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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

स्वसमवेदबोध

( ९३ )

चाले धर्म हर्ष हिय वाढ़े । मनमें करत गुनावन गाढ़े ॥
जाय कूर्मके सम्मुख भयञ्ज । नहीं प्रनाम दंडवत कियञ्ज ॥
देखे धर्म कूर्मकी काया । अठानवे कोटि योजन बतलाया
बारह पालंग कूर्म शरीरा । षट पालंग धर्म बलवीरा ॥
धर्मराय तब कूर्मते कहई । मोहि पुरुषकी आज्ञा अहई ॥
सृष्टिकी रचना मोकहँ देहो । ना देहो तो मारिके लेहो ॥
तबहि कूर्म निज मनहि विचारी । यह तो काल भयो हंकारी ।
कहैं कूर्म सुनिये धर्मराया । पुरुष मोहि नहिं कछु फरमाया ॥
हमते मांगे कछु नहिं पावो । जाय पुरुष ढिग वेगि सिधावो ॥
यह सुनि धर्मराय अतिकोपा । कूर्मते युद्ध करण प्रण रोपा ॥
तपबल काल भयो बरियारा । अहंकार करि कूर्म प्रचारा ॥
भिरा जायके सन्मुख धाई । करे यतन किमि रचना पाई ॥
धायकाल अतिबल तिहि डाटा । तासु तीन शिर नखते काटा ॥
शीस तासु जिहि औसर खंडा । उद्भते निकसा पौन प्रचंडा ॥
रणश्रव कूर्म तन उठा पसीना । सो जलतत्त्व पृथ्वीतिहिकीना ॥
पाँचतत्त्व धरती असमाना । सूरज चंद्र नखते प्रकटाना ॥
तनत पौन छूटा जिहि बारा । रचना सकल कीन विस्तारा ॥
जबहि प्रसेव बुन्द जल दीना । महिउनचास कोटि तिहि कीना ॥
दूधपै जैसे परे ढलाई । जलपर तथा जमीन जमाई ॥
कूर्मको तिहुँ सिर भक्षण कियञ्ज । बहुरि निरंजन शून्यमें गयञ्ज ॥
धर्मराय तब कीन विचारा । कहँ लगि तीनों लोक पसारा ॥
स्वर्ग मृत्यु कीनो पाताला । बिना बीज किमि कीजै बाला ॥
करि सेवा मांगो वर सोई । जाते तिहुँ पुर मेरो होई ॥
पूर्वध्यान तब कीन निरंजन । युग चौसठ कर सेवासंजम ॥
एकपाँव पुनि सेवा कियञ्ज । चौसठ युगलों ठाढे रहेञ्ज ॥

( ९४ )

बोधसागर

बहुरि पुरुष दीनो बरदाना । सोइ होई जो तोहि मनमाना ॥
बहुरि निरंजन विनय उचारा । बीज खेत दीजै करतारा ॥
देहु ठौर बैठा जहँ जाई । तबहि पुरुष अस बचन सुनाई ॥
मान सरोवर बैठक लीजै । तीन लोककी रचना कीजै ॥
तब करता मन कीन विचारा । बीज खेत तिहि काल सँवारा ॥

अथ बीजखेत अथवा आदि शक्तिकी

उत्पत्ति वर्णन-चौपाई

अद्याकी उत्पत्ति बखानों । ग्रंथ श्वास गुंजार प्रमानों ॥
निजतन मधि प्रभु मैल निकारी । रची ताहि आदि कुमारी ॥
पुरुष मैलते साँचा कीना । पैठी मैल रंग तिहि दीना ॥
देकर रंग बरन सब फेरा । भीतर मल मोह मद चेरा ॥
पुरुष मैलते पुत्री कीनी । पाँच तत्त्व तिहि भीतर दीनी ॥
उत्पत्ति पारस पुत्री पावा । प्रगटी कला अनंत सुभावा ॥
नख शिष देह सिद्ध प्रभु कीना । पंचह श्वास तिहि भीतर दीना ॥
जब श्वासा कायामें गैऊ । प्रगटी ज्योति जगामग भैऊ ॥
आठो अंग बना बहु रंगा । पारससार ताहिके संगा ॥
निर्मल उदित बतीसो दंता । चमकै बिजुली कला अनंता ॥
उपजी ज्योति अखंडित बानी । बोले बचन पुहुष रससानी ॥
मधुर वचन अरु लीला धारी । देख रूप जब पुरुष दुलारी ॥
उपजी रंग रूपकी खानी । बोले अमी विरहकी बानी ॥
उपजी कन्या कला अनूपा । पुरुषते प्रकट पुरुष स्वरूपा ॥
जिहिया रस सब उत्पत्ति कीना । सोंपा रस कन्याको दीना ॥
उपजी कन्या अगम सुभावा । अष्टंगी कह पुरुष बुलावा ॥
पुत्री जाहु निरञ्जन पाही । तुमकहँ समरथ सदा सहाई ॥

स्वसमवेदबोध

( १५ )

