कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
( ६ )
निरंजनबोध
चित्रगुप्त धर्म वरियारा । लिखनी लिखे सकल संसारा ॥
चौरासी लाखअरुचारों खानी । लिखनी लिखे सकल सब जानी ॥
पशु पक्षी जल थल विस्तारा । बन पर्वत जल जीव विचारा ॥
काल निरंजन सब पर छाया । पुर्ष नामको चिह्न मिटाया ॥
सत्तरयुग ऐसेहि चलि गयेऊ । पुर्ष शब्द एक चित्तमें ठयेऊ ॥
पुर्ष वचन
तबहीं पुर्ष ज्ञानी सों कहऊ । धर्मराय अति प्रबल जो भयऊ ॥
यह तो अंश भयावरियारा । तीन लोक जीव कीन्ह अहारा ॥
नाहि मारकै देव उठाई । जग जीवनको लेहु छुडाई ॥
ज्ञानी वचन-साखी
दोहा—करि प्रणाम ज्ञानी चले, करन हंसके काज ।
जोपै काल न मानि है, तुम्हीं पुर्षको लाज ॥
चौपाई
मान सरोवर ज्ञानी आई । काल कठिन तब छेकी धाई ॥
काल कठिन गजें बहु वारा । मस्तिक साठ सूठ बरियारा ॥
सत्तर योजन गजें दंता । प्रलय जो कीन्हो काट अनंता ॥
कान एक आँखे चौरासी । औ मुख आठ हाथ लिये फाँसी ॥
छत्तिस नाम ताहि पुन जानी । बोले वचन बहुत इतरानी ॥
तीन दंत पाछेको फेरी । यहि विधि तीन लोक किये जेरी ॥
एक दंत पाताल चलावा । तहाँ जाय वासकको खावा ॥
दूजो दन्त पृथ्वी चलि आई । देव ऋषि जग दैत्यन खाई ॥
तीजो दंत गयो आकाशा । चन्द्र सूर्य खाये कैलासा ॥
ब्रह्मा वेद पढ़त तहाँ आये । शंकर ध्यान करत तब खाये ॥
लीन्हें खाय विष्णु को धाई । सकल खाय पुनि धूरि उडाई ॥
गजें दन्त अग्नि सम भाई । तीन लोक खाई दुनियाई ॥
बोधसागर
( ७ )
ज्ञानी वचन
ज्ञानी देखे दृष्टि पसारा । याते नाहिं बचे संसारा ॥
ज्ञानी बोले शब्द बरियाई । तूहा काल खाइ दुनियाई ॥
निरञ्जन वचन-साखी
दोहा
जाहु ज्ञानी घर आपने, मानों वचन हमार ।
तीन लोक पुर्षहि दिये, स्वर्ग पताल संसार ।
ज्ञानी वचन-साखी
चौपाई
बोले ज्ञानी शब्द अपारा । मोकहैं दीन्हा पुर्ष टकसारा ॥
साखी
मैं जो पठयो पुर्षको, करन हंसके काज ।
कालहि मार सिंगार हों, दीन्ह सकल मोहे साज ॥
चौपाई
मारा काल शब्दका झारा । टूटे दन्त न करे पसारा ॥
निरञ्जन वचन
तबै निरञ्जन बोले बानी । कैसे हंस छुड़ाई ज्ञानी ॥
जगके माह कीन्ह हम बासा । पशु पक्षी जल थलमें आसा ॥
तीन सौ साठ पैठ हम लाई । तामें सकल जीव उरझाई ॥
जे दिनते हमने पैठ लगाई । दिन दिन उरझे सुझात नाहीं ॥
तापर काम क्रोध हम डारी । तृष्णा सकल जीवकहैं मारी ॥
इनमें जीव बन्धे सब झारी । कैसे हंसहि लेव उबारी ॥
तापर कीन्हो एक हम काजा । पाप पुण्य थापे हम राजा ॥
शुभ अरु अशुभ दोहदल साजा । ऐसे अलख निरञ्जन राजा ॥
( ८ )
निरञ्जनबोध
ज्ञानी वचन
सत्त शब्द हम बोले बानी । वचन हमारे छूटे प्रानी ॥
गहे शब्द जब मन चित लाई । भाजे काल जीव लेव छुड़ाई ॥
काल वचन
तबै काल अस बोले बानी । सकल जीव वस हमरे ज्ञानी ॥
तीन सौ साठ पैठ उर्रेश । कैसे हंसन लेव उबेरा ॥
गङ्गा जमुना सरस्वती जानी । पुष्करगोदावरी कुछका मानी ॥
बद्री केदार हम का ठाऊं । जहाँ तहाँ हम तीर्थ लगाऊं ॥
मथुरा नगर उत्तम जो जानी । जगन्नाथ जस बैठे ध्यानी ॥
सेतुबन्ध पुन कीन्ह ठिकाना । पुष्कर क्षेत्र आय जम थाना ॥
हिंगलाज जिव जेहे सोई । कालका नगरकोठ महाँ होई ॥
गढ गिरना दत्तको थाना । ताहि घेर जम बैठ निदाना ॥
कमरू माह कमिशा देवी । नीमखार मिसरख जम लेवी ॥
नगर अजुध्या रामहिं राजा । खैहैं दइत बांध सब साजा ॥
याही पैठ जग जीव भुलाई । किहिं विधि हंस देव मुक्ताई ॥
