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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

स्वतमवेदबोध

( १३३ )

नीरू नीमा जोलह जोलाही । काशी नग्र बसै दोड ताही ॥ ताही नग्र कवीर तलाई । कमल पुष्प तामें रह छाई ॥ बालक रूप तहाँ हम लीने । कमल पुष्प पर आसन कीने ॥ तहैं बारह बालक पौढाऊ । करे कुटूहल बाल सुभाऊ ॥ तिहि औसरमें नीरू जोलाहा । नारि गौन सँग ल्यावै ताहा ॥ तृषावंत जब मै सो नारी । तालपै जल अँचवन पग धारी ॥ नीमा दृष्टि बाल पर परेऊ । देखत दृश मोद मन भरेऊ ॥ जिमिरविदृश पद्म विकशाना । धाय धरचो धन रंक समाना ॥ तब सो बालक लियौ उठाई । ले बालक नीरूपहैं आई ॥ क्रोधवन्त जोलहा तब भैऊ । नीमासे तब ऐसे कहेऊ ॥ काको बालक तैं लै आई । नग्रमें मेरी होय हँसाई ॥ नग्रके लोग हँसैगे मोही । गौनहि तिय बालक सँग जोही ॥ जोलहा रोष कीन तिहि वारी । बेगि देहु तुम बालक हारी ॥ हर्ष गुना बनि नारी लाई । तब हम तासे बचन सुनाई ॥

बाल वचन

छन्द-सुनहु बचन हमार नीमा तोहि कहीं समुझायके । पिछली प्रीतिके कारने तोहि दृस दीनो आयके ॥ आपने गृह लै चलो मोहि चीन्हिके जौँ गुरु करो । देहुँ नाम दृढाय तुमको फंद यमके नहि परो ॥ सोरठा-सुनत बचन अस नारि, नीरू त्रास न राखेऊ । ले गई नग्र मझार, काशी नगर पहुँचेऊ ॥

चौपाई

लै बालक जब घरको गैऊ । नग्र लोग सब देखत भैऊ ॥ नग्र नारि नर हाँसी लाई । नारि गौन सँग बालक ल्याई ॥ जोलहा सुनि सुनि लाजित होई । बाल वृतांत कहै सब सोई ॥

( १३४ )

बोधसागर

यह बालक तलावमें पाईं । नीमा देखि ताहि लै आई ॥ कमलपुष्प शिशु सेज बनाई । हरषित नारि सो लियौ उठाई ॥ जोलहा यद्यपि कथा प्रकासी । तऊ लोग सब करते हाँसी ॥ बहुत घौस तिहि भौन रहाऊ । जोलहा जाने बालक भाऊ ॥ बालक रूप तासु ग्रह रहते । खानपान तहँ नहिं कछु गहते ॥ बिन भोजन तन छवि सरसाई । दिन दिन देहकी दीरघताई ॥ जोलहा पुनि पंडितन बोलाये । बालक नाम धरनको आये ॥ पंडित करन जो लगे बिचारा । तब शिशु निजमुख बचन उचारा ॥ नाम कबीर हमारा अहई । और नाम जनि पंडित कहई ॥ यह सुनिके सब चकृत भैऊ । शिशु निजनाम आपते कहेऊ ॥ कोइ कहै यह दानौ देवा । कोई कहै यह अलख अभेवा ॥ कोई ईश्वर अंश बतावा । कोइ कह आप देह धरि आवा ॥ पंडित निज निज भौन सिधारा । बिन भोजन बीते बहु बारा ॥ जोलहा तब मनमें दुख पाईं । भोजन करो कबीर गोसाईं ॥ जोलहजोलाही दुखित निहारी । तब हम तिनते बचन उचारी ॥ कोरी यक बछिया ले आवो । कोरा भांडा एक मँगावो ॥ ततछन सो जोलहा चलि जाई । गऊ कि बछिया कोरी ल्याई ॥ कोरा भांडा एक गहाई । भांडा बछिया शीघ्रही आई ॥ दोऊ कबीरके सम्मुख आना । बछिया दिशाहछि निज ताना ॥ बछिया हेठ सो भांडा धरेऊ । ताके थनहि दूधते भरेऊ ॥ दूध हमारे आगे धरही । यहिबिधि खानपान नित करही ॥ तबसे जोलहा डरै बहुत । हमरे घर है अचरज पूता ॥ केते दिन यहि विधि चलिगैऊ । संग बालकन खेलत भैऊ ॥ कथै बालकन प्रति विज्ञाना । सो जड़वत नहिं कछु पहिचाना ॥ तब साधुन सँग गोछि कराही । अगम ज्ञान कथ तिनके पाही ॥

स्वसमवेदबोध

( १३५ )

