कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
( ७८ )
बोधसागर
पांचतत्त्व गुण तीन मयी, निर्गुण रूप सम्हार ॥
ज्ञान विविधि विधि सब कह्यो, चौदह कोटि बखान ।
तासो न्यारे राखिया, मूल ज्ञान निदान ॥
चौपाई
धर्मदास बचन
धर्मदास उठि विनती कीन्हा । कृपासिंधु मोहि दर्शन दीन्हा ॥
जामें यह मन अस्थिर होई । सोई भेद मोहि कहो विलोई ॥
विनथिर भये न होइ अनन्दा । मेटउ मोर भरमके फन्द ॥
आदि बचन मैं कहौं विचारी । धर्मदास यह कथा निनारी ॥
यह तो कथा बहुत अवगाहा । ज्ञान गम्य नहिं पावे थाहा ॥
ग्रन्थ अनेक कहीं बहुबानी । यह निजगम्य सुजन जन जानी ॥
यह तो ज्ञान न काहू पाया । सो मैं तुम कहैं भाषि सुनाया ॥
स्थित ज्ञान अब कहौं बखानी । जाते छूटे यमकी खानी ॥
स्थित ज्ञान बिनु मुक्ति कहैं पावे । भरमत फिरै काल सन्तावे ॥
जोई भेद पुरुष कहि दीना । सोई ज्ञान स्थिति मैं चीना ॥
साखी—यकचित यक मन होइके, रहे शब्द लौलाय ।
कहै कबीर धर्मदास सो, तब हंसा घर जाय ॥
धर्मदास तोहि कहौं चिताई । स्थितिज्ञान सुनौ चितलाई ॥
पहले करो रक्ष मन नेहा । तबहीं बाटै शब्द सनेहा ॥
जो सुने कहुँ चोर यह बैना । सुनिके करै अपरबल सेना ॥
बीरा सार बालक कहैं दीजै । सुरतिवन्त कह स्थिर कीजै ॥
स्थिति ज्ञान जो पावे कोई । जरा मरण रहित सो होई ॥
निरअक्षर वह नाम अपारा । ग्रन्थनसे वह रहत निनारा ॥
अक्षर ज्ञानसार में भाषा । पुरुषभेद याहीमें राषा ॥
यह पायहु तब आयव आई । धर्मदास मैं तुम्हैं लखाई ॥
ज्ञानस्थितिबोध
( ७१ )
यमराजा जेहि देखि डराना । सोई शब्द अहै निर्वाना ॥
स्थिति भेद ज्ञान नहि पावै । कास फांस कैसे मुक्तावे ॥
गुरु होइ बहियां ताहि लखावै । योनी संकट बहुरि न आवै ॥
साखी-ज्ञानस्थतिके पायते, जीवनमुक्त होइ जाय ।
कबीरा आन पुरुषकी, समरस सेज बिछाय ॥
धर्मदास उवाच
धर्मदास बिनती अनुसारी । हे सतगुरु मैं तुम बलिहारी ॥
स्थिति ज्ञान कहां तुम पावा । केहि कारण यह पुहुमी आवा ॥
सो अब मोहि कहो समुझाई । जाते मनको संशय जाई ॥
तुम प्रभु अहंहु मुक्तिके दाता । आदि अन्त कहिये विरुयाता ॥
सद्गुरु वचन
धर्मदास मैं कहौ बिचारा । हंसराज बड भाग तुम्हारा ॥
जबही हतो पुरुषके पास । पुहुपद्दीप सब दीप निवासा ॥
हंस दुखी भय कालके पास । दया पुरुष तबै परकासा ॥
अमर वचन प्रभु भाज्यो जबही । पुहुपद्दीप विकसित भौ तबही ॥
पुरुष वचन
जाहु सतायन तुम भवसागर । नौतम सुरति हौ हंस उजागर ॥
जीवन फांस कालने डारी । तिनसौ ज्ञानी करो उबारी ॥
भवसागरते जाय छुडाओ । अमरलोक हंसन बैठाओ ॥
सद्गुरु वचन
दाया होत चला मैं जबहीं । भवसागर पग दीना तबहीं ॥
देखेहुं यमराजहि वरिंवाडा । त्रास दिखावत है नौखण्डा ॥
सब जीवन कहैं फांसी लावा । जब हम जाहि तुमहि डरपावा ॥
शब्दसार कीन्हौ संधाना । धर्मराय तब देखि सकाना ॥
( ८० )
शोधसागर
सारखी-सोई शब्द तुमते कहौं, धर्मदास लेउ मानि ।
जीव मुक्तावहु कालसों, सत्य शब्द परमानि ॥
और बहुत सुमिरन है भाई । बिना नाम नहिं काल नशार्ई ॥
धर्मदास वचन
धर्मदास बिनवै करजोरी । भाषहु मोहिं नामकी डोरी ॥
कैसे भयो नाम जो सारा । कैसे भयो सबै विस्तारा ॥
सो यह भेद कहौ गुरु स्वामी । करिय कृपा कहिय सुखधामी॥
सद्गुरु वचन
धर्मदास मैं कहौं बुझार्ई । स्थिति ज्ञान सुनौ चितलाई ॥
आदि अंतको नहीं निवासा । तब नहिं पुत्रलोक परकाशा ॥
तब नहिं जीव जंतुकी खानी । तब नहिं अमी अमिरसआनी॥
तब नहिं देह विदेही चीन्हा । ज्योति शून्य नाहिं तब कीन्हा॥
तब नहिं हतो अग्रको मूला । अग्रहि अग्र अग्रहो झूला ॥