अथ आद्या और निरञ्जनकी कथा वर्णन-चौपाई

परम पुरुषकी आज्ञा पाई । कन्या तबहि कैल ढिग आई ॥
यकपग खड़ी सेवमें लागो । छुटी समाधि निरञ्जन जागो ॥
सम्मुख पलक उचारि निहारी । देखा ठाढ़ी आदि कुमारी ॥
परमरूप शोभा सरसाई । देखतके लहि काम सताई ॥
कहैं कैल सुनु आदि भवानी । मिलि हमतुम जगरचना ठानी ॥
तब आद्या अस उत्तर दीना । यह विचार तुम अनुचित कीना ॥
मैं हौं बहिन तू मेरो भाई । मोहि तोहि ना होय सगाई ॥
यहि करनी तोहि लागै पापा । धर्मराय तब निज पद थापा ॥
पुण्य पापके भय मोहि नाही । पुण्य पाप हमही ते आही ॥
पुण्य पापके हम करतारा । कोई लेय न लेख हमारा ॥
कहैं कैल सुन आदि कुमारी । मोहि कारन तोहि पुरुष सँवारी ॥
मानि लेहु तुम हमरा बचना । मिलि हमतुम करिये जगरचना ॥
कैल वचन आद्या नाहिं माना । उत्तर प्रति उत्तर तोहि ठाना ॥
तब मन रोष निरञ्जन कीना । निज मुखमाहि मेलि तिहि दीना ॥
लीलत कन्या कीन पुकारा । पुरुष पुरुष कहि वचन उचारा ॥
ततक्षण योग जीत प्रकटाने । गहे कमान बान कर ताने ॥
सुरति बानते कैलहि पारा । कन्या मुखते बाहर डारा ॥
जब कन्या मुख बाहर आई । योगजोत तब गयो लोपाई ॥
कन्या भयबश भै तिहि काला । पुरुषकि सुधि बिसरायौ बाला ॥
पिता पिता कहि कैलहि बोले । मदन प्रचंड तासु तन डोले ॥
कियो निरञ्जन सकल पसारा । पुण्य पाप दोउ रचे अपारा ॥
पुण्य पाप दोउ फंदा होई । जामें अरुझि रहे सब कोई ॥
योग यज्ञ संयम व्रत पूजा । सब हमही कोइ और न दूजा ॥
रची छुधा माया बिकरारा । पुरुष लोकको मूँढौ द्वारा ॥

( १६ )

बोधसागर

कहै निरञ्जन कामिनि पाही । पुरुष ढिग अब हम नहीं जाई॥
पुरुष लोक इहाँ रचि लीजे । यकछत राज हमहि तुम कीजे॥
अब तौ पुरुष आस नहीं मोही । गहिके बाह राखि हो तोही ॥

छन्द-भग ना हतो तिहि नारिके नख फारि कीन निरञ्जना ।
यमसाट जिव जेहि बाट विचरे घाट उत्पतिको बना ॥
भग भोग प्रथम सँयोग सोई कैल आद्या सो ठना ।
भे प्रकट ब्रह्मा विष्णु शंकर त्रिगुन भव निधि रंजना॥

अथ त्रिदेवकी जन्मकथा वर्णन-चोपाई

काल कल्लुङ्ग जब गयौ सिराई । रूपरंग कन्या तन छाई ॥
जब भलि भांति रंग तन भीना । कन्या कैल व्याह सँग कीना ॥
कूर्मको तीन शीस जो रहेऊ । कैल काटिके भक्षण कियऊ ॥
ताते तीन अंश प्रकटाने । ब्रह्मा विष्णु महेश बखाने ॥
देव निरंजन आदि कुमारी । केते काल कीनो सुख भारी ॥
कैल अरु कामिनि भोग बिलासा । स्वसमवेद भलिभांति प्रकाशा ॥
तीनो सुत जिहि काल उपाई । धर्मराय तब गयौ लुपाई ॥
राजपाट आद्याको दीना । सुत्रमाहँ निज बासा कीना ॥
कह्यो निरंजन आद्या पासा । मेरो भेद न करहु प्रकाशा ॥
पुत्रनसे जनि बात जनावो । मेरो भेद न तिनहि सुनावो ॥
यतन अनेक ध्यान जौ लैहैं । तो मम दर्श पुत्र नहीं पैहैं ॥
यह कहि शून्यमें गयो समाई । योगसमाधि निरञ्जन लाई ॥
मातासे सुत पूछे बाता । पिता हमार कहाँ है माता ॥
पुत्रनते कह आदि भवानी । पिता तुमार हमहुँ नहीं जानी ॥
रचना सकल हमहिते होई । हम तुम तुम हम और न कोई ॥
तुमहो पुरुष हमहि तोर जोई । हम तुम दूसर और न कोई ॥
हम हैं पिता हम ही हैं माता । हम ही तीन लोकके दाता ॥

स्वसमवेदबोध

( १७ )

जब जननी अस बचन उचारा । सुनि संसै कर तिहूँ कुमारा ॥
माता कपट कीन हमपाहीं । पिताको भेद बतावत नाही ॥
तीनो बालक ताते रूठै । जननी बचन कहैं सब झूठै ॥
तब माता बोली रिसिआई । पिताको दरश करहु तुम जाई ॥
माता कह तुम पुष्प चढ़ाओ । पिताको शीस परसिके आवो ॥
चले जो पुत्र पिताकी आसा । पिता रहै पुत्रनके पास ॥
खोजत खोजत कतहुँ न पाई । रहे निरंजन सुन्न समाई ॥
लगी समाधि निरंजन तारी । निकसे वेद श्वास सँग चारी ॥
ऋग अरु यजुर अथरबन सामा । धरि तन रटहि निरंजननामा ॥
निरंकारकी अस्तुति करही । देव निरंजन गुन उच्चरही ॥
देव निरंजन दृष्टि न आवै । ज्योतिज्योति कहि श्रुतिगुणगावै
तिहिमें वेद निरखै निज नैना । अनुमानहिते भाखे वैना ॥
वेदन प्रति नभ बचन सुनाई । बासा करहु सिंधुमें जाई ॥
आज्ञा दियौ निरंजन राई । बसो वेद सागरमें आई ॥
बहुरि निरंजन सैन लखाई । आद्यासे अस कहौ बुझाई ॥
निज पुत्रनको आज्ञा दीजै । सिंधु मथनको उद्यम कीजै ॥
तब आद्या अस युक्ति बनाई । तीन सुता निज अंग उपाई ॥
पुत्रिन कह अस आज्ञा दीनों । बसहु जाय सागरमें तीनों ॥
माताको अस आयसु पाई । तीनों सिंधुमें गई समाई ॥
यह चरित्र जननी जो ठाना । ब्रह्मा विष्णु शंभु नहि जाना ॥
राखा गुप्त न मर्म बताया । आद्या सुतनसे बचन सुनाया ॥
सागर मथन जाहु मम वारा । पैहो वस्तु महा सुखसारा ॥
माताकी जब आज्ञा पाई । चले तिहूँ तिहि शीस नवाई ॥
मथ्यौ जाय सागरको सोई । कन्या तीन प्रकट तब होई ॥
तीनो कन्या जबही पाये । हर्षसमेत मातु ढिग आये ॥

