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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

( १३८ )

बोधसागर

चौपाई

कहैं शाह तेहि तुरत ले आवो । साइत एक विलंब न लावो ॥
सारखी-आये धायके लोग बहु, आतुर बोले वैन ।
चलो कबीरा शाहपै, हम आये तोहि लैन ॥

चौपाई

गये शाहके सन्मुख जबही । ज्वाला देह दूर भइ तबही ॥
उठिके शाह भयो तब ठाढा । मोहिते अधिक प्रेम तब बाढा ॥
सारखी-शाह न छोडे हमकहँ, बढचो प्रेम मनमाहिँ ।
शेखतकी तेहि पीर थे, सो सुरझे मनमाहिँ ॥

चौपाई

कहैं तकी सुन शाह सिकंदर । हमते कियो तफाउत अंतर ॥
जोलहाते तुम कीनेहु यारी । हमते अन्तर कियो विगारी ॥
कह सिकंदर तुम हमरे पीरा । वह द्रदमंद द्रवेश फकीरा ॥
कहैं मारफत राहकी बाते । राखा जान जो मेरा जाते ॥
ऐसे शाह कह्यो समुझाई । तबहुँ न शेखतकी शरमाई ॥
काशीके पंडित अरू काजी । शेखतकी मिली परपैच साजी ॥
कह काजी सुनु शाहके पीरा । कैसेहु मारा जाय कबीरा ॥
यह जोलहा जौँ मारा जाई । तौ हम सबकी टरै बलाई ॥
कहैं तकी सुन पंडित काजी । क्या कबीर जोलहा है पाजी ॥
चाहो तो आतशमें जारो । चाहो टूक टूक करि डारो ॥
चाहो जलके बीच डुबाओ । चाहो देगमें आँच दिलावो ॥
चाहो हाथीसे चिरवाओ । चाहो खाक त्वचा भरवावो ॥
चाहो तो देवालमें साटो । चाहो बोटी बोटी काटो ॥
चाहो मोहडे तोप उडावो । चाहो कूपमें जितत दबावो ॥
सारखी-मेरा नाम शेख तकी, मैं सिकंदरको पीर ।
देखो कैसे बाचिहैं, कैसा फकर कबीर ॥

स्वसमवेदबोध

( १३९ )

काजी पंडित सब हरषाना ।जिमि पंकज विकसे लखि भाना॥
कह काजी तुमते सब होई । तुम ऐसा दूजा नहीं कोई ॥
इस जोलहेने कुपुत्र मचाया । दोनों दीनकी अदल मिटाया ॥

साखी-तीरथ व्रत एकादशी, रोजा और नमाज ।
ये सब कछु न मानई, कहै एक शिरताज ॥
खसी वो सुरगी गायनी, पीर निमित्त हम देह ।
सबको कहै कसाइ है, ऐसा काफिर येह ॥

चौपाई

काशीके लोग हमैं नहीं मानें । जोलहाकी सब सिफत बखानें ॥

साखी-भाग हमारे शेखजी, तुम इहँ पहुँचे आय ।
जौं यह जोलहा मारहुँ, सबको कंटक जाय ॥
कहै तकी सुन काजी, हमते बाढी रार ।
जीअत कबहुँ छोड़ो, न अब यहि डारो मार ॥
शेखतकी परंपंच करि, गये शाहके पाहँ ।
हमें देख तहँ बैठे, अधिक जरे मनमाहँ ॥
कहै तकी चित रोष धरि, सुनो सिकन्दर बात ।
कहा हमारा मानहुँ, तब होवै कुशलात ॥

सोरठा-यहि जोलहै तू मार, नहीं तो देगा बददुआ ।
तुमको करें खुवार, जान माल सब गलैगा ॥

साखी-कहै सिकन्दर पीर सुन, मोहि तुमारि पनाह ।
जो चाहो सो करो यहि, तुमें कोई रोकै नाह ॥

चौपाई

कहो कबीरके मारन ताँई । इहवाँ मेरी कछु न बसाई ॥
पीर फकीर जात अल्लाहा । मेरो जोर न पहुँचे ताहा ॥

( १४० )

बोधसागर

साखी—जौँ वह होतो रैअत, तौ हम करते जोर ।
वह अलमस्त फकीर है, तहाँ न फावै मोर ॥
तुमहु कही समुझायके, पीर फकीर अल्लाह ।
अब तुम कहते मारने, यह न होय हमपाह ॥

चौपाई

अहो पीरजी तुम वह एका । अपने मनमें करो विवेका ॥
उन तुमरो कछु नाहिं बिगारा । काहे तुमने कुफुर पसारा ॥
बुजरूग सब नेकी फरमावै । जोर जुलुम कछु नाहीं भावै ॥

साखी—कहा हमारा मानिये, छोड़ि दीजिये रार ।
कुलह सुलह दे बैठिये, अल्लह ओर निहार ॥
कहै तकी सुलतान सुन, तुमे नहीं कछु दोष ।
जो मैं कहों सो मानिये, कर मेरो संतोष ॥
कहै सिकंदर पीर सुन, मेरो शिर बरु लेहु ।
फकिर कबीर न मारिये, यह मांगे मोहि देहु ॥

