटनेका
दल नाम दयाका मानाम करि पूर । नौग नाम वे पुरुष है ।
बिन डोठीका फूल । सुर्त लाय दल वाटहु जल दल धरहु सुधार ॥
कहैं कबीर धर्मपास सों भव तज लगे नवार ॥
स्मरण दल बनावनेका
यो दल सत्तर लोक सों जल आवा । सत्तर लोक सों अमृत लावा ॥
शब्दकी झारी अमृत भरी । तापेसा तोष रिचा धरी । तीन खरचा ॥
पहले तोराई । कह कबीर यमदूत पराई ॥
नरियर जग उतारनेका
प्रथम बीज धरतीको दीन्हा । लागे फल नरियर तहाँ लीन्हा ॥
सो नरियर सन्त जन पाये । सत्य सुकुतको आनि चढाये ॥
तीन लोक है पिण्ड शरीर । भीतर बाहेर एकहि नीर ॥
कहैं कबीर सुनो धर्मदास । यहि विधि नरियर भयो प्रकाश ॥
स्मरण नरियर स्नानका
सुख सागर है मूल अस्थान । तहाँ भये नरियरके स्नान ॥
श्वेत नरियर श्वेतहि छाया । अमी पुरुष सन्ध पठाया ॥
सुमिरनबोध
( २७ )
भरमित पवन फिरे संसारा । निर्मल पवन ताहि असवारा ॥
कहैं कबीर सुनो धर्मदास । दुम नरियर स्नान प्रकाश ॥
स्मरण कलश धरनेका
दो पैसा औ एक सुपारी । अलश धरो उत्तम विस्तारी ॥
सवासेर लै तण्डुल धरौ । धर्मराय देख थरहरौ ॥
पांचो बाती देव लेसाई । तब गादी पर बैठो आई ॥
हृदय चरण वंशके धरो । सत्य कबीरकहिधोकपरिहरौ ॥
कलश सही करनेका
पांचतत्त्वघटभीतरपांचहिनाम । तासों होय जीवको काम ॥
सो लेखा तियवार कहैं कबीर सुनो धर्मदास । धर्मरायसो हंस
उबार । जोति अजरलोककी अञ्जलोक देह पहुँचाय ॥ कहैं कबीर
सुनो कडिहार । सारशब्द गहो टकसार ॥
स्मरण फूल चढावनेका
सुकृत वारिसों फूल मँगाये । सहजकी झारी आनि भराये ॥
सत्य पुरुषको आनि चढाये । धर्मदास उठ बिनती लाये ॥
हीरा मानिक लागे मोती । सत्य पुरुषकी निर्मल जोती ॥
स्मरण गादी बिछावनेका
चौका धरो मिठाई आनी । नरियर पान कपूर प्रवानी ॥
पुरुष बैठ सिंहासन आई । हंसहि नाही भार रहाई ॥
मान सरोवर कदली केरा । मेवा अण्ट लाय यह वेरा ॥
लौंगलाइची सत्यलोककेछोही । भौमे आनि मिठाई होई ॥
कहैं कबीर सुनो धर्मदास । सिंहासन बैठे मम दास ॥
स्मरण फूल माला बाँधनेका
मन माली तन फूल मँगाये । अभी अंक लै शब्द सुनाये ॥
मनकरवारी तन कह पोष । काया कञ्चन भई निर्दोष ॥
कहैं कबीर निज सुमिरो मोही । मारों यमै उबारो तोही ॥
( २८ )
बोधसागर
स्मरण आरती धरनेका
सत्य जीव आरती है नाम । सतगुरु शब्द सुनो परवान ॥
वोही नाममें बैठके लेहु धनीको पान । अंश वंश गुरु कीजिये ॥
देह धरो नहि आन । धीर गुरुको चीन्हके रहो सत्य मनलाय ॥
देखो खसम कबीर को हंसलोकको जाय
स्मरण चौका हाथ देनेका
करधर चौका विनती कीन्हा । तुम्हरे कहे भार हम लीन्हा ॥
अहो साहेब मोहे नहि भार । यह चौका विस्तार तुम्हार ॥
तुम जागो ओ शब्द तुम्हारा । समरथ मोहि उतारो पारा ॥
