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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

( ८६ )

बोधसागर

सो तन त्यागि और पुनि लेऊ । पुनि कछु काल ताहिमें रहेऊ ॥
पुनि त्याग्यौ पुनि गह्यौ नवीना । क्रम क्रम भयौ ज्ञान गुनछीना ॥
षट प्रकार गह उत्तम अंगा । पुनि पशु पक्षी कीट पतंगा ॥
नर तनमें ज्यौ पारख पावै । तौ यह जीव बहुरि घर आवै ॥
मनुज देह ज्यौ चेतन होई । तौ निश्चय जिव जाय विगोई ॥
धोखे परा जीव यहि लेखा । भांति भांतिको धारे भेषा ॥
भ्रम करि वेद कितेब बनाया । भ्रम करि द्वैताद्वैत बताया ॥
भ्रम करि कर्म धर्म ठहराया । भ्रम करि बड़ बानी कथि गाया ॥
भर्मको धर्म सकल जग माहीं । सब जिव बले भर्मकी छाहीं ॥
भ्रम करिके षट दर्शन थापा । भ्रम करिके जिव लखै न आपा ॥
भ्रम करि ईश्वर दूर बताया । विरही बने सकल जग जाया ॥
भ्रम करि इत उत दूँदन लागे । भ्रम करि प्रेम भक्तिमें पागे ॥
धोखे परा सकल संसारा । बिन सतगुरु भ्रम टरे न टारा ॥
सारशब्द सतगुरुको पावै । सब धोखा भ्रम दूरि बहावै ॥

दोहा-ब्रह्मादिक सनकादिक, भ्रम करि बानी गाय ।
ता बानी भ्रम विष चढ़ा, जीव गये गफिलाय ॥
तिहि कारन आसा लगी, आवा गौनको मूल ।
पछो ताते सात फुटि, जीव सहे बहु शूल ॥

इति

अथ सात बीज वर्णन

ॐ श्रीं रं सौं रौं ह्रीं क्लीं. अ इ उ ए व म ह ।

चोपाई

सात बीज यह कह्यौ बखानी । ताते पुनि अंकुर उत्पानी ॥
क्रम ऊपाछा योग रु ज्ञानी । उत्तपति स्थितिप्रलय विधिनाना ॥
सातो अंकुरे जब चाली । चित्तरूप तब गहौ कुदाली ॥

स्वसम्बन्धवोध

( ८७ )

गोडन लगे नित प्रति वाही । बुद्धिके जलते सींचा ताही ॥
आलबाल हंकार बनाया । मन रूपी तहैं खाद डराया ॥
अंतःकरण भूमिका माही । नित नौ पल्लव फूटै ताही ॥
नाना क्रम उपाछा नाना । नाना योग अरु नाना ज्ञाना ॥
नाना उत्तपति स्थित है नाना । प्रलय अनंत न जाय बखाना ॥
एक एक प्रति नाना बानी । नाममात्र कहि तासु बखानी ॥
सात बीज गुरुवन मिलि बोये । प्रथम सुभेच्छा नाम कहाये ॥
पुनि सुविचार दूसरे कहिये । तनोमानसा तृतिये गहिये ॥
सत्त्वापति चौथे कहि दीजै । असंशक्ति पंचम गनि लीजै ॥
छठे पदार्थ अभावनी भाषा । तुरिया नाम सप्तमे राखा ॥
बोये सात बीज जब येही । अंकुरे निकसे फुटि तेही ॥
प्रथमै सो अब करों बखाना । जाते ज्ञानकेर बंधाना ॥
सोहं बीजको अंकुर ज्ञाना । आलबाल भक्तिमय साना ॥
सींचा ताहि प्रेमकी बारी । ताने नित नौ पल्लव धारी ॥

दोहा-शुभ इच्छादिक सात ये, तिनप्रति बानी भूर ।

पल्लव तिनते बहु फुटी, रही जक्त भर पूर ॥

ज्ञान परोक्ष है फूल तिहि, फल अपरोक्ष जो ज्ञान ।

दो बिधि ज्ञान प्रमानमें, जक्त जीव अरुज्ञान ॥

चौपाई

दुतिये अकार कर्म कहि गावो । ताते क्रम अंकूर उगावो ॥
भय करि आलबाल कर ताही । लोभके जलते सींचा वाही ॥
तामें सात साष कर थापन । यजन याजन अध्यन अध्यापन ॥
दान प्रतिग्रह मैथुन गानी । सातो क्रमकी नाना बानी ॥
बानीते पल्लव बहुतेरो । फूल बासना ताको हेरो ॥
पुण्य पाप द्वै फूल सो आना । कर्म करै यह कीन बखाना ॥

( ८८ )

बोधसागर

पुनि तृतिये अब देहुँ बताई । श्री उपाछा बीज कहाई ॥
तिहि उपाछा अंकुर आया । आलबाल मरजाद बनाया ॥
भावके जलते सींचा ताहीं । सात साख फूटी तिहि माहीं ॥
शिव विष्णू गणपति रवि होई । शक्ती राम कृष्ण सातोई ॥
पल्लव ताहि न फूटी थोरी । महामंत्र जो सात करोरी ॥