चौपाई

सुनतहि तकी कोध परजारा । शिरते ताज जमीन दे मारा ॥
निपटहि बिकल देखि तिहि भाई । तब हम शाहसे कहा बुझाई ॥
कहै कबीर सुनो सुलताना । करो पीरको बचन प्रमाना ॥
कहै सिकंदर सुनो हो पीरा । मन मानै सो करो कबीरा ॥

साखी—डारहु मारि कबीरको, हम नहिं मानै उन ।
ताका कबहु न भला हो, करे फकरको खून ॥

चौपाई

शेखतकी तब उठे रिसाई । है कोई बांध कबीरहि भाई ॥
साखी—शेखतकी आपै उठै, काजी पंडित झार ।
बाँध बाँध सब कोई कहै, कोई न करे गोहार ॥

स्वसमवेदबोध

( १४१ )

बाहँ बांधि पग बांधिके, बोर गंगजल नीर ।
निःसंशय निश्चित सो, निरभय सदा कबीर ॥
गंगाजलपर आसन, वंद परे खहराय ।
जन कबीर सतनाम बल, निरभय मंगल गाय ॥
शाह सिकंदर देखही, अरु ठाढे सब लोग ।
धनि कबीर सब कोइ कहै, शेखतकी भा सोग ॥

चौपाई

शेखतकी तब मीजै हाथा । सुखे सुख नहिं आवै वाता ॥
शेखतकी तब कहै बनाई । अबकी कसनी बढ़ौ न भाई ॥
अबकी बार कबीरहि पावो । देगि मूढ़िके आच दिलावो ॥
देग आंचते बचै कबीरा । तो जानौ अल्लाहको नूरा ॥
कहै कबीर नाम परकासा । तासो गयौ सिकंदरके पास ॥
शाह सिकंदर उठिभे ठाढे । अधिको प्रेम तासु उर बाढे ॥
शेखतकी कह क्रोधित बैना । धुनै शीस राते भये नैना ॥
सुन कबीर कह तकी मयाना । तुम कीनो चेटक हम जाना ॥

सारखी-अबहि तोहि कीमा करे, देग मूढ़ि देव आँच ।
देव आँचदे बाँचिहो, तो कबीर तुम साँच ॥
कहै कबीर सुन शेखतकि, करो जो तुम मनभाव ।
हम जैसेको तैसा, देग आँच दिलवाव ॥

चौपाई

तुम नाटक चेटक मन लावा । हमरे चेटक नाम प्रभावा ॥
शेखतकी तुम आप हो जैसे । हमको तुम मति जानो तैसो ॥

सारखी-कीमा करने कारने, शेख घालो तरवार ।
खांडा गहि शिर ना कटै, शेखतकी गे हार ॥
कहै तकी इहि जोलहा, बाँध्यौ खांडा मोर ।

( १४२ )

बोधसागर

ताते देही ना कटै, लगै अत्र हो भोर ॥
देग मुसल्लम मूँदेहूँ, मोहड़ा मूँद रिसाय ॥
आप आँच दिलवावई, ठाढ़ कतहुँ नहिं जाय ॥

चौपाई

देख लोग सब बहुत तमासा । हम पुनि गये सिकन्दर पास ॥
साखी-शाह सिकन्दर पीरपै, खबरि पठाई साँच ।
है कबीर पास हमारे, काहि दिलावो आँच ॥

चौपाई

सो सुनि तकी देग मुख खोला । सुन्न देखि वाको मन डोला ॥
आतुर तकी शाहपै आये । हमैं देखि पुनि शीश डोलाये ॥
बहुरि तकी लज्जित है कहई । जोलहापै कल्लु चेटक अहई ॥
साखी-देग अत्र जल बांचेऊ, नहिं व्यापै तन पीर ।
बहुरि अग्नि जरि बाचिहौ, तो तुम साँच कबीर ॥

चौपाई

विहँसि कबीर कहै सुन शेखा । करो जो आवैं तुमरे लेखा ॥
शेखतकी बहु काठ मँगाया । अति विस्तार अँबार लगाया ॥
साखी-ताहि बीच मोहि मूँदके, दीन्हेसि अग्नि लगाय ।
अग्नी धाय बुतानी, जन कबीर गुन गाय ॥

चौपाई

कहै तकी यह बाँध्यौ आगी । याको चेटक सब पर लागी ॥
तब जानो तुम साँच फकीरा । धरती गाड़े बचे कबीरा ॥
कहैं कबीर सत नाम प्रतापा । कतहुँ नहिं व्यापै तनतापा ॥
साखी-तुम मति चूको शेखजी, करो जो तुव मन होय ।
कहैं कबीर मोहि डर नहीं, निर्भय नाम समोय ॥

चौपाई

शेखतकी पुनि कूप खुदाये । गर पग बाँधि ताहिमें नाये ॥

स्वसमवेदबोध

( १४३ )

साखी-ईटा पाथरते भरे, दीनो रूप सुँदाय ।
कहै तकी अबकी मरे, ऐसो करे खुदाय ॥

चौपाई

शेखतकी अल्लाह मनावै । अबकी बार न जीअत आवै ॥
हम पुनि गये शाहके पास । तबहि सिकन्दर वचन प्रकासा ॥

साखी-कहै सिकन्दर पीर सुन, किसको गाड़ो रूप ।
सो कबीर इहँ बैठ हैं, अदभुत ख्याल अनूप ॥