अग्र डोरी विहंग है नाला । विहंग अग्र तहँ आहि विशाला॥
विहंगवास सबहिन मों लीन्हा । विहंग अग्र कोह विरले चीन्हा॥
विहंग अक्षर हते प्रभु सोई । विहंग नाम महँ रहे समोई ॥
अग्र विहंग नाम सुनि लीजै । निरखिपरखि तामहँचित दीजै॥
सोई अंश तुमहिं सम तूला । जो यह गहै अग्र निज मूला ॥
सारखी-विहंग नाम प्रताप सुनि, भयो सकल विस्तार ।
कहै कबीर धर्मदास सों भारुयो शब्द विचार ॥
धर्मदास वचन
धर्मदास विनती अनुसारी । समरथ खसम जाऊँ बलिहारी॥
मोकहँ शब्द दीन्ह टकसारा । जीवन मुक्ति देह भवतारा ॥
विदेह नाम गुण कहो बखानी । जासो यमकी होवे हानी ॥
सद्गुरु वचन
धर्मदास मैं कहौं विचारा । राखो गुप्त गुप्त अनुसार ॥
ज्ञानस्थितिचोथ
( ८१ )
अगर विहंग सुरति भयउ जबहीं। हंस सुजन जन प्रगटे तबहीं ॥
विदेही अंग थान्यो प्रभु आई। विहंग इच्छा तबहीं उपजाई ॥
बिदेह देहधरि भौ उजियारा। सूर्य उदित मूदितं भये तारा ॥
देह धरे हाथ ओ पाऊँ। रतन रंग बहु रंगवाऊँ ॥
वहतो नाम सुजन जन चीन्हा। दया कीन्ह प्रभु हमहूँ दीन्हा ॥
सञ्जीवन नाम आदि प्रकाशा। हंस सुजन जन कीन्ह निवासा ॥
साखी-जोइ गहे निज नामको, सोई हंस हमार।
कहैं कबीर धर्मदासों, उतरे भव जल पार ॥
धर्मदास वचन
चरण टेकि बिन्ती अनुसारी। साहब वचन जांव बलिहारी ॥
प्रथम स्थूल कहो समुझाई। बिदेह रूप जब पुरुष रहाई ॥
केतिक सज्याको परमाणा। जहँवा आप कीन स्थाना ॥
सोइ भेद प्रभु कहो निनारा। जीवन जन्म सुक्ति होय मोरा ॥
सद्गुरु वचन
धर्मदास तुम बिन्ती कीन्हा। अगम पंथ काहू नहिं चीन्हा ॥
मैं पाया सतगुरुकी दाय। धर्मदास मैं तुम्हैं लखाया ॥
जेहि विधि पुरुष रूप संधाना। सो सब तुमसों कहौ निदाना ॥
अग्रमूल विदेह स्थाना। सोइ नाम सुजन जन जाना ॥
अब लों लङ्क द्रौप दिखलाऊं। बारह पलंग विस्तार सुनाऊं ॥
बीजक अमान अखंडित द्रौपा। सत चैतन आनन्द सर्मापा ॥
साखी-अन्तरिक्ष छः पालंगभरि, लोलंग द्रौप स्थान।
तहाँ सो सब उत्पति भई, यही परमपद जान ॥
कंचन हेम द्रौप उजियारा। तहाँते उत्पति भई हमारा ॥
तेरह पालंगा है सो ठाऊं। तिल प्रमाण सेज्या निर्माऊं ॥
१ गुप्त
( ८२ )
बोधसागर
अस्थल रूप राई परमाना । प्रगटे महा नाम संधाना ॥
कला अनन्त अनंतहि धावा । बरनत जीव लक्ष नहिं आवा ॥
सत्य शब्द पावे परवाना । सोई हंस वहाँ करत पयाना ॥
जो नहिं गहत शब्द सहि दानी । सो पुनि पै नर्ककी खानी ॥
सुरति निरति ज्यों लौं लौलावा । सो हंसा जग बहुरि न आवा ॥
एही नाम सम्पूर्णन सही । एही नाम हंसा निर्वही ॥
मूलदीप तब नहीं निमासा । प्रथमहि श्रुती पुरुष प्रकाशा ॥
वही सुरति सब रचना कीन्हौं । मूल शब्द हिरदै धर लीन्हौं ॥
पुरुष गले पुहुपकी माला । हाथ अमर अंकूर रिसाला ॥
कहै कबीर सुनो धर्मदासू । एही मूल सब लोक प्रकाशू ॥
और नाम बहुत कहे भाई । पुरुष नाम हंसा लपटाई ॥
सार्वी—यही शब्द दृढ़ कर गहो, कहे कबीर समझाई ॥
अग्र विदेही नाम गहि, अग्र रूप हो जाई ॥
धर्मदास वचन
धर्मदास विनवै कर जोरी । साहेब कहो ज्ञानकी डोरी ॥
जाते मन चित्त अस्थिर होई । चरण प्रसाद पाव वर सोई ॥
महा कठिन भवसिंधु कराला । लीन्ह उवारि काटि यमजाला ॥
सद्गुरु वचन
धर्मदास भल कीन्ह विचारा । हंस राज बड भाग तुम्हारा ॥
और ध्यान सुमिरन हम भाखा । विदेह नाम सोइ न्यारे राखा ॥
सो अब तुम कह दीन्ह चिन्हाई । देह विदेह लेहु निर्माई ॥
भाग बडे वाहीके कहिये । सुरति शब्द मई बासा लहिये ॥
नाम महात्म कहां समुझाई । जेहि प्रताप यम देखि डराई ॥
ध्यान विदेह यह परभाऊ । इकोतरसे पुरुष तरि जाऊ ॥
सार शब्द सों चित नहिं लाग। सोई जीव बड आहि अभागा ॥
