कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
सत्यसुकृत, आदिअदली, अजर, अचिन्त, पुरुष,
मुनीन्द्र, करुणामय, कबीर, सुरति योग, संतान,
धनी, धर्मदास, च्छरामणिनाम, सुदर्शन नाम,
कुलपति नाम, प्रबोध गुरुवालापीर, केवल नाम,
अमोल नाम, सुरतिसनेही नाम, हकनाम,
पाकनाम, प्रकट नाम, धीरज नाम,
उग्र नाम, दयानाम की दया,
वंश ब्यालीसकी दया ।
अथ श्रीबोधसागरे
त्रिशतमस्तंरंगः
धर्मबोध प्रारम्भः
★
गृहीधर्म वर्णन
दोहा—गृहाश्रमीके धर्मको, वर्णन करें सुजान ।
जिहि आश्रम आश्रम सकल, आश्रम कतहुँ न आन ॥
सांझ सकार मध्याह्नको, सन्ध्या तीनों काल ।
धर्म कर्म तत्पर सदा, कीजै सुरति सँभाल ॥
बो • ला • ९/
( १७८ )
बोधसागर
कोटिन कंटक घेरि ज्यों, नित्य क्रिया निज कीन ।
सुमिरन भजन एकांतमें, मन चंचल गहि लीन ॥
साधू गुरु सेवा करे, श्रद्धा प्रेम सहीत ।
देव परम प्रभु ध्यावई, करि अतिशय मन प्रीत ॥
तन मन साधु जो सेवई, जपे निरंतर नाम ।
गृही सो पावै परमपद, योग समाधि न काम ॥
पुरुष यती सो जानिये, निज तिय तीय विचार ।
मात बहिन पुत्री सकल, औरी जो जग नार ॥
तिय ऐसो व्रत धर्मधर, निज पति सेवत जोय ।
इतर पुरुष जे जगतमें पिता भ्रात सुत होय ॥
पतिकी आज्ञामें रहै, निज तन मनते लाग ।
पिय विपरीत न कछु करे, ता तियको बड़ भाग ॥
मनकामना विहायके, हर्षसहित कर दान ।
सो तन मन निर्मल भया, होय पापकी हान ॥
यज्ञ दान बिन गुरु करे, निशि दिन माला फेर ।
निष्फल है करनी सकल, सतगुरु भाषे टेर ॥
प्रथमै गुरुसे पूछिये, कीजै काज बहोर ।
सो सुखदायक होत है, मेटे जिवका खोर ॥
अभ्यागत आगम निरखि, आदर मान समेत ।
भोजन छाजन बित यथा, सदा काल जो देत ॥
सोई म्लेच्छ सम जानिये, गृही जो दान विहीन ।
यहि कारण नित दान कर, जो नर चतुर प्रवीन ॥
पात्र कुपात्र विचारिके, तब दीजै तेहि दान ।
देता लेता सुख लहै, अन्त होय नहिं हान ॥
भूखा साधु भिखारि कोइ, नहिं आवे जब द्वार ।
धर्मबोध
( १७९ )
तादिन मन पछतात बहु, करत अकेल अहार ॥
भोजनपाक निहारिके, इत उत द्वारे झांक ।
अभ्यागत भूखा निरखि, मारे तत्क्षण हांक ॥
विन हरिकृपा न सन्त मिल, संत मिलन सुखसार ।
तिनके आश्रय मुक्ति गति, सङ्कट सकल निवार ॥
गृही होय तो भक्ति कर, नातो करू वैराग ।
दोहु भावते एक गहु, थोथी कथनी त्याग ॥
फल कारण सेवा करे, निशि दिन याचे राम ।
कह कबीर सेवक नहीं, चहै चौगुना दाम ॥
सज्जन सगे कुटुम्ब हितु, जो कोई द्वारे आव ।
नहीं निरादर कर कोई, राखे सबको भाव ॥
रहे सदा निज गेहमें, सुमिरनमें लौलीन ।
ऐसे गृहीको काम कह, करवा अरु कौपीन ॥
कौड़ी कौड़ी जोरिके, कीने लक्ष करोर ।
कौड़ी एक न सँग चले, केतो दाम बटोर ॥
जो धन हरिके हेत नहीं, धरम राह नहीं जात ।
सो धन चोर लबार गह, धर छातीपर लात ॥
सतको सौदा जो करे, दम्भ छिद्र छल त्याग ।
अपने भागको धन लहै, परधन विषसों लाग ॥
भूखा जेहि घरते फिरे, ताको लागे पाप ।
गृही पाप ले जात है, पाप आपनो थाप ॥