ज्ञानी वचन
तब ज्ञानी अस बोले बानी । जमते जीव छुडावहुँ आनी ॥
पुर्ष नामको कहुँ समभाई । जमराजा तव छोड पराई ॥
घाट बाट बैठे उर्रेश । हम शब्दतें होय निवेरा ॥
सुना रे काल दुष्ट अनयाई । शब्द संग हंसा घर जाई ॥
निरञ्जन वचन
का ज्ञानी दहो अधिकारा । हमरी नहिं छूटे जम जारा ॥
पांच पचीस तीन गुण आही । यह ले सकल शरीर बनाई ॥
तामें पाप पुण्यका वासा । मन बैठे ले हमरी फांसा ॥
बोधसागर
( ९ )
जहां तहां सब जग भर्मावै । ज्ञान संच कछु रहन न पावै ॥
एक शब्दकी केतक आसा । हमरे हैं चौरासी फांसा ॥
ज्ञानी वचन
बोले ज्ञानी शब्द विचारी । छूटै चौरासी की धारी ॥
छूटै पांच पच्चीस गुन तीनों । ऐसो शब्द पुर्ष सुहि दीन्हो ॥
निरञ्जन वचन
हे ज्ञानी का करों बड़ाई । हमते नाह छूट जिव जाई ॥
इतने जुग भये का तुम देखा । ज्ञानी हंस न एकै पेखा ॥
का तुम करो का शब्द तुम्हारा । तीन लोक प्रलय तर डारा ॥
साधु सन्त हम देखी रीती । प्रलय परे सकल सब जीता ॥
कर्म रेख बाँधै सब साधा । सुरनरसुनि सकलो जग बांधा ॥
ज्ञानी वचन
ज्ञानी कहै काल अन्यायी । शब्द बिना तू खाय चबायी ॥
अब तुम कस खेहौ बटपारा । पुर्ष शब्द दीन्हौ टकसारा ॥
जनके जीवत लेउँ उबारा । कर्म रेख तोरो घर न्यारा ॥
पांच पच्चीस और गुन तीनों । इतने मोर हम लेउँ छीनो ॥
पांच जानेकी मेटी आसा । पुर्ष शब्द भाषौ विश्वासा ॥
शुभअरु अशुभ काकरे निबेरा । मेटी काल सकल उरझारा ॥
निरञ्जन वचन
तिगुन काल तब बोले बानी । उरझ जीव सकल जमखानी ॥
कै केसे तुम शब्द पसारो । कौनसी विधि तुम जीव उबारो ॥
ऐसे जीव सकल हैं करनी । कैसे पहुँचै पुर्षके सरनी ॥
जगमें जीव क्रोध विकरारा । कैसे पहुँचै पुर्षके द्वारा ॥
क्रोधी जीव प्रेत अभिमानी । धरी है जन्म नर्कको खानी ॥
( १० )
निरंजनबोध
लोभी होय सर्प विकारा । कैसे पावै मोक्ष को द्वारा ॥
लोभ जन्म सूकर अवतारा । कैसे पावै मोक्ष को द्वारा ॥
विषई विषै सब विषकी खानी । ए सब कहिये जम सहदानी ॥
ज्ञानी करै करहु वरियारा । हमते कीन सकल निर्वारा ॥
जोई ज्ञान होय हमारा । काम क्रोध तैं होय नियारा ॥
तृष्णा लोभहिं देय बहाई । विषै जन्म सब दूर पराई ॥
उनको ध्यान शब्द अधिकारी । काम क्रोध सब होय नियारी ॥
नाम ध्यान हंसा घर जाई । कहा दूत जस करो बड़ाई ॥
उनपै जम की परै न छाही । तासैं हंसा लोकहिं जाई ॥
निरंजन वचन
कहैं निरंजन सुन हो ज्ञानी । कथि हों ज्ञान तुम्हारी बानी ॥
जुगत महातम सबै बताऊँ । नाम तुम्हारे पन्थ चलाऊँ ॥
तुम तो एक पन्थ प्रकासा । हम दशपन्थ काल जुगफांसा ॥
जगके जीव सबै भर्माऊँ । ज्ञानवंत को कर्म हटाऊँ ॥
मार जीव को करे अहारा । काम क्रोध तैं होय नियारा ॥
करे कर्म विषै बस भाई । चर वर्ण ले एक मिलाई ॥
कुलको त्याग होय सों न्यारा । चार वर्णको एक विचारा ॥
ज्ञान हमारा रहै तन छाई । ते सब जीव काल ले खाई ॥
बेखबरन की करिहैं हांसी-ते जीवन पर हमारी फांसी ॥
फिर फिर आवै जमकी खानी । वे सब सरन हमारी ज्ञानी ॥
कैसे पहुँचै पुर्षके सरनी । ज्ञान संधि हमहू दे बरनी ॥
ज्ञानी वचन
कहे ज्ञानी सुन कैल विचारा । हंस हमार होय नहिं न्यारा ॥
निसवासर रहै लौ लीना । शब्द विचार होय नहिं भीना ॥
हंस हमार शब्द अधिका । पुर्ष प्रताप को करे सम्हारा ॥
बोधसागर
( ११ )
नाम जपै अरु सुर्त लगाई । मिले कर्म लागे नहिं घाई ॥
शब्द मान है शब्द सरूपा । निश्चै हंसा होय अनूपा ॥