सुनि साधुन मन अचरज होई । यह तो सिद्ध पुरुष है कोई ॥ सब जोलहा मिलके एक बारा । नीरू ते अस बचन उचारा ॥ बालककी सुन्नत करवावो । तिहि कारन सब साज मँगावो ॥ ताहि काल अस कथा कहाई । नाई सुन्नतको बोलवाई ॥ तब नाई कबीर ढिग आया । ले अस्तुरा निकट नियराया ॥ पांच इंद्री ताको दिखलावो । काटि लेहु जो तोहि मनभावो ॥ यह लखि भभरिके नाई भागा । सुन्नत नहीं कीन डर लागा ॥ पुनि जोलहन अस कौतुककीना । तब बोलाय काजीको लीना ॥ एक गाय तिहि काल मँगाई । काजी ताको जबह कराई ॥ जिहि औसर अस कौतुक ठाना । सत्यकबीर मरम सब जाना ॥ खेलत रहे बालकन माहीं । तेहि छन धायके पहुँचे ताहीं ॥ गऊ घात जब देखत भैऊ । दया धारि काजीते कहेऊ ॥ बहुबिधि काजीको समुझाई । महापाप जिव घात बताई ॥ काजी लज्जित है शिर नायौ । बिनती करै न उत्तर आयौ ॥ तबहि कबीर गऊ ढिग जाई । मरी गाय तिहि काल जिवाई ॥ तब जोलहा गृह तजे कबीरा । अब नहिं रहौं तुमारे तीरा ॥ विकल भये तब नीमा नीरू । नग्र चहुँ दिश बालक हेरू ॥ दूँदत सुत न लहौ नर नारी । रुदन बिलाप करै दोउ भारी ॥ विकल विलोकि दया उर आई । तब कबीर तेहि दियो देखाई ॥ नीरू नीमा बिनती करही । प्रभु हमरे गृह पुनि पग धरही ॥ तब हम तिनते बचन उचारी । ऐसो पाप कीन तुम भारी ॥ तब जोलहा बोलै शिर नाई । नहिं यह पाप मेरी समताई ॥ मिल जोलहन कीनी बरियाई । ताकी खबर न मैं कहु पाई ॥ तापर कृपा बढुरिकै कीना । पुनि ताके गृहमें पग दीना ॥ बाल चरित्र है विविधि विधाना । सो संकेत न होय बखाना ॥

( १३६ )

बोधसागर

चरचा जग अनेक परचारा । कछुकसोलिखौं होय विस्तारा॥ रामानंद गुरु जिमि गहेऊ । वेद मते प्रथमै सो कहेऊ ॥ केते ध्योस जोलहा गृह बासा । अजौं न ता हिय ज्ञान प्रकासा॥ बार बार तेहि नाम हटाई । तिनको नहिं प्रतीत गुरु आई॥ बालक जानि न गुरुपद गहेऊ । ताते परमधाम नहिं लहेऊ ॥ जोलहाकी जब आयु पुराई । मथुरा नग्र देह घर जाई ॥ सकल कथा मैं कीन प्रकाशा । जिमिगुरुकर जोलहा गृहवासा॥ श्वपचके मातु पिता जो रहेऊ । श्रीपाकुलपति नाम सोकहेऊ॥ बहुरि लछमना नरहर सोई । नीमा नीरू सोई होई ॥ तिन दुहुँके तारणके काजा । जोलहा गुरुगृह आनि विराजा॥ गर्भवास कबहुँ नहिं आवै । निज इच्छा नर तन दरसावै ॥ हिंदू मुसलमान नहिं सोई । बाल बृद्ध अरु युवा न होई ॥ दाय़ा करै देह नर धरही । जीव अनंत कोटि ले तरही ॥ जरा मरण कबहुँ नहिं ताही । सदा समान एकरस आही ॥ सो वृतांत अब करो बखाना । जिमि कबीर काशी कथ ज्ञाना॥ षट् दरसन झगरनको आवै । अगम ज्ञान सबको समुझावै ॥ सत्यपथको कीन प्रचारा । हिंसा कर्म निंद निरधारा ॥ तीरथ व्रत अरु मूरति पूजा । जीव हने ईश्वर कथ दूजा ॥ जीवघात करिहै जो कोई । वासा तासु नरकमें होई ॥ पाहन को पूजै पाखंडी । गल काटै जो सम्मुख चंडी ॥ बकरा मुरगा जबह जो करही । विस्मिच्छह कहि धर्म उचरही॥ सो सब पापकर्म बतलाये । हिंदू तुर्क सुनत दुख पाये ॥ वैरभाव दोनों कुल धरहीं । सत्यकबीर टेक नहिं टरहीं ॥ मिलि विप्रन अस युक्ति बनाई । किमि कबीरकी हुरमत जाई ॥ ऐसी गोष्ठि सबन मिलि ठाना । करि प्रपंच अस कीन बहाना॥

स्वसमवेदबोध

( १३७ )

जहाँ तहाँ बहु विप्र सिधारा । सत्यकबीर केर भंडारा ॥ निवता दियो चहुँ दिश जाई । साधुनकी जमाति चलिआई ॥ भीर भई साधुनकी भारी । गृह तजि सत्यकबीर सिधारी ॥ आयके विष्णु भये भंडारी । साधुनको आदर कर भारी ॥ पोषन भरना विष्णुको कर्मा । आयके गहि लीनों निजधर्मा ॥ सत्य कबीर कर्मते न्यारा । मायाको सब खेल पसारा ॥ माया सदा जासुकी दासी । सकै कौन करि ताकी हाँसी ॥ सब साधुनको हरि सनमाने । विप्र सकल देखत खिसियाने ॥ मर्म न कोई लरुयो तिहि बारा । धन्य कबीर धन्य भंडारा ॥ दोहा-काशी कुटी कबीरपर, भई साधुनकी भीर । जो कलु किया सो हरि किया, होय कबीर कबीर ॥

चोपाई

आदर भोजन दछिना पाई । धन्य धन्य कहि साधु सिधाई ॥ काजी पंडित करें विचारा । जाय कबीर कौन विधि मारा ॥ काशीमें तेहि काल बताई । शाह सिकन्दर पहुँचा आई ॥