साधु न जेवैं जाहि घर, ता घर जेवैं भूत ।
कलिमल ग्रसित सो जानिये, छुटै न कबहुँ छूत ॥
गृही भक्त निज धर्मरत, ताको साधु विचार ।
परमप्रीति जेहि साधुते, परम धर्म धन धार ॥
प्रथमहि साधु जैवाइये, पीछे भोजन भोग ।
( १८० )
बोधसागर
ऐसे पापको टालिये, कटे नित्यको रोग ॥
जाके सुख सब धाम है, मन विरक्त हो जाहि ।
गृही सो साधू जानिये, दाग न लागे ताहि ॥
जो सुत बित मिथ्या लखे, दुख सुख एक समान ।
परम भक्त सो गृही सोइ, पावै पद निर्बान ॥
हरिपद प्रीति लगाइये, औरते तजि निर्वाह ।
गृही होय कै साधुते, यही तरनकी राह ॥
यद्यपि उत्तम कर्म करि, रहै रहित अभिमान ।
साधु देखि शिर नावते, करते आदर मान ॥
बार बार निज श्रवणते, सुने जो धर्म पुरान ।
कोमल चित्त उदार नित, हिंसा रहित बखान ॥
न्याय धर्म युत कर्म सब, कर न कबहुँ अन्याय ।
जे अन्यायी लोग हैं, बांधे यमपुर जायँ ॥
सरल सुभाव रहे सदा, कोह द्रोह न विषाद ।
प्रीति शुद्ध सत गुन गहे, संतत संत प्रसाद ॥
अर्थ—जो कोध द्रोह और मिथ्या विचारसे रहित होकर कपट रहित सन्तोंकी कृपा चाहता है वह सन्तोंकी दयासे शांत शुद्ध सत्य और पुण्य रूप पदार्थ सत्यपर पारखको प्राप्त होता है ।
साथा लाभ संतोष कर, तृष्णा तरल तरंग ॥
उठन न पावै हृदयमें, कीजै ज्ञानते भंग ॥
गृही साधु दोउ जानिये, चक्र धर्म रथकेर ॥
दोहु बिन कारज ना सरे, मिलके कलिमल पेर ॥
१ पुरान कथा, धर्म निर्णय जिसके अन्दर लिखा हो और जिसमें धर्मवीरोंकी कथा हो ।
धर्मबोध
(१८१)
गृहकारजमें पाप बहु, नित लागे सुनु लोय ।
ताहित दान अवश्य है, दूर ताहिते होय ॥
चक्की चौका चूल्ह महँ, झाडू अरु जलथान ।
गृह आश्रमीको नित्य यह, पाप पंचविधि जान ॥
और युगनमहँ गृही कर, योग यज्ञ मख जाप ।
कलिमें सो कछु होय नहिं, कटे दानते पाप ॥
यथायोग जग लोग सब, बिन सम कीजे दान ।
कह राजा कह रंक है, दोनों एक समान ॥
जो धन पाय न धर्मरत, नहीं दान व्यवहार ।
सो शिर पावँको भारभरि, बंधे यमपुर द्वार ॥
गुरुजन जो परिवारके, कर आदर सतकार ।
लघु गुरुलोग जो योग जस, कुलको पालनहार ॥
पुत्र पौत्र बनितादि जे, इतर जेते लघु देख ।
भलो सिखावन दीजिये, जाते भला बिसेख ॥
जो गुरुजन परिवारके, लघुको सीख न देत ।
जो कछु औगुन सो करे, अघ शिर अपने लेत ॥
सोई मित्र सोई सगा, भल शिख शिशुहि दिखाव ।
तरुण अवस्था सुख लहै, गुरुजन सीख प्रभाव ॥
मारि ताड़िकै हठ किये, बाल अधर्मका राह ।
शुभगुण ज्ञानके पंथमें, बांधि चलाओ ताह ॥
मातु पिता सो शत्रु है, बाल पढ़ावै नाहिं ।
हंसनमें बकला यथा, तथा सो पण्डितमाहिं ॥
पहिले अपने धर्मको, भली भांति सिखलाय ।
अन्य धर्मकी सीख मुनि, भटकि बालबुधि जाय ॥
अपनो धर्म न जानेऊ, सीख्यो न्यारो धर्म ।
( १८२ )
बोधसागर
अज्ञानी यहि विधि किते, भूलि ते गह्यौ अकर्म ॥
जेते गृही हैं जगतमें, निज निज घरके भूप ।
हुकुम चले निज भौनमें, भूपतिके तद्रूप ॥
जिमि नृप चढै बजायके, धरती बस कर लेय ।
परजा सब तेहि बश भये, बिनयते भूपति सेय ॥