उनको नाम भक्ति की आसा । ताते निरख चले विश्वासा ॥
निरञ्जन वचन
ज्ञानी मोर अपरबल ज्ञाना । वेद किताब भरम हम साना ॥
इनको माने सब संसारा । कलि मे गंगा मुक्ती द्वारा ॥
देहीं दान जो उतरे पारा । ऐसे सुमृत कहैं विचारा ॥
यहीं विधि जग जीव बुलाई । जग मरन सब बंध बँधाई ॥
सूतक पातक वेद विचारा । परछ वेदमे करहि सम्भारा ॥
एकादशी मुक्ति की भाई । जोग जग्य करवे अधिकाई ॥
ज्ञानी वचन
सुनहु काल ज्ञानका सन्धी । छोरों जीव सकलकी फंड़ी ॥
जब निज बीरा हंसा पावै । जोग बर्त तप सबै नसावै ॥
वेद किताबकी छोड़े आसा । हंसा करे शब्द विश्वासा ॥
ताके निकट काल नहिं आवे । निज बीरा जा सुर्त लगावे ॥
बीरा पाय भये वटपारा । शब्द सन्ध परखै बकसारा ॥
जोग बरत तपहुँ है छारा । अद्भुत नाम सदा रखवारा ॥
जेते हंस सरन हम आई । भक्ति करे तो मिटै धुआई ॥
निरञ्जन वचन
अब तुम ज्ञानी भली सुनाई । मेरो उरझौ सुरझौ नहिं जाई ॥
जो जीवनको भक्ति हटै हो । शब्द भेद तुम ताहि लखै हो ॥
पावै शब्द होय अभिमानी । कैसे लोकै जैहै सो प्रानी ॥
शब्द पाय नहिं करै विचारा । कैसे पहुँचै लोक तुम्हारा ॥
शब्द पाय कर कर्म जगावै । कैसे ज्ञाना निज घर पावै ॥
शब्द पाय कर चले न राहा । ज्ञानी कहाँ मुक्ति की थाहा ॥
( १२ )
निरञ्जनबोध
ज्ञानी वचन
तब ज्ञानी बोले सुख बानी । सुनिये काल निरञ्जन आनी ॥
हंसा भक्ति जो करे हमारो । राखों सदा शब्द निज धारो ॥
काम कोध अहङ्कार बिकारा । इनको तजे है हंस हमारा ॥
शब्द हमार छोड़ै फन्द । पहुँचे लोक मिटै जमदन्दा ॥
बीरा नाम पुर्ष को सारा । निर्मल हंस होय उजियारा ॥
आवागवन बहुरि नहिं होई । काल फांस तज न्यारा होई ॥
पहुँचे हंस पुर्ष दबारा । अरे काल तोको तज डारा ॥
निरञ्जन वचन
निरंजन बोले गर्भ सों भाई । मोर फंद टारे को जाई ॥
कर्म जंजीर बँधा संसारा । जो पुन हम जगजाल पसारा ॥
तीन लोग जो इन औतारा । आवागमनमें फिर फिर पारा ॥
उपजै विनसे रहै भुलाई । देव ऋषी सुनि सकल जो खाई ॥
सिद्ध साधु अरु बडे जो ज्ञानी । बांध बांध कर तोपि समानी ॥
कर्म रेख ते कोई न न्यारा । तीन देव सुर असुर पसारा ॥
ज्ञानी वचन
कहे ज्ञानी सुन काल लबारा । करिहों टूक जखीर तुम्हारा ॥
हंसन लेहों तुर्त उबारी । पुर्ष शब्द दीन्हों मोहे भारी ॥
ताहि डुकम सों मारों तोही । सब संसार तू खाया द्रोही ॥
खण्ड खण्ड कर तोरों बाना । मारों काल करो पिसमाना ॥
हंसन की मैं करों मुक्ताई । बहुरन जन्महि भौजल आई ॥
पुर्ष हंस नोतम है अंशा । ते जग प्रकट कहावै वंशा ॥
तिनके सरन हंस जो आई । कोट कर्म सब देयैं बहाई ॥
हंस संधि लखि होवैं न्यारा । चलतै पावे नहिं बटपारा ॥
बोधसागर
( १३ )
निरञ्जन वचन
मानों ज्ञानी वचन तुम्हारा । हंस ले जाव पुर्षे दर्बारा ॥
चौदह काल जगतमें म्हारे । घाट बाट बैठे रखवारे ॥
सुर नर सुनि आवैं वहि घाटा । दशहि और जो जोवे बाटा ॥
दुर्ग जगाती बड़ा सिरदारा । विना जगात कोइ उतरन पारा ॥
भोजन नदी घाट नहिं थाहू । उतरन काज कहै सब काहू ॥
ज्ञानी वचन
कहैं ज्ञानी सुन काल सुभाऊ । हमरे हंस की बात सुनाऊ ॥
बखतर ज्ञान शब्द हथियारा । मार दूत को चले अगारा ॥
कोट सिद्ध तेज है हंसा । जब परवाना आवैं बंसा ॥
बंस छाप जब पावहिं प्राणी । ताहि न रोके दुर्गा रानी ॥
कहा काल तुम करो विचारा । हंस हमार उतरि है पारा ॥
सार शब्द है हंस बहोरी । ता चढ़ि जायकाल मुखतोरी ॥