ज्ञानस्थितिबोध
( ८३ )
साखी-अब मैं कहब तोहि सों, ए चित करो विचार ।
कहै कबीर पुरुषको, यही रूप निज सार ॥
चौपाई
कहै कबीर सुनो धर्मदासा । अग्रमूल बिदेह परकाशा ॥
इच्छा पुरुष काया बंधाना । लीलागर दीप कीन्ह अस्थाना ॥
सुजन हंस जन कीन्ह विश्रामा । धरै ध्यान पुरुषकर नामा ॥
तहैंवा पुरुष कीन्ह अस्थाना । अस्थल रूपको कहों ठिकाना ॥
कंठमाल पुढुपनकी राजे । माँथे प्रभुके छत्र विगजे ॥
हाथ अमी अंकूर बिचारी । जगर मगर शोभा उजियारी ॥
उपमा काकहि वरनों भाई । कोटि भानु सोजायैं लजाई ॥
भालरूप वरनन कहि कैसा । बीस सहस्र चंद्र लखि जैसा ॥
शरवन शोभा देहु बताई । रवि सहस्र तहाँ रहे लजाई ॥
चक्षु अमीकर चितवन कैसी । सुधा सिंधु लहरे उठ जैसी ॥
नासा श्रीवा कंठ कपोला । शोभा इनकी आइ अतोला ॥
मुखारविंद अरविंदहि जानी । उदय कोटि सूरजकी खानी ॥
उभय हंस अघरमो विहरे । दामिनि दशन उठत जनु लहरे ॥
भुजा बाँह मन चिकुर बनाई । हृदय राखि उर कलित लजाई ॥
साखी-कटि नाभि पिंडुरी जंघनि, नख सिख बहुत अनूप ।
झलझलात झलकत महा, शब्दहि रूप सुरूप ॥
चौपाई
निगम नेति नेतिहि करिधावे । तिनको रूप बरन को पावै ॥
मन बुधि चित पहुँचे नहिं तहाँ । अबरण पुरुष विराजे जहाँ ॥
जहाँ लों निजमन दर्शन पावा । तहाँ लंगि वरणि कबीर सुनावा ॥
अगम अगाय गाधमो नाही । ज्योंके त्यों प्रभु सदा रहाहीं ॥
अग्र नाम पुरुषके बरणी । भवसागरकी है यह तरणी ॥
( ८४ )
बोधसागर
ध्यान बीच जिन कीन्ह समारा । ते चढ़ि हंस होहि असवारा ॥
साखी-कहै कबीरा धर्मदाससों, पहुँचे लोक मझार ।
लीलागर दीप जहँ पुरुष है, हंसा करत विहार ॥
धर्मदास वचन
धर्मदास जो बिनती करहीं । बचन विचार मुखै उच्चरहीं ॥
तीन लोकमें व्यापक काला । धर्मराय जिव कीन्ह विहाला ॥
इहि भूमि यम जाल पसारा । नेम जाप षट करम अचारा ॥
इहि विच सबही दुनी भुलानी । नाम सार काहू नहिं जानी ॥
एक मंत्र काहू नहिं पावा । पेड़ छोड़ डारही भुलावा ॥
प्रथम पेड़को पालन कीन्हा । पेड़ मरम काहू नहिं चीन्हा ॥
सदृश वचन
पुरुष पेड़ निरञ्जन है डारा । त्रिगुण शाखा प्रति संसारा ॥
सत्य नाम नहिं जाने कोई । सार शब्द बिन गैबी गोई ॥
साखी-नाम महातम भाषहिं, धर्मदास समझाय ।
जो नर प्राणी नाम बिन, ताहि काल धरि खाय ॥
चौपाई
निवृति ज्ञान जीवन समझावहु । अजर नाम सो गुप्त छिपावहु ॥
जो जियरा होवै अंकुरी । वासे कहों शब्द भरपूरी ॥
जिह्वा कहों तो जगत रिझाई । प्रकट कहों तो काल नसाई ॥
उपजै विनशैको संसारा । कैसे पूजै काल अहारा ॥
साखी-परकट जनि भाखहु, हिरदै धरो छिपाय ।
बीरा दै समझायहु, सदृश येहि लखाय ॥
धर्मदास वचन
धर्मदास बिनती अनुसारी । बिन पांजी कैसे निस्तारी ॥
पांजी भेद कहौ विर छानी । जाते मिटे जन्मकी खानी ॥
ज्ञानस्थितिविषय
( ८५ )
पांजी भेद पावा नहिं कोई । ताते गयो बिगोह बिगोई ॥
देहि बीच जोहि लखि पावा । ताकर आवा गमन नशावा ॥
जब तक आप चीन्ह नहिं परई । तब लग काज न एको सरई ॥
सद्गुरु वचन
धर्मदास मैं कहों बिचारी । पांजीभेद कहों अतिभारी ॥
पांजी डोरी चित न धरई । मिथ्या दोष गुरुन कहैं करई ॥
यही भेद है अगम अपारा । अब मैं कहों सकल व्यवहारा ॥
जो चीन्ह है सो दरशन पाई । हंसहि हंस मिले पुनि जाई ॥
अनुचित वचन हमारे धरई । यमकी डगरी जाय सो करई ॥
साखी-पांजी कहों समुझायके; मन बिच लोकहि जाय ॥
मूलशब्द निर्वाण है, कहै कबीर समुझाय ॥
चौपाई
मूल शब्द है गुप्त जो सारा । बिरले पावैं शब्द हमारा ॥
सत्य वचन अस्ती ना माने । गहे हंस सो पहुँच ठिकाने ॥
अग्र अर्चित सुरति सोहंगा । एहि मूल गहि हंस विहंगा ॥