दोहा—जारन मारन बसकरन, उच्चाटन, उच्चार ।

आकर्षण अरुंधभनो, मोहन सप्त विचार ॥

तिनमें लागे फल रुचिर, लोकादिक बहु फूल ।

आब चौथो वर्णन करौं, योग धर्मको मूल ॥

बीपाई

योग बीज रंकी न प्रमाना । ताते योग अंकुर बिकसाना ॥

किरिया आलबाल कर ताको । साधन जलते सींचा वाको ॥

शास्त्र पतञ्जल पल्लव गायौ । सात साख तामें फहि आयौ ॥

प्रथमें सो हठयोग बतावो । बहुरि योग लय नाम कहावो ॥

योग कुंडली तीजे बरना । पुनि लंबिका योग चित धरना ॥

पंचम तारक योग बताई । षष्ठ योग अमनसकहि गाई ॥

योग सारुय सप्तम गुणगाहा । फूल समाध बखानो ताहा ॥

अणिमादिक सिद्धी फल अहई । अब उत्तपत्य भेद विधि कहई ॥

ए उत्तपत्य बीज बतलाया । तामें उत्तपति अंकुर आया ॥

विषया आलबाल कर जाही । बानी जलते सींचा वाही ॥

उत्तपति साख सात प्रकटानी । जाते चारो खानि बखानी ॥

शब्द स्पर्श रूप रस गंधा । बहुरि वासना इच्छा बंधा ॥

शब्दते मेघ कीट बहु आही । दाडुर आदिक उत्तपति जाही ॥

बहुरि स्पर्श अरु मैथुन गाया । जीव मैथुनी ताते जाया ॥

तृतिये रूप कि उत्तपति ठाना । अनल विहंग आदि जिव नाना ॥

स्वसमवेतबोध

( ८९ )

जेते दृष्टि भावते जाये । सो सब रूप उत्पन्न कहाये ॥
चौथे रसते जलचर भयऊ । वृक्षके फलते कीड़े कहेऊ ॥
पंचम गंधते उखमज होई । छठे वासना उत्पत्ति जोई ॥
ताते देव योनि प्रकटानी । भूतादिक ताहीते मानी ॥
सप्तम इच्छाते सिध योनी । सात बीज यह उत्पत्ति थूनी ॥

दोहा-नारी ताको फूल है, पुरुष फल बतलाय ।
बहुरि स्थितके बीजको, वर्णन करौं सभाय ॥

चौपाई

ह्रीं स्थिती बीज षष्ठोई । आलबाल तिहि माया होई ॥
मोहके जलते सींचा येही । सात शाख फुटि निकसीतेही ॥
अन्न अरु जल तृण पृथ्वी पत्ता । फल अरु फूल स्थिती गहत्ता ॥
अन्नते नर जलते है जलचर । तृणते तृणचर पात पत्रचर ॥
पुष्पते स्थित पुष्पचर आही । फलचर सदा फलनको खाही ॥
महि अरु मैलते जो उपजाया । महिअरु मैलसों भोग लगाया ॥
अब सप्तम परलयको बरनो । क्लीं है बीज ताहि संहरनो ॥
परलयको अंकुर सों धारा । सात साख तामें परचारा ॥
आलबालकी ना कठिनाई । क्रोध बारिते सो तृप्ताई ॥
सात लाख हैं ताके तीरा । पृथ्वी पानी अग्नि समीरा ॥
लात हाथ अरु दंत भनन्ता । नास करनको शस्त्र अनन्ता ॥
भय है फूल मृत्यु फल जाका । सत्य कबीर वचन परपाका ॥

इति

अथ उत्पत्ति कथाग्रंथ अमर मूल सत्य कबीर वचन-चौपाई

आदि पुरुष जब हतो अकेला । शब्द स्वरूपी पंथ दुहेला ॥
मनसा घटते भिन्न निकारी । उत्पत्ति भई ताहि यक नारी ॥
वह नारी सकलो जग जाया । भग भोगे सो पुरुष कहाया ॥

( ९० )

बोधसागर

भग द्वारे हैं बालक आया । यही भांति सब जग भरमाया ॥
यहि घटमें द्वै रूप सवारी । सूरज पुरुष चंद है नारी ॥
प्रथम हतो जब सुन्न सुभाऊ । काल सुन्न एकै समुझाऊ ॥
काल भेद कोई नहि जाना । धर्मदास तुम सुनियौ ज्ञाना ॥
सुन्नहि माहैं शब्द उच्चाग । धर्मरायको भयौ पसारा ॥
प्रथमहि जिंदरूप यक भैऊ । सत्तर युग सोवत चलि गैऊ ॥
सत्य साहिब मोहि आज्ञादीन्हा । जिंद जीव कह तुम नहि चीन्हा ॥
तब हम जाय शब्द अस बोला । सोवत जिंद नाहिं चितडोला ॥
तब हम जाय जगावन लागे । जिंद न जाग प्रेम अनुरागे ॥
नाहिंन जाग नौंद भ्रम आवा । तब हम शब्द एक उपजावा ॥
काल शब्द कहि टेरि पुकारा । सुनिके जिन्द भयो संभारा ॥
काल शब्द सुनि जिंद डेराना । तब गहि आनि चरण लपटाना ॥
काल शब्द ना होता भाई । तो काहेका भक्ति कराई ॥
कालकी डर तपसी तप साधा । इंद्री पञ्च काल डर बाँधा ॥

इति

अथ उत्पत्ति कथाग्रन्थ कबीर बातो और अनुरागसागरके

अनुसार सत्यकबीर बचन--चौपाई

प्रथमें आदि समर्थते सोई । दूसर अंश हतो नहिं कोई ॥
आदि अंकुरा सुरति जो कीना । सत्य करी गभैं तब लीना ॥
पांच अंड तब भयौ उपानी । तत्त्व एक है भिन्न प्रमानी ॥
धावै अंड करै चौचन्दा । आप देखके सहजानन्दा ॥
फूटे अंड तेज भइ धारा । सबमें देख पांच ततसारा ॥
देखि रूप अंडनको भाई । सोहैं सुरति तबै उपजाई ॥
पुरुष शक्तिमें दोय प्रकारा । ताको सौंपा उत्तपतिसारा ॥
तासों उत्पत्ति भेद बतावो । बचन सुरति एकै संमावो ॥

स्वसमवेदबोध

( ९१ )