चौपाई

शेखतकी व्याकुल है बोले । नैन नासिका मस्तक डोले ॥
साखी-यहि जोलहाके पासमें, तारो गुटका आहि ।
ताते गाड़े नहीं मड़े, जरे न काटा जाय ॥
अब गहि कर पग बांधिके, हाथी देव हुलाय ।
हाथी धरि धरि चीरि है, तब कछु नाहि बसाय ॥
खूनी पील मँगायकै, दीन्हेसि मद्य पिलाय ।
कर पग बँधि हाथी हुले, हाथी चला पराय ॥
केतनो करै महाउत, गज सम्मुख नहीं आव ।
कहै तकी अब तोपके, मोहड़े राखि उड़ाव ॥
गोला दारू भरि दिहसि, राखे मोहड़े तोप ।
कहै कबीर सतनाम बल, निर्भय रहौ निशोक ॥
चले सिकन्दर निज घरे, हमकहँ लीने साथ ।
शेखतकी झूँसी रहे, शाह इलाहाबाद ॥

चौपाई

काशीके ब्रह्मन अरु काजी । मुरछि रहे सब हिरफत बाजी ॥
साखी-एक घौस गंगा तटे, बैठ सिकन्दर शाह ।
शेखतकी हमहू तहाँ, मुरदा यक बहा जाय ॥

नं. ९ कबीरसागर - ६

( १८४ )

बोधसागर

चौपाई

कहै तकी सुन फकर कबीरा । मुरदा फेर जिलावहु धीरा ॥

साखी-कहै कबीर गरीब हम, तुम बादशाहके पीर ।

मुरदा तुमहि जिलावहु, सतगुरु कहै कबीर ॥

चौपाई

शेखतकी चितवै चित लाई । अल्लह मुरदा देहु जिलाई ॥

साखी-अल्लह पीर मनाइया, शेखतकी बहु बार ।

मुरदा जिंदा न हुवा, बहिगो रेत मझार ॥

चौपाई

शेखतकी कह सुनो कबीरा । मुरदा तुमहि जिलावहु फीरा ॥

साखी-उठि मुरदाहि हम चितवा, दूरते नरे आय ।

कुदरत निर्भय नामके, मुरदा फेर जिलाय ॥

मुरदेको अस बोलेऊ, उठ कुदरत कम्माल ।

कर कुबड़ी धर टेकिऊ, सजि जिव भया सो बाल ॥

चौपाई

सुत कमाल कहि उत्तर दीना । उठि कमाल तब अस्तुति कीना ॥

गुरु सत्त जो कही कमाला । गुरु कबीर मोहि कीन निहाला ॥

साखी-कहै कमाल पुकारिके, गुरु हैं सत्य कबीर ।

मुरदेसे जिंदा किया, गन्दी गली शरीर ॥

शेखतकी मन मूछिके, कह धनि धन्य कबीर ।

तुम अल्लाह खुदाय हो, तुम मेरे गुरु पीर ॥

कहै कबीर सुन शेखजी, तुम औलियाकि जात ।

रोजा निमाज कर बंदगी, बैठो नबी जमात ॥

जो अल्लह फरमाया, सो नहिं करता कोय ।

हलाल हराम चीन्है नहीं, कैसे मुसलिम होय ॥

स्वसमवेदबोध

( १४५ )

सारखी-जबतक दर्द पराई, दिलमें आवै नाहिं ।
कोटि बंदगी खता है, परै सो दोजखमाहिं ॥
जैसा दिल है आपना, तैसा सबका जान ।
दर्दमन्द अल्लह मिलै, कहै कबीर प्रमान ॥
शाह सिकंदर तकी मिलि, ठाढ़ भये करजोर ।
बकसो चूक कबीर तुम, जो कछु औगुन मोर ॥

चौपाई

कहै कबीर सुनो शाह प्यारे । तुम हमार कछु नाहिं बिगारे ॥
तुमरे पीर जो कसनी लीना । खरा खोट हम सबही चीन्हा ॥
हम नाहिं देहि बददुवा काहू । जो मम अरि हम सेवत वाहू ॥
हमरे मित्र दुष्ट कोइ नाहीं । सब हमरेमें हम सबमाहीं ॥
हम काहूको कहा सरापै । करै सो तैसो फल ले आपै ॥

सारखी-जैसो बीज कोइ बोइहै, तस फल चाखै आप ।
कह कबीर सत कहत हौं, मोहिं पुण्य नाहिं पाप ॥
कहर कुफुर दिल दोजखी, मोम दिलमें हर फकीर ।
निरभय नामसो समरथ, सतगुरु कहैं कबीर ॥

चौपाई

ऐसे कहि काशी चलि आये । धर्मदास तोहि सैन बुझाये ॥

सत्यकबीर वचन--चौपाई

रोग सोग बहु दुःख हटाये । केते परचाको देखलाये ॥
मृतकको दीनो जिव दाना । सो कछु इहां न करौं बखाना ॥
सोइ प्रसंग बढ़ुरि अब गार्ई । कलिमें जिमि प्रभु पंथ चलाई ॥
सत्य कबीरके शिष्य सुजाना । चार गुरु जो कीन प्रमाना ॥
तिनमें धर्मदास बड़ अंशा । वंश बयालिस जासु प्रशंसा ॥

बो० सा० १/

( १४६ )