बो० सा०

( ९८ )

बोधसागर

तब माता पुत्रन कहि टेरा । यह तो काज भयौ सुत तेरा ॥
सावित्री ब्रह्माको दीना । विष्णु लक्ष्मीको बरि लीना ॥
पारवती शंकरको ब्याहा । नारि पाय अतिमनहि उछाहा ॥
काम विवशभे तीनों भाई । देव दनुज सब ही प्रकटाई ॥
जननी पुनि पुत्रन समुझावो । सागर मथन फेरि तुम जावो ॥
जो जिहि मिले लेहु तुम सोई । तीनों पुत्र चलत तब होई ॥

सोरठा-रश्म न लायौ बार, चले तिहुँ सुत सिंधुतट ।

मथ्यौ ताहि चित धार, निकसे चौदह रतन तब ॥

चौपाई

चौदह रत्न निकस जिहि बारी । लै जननीके सम्मुख धारी ॥
माताके जब आगे कीना । ताने बांटि तिहुँको दीना ॥
पायौ वेद सो ब्रह्मा लीनो । पढ़ि गुनिके विचार सो कीनो ॥
ब्रह्मा वेद पढ़न जब लागा । पढ़त वेद तब भौ अनुरागा ॥
कहै वेद पुरुष यक आही । निराकार जिहि रूप न छाही ॥
सत्य माई सो रूप देखावत । चितवत दृष्टि नजर नहि आवत ॥
स्वर्ग सीस पग आहि पताला । यह सब देखो ताको रुयाला ॥
ब्रह्मा विष्णुसे कह समुझाई । तुमहू शंख सुनो चितलाई ॥
आदि पुरुष यक वेद बतावा । वेद कहै हम भेद न पावा ॥
तब ब्रह्मा माता ढिग आये । करि प्रनाम तेहि शीस नवाये ॥
हे माता मोहि वेद बतावा । सिरजनहार और बतलावा ॥

दोहा-ब्रह्मासे माता कहे, सुन सुत मेरी बात ।

सप्त स्वर्ग है शीस जिहि, चरण पताल है तात ॥

जौ इच्छा तोहि दरशकी, पुष्प लेहु तुम हाथ ।

बेगि सिधारो ताहि ढिग, जाय नवावो माथ ॥

चौपाई

ब्रह्मा मातहि शीस नवाई । उत्तर दिशा बेगि चलि जाई ॥

स्वसमवेदबोध

( ९९ )

तिहि अस्थान पहुँचे जाईं । नहिं तिहँ रवि शशि सुत्र रहाईं॥
बहुविधि अस्तुति करे बनाईं । ज्योति प्रभाव ध्यान तहँ लाईं॥
करते ध्यान गये युग चारी । माता शोच पुत्रकर भारी ॥
ब्रह्मा तात दरश नहिं पावा । शून्य ध्यान युग चारि गँवावा ॥
किहि विधि रचना रची बनाईं । ब्रह्मा आवै कौन उपाईं ॥
उषटि शरीर मैल गहि काढ़ी । पुत्रीरूप कीन रचि ठाढ़ी ॥
शक्ति अंशनिज ताहि मिलावा । नाम गायत्री तासु धरावा ॥
गायत्री मातहि शिर नावा । चरन टेकि रज शीस चढ़ावा ॥
गायत्री बिनवै कर जोरी । सुन जननी बिनती यक मोरी ॥
कौन काज मोंकह निरमाईं । कहो वचन लेवैं शीस चढ़ाईं ॥
कह अद्या पुत्री सुन बाता । ब्रह्मा आहि जेठ तव आता ॥
पिता दरश कहँ गये अकाशा । आनहु ताहि वचन प्रकाशा ॥
दरश तातको वह नहिं पावै । खोजत खोजत जन्म सिरावै ॥
जौनी विधि वह ईहां आईं । करहु जाय तुम तौन उपाईं ॥
चलि गायत्री मारग जाईं । जननी बचन प्रीति चित लाईं ॥
गायत्री पहुँची तहँ जाईं । ब्रह्मा जहाँ समाधि लगाईं ॥
लगी समाधि ब्रह्मकी गाढी । गायत्री शोचे तहँ ठाढी ॥
केते धौस रही सो ताहीं । ब्रह्मा पलक उधारे नाहीं ॥
गायत्री तब शोचन लागी । कौन भाँति ब्रह्मा अब जागी ॥
निजु मनमें बहुतै अनुमानी । आद्या ताके ध्यान समानी ॥
आद्या ध्यानमें ताहि सिवाईं । परसो निजकर ब्रह्मा पाईं ॥
गायत्री पुनि कीनेहु तैसो । जननी युक्ति बतायो जैसो ॥
तिहि औसरसो मन चितलाईं । परस्यौ ब्रह्म चरन तब जाईं ॥
ब्रह्मा योग ध्यान चित डोला । व्याकुल भयो ब्रह्म अम बोला ॥
कौन आहि पापिन अपराधी । काहेको मोर छोडाय समाधी ॥

( १०० )

