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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

बोधसागर

( १३ )

निरञ्जन वचन

मानों ज्ञानी वचन तुम्हारा । हंस ले जाव पुर्षे दर्बारा ॥
चौदह काल जगतमें म्हारे । घाट बाट बैठे रखवारे ॥
सुर नर सुनि आवैं वहि घाटा । दशहि और जो जोवे बाटा ॥
दुर्ग जगाती बड़ा सिरदारा । विना जगात कोइ उतरन पारा ॥
भोजन नदी घाट नहिं थाहू । उतरन काज कहै सब काहू ॥

ज्ञानी वचन

कहैं ज्ञानी सुन काल सुभाऊ । हमरे हंस की बात सुनाऊ ॥
बखतर ज्ञान शब्द हथियारा । मार दूत को चले अगारा ॥
कोट सिद्ध तेज है हंसा । जब परवाना आवैं बंसा ॥
बंस छाप जब पावहिं प्राणी । ताहि न रोके दुर्गा रानी ॥
कहा काल तुम करो विचारा । हंस हमार उतरि है पारा ॥
सार शब्द है हंस बहोरी । ता चढ़ि जायकाल मुखतोरी ॥
संधि न पावे ते बटपारा । हंसा पहुँचे लोक दुवारा ॥

निरंजन वचन

तुमको काल निरंजन राई । हे ज्ञानी का करो बड़ाई ॥
पांव पताल शीश अकाशा । सोरह योजन अग्निप्रकाशा ॥
गजें काल महा विकरारा । सत्रह लाख लो पांव पसारा ॥
लपके जीभ जिमि टूटे तारा । जस बिजली चमके अँधियारा ॥
सृद्ध बदाय दंत अति बाढ़ा । मध्य घेर ज्ञानी कह ठाढ़ा ॥
हमरे पौरुष हम बरियारा । तुम ज्ञानी का करो हमारा ॥

ज्ञानी वचन

ज्ञानी पुर्ष शब्द कियो जोरा । पकड़ सृद्ध दांत गहि मोरा ॥
मारेउ शब्द पांव कर पेली । तोर सृद्ध समुद्र गहि मेली ॥
पुर्षरूप तबही पुन धारा । जौन सरूप काल औतारा ॥

( १४ )

निरञ्जनबोध

निरञ्जन वचन

भया अधीन दोड़कर जोरी । तुम सतपुरुष सरन हम तोरी ॥
तुमसों बाल बुद्धि हम धारा । अब तुम करहु मोहि उद्धार ॥
बालक कोटि भांति गरियावत । मात पिता मन एक नहि आवत ॥
तुमहीं पुर्ष दीन मोहे राजू । औ पुनदीन्हसकलमोहिंसाजू ॥
तिहिं पर हमने गाउं बसावा । लीन्हे सुन्न ठिकान बनावा ॥
तहां हम साहब जाय रहाई । बिन आज्ञा कछु नाहिं कराई ॥
अबलग साहब मैं नहिं चीन्हा । सत्त पुर्ष तुम दर्शन दीन्हा ॥
दोड़कर जोरि चरणचितलावा । धन्य भाग हम दर्शन पावा ॥
अब मोहिं साहब भेद बताई । पाऊं चिह्न हंस पहुँचाई ॥

ज्ञानी वचन

सुन रे काल निरंजन राई । पुर्ष नाम है वीरा भाई ॥
जो हंसा चित भक्ति समोई । ताको खूट गहे मत कोई ॥

साखी

जो निज वीरा पाय है, आवै लोग हमार ।
ताको खूण्ट गहो मत, सुनो काल बटपार ॥

निरञ्जन वचन

चौपाई

सुनो गुसाईं विनती मोरी । वीरा पाय करै कछु औरी ॥
ज्ञान कथै अन्त चित वासा । आवागमनकी राखों आसा ॥

ज्ञानी वचन

सुनी निरंजन वचन हमारा । नहीं सत्त वह जीव तुम्हारा ॥

साखी

जा घरते जिव आइया, ताह सुध गई खोय ।
गोहराय कहों मैं जीवसों, जो शब्द पारखी होय ॥

बोधसागर

( १६ )

निरंजन वचन

चौपाई

कहै बाल तुम भली विचारी । संप देख हम कांथ उतारी ॥
उनके निकट दूत नहीं आई । साहब हंस देहों पहुँचाई ॥

साखी

साहिब सबको एक है, साहिबका कोइ एक ॥
लाखन मध्ये को गिने, कोटिन मध्ये देख ॥

ज्ञानी वचन साखी

जाहु काल घर आपने, शब्द कहौँ चितलाहु ॥
जो फिर सीस उठाय हो, बांध रसातल जाहु ॥

चौपाई

जो पुन गह्यो हंसकी बाँही । बांध रसातल पठाऊँ तोही ॥

निरंजन वचन

जब तुम रूप दिखावा मोहा । तब हम पुरुष चीन्हा तोही ॥
प्रथमै ज्ञानी हम नहीं जाना । बन्धु जानकान्हा अभिमाना ॥

ज्ञानी वचन

धर्मदास तब सों हम आये । गढ़ रैदास मो धारा पाये ॥
प्रथमहि सतयुग लागा भाई । नृप हरचन्द्र भये तहाँ राई ॥
तहाँ जाय शब्द गुहराई । जो चीन्हा सो लोक पठाई ॥
सतयुग सत्त नाम मोरो नाऊँ । देही धर हम मनुष्य कहाऊँ ॥