अग्र विहंग नाम जो पावै । तबहीं हंसा घरको आवै ॥
विहंग शब्द जाने नहिं कोई । सो तो गये बिगोह बिगोई ॥
सुरति बिहंगता ले चित जोरी । बिहंग नाम बिहंग है डोरी ॥
बिहंग हंस विहंग है बीरा । निज सोकाम ये कहै कबीरा ॥
बिहंग शब्द बिहंग है नाला । विहंग पुरुष संग हंस बहाला ॥
सातों नाल जो आय बिहंगा । बिहंग पताल आहि जलरंगा ॥
तहैं बैठी जलरंगी शाला । बायें कर पृथ्वीकी नाला ॥
ता ऊपरहि कर्म अवतारा । कहै कबीर भेद टकसारा ॥
लघु दीरघ अक्षर नहिं जाना । कैसे संत होइ निर्वाना ॥
एक भेद जिनही लखि पावा । तिनके काल निकट नहिं आवा ॥
( ८६ )
बोधसागर
सोई सिद्ध संत है भाई । सोहं नाल चीन्ह जिनपाई ॥
पुरुषहि सम शिरसेज बिछावा । जिन जिन शब्द हमारा पावा ॥
नालहै सत्य पुरुषकी स्वासा । सो नाल पतालमें बासा ॥
तहां है पांजीको दरबारा । ता चढ़ि हंस उतरिगो पारा ॥
पाँच नाम तिहको परवाना । जो कोइ साधु हृदयमें आना ॥
पाँच नाम
साखी—आदि उदित अति अजरमन, सप्त सिंधु निज नीर ।
अदल अदल सोहं गहै, साहब कहै कबीर ॥
चौपाई
यही सप्त नाल हैं सही । यही हंस नाम निरबही ॥
सप्तनालके सातों नामा । बीर बिहंग करै सब कामा ॥
सिंधुनालमें हंस पठाए । पुहुप नालसो सकल सुहाए ॥
अमीनाल महाँ हंस पयाना । सुरति नालसे हंस सिधाना ॥
अग्रनाल महाँ करत अहारा । सोहंग नालको सकल पसारा ॥
अजर नालघट कीन्ह विचारा । तबै पुरुषको दर्श निहारा ॥
सप्त नाल है एके गाऊं । सोई सुरति भेद निज पाऊं ॥
सद्गुरु मिले वस्तु निज पावै । बिन सद्गुरु को भर्म मिटावै ॥
सद्गुरुदया सबै कछु पाई । बिन सद्गुरु वह जाइ नशाई ॥
साखी—सतगुरु बडा सुनार है, परखे वस्तु भैंडार ।
सुरतिहि निरति मिलाइके, मेटि डार खुटसार ॥
सद्गुरु सांचे शब्द हैं, कायाके गुणवान ।
जीवनमुक्त शब्दहि मिले, महापुरुषके ज्ञान ॥
धर्मदास उवाच
धर्मदास विनती अनुसारि । मैं सब पायब तुम बलिहारी ॥
बलिहारी सतनाम तुम्हारी । जाते भयो सबै निस्तारी ॥
ज्ञानस्थितिबोध
( ८७ )
अब प्रभु मोपर दया हि कीजे । भेद अमीको मो कहिदीजे ॥
अमी अंक केहि कारण कीन्हा । वह तो अंक मोर नहि चीन्हा ॥
सो प्रभु मोकहैं देहु चिन्हाई । अंक विस्तार कहो समुझाई ॥
सदगुरु वचन
धर्मनि तुम विनती अनुसारी । सोई भेद अब कहो विचारी ॥
ज्ञान स्थिति हम कीन्ह बखानी । जाते भई सकल उत्पानी ॥
जबहि देह धरी प्रभु आई । अमी अंक है अंक बनाई ॥
अशर नाम देह धरि आई । अंक यही मैं कहो बुझाई ॥
स्थूल धरो साहिब यहि कारण । बिन अस्थूल न वस्तु उचारन ॥
मूलहि अंक विदेह विचारा । देह धरी नामहि संचारा ॥
जो नहि होत नाम परभाऊ । तो सब जगतकाल धरिखाऊ ॥
जोकहैं लेइ नाम टकसारा । देह छूटी जाय पुरुष दुवारा ॥
जबही नाम लेतहैं हंसा । तबही काल मरत है संसा ॥
तारण हंस देहमें धरहूँ । यमको मारि मुक्ति मैं करहूँ ॥
नाम प्रताप सबै कछु भाखा । सुमिरत हंस बोल हम राखा ॥
साखी—हंस उबारन नाम यह, कहैं कबीर बखानि ।
जाय जीव सतपुरुष घर, धरमराय पछितानि ॥
चौपाई
अमी अंक जब ही प्रभु कीन्हा । उत्पति सकल ताहि हम दीन्हा ॥
पुछुप दीप सब दीप निवासा । तीन लोक याते परकाशा ॥
स्वर्ग पताल भयो पुनि सबही । अमी अंक पुरुषहि किय जबही ॥
चन्द्र सूर्य सकलहि विस्तारा । अमी अंक सो भयो संसारा ॥
अमी अंक दोइ रूप बनावा । पुरुष शक्ति सो नाम कहावा ॥
ब्रह्मा विष्णु महेश विचारा । अमी अंक ते सब संसारा ॥
अमी अंकके गुण हैं ऐसे । सोरह सुत उत्पत भये तैसे ॥
अमी अंक जब नाहीं कीन्हा । तबही सुनहि शब्दमें चीन्हा ॥
( ८८ )
बोधसागर
सोही अंक कही अब तुमसों । अंक प्रभाव सुनो तुम हमसों ॥