संधि न पावे ते बटपारा । हंसा पहुँचे लोक दुवारा ॥
निरंजन वचन
तुमको काल निरंजन राई । हे ज्ञानी का करो बड़ाई ॥
पांव पताल शीश अकाशा । सोरह योजन अग्निप्रकाशा ॥
गजें काल महा विकरारा । सत्रह लाख लो पांव पसारा ॥
लपके जीभ जिमि टूटे तारा । जस बिजली चमके अँधियारा ॥
सृद्ध बदाय दंत अति बाढ़ा । मध्य घेर ज्ञानी कह ठाढ़ा ॥
हमरे पौरुष हम बरियारा । तुम ज्ञानी का करो हमारा ॥
ज्ञानी वचन
ज्ञानी पुर्ष शब्द कियो जोरा । पकड़ सृद्ध दांत गहि मोरा ॥
मारेउ शब्द पांव कर पेली । तोर सृद्ध समुद्र गहि मेली ॥
पुर्षरूप तबही पुन धारा । जौन सरूप काल औतारा ॥
( १४ )
निरञ्जनबोध
निरञ्जन वचन
भया अधीन दोड़कर जोरी । तुम सतपुरुष सरन हम तोरी ॥
तुमसों बाल बुद्धि हम धारा । अब तुम करहु मोहि उद्धार ॥
बालक कोटि भांति गरियावत । मात पिता मन एक नहि आवत ॥
तुमहीं पुर्ष दीन मोहे राजू । औ पुनदीन्हसकलमोहिंसाजू ॥
तिहिं पर हमने गाउं बसावा । लीन्हे सुन्न ठिकान बनावा ॥
तहां हम साहब जाय रहाई । बिन आज्ञा कछु नाहिं कराई ॥
अबलग साहब मैं नहिं चीन्हा । सत्त पुर्ष तुम दर्शन दीन्हा ॥
दोड़कर जोरि चरणचितलावा । धन्य भाग हम दर्शन पावा ॥
अब मोहिं साहब भेद बताई । पाऊं चिह्न हंस पहुँचाई ॥
ज्ञानी वचन
सुन रे काल निरंजन राई । पुर्ष नाम है वीरा भाई ॥
जो हंसा चित भक्ति समोई । ताको खूट गहे मत कोई ॥
साखी
जो निज वीरा पाय है, आवै लोग हमार ।
ताको खूण्ट गहो मत, सुनो काल बटपार ॥
निरञ्जन वचन
चौपाई
सुनो गुसाईं विनती मोरी । वीरा पाय करै कछु औरी ॥
ज्ञान कथै अन्त चित वासा । आवागमनकी राखों आसा ॥
ज्ञानी वचन
सुनी निरंजन वचन हमारा । नहीं सत्त वह जीव तुम्हारा ॥
साखी
जा घरते जिव आइया, ताह सुध गई खोय ।
गोहराय कहों मैं जीवसों, जो शब्द पारखी होय ॥
बोधसागर
( १६ )
निरंजन वचन
चौपाई
कहै बाल तुम भली विचारी । संप देख हम कांथ उतारी ॥
उनके निकट दूत नहीं आई । साहब हंस देहों पहुँचाई ॥
साखी
साहिब सबको एक है, साहिबका कोइ एक ॥
लाखन मध्ये को गिने, कोटिन मध्ये देख ॥
ज्ञानी वचन साखी
जाहु काल घर आपने, शब्द कहौँ चितलाहु ॥
जो फिर सीस उठाय हो, बांध रसातल जाहु ॥
चौपाई
जो पुन गह्यो हंसकी बाँही । बांध रसातल पठाऊँ तोही ॥
निरंजन वचन
जब तुम रूप दिखावा मोहा । तब हम पुरुष चीन्हा तोही ॥
प्रथमै ज्ञानी हम नहीं जाना । बन्धु जानकान्हा अभिमाना ॥
ज्ञानी वचन
धर्मदास तब सों हम आये । गढ़ रैदास मो धारा पाये ॥
प्रथमहि सतयुग लागा भाई । नृप हरचन्द्र भये तहाँ राई ॥
तहाँ जाय शब्द गुहराई । जो चीन्हा सो लोक पठाई ॥
सतयुग सत्त नाम मोरो नाऊँ । देही धर हम मनुष्य कहाऊँ ॥
धर्मदाससों वचन
धर्मदास सुनि टेके पाई । तुव प्रनाप सकल सुधि आई ॥
काल चरित्र सकल हम जाना । पुर्ष लीला सबही पहुँचाना ॥
जब आपुन आये भौमाहीं । हंस काज जो भयो अब भाई ॥
इति श्री कबीर साहिब और निरंजनकी गोष्ठी समाप्त
ज्ञानबोध (त्रयोदश तरंग)
सत्यपुरुषाय नमः
अथ श्रीबोधसागरे
त्रयोदशस्तरंगः
ग्रन्थ ज्ञानबोध
★
कबीर वचन
साखी-सत गुरु जीव प्रबोधके, नाम लखावै सार ।
सार शब्द जो कोई गहे, सोई उतरि है पार ॥
चौपाई
भौसागर है अगम अपारा । तामें बूड गया संसारा ॥
पार लगन को सब कोइ धावे । बिना नाम कोइ पार न पावे ॥
यह जग जीव थाह नहिं पावे । बिना सतगुरु सब गोता खावे ॥