धर्मदाससों वचन

धर्मदास सुनि टेके पाई । तुव प्रनाप सकल सुधि आई ॥
काल चरित्र सकल हम जाना । पुर्ष लीला सबही पहुँचाना ॥
जब आपुन आये भौमाहीं । हंस काज जो भयो अब भाई ॥

इति श्री कबीर साहिब और निरंजनकी गोष्ठी समाप्त

ज्ञानबोध (त्रयोदश तरंग)

सत्यपुरुषाय नमः

अथ श्रीबोधसागरे

त्रयोदशस्तरंगः

ग्रन्थ ज्ञानबोध

★

कबीर वचन

साखी-सत गुरु जीव प्रबोधके, नाम लखावै सार ।
सार शब्द जो कोई गहे, सोई उतरि है पार ॥

चौपाई

भौसागर है अगम अपारा । तामें बूड गया संसारा ॥
पार लगन को सब कोइ धावे । बिना नाम कोइ पार न पावे ॥
यह जग जीव थाह नहिं पावे । बिना सतगुरु सब गोता खावे ॥
जग जीवों से कहो गुहराई । सतगुरु केवट पार लगाई ॥
यह जग बूड गयो मैझधारा । सतगुरु भक्त भये भवपारा ॥
सत्तनाम जो करे पुकारा । जब भव जल उतरेंगे पारा ॥
सत्तपुरुष है अगम अपारा । ताको सब मैं कहीं विचारा ॥
आदि अनाम ब्रह्म है न्यारा । निराधार मई कियो पसारा ॥
ताहि पुरुष सुमरो रे भाई । तन छोड़ जिवलोक सिधार्ह ॥
कहे कबीर नाम गह सोई । भरम छोड़ भव पारहिं होई ॥

साखी

आदिब्रह्म हिय परखिय, छोड़ो मरन अजान ।
कहे कबीर जग जीवसे, गहिले पद निरवान ॥

बोधसागर

( १७ )

सोरठा

भवसागरको पार, विना नाम उत्तरे नहीं ।
गहिलेव नाम अपार, कई कबीर सब जीवसे ॥

चौपाई

कहैं कबीर सुनो धर्मदासा । आदि नाम मैं कहों सब पासा ॥
यहि जगसे मैं कहा चिताई । अज्ञानी नहि माने भाई ॥
जौन जीव को ज्ञान न होई । कहे वचन माने नहि सोई ॥
और कहे जुलहा मति हीना । ब्रह्मा विष्णु शिवराम न चीन्हा ॥
ऐसे भक्त न देखे भाई । ब्रह्मा विष्णु शिवहिं विसराई ॥
जिन्दा हर का मरम न पाई । जुलहा भक्ति न जाने भाई ॥
ब्रह्मा विष्णु शिव जग उपजाई । इन तीनोंकी यह दुनियाई ॥
रावन छली रामकी नारी । रामचन्द्र कीन्हा रण भारी ॥
हर सीताको रावण लाये । राम लंकपति चिह्न मिटाये ॥
कहाँलों वरणों वार न पारा । तीन देवका सकल पसारा ॥

सार्वी-रामचन्द्र वर्णन कहूं, त्रयलोकी हैं नाथ ।

जग जिव कई समझायके, सुनिये जुलहा बात ॥

चौपाई

ऐसे सब जग कई गुहराई । धर्मदास मैं तुम्हें सुनाई ॥
आदि नाम मैं भाख सुनाई । यह जग जीव न चेता भाई ॥
आदि नाम सबको दरसाया । जग जीवों को ज्ञान सुनाया ॥
यह जुलहाको भेद न पाये । अज्ञानी क्यों रार मचाये ॥
आदि नामकी सुधि विसराये । मायामें सब जग लपटाये ॥
सच्चा साहिवको नहिं पाये । रामकृष्ण जग ध्यान लगाये ॥
ऐसे भूल गये संसारा । कैसे उत्तरे भव जल पारा ॥
कहे कबीर गहो निज नामा । जब पहुँचे अमरापुर गामा ॥

नं. ७ कबीरसागर - २

( १८ )

ज्ञानबोध

साहब पै जग धरे न ध्याना । तिहुँपुर काल ठगो हम जाना ॥
सब कोइ नाम गहो रे भाई । छोड़ो दुर्गति और चतुराई ॥
भरम जाल मनही ना लाओ । सत्तपुरुषमें ध्यान लगावो ॥
दुनियामें भरमो मति हीना । जम घरजायँगे नाम विहीना ॥
यही मता हम जगहि लखाये । धर्मदास विरले जिव पाये ॥