बोधसागर

धर्मदास धरनीमें आये । करि प्रपंच तिहि काल भ्रमाये ॥
धर्मदास सुकृत औतारा । भूलयौ पुरुष नाम निज सारा ॥
प्रतिमा पूजामें लपटाई । परमपुरुषकी सुधि विसराई ॥
तीरथ व्रत आचार अपारा । क्रम उपाह्लाको व्योहारा ॥

पुरुष वचन--चौपाई

पुरुष अवाज उठी तिहि बारा । ज्ञानी बेगि जाहु संसारा ॥
सुकृत भवसागर चलि जाई । काल जालते गये झुलाई ॥
तिनकहैं जाय चेतावहु ज्ञानी । जाते वंश चले रजधानी ॥
वंश बयालिस अंश हमारा । सुकृत गेह लेहै अवतारा ॥
ज्ञानी बेगि जाहु तुम अंसा । धर्मदास उर मेटहु शंसा ॥

ज्ञानी वचन--चौपाई

चले ज्ञानी तब शीस नवाई । धर्मदास हम तुम लगि आई ॥
पुरुष अवाज कहा तुम पासा । चीन्हो शब्द गहो विश्वासा ॥

धर्मदास वचन--चौपाई

धनि सतगुरु तुम मोहिं चेतावा । काल जालते मोहि बचावा ॥
मैं किंकर तुव दासके दासा । लीन उबारि काटि यम फांसा ॥
मेरे चित अति हर्ष समाना । तुव गुण मोहिं न जात बखाना ॥
भागी जीव शब्द तुम माने । पूरण भागते तुव वर ठाने ॥
मैं अघकर्मों कुटिल कठोरा । रहचो अचेत भर्म चित भोरा ॥
मोहि आय तुम लीन जगाई । धन्य भाग तुव दरशन पाई ॥
कहिये मोहि जीवके मूला । रविके उदय कमल मन फूला ॥
भवसागर कौनी विधि छूटे । यमबंधन कौनी विधि टूटे ॥
करौं भक्ति कै योग कमावौं । देउँ दान कै तीर्थ नहावौं ॥
करौं यज्ञ कै इंद्री साथौं । बाहर फिरौं कि मनको बांधौं ॥
करौं अचार कि साधन साथौं । बर्त करौं कै हरि अवराधौं ॥

स्वसमवेदबोध

( १४७ )

जो तुम कहो सोइ सो करऊं । वचन तुमार हृदयमें धरऊं ॥

सत्यकबीर वचन-चौपाई

सुन धर्मदास मैं सत्य बतावों । भवसागरको दुःख मिटावों ॥
सुन धर्मदास भक्ति पद उँचा । इहि सीठी कोइ विरला पहुँचा॥
योगी योग साधना करई । भवसागर तेऊ नहिं तरई ॥
दान देय सोई फल पावै । भवसागर भुक्तैको आवै ॥
तीर्थ नहाये जो फल होही । सर्व मर्म समझावों तोही ॥
जन्म लेय सुन्द तन पावै । संपति दौरि बहुरि जग आवै॥
ऊँचे घर लेवै औतारा । ब्राह्मण क्षत्रीको व्यौहारा ॥
इंद्री साधन है अति नीका । बिना भक्ति जानो सब फीका॥
इंद्री साधन है तप भारी । तामस तेज क्रोध हंकारी ॥
कोध किये गति मुक्ति न पावै । भक्ति महातम हाथ न आवै ॥
बर्त एक भक्तिको पूरा । और बर्त कीजै सब दूरा ॥
और बर्त सब यमकी फाँसी । भक्तीबर्त मिलै अविनाशी ॥
हरि अवराधनकी सुनि बाता । कहो भेद तुम सुनियो ज्ञाता ॥
हरिहर नाम सदा शिव केरा । तातै मिटे न भवको फेरा ॥
बहुत प्रेमते शिवको ध्यावै । रिध अरु सिद्ध द्रव्य बहु पावै॥
जो मन चित निश्चय करि धरई । गिरि कैलास में बासा करई ॥
फिरके काल झपेटै ताही । डारि देय भव चक्रर माही ॥

साखी-शिव साधनकी यह गति, शिव हैं भवके रूप ।

बिन समझे यह जक्त सब, पन्यौ महा भ्रमकूप ॥

चौपाई

हरिहर नाम विष्णुको भाखा । शुभ अरु अशुभ कर्म द्वे राखा॥
इनमें करे कलोल सदाई । करे भोग जीवन भरमाई ॥
बहुत प्रीतिसे विष्णुहि ध्यावै । सो जिव विष्णुपुरीमें जावै ॥
विष्णुपुरी सो निरभय नाही । फिरि कै डारि देइ भव माही ॥

( १४८ )

बोधसागर

साखी-हरीहर नाम जो विष्णुको, जाने किय जिव जेर ।
चौरासी भरमै सदा, मिटै न भवको फेर ॥

चौपाई

हरिहर ब्रह्माको है नाऊँ । रजगुण व्यापि रहा सब ठाऊँ ॥
ब्राह्मणको पूजै संसारा । सो जिव होय न भवके पारा ॥

साखी-यहि तिनगुनकी भक्तिमें, मति भूलो भ्रमदास ।
इनके ऊपर निरगुन, तहाँ योगीको बास ॥