जाते ओहं पुरुष भे अंशा । ओहं सोहं भे द्वै अंशा ॥
ताको आज्ञा उत्पत्ति कीना । शब्द संधि उनहूको दीना ॥
मूल सुरति अरु पुरुष पुराना । रचना बाहर कीनो थाना ॥
ओहं सोहं अंडन रहेऊ । सकल सृष्टि के करता भयऊ ॥
प्रथम अँकु दुज इच्छा संगा । तीसर मूल चौथ सोहंगा ॥
ओहं सोहं कीन प्रमानी । आठ अंश भे तिनते उत्पानी ॥
आठ अंश भे एक निधाना । करता सृष्टि भये परमाना ॥
सात अंशके नाम बखानो । जिनते सकल सृष्टि बंधानो ॥
प्रथम मूल अंकूर गनीजै । इच्छा सहज साहंग भनीजै ॥
पुनि अर्वित फिर अक्षर भैऊ । बृद्धि हेत करता निरभैऊ ॥
सातो अंश जीव हितकारी । जिव कल्यान काज तन धारी ॥
यहिविधि रचना करि करतारा । पुनि अपने मनमाहिं विचारा ॥
बिना काल नहिं जीव डेराई । कोइ न भक्ति भजन मन लाई ॥
तिहि औसर प्रभु काल उपाया । जाकी डर सब जीव डेराया ॥
जप तपादि संयम जो करनी । काले के डरतें सो सब बरनी ॥
सात अंश जिव दाया करता । अष्टम काल भयो संहरता ॥
सोरठा-बृद्धि हेत भे सात, अष्टम नास्तिकि हेत है ।

स्वसमवेद विरूपात, तिनते सब रचना भई ॥

चौपाई

द्वीपन द्वीप अंश बैठारा । सातो जहैं तहैं कीन पसारा ॥
अक्षर कीन जहाँ निज थाना । तहैं समूहजल तत्त्व बखाना ॥
अक्षर सुरति पुरुषकी बानी । त्रिगुण तत्त्व घटमाहिं समानी ॥
तब अक्षर को निद्रा आई । सोरह चौकरी सोय सिराई ॥
अक्षर सुरति मोहमें आई । ताते दूसरे अंश उपाई ॥
अंडस्वरूपी जलमहैं दीना । यह अबिगति समरथने कीना ॥

( ९२ )

बोधसागर

अक्षर जागा निद्रा जाई । देखि अंड व्याकुलता आई ॥
चक्रुत भा यह किन निरमाई । अंडदृष्टिने देखो भाई ॥
चहुँदिशि तहाँ रहे जल छाये । अंडा तापर तेरे भाये ॥
अक्षर ढिग अंडा लगि आवा । तामें लिखी हकीकत पावा ॥
ऐसी तामे लिखी निशानी । परमपुरुषकी सो सहिदानी ॥
तुम लगि हम यक अंश पठाई । रचना करो सृष्टिकी भाई ॥
तुमते सो करिहै बरिआई । आवन देहु जहाँ लगि आई ॥
सत्रहसौ युग ऊपर तीसा । तासु महातम कर जगदीशा ॥
बहुरि महातम होय तुमारा । कालजालते जीव उबारा ॥
काल पुरुष तब पुरुष समाई । तासु महातम तब उठि जाई ॥
तब सब जीव मुक्ति पद पैहैं । फेरि न चौरासीमें ऐहैं ॥
ऐसो अंडप लिखा निहारी । अक्षर पढ़ि मनमाहि विचारी ॥
अक्षर दृष्टि अंड विहराना । ताते काल बली प्रकटाना ॥
सोइ ज्योति निरंजन भयऊ । जाको सब जग करता कहेऊ ॥
अक्षर सुरति पुरुषकी बानी । ताते काल भयो अभिमानी ॥
निरंजननाम अक्षरने भाषा । समरथ शब्द हृदयमें राखा ॥
प्रभु निज तेजते काल उपाया । ताते सकल सृष्टि दुख पाया ॥
यकपग काल रहो पुनि ठाढो । युग सत्तर कीनो तप गाढो ॥
तपमें येते काह बिताई । मांगु मांगु वर कह तब साई ॥
कहै काल प्रभु यह वर दीजे । तिहुँ लोकको राज करीजे ॥
भवसागरमें राज हमारा । मुनि समर्थ अस वचन उचारा ॥
पुत्र जाहु पृथ्वीके मूला । जहाँ कूर्म बैठे अस्थूला ॥
सृष्टि भंडार कूर्मको भाई । सोलह माथ चौंसठहाथ पाई ॥
ताते लेहु सृष्टिकी रचना । शीश नाय बोलेहु मृदुवचना ॥
तीन लोकको पायो राजू । धर्मराय तब निज उर गाजू ॥

स्वसमवेदबोध

( ९३ )

चाले धर्म हर्ष हिय वाढ़े । मनमें करत गुनावन गाढ़े ॥
जाय कूर्मके सम्मुख भयञ्ज । नहीं प्रनाम दंडवत कियञ्ज ॥
देखे धर्म कूर्मकी काया । अठानवे कोटि योजन बतलाया
बारह पालंग कूर्म शरीरा । षट पालंग धर्म बलवीरा ॥
धर्मराय तब कूर्मते कहई । मोहि पुरुषकी आज्ञा अहई ॥
सृष्टिकी रचना मोकहँ देहो । ना देहो तो मारिके लेहो ॥
तबहि कूर्म निज मनहि विचारी । यह तो काल भयो हंकारी ।
कहैं कूर्म सुनिये धर्मराया । पुरुष मोहि नहिं कछु फरमाया ॥
हमते मांगे कछु नहिं पावो । जाय पुरुष ढिग वेगि सिधावो ॥
यह सुनि धर्मराय अतिकोपा । कूर्मते युद्ध करण प्रण रोपा ॥
तपबल काल भयो बरियारा । अहंकार करि कूर्म प्रचारा ॥
भिरा जायके सन्मुख धाई । करे यतन किमि रचना पाई ॥
धायकाल अतिबल तिहि डाटा । तासु तीन शिर नखते काटा ॥
शीस तासु जिहि औसर खंडा । उद्भते निकसा पौन प्रचंडा ॥
रणश्रव कूर्म तन उठा पसीना । सो जलतत्त्व पृथ्वीतिहिकीना ॥
पाँचतत्त्व धरती असमाना । सूरज चंद्र नखते प्रकटाना ॥
तनत पौन छूटा जिहि बारा । रचना सकल कीन विस्तारा ॥
जबहि प्रसेव बुन्द जल दीना । महिउनचास कोटि तिहि कीना ॥
दूधपै जैसे परे ढलाई । जलपर तथा जमीन जमाई ॥
कूर्मको तिहुँ सिर भक्षण कियञ्ज । बहुरि निरंजन शून्यमें गयञ्ज ॥
धर्मराय तब कीन विचारा । कहँ लगि तीनों लोक पसारा ॥
स्वर्ग मृत्यु कीनो पाताला । बिना बीज किमि कीजै बाला ॥
करि सेवा मांगो वर सोई । जाते तिहुँ पुर मेरो होई ॥
पूर्वध्यान तब कीन निरंजन । युग चौसठ कर सेवासंजम ॥
एकपाँव पुनि सेवा कियञ्ज । चौसठ युगलों ठाढे रहेञ्ज ॥