सारखी—कहैं कबीर जनगायके, सुनो जगत यह ज्ञान ॥

नीचे त्रयलोकी रहत, ऊपर सत्तगुरु नाम ॥

कहैं कबीर सुनो धर्मदासा । जग जीवोंकी कथा प्रकाशा ॥
आदि नाम हम भास्व सुनाया । मूरख जीव भरम नहि पाया ॥
राम वरन जग कीन्हहा भाई । तुम सुनियो मैं देखै बताई ॥
जगत कहै जुलहा अज्ञानी । हरिहरका कछु भेद न जानी ॥
नीच जात और भक्त कहाई । हरि के दरस कबहुँ ना पाई ॥
वेद पुराण गीता हम जाना । हमसे नाहक करे बखाना ॥
हमरो वेद कहे निज बाता । रामचंद्र समरथ है दाता ॥
चार वेद ब्रह्मने ठाना । जुलहा भूल गया अभिमाना ॥
ब्रह्म विष्णु शिवसे और न देवा । ऋषि मुनि करें सबै मिल सेवा ॥
ले अवतार जीव जग आये । शालग्राममें सुर्त लगाये ॥
ब्रह्म विष्णु शिवहि जग धाये । जुलहा उलटा ज्ञान चलाये ॥
वेद शास्त्र में हमने जाना । ब्रह्म विष्णु महेश्वर माना ॥
सार वेदमें देखा भाई । रजगुण तमगुण सत्तगुण साई ॥
गीता भागवत पुस्तक नाना । निशिदिन जाप करें भगवाना ॥
आदि भवानी तीनों देवा । इनकी सब मिल साथे सेवा ॥
ऐसा ज्ञान हमारा होई । जुलहा कहा न मानो कोई ॥

सारखी—तीन देव निजके गहे, राखे देवी आस ।
सोइ जीव सुख भोग हैं, हंसा करे विलास ॥

बोधसागर

( १९ )

चौपाई

ऐसे जग जिव ज्ञान चलाई । धर्मदास तोहि कथा सुनाई ॥
यही जगत की उलटी रीती । नाम न जाने कालसों प्रीती ॥
वेद रीति सुनियो धर्मदासा । मैं सब भाख कहों तुम पासा ॥
वेद पुरान में नामहि भाषा । वेद लिखा जानों तुम साखा ॥
छऊ शास्त्र मिलिझगराकीन्हा । ब्रह्मरूप काहू नहि चीन्हा ॥
चीन्हो है जो दूसर होई । भर्म विवाद करे सब कोई ॥
मूल नाम ना काहू पाये । साखा पत्र गह जग लपटाये ॥
डार पत्रको जो कोई धरही । निश्चय जाय नरकमें परही ॥
भूले लोग कहैं हम पावा । मूल वस्तु विन जन्म गमावा ॥
जीव अभागि मूल नहि जाने । डार पत्र में पुरुष बखाने ॥
पढ़े पुराण औ वेद बखाने । सत् पुरुष जगभेद न जाने ॥
वेद पढ़े औ भेद न जाने । नाहक यह जग झगड़ा ठाने ॥
वेद पुराण यह करे पुकारा । सबहीसे इक पुरुष नियारा ॥
ताहि न यह जग जाने भाई । तीन देवमें ध्यान लगाई ॥
तीन देव की करहीं भक्ती । जिनकी कभी न होवे सुक्ती ॥
तीन देवका अजब खयाला । देवी देव प्रपंची काला ॥
इनमें मत भटको अज्ञानी । काल झपट पकड़ेगा प्राणी ॥
तीन देव पुरुष गम्य ना पाई । जगके जीव सब फिरे भुलाई ॥
जो कोइ सत् पुरुष गये भाई । जा कहैं देख डरे जमराई ॥
ऐसा सबसे कहियो भाई । जग जीवोंका भरम नशाई ॥
साखी-रूप देख भरमो नहीं, कहैं कबीर विचार ।
अलख पुरुष हृदये लखे, सोइ उतारि है पार ॥
चौपाई-जो जो वस्तु दृष्टिमें आई । सोई सबहि काल धर खाई ॥
मूरति पूजै सुक्त न होई । नाहक जन्म अकारथ खोई ॥

( २० )

ज्ञानबोध

यह जग करै मूर्तिकी पूजा । करै गर्व हमसे नहिं दूजा ॥
पण्डित भक्त भये जग माहीं । पाथर पूजत जन्म गमाही ॥
ऐसे भक्त भये अधिकार्ई । पीतरकी निज मूर्ति बनाई ॥
इनसै भक्त और नहिं कोई । जिन अपनी दुरमति नहिं खोई ॥
आदि ब्रह्मको भेद न पाये । पद पद पंडित जग भरमाये ॥
अन्तकाल जम घेरे आई । तब विद्या कछुकाम न आई ॥
पाथर पूजें पढ़े पुराना । पद गुण अर्थ विवेकहि ज्ञाना ॥
ज्ञान कथे है वार न पारा । सतगुरु भक्त न जान लबारा ॥
ऐसा मत ब्राह्मणने धारा । जले जात हैं यमके द्वारा ॥
आदि नाम भूलो मत भाई । असुर अंश दुरमतहि लखाई ॥
धर्मदास देखो जग रीती । सांचा छोड़ झूठसों प्रीती ॥

साखी

सार शब्द ना जान है, कहैं कबीर बखान ।
यह जग भूले बावरे, गहे न सतगुर मान ॥
ब्राह्मण भूले बावरे, सरगुण मतके जोर ।
लख चौरासी भोगिहैं, पारब्रह्मके चोर ॥

सरगुण माहिं सार नहिं कोई । निरगुण नाम नियारा होई ॥
निर्गुणसे सरगुण है भाई । सरगुणमें यह जग लपटाई ॥
रजगुण सतगुणतमगुणकहिये । सब मिटजाय ज्ञान जोलहिये ॥
तीनों गुण से सरगुण होई । चौथा पद निरगुण है सोई ॥
निर्गुण नाथ निरंजन राई । निज उत्पत्ति बनाके खाई ॥
ताके परे इक नाम नियारा । सो साहब है मूल अपारा ॥