इमि सब गृही निशान दे, व्याहको सजै बरात ।
भूमि नारि लहि प्रजाभे, सुत सुतादि लघु जात ॥
जो कछु धनको लाभ हो, शुद्ध कर्माई कीन ।
धनतेदशवें अंशको, अपने गुरुको दीन ॥
जो गुरुनिकट निवास कर, तो सेवा कर नित्त ।
जो कहैं दूर अनत बसे, ध्यान करे करि हित्त ॥
छठे मास गुरुदरश कर, सेवा कर निज वश्य ।
छठे मास जो पहुँच वर्हि, वर्षमें करो अवश्य ॥
गुरु विरक्त जो लेइ नहिं, शिष्य निज आरतदेह ।
गुरु आज्ञा अनुसार तो, दान पुण्य कर देइ ॥
अथ गृहस्थकर्तव्येषु लक्षण
सत्यबचन प्रथमे कहो, दुतिये दया बताय ।
तीजो तप चौथे शौच, दोनो भांति कराय ॥
बाहर जलते शौच कर, अन्तर ज्ञान के द्वार ।
पचये तितिशा इच्छा, षट सतसंत निरुवार ॥
सप्तम सम दम अष्टमे, नवम अहिंसा होय ।
ब्रह्मचर्म्य दशमें कहा, त्याग एकादश जोय ॥
बरहैं स्वाध्यायहि कहो, अरु तेरहैं मृदु चित्त ।
चौदह तोष पुनि पंद्रहैं, साधु सेव करे नित्त ॥
विषयत्यागकर सोलहैं, सत्रहे वृथा सुखोपाय ।
१ सत्यसत्य ।
धर्मबोध
( १८३ )
मौन अठारह सो कहा, वृथा बोल न गवाय ॥
ऊनविंश इस देहसे, आतम न्यारा जान ।
विसवें जो अन्नदि कछु, बांटिके भोजन पान ॥
ब्रह्म इकिसवें सर्वमय, नरमें निरख विशेष ।
वाइसवें पुनि श्रवण कह, तेइस कीर्तन लेख ॥
स्मृति चौविंश पच्चीसवें, पूजा सेवन छबीश ।
बन्दन दास्य अठाइसे, सरुय स्वार्पणा तीस ॥
इति ३० लक्षण
केते जनकादिक गृही, जो निज धर्मप्रवीन ।
पायो शुभगति आपहू, औरनहू गति दीन ॥
हरिके हेतु न देत धन, देत कुमारगमाहिं ।
ऐसे अन्यायी अधम, बांधे यमपुर जाहिं ॥
जो दीने सो पाइहै, लुनै जो बोया बीज ।
जो नहिं बोया बीज है, पावै नहिं कछु चीज ॥
गाडा धन छाडा वृथा, जो दीना सो मोर ।
क्रूर विचार करे नहीं, लगे न हरिकी ओर ॥
निज धनके भागी जिते, सगे बन्धु परिवार ।
जैसा जाको भाग है, दीजै धर्म सँभार ॥
अपने भागको लीजिये, है हराम पर हक्क ।
सूकर गायकी सौंहपर, अहक्क ओर जनि तक्क ॥
गह्यो सुदामा भाग हरि, भयो महा कंगाल ।
और भाग विषसों तजो, धर्मनीति निजुपाल ॥
तन मन धन हरि हेत दे, चेत भक्ति कर प्रीति ।
यहि संसार असार लखि, चल जनकी विपरीति ॥
१ सुमिरन । २ आत्मसमर्पण ।
( १८४ )
बोधसागर
धन मन तन सब जायगो, रहे न जो कछु दीस ।
मूरख वृथा गवाँव सो, भक्ति भजे जगदीश ॥
महातिमिर घेरे हृदय, विषयभोग लपटान ।
सुमति न आई अजौं उर मरनकाल नियरान ॥
खाट परे तब झरखई, नयनन आवे नीर ।
तब कछु यतन बनै नहीं, तनु व्यापे मृतु पीर ॥
देखे जब यमदूतको, ठाढ भे सन्मुख आय ।
महाभयंकर भेष लखि, इत उत जीव लुकाय ॥
सकल शिथिल इन्द्री भई, रहा न कोई ओट ।
अब कहैं भागिकै जाइहौ, यमगण पकरी झोंट ॥
पुण्य भजन कीना नहीं, नहि संतनसे हेत ।
बार बार पछतात मन, चिड़िया चुन गई खेत ॥
इति गृहीधर्मका वर्णन समाप्त
अन्य गृहीधर्म वर्णन
( कबीर संग्रह )
दोहा—जो मानुष गृहधर्म युत, राखे शील विचार ।
गुरुमुख वाणी साधु सँग, मन वच सेवा सार ॥
सेवक भाव सदा रहे, अहम न आने चित्त ।