( ९४ )

बोधसागर

बहुरि पुरुष दीनो बरदाना । सोइ होई जो तोहि मनमाना ॥
बहुरि निरंजन विनय उचारा । बीज खेत दीजै करतारा ॥
देहु ठौर बैठा जहँ जाई । तबहि पुरुष अस बचन सुनाई ॥
मान सरोवर बैठक लीजै । तीन लोककी रचना कीजै ॥
तब करता मन कीन विचारा । बीज खेत तिहि काल सँवारा ॥

अथ बीजखेत अथवा आदि शक्तिकी

उत्पत्ति वर्णन-चौपाई

अद्याकी उत्पत्ति बखानों । ग्रंथ श्वास गुंजार प्रमानों ॥
निजतन मधि प्रभु मैल निकारी । रची ताहि आदि कुमारी ॥
पुरुष मैलते साँचा कीना । पैठी मैल रंग तिहि दीना ॥
देकर रंग बरन सब फेरा । भीतर मल मोह मद चेरा ॥
पुरुष मैलते पुत्री कीनी । पाँच तत्त्व तिहि भीतर दीनी ॥
उत्पत्ति पारस पुत्री पावा । प्रगटी कला अनंत सुभावा ॥
नख शिष देह सिद्ध प्रभु कीना । पंचह श्वास तिहि भीतर दीना ॥
जब श्वासा कायामें गैऊ । प्रगटी ज्योति जगामग भैऊ ॥
आठो अंग बना बहु रंगा । पारससार ताहिके संगा ॥
निर्मल उदित बतीसो दंता । चमकै बिजुली कला अनंता ॥
उपजी ज्योति अखंडित बानी । बोले बचन पुहुष रससानी ॥
मधुर वचन अरु लीला धारी । देख रूप जब पुरुष दुलारी ॥
उपजी रंग रूपकी खानी । बोले अमी विरहकी बानी ॥
उपजी कन्या कला अनूपा । पुरुषते प्रकट पुरुष स्वरूपा ॥
जिहिया रस सब उत्पत्ति कीना । सोंपा रस कन्याको दीना ॥
उपजी कन्या अगम सुभावा । अष्टंगी कह पुरुष बुलावा ॥
पुत्री जाहु निरञ्जन पाही । तुमकहँ समरथ सदा सहाई ॥

स्वसमवेदबोध

( १५ )

अथ आद्या और निरञ्जनकी कथा वर्णन-चौपाई

परम पुरुषकी आज्ञा पाई । कन्या तबहि कैल ढिग आई ॥
यकपग खड़ी सेवमें लागो । छुटी समाधि निरञ्जन जागो ॥
सम्मुख पलक उचारि निहारी । देखा ठाढ़ी आदि कुमारी ॥
परमरूप शोभा सरसाई । देखतके लहि काम सताई ॥
कहैं कैल सुनु आदि भवानी । मिलि हमतुम जगरचना ठानी ॥
तब आद्या अस उत्तर दीना । यह विचार तुम अनुचित कीना ॥
मैं हौं बहिन तू मेरो भाई । मोहि तोहि ना होय सगाई ॥
यहि करनी तोहि लागै पापा । धर्मराय तब निज पद थापा ॥
पुण्य पापके भय मोहि नाही । पुण्य पाप हमही ते आही ॥
पुण्य पापके हम करतारा । कोई लेय न लेख हमारा ॥
कहैं कैल सुन आदि कुमारी । मोहि कारन तोहि पुरुष सँवारी ॥
मानि लेहु तुम हमरा बचना । मिलि हमतुम करिये जगरचना ॥
कैल वचन आद्या नाहिं माना । उत्तर प्रति उत्तर तोहि ठाना ॥
तब मन रोष निरञ्जन कीना । निज मुखमाहि मेलि तिहि दीना ॥
लीलत कन्या कीन पुकारा । पुरुष पुरुष कहि वचन उचारा ॥
ततक्षण योग जीत प्रकटाने । गहे कमान बान कर ताने ॥
सुरति बानते कैलहि पारा । कन्या मुखते बाहर डारा ॥
जब कन्या मुख बाहर आई । योगजोत तब गयो लोपाई ॥
कन्या भयबश भै तिहि काला । पुरुषकि सुधि बिसरायौ बाला ॥
पिता पिता कहि कैलहि बोले । मदन प्रचंड तासु तन डोले ॥
कियो निरञ्जन सकल पसारा । पुण्य पाप दोउ रचे अपारा ॥
पुण्य पाप दोउ फंदा होई । जामें अरुझि रहे सब कोई ॥
योग यज्ञ संयम व्रत पूजा । सब हमही कोइ और न दूजा ॥
रची छुधा माया बिकरारा । पुरुष लोकको मूँढौ द्वारा ॥

( १६ )

बोधसागर

कहै निरञ्जन कामिनि पाही । पुरुष ढिग अब हम नहीं जाई॥
पुरुष लोक इहाँ रचि लीजे । यकछत राज हमहि तुम कीजे॥
अब तौ पुरुष आस नहीं मोही । गहिके बाह राखि हो तोही ॥