बोधसागर

( २१ )

उन्हें जगत नहीं जाने भाई । काल अंश राखे भगमाई ॥
ब्रह्मा विष्णु शिवहि जग झाँके । सत्य कबीर नाम रस छोँके ॥
नाम अमल रस चाखे कोई । ताको जरा मरन ना होई ॥
सतगुरु भक्ति करे जो कोई । जाति वर्ण डुरमति सब खोई ॥
आदि नामको नित गुणगावे । भवसागर में बहुरि न आवे ॥
आदि नामको गहे जो आसा । सतगुरु काटे काल कि फाँसा ॥
आदिनाम है गुप्त अमोला । धर्मदास मैं तुमसे खोला ॥
गुप्त मता पावे जो कोई । गेही तज बैगगी होई ॥
आदि नाम गुप्त संसारा । जो पावै जग से हो न्यारा ॥
धर्मदास यह जग बौराना । कोई न जाने पद निरवाना ॥
यहि कारन मैं कथा पसारा । जगसे कहियो नाम नियारा ॥
यही ज्ञान जग जीव सुनाओ । सब जीवोंका भरम नशाओ ॥
अब मैं तुमसे कहों चिताई । त्रयदेवनकी उतपत्ति भाई ॥
साहब कीन्ह इक अजबतमाशा । सो सब कहँ मैं तुम्हरे पास ॥
कछु संक्षेप कहों गुहराई । सब संशय तुम्हरे मिट जाई ॥
भरम गये जग वेद पुराना । आदि नामका भेद न जाना ॥
राम राम सब जगत बखाने । आदि नाम कोई बिरला जाने ॥
राजाराम सबको यह जग जाने । तुम से ताको भेद बखाने ॥
ज्ञानी सुन सो हिरदै लगाई । मूरख सुने सो गम्य न पाई ॥
मा अछंगी पिता निरंजन । वे जम दारुण वंशन अंजन ॥
पहिले कीन्ह निरंजन राई । पीछेसे माया उपजाई ॥
मायारूप देख अति शोभा । देव निरंजन तन मन लोभा ॥
कामदेव धर्मराय सताये । देवी को तुरतइ धर खाये ॥
पट से देवी करी पुकारी । साहब मोहे करो उबारी ॥
टेर सुनो सतगुरु तहँ आये । अछंगी को बंद छुड़ाये ॥

( २२ )

ज्ञानबोध

धर्मराय को हिकमत दीन्ह। नख रेखासे भगकर लीन्ह ॥
धर्मराय करें भोग विलासा । मायाको सु रही तब आसा ॥
धर्मराय अरु माया साजे । तीन लोक तासे उपराजे ॥
तीन पुत्र अष्टंगी जाये । ब्रह्मा विष्णु शिव नाम धराये ॥
तीन देव विस्तार चलाये । इनमें यह जग धोखा खाये ॥
पुरुष गम्य कैसे के पावै । काल निरंजन जग भरमावै ॥
तीन लोक अपने सुत दीन्ह। सुन्न निरंजन बासा लीन्ह ॥
अलख निरंजन सुन्न ठिकाना । ब्रह्मा विष्णु शिव भेद न जाना ॥
तीन दव सो उनको धावै । निरञ्जनको वे पार न पावै ॥
अलख निरञ्जन बड़ वटपारा । तीन लोक जिव कीन्ह अहारा ॥
ब्रह्मा विष्णु शिव नहीं बचाये । सकल खाय पुन धूर उड़ाये ॥
तिनके सुत है तीनै देवा । आंधर जीव करत है सेवा ॥
रामहिं रूप धरी है माया । जिन लंकाको राय सताया ॥
दश औतार माया ने धरिया । काल अपर्बल सबको छलिया ॥
काल पुरुष काहू नहिं चीन्हीं । काल पाय सबही गह लीन्हीं ॥
एसा राम सकल जग जाने । आदि ब्रह्मको ना पहिचाने ॥
तीनों देव असुर औतारा । ताको भजे सकल संसारा ॥
तीनों गुणका यह विस्तारा । धर्मदास मैं कहीं पुकारा ॥

सारखी

गुण तीनों की भक्ति में भूल परो संसार ।
कई कबीर निज नाम विन, कैसे उतरे पार ॥

सोरठा

जगजिव है अज्ञान, आदि नाम नहिं जानहीं ।
मायामें लपटान, जीव जमपुरी जावहीं ॥

बोधसागर

( २३ )