अमी अंक तुम राखि छिपाई । सुरतिवंत कहैं देहु लखाई ॥
अंक बिना पारस नहिं जोई । पारस बिना मुक्ति नहिं होई ॥
पारस लोहा कंचन सोई । पारस विन पहुँचे नहिं कोई ॥
पारस परस गुरु शिर नावा । गुरु पारस परसे सतभावा ॥
सार शब्द है बीजक ध्याना । पारस आहि मूल रथाना ॥
तब सुकृत मिलि सत्य समाना । सत्य शब्द निश्चय करिजाना ॥
सिखापन मानि पुरुषकर लीन्हा । बलि तुम्हार हम पारस दीन्हा ॥
नाम तुम्हार न धोखे डारों । घट भीतर सो कबहुँ न टारों ॥
साखी—सब धोखा कौ मेटिके, पारस परसे संत ।
कबीर कहै धर्मदाससो, मेटों भवका अंत ॥
धर्मदास
धर्मदास चित बहुत हुलासा । ज्यों रविउदय कमल परकाशा ॥
दयासिन्धु पूरण गुरु स्वामी । कीन्ह कृतारथ अन्तर्यामी ॥
अविचल नाम मोहिं कहदीना । सकल जीव आपन कर लीन्हा ॥
जो जिय नाम तुम्हारा पावै । अवागमन रहित घर जावै ॥
साहेब कहिये शब्द विचारी । जाते छूटै भ्रमकी बारी ॥
अन्त समै बालक कर आही । तब यम सूझ परै कहि नाही ॥
समय साधिबालक नहिं जानैं । कैसे बाचै जीव आपनै ॥
यमकी घरी पहुँचे जब आई । तहाँको भेद कहों समुझाई ॥
वह बाचै यम जाइ हँराई । कष्ट परै सब सुधि बिसराई ॥
जड़ चेतनको है यह चारो । कैसे भवसे होत उबेरो ॥
सद्गुरु वचन
पुरुष अंश सुकृत तुम आगर । भलमति पूछब धर्मनि नागर ॥
सो समुझाइ कहुँ तोहि रंगू । जाहि रंगभौ यमको अंगू ॥
ज्ञानास्थितिबोध
( ८९ )
जब आवै बालकके पाहा । पलटे देह धरै निजु नाहा ॥
भक्तिरूप धरि आवै सोई । मस्तक श्याम फेर नहिं होई ॥
जब जिय नाम करै सम्भारा । तब यमकी जड़ होवे छारा ॥
शब्द सिंधुमें रहै समाई । तहांयम कबहु निकट नहिं आई ॥
शब्दविचार बारि टढ़ करहीं । मूल हंस रखवारी धरहीं ॥
जब फिर चाहे करन पयाना । अग्रज नाम करी संधाना ॥
साखी-वंश छांय बीरा लिखो, नाम सन्धि चित लाय ।
कहै कबीर निःशंक हो, हंस लोक कहैं जाय ॥
जब सठहार चले लै हंसा । सत सिंधु पहुँचत गइ संसा ॥
सत सिंधु आसन जो करहीं । हृदय रूप हंसा सब धरहीं ॥
आगे लेन हंस तहैं आवहि । आरति साजि चीर पहिरावहि ॥
कुशल क्षेम पूछे सब कोई । यमकी लज्जा किहि विधि खोई ॥
कहि प्रसाद आइ यदि ठाऊं । केहिं करनी पहुँची इहिं गंजि ॥
तबै हंस उठि बोले बैना । गुरुप्रसाद पाया निज नैना ॥
गुरु मोहि वह नाम सुनाई । तेहि प्रताप आये इहि ठाई ॥
तबही हंस पुरुष सौ कहई । हंसन चाह दर्शकी अहई ॥
साखी-नाम महात्म कबीरको, तेहि प्रसाद सो आइ ।
बिनय करत अभिलाष चित, पुरुषहि दरस कराइ ॥
चौपाई
पुरुष बुलाइ हंस कह लीन्हा । हंसन सकल डण्डवत कीन्हा ॥
दीन सिंहासन क्षत्र जु धरहीं । हंस सुजन जन दर्शन करहीं ॥
सिंहासन बैठी सुख पावा । शब्द अहार पुरुष संग आवा ॥
जन्म मरनकी भूख बुझाई । सब सुख भुगते अग्र अघाई ॥
निरंजन सुख सुधि नहिं पावा । ब्रह्मा विष्णु बैठि पछितावा ॥
वहतो हंस कहाँ उड़ि गयऊ । आदि अंत काहू नहिं लयहू ॥
( ९० )
बोधसागर
सारखी—यह सुख ज्ञान स्थितहिमें; जो कोइ भुगते आय ।
धन्य भाग्य वा हंसके, कहै कबीर समुझाय ॥
धर्मदास वचन
धर्मदास बिनवै करजोरी । देह विदेह कहिब कछु थोरी ॥
कवने कमल उठत है बानी । कवने कमल शब्द सहिदानी ॥
कवने कमल मूल अस्थाना । कवने कमल सुरति पहिचाना ॥
कवने कमल ब्रह्मालिय वासा । कवन कमल है जीव निवासा ॥
सद्गुरु वचन
अक्षय कमल सुशब्द उचारी । सुरति कमल वानी अनुसारी ॥
श्वेत कमल निर्गुण अस्थाना । भँवर गुहा मूलहि पहिचाना ॥
कंबु नाल मूलके पास । तहवां ब्रह्म लीन है बासा ॥
अष्टकमलते उठे जो बानी । कुसुमहि दल ताके परवानी ॥
बंकहि नाल बंक है घाटा । जो हंसा चीन्है वह बाटा ॥