निर्णय लखे यथार्थ विधि, साधुनको कर मित्त ॥
सत्य शील दाय़ा सहित, बरते जगव्यवहार ।
गुरु साधुके आश्रित, दीन बचन उच्चार ॥
बहु संग्रह विरुष्यानके, चित्त न आवे ताहि ।
मधुकर इव सब जगतमें, घटि बढ़ि लखि बर्ताहि ॥
प्रीति सदा गुरु पारख करई । संगति साधु सदा आचरई ।
उत्तम मध्यम जग व्यवहारा । निर्णयसहित करे अनुसारा ॥
धर्मबोध
( १८५ )
दोहा-गृहीधर्म बड़ खटपट, तामें रहि हुशियार ।
लोक वेदकी रीति सब, करता सहित विचार ॥
जीवधात आदिक करम, करै न कबहूं भूल ।
सोइ रक्षा जीवन करे, प्रेम सहित अनुकूल ॥
वाणी अप्रिय कहै नहीं, कहै सबन उपकार ।
ठहरे पद बोधित गुरु, लावे भक्ति गोहार ॥
चारि खान बहु जीयरहि, दुखदाई जो होय ।
जुरे तो रक्षे जीव कहैं, अस कह रहे चुप सोय ॥
गुरु साधुहिं सन्मानई, मिथ्या जालहिं त्याग ।
सांच हृदय दाया सहित, निज सुख गुरु अनुराग ॥
दीन दयालको मत लखे, शिष्य स्वतः पद थीर ।
साधु गुरु सम जानिके, सबहि मन बच थीर ॥
साधुनकी जल अन्नते, वस्त्र सहित करै रच्छ ।
शक्य यथार्थ अनुक्रम, गुरुसेवी शिष्य स्वच्छ ॥
गुरु साधुपद दीर्घजग, है शिष्य सबन प्रमान ।
त्रिबिधि ताहि सेवन करे, आपु दास पद मान ॥
हे शिष्य जे दासातने, हंताते तेहि भीन ।
तेई गुरु पारख लखे, हंत कल्पना कीन ॥
तेई उत्तम पारखी, गुरुमतके अधिकार ।
हंता नाशे शिष्य जो, हंस थीर पदसार ॥
दास भाव सेवा सहित, भक्ति साधु गुरुकेर ।
यहि प्रकार हंसा वसे, सेवकको नहीं फेर ॥
निर्णय जो गुरुमुखही सूना । ताहि मनन साक्षातहु गूना ॥
प्रेम लगावे अस्ति पद माही । ठहरे गुरु पंचाइत पाही ॥
इति
( १८६ )
बोधसागर
अथ वैराग धर्म वर्णन
दोहा—दयापाल सब जीवके, बोले सत्य विचार ।
मन कर्म बानी त्यागकर, मैथुन अष्टप्रकार ॥
काठंचित्रकी नाव जो, ताहुं दिशि मत देख ।
देखतही तन विष चढ़ै, सर्प दंशकर लेख ॥
मनमंतंग मानै नहीं, महा महाउत ज्ञान ।
ताते अंकुश दीजिये, हो कलिमलकी हान ॥
सुवर्ण मिट्टी एकसम, दत्त अदत्त न लेत ।
कार्य्य मात्र कछु लीजिये, भोजन छाजन हेत ॥
सकल परिग्रह त्यागिये, सूक्ष्म तनके काज ।
धर्म वस्तु जो राखिये, तौ ना होय अकाज ॥
भय नहिं देत न करतभय, निर्भय हृद मनजास ।
सर्प सिंह आदिक लखे, रंचहु डरे नहिं तास ॥
काला सर्प शरीरमें, सब जग डारयो खाय ।
साधु अंग ना मोड़ई, ज्यों भावै त्यों खाय ॥
सम्मुख आवत बाण लखि, कबहुँ न मोड़त अंग ।
ठौर न तजि थिरताभजे, होय प्राण जौ भंग ॥
पर्वतसे टूटी शिला, शिरपर आवत देख ।
सरकत नहिं निज ठौरते, प्राणघात निज लेख ॥
भूमि सन कै काठ पर, जीव घात ना होय ।
लोट पोट कीजे सही, ना पड़ि रहिये सोय ॥
योग ध्यानमें हृद सदा, शुद्ध हृदय निर्गन्थ ।
आठ पहर जपमें रहे, पाव परम पद पन्थ ॥
धर्म पुराण विचार नित, गुरुको बचन प्रमान ।
शांति सरल अक्रोध चित, इन्द्री दम शम जान ॥
धर्मबोध
( १८७ )
तजि चंचलता भावको, अनहिंसा रह नित ।
दृढ समाधिआसनअचल, छितसौ क्षमाहै चित्त ॥
घेरे विपत्ति अनेक जो, आसन तजे न संत ।