चौपाई

ऐसा राम कबीर न जाना । धर्मदास सुनियो दै काना ॥
सुत्र के परे पुरुष को धामा । तहैं साहब है आदि अनामा ॥
ताहि धाम सब जीवका दाता । मैं सबसों कहता निज बाता ॥
कहत अगोचर सब के पारा । आदि अनादि पुरुष है न्यारा ॥
आदि ब्रह्म इक पुरुष अकेला । ताके संग नहीं कोइ चेला ॥
ताहि न जाने यह संसारा । बिना नाम है जमके चारा ॥
नाम बिना यह जग अरुझाना । नाम गहे सौ संतसुजाना ॥
सच्चा साहब भजु रे भाई । यहि जगसे तुम कहो चित्ताई ॥
धोखा में जिव जन्म गँवाई । झूठी लगन लगाये भाई ॥
ऐसा जग से कहु समझाई । धमदाम जिव बोधो जाई ॥
सज्जन जिव आवै तुम पासा । जिन्हें देव सतलोकहि बासा ॥
ज्ञानहीनके सुन षट करमा । धर्मदास उनके ये धरमा ॥
भरग गये वे भव जलमाहीं । आदि नाम को जानत नाही ॥
पीतर पाथर पूजन लागे । आदि नाम घटही से त्यागे ॥
तीरथ बर्त करे संसारे । नेम धरम असनान सकारे ॥
भेष वनाय विभूति रमाये । घर घर भिक्षा माँगन आये ॥
जग जीवनको दीक्षा देहीं । सत्तनाम विन पुरषहि द्रोही ॥
ज्ञान हीन जो गुरु कहावै । आपन भूला जगत भुलावै ॥
काम कोध मद लोभ विक्राग । इन्हें न त्यागे साध बिचारा ॥
ऐसा ज्ञान चलाया भाई । सत साहबकी सुध बिसराई ॥
यह दुनियां दो रंगी भाई । जिव गह शरण असुरकी जाई ॥
तीरथ व्रत तप पुन्य कमाई । यह जम जाल तहाँ ठहराई ॥
यहै जगत ऐसा अरुझाई । नाम बिना बूढ़ी दुनियाई ॥
जो कोइ भक्त हमारा होई । जात वरण को त्यागे सोई ॥

( २४ )

ज्ञानबोध

तीरथ व्रत सब देय बहाई । सतगुरु चरणसे ध्यान लगाई ॥
काम क्रोध मद लोभ न तेही । सोई पावै परम सनेही ॥
मनहीं बांध स्थिर जो करही । सो हंसा भवसागर तरही ॥
भक्त होय सतगुरुका पूरा । रहै पुरुष के नित्त हजुरा ॥
यही जो रीति साधकी भाई । सार युक्ति में कह गुहराई ॥
साखी-सत्तनाम निज मूल है, यह कबीर समझाय ॥
दोई दीन खोजत फिरें, परम पुरुष नहीं पाय ॥

सोरठा

सत्तनाम गुण गाव, गहै नाम सेवा करै ।
सहज परम पद पाव, सतगुरु पद विश्वास दृढ ॥

चौपाई

पाथर पूज हिंदु भुलाना । सुरदा पूज भूले तुरकाना ॥
कहैं कबीर ये दोह भुलाना । आदि पुरुष कोई नहीं जाना ॥
हिन्दू तुर्क दोई उपदेशा । नाम गहै मिटि काल कलेशा ॥
भवसागर कोइ पार न पावे । या जग में सब गोता खावे ॥
भव दरयाव है अगम अपारा । पुरुष भक्त उतरेंगे पारा ॥
धर्मदास जग कहो समझाई । आदि नाम बिन सुक्ति न पाई ॥
जो जन भजि हैं निर्भयनामा । सो हंसा पहुँचै निज धामा ॥
अजर नाम लै लोकहि जाई । दुष्ट काल तब रहे सुरझाई ॥
कर्मत्याग सब भजो यकनामा । कभी न हो भवसागर धामा ॥
ब्रह्मने जो राह चलाई । सो सब कहों मैं तुमसे गार्ई ॥
चार वरण अरु वेद बखाना । जगके जीव सबही उरझाना ॥
जात पांत ब्रह्म कर दीन्हा । सबमें ऊँच ब्राह्मणको दीन्हा ॥
ब्रह्म अपने मते चलाये । तीनों गुण जग नाम लखाये ॥
आदि नामकी सुध नहीं पाये । चारों जुग धोखाहि गुमाये ॥

बोधसागर

( २५ )

यह ब्रह्मा की है कगवृत्ती । जगहि लखाये झूठी रीती ॥
ब्रह्माने यह जग भरमाया । पत्त पुरुषका भेद न पाया ॥
तिहुँपुर कालके जाल पसारा । तामें अटके सब संसारा ॥
जात पांत कोई भेद न चीन्हा । मिथ्या राह जगहि गहलीन्हा ॥
ब्राह्मण प्रभुकी भक्ति न जाने । ब्रह्म रूप नाहीं पहचाने ॥
सार शब्द ब्राह्मण नहीं जाने । आदि नाम शूद्रही बखाने ॥
ब्राह्मण धरे शूद्र औतारा । करे मुक्ति तिहुँ पुरसे न्यारा ॥
धन्य शूद्र जो सेवा करई । आदि नामको हियमें धरई ॥
जाति वनरमें भेद बताऊँ । जो कोई समझे ताह लखाऊँ ॥
जाति बरण सब एकहि होई । दूसर जाति नहीं है कोई ॥
दूसर कर्म जाति है भाई । कर्म करे सो नाम धराई ॥
जैसो कर्म करे जो भाई । तैसी ताकी जात बनाई ॥
चार बरण सब एकहि जानो । दूसरे कर्म जो जात बखानो ॥
जाति बरणका चिह्न न कोई । कैसे जाति दूसरी होई ॥
दूसरि जाति कोई विधि माने । जग अज्ञात भेद न जाने ॥
जाति पांति होके नहिं आये । यह जगमें झगड़ा फैलाये ॥
जाति पांति नाहीं कोई न्यारी । एक जाति है सब संसारी ॥
भगके द्वार जीव सब आये । जन्म मरनमें बहुरि समाये ॥
राह एक आये संसारा । कौन ज्ञानसे भये नियोग ॥
एकइ घरसे सब जिव आये । एक बाप एक माता जाये ॥
ऊँच नीच सब सम कर जाना । ऊँच नीच सब झूँठ बखाना ॥
डार जनेऊ ब्राह्मण कहलायें । ब्राह्मणिको कहो का पहिराये ॥
सुनत करा मुसलमानहि कीन्हा । तुर्कानीको का कर दीन्हा ॥
ना हिन्दू ना तुर्क कहाये । ज्ञान हीन जिव धोखा खाये ॥
जात बरन मिथ्या कर जानो । सत्त कहे निश्चय कर मानो ॥