सारखी—बंक नालनी नवरिके, भिन्न भिन्न कर लेख ।
भँवर गुहामें पैठिके, घरियारी कर पेख ॥
सुरति कमलके बीचमें, सद्गुरुको विश्राम ।
सहस्र जाप अजपा कही, पूरुषको निज धाम ॥
चौपाई
द्वान्छ कमलमें झिलमिल तारा । अलख सरूपहिको विस्तारा ॥
विषम सरोवर है तेहि ठाई । मान सरोवर परै रहाई ॥
मान सरोवर दहिनो देही । सद्गुर पंथ तहां हो लेही ॥
आप कमल तेहिकहीं बखानी । विरले जन कीन्हहीं पहिचानी ॥
पारब्रह्म बस अधर अटारी । जगमग ज्योति जहां उजियारी ॥
हीरा रतन जटित बहु भांती । लाल अमोल गने को पांती ॥
ज्ञानस्थितिबोध
( ९१ )
रत्न कमल पै सत्य विराजे । हिरमर हंस संग बहु छाजे ॥
गोरख दंत पहुँचि नहिं कोई । पारब्रह्म अस भवन है सोई ॥
ये सब अटकहिं सुनि मंझारा । सत्य पुरुष नहिं कीन्ह विचारा ॥
चउदा कमल महुं सुत्र विराजे । द्वादश कमल गगन धुनि गजै ॥
भर्म भूलि अटके तहां ज्ञानी । भर्महिं भर्म भर्म लपटानी ॥
सुर नर मुनि पवनहि अवराधे । सिद्धहु बारे उनमनि साधे ॥
नाभी मण्डल पवन किवारा । तहैं लगि गमी कीन्ह टकसारा ॥
हमरा घर कहैं विरलन बूझा । ऊर्ध्व कमलका पंथ न सूझा ॥
साखी-सुरति कमलपर बैठिके, अमी सरोवर चाखि ।
कहै कबीर विचारिके, संत विवेकहि भाखि ॥
ऊर्ध्व कमलकै उपरै, परिमल बास सुवास ।
अमी कमल महुं बैठिके, दर्शन दर्श हुलास ॥
चौपाई
उत्पतिको वह वृक्ष बखानी । प्रलय कबहुं होवे नहिं हानी ॥
पिण्ड मांह वह वृक्ष बताऊं । अगम अगोचर गम नहिं पाऊं ॥
अगम गोष्ठि तुम पूछन लाई । सुनो धर्म अब कहौ बुझाई ॥
अगम गोष्ठि अगम व्यवहारा । अगम पंथ हम कहौ विचारा ॥
अब मैं कहौ जो गम्य बखानी । अगम गोष्ठि काहू नहिं जानी ॥
उत्पति सब मैं तुम्हैं सुनावा । ये हमते कोउ जानि न पावा ॥
उत्पति सुनु वा वृक्षकी भाई । प्रलय तेरे वह कबहुँ न आई ॥
जासों कहों अमरपुर गाऊं । बिना बीज वह वृक्ष रहाऊं ॥
बिन धरती अंकूरहि आनी । पानी रंग नहीं उत पानी ॥
मूलवृक्ष वह पुरुष बखानी । शाखा तासु निरंजन जानी ॥
डाली ब्रह्मा विष्णु मधेश्वर । पत्र तासु संसार नरेश्वर ॥
सत्य सुकृत जहँ कर विश्रामा । अछय वृक्ष जाकर है नामा ॥
पत्ररूप संसार बखाना । धर्मदास लखवो यह ज्ञाना ॥
( ९२ )
बोधसागर
साखी-पानीमें सबउपजहि, पानि जान सब कोइ ।
जासों पानी ऊपजा, सो रँग कैसो होइ ॥
चौपाई
रंगहि रंग रंग उपजाया । एक रंगसे सब रँग आया ॥
बहुरंगीसे पानी भयऊ । पानी रंग नाद जो कियऊ ॥
नाद रंगसे वेद उचारा । वेद रंगसे भयो संसारा ॥
साखी-हीर डोरको भाव यह संत सुजाना देखि ।
कहै कबीर विचारिके रंगहि रंग विशेखि ॥
पुरुष डोर तुमसों कही, सुनो संत चित लाइ ।
धन्य भाग्य वह जीवके, ज्ञान स्थित जो पाइ ॥
चौपाई
सो सब तोहि कहिव चित लाई । परखि लेहु हियको समुझाई ॥
पांच तत्त्व जो प्रकटे आई । पांच तत्त्व वे गुणत रहाई ॥
सोह तत्त्व तुमको न सुनावा । हृदये भीतर गुप्त छिपावा ॥
कौन शब्दसे तत्त्व जो आऊ । सो अनुसार तोहि समुझाऊ ॥
विदेह तत्त्व अगरको मूला । सोम तत्त्व आही अस्थूला ॥
अनुम तत्त्व सब दीप बखानी । अनुप तत्त्व सब दीप बखानी ॥
अंकुर तत्त्वसों सब कछु कीन्हा । ताको मरम न काहू चीन्हा ॥
पाच तत्त्व प्रगटे दुनियाई । तामहँ जीव रहै अरुझाई ॥
आप तेज वायु तत्त्व बखानी । पृथ्वी अकाश देह सब जानी ॥
धर्मदास वचन
कौने तत्त्व सो रची है देही । कौन तत्त्व है फूल सनेही ॥
कौन तत्त्व सो देहमें आवा । कौन तत्त्व निज मूल कहावा ॥
सत्गुरु वचन
अजर तत्त्व निःस्वादी कहेऊ । पुढुपतत्त्व निजमूलहि लहेऊ ॥
ज्ञानस्थितिबोध
( ९३ )