चौपाई

निर्गुण धाम निरञ्जन भाई । जिन सगरी उपपत्ति बनाई ॥
निर्गुणते मन भया प्रचंडा । ताते बसै सकल ब्रह्मण्डा ॥
निर्गुण अंश सकल औतारा । पीर पगंबर सब तन धारा ॥
यही निरञ्जनके पसारा । तामें अटका सब संसारा ॥
धर्मदास तुम भक्त सनेही । इनमें जनि अटकावो देही ॥
भक्त अनेक भये जग माहीं । निरभय घर कोइ पावत नाहीं ॥
भक्ति करे तब भक्त कहावै । भगतिसे रहित बचनको पावै ॥
चौदह लोक बसै भग माहीं । भगसे न्यारा कोई नाहीं ॥
सत्य नामकी खबरि न पाई । क्या करि भक्ति करो रे भाई ॥
जगमें भक्त दोय भै भारी । धू प्रहलाद सदा अधिकारी ॥
ये दोनों जन द्वै व्रत साधा । एकहि एक इष्ट आराधा ॥
ध्रुव तौ गृह तजि बाहर गयऊ । नारदको उपदेशी भयऊ ॥
छठे मास प्रकटे हरि आई । राज दियो वैकुंठ पठाई ॥
साठि हजार वर्ष करि राजू । कुट्टैब सहित वैकुंठ विराजू ॥
एक दौस जब परलय आई । ताहि बासते देय गिराई ॥
दुतिय भक्त प्रहलाद कहाई । इंद्रासनको सुख जो पाई ॥
स्वर्ग दोन चौकरी भुक्ती । बन्धनभावते भई न भुक्ती ॥

स्वसमवेदबोध

( १४९ )

साखी-इंद्रराजको भोगिके, फिर भवसागरमाहिं ।
यह सर्गुनकी भक्ति है, निर्भय कबहुँ नाहिं ॥

धर्मदास वचन-चौपाई

कौन भांतिते करिये भक्ती । सतगुरु मोहि बतावो युक्ती ॥
निर्गुन सद्गुण पार लखावो । तीसर न्यारा मोहि लखावो ॥

सत्य कबीर वचन-चौपाई

एक पुरुष है अगम अपारा । सब घट व्यापक सबसे न्यारा ॥
ताको भक्ति करै जो कोई । ताको आवागमन न होई ॥
आदि ब्रह्म नहिं था ओंकारा । निर्गुन रूप नहीं विस्तारा ॥
नहिं तब बीज नहीं अंकुरा । आदि भवानी चन्दन सूरा ॥
पुरुष कहो तो पुरुषो नहीं । पुरुष भया मायाके माहीं ॥
शब्द कहो तो शब्दो नहीं । शब्द भया मायाके माहीं ॥
द्वै विन होय न अधर अवाजा । कहो काहिं यह काज अकाजा ॥
नाम कहो तो नाम न ताको । नामराय काल है जाको ॥
है अनाम अक्षरके माहीं । निह अक्षर कोइ जानत नाहीं ॥
धर्मदास तहैं बास हमारा । काल अकाल न पावै पारा ॥

धर्मदास वचन

धर्मदास कह सुनो गोसाँई । इन बातें बनबेकी नाहीं ॥
संशय किये एक ही ओरा । तुम ही हते कि है कोइ ओरा ॥

सत्य कबीर वचन चौपाई

जौ परतीति होय उर तोरे । भवको मेटि संग रहु मोरे ॥
आदि पुरुष निहअक्षर जानो । देही धरि मैं प्रकट बखानो ॥
मोहि न व्यापो जगकी माया । कहन सुननको है यह काया ॥
देह नहीं अरु दरसे देही । रहौं सदा जहँ पुरुष विदेही ॥
गुप्त रहौं नाहीं लखि पाया । सो मैं जगमें आनि चेताया ॥

( १५० )

बोधसागर

चारों युगमें चारों नाऊँ । माया रहित रहौं सब ठाऊँ ॥
सबसे कहौं पुकारि पुकारी । कोई न मानै नर अरु नारी ॥
इनको दोष कछु नहिं भाई । धर्मराय राख्यो बिलमाई ॥

धर्मदास वचन-चौपाई

हे स्वामी मैं तुमको चीन्हा । आदि अंतको भेद सब लीन्हा ॥
तुम ही वार तुमहि हो पारा । तुमहीते उपजा संसारा ॥
समरथ सब गति पाई तोरी । अब सब संशय छूटी मोरी ॥
अब यहि भवमें बहुरि न आवों । तुमरे चरणकमल चित लावों ॥

सत्य कबीर वचन-चौपाई

कहै कबीर सुनो धर्मदासा । सकल भेद मैं कीन प्रकाशा ॥
अब तुम भक्ति करो चित लाई । सेवो साधु तजि मान बढ़ाई ॥
पहिले कुल मरजादा खोवै । भयते रहित भक्त तब होवै ॥
सेवा करो छोड़ि मत दूजा । गुरुकी सेवा गुरुकी पूजा ॥
गुरुसे करे कपट चतुराई । सो हंसा भवभ्रममें आई ॥
ताते गुरुसे परदा नाही । परदा करे रहै भवमाहीं ॥
गुरु है मात पिता गुरु सेवा । गुरु सम और नहीं कोइ देवा ॥
गुरुसे अन्तर कबहुँ न करिये । सर्वस ले गुरु आगे धरिये ॥

