कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
( १३६ )
कबीरबानी
चारि गुरु निज सीख हमारा । तिन्हकी छाप चले संसारा ॥ बंस बयालिस वचन हमारा । तिन्हते सुक्त होय संसारा ॥ सहसरभांति होम जोकोइ धावै । कोटिनयोग समाधि लगावै ॥ कोटिन ज्ञान छान बिल छाने । अर्थ परीक्षा बहुविधि आने ॥ वचन वंश को बीरा नहिं पावै । फिर मरे फिरहि गर्भमें आवै ॥ धर्मदास सुनो सत्य की बानी । काल प्रपंच बहुतविधि ठानी ॥
द्वादश पंथ चलो सो भेद
द्वादश पंथ काल फुरमाना । भूले जीव न जाय ठिकाना ॥ ताते आगम कहि हम राखा । वंश हमार चुरामणि शाखा ॥ प्रथम जगमें जागू भ्रमावै । विना भेद ओ ग्रन्थ चुरावै ॥ दुसरि सुरति गोपालहि होई । अक्षर जो जोग हढ़ावे सोई ॥ तिसरा मूल निरञ्जन बानी । लोकवेदकी निर्णय ठानी ॥ चौथे पंथ टकसारभेद लै आवै । नीर पवन को सन्धि बतावै ॥ सो ब्रह्म अभिमानी जानी । सो बहुत जीवनकीकरीहै हानी ॥ पांचौ पंथ बीज को लेखा । लोक प्रलोक कहें हममें देखा ॥ पांच तत्व का मर्म हढ़ावै । सो बीजक शुक्ल ले आवै ॥ छठवाँ पंथ सत्यनामि प्रकाशा । घटके माहीं मार्ग निवासा ॥ सातवाँ जीव पंथले बोले बानी । भयो प्रतीत मर्म नहिं जानी ॥ आठवे राम कबीर कहावै । सतगुरु भ्रमलै जीव हढ़ावै ॥ नौमे ज्ञानकी काल दिखावै । भई प्रतीत जीव सुख पावै ॥ दसवे भेद परमधाम की बानी । साख हमारी निर्णय ठानी ॥ साखी भाव प्रेम उपजावै । ब्रह्मज्ञानकी राह चलावै ॥ तिनमें वंश अंश अधिकारा । तिनमेंसो शब्द होय निरधारा ॥ संवत सत्रासै पचहत्तर होई । तादिन प्रेम प्रकटें जग सोई ॥
बोधसागर
( १३७ )
आज्ञा रहै ब्रह्म बोध लावे । कोली चमार सबके घर खावे ॥ साखि हमार ले जिव समुझावै । असंख्य जन्ममें ठौर ना पावै ॥ बारवै पन्थ प्रगट है बानी । शब्द हमारेकी निर्णय ठानी ॥ अस्थिर घरका मरप न पावै । ये बार पंथ हमहीको ध्यावै ॥ बारहे पन्थ हमही चलि आवै । सब पथ मिट एकही पंथ चलावै ॥ तब लगि बोधो कुरी चमारा । फेरी तुम बोधो राज दर्बारा ॥ प्रथम चरन कलजुग स्रियाना । तब मगहर माडौ मैदाना ॥ धर्मरायसे मांडौ बाजी । तब धरि बोधो पंडित काजी ॥ बावन वीर कबीर कहाइ । भवसागरसों जीव सुकताइ ॥
कलियुगको अंत पठयते
ग्रहण परै चौंतीससो वारा । कलियुग लेखा भयो निर्धारा ॥ ३४०० ग्रहण परैसो लेखा कीन्हा । कलियुग अंतहु पियाना दीन्हा ॥ पांच हजार पाँचसौ पांचा । तब ये शब्द हो गया साँचा ५५०५ सहस्र वर्ष ग्रहण निर्धारा । आगम सत्य कबीर पोकारा ॥ तेरा वंश चले रजधानी । वंश चूरा मणि प्रगटे ज्ञानी ॥ तिनकी देह छायाँ नहिं होई । सर्वे पृथ्वी प्रमानिक सोई ॥
क्रिया सोगंद