इति

ग्रंथनिरंभयज्ञान-सत्यकबीर वचन

साखी-कलिमहँ काशी प्रकटचौ, सुनो सन्त धर्मदास । सत्य पंथ परचारैऊ, निंदक भये उदास ॥ शाह शिकंदरके तन, भयो ज्वाल उत्पान । दुखग्याकुल अति विकलतन, काशी पहुँचा आन ॥

चोपाई

पूछै शाह ऐसा कोइ भाई । जाते मेरो कष्ट दुराई ॥ साखी-काजी पंडित मिलिके, कहा शाहसे जाय । है कबीर दरवेश यक, ताको लेहु बुलाय ॥

( १३८ )

बोधसागर

चौपाई

कहैं शाह तेहि तुरत ले आवो । साइत एक विलंब न लावो ॥ सारखी-आये धायके लोग बहु, आतुर बोले वैन । चलो कबीरा शाहपै, हम आये तोहि लैन ॥

चौपाई

गये शाहके सन्मुख जबही । ज्वाला देह दूर भइ तबही ॥ उठिके शाह भयो तब ठाढा । मोहिते अधिक प्रेम तब बाढा ॥ सारखी-शाह न छोडे हमकहँ, बढचो प्रेम मनमाहिँ । शेखतकी तेहि पीर थे, सो सुरझे मनमाहिँ ॥

चौपाई

कहैं तकी सुन शाह सिकंदर । हमते कियो तफाउत अंतर ॥ जोलहाते तुम कीनेहु यारी । हमते अन्तर कियो विगारी ॥ कह सिकंदर तुम हमरे पीरा । वह द्रदमंद द्रवेश फकीरा ॥ कहैं मारफत राहकी बाते । राखा जान जो मेरा जाते ॥ ऐसे शाह कह्यो समुझाई । तबहुँ न शेखतकी शरमाई ॥ काशीके पंडित अरू काजी । शेखतकी मिली परपैच साजी ॥ कह काजी सुनु शाहके पीरा । कैसेहु मारा जाय कबीरा ॥ यह जोलहा जौँ मारा जाई । तौ हम सबकी टरै बलाई ॥ कहैं तकी सुन पंडित काजी । क्या कबीर जोलहा है पाजी ॥ चाहो तो आतशमें जारो । चाहो टूक टूक करि डारो ॥ चाहो जलके बीच डुबाओ । चाहो देगमें आँच दिलावो ॥ चाहो हाथीसे चिरवाओ । चाहो खाक त्वचा भरवावो ॥ चाहो तो देवालमें साटो । चाहो बोटी बोटी काटो ॥ चाहो मोहडे तोप उडावो । चाहो कूपमें जितत दबावो ॥ सारखी-मेरा नाम शेख तकी, मैं सिकंदरको पीर । देखो कैसे बाचिहैं, कैसा फकर कबीर ॥

स्वसमवेदबोध

( १३९ )

काजी पंडित सब हरषाना ।जिमि पंकज विकसे लखि भाना॥ कह काजी तुमते सब होई । तुम ऐसा दूजा नहीं कोई ॥ इस जोलहेने कुपुत्र मचाया । दोनों दीनकी अदल मिटाया ॥

साखी-तीरथ व्रत एकादशी, रोजा और नमाज । ये सब कछु न मानई, कहै एक शिरताज ॥ खसी वो सुरगी गायनी, पीर निमित्त हम देह । सबको कहै कसाइ है, ऐसा काफिर येह ॥

चौपाई

काशीके लोग हमैं नहीं मानें । जोलहाकी सब सिफत बखानें ॥

साखी-भाग हमारे शेखजी, तुम इहँ पहुँचे आय । जौं यह जोलहा मारहुँ, सबको कंटक जाय ॥ कहै तकी सुन काजी, हमते बाढी रार । जीअत कबहुँ छोड़ो, न अब यहि डारो मार ॥ शेखतकी परंपंच करि, गये शाहके पाहँ । हमें देख तहँ बैठे, अधिक जरे मनमाहँ ॥ कहै तकी चित रोष धरि, सुनो सिकन्दर बात । कहा हमारा मानहुँ, तब होवै कुशलात ॥

सोरठा-यहि जोलहै तू मार, नहीं तो देगा बददुआ । तुमको करें खुवार, जान माल सब गलैगा ॥

साखी-कहै सिकन्दर पीर सुन, मोहि तुमारि पनाह । जो चाहो सो करो यहि, तुमें कोई रोकै नाह ॥

चौपाई

कहो कबीरके मारन ताँई । इहवाँ मेरी कछु न बसाई ॥ पीर फकीर जात अल्लाहा । मेरो जोर न पहुँचे ताहा ॥

( १४० )

बोधसागर

साखी—जौँ वह होतो रैअत, तौ हम करते जोर । वह अलमस्त फकीर है, तहाँ न फावै मोर ॥ तुमहु कही समुझायके, पीर फकीर अल्लाह । अब तुम कहते मारने, यह न होय हमपाह ॥

चौपाई

अहो पीरजी तुम वह एका । अपने मनमें करो विवेका ॥ उन तुमरो कछु नाहिं बिगारा । काहे तुमने कुफुर पसारा ॥ बुजरूग सब नेकी फरमावै । जोर जुलुम कछु नाहीं भावै ॥