धर्मदास विनती करें, तुम हो सत्य कबीर ।
शिरके भार उतारहूँ, गहिके लावौ तीर ॥
इति श्रीस्मरण गुरुवाई भेदादि चौकाविस्तार विधि सम्पूर्ण
अथ लिख्यते स्मरण अभेद
प्रथम समरथके मुखसो सहज अंश उत्पन्न भये ताकोबीज ।
बुन्द दियो तामें सर्व रचना आई औ सात करी भई ॥
करीके नाम
प्रथम पोहप करी, दूसरे मूल करी, तीसरे अम्बुकरी, चौथे सुघर
करी, पांचे सुखसागर करी, छटये पंकज करी, सातेमंजुलकरी ।
दूसरे समरथके नेत्र सो इच्छा सुर्तउत्पन्नभई ॥ ताकोजावनबुन्द
दियो तासों पांच अंड भये ॥ तीसरे-समरथकेश्रवणसोमूलसुर्त
उत्पन्न भई ताको अमी बुन्द दियो तासो पांच अंड पोषे तासो
पांच ब्रह्म उत्पन्न भये तिनको आज्ञा दिये एक एक ब्रह्म एक
एक अण्डमों आये चौथे समरकी नासिकासे सोहंग सुर्त
उत्पन्न भये तासो पांच अण्ड फूटे तासों आठ अण्डभये ॥
सुमिरनबोध
( २९ )
अंशनके नाम
प्रथम अचित्य, दूसरे जोहेंग, तीसरे अकह, चौथे सुकृत, पांचे हिरण्यमय, छठे अक्षर, साते योगमाया, आठे निरंजन, अचिन्तको चिन्ता नहीं, तेज अण्डके मालक, प्रवान, पालंग १२ वंश ॥१॥ प्रथम माया, दूसरे कूर्म तिसरे अदल अष्ट, चौथे निरञ्जन, पांचे नभ, छठे समीर, साते तेज, आठे नीर, नवे पृथ्वी ॥ ९ ॥ दूसरे जो अङ्ग हंस, तिनको बैठक धीरज अण्ड दिये अण्डको प्रवान पालंग पचीस ॥ २५ ॥ और वंश सोरह ॥१६॥
वंशनके नाम
प्रथम अजरमुनि, दूसरे अगममुनि, तीसरे हंसमुनि, चौथे चन्द्र मुनि, पांचे आपमुनि, छठये पुरुषमुनि, सातें अलंजित मुनि आठे कलंक मुनि, नवें शीतलमुनि, दशयें श्री मुनि, ग्यारहे कण्ठमुनि बारहें कनक मुनि, तेरहे बेहंग मुनि, चौदहे गंगमुनि, पन्द्रहहे सोम मुनि, सोरहे जलरंग ॥ १६ ॥
तीसरे अकहअंश
तिनको बैठक छिमा अण्डभो दिया, अण्डको प्रवान व्यालिस ॥ ४२ ॥ वंश सताईस ॥ २७ ॥
वंशके नाम
प्रथम प्रेम, दूजे हुलास, तिसरे आनन्द चौथे विशाष, पांच हेत छठे प्रीति, साते निरख, आठे विवेक, नवें सुमत, दशें क्षमा, ग्यारहें धीरज, बारहें आलहाद, तेरहें शील, चौदहें संतोष, पन्द्रहहें सुमन, सोरहें बुद्धि सत्रहें भाव, अठारहें भक्ती, उन्नीसवें दया, बीसे ज्ञान, एकइसे किया, बाईसे विचार, तेइसे कृपानि, चौबिसे संतोष पचीसे भेद, छबीसे इच्छा, सताइसे भय, तिनको राज्य क्षमा अण्ड पुरुषके हजूरी ॥
( ३० )
बांधसागर
चौथे सुकृत अंश
तिनके बैठक सत अण्डमोदिये, अण्डको प्रमान पालंग बहत्तर
॥ ७२ ॥ तिनके वंश बयालिस ॥ ४२ ॥
वंशनके नाम
प्रथम काय सर्वांग रहाई, सर्वांग कायाते बीज बुन्द निरमाई
बीजबुन्दते अविगति काया। अविगत कायाकेदशोंभेदले। कायाके
रूपसुर्त निर्माया। रूप सुर्तके सतगुरु सोहंके गुंग पुरुष कहाये