छन्द-भग ना हतो तिहि नारिके नख फारि कीन निरञ्जना ।
यमसाट जिव जेहि बाट विचरे घाट उत्पतिको बना ॥
भग भोग प्रथम सँयोग सोई कैल आद्या सो ठना ।
भे प्रकट ब्रह्मा विष्णु शंकर त्रिगुन भव निधि रंजना॥

अथ त्रिदेवकी जन्मकथा वर्णन-चोपाई

काल कल्लुङ्ग जब गयौ सिराई । रूपरंग कन्या तन छाई ॥
जब भलि भांति रंग तन भीना । कन्या कैल व्याह सँग कीना ॥
कूर्मको तीन शीस जो रहेऊ । कैल काटिके भक्षण कियऊ ॥
ताते तीन अंश प्रकटाने । ब्रह्मा विष्णु महेश बखाने ॥
देव निरंजन आदि कुमारी । केते काल कीनो सुख भारी ॥
कैल अरु कामिनि भोग बिलासा । स्वसमवेद भलिभांति प्रकाशा ॥
तीनो सुत जिहि काल उपाई । धर्मराय तब गयौ लुपाई ॥
राजपाट आद्याको दीना । सुत्रमाहँ निज बासा कीना ॥
कह्यो निरंजन आद्या पासा । मेरो भेद न करहु प्रकाशा ॥
पुत्रनसे जनि बात जनावो । मेरो भेद न तिनहि सुनावो ॥
यतन अनेक ध्यान जौ लैहैं । तो मम दर्श पुत्र नहीं पैहैं ॥
यह कहि शून्यमें गयो समाई । योगसमाधि निरञ्जन लाई ॥
मातासे सुत पूछे बाता । पिता हमार कहाँ है माता ॥
पुत्रनते कह आदि भवानी । पिता तुमार हमहुँ नहीं जानी ॥
रचना सकल हमहिते होई । हम तुम तुम हम और न कोई ॥
तुमहो पुरुष हमहि तोर जोई । हम तुम दूसर और न कोई ॥
हम हैं पिता हम ही हैं माता । हम ही तीन लोकके दाता ॥

स्वसमवेदबोध

( १७ )

जब जननी अस बचन उचारा । सुनि संसै कर तिहूँ कुमारा ॥
माता कपट कीन हमपाहीं । पिताको भेद बतावत नाही ॥
तीनो बालक ताते रूठै । जननी बचन कहैं सब झूठै ॥
तब माता बोली रिसिआई । पिताको दरश करहु तुम जाई ॥
माता कह तुम पुष्प चढ़ाओ । पिताको शीस परसिके आवो ॥
चले जो पुत्र पिताकी आसा । पिता रहै पुत्रनके पास ॥
खोजत खोजत कतहुँ न पाई । रहे निरंजन सुन्न समाई ॥
लगी समाधि निरंजन तारी । निकसे वेद श्वास सँग चारी ॥
ऋग अरु यजुर अथरबन सामा । धरि तन रटहि निरंजननामा ॥
निरंकारकी अस्तुति करही । देव निरंजन गुन उच्चरही ॥
देव निरंजन दृष्टि न आवै । ज्योतिज्योति कहि श्रुतिगुणगावै
तिहिमें वेद निरखै निज नैना । अनुमानहिते भाखे वैना ॥
वेदन प्रति नभ बचन सुनाई । बासा करहु सिंधुमें जाई ॥
आज्ञा दियौ निरंजन राई । बसो वेद सागरमें आई ॥
बहुरि निरंजन सैन लखाई । आद्यासे अस कहौ बुझाई ॥
निज पुत्रनको आज्ञा दीजै । सिंधु मथनको उद्यम कीजै ॥
तब आद्या अस युक्ति बनाई । तीन सुता निज अंग उपाई ॥
पुत्रिन कह अस आज्ञा दीनों । बसहु जाय सागरमें तीनों ॥
माताको अस आयसु पाई । तीनों सिंधुमें गई समाई ॥
यह चरित्र जननी जो ठाना । ब्रह्मा विष्णु शंभु नहि जाना ॥
राखा गुप्त न मर्म बताया । आद्या सुतनसे बचन सुनाया ॥
सागर मथन जाहु मम वारा । पैहो वस्तु महा सुखसारा ॥
माताकी जब आज्ञा पाई । चले तिहूँ तिहि शीस नवाई ॥
मथ्यौ जाय सागरको सोई । कन्या तीन प्रकट तब होई ॥
तीनो कन्या जबही पाये । हर्षसमेत मातु ढिग आये ॥

बो० सा०

( ९८ )

बोधसागर

तब माता पुत्रन कहि टेरा । यह तो काज भयौ सुत तेरा ॥
सावित्री ब्रह्माको दीना । विष्णु लक्ष्मीको बरि लीना ॥
पारवती शंकरको ब्याहा । नारि पाय अतिमनहि उछाहा ॥
काम विवशभे तीनों भाई । देव दनुज सब ही प्रकटाई ॥
जननी पुनि पुत्रन समुझावो । सागर मथन फेरि तुम जावो ॥
जो जिहि मिले लेहु तुम सोई । तीनों पुत्र चलत तब होई ॥

सोरठा-रश्म न लायौ बार, चले तिहुँ सुत सिंधुतट ।

मथ्यौ ताहि चित धार, निकसे चौदह रतन तब ॥

चौपाई

चौदह रत्न निकस जिहि बारी । लै जननीके सम्मुख धारी ॥
माताके जब आगे कीना । ताने बांटि तिहुँको दीना ॥
पायौ वेद सो ब्रह्मा लीनो । पढ़ि गुनिके विचार सो कीनो ॥
ब्रह्मा वेद पढ़न जब लागा । पढ़त वेद तब भौ अनुरागा ॥
कहै वेद पुरुष यक आही । निराकार जिहि रूप न छाही ॥
सत्य माई सो रूप देखावत । चितवत दृष्टि नजर नहि आवत ॥
स्वर्ग सीस पग आहि पताला । यह सब देखो ताको रुयाला ॥
ब्रह्मा विष्णुसे कह समुझाई । तुमहू शंख सुनो चितलाई ॥
आदि पुरुष यक वेद बतावा । वेद कहै हम भेद न पावा ॥
तब ब्रह्मा माता ढिग आये । करि प्रनाम तेहि शीस नवाये ॥
हे माता मोहि वेद बतावा । सिरजनहार और बतलावा ॥