साखी—कहा हमारा मानिये, छोड़ि दीजिये रार । कुलह सुलह दे बैठिये, अल्लह ओर निहार ॥ कहै तकी सुलतान सुन, तुमे नहीं कछु दोष । जो मैं कहों सो मानिये, कर मेरो संतोष ॥ कहै सिकंदर पीर सुन, मेरो शिर बरु लेहु । फकिर कबीर न मारिये, यह मांगे मोहि देहु ॥

चौपाई

सुनतहि तकी कोध परजारा । शिरते ताज जमीन दे मारा ॥ निपटहि बिकल देखि तिहि भाई । तब हम शाहसे कहा बुझाई ॥ कहै कबीर सुनो सुलताना । करो पीरको बचन प्रमाना ॥ कहै सिकंदर सुनो हो पीरा । मन मानै सो करो कबीरा ॥

साखी—डारहु मारि कबीरको, हम नहिं मानै उन । ताका कबहु न भला हो, करे फकरको खून ॥

चौपाई

शेखतकी तब उठे रिसाई । है कोई बांध कबीरहि भाई ॥ साखी—शेखतकी आपै उठै, काजी पंडित झार । बाँध बाँध सब कोई कहै, कोई न करे गोहार ॥

स्वसमवेदबोध

( १४१ )

बाहँ बांधि पग बांधिके, बोर गंगजल नीर । निःसंशय निश्चित सो, निरभय सदा कबीर ॥ गंगाजलपर आसन, वंद परे खहराय । जन कबीर सतनाम बल, निरभय मंगल गाय ॥ शाह सिकंदर देखही, अरु ठाढे सब लोग । धनि कबीर सब कोइ कहै, शेखतकी भा सोग ॥

चौपाई

शेखतकी तब मीजै हाथा । सुखे सुख नहिं आवै वाता ॥ शेखतकी तब कहै बनाई । अबकी कसनी बढ़ौ न भाई ॥ अबकी बार कबीरहि पावो । देगि मूढ़िके आच दिलावो ॥ देग आंचते बचै कबीरा । तो जानौ अल्लाहको नूरा ॥ कहै कबीर नाम परकासा । तासो गयौ सिकंदरके पास ॥ शाह सिकंदर उठिभे ठाढे । अधिको प्रेम तासु उर बाढे ॥ शेखतकी कह क्रोधित बैना । धुनै शीस राते भये नैना ॥ सुन कबीर कह तकी मयाना । तुम कीनो चेटक हम जाना ॥

सारखी-अबहि तोहि कीमा करे, देग मूढ़ि देव आँच । देव आँचदे बाँचिहो, तो कबीर तुम साँच ॥ कहै कबीर सुन शेखतकि, करो जो तुम मनभाव । हम जैसेको तैसा, देग आँच दिलवाव ॥

चौपाई

तुम नाटक चेटक मन लावा । हमरे चेटक नाम प्रभावा ॥ शेखतकी तुम आप हो जैसे । हमको तुम मति जानो तैसो ॥

सारखी-कीमा करने कारने, शेख घालो तरवार । खांडा गहि शिर ना कटै, शेखतकी गे हार ॥ कहै तकी इहि जोलहा, बाँध्यौ खांडा मोर ।

( १४२ )

बोधसागर

ताते देही ना कटै, लगै अत्र हो भोर ॥ देग मुसल्लम मूँदेहूँ, मोहड़ा मूँद रिसाय ॥ आप आँच दिलवावई, ठाढ़ कतहुँ नहिं जाय ॥

चौपाई

देख लोग सब बहुत तमासा । हम पुनि गये सिकन्दर पास ॥ साखी-शाह सिकन्दर पीरपै, खबरि पठाई साँच । है कबीर पास हमारे, काहि दिलावो आँच ॥

चौपाई

सो सुनि तकी देग मुख खोला । सुन्न देखि वाको मन डोला ॥ आतुर तकी शाहपै आये । हमैं देखि पुनि शीश डोलाये ॥ बहुरि तकी लज्जित है कहई । जोलहापै कल्लु चेटक अहई ॥ साखी-देग अत्र जल बांचेऊ, नहिं व्यापै तन पीर । बहुरि अग्नि जरि बाचिहौ, तो तुम साँच कबीर ॥

चौपाई

विहँसि कबीर कहै सुन शेखा । करो जो आवैं तुमरे लेखा ॥ शेखतकी बहु काठ मँगाया । अति विस्तार अँबार लगाया ॥ साखी-ताहि बीच मोहि मूँदके, दीन्हेसि अग्नि लगाय । अग्नी धाय बुतानी, जन कबीर गुन गाय ॥

चौपाई

कहै तकी यह बाँध्यौ आगी । याको चेटक सब पर लागी ॥ तब जानो तुम साँच फकीरा । धरती गाड़े बचे कबीरा ॥ कहैं कबीर सत नाम प्रतापा । कतहुँ नहिं व्यापै तनतापा ॥ साखी-तुम मति चूको शेखजी, करो जो तुव मन होय । कहैं कबीर मोहि डर नहीं, निर्भय नाम समोय ॥

चौपाई

शेखतकी पुनि कूप खुदाये । गर पग बाँधि ताहिमें नाये ॥

स्वसमवेदबोध

( १४३ )