दुःख द्रन्द लखि भाग मति, दृढ संकल्प गहंत ॥
शुद्ध अचार विचार मय, नहिं मनमें मदमान ।
धीरज धर्म संतोष गहि, लघु भोजन परमान ॥
राग द्वेष नहिं शत्रु हित, तजे दर्प हंकार ।
शीतउष्ण समदुःख सुख, प्रिय अप्रिय यकसार ॥
मान और अपमान सम, तजे जक्त की आस ।
चाह रहित संशय रहित, हर्ष शोक नहिं तास ॥
अधो दृष्टि मारग चले, चार हाथ महि देख ।
जाग्रत मौन मधुर बचन, मन संकल्प न लेख ॥
पात्र कुपात्र विचार गृह, भिक्षा दान जो लेत ।
नीच अकर्म सूम घर, दान महा दुख देख ॥
सदा होय मलपात जिहि, देहि में जो नौ द्वार ।
मुखी ठौर एकन्त लखि, ताको दीजै डार ॥
देह को विग्रह नाम है, रोग दुःख बहु घेर ।
धीरज धरे मनमें सदा, दुख करि काहु न टेर ॥
अपने मन कोई करे, भावे करे न सेव ।
काहूसे नहिं जांच कछु, यही संतको टेव ॥
लाभालाभ जयाजयौ, गंध कुगंध समान ।
रूप कुरूपहिं समलखे, गुरु हरिको गुनगान ॥
संध्या तीनों काल दृढ़, कर्म किया विधिलेख ।
दम्भ छिद्र छल रचे नहिं, प्रभु अनन्य जो देख ॥
१ छितसौ - पूर्वोके समान क्षमापान ।
( १८८ )
बोधसागर
प्रथम विराग विवेक पुनि, ज्ञान और विज्ञान ।
चारो नयनपुनीत जेहि, पर औगुन मलखान ॥
अपनो औगुन देखते, औरन को गुन दीख ।
निन्दा जुगली सब तजे, यह सतगुरुकी सीख ॥
यह दुनिया मुदार् है, तामें लागे स्वान ।
ताते जगसुख साज सब, त्यागत संत सुजान ॥
स्वर्ग आदि जो सुख घने, कीट बीटवत जान ।
मन इन्द्री विपरीति कर, दुखदेही नहिं मान ॥
जगमें गुरु अनेक हैं, सतगुरु सांच टटोल ।
कांचकी ढेर बखेर बहु, गह मणि एक अमोल ॥
संत जोहरी जानसो, ज्ञान नैन निरुआर ।
सार बस्तुको गहिलियो, त्याग्यो सकल असार ॥
सदा काल तप तन दहे, ओर छोर यकसार ।
सो सूर साधू कहो, उतरे भवनधिपार ॥
सूर तो क्षणमें मरे, जरे सती क्षणमांह ।
परम सूर साधू कहो, सदा काल तन दाह ॥
मुरखते मत ज्ञान कह, मौन धारि बहलेहु ।
जेहि पथ विषयनमें चले, चला जान तेहि देहु ॥
उत्तम ज्ञान न आव तेहि, छोड़ि देत निज धर्म ।
ताते तेहि न हटाइये, होय अधिक मति भर्म ॥
कोइ कुधर्म अज्ञानते, गहि लीना जो संत ।
ज्ञान भये अवगुण लखे, तजिये ताहि तुरंत ॥
अजर अमर लखि आपको, तप हृद ध्यान गहंत ।
देह गेह सब तुच्छ है, जान सुजान कहंत ॥
इंद्री तत्त्व प्रकृतिसे, आतम जाने पार ।
धर्मबोध
( १८९ )
जाप एक पल नहीं छुटै, टुटै न पावै तार ॥
जब जप करते थकि गये, हरि यश गावे सन्त ।
कै निज धर्म पुराण पढ, ऐसो धर्म सिद्धंत ॥
मोहको जब लग त्याग नहीं, तबलग नहीं वैराग ।
जो मनमें वैराग नहीं, तौ समाधि नहीं लाग ॥
दुखको तजि भागे नहीं, सुख नहीं चाहत सोय ।
नेह क्रोध भय त्यागिये, बुद्धिकी थिरता होय ॥
आप जो खैचकै आपमें, कर्म बटोरे आप ।
विषयते इंद्दी खैंचिये, कटे देहको पाप ॥
इन्द्री भोग न पाव जब, मृतक सो रहि जात ।
तब इंद्रियन परे जो, सो आतम दर्शांत ॥
बुद्धिवन्त जे पुरुषवर, बलकरि इंद्दी साध ।
विषयन ध्यावन काम उग, कोह मोहकर बाध ॥
मोहते सुधि बुद्धि नाश है, सुधि बुधि बिन मृतहोय ।