धर्मदास मोरी लाख दोहाई । मूल शब्द बर जिन जाई ॥ पवित्र ज्ञान तुम जगमों भाखौ । मूलज्ञान गोइ तुम राखौ ॥ मूलज्ञान जो बाहेर परही । बिचले पीढी वंश हंस नहिं तरही ॥ तेतिस अर्व ज्ञान हम भाखा । मूलज्ञान गोए हम राखा ॥ मूलज्ञान तुम तब लगि छपाई । जब लगि द्वादश पंथ मिटाई ॥
द्वादशपंथका जाव अस्थान
द्वादश पंथ अंशनके भाई । जीवबांधि अपने लोक लेजाई ॥ द्वादश पंथमें पुरुष न पावै । जीव अंशमें जाइ समावै ॥
( १३८ )
कबीरबानी
तुमजिन भूलो ज्ञानमो भाई । बिगड़े हंस सब जीव भुलाई ॥
सोरठा-हमरो करै सब ज्ञान, वंस बयालिस तिलक है ।
द्वादस पंथमें मान, पुरुष शब्द तोसे कहूँ ॥
धर्मदास वचन
धर्मदास पूछे चितलाई । बंस बखान गुरु कहौ ससुझाई ॥
कौन वंस कौन अंस हमारा । कौन वंश अंश मर्जाद सुधारा ॥
पंथ पंगति तेहि भाव बतावौ । जैसे जगमो पंथ चलावौ ॥
तुम्हरो डर माने सब कोई । वचन डोर बाँध्यो जग सोई ॥
दास नरायण सरण न पावा । दुसरा वंश अंश धरि आवा ॥
तेहिकी पंगति कहो ससुझाई । सोई पंगति आगे चलि जाई ॥
साखी-इतनी निरभये भाखिहों, गुरु मोहि कहो ससुझाय ॥
वंश अंशकी पंगति, सब विधि देहु सिखाय ।
साखी-वंशनिखेहकी । सद्गुरु उवाच
धर्मदास सुन भेद अपारा । तुमसों कहूँ वंश अंश निरधारा ॥
समर्थ हमसों ऐसी फुरमाई । धर्मदासको लेहो जगाई ॥
धर्मदास है अंस हमारा । उन्हसों भेद कहों निर्धारा ॥
उनकी जागा एक पंथ हटावौ । पीछे हम अपनी अंश पठावौ ॥
ते जन्म लीहे धर्मदाससे आई । वोही हंसनके बन्ध मुक्तताई ॥
तिन्हके वंश चले कडिहारा । बहुत जीवनि के करे उबारा ॥
तब हम पुरुषसों विनती कीन्हा । धन्य बंस धर्मदास जो लीन्हा ॥
वो कैसे कै लोकै आवा । सोई बात गुरु मोहि सुनावा ॥
खुदबानी
तब समर्थ अस बोले बानी । धर्मदासको बंस अभिमानी ॥
ताते हम अपना अंश पठावा । जंबुद्वीपमें थाना बैठावा ॥
बोधसागर
( १३९ )
अच्छर अच्छर अतीतकी बानी । निःअच्छर कोई बिरले जानी ॥ निःअक्षर की अक्षर श्वासा । नहीं धरनी नहीं गगन प्रकासा ॥ अक्षर तीनि लोक बिस्तारा । तामें अरुझो सब संसारा ॥ तीन सुत तेज अंडमों आई । आप आप इन्हें आप हटाई ॥ चार वेद कहै तिनकी साखी । अक्षर अतीत थापि उन्ह राखी ॥ अब भिन्न भिन्न कहूं अर्थीई । सात सुरतिके स्थान बताई ॥ अक्षर अतीत माया सो कहिये । सोई सुरति निरंजन लहिये ॥ अक्षर सुरति दुतिय है स्थाना । जिनके चार वेद परवाना ॥ शब्दातीत अनहद रहता । प्रेम धाम अक्षरकी चहता ॥ चार सुरतिका भेद नियारा । तीनि सुरतिका देउ विचारा ॥ पांचे सुरति अंकुरकी बानी । पांचे स्थान तेहि ठहरानी ॥ छटे स्थाना अंकुरकी है आपा । जेहिते सात करी उततापा ॥ सातवी सुरति सहजकी रही । उहि समरथको देखा सही ॥ सात सुरति सात है स्थाना । मूल सुरति है समर्थ प्रमाना ॥ सहज सुरति सब सुतं उपजाई । मूल सुरति लै हंस समाई ॥ मूल सुरति है सबको मूला । सात सुरतिको एक स्थूला ॥ सात सुरति मूल सिध सब माहीं । धर्मदास लखि राखौ ताहीं ॥ शब्द पांजी इतना परमाना । अब कहूं कायाकी बन्धाना ॥ सातों सुरति कायामें रहै । औ काया धरि बातें कहै ॥