साखी-ईटा पाथरते भरे, दीनो रूप सुँदाय । कहै तकी अबकी मरे, ऐसो करे खुदाय ॥

चौपाई

शेखतकी अल्लाह मनावै । अबकी बार न जीअत आवै ॥ हम पुनि गये शाहके पास । तबहि सिकन्दर वचन प्रकासा ॥

साखी-कहै सिकन्दर पीर सुन, किसको गाड़ो रूप । सो कबीर इहँ बैठ हैं, अदभुत ख्याल अनूप ॥

चौपाई

शेखतकी व्याकुल है बोले । नैन नासिका मस्तक डोले ॥ साखी-यहि जोलहाके पासमें, तारो गुटका आहि । ताते गाड़े नहीं मड़े, जरे न काटा जाय ॥ अब गहि कर पग बांधिके, हाथी देव हुलाय । हाथी धरि धरि चीरि है, तब कछु नाहि बसाय ॥ खूनी पील मँगायकै, दीन्हेसि मद्य पिलाय । कर पग बँधि हाथी हुले, हाथी चला पराय ॥ केतनो करै महाउत, गज सम्मुख नहीं आव । कहै तकी अब तोपके, मोहड़े राखि उड़ाव ॥ गोला दारू भरि दिहसि, राखे मोहड़े तोप । कहै कबीर सतनाम बल, निर्भय रहौ निशोक ॥ चले सिकन्दर निज घरे, हमकहँ लीने साथ । शेखतकी झूँसी रहे, शाह इलाहाबाद ॥

चौपाई

काशीके ब्रह्मन अरु काजी । मुरछि रहे सब हिरफत बाजी ॥ साखी-एक घौस गंगा तटे, बैठ सिकन्दर शाह । शेखतकी हमहू तहाँ, मुरदा यक बहा जाय ॥

नं. ९ कबीरसागर - ६

( १८४ )

बोधसागर

चौपाई

कहै तकी सुन फकर कबीरा । मुरदा फेर जिलावहु धीरा ॥

साखी-कहै कबीर गरीब हम, तुम बादशाहके पीर ।

मुरदा तुमहि जिलावहु, सतगुरु कहै कबीर ॥

चौपाई

शेखतकी चितवै चित लाई । अल्लह मुरदा देहु जिलाई ॥

साखी-अल्लह पीर मनाइया, शेखतकी बहु बार ।

मुरदा जिंदा न हुवा, बहिगो रेत मझार ॥

चौपाई

शेखतकी कह सुनो कबीरा । मुरदा तुमहि जिलावहु फीरा ॥

साखी-उठि मुरदाहि हम चितवा, दूरते नरे आय ।

कुदरत निर्भय नामके, मुरदा फेर जिलाय ॥

मुरदेको अस बोलेऊ, उठ कुदरत कम्माल ।

कर कुबड़ी धर टेकिऊ, सजि जिव भया सो बाल ॥

चौपाई

सुत कमाल कहि उत्तर दीना । उठि कमाल तब अस्तुति कीना ॥

गुरु सत्त जो कही कमाला । गुरु कबीर मोहि कीन निहाला ॥

साखी-कहै कमाल पुकारिके, गुरु हैं सत्य कबीर ।

मुरदेसे जिंदा किया, गन्दी गली शरीर ॥

शेखतकी मन मूछिके, कह धनि धन्य कबीर ।

तुम अल्लाह खुदाय हो, तुम मेरे गुरु पीर ॥

कहै कबीर सुन शेखजी, तुम औलियाकि जात ।

रोजा निमाज कर बंदगी, बैठो नबी जमात ॥

जो अल्लह फरमाया, सो नहिं करता कोय ।

हलाल हराम चीन्है नहीं, कैसे मुसलिम होय ॥

स्वसमवेदबोध

( १४५ )

सारखी-जबतक दर्द पराई, दिलमें आवै नाहिं । कोटि बंदगी खता है, परै सो दोजखमाहिं ॥ जैसा दिल है आपना, तैसा सबका जान । दर्दमन्द अल्लह मिलै, कहै कबीर प्रमान ॥ शाह सिकंदर तकी मिलि, ठाढ़ भये करजोर । बकसो चूक कबीर तुम, जो कछु औगुन मोर ॥

चौपाई

कहै कबीर सुनो शाह प्यारे । तुम हमार कछु नाहिं बिगारे ॥ तुमरे पीर जो कसनी लीना । खरा खोट हम सबही चीन्हा ॥ हम नाहिं देहि बददुवा काहू । जो मम अरि हम सेवत वाहू ॥ हमरे मित्र दुष्ट कोइ नाहीं । सब हमरेमें हम सबमाहीं ॥ हम काहूको कहा सरापै । करै सो तैसो फल ले आपै ॥

सारखी-जैसो बीज कोइ बोइहै, तस फल चाखै आप । कह कबीर सत कहत हौं, मोहिं पुण्य नाहिं पाप ॥ कहर कुफुर दिल दोजखी, मोम दिलमें हर फकीर । निरभय नामसो समरथ, सतगुरु कहैं कबीर ॥

चौपाई

ऐसे कहि काशी चलि आये । धर्मदास तोहि सैन बुझाये ॥

सत्यकबीर वचन--चौपाई

रोग सोग बहु दुःख हटाये । केते परचाको देखलाये ॥ मृतकको दीनो जिव दाना । सो कछु इहां न करौं बखाना ॥ सोइ प्रसंग बढ़ुरि अब गार्ई । कलिमें जिमि प्रभु पंथ चलाई ॥ सत्य कबीरके शिष्य सुजाना । चार गुरु जो कीन प्रमाना ॥ तिनमें धर्मदास बड़ अंशा । वंश बयालिस जासु प्रशंसा ॥