गुंग पुरुषके अचित पुरुष कहाये। अर्चित पुरुषके ज्ञानी अंश
ज्ञानी अंशके सुजनजन अंश। सुजनजन अंशके चूरा मणी नाम।
चूरामणी नामके सुदर्शन नाम। दूसरे कुरुपति नाम। तीसरे प्रमोद।
नाम। चौथे कवल नाम। पांचे अमोल नाम। छठे सुर्त सनेही नाम।
साते हक्कनाम। आठे याक नाम। नवें प्रकट नाम। दशें धीरज नाम।
ग्यारहें उग्रनाम। बारहें दया नाम। तेरहे गत्र नाम। चौदहें प्रकाश
नाम। पंद्रहें अदित नाम। सोरहें मुकुन्द मुनि। सत्रहें अधरनाम।
अठारहें उर्द्धनाम। उनीसें ज्ञानी नाम। ... बाइसें अजरनाम।
तेइसे रस नाम। चौविसे गंग मुनि। पचीसे पारस नाम छबीस
जाग्रत नाम। सताइसे भुंगमुनि। अठाइसे अखै नाम। उनतीसे कंठ
मुनि। तीसें संतोषदास। एकतीसे चात्रकमुनि। बत्तीसे अजरनाम
तेतीसवें दुर्गमुनि। चौतीसवें आदि नाम पैतीसवें महा मुनि।
छतीसवें निज नाम। सैतीसवें साहब दास। अडतीसवें उर्द्धदास
उनतालीसवें करु। चालीसवें दीर्घमुनि। एकतालीशवें महामुनि।
साखी-वंश व्यालीसके आगम, चूरामणि सँतायन।
वचन हमारा प्रकटे, निःअक्षर निज नाम ॥
तिनको राज सत अण्डमें, चौकी लोक पांजी ॥
सुमिरनबोध
( ३१ )
पांचे हिरण्यमय अंश
तिनको बैठक सुमत अण्डमों दिया अंडको प्रवान पालंग ॥६४॥
वंश सात ॥ ७ ॥
वंशानके नाम
प्रथम वंशपारन, दूसरे स्वांतसनेही, तीसरे भृंगसनेही, चौथे ॥
लरसिध, पांचेदीपकजोत, छठे जलभाव, सातें मलयगिरि ॥७॥
तिनको राजसुमत अंडमें पुरुषके हजूरी ॥
चार गुरुके नाम-लोकके और भवसागरके
प्रथमनाम लोकमें जो हंस कहिये औरभवसागरमेंगुरु चतु-
भुंज गोसाईं तिनके वंश सोरह ॥ १६ ॥ दक्षिण दिशा सामवेद
पुक्षद्वीप दरभंगा शहर तथा प्रकट भये ॥ तिनकोमूलज्ञानबानी
ता बानीले पंथ चलायो, ब्राह्मणकुलप्रकट भये ॥११॥ दूसरे नाम
लोकमें अकह अंश कहिये ॥ २७ ॥ पूर्वदिशा यजुर्वेदकुशद्वीप
करनाटक शहर तहाँ प्रकट भये । तिनको टकसारज्ञानतावाणीले
पंथ चलायो ॥ २ ॥ कायस्थकुल शुद्ध, तीसरेनामलोकमें सुकृत
अंश कहिये और भवसागरमें गुरुधर्मदास गोसाईंकहिये तिनके
वंश व्यालिस ॥ २४ ॥ उत्तरदिशा ऋग्वेद जम्बूद्वीपभरतखण्ड
बांधो शहर तथा प्रकट भये, तिनके कोट ज्ञान बानी ताबानी लै
पंथ चलाये ॥ ३ ॥ चौथे नाम लोकमेंहिरण्यमयअंशकहिये । और
भवसागरमें गुरुसहेतेजी गोसाईं कहिये तिनके वंश सात ॥ ७ ॥
पश्चिम दिशा अथर्वण वेद सिलमिल द्वीप मानिकपुर शहर तहाँ
प्रकट भये । तिनको बीजक ज्ञान बानी ता बानीले पंथ चलाये
क्षत्रियकुल ॥ ४ ॥
दश सोहंगकेनाम
प्रथम पुरुष सोहं दूसरे सहज सोहंग तीसरे इच्छा सोहंग ॥
( ३२ )
बोधसागर
चौथे मूल सोहंग पाचे वोहं सोहंग छटे अर्चितसोहंगसाते अक्षर