जबै इंद्रियनको वश कियो, तबै शांति कह सोय ॥
शांतिते मन थिरता गहे, मन थिरताते योग ।
योग ध्यानसुध्यानते, ज्ञान गहैं सब लोग ॥
ज्ञानते आतम लाभ है, लाभ न ताहि समान ।
इन्द्री दम नित जाग्रन, तबही बुद्धि थिरान ॥
मनमें जो विषयन भजे, कर्म तजे का होय ।
सर्व मनोरथ त्यागिये, बुद्धि शांति तब होय ॥
फाका फुक्र फिक नहीं, इंद्रहि जाने रंक ।
सात गांठ कोपीनके, तऊ न साधुको शंक ॥
हरिकी भक्ति कबीर करु, तजि विषया रस चोज ।
बारबार नहीं पाइये, मनुज जन्मकी मौज ॥
( १९० )
बोधसागर
कबीर हरीकी भक्ति बिन, धिक जीवन संसार ।
धुवाँकेर धौलाहरा जात न लागे बार ॥
कबीर-जबलग नाता जातिका तबलग भक्ति न होय ।
भक्ति करे कोइ शूरमा, जाति वरण कुल खोय ॥
कबीर-भक्ति निशानी मुक्तिकी, चढे संत सब धाय ।
जिनजिन मनआलस किया, तिनही तिन जहडाय ॥
कबीर-जबलग आशा देहकी, तबलग भक्ति न होय ।
आशा त्यागे हरि भजे, भक्त कहावै सोय ॥
सब इंद्रिनके भोगमें, राग द्वेष तजि देहु ।
काम कोध रजगुणहिंते, नेह न कीजे एहु ॥
ठौर पुनीत निहारिके, कर आसन विस्तार ।
अभयशांति ब्रह्मचर्यगहि, इमि समाधिको धार ॥
दृष्टि न इत उत तानिये, हगमहँ ध्यान लगाय ।
चित्त चंचलको रोकिके, रसरसते बैठाय ॥
दीपशिखा बिन पवनके, इमि योगी मन थीर ।
योग जो करे वैराग युत, सो मेटे भवभीर ॥
ज्ञानी रोगी आर्थिही, जिज्ञासू ये चार ।
सो सबही हरि ध्यावते, ज्ञानी उतरे पार ॥
गोत्र ऊंच अरु नीच जो, पावत है जग जीव ।
आलस नहिं अरु व्याकुली, ताने तमगुण कीव ॥
ताते ज्ञानको गोप है, हिरदयमें अँधियार ।
रजतमको सतपेल जब, होइ ज्ञान इंद्रिदार ॥
मृदु शुचि हो गुरु सेइये, ब्रह्मचर्य चित लाय ।
अनहिंसा तप दान युत, निग्रह मौन गहाय ॥
कर्मके फलको त्याग है, देह कर्म नहिं त्याग ।
धर्मबोध
( १११ )
मनकामनाऽहंकार युत, सो राजस दुख भाग ॥
शुभअशुभ नहि जान जो, किये सहित अभिमान ।
हिंसायुत है कर्म जो, तामस ताहि बखान ॥
थोरे दिनके कर्मको, बहुत अबार लगाय ।
आलस्ये कारज किये, तामें तम सरसाय ॥
क्षमासमान न तप कोई, सुख नहि तोष समान ।
तृष्णासम नहि व्याध कोई, धर्म न दया समान ॥
व्रतके पाँचो अंग हैं, त्याग न चाहे न मोहैं ।
निःसंशय निस्प्रীहतां, यह पाँचो विधि जोह ॥
योगके पाँचो अंग हैं, क्षमा अष्कामं * बताय ।
समर्द्धि आनन्दमय, फिरि अनन्य कहलाय ॥
भक्तिके पाँचो अंग है, नामरटन धुन धार ।
सत्य शान्ति अरु प्रेमदृढ़, सुरति न चरनन टार ॥
भक्तिमें तीन प्रकारके प्रेम कहावे संत ।
रूप देह अत्यन्त जो, तीनों नाम बंदंत ॥
ज्ञानके लक्षण अब कहौं, दश प्रकारको ज्ञान ।
नित अक्रोध वैराग्युत, इन्द्रीदमन बखान ॥
दयापाल परमार्थी, क्षमावंत निर्धार ।
शोकहीन निलौंभ कहि, निर्भयं चित्तं उदार ॥
शंभ दमै विरागं विवेकं है, ज्ञानके साधन चार ।
सात्त्विक राजसि तामसी, निर्गुण श्रद्धा सार ॥
अंग योगके पाँच यह, संयमै मौनं यकर्न्त ।
विषयत्याग आतमै निरख; होय दुःखको अन्त ॥
• निष्काम ।