बोधसागर

शाप देब तोको हम जानी । पिता ध्यान खंडेहु मोर आनी॥
कह गायत्री मोहि न पाया । बृक्षि लेव तब देहो आपा ॥
कहौं तोहिते सांची बाता । तोहि लेन पठयौ तो माता ॥
चलहु बेगि जननी पहुँ जाई । तुम बिन रचना होय न भाई ॥
ब्रह्मा कहैं कौन विधि जाई । पिता दरश अजहूं नहि पाई ॥
कह गायत्री दरशन पैहो । चलहु बेगि नहि तो पछितैहो ॥
ब्रह्मा कहैं देहु तुम सार्वी । परस्यौ शीस देखा मैं आँखी ॥
ऐसो कहो मातु समुझाई । तब तुमरे सँग हम चलिजाई ॥
गायत्री कह यह है स्वारथ । कहब जानि मैं पुनि परमारथ ॥
यहि विधि बोलब झूठी बाता । कौनी विधि तौ बूझे माता ॥
पुष्प गायत्री ब्रह्मा तीनी । एकमता तिहि औसर कीनी ॥
तीनों मिलिके चलि भये तहँवा । कन्या आदि कुमारी जहँवा ॥
करि प्रणाम सम्मुख रह जाई । माता सब पूछी कुशलार्ई ॥
कैसे दरश भो पिता सुभाऊ । ब्रह्मा सो सब मोहि सुनाऊ ॥
कहैं ब्रह्म दोनों हैं सार्वी । परस्यौ शीस देखा इन आँखी ॥
तब माता बूझै अनुसारी । कहु गायत्री वचन विचारी ॥
तुम देखा इन दर्शन पावा । कहो सत्य दरशन परभावा ॥
तब गायत्री बचन सुनावा । ब्रह्मा दरश शीस पितु पावा ॥
मैं देखा इन परस्यो शीसा । ब्रह्माही मील्यौ जगदीशा ॥

छंद-ले पुष्प परस्यौ शीस पितु इन दृष्टिमें देखत रही ।
जल ढारि पुष्प चढ़ाय दीनों हे जननि है यह सही ॥
माता कहे पुष्पावतीसे कहो सत्यहि मोसना ।
जो चढ़ेहु शीसपिताके तुम मोसे कहो तुम ततछना ॥

सोरठा-कहु पुष्पावति मोहिं, दरसकथा निरुवारिके ।
यह बूझौं मैं तोहिं, जिमि ब्रह्मा दरशन कियौ ॥

स्वसमवेदबोध

( १०१ )

चौपाई

पुष्पावती वचन अस बोले । माता सत्य वचन नहिं डोले ॥
दरसन शीस लह्यौ चतुरानन । चढ़न शीस यह धरिनिश्चलमन ॥
शाप सुनत आद्या अकुलानी । यह अचरज भो मरम न जानी ॥
अलखनिरंजन असपुनिभाखी । मोकहैं कोइ न देखे आंखी ॥
तीनों बोलैं झूठी बानी । सुनि माता बहुतै अकुलानी ॥
यह सुनि माता कीनेहु दापा । ब्रह्माको पुनि दीनेसु शापा ॥
पूजा तोर करे कोइ नाही । जो मिथ्या बोल्यौ हम पाही ॥
आगे ह्वैहै शाप तुम्हारा । मिथ्या पाप करे बहु भारा ॥
प्रकट नियम बहु करै अचारा । अंतरमैल पाप विस्तारा ॥
विष्णु भक्तसे कर हंकारा । ताते परे नरककी धारा ॥
कथा पुराण औरन समुझावै । चाल बिहीन आप दुख पावै ॥
उनत और सुने जो ज्ञाना । करै भक्ति सो कहो प्रमाना ॥
देवन पूजा, बहुबिधि लावै । दछिना कारन गलाकटावै ॥
जाकह शीस करे पुनि जाई । परमारथ तिहि नाहिं हढ़ाई ॥
अपने स्वारथ ज्ञान सुनैहै । आपन पूजा जगहि हढ़ैहै ॥
परमारथके निकट न जाई । स्वारथ अरथ सबै समुझाई ॥
गायत्री तोर वृषभ भतारा । पाँच सात अरु बहुत पसारा ॥
धरि औतार अखज तुम खाई । बहुत झूठ तुम वचन सुनाई ॥
सुनो पुष्प तुमरो विश्वासा । होय विगंध मध्य तौ बासा ॥
जो तोहि सींच लगावै आनी । ताकर होय वंशकी हानी ॥
अब तुम जाय धरो औतारा । केवडा केतकी नाम तुमारा ॥
छंद-शाप तीनोंको दियो मनमाहैं तब पछितावई ।
कैसे करे मोहि निरंजन पल छमा मोहि न आवई ॥
आकाश बानी तब भई यह कहाँकी नभ बानिया ।
उत्पत्ति कारन तोहि पठयौ कह चरित यह ठानिया ॥

( १०२ )

बोधसागर

सोरठा-नीचहि ऊँच सताव, ओल मोहिते पाय हो ।
द्वापर युग जब आव, तोहि पाँच भरतार हो ॥

चौपाई

शाप ओल जब सुने भवानी । मनमें गुने कहे नहि बानी ॥
ओल प्रभाव आपते पाई । अब कह करो निरंजन राई ॥
तुमरी वशय परी हम आई । जस चाहो तस करो उपाई ॥
आई माता विष्णु दुलारा । सुनहु विष्णु यक बचन हमारा ॥
अब तुम बेगि पिता लगि जाई । बेगि पिताको परसहु पाई ॥
आज्ञा पाय विष्णु तब चाला । पिता दरश कहै गये पताला ॥
अछत पुष्प लीने कर माहीं । चले पताल पंथ गम नाहीं ॥
पहुँचे शेष नाग पहुँ जाई । विषके तेज विष्णु अलसाई ॥
भयौ श्याम विष तेज समावा । निरंकार अस बचन सुनावा ॥
अहो विष्णु माता पहुँ जाई । कहियो सत् बचन ससुझाई ॥
सतयुग त्रेता जैहै जबही । द्वापर होय चौथा पद तबही ॥
जब तुम है हो कृष्ण शरीरा । लेहु ओल सो कहो बलवीरा ॥
जो जीव देय पीत जेहि काहूँ । हम पुनि ओल दिलावैं ताहूँ ॥
नाथहु नाग कालिंदी जाई । अब तुम जाहु विलंब न लाई ॥
बिल्लु पहुंचे जननी पास । कीनो सत् बचन परकाशा ॥
भेत्यौ नाहि मोहि पद ताता । विषके ज्वाल श्यामभो गाता ॥
व्याकुल भयौ तबहि फिरि आई । पितादरश नाहीं हम पाई ॥
सुनिकै हरषी आदि कुमारी । लीन विष्णु कहै निकटदुलारी ॥
चूम्पौ बदन शीश दियो हाथा । सत्य वचन बोल्यौ सुतगाथा ॥
देहुँ पुत्र तोहि पिता भेटाई । तोरे मनको धोख छुड़ाई ॥
प्रथमहि ज्ञान दृष्टि तुम देखो । बचन मोर हृदयेमें पेखो ॥
मनस्वरूप करि ताकर जानो । मनते दूजा और न मानो ॥