जग जीवों से कहो गुहराई । सतगुरु केवट पार लगाई ॥
यह जग बूड गयो मैझधारा । सतगुरु भक्त भये भवपारा ॥
सत्तनाम जो करे पुकारा । जब भव जल उतरेंगे पारा ॥
सत्तपुरुष है अगम अपारा । ताको सब मैं कहीं विचारा ॥
आदि अनाम ब्रह्म है न्यारा । निराधार मई कियो पसारा ॥
ताहि पुरुष सुमरो रे भाई । तन छोड़ जिवलोक सिधार्ह ॥
कहे कबीर नाम गह सोई । भरम छोड़ भव पारहिं होई ॥
साखी
आदिब्रह्म हिय परखिय, छोड़ो मरन अजान ।
कहे कबीर जग जीवसे, गहिले पद निरवान ॥
बोधसागर
( १७ )
सोरठा
भवसागरको पार, विना नाम उत्तरे नहीं ।
गहिलेव नाम अपार, कई कबीर सब जीवसे ॥
चौपाई
कहैं कबीर सुनो धर्मदासा । आदि नाम मैं कहों सब पासा ॥
यहि जगसे मैं कहा चिताई । अज्ञानी नहि माने भाई ॥
जौन जीव को ज्ञान न होई । कहे वचन माने नहि सोई ॥
और कहे जुलहा मति हीना । ब्रह्मा विष्णु शिवराम न चीन्हा ॥
ऐसे भक्त न देखे भाई । ब्रह्मा विष्णु शिवहिं विसराई ॥
जिन्दा हर का मरम न पाई । जुलहा भक्ति न जाने भाई ॥
ब्रह्मा विष्णु शिव जग उपजाई । इन तीनोंकी यह दुनियाई ॥
रावन छली रामकी नारी । रामचन्द्र कीन्हा रण भारी ॥
हर सीताको रावण लाये । राम लंकपति चिह्न मिटाये ॥
कहाँलों वरणों वार न पारा । तीन देवका सकल पसारा ॥
सार्वी-रामचन्द्र वर्णन कहूं, त्रयलोकी हैं नाथ ।
जग जिव कई समझायके, सुनिये जुलहा बात ॥
चौपाई
ऐसे सब जग कई गुहराई । धर्मदास मैं तुम्हें सुनाई ॥
आदि नाम मैं भाख सुनाई । यह जग जीव न चेता भाई ॥
आदि नाम सबको दरसाया । जग जीवों को ज्ञान सुनाया ॥
यह जुलहाको भेद न पाये । अज्ञानी क्यों रार मचाये ॥
आदि नामकी सुधि विसराये । मायामें सब जग लपटाये ॥
सच्चा साहिवको नहिं पाये । रामकृष्ण जग ध्यान लगाये ॥
ऐसे भूल गये संसारा । कैसे उत्तरे भव जल पारा ॥
कहे कबीर गहो निज नामा । जब पहुँचे अमरापुर गामा ॥
नं. ७ कबीरसागर - २
( १८ )
ज्ञानबोध
साहब पै जग धरे न ध्याना । तिहुँपुर काल ठगो हम जाना ॥
सब कोइ नाम गहो रे भाई । छोड़ो दुर्गति और चतुराई ॥
भरम जाल मनही ना लाओ । सत्तपुरुषमें ध्यान लगावो ॥
दुनियामें भरमो मति हीना । जम घरजायँगे नाम विहीना ॥
यही मता हम जगहि लखाये । धर्मदास विरले जिव पाये ॥
सारखी—कहैं कबीर जनगायके, सुनो जगत यह ज्ञान ॥
नीचे त्रयलोकी रहत, ऊपर सत्तगुरु नाम ॥
कहैं कबीर सुनो धर्मदासा । जग जीवोंकी कथा प्रकाशा ॥
आदि नाम हम भास्व सुनाया । मूरख जीव भरम नहि पाया ॥
राम वरन जग कीन्हहा भाई । तुम सुनियो मैं देखै बताई ॥
जगत कहै जुलहा अज्ञानी । हरिहरका कछु भेद न जानी ॥
नीच जात और भक्त कहाई । हरि के दरस कबहुँ ना पाई ॥
वेद पुराण गीता हम जाना । हमसे नाहक करे बखाना ॥
हमरो वेद कहे निज बाता । रामचंद्र समरथ है दाता ॥
चार वेद ब्रह्मने ठाना । जुलहा भूल गया अभिमाना ॥
ब्रह्म विष्णु शिवसे और न देवा । ऋषि मुनि करें सबै मिल सेवा ॥
ले अवतार जीव जग आये । शालग्राममें सुर्त लगाये ॥
ब्रह्म विष्णु शिवहि जग धाये । जुलहा उलटा ज्ञान चलाये ॥
वेद शास्त्र में हमने जाना । ब्रह्म विष्णु महेश्वर माना ॥
सार वेदमें देखा भाई । रजगुण तमगुण सत्तगुण साई ॥
गीता भागवत पुस्तक नाना । निशिदिन जाप करें भगवाना ॥
आदि भवानी तीनों देवा । इनकी सब मिल साथे सेवा ॥
ऐसा ज्ञान हमारा होई । जुलहा कहा न मानो कोई ॥
सारखी—तीन देव निजके गहे, राखे देवी आस ।