( १९२ )
बोधसागर
पाँच अंग विज्ञानके, सत्यबंचन निःशंक ।
सुखदुःख सम परमार्थी, लह विवेकें निकलंक ॥
औरन औगुन देखि कह, औगुन अपने आहि ।
अपने औगुन देखिये, जगत ब्रह्म दरसाहि ॥
औरनमें औगुन लखे, निज औगुन नहि जान ।
अंधकार उरमें वसे, युत जड़ता अज्ञान ॥
जो कछु कहना चाहिये, चौड़े कहो बजाय ।
पीछे दोष न भाषिये, अमृत बचन सुनाय ॥
हृदय तराजू तौलके, तब सुख बाहर कीन ।
मधुरी बानी बोलके, परमारथ चित दीन ॥
यंत्र मंत्र सब त्यागिये, अन्यदेव मति ध्याय ।
जो साधू ऐसा करे, सोई मुक्ति पद पाय ॥
चौदह विद्या सीखकै, पूरण पण्डित होइ ।
मूक बने सब त्यागिके, वन्दनीय है सोइ ॥
कबीर भानुप्रकाश अन्तर्गत साधु लक्षण समाप्त
अथ विमल लक्षण वर्णन
प्रथम संसार भली प्रकारसे चलाना, पश्चात् परमार्थका विचार ग्रहण करना । विवेकियोंको सदा ध्यान रखना चाहिये कि, संसार छोड़ परमार्थका ढोंग करना अथवा परमार्थको छोड़कर केवल संसारमें ही निमग्न रहना मूर्खता और दुःखका कारण है, इस हेतु विवेककी चरितार्थता इसीमें है कि, संसार और परमार्थ दोनों मर्यादापूर्वक चलाये जाव ।
संसार छोड़ परमार्थ करने लगे तो खानेको अन्न मिलेगा नहीं, फिर भूखे मरनेवालोंसे परमार्थ क्या हो सकेगा ? अंतमें संसारयात्राके लिये नाना प्रकारके उचित अनुचित व्यवहारोंमें
धर्मबोध
( ११३ )
फँसाना होगा । और इसप्रकार फसे हुए पुरुषका फिर परमार्थमें लगना दुस्तर है ।
इसी प्रकारसे परमार्थको छोड़कर केवल संसारमें ही मग्न होनेसे पारलौकिक ज्ञानताके कारण अन्तमें नाना प्रकारके दुखों सहित बारम्बार गर्भकी कठिन यन्त्रणाको सहना होगा । स्वामीके कामको छोड़कर घरमें बैठनेवालेको स्वामीकी ओरसे नाना-प्रकारकी कठोरवाणी और उलाहनाके सहित लोगोंकी निन्दा उठानी पड़ती है। उसी प्रकारके पारलौकिक ( सद्गुरुकी आज्ञा ) धर्म ( परमार्थको ) छोड़कर संसारमें ही मग्न रहनेवालेकी मुक्ति और सुख छूट जावेगा और कठिन यमका दण्ड सहना पड़ेगा । प्रवृत्तिमें रहनेपर भी ज्ञानद्वारा आसक्ति शक्तिरहित निलैष रहता है वही उत्तम है, क्योंकि वह सदा परमपदपर स्थित सारासारके विचारमें संलग्न रहता है ।
प्रवृत्तिमें कुशल पुरुष निवृत्ति मार्गको सहजमें ही पूरा कर सकता है; परन्तु प्रवृत्तिमें जो कुशल नहीं है उसको परमार्थमें भी कदापि सफलता नहीं होती । शंकराचार्यादि महात्मागण जो बाल्यावस्थासे ही त्यागी थे उन्हें भी अन्तमें प्रवृत्तिके अनुभवको प्राप्त करनेका यत्न करना पड़ा ।
विशेषकर उपदेशकों और धर्म गुरुओं और आचार्य आदि गुरुकोटिके पुरुषोंको तो अवश्य उभयप्रकारसे दक्ष और अनुभवों होना चाहिये ।
इसी हेतुसे उचित है कि, शान्तिसे विचारपूर्वक धर्म और नीतिके अनुसार संसार और परमार्थ दोनोंको ही चलाना चाहिये; ऐसा न करनेसे अनन्त दुःखोंका भागी होना पड़ेगा ।
बो० सा० ९/
( ११४ )
बोधसागर
जीवोंका स्वभाव अनुकरण करनेका है तो जो मनुष्य शरीरमें आकर भ्रममें भटकता उसको क्या कहना ?