साखी-गुरुकी महिमा अगम है, शिव विरंचि नहिं जान ।

गुरु सतगुरुको चीन्हि के, पावै पद निरबान ॥

धर्मदास वचन

साखी-कर्म भर्म भव भार सब, दिया भारमें झोंक ।
सतगुरुके परतापते, मिट गया सबही धोख ॥

इति

अथ धर्मदासजीकी कथा-चौपाई

धर्मदासकी कथा बखानो । वैश्यके कुल तनधरि प्रकटानो ॥
धर्मबइल्लव परम अचारी । जासु सुजस गावै संसारी ॥

स्वसमवेदबोध

( १५१ )

धर्मदास गुरु चरनन परेऊ । तनमनधनतृणसम परिहरेऊ ॥
छप्पनकोटिकि संपति सारी । दियौ लुटाय सो रंक भिखारी ॥
एकै पुत्र परम प्रिय जाही । तजत बार नहिं लायौ ताही ॥
नारि पुत्र तजि भये उदासी । धर्मधुरंधर गुन गन रासी ॥
तन मन गहे भक्ति सो गाढ़ी । सतगुरुचरनप्रीति अति बाढ़ी ॥
परल्यौ ताको भक्ति प्रभावा । तब तेहि सतगुरु बचन सुनावा ॥
धर्मदास सुनिये मम बानी । तुमरे गृह प्रकटैगो आनी ॥
दशमें मास लेइ औतारा । हंसन काज देह निजु धारा ॥
सो जीवन को पार लँचावै । वंशकेर कँडिहार कहावै ॥
मेरे बचनते सो तन धारे । बचन सुरामनि नाम पुकारे ॥

धर्मदास बचन--चौपाई

हे प्रभु हम इद्री बस कीना । कैसे अंश जन्म तौ लीना ॥
धर्मदास अस बचन सुनाई । तब सतगुरु तिहि कह्यौ बुझाई ॥
पुरुष नाम धर्मन लिखि देहो । ताते अंश जन्म जो लेहो ॥
लखो सैनमें देहुँ लखाई । धर्मदास सुनिये चित लाई ॥
लिखो पान पूरुष सहिदाना । आमिन देहु पान परवाना ॥
धर्मदास आमिनिहि बोलाई । ले सतगुरुके चरन टिकाई ॥
धर्मदास परवाना दीना । आमिन पाय दंडवत कीना ॥
दशये मास जब पूजी आसा । प्रकटे अंश सुरामनि दासा ॥
सतगुरु बचन ते प्रकटे आई । बचन सुरामनि नाम कहाई ॥
मुक्तामनि पुनि नाम है ताका । जाते चली वंशकी साका ॥

इति

अथ चारों गुरुकी कथा--चौपाई

स्वसमवेद सतगुरु मुख बानी । चौदह कोटि ज्ञानकी खानी ॥
तत्त्व ज्ञान पुनि ताते काढ़ा । चारो वेद कान तिहि ठाढ़ा ॥
ऋग यजु साम अथर्वन चारो । ताते सब जग धर्म प्रचारो ॥

( १५२ )

बोधसागर

स्वसमवेदको चारो अंगा । ताते भये अनेकन ढंगा ॥
चारो वेद चहुँ गुरु गहेऊ । परमपंथ जाते जिव लहेऊ ॥
चारो गुरुकी कथा बखानो । सुकृत आदि भेद ग्रंथ प्रमानो ॥

इति

अथ प्रथमगुरु भवसागरमें उत्तर दिशा गोसाई धर्मदासजी-चौपाई

लोकमें सुकृत अंश कहलाई । भवसागर धर्मदास गोसाई ॥
उत्तर दिशा तासु गुरुवाई । गहि ऋगवेद जो पंथ चलाई ॥
जम्बूदीपो भारथ खंडा । प्रकटै गढ़बानौ महि मंडा ॥
सो गह कोट ज्ञानकी बानी । पंथ प्रचार कीन रजधानी ॥
वंश बयालिस ताने पाया । भवसागरमें पंथ चलाया ॥

इति

अथ धर्मदासजीके बयालिस वंशके नाम

दोहा-बचन सुरामनि प्रथम कह, बहुरि सुदर्शन नाम ।
कुलपति नाम प्रमोद गुरु, कौल नाम गुणधाम ॥
नाम अमोल कहाव पुनि, सुरति सनेही जान ।
हक्क नाम साहिब कहो, पाक नाम परधान ॥
प्रकट नाम साहिब बहुरि, धीरज नाम कह फेर ।
उग्र नाम साहेब कहो, उदै नाम पुनि टेर ॥
गीर्ध नाम साहिब तथा, नामप्रकाश कहाय ।
उदित मुकुन्द बखानिये, अर्ध नाम पुनि गाय ॥
ज्ञानी साहिब हंस मनि, सुकृत नाम अर्जनाम ।
पुनि रसनाम रु गंगमनि, परस नाम अभिराम ॥
जागृत नाम अरु भृगमनी, अकह कंठमणि होय ।
पुनि संतोषमनी कहो, चात्रिक नाम गनोय ॥
आदि नाम नेह नाम है, आदिनाम महानाम ।

स्वसमवेदबोध

( १५३ )