स्वसमवेदबोध

( १०३ )

स्वर्गं पताल दौर मन केरा । मन अस्थिर मन फिरै अनेरा ॥
छनमहँ कला अनंत देखावै । मनकहँ पेरि न कोई पावै ॥
निराकार मनहीको कहिये । मनके आस दौस निशि रहिये ॥
देखहु पलटि सुन्नमें ज्योती । जहाँ झिलिमिलि झलके मोती ॥
यहिविधिविष्णुदरसपितुपायौ । भांति भांतिको रंग दिखायो ॥
श्वेत पीत हरितो जंगाली । रूप अन्तूप गगनमें भाली ॥
सुनि बाजा हियमें हरपाना । पिता दरसते अति सुख माना ॥
बहुत अधीन मातुसे भैऊ । शीश नाय मृदु बानी कहेऊ ॥
तव प्रसाद मम मातु विशेषा । पिताको दरश दृष्टि देखा ॥
मातु गई पुनि रुद्रके पास । देखि रुद्र मनमाहँ हुलासा ॥
दौय पुत्र कह मता बतावा । माँग महेश्वर तोहि जो भावा ॥
हे जननी यह कीजै दाय । कबहुँ न विनसै हमरी काया ॥
कह जननी तुम ऐसे होही । साधो योग सत्य कहाँ तोही ॥
जबलों पृथ्वी अकाश सनेहा । कबहुँ न विनसे तुम्हरी देहा ॥
तिहुँ सुतनको मता बताई । आदि पुरुषको नाम छपाई ॥
आद्या ऐसो छल बल कीना । पुरुष छपाय प्रकट यम कीना ॥
निरंकारको भेद बतावा । पुरुषसँदेश न सुनत सुनावा ॥
पुरुषभेद विष्णुहू न जाने । निरंकारको करता माने ॥
जैसो छल बल आद्या कीन्हा । सोई चला जक्तमें चीन्हा ॥
देखो ऐसो नारि स्वभाऊ । मात पिता कह सो विसराऊ ॥
केतो प्रीति मातु पितु करही । कन्या एक न चितमें धरही ॥
गै पुत्री जब स्वामी गेहा । रातयौ रंग तासुके नेहा ॥
मातु पिता सबही विसरायौ । अपने पतिकी नारि कहायौ ॥
आदर मान खसमको होई । पिताको नाम लेय नहि कोई ॥
ताते आद्या भई बिगानी । काल अंग है रही भवानी ॥

( १०४ )

बोधसागर

ब्रह्मा निज मन कीन उदासा । तब चलि गये विष्णुके पास ॥
जाय विष्णुसे बिनती ठाना । तुम हो बुद्धिदेव परधाना ॥
तुमपर माता भई दयाला । हम तो आप बस भये बिहाला ॥
निज करनी फल पायों भाई । कैसे दोष लगावों माई ॥
अब सोयतन करो हो आता । चले परिवार वचन रहै माता ॥
कहैं विष्णु छोड़ो मन भंगा । मैं करि हौं सेवकाई संगा ॥
तुम जेठे हम लहुरे भाई । चित संशय सब देहु बहाई ॥
जो कोइ होवे भक्त हमारा । सो सब ही तुमरो परिवारा ॥
यज्ञ धर्म पूजा जो होई । विप्र बिना कछु होय न सोई ॥
जत्तमें ऐसो ज्ञान हटावै । पुन्यफलनकी आस लगावै ॥
जो कोइ करे द्विजनकी सेवा । हरषित हों तिहि विष्णुदेवा ॥

सोरठा-ब्रह्मा भये अनंद, जबहि विष्णु अस भाषेऊ ।

मेलो मनको द्रंद, साख मोर सुखते रहै ॥

चौपाई

ब्रह्मा भाष्यौ झूठ संदेशा । ताते ताको भयो अंदेशा ॥
विष्णु जो सांचो वचन सुनाया । माता कीन ताहिपर दाया ॥
शिव लजायके चुप है रहेऊ । झूठ सांच एको नहिं कहेऊ ॥
दृढत पिता तिहुं गे हारी । पिताको रूप न कतहुं निहारी ॥
माता कही बिहँसि निज बानी । ब्रह्मा झूठ झूठकी खानी ॥
शिव कछु झूठसांच नहिं भाखो । ताते योग ध्यान चित राखो ॥
योग समाधि करो अब जाई । जटा रखाय बिभूति रमाई ॥
माता विष्णुसे बोलै बानी । तीन लोक करिहो रजधानी ॥
शिव ब्रह्मा करिहै तब सेवा । गन गंधर्व रचिहो मुनि देवा ॥
चार बरण ब्रह्मा निरमाई । चार वेद मत चार चलाई ॥
शिवके वरण भेद ना होई । कौध रूप धरि भेष बिगोई ॥

स्वसमवेदबोध

( १०५ )