सुरति स्थान
प्रथमहि दीप अमर मनियारा । तहैं वा मूल सुरति बैठारा ॥ दुसरा अजर दीप तहाँ कीन्हा । सहज सुरतिको बैठक दीन्हा ॥
चौपाई
तीसर दीप हिरण्मय सोई । सुरति अंकुरकी बैठक होई ॥ चौथे दीप सुरंग निर्मावा । ओहं सोहं तहाँ बैठवा ॥
( १४० )
कबीरबानी
पाँचवें अघर दीप रहे वासा । तहाँ है अचित सुरतिको वासा॥ छठये पच्छ दीप जो कीन्हा । तहाँ अक्षरसुरतिको बैठकदीन्हा॥ सातवीं सुरत कलदीप बिलमाना । काम कोध मोह तहाँ समाना ॥ सातवीं सुरति सातहुँ स्थाना । तीनसुरतिनिरंजनकालप्रमाना॥ पुछुप दीप है सबते न्यारा । तहाँ समर्थसे जीव विस्तारा ॥
साखी-घटघटकी जो परच कहो, सब स्थान बताय । कह कबीर बिनु काया परचै, फिरि फिरि रह भटकाय॥
साखी-सुरति पांजीकी धर्मदास उवाच
मैं सद्गुरु तुम्हरी बलिहारी । कर्म फास कैसे निरुवारी ॥ मोहि कहो जेहि दुख ना होई । काल चरित्र कहौ सब सोई ॥ जो तुम्हरे दिल आवे गुसाई । संशय जालते लेहु छुड़ाई ॥
साखी-तुम्हरो भेद अगम्य है, काहु लख्यो नहीं भेद ।
सुर नर मुनि सबही ठगे, सनकादिक शुक्देव ॥
सतगुरु उवाच
धर्मदास सुनियो चितलाई । तुम जनि शंका मानों भाई ॥ पंथ हमारो चलावो जाई । वंश ब्यालिस अटल अधिकाई ॥ वंश ब्यालिस अंस हमारा । सोई समरथ वचन पुकारा ॥ वंश ब्यालिस गरवाई दीन्हा । इतना चर हम तुमको दीन्हा ॥ वंश अंश समरथ कडिहारा । सोइ जीवनको करे उबारा ॥ तुम जिन शंका मानो भाई । समरथ वचन राखो चितलाई ॥ अटक काहुकी तुम जिन मानों । पाँन नाम तुम निश्चय जानों ॥
साखी-तुम समर्थके अंश हो, जाग्रत वंश तुम्हार ।
समर्थ बचन जनि छोड़हुँ, मानो बचन हमार ॥
बोधसागर
( १४१ )
साखी-व्यालिसके निकासी-धर्मदास उवाच धर्मदाम जब विनती लाई । हमसों पन्थ ना चले गोसाईं ॥ नरदेहीसों पन्थ चले ना भाई । जाते अपना अंश पठाई ॥ अंश बयालिस देहु पठाई । ते जग हंस लेहि सुकताई ॥ तुम्हें सिखावन हमसों लीना । तुम्ह लै धर्मदासको दीन्हा ॥ बचन वंश एक है भाई । नाम वंश जग मैं बताई ॥ बचन वंश है आदि निशानी । तिन्हकी पावै जग सहेदानी ॥ नाम नरायण हैं अभिमानी । तुम संसार फिर जावो अब ज्ञानी ॥
कबीर उवाच
तब समर्थ मोसे अस कही । बंशहि अस चुरामणि सही ॥ तुम्ह जो सिखावन हमसों लीन्हा । ऐसा जग चुरामणि कीन्हा ॥ संधिक नाम है उन्हकी देही । पावै हंसा जो हमरे सनेही ॥