पुनि निज नाम बखानिये, साहेबदास गुणग्राम ॥
उद्दैदास करु नाम पुनि, दृगमनि महामनि हंस ।
मुक्तामनि धर्मदासके, बिदित बयालिस वंस ॥

अथ बयालिस वंशकी स्थिति वर्णन—चौपाई

वंशबयालिसकी थिति भाखों । सत्य कबीर प्रमान जो राखों ॥
बीस द्यौस अरु वर्ष पचीसा । सिंहासन थिति येती दीसा ॥
वर्ष पचीस बीस दिन केरी । भोग पूर्ण थित हो जिहि बेरी ॥
गद्दी सौंपे जो अधिकारी । निज इच्छा पर धाम पधारी ॥
जबलों थित करार नहि पूजै । तबलों राजसिंहासन भूजै ॥
तिनको कबहुँ न मृत्युकी पीरा । अमर कीन तेहि सत्यकबीरा ॥
गद्दीको करार नियरावै । सन्त महंत खबरि तब पावै ॥
सुने सन्त पृथ्वी चहुँ खूटे । दर्शन हेत जाय तहँ जूटे ॥
लेहि चलानेको जब बीरा । जग प्रत्यक्ष निरखे तेहि तीरा ॥
यहि विधि आप लोकचलि जाई । सन्त महन्त बिदा तब पाई ॥
हंसन प्रति गद्दी थिति ऐसे । वंश बयालिस भै जे जैसे ॥
संवत पंद्रहसौ अरु बीसा । वंश थाप तेहि समयसे दीसा ॥
जब तेरही पीढी चलि आवै । मुक्तामनि तबही प्रकटावै ॥
धर्म कबीर होय परचारा । जहाँतहँ सतगुरु सुयस उजारा ॥

इति

अथ दुतिये गुरुभवसागरमें दक्षिण दिशा गोसाईं चतुर्भुजदासजी—चौपाई

लोकमें अकह अंश परकाशा । महिमें सोई चतुर्भुजदासा ॥
दक्षिणदिशि गुरु ताहि प्रसंशा । ताके हैं सत्ताइस वंशा ॥
यजुरवेद विधि पंथ चलाई । कुशहर द्रौप माहिं प्रकटाई ॥
नय करनाटक तेहि रजधानी । गह टकसार ज्ञानकी बानी ॥

इति

( १५४ )

बोधसागर

अथ चतुर्भुजदासजीके सताइस वंशके नाम--चौपाई

प्रथम प्रेम कह दुतिय हुलासा । तीजे अन्हंद चौथ विश्वासा ॥
पंचम हित प्रीति है छठवें । सतवें निरख बिबेक है अठवें ॥
नौवें सत् छमा दशमें वद । ग्यरहें धीरज बरहें अनहद ॥
तेरहें शील संतोष चौदहें । पंद्रहें सुमति बुद्धि सोरहें ॥
सत्रहवें पुनि भक्ती जाना । उन्निस दया बीसवें जाना ॥
एकिस कृपा विचार बाइसे । एकपन तेइस मोक्ष चौबिसे ॥
पचिसवें मेद छबीसवें मोखा । सताईसवें सुमती चोखा ॥
लोकमें यह सब नाम कहाये । महिमें न्यारे नाम धराये ॥

इति

अथ तृतीये गुरुभवसागरमें गोसाई बंकेजी पूर्वदिशा--चौपाई

लोकमें जो हं अंश कहाया । भवसागर बंकेजी राया ॥
सोलह वंश तासुके होई । पूरब दिशिमें प्रकटे सोई ॥
पुश् द्रौप दरभंगा नगरे । सामवेद मम भाषे सगरे ॥
सो गहि मूलज्ञानकी बानी । पंथप्रचार आपनो ठानी ॥

इति

अथ राय बंकेजीके सोलह वंशके नाम जो लोकमें प्रसिद्ध हैं--चौपाई

माया प्रथम कर्म दुसरोई । तीसर अदल अष्ट कह सोई ॥
चौथ निरंजन छत्र मुनि पंचम । छठे आपमुनि पेख मुनिसतम ॥
अठयेजीत मुनिनौमशीतलमुनि । दशमें भृगुमुनि ग्यरहे कंठमुनि ॥
बरहे कलंकमुनि तेरहे गंगमुनि । चौदहे बिहंगमुनि पंद्रहेसोमुनि ॥
मुनि सो रहे जलरंग गोसाई । षोडशवंश केरि गुरुवाई ॥

इति

अथ चौथे गुरुभवसागरमें गोसाई सहतेजी पश्चिमदिशा--चौपाई

अंश हिरम्मर लोकमें होई । सहतेजी भवसागर सोई ॥

स्वतमवेदबोध

( १५५ )

पश्चिम दिशा करें गुरुवाई । वेद अथर्वन ताने पाई ॥
शालमलय जो द्वीप कहाई । मानपुर शहरमें सो प्रकटाई ॥
कथे ज्ञान लहि बीजक बानी । सात वंश ताके परमानी ॥

इति

अथ सहतेजीके सातवंशके नाम--चौपाई

प्रथमवर्ष पारस कहवाये । दुतिये स्वातिसनेही गाये ॥
तीजे भृंगसमीप बखानी । चौथे लहरसिंधु कहि गानी ॥
पञ्चम दीपक ज्योति कहाई । पुनि जलभाष षष्ठमें जोई ॥
सप्तम मलयागिर कहि टेरा । सात वंश सहतेजी केरा ॥
निज निज वंशन युत गुरुवारी । सत्यकबीरको धर्म प्रचारी ॥
जक्त जीवको कर उपदेशा । परम धरमको कहे सँदेशा ॥
इनते इतर पंथ बहुतेरो । सत्यकबीरकी कृपा चनेरो ॥