मातु जो दया विष्णुपर कीने । पिता देखाय निकटही दीने ॥
माता पिता एक मिलि गेऊ । विष्णु देखिके हर्षित भैऊ ॥
माता पिता सुत एकै ठेऊ । विष्णुसमाधिज्योति मिलिगैऊ॥
तीनों मिलि जब एकै भयऊ । तिहि पीछे जग सिरजै लियऊ॥
तब माता अस बचन उचारा । रचो सृष्टि तुम तीनों बारा ॥
अंडज उत्पति कीनी साता । पिंडजको ब्रह्मा उत्पताता ॥
उखमज खानि विष्णु न्यौहारा । शिव थाबरको कीन पसार ॥
चौरासी लख जूनी कीना । आधा जल आधा थलदीना ॥
नौलख जलके जीव बखाना । चौदह लख पंछी परमाना ॥
कृमी कीट सत्ताइस लाख । तीस लक्ष अस्थावर भाषा ॥
चतुर लक्ष मानुष परमाना । मनुषदेह लह पद निर्वाना ॥
और योनि परचे नहीं पावै । तत्त्वहीन भव भटका खावै ॥
एक तत्त्व अस्थावर जाना । उखमज दोय तत्त्व परमाना ॥
अंडज तीन तत्त्वगुन जाना । पिंडज चार तत्त्व परमाना ॥
ताते होय ज्ञान अधिकारा । मानुष देह भक्ति अनुसारा ॥
अंडज खानि तीन तत्त्वव्यापा । वायू तेज तीसरो आपा ॥
थावर एक तत्त्व है पानी । उखमज वायु तेजते सानी ॥
पिंडज चार तत्त्वसे बरनी । पौनो पावक जल अरु धरनी ॥
पिंडज नरकी देह देह सँवारा । ताते पंच तत्त्व परमाना ॥
नर नारीमें तत्त्व समाना । ज्ञान विभेद ताहुमें जाना ॥
चारो खानि जीव भरमावा । तब मानुषकी देही पावा ॥
पांच तत्त्व मानुष विस्तारा । तीनों गुण तेहिमाहँ सँवारा ॥
देह धरे छोडे जस खानी । तैसो ज्ञान लहे सो प्रानी ॥
प्रथम कहो अंडजकी खानी । दारिद्री निद्रा अलसानी ॥
चोरी चुगली निंदा माया । घर बन झाड़ी आगिलगाया॥

(१०६)

बोधसागर

तृष्णा दूत भूत सेवकाई । रोवै कभीके मंगल गाई ॥
और को देत देखि पछिताई । गुरु सतगुरु चीन्है नहिं भाई ॥
वेद शास्त्र सब देत उठाई । आपन मन सब ही दरसाई ॥
जगमें और तुच्छ सब आही । मोहि समान बड़ को जगमाही ॥
मैले वस्त्र सो नहीं नहाई । आँखि चिपर मुख लार बहाई ॥
पासो जूवा खेल अरु दाऊ । कूबर मूंड अरु लामा पाऊ ॥
दूजी उखमज खानि कहावा । ताते जो नर देही पावा ॥
जाय सिकार जीव कहैं मारा । बहुत आनंद होय तिहि बारा ॥
बहुविधि मांसु राँधिके खाई । गुरुको मेटि करे अधिकार्ई ॥
निंदै नाम शब्द गुरु देवा । बहुत बात कथ ज्ञानको भेवा ॥
झूठी बचन सभामें लाई । टेढी पाग छोर ओरमाई ॥
दया धर्म मनमें नहिं आवै । करे पुन्य तिहि हाँसी लावै ॥
माला तिलक अरु चंदन करई । हाट बजार चिकन पट धरई ॥
अन्तर पापी ऊपर दया । सो जिव यमके हाथ बिकाया ॥
लम्बा दन्त रु वदन भयावन । पीरे नैन ऊँच अनपावन ॥
तीजे अचल स्वानिको लेखा । देह धरेते होय जो भेखा ॥
छिनक बुद्धि होवै जिव केरा । पलटत बुद्धि न लगै बेरा ॥
झगा फेटा शिरपर पागा । राजद्वारसे वामे लागा ॥
घोडेपर होवै असवारा । तीर खड्ग अरु कमर कटारा ॥
इत उत सैन चित्तसे लावा । परनारीको सैन बोलावा ॥
पर घर रति कर चोरी जाई । शरमभाव उपजै नहिं भाई ॥
छन यकमें कर पूजा सेवा । छन यकमें बिसरै सो देवा ॥
छन यक मनमें सूरा होई । छन यक मनमें कादर सोई ॥
छन यक मनमें करे सुधर्मा । छन यक माहँ करे अपकर्मा ॥
भोजन करत माथ खजुआवै । बाँह जाँघ पुनि मीजत जावै ॥

स्वसमवेदबोध

( १०७ )

भोजन करे सोय पुनि जाई । जो जगाव तिहि मारन धाई ॥
आँखी लाल होय पुनि वाको । और अनेक न लक्षण ताको ॥
चौथे पिंडज खानि सुनावों । गुन औगुनको भेद बतावों ॥
वैरागी उन मुनि मत धारी । धर्म पुण्य कर वेद विचारी ॥
तीरथ पुण्य अरु योग समाधी । गुरुके चरण चित बल बाँधी ॥
पढे पुराण कथे भल ज्ञाना । सभामें बैठि बात भल ठाना ॥
राजभोग कामिनि सुख माने । मनशंका कबहुँ नहि आने ॥
धन संपत्ति सुख बहुत सोहाई । लौंग सोपारी बीरा खाई ॥
खरचै दाम पुण्यमें सोई । हृदये सुख पुनि ताके होई ॥
चक्षु तेज ताकर अति मानी । परा कर्म देही बल ठानी ॥
देखो खड्ग सदा ता हाथा । प्रतिमा निरखि नवावै माथा ॥

सोरठा-छूटे नरकी देह, जन्म धरो फिरि आय जब ।

ताको कह्यो सनेह, धर्मदास सुन कान दे ॥

चौपाई

आयू आछत जिव मरिजाई । जन्म धरे मानुषको आई ॥
शूरा होय सो रणके माहीं । भै डर ताहि निकट न जाहीं ॥
माया मोह ममता नहि व्यापे । दुरमति ताहि देखि डर कांपे ॥
सत्यशब्द परतीत कै आने । निंदारूप कबहुँ ना जानै ॥
सतगुरु चरण सदा चित राखे । प्रेम रु प्रीति दोनता भाखे ॥
यहिविधि चारों खानि बनाया । सबमें रमे निरंजन राया ॥
कर्मजाल महाँ सबै फँसाई । रेखाकर्म प्रत्यक्ष देखाई ॥
कर्मकी रेख लिखे सबमाही । ताते जीव भवमें भरमाही ॥
लिखे निरञ्जन कर्मको रेखा । ताते जीव धरे बहु भेषा ॥
कर्मरेख कबहुँ नहि छूटे । फिर फिर जीव निरंजन लूटे ॥
चारि खानि रचिकियो पसारा । चार बरन पाखेंड व्यौहारा ॥