( २६ )

ज्ञानबोध

यह जग आंधर जानो भाई । नाम न जाने ऊँच कहाई ॥
ऊँच वही जो नामहि जानें । विना नाम सब नीच कहानें ॥
ना कोउ वर्ण नहीं कोउ भेषा । शब्द सरूपी जैहै देशा ॥
सब मिल भक्ति करो रे भाई । सतगुरु मुखसे यह फरमाई ॥
यह सतगुरुका ज्ञान है भाई । जो कोइलखे सो लोक सिधाई ॥
जात वर्ण हम भाख सुनाई । धर्मदास जगसे कहो जाई ॥
ऐसा तुम जग जान लख वो । सत्तलोकमें जिव पहुँचावो ॥

साखी-यह जग त्रयगुण भक्तमें, धूल परे धर्मदास ॥
नाम गहे विश्वास करि, जाय पुरुषके पास ॥
माना कहा कबारकी, सबको यहै पुकार ।
भरम जाल सब त्यागदे, गहले नाम अपार ॥

सारठा

जिन सब न म आधार विना नाम भव ना तरे ।
जाय काल दर्बार, सत्तपुरुष जो ना गहे ॥

चौपाई

कहै कबीर सुनो धर्मदासा । अब निज भेद कहों तुम पास ॥
अकह हतो पुनि कहा बखानी । उत्पति प्रलय हती मम वाणा ॥
आदि न अंत हती नहि माया । उत्पति प्रलय हती न काया ॥
सोहं ब्रह्म न नहि ओङ्कारा । काल निरंजन नहि औतारा ॥
दश आतारन चौबीस रूपा । तब नहि होता ज्योति स्वरूपा ॥
जब नहि चंद्रलोक दीपविस्तारा । तब नहि सुकृत करचो संसारा ॥
जब नहि लाक चंद्रसूर्य अरुतारा । तब नहि तीनों गुण औतारा ॥
वहां नहीं है दिन अरु राती । ऊच न नीच जात ना पांती ॥
नाही मुख पवन नहि पानी । समरथ गति काहू नहि जानी ॥
आदि ब्रह्म नहि करे पसारा । आप अकह तब हता नियारा ॥

बोधसागर

( २७ )

है अनाम अक्षर के माहीं । निहअक्षर कोइ जानत नाहीं ॥
अमर लोक जहाँ अम्बर काया । अकाल पुरुष जहाँ आपरहाया ॥
धर्मदास जहाँ वाम हमारा । काल अकाल न पावे पारा ॥
निरभय घर बोही है भाई । रोग न व्यापे काल न खाई ॥
समरथ घर हैं पैले पारा । सबके ऊपर है निरधारा ॥
जिनकी गम्य काल नहीं पाई । तीन देवकी कौन चलाई ॥
मन माया काल गति नाहीं । जीव सहाय बसै तेहिं ठाही ॥
ऐसा है वह देश हमारा । जहाँसे हम आये संसारा ॥
ताकी भक्ति करे जो कोई । भवते छूटै जन्म न होई ॥
वहाँ जाय जीव करे विलासा । अमरलोक जिवका नहीं नासा ॥
कहै कबीर सुनो धर्मदासा । आदिनाम मैं कहा तुम पासा ॥
जो कोई माने कहा तु हारा । निरभय जाय पुरुषके द्वारा ॥
मूरख सतगुरु मरम न पावे । भवसागरमें भटका खावे ॥
सार युक्ति मैं तुम्हें लखया । गन मुनि काहू भेद न पाया ॥
भाषा ग्रंथ ज्ञान उपदेशा । तुम अपने घट करो प्रवेशा ॥

सारखी-अस मुख है हमरे घरे, कहैं कबीर समझाय ।

सत्त शब्द तो कोई गहे, अस्थिर बैठे जाय ॥

सोरठा

चौथे पद निरवान, पूरे गुरुसे पाइये ।

कहे कबीर बखान, सत्त मान सतगुरु सही ॥

चौपाई

और सुनो गुरुमु का लेखा । भक्त होय सो करै विवेका ॥

जो कोई पान पम्बाना पावै । ताके निकट काल नहीं जावै ॥

पान परवाना पावै भाई । नाम गहे अरु भरम नशाई ॥

तन मन से गुरु सेवा लाई । गुरुसे देव और नहीं भाई ॥

गुरु से कपट शिष्य जो राखे । जमराजाके सुदगर चाखे ॥

( २८ )