सोइ जीव सुख भोग हैं, हंसा करे विलास ॥
बोधसागर
( १९ )
चौपाई
ऐसे जग जिव ज्ञान चलाई । धर्मदास तोहि कथा सुनाई ॥
यही जगत की उलटी रीती । नाम न जाने कालसों प्रीती ॥
वेद रीति सुनियो धर्मदासा । मैं सब भाख कहों तुम पासा ॥
वेद पुरान में नामहि भाषा । वेद लिखा जानों तुम साखा ॥
छऊ शास्त्र मिलिझगराकीन्हा । ब्रह्मरूप काहू नहि चीन्हा ॥
चीन्हो है जो दूसर होई । भर्म विवाद करे सब कोई ॥
मूल नाम ना काहू पाये । साखा पत्र गह जग लपटाये ॥
डार पत्रको जो कोई धरही । निश्चय जाय नरकमें परही ॥
भूले लोग कहैं हम पावा । मूल वस्तु विन जन्म गमावा ॥
जीव अभागि मूल नहि जाने । डार पत्र में पुरुष बखाने ॥
पढ़े पुराण औ वेद बखाने । सत् पुरुष जगभेद न जाने ॥
वेद पढ़े औ भेद न जाने । नाहक यह जग झगड़ा ठाने ॥
वेद पुराण यह करे पुकारा । सबहीसे इक पुरुष नियारा ॥
ताहि न यह जग जाने भाई । तीन देवमें ध्यान लगाई ॥
तीन देव की करहीं भक्ती । जिनकी कभी न होवे सुक्ती ॥
तीन देवका अजब खयाला । देवी देव प्रपंची काला ॥
इनमें मत भटको अज्ञानी । काल झपट पकड़ेगा प्राणी ॥
तीन देव पुरुष गम्य ना पाई । जगके जीव सब फिरे भुलाई ॥
जो कोइ सत् पुरुष गये भाई । जा कहैं देख डरे जमराई ॥
ऐसा सबसे कहियो भाई । जग जीवोंका भरम नशाई ॥
साखी-रूप देख भरमो नहीं, कहैं कबीर विचार ।
अलख पुरुष हृदये लखे, सोइ उतारि है पार ॥
चौपाई-जो जो वस्तु दृष्टिमें आई । सोई सबहि काल धर खाई ॥
मूरति पूजै सुक्त न होई । नाहक जन्म अकारथ खोई ॥
( २० )
ज्ञानबोध
यह जग करै मूर्तिकी पूजा । करै गर्व हमसे नहिं दूजा ॥
पण्डित भक्त भये जग माहीं । पाथर पूजत जन्म गमाही ॥
ऐसे भक्त भये अधिकार्ई । पीतरकी निज मूर्ति बनाई ॥
इनसै भक्त और नहिं कोई । जिन अपनी दुरमति नहिं खोई ॥
आदि ब्रह्मको भेद न पाये । पद पद पंडित जग भरमाये ॥
अन्तकाल जम घेरे आई । तब विद्या कछुकाम न आई ॥
पाथर पूजें पढ़े पुराना । पद गुण अर्थ विवेकहि ज्ञाना ॥
ज्ञान कथे है वार न पारा । सतगुरु भक्त न जान लबारा ॥
ऐसा मत ब्राह्मणने धारा । जले जात हैं यमके द्वारा ॥
आदि नाम भूलो मत भाई । असुर अंश दुरमतहि लखाई ॥
धर्मदास देखो जग रीती । सांचा छोड़ झूठसों प्रीती ॥
साखी
सार शब्द ना जान है, कहैं कबीर बखान ।
यह जग भूले बावरे, गहे न सतगुर मान ॥
ब्राह्मण भूले बावरे, सरगुण मतके जोर ।
लख चौरासी भोगिहैं, पारब्रह्मके चोर ॥
सरगुण माहिं सार नहिं कोई । निरगुण नाम नियारा होई ॥
निर्गुणसे सरगुण है भाई । सरगुणमें यह जग लपटाई ॥
रजगुण सतगुणतमगुणकहिये । सब मिटजाय ज्ञान जोलहिये ॥
तीनों गुण से सरगुण होई । चौथा पद निरगुण है सोई ॥
निर्गुण नाथ निरंजन राई । निज उत्पत्ति बनाके खाई ॥
ताके परे इक नाम नियारा । सो साहब है मूल अपारा ॥
बोधसागर
( २१ )
उन्हें जगत नहीं जाने भाई । काल अंश राखे भगमाई ॥
ब्रह्मा विष्णु शिवहि जग झाँके । सत्य कबीर नाम रस छोँके ॥
नाम अमल रस चाखे कोई । ताको जरा मरन ना होई ॥
सतगुरु भक्ति करे जो कोई । जाति वर्ण डुरमति सब खोई ॥
आदि नामको नित गुणगावे । भवसागर में बहुरि न आवे ॥
आदि नामको गहे जो आसा । सतगुरु काटे काल कि फाँसा ॥
आदिनाम है गुप्त अमोला । धर्मदास मैं तुमसे खोला ॥
गुप्त मता पावे जो कोई । गेही तज बैगगी होई ॥
आदि नाम गुप्त संसारा । जो पावै जग से हो न्यारा ॥