( १०८ )

बोधसागर

चौरासी लख योनी कीन्हहा । चार खानि जिव एकै चीन्हहा ॥
चौरासी लख बचन बखाना । चारखान जिव एक समाना ॥
रचना रचे सृष्टि बहु रंगा । कामदेवकी कला अनंगा ॥
सुर नर मुनि गण काम तरंगा । पशु पक्षी सबहीके संगा ॥
कर्म काल सबही भरमावा । शिवशक्ती सँग कला नचावा ॥
कनक कामिनी फंद बनाया । तिहि फन्दे सबही अरुझाया ॥
जाति पांति कुल मान बढ़ाई । ब्रह्मा यह यम फंद बनाई ॥
शिव शक्ती द्वै रूप बनाया । नारि पुरुष सो नाम धराया ॥
भगद्वारे है सब जग आया । भग भोगनको पुरुष कहाया ॥
नखशिख रची काल फुलवारी । फूल कुवास सुवास सँवारी ॥
कनक कामिनी काल बनाई । चार खानिमें रही समाई ॥
कामिनि काम सँवारा ज्ञानी । चारो खानि रहा विष सानी ॥
काल कर्मकी खानि बनाई । सब संगतमें रहा समाई ॥
सुर नर मुनि सबहीको डहके । चारखानि सबही घटमहके ॥
तीनों देव निरंजन रूपा । येई भवसागरके भूपा ॥
चारो मिलि सब सृष्टि सँवारी । पञ्चम कहिये आदि कुमारी ॥
जहाँ तहाँ तीरथ व्रत दाना । देवल देव पूजा पाषाना ॥
मथुरा तीनि देव औतारा । ब्रह्मा पुनि काशी पग धारा ॥
यहिविधि आया साज्यौसाजू । तिहुँ पुत्रनकहँ दीनो राजू ॥
मथुराते चलि आदि भवानी । कोटकगंडे पहुची आनी ॥
कोटकगंडे करि निज थाना । हींगलाज पुनि कीन पयाना ॥
आदि भवानी रही तहाँई । तिहुँ पुत्र जग राज कराई ॥
नाना भांति कर्म बिस्तारा । वेद कितेब प्रपंच अपारा ॥
भर्मजाल जगमें फैलाई । नर नारी तामें अरुझाई ॥
जहतहँ तीन देवकी सेवा । कोइ न जान पुरातन देवा ॥

स्वसमवेदबोध

( १०९ )

तीन देव निज हुकम चलाईं । अध्याहूको नाम छपाई ॥
तीन देव सेवैं संसारी । पूछै नहिं कोइ आदि कुमारी ॥
तब अध्या मनमाहिं बिचारा । मम सुत मेरो महातम टारा ॥
कीनो तब असि युक्ति भवानी । ऐसो कलारूप गुनखानी ॥
तीन शक्ति निज तन प्रकटावा । महामोहनी रूप बनावा ॥
दोहा-रंभा सूची रेनुका, तीन रूप निज कीन ।
गंधर्बनको मोहि मन, वश अपने कर लीन ॥

चौपाई

तिहुँ रूप मोहनी बनाई । सब गंधर्व निज संग गहाई ॥
भाँति भाँतिके बल्ल अन्तूपा । भूषन भूषित अद्वुत रूपा ॥
छतिस भाँतिके बाजा लेई । चली त्रिदेवपाहिं तब येई ॥
राग रागिनी यकसठ जाती । महा मधुर सुर गाव सुभाँती ॥
तीन देव सुर नर मुनि झारी । निज बस करि लीने तिहुँ नारी ॥
जगमें अपनो अदल चलाई । जहँ तहँ शक्तीसेव थपाई ॥
तीनो देव निरंजन शक्ती । इन पांचोंकी सब कर भक्ती ॥
मन ऊँकार निरंजन राई । अलख शून्य अविकार कहाई ॥
कैलकाल निर्गुन निरंकारा । धर्मराय यम ब्रह्म पुकारा ॥
इत्यादिक बहु यमके नामा । रमै सर्वमें सोई रामा ॥
जैसे तिलमें तेल समाया । तिमि सबमाहिं निरंजन राया ॥
मनसे और नहीं बरिबंडा । गाजै तीन लोक नौ खंडा ॥
सुर नरमुनिसब छलि छलि मारा । कोई जीव नहिं बचा कड़ारा ॥
रचना रुचिर अपार बनाई । सकल जीवको सो भरमाई ॥
कबहुँके हेठ कबहुँके ऊपर । कबहुँके डारि देय जिव भूपर ॥

पंजाबी भाषा-छंब झूलना

इत्थते उत्थ कर उत्थते इत्थ धर जित्थेही जाय जिव नाहिं छुट्टे ॥

( ११० )