ज्ञानबोध

सोई हंस काल घर जावे । सत् लोकमें वास न पावे ॥
निरभय घर कबहुँ ना पावै । कोट जन्मतिहिकालसतावै ॥
भक्ति कर पूजत हैं जो देवा । निश्चय जाय कालकी सेवा ॥
मनुष्य तन वे कभी न पावै । लख चौरासी भटका खावै ॥
जैसे कर्म करे संसारा । तस भुगते चौरासी धारा ॥
ना गुरु ना निगुरा पंथी । कहा कयो बांचैसे ग्रंथी ॥

साखी-भक्ति करें भरमत फिरे, जग छोड़े नहिं सोय ।

कहैं कबीर धर्मदास से, जिनका तरन न होय ॥

सोरठा

करनी देय वहाय, आदि नाम कह जानके ।

ता महाँ रहै समय, भरम जाल सब छोड़ दे ॥

धर्मदास वचन

चौपाई

धर्मदास तब कहै करजोरी । स्वामी सुनिये विनती मोरी ॥

हो स्वामी मैं बूझो तोहीं । करके कृपा बताइये मोहीं ॥

हो अविनाशी ब्रह्म कहाये । यह जगमें तुम कैसे आये ॥

यह सब भेद बताइय स्वामी । तुम सब घटके अंतर्यामी ॥

सकल चरित तुम मोहि बतावो । मैं जाते जगजीव चितावो ॥

यह जग तब पतियावे साई । चारों जुग तुम कहाँ रहाई ॥

साखी-सो अब मोहि बतावहूँ, तुम गुरु अगम अपार ।

धर्मदास विनती करे, सुनियो हो करतार ॥

कबीर वचन चौपाई

कहै कबीर सुनो धर्मदासा । अब यह भेद कहों तुम पासा ॥

वेद पुराण शास्त्र जग ठाना । भूले जीव न पांय ठिकाना ॥

बोधसागर

( २९ )

तीन लोक जिव काल सतावै । ब्रह्मा विष्णू पार न पावै ॥
सत् पुरुष तब मोहिं पठावा । जीव उबारन मैं जग आवा ॥
यहि कारण आयो संसारा । जगके जीव मैं करों उबारा ॥
जग जीवनको नाम लखावै । पकड़ हंस सतलोक पठावै ॥
हम हैं सतलोकके बासी । दास कहाय प्रगट भये कासी ॥
ना कोइ वर्ण नहीं कोइ भेशा । सत् पुरुषके थे हम देशा ॥
तहैंकी रचना अद्भुत भाई । सो मैंने तोहि पहिले सुनाइ ॥
और तोहि मैं कहूँ समझाई । धर्मदास सुन चित्त लगाई ॥
धरी देह भवसागर आये । धर्मदास तोहि नाम सुनाये ॥
कलियुगमें काशी चल आये । जब हमरे तुम दर्शन पाये ॥
तब हम नाम कबीर धराये । काल देख तब रह सुरझाये ॥
जो कोइ हमको चीन्हा भाई । जिनका काल धोक मिट जाई ॥
देह नहीं अरु दरसै देही । जग ना चीन्हे पुरुष विदेही ॥
नहीं बाप ना माता जाये । अब गतिहीसे हम चल आये ॥
हते विदेह देह धर आये । जग जीवोंके बन्द छुड़ाये ॥
नाम गहे तेहि लोक पठाये । बिना नाम जिव कालहि खाये ॥
गुप्त रहे नाहीं लख पावा । सो मैं जगमें आन चितावा ॥
चारों जुग भवसागर आये । आदि नाम जग ढेर सुनाये ॥
नाम सुने शरणागत आवें । तिनहीकी हम बंद छुडावें ॥
जीव प्रबोध लोक पहुँचावें । काल निरंजन देख डरावें ॥
चारों जगके चारों नामा । माया रहित रहै तिहि ठामा ॥
सतजुग सत् सुकृत कहलाये । त्रेता नाम सुनींद धराये ॥
द्वापरमें करुनामय कहाये । कलियुग नाम कबीर रखाये ॥
आदि नाम चारों जुग ढेरा । सज्जन जीव सुनतही दौरा ॥
जो जो जीव शरणमें आये । तिनको हमने नाम सुनाये ॥

( ३० )

ज्ञानबोध

आदि नाम जो नित गुन गावैं । कर विश्वास अमर पद पावैं ॥
जो कोइ सतगुरु नामको धावैं । तिनको साहब पार लगावैं ॥
पार हाय जो माया त्यागे । जन्म मरनको संशय भागे ॥
माया त्याग वैरागी होई । अजर अमरको पावैं सोई ॥