धर्मदास यह जग बौराना । कोई न जाने पद निरवाना ॥
यहि कारन मैं कथा पसारा । जगसे कहियो नाम नियारा ॥
यही ज्ञान जग जीव सुनाओ । सब जीवोंका भरम नशाओ ॥
अब मैं तुमसे कहों चिताई । त्रयदेवनकी उतपत्ति भाई ॥
साहब कीन्ह इक अजबतमाशा । सो सब कहँ मैं तुम्हरे पास ॥
कछु संक्षेप कहों गुहराई । सब संशय तुम्हरे मिट जाई ॥
भरम गये जग वेद पुराना । आदि नामका भेद न जाना ॥
राम राम सब जगत बखाने । आदि नाम कोई बिरला जाने ॥
राजाराम सबको यह जग जाने । तुम से ताको भेद बखाने ॥
ज्ञानी सुन सो हिरदै लगाई । मूरख सुने सो गम्य न पाई ॥
मा अछंगी पिता निरंजन । वे जम दारुण वंशन अंजन ॥
पहिले कीन्ह निरंजन राई । पीछेसे माया उपजाई ॥
मायारूप देख अति शोभा । देव निरंजन तन मन लोभा ॥
कामदेव धर्मराय सताये । देवी को तुरतइ धर खाये ॥
पट से देवी करी पुकारी । साहब मोहे करो उबारी ॥
टेर सुनो सतगुरु तहँ आये । अछंगी को बंद छुड़ाये ॥
( २२ )
ज्ञानबोध
धर्मराय को हिकमत दीन्ह। नख रेखासे भगकर लीन्ह ॥
धर्मराय करें भोग विलासा । मायाको सु रही तब आसा ॥
धर्मराय अरु माया साजे । तीन लोक तासे उपराजे ॥
तीन पुत्र अष्टंगी जाये । ब्रह्मा विष्णु शिव नाम धराये ॥
तीन देव विस्तार चलाये । इनमें यह जग धोखा खाये ॥
पुरुष गम्य कैसे के पावै । काल निरंजन जग भरमावै ॥
तीन लोक अपने सुत दीन्ह। सुन्न निरंजन बासा लीन्ह ॥
अलख निरंजन सुन्न ठिकाना । ब्रह्मा विष्णु शिव भेद न जाना ॥
तीन दव सो उनको धावै । निरञ्जनको वे पार न पावै ॥
अलख निरञ्जन बड़ वटपारा । तीन लोक जिव कीन्ह अहारा ॥
ब्रह्मा विष्णु शिव नहीं बचाये । सकल खाय पुन धूर उड़ाये ॥
तिनके सुत है तीनै देवा । आंधर जीव करत है सेवा ॥
रामहिं रूप धरी है माया । जिन लंकाको राय सताया ॥
दश औतार माया ने धरिया । काल अपर्बल सबको छलिया ॥
काल पुरुष काहू नहिं चीन्हीं । काल पाय सबही गह लीन्हीं ॥
एसा राम सकल जग जाने । आदि ब्रह्मको ना पहिचाने ॥
तीनों देव असुर औतारा । ताको भजे सकल संसारा ॥
तीनों गुणका यह विस्तारा । धर्मदास मैं कहीं पुकारा ॥
सारखी
गुण तीनों की भक्ति में भूल परो संसार ।
कई कबीर निज नाम विन, कैसे उतरे पार ॥
सोरठा
जगजिव है अज्ञान, आदि नाम नहिं जानहीं ।
मायामें लपटान, जीव जमपुरी जावहीं ॥
बोधसागर
( २३ )
चौपाई
ऐसा राम कबीर न जाना । धर्मदास सुनियो दै काना ॥
सुत्र के परे पुरुष को धामा । तहैं साहब है आदि अनामा ॥
ताहि धाम सब जीवका दाता । मैं सबसों कहता निज बाता ॥
कहत अगोचर सब के पारा । आदि अनादि पुरुष है न्यारा ॥
आदि ब्रह्म इक पुरुष अकेला । ताके संग नहीं कोइ चेला ॥
ताहि न जाने यह संसारा । बिना नाम है जमके चारा ॥
नाम बिना यह जग अरुझाना । नाम गहे सौ संतसुजाना ॥
सच्चा साहब भजु रे भाई । यहि जगसे तुम कहो चित्ताई ॥
धोखा में जिव जन्म गँवाई । झूठी लगन लगाये भाई ॥
ऐसा जग से कहु समझाई । धमदाम जिव बोधो जाई ॥
सज्जन जिव आवै तुम पासा । जिन्हें देव सतलोकहि बासा ॥
ज्ञानहीनके सुन षट करमा । धर्मदास उनके ये धरमा ॥
भरग गये वे भव जलमाहीं । आदि नाम को जानत नाही ॥
पीतर पाथर पूजन लागे । आदि नाम घटही से त्यागे ॥
तीरथ बर्त करे संसारे । नेम धरम असनान सकारे ॥
भेष वनाय विभूति रमाये । घर घर भिक्षा माँगन आये ॥
जग जीवनको दीक्षा देहीं । सत्तनाम विन पुरषहि द्रोही ॥
ज्ञान हीन जो गुरु कहावै । आपन भूला जगत भुलावै ॥