अमी तत्त्वकी देह बखानी । अजर तत्त्वमूल पहिचानी ॥
साखी-अमरपुरीको यह गुन, अमर हंस होजाइ ।
कबीर ज्ञान स्थिति बिना, जीव प्रलय तर जाइ॥
चौपाई
नाद प्रकट बिंदुहिं सो भयऊ । बिन्दु प्रकट नादहि जो लहिऊ॥
शब्द भेदते श्वास जो जानी । श्वासरूप शब्दहि पहिचानी ॥
नाद बिंदु जब नाहीं रहिया । तबकी बात तुमहिंसों कहिया॥
अमी अघर कीनी जब ग्रामा । नीर ब्रह्म लीनो विश्रामा ॥
नाद निरञ्जन प्रगटे जबही । श्वास प्रेम गुरु कीन्हो तबही ॥
बिन्दु सकलसे भयो पसारा । देह बिदेह सो रहत न न्यारा ॥
जब नहिं धरती नहिं आकाशा । तब नहिं सहज कूर्म परकाशा॥
चकित अण्ड चौँकरे मुचंदा । हमें देखि करि सहज अनंदा ॥
सारशब्द कबीरहि जाना । अंगहि अंग आहि बिहराना ॥
फूटा अंड कटे तब अंशा । योग जीत उपजे निःसंशा ॥
नहिं तब धरती नहिं आकाशा । साखी शब्द नहीं परकाशा ॥
तबही पुरुष कहां धौं रहेऊ । कौन तत्त्वमें वासा लहेऊ ॥
गुप्तहि तत्त्व गुप्त अस्थाना । गुप्त वस्तुमें रहे निदाना ॥
गुप्त हते तब प्रकटे भयऊ । अमर दीप उच्चारण लयऊ ॥
शब्द उचारो अमर अखंडा । बीरा सार बिदेही पंडा ॥
तादिन पुरुष आप जो रहते । कौन पिंडमें वासा करते ॥
साखी-राईभसा जो वस्तु थी, राई मर अस्थूल ।
लहर लहर दिल अंदरा, तहाँ पुरुषको मूल ॥
चौपाई
जब नहिं हते कूर्म नहिं कामा । आदि पुरुष कीन्हो निज नामा ॥
नाम सार हंसा जेहि पावा । वो जन चार काल पहुँचावा ॥
( ९४ )
बोधसागर
पहुँचावतमें कछु दिल मोरा । वारी लांघि सकै नहिं चोरा ॥
जो बोले तो शिर छिन जाई । खूट गहे तो अंग नशाई ॥
सारनाम सतगुरुने दीना । ताते धर्म शीस पर लीना ॥
जो कोइ करै नाम महाँ वासा । ताकहँ होइ न काल तरासा ॥
नाम प्रताप काल नश जाई । काले खेले पुरुष जाई ॥
नौ दल गुप्त हृदयमें टीका । अमर मोक्षपद पावै नीका ॥
नौदल नाम जो कहौं बिचारी । षट्दल काटि जो बाहर डारी ॥
शुभ दल शुभचित बन भरमा । भये दल क्रोध संत तज करमा ॥
अस्थित दल राखे निज मनको । पहुँचे हँस लोक सुरजनको ॥
सार्वी-यहि गुण ज्ञान स्थितिहिमें, शब्द सिंहासन सार ।
केहे कवीरा नाम बल, पहुँचि पुरुषके द्वार ॥
धर्मदास उवाच
धर्मदास बिनवे कर जोरी । साहब कहौं नामकी डोरी ॥
अगम निगम शारद औ शेशा । तुम दातामांगन सब देशा ॥
कहो बचन प्रभु हृदय विचारी । कैसे कूर्म लीन अवतारी ॥
आदि ब्रह्मका कहौं निवासा । केहिविधि लीन कमलमें बासा ॥
सतगुरु वचन
धर्मदास मैं कहौं बुझाई । अकथ कथा कछु कही न जाई ॥
आदि अन्तको नाहिं निवासा । आसा सार पुरुष परकाशा ॥
बिना नालको कमल अनूपा । पूरुष तामहँ कही सरूपा ॥
तबही भई अधर सों बानी । बिन रसनावह अगम निशानी ॥
बिनहि बिन्दु जिद एक कियऊ । अजय अपार सरोवर लियऊ ॥
अष्ट कमल तहां कीन्ह प्रकाशा । अष्ट पुत्र को तहां निवासा ॥
अष्टताल सुत नाम धरावा । अब मैं कहौं नाम परभावा ॥
मनसा बुद्धि निरञ्जन कीन्हा । सहज सुरतिसों उत्पति लीन्हा ॥
ज्ञानस्थितिबोध
( १६ )
रंग रेख कर्म उपराज् । सरवन सुरति वहे गुण छाज् ॥
योग संत इनको विरमाए । तिनको अंत न काहू पाए ॥
सुकृत अंश भये तेहि ठाऊँ । सोहँ सुरति अचित बनाऊँ ॥
आठ अंश ये उपजे भाई । ज्यों दर्पण प्रतिबिंब समाई ॥
पुरुष सहज सो भाषे लीना । दीप एक तुमहुँ कहँ दीना ॥
अंमो दीप प्रदीप निवासा । गर्भते कूर्म तहाँ परकाशा ॥
तबही पुरुष कूर्म उपराजा । बाहर पलंग रूप तेहि छाजा ॥
उपजे कूर्म पृथ्वीको भारा । सोरह पलंग दीप विस्तारा ॥
रचना सबहि कूर्मकह दीना । इहतो चरित सहज नहि चीन्हा ॥
साहब चरित लखे नहि कोई । सुरति पुत्र उपराजे सोई ॥
महा अपर्वल है अधिकारी । पुरुषके कहिये भण्डारी ॥