दोहा-ब्रह्मासे माता कहे, सुन सुत मेरी बात ।

सप्त स्वर्ग है शीस जिहि, चरण पताल है तात ॥

जौ इच्छा तोहि दरशकी, पुष्प लेहु तुम हाथ ।

बेगि सिधारो ताहि ढिग, जाय नवावो माथ ॥

चौपाई

ब्रह्मा मातहि शीस नवाई । उत्तर दिशा बेगि चलि जाई ॥

स्वसमवेदबोध

( ९९ )

तिहि अस्थान पहुँचे जाईं । नहिं तिहँ रवि शशि सुत्र रहाईं॥
बहुविधि अस्तुति करे बनाईं । ज्योति प्रभाव ध्यान तहँ लाईं॥
करते ध्यान गये युग चारी । माता शोच पुत्रकर भारी ॥
ब्रह्मा तात दरश नहिं पावा । शून्य ध्यान युग चारि गँवावा ॥
किहि विधि रचना रची बनाईं । ब्रह्मा आवै कौन उपाईं ॥
उषटि शरीर मैल गहि काढ़ी । पुत्रीरूप कीन रचि ठाढ़ी ॥
शक्ति अंशनिज ताहि मिलावा । नाम गायत्री तासु धरावा ॥
गायत्री मातहि शिर नावा । चरन टेकि रज शीस चढ़ावा ॥
गायत्री बिनवै कर जोरी । सुन जननी बिनती यक मोरी ॥
कौन काज मोंकह निरमाईं । कहो वचन लेवैं शीस चढ़ाईं ॥
कह अद्या पुत्री सुन बाता । ब्रह्मा आहि जेठ तव आता ॥
पिता दरश कहँ गये अकाशा । आनहु ताहि वचन प्रकाशा ॥
दरश तातको वह नहिं पावै । खोजत खोजत जन्म सिरावै ॥
जौनी विधि वह ईहां आईं । करहु जाय तुम तौन उपाईं ॥
चलि गायत्री मारग जाईं । जननी बचन प्रीति चित लाईं ॥
गायत्री पहुँची तहँ जाईं । ब्रह्मा जहाँ समाधि लगाईं ॥
लगी समाधि ब्रह्मकी गाढी । गायत्री शोचे तहँ ठाढी ॥
केते धौस रही सो ताहीं । ब्रह्मा पलक उधारे नाहीं ॥
गायत्री तब शोचन लागी । कौन भाँति ब्रह्मा अब जागी ॥
निजु मनमें बहुतै अनुमानी । आद्या ताके ध्यान समानी ॥
आद्या ध्यानमें ताहि सिवाईं । परसो निजकर ब्रह्मा पाईं ॥
गायत्री पुनि कीनेहु तैसो । जननी युक्ति बतायो जैसो ॥
तिहि औसरसो मन चितलाईं । परस्यौ ब्रह्म चरन तब जाईं ॥
ब्रह्मा योग ध्यान चित डोला । व्याकुल भयो ब्रह्म अम बोला ॥
कौन आहि पापिन अपराधी । काहेको मोर छोडाय समाधी ॥

( १०० )

बोधसागर

शाप देब तोको हम जानी । पिता ध्यान खंडेहु मोर आनी॥
कह गायत्री मोहि न पाया । बृक्षि लेव तब देहो आपा ॥
कहौं तोहिते सांची बाता । तोहि लेन पठयौ तो माता ॥
चलहु बेगि जननी पहुँ जाई । तुम बिन रचना होय न भाई ॥
ब्रह्मा कहैं कौन विधि जाई । पिता दरश अजहूं नहि पाई ॥
कह गायत्री दरशन पैहो । चलहु बेगि नहि तो पछितैहो ॥
ब्रह्मा कहैं देहु तुम सार्वी । परस्यौ शीस देखा मैं आँखी ॥
ऐसो कहो मातु समुझाई । तब तुमरे सँग हम चलिजाई ॥
गायत्री कह यह है स्वारथ । कहब जानि मैं पुनि परमारथ ॥
यहि विधि बोलब झूठी बाता । कौनी विधि तौ बूझे माता ॥
पुष्प गायत्री ब्रह्मा तीनी । एकमता तिहि औसर कीनी ॥
तीनों मिलिके चलि भये तहँवा । कन्या आदि कुमारी जहँवा ॥
करि प्रणाम सम्मुख रह जाई । माता सब पूछी कुशलार्ई ॥
कैसे दरश भो पिता सुभाऊ । ब्रह्मा सो सब मोहि सुनाऊ ॥
कहैं ब्रह्म दोनों हैं सार्वी । परस्यौ शीस देखा इन आँखी ॥
तब माता बूझै अनुसारी । कहु गायत्री वचन विचारी ॥
तुम देखा इन दर्शन पावा । कहो सत्य दरशन परभावा ॥
तब गायत्री बचन सुनावा । ब्रह्मा दरश शीस पितु पावा ॥
मैं देखा इन परस्यो शीसा । ब्रह्माही मील्यौ जगदीशा ॥

छंद-ले पुष्प परस्यौ शीस पितु इन दृष्टिमें देखत रही ।
जल ढारि पुष्प चढ़ाय दीनों हे जननि है यह सही ॥
माता कहे पुष्पावतीसे कहो सत्यहि मोसना ।
जो चढ़ेहु शीसपिताके तुम मोसे कहो तुम ततछना ॥

सोरठा-कहु पुष्पावति मोहिं, दरसकथा निरुवारिके ।
यह बूझौं मैं तोहिं, जिमि ब्रह्मा दरशन कियौ ॥

स्वसमवेदबोध

( १०१ )