इति

अथ सत्यकबीरके बारह पंथ वर्णन--चौपाई

बारह पंथके नाम बतावो । प्रथम नरायणदास कहावो ॥
जेठ पुत्र धर्मदासके सोई । जागू पंथ दूसरो होई ॥
तीजे सुरति गोपाल पुकारा । मूल निरंजन चौथ उचारा ॥
पंचम पंथ आहि टकसारी । छठवाँ भागू पंथ पसारी ॥
सो बीजक ले ज्ञान सुनाया । सतयेमें सतनामी आया ॥
अष्टम पंथ कमाली होई । नौमें राम कबीर कहोई ॥
दशमें प्रेम धामकी बानी । ग्यरहें जीवा पंथ बखानी ॥
बरहें एक अचारज आयौ । अपनौ नाम कबीर बतायौ ॥
बारह पंथ सुयश गुरु गैहैं । सतगुरु कृपा परमपद पैहैं ॥

इति

( १५६ )

बोधसागर

अथ सत्य कबीरके इतरपंथ वर्णन चौपाई

प्रथमें नानक पन्थ बखानो । पानप बहुरि पंथ कहि गानो ॥
दास मलोक पन्थ परचारा । बहुरि गरीबदास विस्तारा ॥
इत उत देशन देशन माहीं । सत्यकबीर पन्थ जहँ ताहीं ॥
जहँतहँ देखो सत्य कबीरा । हिंदू मुसलमान गुरु पीरा ॥
निज इच्छाते सो तन धारे । कालजालते जीव उबारे ॥
कबहुँ योनि संकट नहि आवै । जीव दया करि सतगुरु ध्यावै ॥
जिन जिन सतगुरुको पहिचाना । सो अवश्य लह पद निर्बाना ॥

शब्द

हम बसैं चामके धाम हमें कोई क्या जाने ॥
पशुपंछी नरनाग जहां लगि सबै चामको साज ।
चामै चामको दाम बटोरै चामरंगको राज ॥
चामै मांडै चामै पोवै चामै करै रसोई ।
चामै चामको परसि जिवावै चाम करे सो होई ॥
चामै गावै चाम बजावै चाम करावै नाच ।
चामै चामको भाव बतावै चाम बीच है सांच ॥
कहैं कबीर सुनो भाई साधो हम हैं पूरे चमार ।
जो कोई हमको पहिचानै उतरे भवनधि पार ॥

सो गुरु खोज सो सन्त सुजाना ॥

जो गुरु खोजि अमरघर आवै पावै मूल ठेकाना ।
जिन गुरु गुरु पञ्च निरमाये रच्यौ जमीं असमाना ॥
तिनके कर्म कटे भवबंधन जिन ओहिगुरुको जाना ।
टीका मूल बिनपरगट कीनो चौदह कोटि जो ज्ञाना ॥
नहीं बोल भाषामें आवै शब्दसैन सो जाना ।
आशा बन्धते परगट कीनो जो जैसे अनुमाना ॥

स्वसमवेदबोध

( १५७ )

सारशब्द दियौ है पुरुषने आप तो गुप्त रहाना ॥
जिहि पारसते पुरुष ददाने करि चौका बंधाना ।
कहैं कबीर ये अगम गुरु है सही छाप परवाना ॥
दोहा-जेते पंथ कबीरके, भिन्न भिन्न विधि थाप ।
कहैं चौका अरु आरती, कंठी माला छाप ॥
तिलक रु कंठीमात्र कहैं, कहैं शब्दहि निरधार ।
कहैं आँढ़ कहैं भिन्न कछु, सबको तारन द्वार ॥
कोई त्रिगुणकी भक्तिमय, कोई तिनते न्यार ।
योग युक्ति करि सुक्तिपद, पावत यहि संसार ॥

इति

अथ नारायणदासजीकी कथा--चौपाई

धर्मदाससुत दास नरायन । भिन्न कथा कछु तं सु बतायन ॥
न्यारो पंथ आपनो ठाना । बारह पंथमें तासु मिलाना ॥
वंश माह द्वै भेद बखाना । प्रथम नारायणदासहि जाना ॥
वचन चुरामणि दुतिय बताई । वंशकेरि कड़िहारी पाई ॥
दोनो जगमें पंथ चलावैं । धर्मदासके वंश कहावैं ॥

इति

अथ जगजीवनदासजी सत्यनामकी कथा--चौपाई

सतनामी जगजीवन दासा । अवध देशमें पंथ प्रकाशा ॥
कोटवा नग्रमें सो प्रकटाना । आहि मध्यमहि हिंदुस्थाना ॥
राजपूत कुल कर ठकुराई । सतगुरु कृपाते पंथ चलाई ॥
न्यारो ज्ञान आपनो भाखा । ताके भई बहुत शिषसाखा ॥
कारी तिलक देहिं निज माथा । आन्दू बाँधें अपने हाथा ॥
आँढ़ एक भांतिको धागा । कंठीके बदले कर लागा ॥

इति