बो० सा० १/

( १४६ )

बोधसागर

धर्मदास धरनीमें आये । करि प्रपंच तिहि काल भ्रमाये ॥ धर्मदास सुकृत औतारा । भूलयौ पुरुष नाम निज सारा ॥ प्रतिमा पूजामें लपटाई । परमपुरुषकी सुधि विसराई ॥ तीरथ व्रत आचार अपारा । क्रम उपाह्लाको व्योहारा ॥

पुरुष वचन--चौपाई

पुरुष अवाज उठी तिहि बारा । ज्ञानी बेगि जाहु संसारा ॥ सुकृत भवसागर चलि जाई । काल जालते गये झुलाई ॥ तिनकहैं जाय चेतावहु ज्ञानी । जाते वंश चले रजधानी ॥ वंश बयालिस अंश हमारा । सुकृत गेह लेहै अवतारा ॥ ज्ञानी बेगि जाहु तुम अंसा । धर्मदास उर मेटहु शंसा ॥

ज्ञानी वचन--चौपाई

चले ज्ञानी तब शीस नवाई । धर्मदास हम तुम लगि आई ॥ पुरुष अवाज कहा तुम पासा । चीन्हो शब्द गहो विश्वासा ॥

धर्मदास वचन--चौपाई

धनि सतगुरु तुम मोहिं चेतावा । काल जालते मोहि बचावा ॥ मैं किंकर तुव दासके दासा । लीन उबारि काटि यम फांसा ॥ मेरे चित अति हर्ष समाना । तुव गुण मोहिं न जात बखाना ॥ भागी जीव शब्द तुम माने । पूरण भागते तुव वर ठाने ॥ मैं अघकर्मों कुटिल कठोरा । रहचो अचेत भर्म चित भोरा ॥ मोहि आय तुम लीन जगाई । धन्य भाग तुव दरशन पाई ॥ कहिये मोहि जीवके मूला । रविके उदय कमल मन फूला ॥ भवसागर कौनी विधि छूटे । यमबंधन कौनी विधि टूटे ॥ करौं भक्ति कै योग कमावौं । देउँ दान कै तीर्थ नहावौं ॥ करौं यज्ञ कै इंद्री साथौं । बाहर फिरौं कि मनको बांधौं ॥ करौं अचार कि साधन साथौं । बर्त करौं कै हरि अवराधौं ॥

स्वसमवेदबोध

( १४७ )

जो तुम कहो सोइ सो करऊं । वचन तुमार हृदयमें धरऊं ॥

सत्यकबीर वचन-चौपाई

सुन धर्मदास मैं सत्य बतावों । भवसागरको दुःख मिटावों ॥ सुन धर्मदास भक्ति पद उँचा । इहि सीठी कोइ विरला पहुँचा॥ योगी योग साधना करई । भवसागर तेऊ नहिं तरई ॥ दान देय सोई फल पावै । भवसागर भुक्तैको आवै ॥ तीर्थ नहाये जो फल होही । सर्व मर्म समझावों तोही ॥ जन्म लेय सुन्द तन पावै । संपति दौरि बहुरि जग आवै॥ ऊँचे घर लेवै औतारा । ब्राह्मण क्षत्रीको व्यौहारा ॥ इंद्री साधन है अति नीका । बिना भक्ति जानो सब फीका॥ इंद्री साधन है तप भारी । तामस तेज क्रोध हंकारी ॥ कोध किये गति मुक्ति न पावै । भक्ति महातम हाथ न आवै ॥ बर्त एक भक्तिको पूरा । और बर्त कीजै सब दूरा ॥ और बर्त सब यमकी फाँसी । भक्तीबर्त मिलै अविनाशी ॥ हरि अवराधनकी सुनि बाता । कहो भेद तुम सुनियो ज्ञाता ॥ हरिहर नाम सदा शिव केरा । तातै मिटे न भवको फेरा ॥ बहुत प्रेमते शिवको ध्यावै । रिध अरु सिद्ध द्रव्य बहु पावै॥ जो मन चित निश्चय करि धरई । गिरि कैलास में बासा करई ॥ फिरके काल झपेटै ताही । डारि देय भव चक्रर माही ॥

साखी-शिव साधनकी यह गति, शिव हैं भवके रूप ।

बिन समझे यह जक्त सब, पन्यौ महा भ्रमकूप ॥

चौपाई

हरिहर नाम विष्णुको भाखा । शुभ अरु अशुभ कर्म द्वे राखा॥ इनमें करे कलोल सदाई । करे भोग जीवन भरमाई ॥ बहुत प्रीतिसे विष्णुहि ध्यावै । सो जिव विष्णुपुरीमें जावै ॥ विष्णुपुरी सो निरभय नाही । फिरि कै डारि देइ भव माही ॥

( १४८ )

बोधसागर

साखी-हरीहर नाम जो विष्णुको, जाने किय जिव जेर । चौरासी भरमै सदा, मिटै न भवको फेर ॥

चौपाई

हरिहर ब्रह्माको है नाऊँ । रजगुण व्यापि रहा सब ठाऊँ ॥ ब्राह्मणको पूजै संसारा । सो जिव होय न भवके पारा ॥