चौपाई

पुष्पावती वचन अस बोले । माता सत्य वचन नहिं डोले ॥
दरसन शीस लह्यौ चतुरानन । चढ़न शीस यह धरिनिश्चलमन ॥
शाप सुनत आद्या अकुलानी । यह अचरज भो मरम न जानी ॥
अलखनिरंजन असपुनिभाखी । मोकहैं कोइ न देखे आंखी ॥
तीनों बोलैं झूठी बानी । सुनि माता बहुतै अकुलानी ॥
यह सुनि माता कीनेहु दापा । ब्रह्माको पुनि दीनेसु शापा ॥
पूजा तोर करे कोइ नाही । जो मिथ्या बोल्यौ हम पाही ॥
आगे ह्वैहै शाप तुम्हारा । मिथ्या पाप करे बहु भारा ॥
प्रकट नियम बहु करै अचारा । अंतरमैल पाप विस्तारा ॥
विष्णु भक्तसे कर हंकारा । ताते परे नरककी धारा ॥
कथा पुराण औरन समुझावै । चाल बिहीन आप दुख पावै ॥
उनत और सुने जो ज्ञाना । करै भक्ति सो कहो प्रमाना ॥
देवन पूजा, बहुबिधि लावै । दछिना कारन गलाकटावै ॥
जाकह शीस करे पुनि जाई । परमारथ तिहि नाहिं हढ़ाई ॥
अपने स्वारथ ज्ञान सुनैहै । आपन पूजा जगहि हढ़ैहै ॥
परमारथके निकट न जाई । स्वारथ अरथ सबै समुझाई ॥
गायत्री तोर वृषभ भतारा । पाँच सात अरु बहुत पसारा ॥
धरि औतार अखज तुम खाई । बहुत झूठ तुम वचन सुनाई ॥
सुनो पुष्प तुमरो विश्वासा । होय विगंध मध्य तौ बासा ॥
जो तोहि सींच लगावै आनी । ताकर होय वंशकी हानी ॥
अब तुम जाय धरो औतारा । केवडा केतकी नाम तुमारा ॥
छंद-शाप तीनोंको दियो मनमाहैं तब पछितावई ।
कैसे करे मोहि निरंजन पल छमा मोहि न आवई ॥
आकाश बानी तब भई यह कहाँकी नभ बानिया ।
उत्पत्ति कारन तोहि पठयौ कह चरित यह ठानिया ॥

( १०२ )

बोधसागर

सोरठा-नीचहि ऊँच सताव, ओल मोहिते पाय हो ।
द्वापर युग जब आव, तोहि पाँच भरतार हो ॥

चौपाई

शाप ओल जब सुने भवानी । मनमें गुने कहे नहि बानी ॥
ओल प्रभाव आपते पाई । अब कह करो निरंजन राई ॥
तुमरी वशय परी हम आई । जस चाहो तस करो उपाई ॥
आई माता विष्णु दुलारा । सुनहु विष्णु यक बचन हमारा ॥
अब तुम बेगि पिता लगि जाई । बेगि पिताको परसहु पाई ॥
आज्ञा पाय विष्णु तब चाला । पिता दरश कहै गये पताला ॥
अछत पुष्प लीने कर माहीं । चले पताल पंथ गम नाहीं ॥
पहुँचे शेष नाग पहुँ जाई । विषके तेज विष्णु अलसाई ॥
भयौ श्याम विष तेज समावा । निरंकार अस बचन सुनावा ॥
अहो विष्णु माता पहुँ जाई । कहियो सत् बचन ससुझाई ॥
सतयुग त्रेता जैहै जबही । द्वापर होय चौथा पद तबही ॥
जब तुम है हो कृष्ण शरीरा । लेहु ओल सो कहो बलवीरा ॥
जो जीव देय पीत जेहि काहूँ । हम पुनि ओल दिलावैं ताहूँ ॥
नाथहु नाग कालिंदी जाई । अब तुम जाहु विलंब न लाई ॥
बिल्लु पहुंचे जननी पास । कीनो सत् बचन परकाशा ॥
भेत्यौ नाहि मोहि पद ताता । विषके ज्वाल श्यामभो गाता ॥
व्याकुल भयौ तबहि फिरि आई । पितादरश नाहीं हम पाई ॥
सुनिकै हरषी आदि कुमारी । लीन विष्णु कहै निकटदुलारी ॥
चूम्पौ बदन शीश दियो हाथा । सत्य वचन बोल्यौ सुतगाथा ॥
देहुँ पुत्र तोहि पिता भेटाई । तोरे मनको धोख छुड़ाई ॥
प्रथमहि ज्ञान दृष्टि तुम देखो । बचन मोर हृदयेमें पेखो ॥
मनस्वरूप करि ताकर जानो । मनते दूजा और न मानो ॥

स्वसमवेदबोध

( १०३ )