धर्मदास वचन

कह धर्मदाम सुनो प्रभु राई । भक्त भाव मोहि देव बताई ॥

कबीर वचन

भक्तोंकी यह कथा पसारा । धर्मदास सुनियो चित्त धारा ॥
जगमें भक्त भये अधिकारी । जोगी सन्यासी लट धारी ॥
शीव गोरख अरु बहु ब्रह्मचारी । मायाने सबको ठग डारी ॥
इनको ठग जब हमपर धाई । गुप्त नाम हम टेरे सुनाई ॥
लोट गइ माया बहुवारी । रहे जीत माया गइ हारी ॥
माया जल है कठिण अपारा । तासे गन सुनि बैठे हारा ॥
माया जाल परो मत भाई । धर्मदास जग कहो गुहराई ॥
भवसागर है भक्त बहुतेरा । जिनको तुमसे कहो निबेरा ॥
मौनी भये मुखहु नहिं बोलें । भेष बनाये घर घर डोलें ॥
अंगहि भस्म गले बिच माला । मठिया बैठ सुने मतवाला ॥
धून रमाय गुरिया सरकावे । गगन चढ़ाय के जग भरमावैं ॥
कान फाड़ शिर जटा बढ़ाये । माथे चन्दन तिलक लगाये ॥
वस्त्र रँगा जोगी बन आये । सतगुरु मिले न भेष बनाये ॥
बहुत करें जप तप रे भाई । आदि नाम कोई नहिं पाई ॥
पाहन सेवैं भक्त कहावैं । चन्दन तेल सिंदूर चढ़ावैं ॥
मानुष जन्म बड़े तप होई । नाम बिना झूठे तन खोई ॥
साधु युक्ति अस चाल बताऊँ । धर्मदास मैं तुम्हैं लखाऊँ ॥
काम क्रोध लोभ अहँकारा । सोई साधु जिन इतने मारा ॥
सूखा फीका करे अहारा । निशिदिन सुमरे नाम हमारा ॥

बोधसागर

( ३१ )

तत्त्व प्रकृति और बल माया । इन्हिं जीत तब साधु कहाया ॥
अन्त कपट सब देय बहाई । क्षमा गङ्गमें बैठ नहाई ॥
हार जीत और अभिमाना । इनसों रहित साधुको ज्ञाना ॥
बिहँसत बदन भजनको आगर । शीतल दया प्रेम सुखसागर ॥
सब षट् कर्म छोड़ अज्ञाना । धर ले केवल निर्गुन ध्याना ॥
धन्य धन्य जग साधु है सोई । जिन अपनी दुरमति सब खोई ॥
ऐसी रहन साधुकी भाई । जब हँसा निरभय पद पाई ॥
यह भक्तोंकी कथा सुनाई । निरभय पद कोइ बिरले पाई ॥
साधू लक्षण तुम्हें सुनाया । गन सुनि काहू भेद न पाया ॥
आदि नामको नित गुनगावो । सोवत जागत ना बिसरावो ॥
सत साहिब है सबसे न्यारा । ताहि जपे होवे भव पारा ॥
भक्त अनेक भये जग माहीं । जोग करै पै युक्ति न पाहीं ॥
जोगहि युक्तिनाम बिन नाहीं । झूठी माया आन लगाहीं ॥
नामहि गहै तेहि निहसंसा । नाम बिना बूझे सब हँसा ॥
नाम निरक्षर सुधि जब पावा । काल अपर्बल निकट न आवा ॥
माया त्याग भजो निज नामा । तब जिव जाय पुरुषके धामा ॥
सबसे कहो पुकार पुकारी । कोइ न माने नर अरु नारी ॥
सत्य पुरुषकी युक्ति न पाई । ऊदय धरे नहिं सत्य को भाई ॥
शिव गोरख सोइ पार न पावे । और जीवकी कौन चलावे ॥
कहें कबीर सुनो मम बानी । जोग युक्ति मैं कहों बखानी ॥
अब गेहीका सुनो विचारा । धर्मदास मैं कहों पुकारा ॥
गेही भक्त करे जो कोई । अब मैं तुमसे भाखों सोई ॥
गेही भक्ति सत्त गुरुकी करई । आदि नाम निज हृदसे धरई ॥
गुरु चरनसे ध्यान लगावै । अन्त कपट गुरुसे ना लागै ॥

( ३२ )

ज्ञानबोध

गुरु सेवामें फल सब आवै । गुरु विमुख नर पार न पावै ॥
गुरु वचन निश्चय कर मानै । पूरे गुरुकी सेवा ठानै ॥
विन विश्वास भक्ति परकाशा । प्रीति विना नहिं दुबिधा नाशा ॥
मीन मांस मद निकट न जाई । अंकुर भक्ष सो सदा कराई ॥
गुरुसे शिष्य करे चतुराई । सेवा हीन नर्कमें जाई ॥
परधन पाहन समझे भाई । झूठ वचन हृदये नहिं लाई ॥
पर तिरिया माता सम मानै । झूठ छोड़ सत्यहिको जाने ॥
जीवपै दया करै रे भाई । बुरे कर्म सब देय बिहाई ॥
हृदये दया प्रीति ना होई । सतगुरु सपने मिले न सोई ॥
नाम नेह गुरु सुतै लगावे । आदि नामको पल पल ध्यावे ॥
लेवै पान सुक्ति सहदानी । जाते काल न रोकै आनी ॥

सारखी-पुरुष नाम निशिदिन गहो, शब्द करो परतीत ।

अंक नाम निज पाइया, जाहो भवजल जीत ॥

सोरठा

भर्म तजे यम जाल, सत्तनाम लौ लावई ।

चले संतकी चाल, परमार्थ चित दे गहे ॥

चौपाई

गेही भक्त आरती आने । प्रति पूनोकी आरति ठाने ॥
अमावस आरती नहिं होई । ताहि भवन रह काल समोई ॥
पाख दिवस नहिं होवे साजू । प्रति पूनो कर आरति काजू ॥
पूनो पान लीन्ह धर्मदासा । पावे शिष्य होट सुखबासा ॥
छटे मास नहिं आरति भेवा । साल माह गुरु चौका सेवा ॥
नाम कबीर जपै लौलाई । तुम्हरा नाम कहे गुहराई ॥
ऐसी रहनि गेहि जो धरि है । गुरु प्रताप दोई निस्तरि है ॥