साखी-यहि तिनगुनकी भक्तिमें, मति भूलो भ्रमदास । इनके ऊपर निरगुन, तहाँ योगीको बास ॥

चौपाई

निर्गुण धाम निरञ्जन भाई । जिन सगरी उपपत्ति बनाई ॥ निर्गुणते मन भया प्रचंडा । ताते बसै सकल ब्रह्मण्डा ॥ निर्गुण अंश सकल औतारा । पीर पगंबर सब तन धारा ॥ यही निरञ्जनके पसारा । तामें अटका सब संसारा ॥ धर्मदास तुम भक्त सनेही । इनमें जनि अटकावो देही ॥ भक्त अनेक भये जग माहीं । निरभय घर कोइ पावत नाहीं ॥ भक्ति करे तब भक्त कहावै । भगतिसे रहित बचनको पावै ॥ चौदह लोक बसै भग माहीं । भगसे न्यारा कोई नाहीं ॥ सत्य नामकी खबरि न पाई । क्या करि भक्ति करो रे भाई ॥ जगमें भक्त दोय भै भारी । धू प्रहलाद सदा अधिकारी ॥ ये दोनों जन द्वै व्रत साधा । एकहि एक इष्ट आराधा ॥ ध्रुव तौ गृह तजि बाहर गयऊ । नारदको उपदेशी भयऊ ॥ छठे मास प्रकटे हरि आई । राज दियो वैकुंठ पठाई ॥ साठि हजार वर्ष करि राजू । कुट्टैब सहित वैकुंठ विराजू ॥ एक दौस जब परलय आई । ताहि बासते देय गिराई ॥ दुतिय भक्त प्रहलाद कहाई । इंद्रासनको सुख जो पाई ॥ स्वर्ग दोन चौकरी भुक्ती । बन्धनभावते भई न भुक्ती ॥

स्वसमवेदबोध

( १४९ )

साखी-इंद्रराजको भोगिके, फिर भवसागरमाहिं । यह सर्गुनकी भक्ति है, निर्भय कबहुँ नाहिं ॥

धर्मदास वचन-चौपाई

कौन भांतिते करिये भक्ती । सतगुरु मोहि बतावो युक्ती ॥ निर्गुन सद्गुण पार लखावो । तीसर न्यारा मोहि लखावो ॥

सत्य कबीर वचन-चौपाई

एक पुरुष है अगम अपारा । सब घट व्यापक सबसे न्यारा ॥ ताको भक्ति करै जो कोई । ताको आवागमन न होई ॥ आदि ब्रह्म नहिं था ओंकारा । निर्गुन रूप नहीं विस्तारा ॥ नहिं तब बीज नहीं अंकुरा । आदि भवानी चन्दन सूरा ॥ पुरुष कहो तो पुरुषो नहीं । पुरुष भया मायाके माहीं ॥ शब्द कहो तो शब्दो नहीं । शब्द भया मायाके माहीं ॥ द्वै विन होय न अधर अवाजा । कहो काहिं यह काज अकाजा ॥ नाम कहो तो नाम न ताको । नामराय काल है जाको ॥ है अनाम अक्षरके माहीं । निह अक्षर कोइ जानत नाहीं ॥ धर्मदास तहैं बास हमारा । काल अकाल न पावै पारा ॥

धर्मदास वचन

धर्मदास कह सुनो गोसाँई । इन बातें बनबेकी नाहीं ॥ संशय किये एक ही ओरा । तुम ही हते कि है कोइ ओरा ॥

सत्य कबीर वचन चौपाई

जौ परतीति होय उर तोरे । भवको मेटि संग रहु मोरे ॥ आदि पुरुष निहअक्षर जानो । देही धरि मैं प्रकट बखानो ॥ मोहि न व्यापो जगकी माया । कहन सुननको है यह काया ॥ देह नहीं अरु दरसे देही । रहौं सदा जहँ पुरुष विदेही ॥ गुप्त रहौं नाहीं लखि पाया । सो मैं जगमें आनि चेताया ॥

( १५० )

बोधसागर

चारों युगमें चारों नाऊँ । माया रहित रहौं सब ठाऊँ ॥ सबसे कहौं पुकारि पुकारी । कोई न मानै नर अरु नारी ॥ इनको दोष कछु नहिं भाई । धर्मराय राख्यो बिलमाई ॥

धर्मदास वचन-चौपाई

हे स्वामी मैं तुमको चीन्हा । आदि अंतको भेद सब लीन्हा ॥ तुम ही वार तुमहि हो पारा । तुमहीते उपजा संसारा ॥ समरथ सब गति पाई तोरी । अब सब संशय छूटी मोरी ॥ अब यहि भवमें बहुरि न आवों । तुमरे चरणकमल चित लावों ॥

सत्य कबीर वचन-चौपाई

कहै कबीर सुनो धर्मदासा । सकल भेद मैं कीन प्रकाशा ॥ अब तुम भक्ति करो चित लाई । सेवो साधु तजि मान बढ़ाई ॥ पहिले कुल मरजादा खोवै । भयते रहित भक्त तब होवै ॥ सेवा करो छोड़ि मत दूजा । गुरुकी सेवा गुरुकी पूजा ॥ गुरुसे करे कपट चतुराई । सो हंसा भवभ्रममें आई ॥ ताते गुरुसे परदा नाही । परदा करे रहै भवमाहीं ॥ गुरु है मात पिता गुरु सेवा । गुरु सम और नहीं कोइ देवा ॥ गुरुसे अन्तर कबहुँ न करिये । सर्वस ले गुरु आगे धरिये ॥