सोहंग, आठे निरंजन माया सोहंग, नवें ब्रह्म विष्णु महादेव
सोहंग ॥ १० ॥
नौ सुतंके नाम
प्रथम सहज सुतं, दूसरे इच्छा सुतं, तीसरे मूल सुतं, चौथे सोहं
सुतं, पांचवें अर्चित सुतं, छठे अक्षरसुतं साते निरंजन सुतं, आठे
सुकृत सुतं, नवें नौतम सुतं ॥ ९ ॥
दश प्राणके नाम
प्रथम अपान, दूसरे समान, तीसरे प्राण, चौथे उदान, पांचे
व्यान, छठे नाग, सातें कूर्म, आठे किलकिला, नवें देवदत्त, दशमें
धनञ्जय ॥ १० ॥
आठ कर्मके नाम
प्रथम ज्ञानर्वनी, दूसरे रसनार्वनी, तीसरे वेदवर्नी, चौथे ध्यान-
वनी पांचे अंतराय, छठे गोट, सातें प्रमान, आठे आव ॥ ८ ॥
तीन कर्मके नाम
प्रथम संचित, दूसरे क्रियमाण, तीसरे प्रारब्ध ॥ ३ ॥
दो कर्मके नाम
प्रथम विधि, दूसरे निषेध ॥ २ ॥
चार ज्ञानके नाम
ब्रह्मज्ञान अंचितको, अनुभवज्ञान अक्षरको त्वचाज्ञाननिरञ्ज-
नको, छुद्गज्ञान माया त्रिदेवाको ॥ ४ ॥
चार ज्ञानीके नाम
प्रथम पिशाच ज्ञानी, दूसरे पंडित ज्ञानी, तीसरे उन्मत्तज्ञानी,
चौथे जडज्ञानी ॥ ४ ॥
सुमिरनबोध
( ३३ )
चार ध्यानके नाम
प्रथम पंडीसीतध्यान, दूसरे रूप सत्य ध्यान, तीसरे पद सत ध्यान, चौथे रूपातीत ध्यान ॥ ४ ॥
चार पदार्थके नाम
प्रथम अर्थ, दूसरे धर्म तीसरे काम, चौथे मोक्ष ॥ ४ ॥
तीन पदके नाम
प्रथम तत्त्वपद, दूसरे तत्त्वपद, तीसरे असिपद ब्रह्म ॥ ३ ॥
तीन तापके नाम
प्रथम अध्यात्म, दूसरे अधिदेव, तीसरे अधिभूत ॥ ३ ॥
तीन जीवके नाम
प्रथम मोक्षी । दूसरे विषय, तीसरे पामर ॥
पांच खानके नाम
प्रथम मनुष्यखान । दूसरे पिण्डजखान । तीसरे अण्ड खान । चौथे उषमज खान । पांचे अस्थावर खान ॥
पांच वाणीके नाम
प्रथम सिंगिनी वाणी । दूसरे बिगिनि वाणी । तीसरे किंगिनि वाणी । चौथे इंगिनि वाणी । पांचे रिंगिनि वाणी ॥
पांच तत्त्वके नाम
प्रथम आकाश । दूसरे वायु । तीसरे तेज । चौथे जल । पांचे पृथ्वी ॥
तिनको विभाग
मानुष खानमें सिंगिनिवाणी आकाश, वायु, तेज, नीर । पृथ्वी ये चार तत्त्व पिंडज खानमें वर्तते हैं । तीसरे अण्डज खानमें किंगिनि वाणी, वायु, तेज, जल ये तीन तत्त्व अंडज खानमें
( ३४ )
बोधसागर
वर्तते हैं। चौथे उषमज खानमें इंगिनि वाणी, वायु, तेज, ये दो तत्त्व उषमज खानमें वर्तते हैं। पांचे अस्थावर खानमें किंगिनि वाणी जल एक तत्त्व वर्तते हैं ॥
जो इनको प्रवानजात
प्रथम चार लाख खान मानुषको। दूसरे पिंडज नौलाख जात । तीसरे अण्डज चौदह लाख जात । चौथे श्वेदज उषमज सताइस लाख जात पांचे अस्थावर तीस लाख जात ॥
अथ पुरुषसत्रथसो अंश भये तिनको नाम