दया करी सुरतीको जबही । सुरति अंश उपराजे सबही ॥
साखी- ज्ञानस्थतिके यह गुण, सुरति कूर्म उपजाइ ।
कहै कबीरा नाम बिन, जीव अकारथ जाइ ॥
चौपाई
कूरम उदर बिदारी जबहीं । चारों अंड फूट गये तबहीं ॥
चारों अंड ब्रह्मांड सम्हारा । कृत्रिम वस्तु कीन्ह संसारा ॥
कर्ता आदिपुरुष कर नाऊ । सोई नाम निरंजन पाऊ ॥
फूटि अंड चौभंगा भयऊ । पाँचो तत्त्व तीन गुण ठयऊ ॥
पंच अमीसे सब संसारा । पंच अमीका है विस्तारा ॥
पंच अमीकर नाम न जाने । सो मन आन केल तन ठाने ॥
अमी दहे है सकल जहाना । अमी रंगसे कीन्ह ठिकाना ॥
अमी वस्तु जिनही पहिचाना । पंच अमीको सकल जहाना ॥
पंच अमीको नाम सुनाऊँ । भिन्न भिन्न सब तोहि बताऊँ ॥
( ९६ )
बोधसागर
अमीके नाम
सिंधु सुअंशहि । १ । सुरंगको नाम । २ ॥ सहजसुतमूलको नाम । ३ । अकहअमी । ४ । अंकअमी । ५ ।
सार्षी-कही कबीर धर्मदाससों, पंच अमीको नाम ।
शब्द अमीसों जानियो, प्रकट भये गुणधाम ॥
चौपाई
अमी शब्द सुमिरे जो कोई । अमीस्वरूप होहि पुनि सोई ॥
अमी शब्द जिन नाहीं पायब । सोई जीव प्रलय तर आयब ॥
मूल शब्द राखे चित सानी । अमी शब्द मृष बोले वानी ॥
पाँच बेर सुमिरे नर कोई । ताको आवा गौन न होई ॥
एहि शब्द मैं कहीं बखानी । ब्रह्मा विष्णु महेश न जानी ॥
इह पुनि नहीं निरंजन पावा । धर्मदास मैं तुमहिं बतावा ॥
शब्द अमी सुपुरुष लिख दीन्हा । एकहुअंक परै नहिं चीन्हा ॥
सार्षी-कमल अंक पंखुरि अरु, सुरति बंध सुखसेज ।
कहि कबीर संशय गई, महापुरुषके एज ॥
ज्ञानस्थितके यही गुण, अमी अमी होजाइ ।
कहे कबीर धर्मदाससों, देह हिरण्मय पाइ ॥
चौपाई
धर्मदास उठ बिनती कीन्हा । तुमरी दया पन्यो सब चीन्हा ॥
अपनो भेद कहीं विलछानी । जाते परै दरस पहिचानी ॥
वहै शब्द गुरु कहीं प्रकाशा । जामैं हवै सुकृतको वासा ॥
वही शब्दमें दर्शन होई । भिन्न भिन्न मोहि कहो बिलोई ॥
तुमहिं सगुण तुम निर्गुण रूपा । कारण कारज कहिये भूषा ॥
तुम धरती तुम पवन अकाशा । तुमहीं चांद सूरज परकाशा ॥
जलथल भीतर कीन्ह निवासा । लोकद्वीप तुमहीं परकाशा ॥
ज्ञानस्थितिबोध
( ९७ )
तुमही माली तुम फुलवारी । तुम हो करता तुमरी बारी ॥
तुम सागर जलहरी तरंगा । तुम मलीन तुम निरमल अंगा ॥
तुम हो उडुगण पर्वत चंदा । मोये तुमये हर्ष अनन्दा ॥
तुम गुपाल तुमहो दिन राती । सुर नर मुनि गंधर्व तुम ज्ञाती ॥
तुमही अलख तुमहि संसारा । तुमही हरि हर विधि अवतारा ॥
तुमही लोप अलोप अलेखा । तुमही गुप्त प्रगट सब देखा ॥
तुमही पुरुष तुमही हो प्रकृति । तुमही योग तुमहि जुगति गति ॥
चारों युग तुम करत निवासा । तुम रमता देहीमें बासा ॥
साखी--तुमहो दूसर अवर नहीं, तुमरा सकल प्रकाश ।
करहु दया अब मोहिपर, सत्य नाम विश्वास ॥
सद्गुरु वचन
धर्मदास तुम विनती कीन्हा । हमरो रूप न काहू चीन्हा ॥
अमरभेद अस्थलकै माहीं । जो पावै अस्थिर मन ताहीं ॥
लीलंगर द्रौप पुरुष अस्थूला । वही द्रौप उत्पतिको मूला ॥
गगन धरनी उत्पति सब नीरा । काया बीर सुनाम कबीरा ॥
याविधि पुरुष हमहि सोंकहिया। विन अंकुर जीव कहाँ रहिया ॥
नाम हमार सुमिरे जो कोई । आवा गमन रहित सो होई ॥
हमरा नाम लेत घर आवै । सुख सागर निर्मल हो जावै ॥
नाम लेत जो काल डराई । सुमिरत नाम हो दूर हो जाई ॥
हमरो नाम सार है भाई । जो चीन्हे तेहि काल न खाई ॥
साखी--नाम हमारा मुक्तामणि, पुरुष आपहि भाखी ।
शब्द शिरोमणि सार यह, हंस सदा चित राखि ॥
चौपाई
येहि नाम लोके पहुँचावै । सुमिरत नाम पुरुष कहैं पावै ॥
अब यह शब्द कहउ सम्भारा । सुनि हृदय महे करो विचारा ॥
नं. ८ कबीरसागर-४