स्वर्गं पताल दौर मन केरा । मन अस्थिर मन फिरै अनेरा ॥
छनमहँ कला अनंत देखावै । मनकहँ पेरि न कोई पावै ॥
निराकार मनहीको कहिये । मनके आस दौस निशि रहिये ॥
देखहु पलटि सुन्नमें ज्योती । जहाँ झिलिमिलि झलके मोती ॥
यहिविधिविष्णुदरसपितुपायौ । भांति भांतिको रंग दिखायो ॥
श्वेत पीत हरितो जंगाली । रूप अन्तूप गगनमें भाली ॥
सुनि बाजा हियमें हरपाना । पिता दरसते अति सुख माना ॥
बहुत अधीन मातुसे भैऊ । शीश नाय मृदु बानी कहेऊ ॥
तव प्रसाद मम मातु विशेषा । पिताको दरश दृष्टि देखा ॥
मातु गई पुनि रुद्रके पास । देखि रुद्र मनमाहँ हुलासा ॥
दौय पुत्र कह मता बतावा । माँग महेश्वर तोहि जो भावा ॥
हे जननी यह कीजै दाय । कबहुँ न विनसै हमरी काया ॥
कह जननी तुम ऐसे होही । साधो योग सत्य कहाँ तोही ॥
जबलों पृथ्वी अकाश सनेहा । कबहुँ न विनसे तुम्हरी देहा ॥
तिहुँ सुतनको मता बताई । आदि पुरुषको नाम छपाई ॥
आद्या ऐसो छल बल कीना । पुरुष छपाय प्रकट यम कीना ॥
निरंकारको भेद बतावा । पुरुषसँदेश न सुनत सुनावा ॥
पुरुषभेद विष्णुहू न जाने । निरंकारको करता माने ॥
जैसो छल बल आद्या कीन्हा । सोई चला जक्तमें चीन्हा ॥
देखो ऐसो नारि स्वभाऊ । मात पिता कह सो विसराऊ ॥
केतो प्रीति मातु पितु करही । कन्या एक न चितमें धरही ॥
गै पुत्री जब स्वामी गेहा । रातयौ रंग तासुके नेहा ॥
मातु पिता सबही विसरायौ । अपने पतिकी नारि कहायौ ॥
आदर मान खसमको होई । पिताको नाम लेय नहि कोई ॥
ताते आद्या भई बिगानी । काल अंग है रही भवानी ॥

( १०४ )

बोधसागर

ब्रह्मा निज मन कीन उदासा । तब चलि गये विष्णुके पास ॥
जाय विष्णुसे बिनती ठाना । तुम हो बुद्धिदेव परधाना ॥
तुमपर माता भई दयाला । हम तो आप बस भये बिहाला ॥
निज करनी फल पायों भाई । कैसे दोष लगावों माई ॥
अब सोयतन करो हो आता । चले परिवार वचन रहै माता ॥
कहैं विष्णु छोड़ो मन भंगा । मैं करि हौं सेवकाई संगा ॥
तुम जेठे हम लहुरे भाई । चित संशय सब देहु बहाई ॥
जो कोइ होवे भक्त हमारा । सो सब ही तुमरो परिवारा ॥
यज्ञ धर्म पूजा जो होई । विप्र बिना कछु होय न सोई ॥
जत्तमें ऐसो ज्ञान हटावै । पुन्यफलनकी आस लगावै ॥
जो कोइ करे द्विजनकी सेवा । हरषित हों तिहि विष्णुदेवा ॥

सोरठा-ब्रह्मा भये अनंद, जबहि विष्णु अस भाषेऊ ।

मेलो मनको द्रंद, साख मोर सुखते रहै ॥

चौपाई

ब्रह्मा भाष्यौ झूठ संदेशा । ताते ताको भयो अंदेशा ॥
विष्णु जो सांचो वचन सुनाया । माता कीन ताहिपर दाया ॥
शिव लजायके चुप है रहेऊ । झूठ सांच एको नहिं कहेऊ ॥
दृढत पिता तिहुं गे हारी । पिताको रूप न कतहुं निहारी ॥
माता कही बिहँसि निज बानी । ब्रह्मा झूठ झूठकी खानी ॥
शिव कछु झूठसांच नहिं भाखो । ताते योग ध्यान चित राखो ॥
योग समाधि करो अब जाई । जटा रखाय बिभूति रमाई ॥
माता विष्णुसे बोलै बानी । तीन लोक करिहो रजधानी ॥
शिव ब्रह्मा करिहै तब सेवा । गन गंधर्व रचिहो मुनि देवा ॥
चार बरण ब्रह्मा निरमाई । चार वेद मत चार चलाई ॥
शिवके वरण भेद ना होई । कौध रूप धरि भेष बिगोई ॥

स्वसमवेदबोध

( १०५ )

मातु जो दया विष्णुपर कीने । पिता देखाय निकटही दीने ॥
माता पिता एक मिलि गेऊ । विष्णु देखिके हर्षित भैऊ ॥
माता पिता सुत एकै ठेऊ । विष्णुसमाधिज्योति मिलिगैऊ॥
तीनों मिलि जब एकै भयऊ । तिहि पीछे जग सिरजै लियऊ॥
तब माता अस बचन उचारा । रचो सृष्टि तुम तीनों बारा ॥
अंडज उत्पति कीनी साता । पिंडजको ब्रह्मा उत्पताता ॥
उखमज खानि विष्णु न्यौहारा । शिव थाबरको कीन पसार ॥
चौरासी लख जूनी कीना । आधा जल आधा थलदीना ॥
नौलख जलके जीव बखाना । चौदह लख पंछी परमाना ॥
कृमी कीट सत्ताइस लाख । तीस लक्ष अस्थावर भाषा ॥
चतुर लक्ष मानुष परमाना । मनुषदेह लह पद निर्वाना ॥
और योनि परचे नहीं पावै । तत्त्वहीन भव भटका खावै ॥
एक तत्त्व अस्थावर जाना । उखमज दोय तत्त्व परमाना ॥
अंडज तीन तत्त्वगुन जाना । पिंडज चार तत्त्व परमाना ॥
ताते होय ज्ञान अधिकारा । मानुष देह भक्ति अनुसारा ॥
अंडज खानि तीन तत्त्वव्यापा । वायू तेज तीसरो आपा ॥
थावर एक तत्त्व है पानी । उखमज वायु तेजते सानी ॥
पिंडज चार तत्त्वसे बरनी । पौनो पावक जल अरु धरनी ॥
पिंडज नरकी देह देह सँवारा । ताते पंच तत्त्व परमाना ॥
नर नारीमें तत्त्व समाना । ज्ञान विभेद ताहुमें जाना ॥
चारो खानि जीव भरमावा । तब मानुषकी देही पावा ॥
पांच तत्त्व मानुष विस्तारा । तीनों गुण तेहिमाहँ सँवारा ॥
देह धरे छोडे जस खानी । तैसो ज्ञान लहे सो प्रानी ॥
प्रथम कहो अंडजकी खानी । दारिद्री निद्रा अलसानी ॥
चोरी चुगली निंदा माया । घर बन झाड़ी आगिलगाया॥