प्रथम पुरुषके त्रिकुटी सो अंकुर । पुरुष नेत्र सो इच्छा । पुरुषको नासिका सोहं पुरुषके मुखसो । अर्चित तेज अंड पालंग बारह अचिन्त अंश प्रेम सुर्त । धीरज अण्डज पालंग पचीस जोहंग अंश सोहं सुर्त । छिमा अण्ड पालंग ब्यालीस अकह अंश मूल सुर्त । सत् अंगुपालंग बहत्तर सुकृत अंश इच्छा सुर्त । सुमत अण्ड पालंग चौसठ, हिरण्मय अन्त अंकुर सुर्त ॥
इति श्री सुभिरपांजी आदि षट्कर्म विधि, चौकाविधि गुरुवाई
भेदादि विस्तार विधि सम्पूर्ण
सत्यमुक्त, आदिअदली, अजर, अचिन्त, पुरुष,
मुनीन्द्र, करुणामय, कबीर, सुरति योग, संतायन,
धनी धर्मदास, चूरामणिनाम, सुदर्शन नाम,
कुलपति नाम, प्रबोध गुरुबालापीर, केवल नाम,
अमोल नाम, सुरतिसनेही नाम, हक्क नाम,
पाकनाम, प्रकट नाम, धीरज नाम,
उग्रनाम, दयानामकी दया, वंश
व्यालीसकी दया
★
अथ श्रीबोधसागरे
सुमिरनबोध प्रारंभः
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षट्त्रिंशस्तरङ्गः
तृतीय बोध
अथ गुरुमहिमा शतक प्रारंभः
गुरु संतन की आज्ञा पाई । गुरु महिमा अमृतरस गाई ॥
गुरु मिले तो अगम बतावे । यमकी आँच ताहि नहि आवे ॥
जेता नाम रूप जग माहीं । सबहींमें सत गुरुकी छाहीं ॥
सतगुरु सकल कलमके साखी । सकल भुवन गुरुतन्मय राखी ॥
( ३६ )
बोधसागर
सतगुरु अजर अमर अविनाशी । सतगुरु परमज्योतिपरकाशी ॥
गुरु गोविन्द दोउएकस्वरूपा । नाम रूप गुण भेद अचूपा ॥
गुरु अविचल पद पूर्णधामा । गुरु स्वामीगुरु जग विश्रामा ॥
सतगुरु जनम मरनते न्यारा । सतगुरु सबका सिर्जन हारा ॥
नर्गुण गुरु रूपसे न्यारा । छाड़ रह्यो सबही संसारा ॥
है सतगुरु सत पुरखै आपे । जासो प्रकट ब्रह्म भयो जापे ॥
साखी-गुरु ईश्वर गुरु परब्रह्म, सतगुरु सबका देव ।
गुरु बिन पार न आवई, ताते शरणो लेव ॥
गुरुकी शरणा लीजै भाई । जात जीव नरक नहिं जाई ॥
गुरुकी शरण साधू जाने । गुरुकी शरण मूढ पहिचानै ॥
गुरु सरणा सबहिनसे भारी । ससुझि गयो सोई नर नारी ॥
गुरु शरणा सो विघ्न विनाशे । डुरमति भाजे पातक नाशे ॥
गुरु शरणा चौरासी छूटे । आवगमनकी डोरी टूटे ॥
गुरु शरणा यमदण्ड न लागे । ममता मरै भक्तिमें पागे ॥
गुरु शरणासे प्रेम प्रकाशे । पारख पाद मिटै यम आसै ॥
गुरु शरणा परमात्म दर्शे । त्रय गुण छोड़ि सतपद परशे ॥
गुरु मुख होय परम पद पावै । चौरासीमें बहुरि न आवै ॥
सत्य कबीर बतायो भेवा । धर्मदास करु गुरुकी सेवा ॥
साखी-गुरुकी सेवा जो करै, हृदया ध्यान लगाय ।
काल जाल सो छूटिके, सत्य धामको जाय ॥
गुरुपद सेवे विरला कोई । जापर कृपा साहबकी होई ॥
गुरु सेवा जो करै सुभाग । माया मोह सकलभ्रम भागा ॥
नौ नाथ चौरासी सिद्धा । गुरु चरणों सेवे बहु विद्धा ॥
गुरुके सेवे कटे दुख पापा । जनम जनमको मिटे सन्तापा ॥
गुरुकी सेवा सदा चित दीजै । जीवन जन्म सुफलकरलीजै ॥