काम कोध मद लोभ विक्राग । इन्हें न त्यागे साध बिचारा ॥
ऐसा ज्ञान चलाया भाई । सत साहबकी सुध बिसराई ॥
यह दुनियां दो रंगी भाई । जिव गह शरण असुरकी जाई ॥
तीरथ व्रत तप पुन्य कमाई । यह जम जाल तहाँ ठहराई ॥
यहै जगत ऐसा अरुझाई । नाम बिना बूढ़ी दुनियाई ॥
जो कोइ भक्त हमारा होई । जात वरण को त्यागे सोई ॥
( २४ )
ज्ञानबोध
तीरथ व्रत सब देय बहाई । सतगुरु चरणसे ध्यान लगाई ॥
काम क्रोध मद लोभ न तेही । सोई पावै परम सनेही ॥
मनहीं बांध स्थिर जो करही । सो हंसा भवसागर तरही ॥
भक्त होय सतगुरुका पूरा । रहै पुरुष के नित्त हजुरा ॥
यही जो रीति साधकी भाई । सार युक्ति में कह गुहराई ॥
साखी-सत्तनाम निज मूल है, यह कबीर समझाय ॥
दोई दीन खोजत फिरें, परम पुरुष नहीं पाय ॥
सोरठा
सत्तनाम गुण गाव, गहै नाम सेवा करै ।
सहज परम पद पाव, सतगुरु पद विश्वास दृढ ॥
चौपाई
पाथर पूज हिंदु भुलाना । सुरदा पूज भूले तुरकाना ॥
कहैं कबीर ये दोह भुलाना । आदि पुरुष कोई नहीं जाना ॥
हिन्दू तुर्क दोई उपदेशा । नाम गहै मिटि काल कलेशा ॥
भवसागर कोइ पार न पावे । या जग में सब गोता खावे ॥
भव दरयाव है अगम अपारा । पुरुष भक्त उतरेंगे पारा ॥
धर्मदास जग कहो समझाई । आदि नाम बिन सुक्ति न पाई ॥
जो जन भजि हैं निर्भयनामा । सो हंसा पहुँचै निज धामा ॥
अजर नाम लै लोकहि जाई । दुष्ट काल तब रहे सुरझाई ॥
कर्मत्याग सब भजो यकनामा । कभी न हो भवसागर धामा ॥
ब्रह्मने जो राह चलाई । सो सब कहों मैं तुमसे गार्ई ॥
चार वरण अरु वेद बखाना । जगके जीव सबही उरझाना ॥
जात पांत ब्रह्म कर दीन्हा । सबमें ऊँच ब्राह्मणको दीन्हा ॥
ब्रह्म अपने मते चलाये । तीनों गुण जग नाम लखाये ॥
आदि नामकी सुध नहीं पाये । चारों जुग धोखाहि गुमाये ॥
बोधसागर
( २५ )
यह ब्रह्मा की है कगवृत्ती । जगहि लखाये झूठी रीती ॥
ब्रह्माने यह जग भरमाया । पत्त पुरुषका भेद न पाया ॥
तिहुँपुर कालके जाल पसारा । तामें अटके सब संसारा ॥
जात पांत कोई भेद न चीन्हा । मिथ्या राह जगहि गहलीन्हा ॥
ब्राह्मण प्रभुकी भक्ति न जाने । ब्रह्म रूप नाहीं पहचाने ॥
सार शब्द ब्राह्मण नहीं जाने । आदि नाम शूद्रही बखाने ॥
ब्राह्मण धरे शूद्र औतारा । करे मुक्ति तिहुँ पुरसे न्यारा ॥
धन्य शूद्र जो सेवा करई । आदि नामको हियमें धरई ॥
जाति वनरमें भेद बताऊँ । जो कोई समझे ताह लखाऊँ ॥
जाति बरण सब एकहि होई । दूसर जाति नहीं है कोई ॥
दूसर कर्म जाति है भाई । कर्म करे सो नाम धराई ॥
जैसो कर्म करे जो भाई । तैसी ताकी जात बनाई ॥
चार बरण सब एकहि जानो । दूसरे कर्म जो जात बखानो ॥
जाति बरणका चिह्न न कोई । कैसे जाति दूसरी होई ॥
दूसरि जाति कोई विधि माने । जग अज्ञात भेद न जाने ॥
जाति पांति होके नहिं आये । यह जगमें झगड़ा फैलाये ॥
जाति पांति नाहीं कोई न्यारी । एक जाति है सब संसारी ॥
भगके द्वार जीव सब आये । जन्म मरनमें बहुरि समाये ॥
राह एक आये संसारा । कौन ज्ञानसे भये नियोग ॥
एकइ घरसे सब जिव आये । एक बाप एक माता जाये ॥
ऊँच नीच सब सम कर जाना । ऊँच नीच सब झूँठ बखाना ॥
डार जनेऊ ब्राह्मण कहलायें । ब्राह्मणिको कहो का पहिराये ॥
सुनत करा मुसलमानहि कीन्हा । तुर्कानीको का कर दीन्हा ॥
ना हिन्दू ना तुर्क कहाये । ज्ञान हीन जिव धोखा खाये ॥
जात बरन मिथ्या कर जानो । सत्त कहे निश्चय कर मानो ॥