सारखी-जियत न तरे सुये का तरिहो, जियते जो न तरे ।
गही प्रतीति कीन जिन जासों, नर ताहैं मरे ॥
-बीजक ।
मरे पीछेके बनावका विचार भी जीवित अवस्थामें ही कर लेना मनुष्यका कर्तव्य है ।
लोकमें प्रत्यक्ष दीख पड़ता है कि, जो सदा जागृत रहता है वह सुखी रहता है और गाफिल दुःख उठाता है । इस कारणसे संसार और परमार्थ उभयमें जो चैतन्य है वही सुखी और सर्वको समाधान करनेको योग्य है ।
दोहा-धन्य धन्य तारण तरण, जिन परखा संसार ।
तेई बन्दी छोर हैं, तारण तरण उबार ॥
सारशब्द निर्णय ।
जो जीवित अवस्था सर्व प्रकारसे शक्ति सम्पन्न होनेमें पारखको प्राप्त नहीं होता है वह कालके कठिन आक्रमणके समय क्या कर सकता है, उस समय तो कालके अधीन होकर चौरासीके ही मार्गमें जाना होगा । इस हेतुसे जहाँतक शीघ्रता हो सके पूर्वज महात्मा लोगोंका और सतगुरुके बताये मार्गका बारम्बार विचार कर पारखको प्राप्त कर सत्यपदको प्राप्त होना चाहिये । क्योंकि जीव अनुसरण शील है एकको देखकर दूसरा मार्ग ग्रहण करता है ।
गुणवान्, बुद्धिमान्, विद्वान् और सदाचारी लोगोंकी संगति करके उनके सद्गुणोंका ग्रहण करना और अवगुणोंका त्याग करना चाहिये । इस प्रकारसे जो सर्वके गुणकी परीक्षा कर ग्रहण
धर्मबोध
( १९५ )
योग्यको ग्रहण करता है और त्यागने योग्यको त्यागता है; किसीके मनको दुखाता नहीं है, और मनुष्यमात्रके ज्ञान और चित्तकी परीक्षा करता है वही उत्तम पुरुष है, उसीको मनुष्य कहलाना शोभा देता है। सर्व मनुष्योंमें उसकी सामान्य बुद्धि होती है, सर्व प्राणियोंपर एकभावसे दया रखता है, उनके ज्ञानकी तारतम्यतासे उनके द्वारा दुखसुखको प्राप्त हुआ भी सदा उनको दया दृष्टिसे देखकर अनेक प्रकारसे उन्हें अज्ञानके धीसे निकालकर पारख राज्यमें प्राप्त करानेकी शुभ इच्छाको धारण किये रहता है।
बलिहारी तेहि पुरुषकी, परचित परखनहार ॥
-बीजकसा० १३२
इसी प्रकारसे विमल लक्षणका अनन्त स्वरूप है, सदाचारी पारखी जब इन लक्षणोंकी ओर झुकता है तब उसे स्वयम् प्रकाश प्राप्त होता है और नित्य नवीन सुलक्षणको जानता जाता है।
अथ मूर्खलक्षण वर्णन
मूर्ख दो प्रकारके होते हैं—१ मूर्ख, २ पठितमूर्ख इन दोनों प्रकार के मूर्खोंके लक्षण विचित्रप्रकारके कौतूहलसे पूर्ण हैं, इन्हीं लक्षणों द्वारा मनुष्यप्राणी लौकिक और पारलौकिक दुःखोंको प्राप्त होते हैं—इसी कारणसे उनको जानना उन्हें परखना, उनसे अलग रहनेका प्रयत्न करना और इन लक्षणोंकर युक्त प्राणियोंकी सदा उपेक्षा करनेके हेतु दोनोंके लक्षणोंको भिन्न २ लिखता हूँ।
जो प्रपंची है, जिसको आत्मज्ञान नहीं है, जो अज्ञानी है, उसे मूर्ख कहते हैं—यद्यपि ऐसे मूर्खोंके लक्षणका विस्तार बहुत है तथापि यहाँ संक्षेपसे लिखा जाता है।
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बोधसागर
अथ मूर्खलक्षण
जिसके उदरसे जन्म लिया ऐसी माताके साथ विरोध करे, और स्त्रीको प्यार करे, सर्व परिवारोंको छोड़ दे, केवल स्त्रीके वश होकर रहे, अपने अन्तर गुप्त बातको उससे कहे उसे मूर्ख जानना । परस्त्रीके साथ प्रेम करे, श्वसुरके घरमें वास करे, नीचकी कन्यासे विवाह करे वह मूर्ख है ।
बलवानके साथ गर्व करे, मनमें ममता रखे, बल बिना सत्ता दिखावे, आत्मस्तुति करे, देशमें रहके दुःख भोगे और बाप दादेकी बड़ाई हाँके उसे मूर्ख कहते हैं । बिना कारणके हँसे, अत्यन्त अविवेकी ( अर्थात् अवसर बिना बोले हँसे ) और बहुतांका शत्रु हो उसे मूर्ख जानो ।
अपने सम्बन्धियों और परिवारके रहते हुए उनकी उपेक्षाकर परायोंसे मित्रता करे, रात दिन पराया छिद्र हूँदता रहे वह मूर्ख है ।
जहाँ बहुतलोग बैठे हों उनके बीचमें जाकर सोना और परदेशमें जाकर बहुत खाना-ऐसा मूर्ख बिना दूसरा कौन कर सकता है ।
मान अपमानकी जिसे समझ न हो, जिसका मन सदा व्यसनके वशमें पड़ा हो उसे मूर्ख जानना ।
परायेकी आशासेपरिश्रम करना छोड़कर जो निरुद्यम होकर आनन्द माने वह मूर्ख है ।
मूर्ख घरमें बड़े विवेकी बनते हैं, बहुत बोलकर अपने परिवार और स्त्रियोंमें बकता बनते हैं परन्तु सभामें शम्माति हैं, भयभीत होकर मुखसे बोल नहीं निकाल सकते ।