बोधसागर

भट् तिहुँ लोक है नट्ट जित जाइये तित्थही तित्थही काल कुट्टै ॥

सत्यकबीर बचन

तीन लोकमें लागी आग । कहैं कबीरा कहँ जैहो भाग ॥

चौपाई

पूर्व प्रसंग करो पुनि वर्णन । कूर्मपाहिं जिमि गये निरंजन ॥
तीन माथ जब ताको छीना । बहुरि शून्यमें बासा कीना ॥
कूर्म भये तिहि काल दुखारी । ध्यानमें पुरुषते बचन उचारी ॥
अहो पुरुष दया भल कीना । मोकहँ धर्मराय दुख दीना ॥
यहि विधि पुरुषपै कूर्म पुकारी । तब सतपुरुष दया उर धारी ॥
बोले तब अस पुरुष पुराना । सुनो कूर्म मम बचन प्रमाना ॥
यह तौ काल भयो अन्याई । जो मैं ताहि देब बिनसाई ॥
तौ सबही रचना मिटि जैहै । सोलह पुत्र सबहि बिनसैं है ॥
सोलह पुत्र एक ही नारा । ताही सूत मध्य यह कारा ॥
विषयते रचित निरंजन देही । मम दरसन अब पाव न येही ॥
लक्ष जीव नित करे अहारा । सवालक्ष नित प्रति बिस्तारा ॥
यहि विधि आप दीन प्रभु तेही । परमपुरुष ढिग जाय न येही ॥
रचना करि पुनि भोजन करई । सबमें रमै न सो लखि परई ॥
षट दरसन छानवे पाखंडा । धर्म कर्म जहँलों महि मंडा ॥
सो सब आहि निरंजन खेला । गह जिव त्रिगुन शक्तिके मेला ॥
नाना भौतिके धर्म चलाई । जक्त जीवको सो भरमाई ॥
एक विरुद्ध पंथ कर दूजा । नानाविधिको थापे पूजा ॥
सबहि भरमायके भोजन करई । कालकलानहिं जिव लखि परई ॥
चार मुक्ति जो वेद बखाना । सो सब देव निरंजन थाना ॥
योग युक्ति सब तासु पसारा । पुरुषद्वार ते परदा डारा ॥
मुक्तिपंथ नहिं पावै कोई । काल भ्रमावै सब नर लोई ॥

स्वसमवेदबोध

( १११ )

तस शिला यक नाम पुकारा । सब जिव पकरि ताहिपरजारा ॥
तस शिलापर जो जिव परही । हाय हाय करि चटपट करही ॥
तलफि तलफि जिव तहँरहिजाही । भूनि भूनि सब यमधरिखाही ॥
केते युग जीवन धरि खायौ । जारि वारिके योनि भ्रमायौ ॥
जरत जीव जब कीन पुकारा । काल देत है कष्ट अपारा ॥
यमको कष्ट सहो नहि जाई । हो साहिब दुःख टारो आई ॥
यहि बिधि जिव जब कीन पुकारा । पुरुष दयाल दया उरधारा ॥
तब पुरुष ज्ञानीको टेरो । ज्ञानी सुनिये आज्ञा मेरो ॥

सत्यकबीर वचन

छंद—जब देखि जीवन कहैं बिकल तब दया पुरुष जनाइया ॥
दया विधि सतपुरुष साहिब तबै मोहि बोलाइया ॥
कह्यौ मोहि समुझाय बहुविधि जीव जाय चितावहो ॥
तुव दरशते जिव होय शीतल जाय तपत बुझावहो ॥
सोरठा—आपा लीनो मानि, पुरुष सिखावन शिर धरचो ॥
तत्क्षण कीन पयान, शीस नाय सतपुरुषको ॥

चौपाई

आयो जहँ जहँ जीव सतावै । काल निरंजन जीव नचावै ॥
चटपट करे जीव तहँ भाई । ठाढ़ भयो मैं तहँ पुनि जाई ॥
मोहि देखि जिव कीन पुकारा । हो साहिब मोहि लेव उबारा ॥
तब हम सत्य शब्द गोहरावा । पुरुष शब्द ते जीव बुझावा ॥
सब जीवनमिलि अस्तुति लाई । धन्य पुरुष यह तपन बुझाई ॥
यमते छोरि लेहु मोहि स्वामी । दया करो उर अंतर्यामी ॥

इति

अथ जीवनकी स्तुति—छंद तोटक

जय सत्य कबीर कृपाल घनं, दल दुष्टहनं पय पुष्ट जनं ॥

नं. ९ कबीरसागर - ५

( ११२ )

बोधसागर

योग जीत अतीत पुनीत प्रभू, वपु धारण कारन तारन भू ॥
सत सुवकृत सत्यस्वरूप सदा, जन ध्यावत पावत मुक्तिपदा ॥
मुक्ता मनिते जिव जो जुगता, मृतलोक सशोकन भौ भुगता ॥
हम दीन दुखी किमि त्याग चहो, करूणामय हो करूणामयहो ॥
करूणातन धार करी करूणा, करूणामयधौ करूणा वरूणा ॥
सुर सिद्ध बखानत खान दया, जिव देखि अनाथ सनाथ भया ॥
यहि ज्वाल जला यम भक्ष करे, बिन देव दयालको रक्ष करे ॥
यम जालिम जीवन जेर कियौ, सुधि लेत दयादधि देर कियौ ॥
सुख लेशन के तक लेश भरे, जगदीश परे जगदीश परे ॥
जिव काल करालके ज्वाल दहे, तर ऊपर भूपर धाय गहे ॥
हम जानि दयाल जो काल भजे, गुणश्राम प्रनाम सो नामतजे ॥
घटवाह मलाह सलाह कहो, फिर कैलकि गेलको सैल न हो ॥
वह सिंह समान शिकार करे, प्रिय पीव बिना कह जीव तरे ॥
हरि केहरि देहरि पार करौ, सरकार बडे बरकार करौ ॥
भयभंजन रंजन दासनको, खल डाटत काटत फांसनको ॥
भवसागर झागर काल बली, तह जीवकि उक्ति न युक्ति चली ॥
नहि एक उपाय बनाय बनी, करू काज गरीब निवाज गनी ॥
प्रभु पेखतही जिव शीतल है, श्रुति वेद पुराण बखानत है ॥
करूणा दृग कोटिन काल हने, खुगसिंधु कणा गिर बंधु बनै ॥
मतिधीर कबीर कबीर भजो, हितनाम प्रिया बिन नाम तजो ॥
तपखान कृशान शिला दहके, जरते प्रभु मारगते बहके ॥
तलफै तप तीख सभी तलते, बिन नाथ किने हन सोपलते ॥
निजु सुधि निवाज मुदधि लखो, सिरपै समरत्थ जो हत्थ रखो ॥
नरबाल बेहाल निहाल मही, दुखद्वंद्व दवारिन देह दही ॥
मनभौ मदमोचन लाचन है, जनरक्षक भक्षक पोचन है ॥