साखी-गुरुकी महिमा अगम है, शिव विरंचि नहिं जान ।

गुरु सतगुरुको चीन्हि के, पावै पद निरबान ॥

धर्मदास वचन

साखी-कर्म भर्म भव भार सब, दिया भारमें झोंक । सतगुरुके परतापते, मिट गया सबही धोख ॥

इति

अथ धर्मदासजीकी कथा-चौपाई

धर्मदासकी कथा बखानो । वैश्यके कुल तनधरि प्रकटानो ॥ धर्मबइल्लव परम अचारी । जासु सुजस गावै संसारी ॥

स्वसमवेदबोध

( १५१ )

धर्मदास गुरु चरनन परेऊ । तनमनधनतृणसम परिहरेऊ ॥ छप्पनकोटिकि संपति सारी । दियौ लुटाय सो रंक भिखारी ॥ एकै पुत्र परम प्रिय जाही । तजत बार नहिं लायौ ताही ॥ नारि पुत्र तजि भये उदासी । धर्मधुरंधर गुन गन रासी ॥ तन मन गहे भक्ति सो गाढ़ी । सतगुरुचरनप्रीति अति बाढ़ी ॥ परल्यौ ताको भक्ति प्रभावा । तब तेहि सतगुरु बचन सुनावा ॥ धर्मदास सुनिये मम बानी । तुमरे गृह प्रकटैगो आनी ॥ दशमें मास लेइ औतारा । हंसन काज देह निजु धारा ॥ सो जीवन को पार लँचावै । वंशकेर कँडिहार कहावै ॥ मेरे बचनते सो तन धारे । बचन सुरामनि नाम पुकारे ॥

धर्मदास बचन--चौपाई

हे प्रभु हम इद्री बस कीना । कैसे अंश जन्म तौ लीना ॥ धर्मदास अस बचन सुनाई । तब सतगुरु तिहि कह्यौ बुझाई ॥ पुरुष नाम धर्मन लिखि देहो । ताते अंश जन्म जो लेहो ॥ लखो सैनमें देहुँ लखाई । धर्मदास सुनिये चित लाई ॥ लिखो पान पूरुष सहिदाना । आमिन देहु पान परवाना ॥ धर्मदास आमिनिहि बोलाई । ले सतगुरुके चरन टिकाई ॥ धर्मदास परवाना दीना । आमिन पाय दंडवत कीना ॥ दशये मास जब पूजी आसा । प्रकटे अंश सुरामनि दासा ॥ सतगुरु बचन ते प्रकटे आई । बचन सुरामनि नाम कहाई ॥ मुक्तामनि पुनि नाम है ताका । जाते चली वंशकी साका ॥

इति

अथ चारों गुरुकी कथा--चौपाई

स्वसमवेद सतगुरु मुख बानी । चौदह कोटि ज्ञानकी खानी ॥ तत्त्व ज्ञान पुनि ताते काढ़ा । चारो वेद कान तिहि ठाढ़ा ॥ ऋग यजु साम अथर्वन चारो । ताते सब जग धर्म प्रचारो ॥

( १५२ )

बोधसागर

स्वसमवेदको चारो अंगा । ताते भये अनेकन ढंगा ॥ चारो वेद चहुँ गुरु गहेऊ । परमपंथ जाते जिव लहेऊ ॥ चारो गुरुकी कथा बखानो । सुकृत आदि भेद ग्रंथ प्रमानो ॥

इति

अथ प्रथमगुरु भवसागरमें उत्तर दिशा गोसाई धर्मदासजी-चौपाई

लोकमें सुकृत अंश कहलाई । भवसागर धर्मदास गोसाई ॥ उत्तर दिशा तासु गुरुवाई । गहि ऋगवेद जो पंथ चलाई ॥ जम्बूदीपो भारथ खंडा । प्रकटै गढ़बानौ महि मंडा ॥ सो गह कोट ज्ञानकी बानी । पंथ प्रचार कीन रजधानी ॥ वंश बयालिस ताने पाया । भवसागरमें पंथ चलाया ॥

इति

अथ धर्मदासजीके बयालिस वंशके नाम

दोहा-बचन सुरामनि प्रथम कह, बहुरि सुदर्शन नाम । कुलपति नाम प्रमोद गुरु, कौल नाम गुणधाम ॥ नाम अमोल कहाव पुनि, सुरति सनेही जान । हक्क नाम साहिब कहो, पाक नाम परधान ॥ प्रकट नाम साहिब बहुरि, धीरज नाम कह फेर । उग्र नाम साहेब कहो, उदै नाम पुनि टेर ॥ गीर्ध नाम साहिब तथा, नामप्रकाश कहाय । उदित मुकुन्द बखानिये, अर्ध नाम पुनि गाय ॥ ज्ञानी साहिब हंस मनि, सुकृत नाम अर्जनाम । पुनि रसनाम रु गंगमनि, परस नाम अभिराम ॥ जागृत नाम अरु भृगमनी, अकह कंठमणि होय । पुनि संतोषमनी कहो, चात्रिक नाम गनोय ॥ आदि नाम नेह नाम है, आदिनाम महानाम ।