साखी-यह निज बचन समर्थके, हमसो मेटि न जाय । अमीनिको मैं सोंपो है, तुमको सोंपि न जाय ॥
साखी-धर्मदास उवाच
धर्मदास तब भए मलीना । उठि सद्गुरुसों विनती कीन्हा ॥ हो साहेब मैं तुम बलहारी । बंसनारायन शरण तुम्हारी ॥ नाम प्रतीत तुम करो संभारी । नामनरायन तुम बोल विचारी ॥ अपनी बोध राखौ संसारा । विन्द बंस प्रण आए हमारा ॥
साखी-इतनी विनती मैं कहूं, तुम दाता गुरु मोर ।
संशय मेटो जीवको, लेहो फँदको छोर ॥
साखी-वंश विषेदकी-सतगुरु उवाच
धर्मदास तुम बड़े विवेकी । तुम्हरे घटमें बुद्धि बढ़ देखी ॥ घर घर गुरु जगतमें होई । हमरे गुरु बचन बंस है सोई ॥ वह सब करै सुख चतुराई । ताते जीव राखे भरमाई ॥
( १४२ )
कबीरबानी
मान तजी लेहि परमाना । खोवै जगतपान अभिमाना ॥ बचन बंशकी पारख पावै । सोइ हमारे बंश कहावै ॥ बचन बंश पारख नहिं होई । बंश हंस सब जाय विगोई ॥ बचन बन्धीए वंश अधिकारा । पारस सरूपी है संसार ॥ पार्स छुवे लोहा कँचन होई । पोहोष बास तिल भेदे सोई ॥ बचन वंश है पुरुष सनेही । कागरूपते हंस करि लेही ॥ सो सब उत्पत्ति कहो समुझाई । जो चीन्हे तो लोके जाई ॥ धर्मदास तुम पन्थके राजा । नाद बिंदु हम दोनों साजा ॥ तुम्हरे वंश पंथके कडिहारा । बचन वंश लोक सठिहारा ॥ सतगुरु बचन लेहि सिर नाई । तब तुमरे वंश करे गुरुवाई ॥
साखी-कहै कबीर
नाम नरायण जगदगुरु, करै बोध संसार । बचन प्रतापसे छूटहि, वो समर्थके कडिहार ॥
साखी-वंश अंसनके-धर्मदास उवाच ॥
धर्मदास विनती अनुसारी । साहब विनती सुनो हमारी ॥ काया पांजीको भेद लखाओ । वंशअंश दोऊ तत समझावो ॥ वा सन्धि कहोजातेहोयउबारा । सोई भेद तुम कहो पुकारा ॥ धाम चारिका भर्म बताओ । कैसे कैलसो आनि समावो ॥ धर्मराय जो अपरबल बीरा । तीन लोकमें ताकी पीरा ॥ कैसे पंथ चले जगमाहीं । तीन लोकमें ताकी छाहीं ॥
साखी-पांजी भेद लखा न हो, वंश अंशनिर्धार ॥
इतनी संशय मिटावहु, सतगुरु हंस उबार ॥
साखी-कायापांजी-सतगुरु उवाच
धर्मदास कहौ समुझाई । काया पांजी आदि है भाई ॥ सुर नर मुनि कोई गम्य न पावा । झूठी आस बांध सब धावा ॥
बोधसागर
( १४३ )
पांजी चार भेद है भाई । चार अंश सब जगहि भ्रमाई ॥ अक्षर तीनि लोक उरझावा । तीनि लोक अक्षर ठेहेरावा ॥ जम्बु दीप है यमको बासा । कैसे सुक्ति होय परकासा ॥ तुम तो जुगन जुगन चलि आए । काहे न शुक्ल जीव सुत्ताये ॥ चारि वेद तुम्हें नाहीं माने । वेद किया सब जीव समाने ॥
साखी-हमसों पंथ ना चलिहै, भवसागर दारुण है दन्द ॥
वंश बयालिस तारहु, काटो कर्मके फंद ॥
सद्गुरु उवाच
मुनो धर्मदास कहैं मैं तोहीं । तुम नहिं निजके चीन्हे मोहीं॥ हमरो कह्यो नहिं मान्यो भाई । अपना वंश मान्यो सुकताई ॥ सकल सृष्टि गुरु तुमकूँ कीन्हा । तुमसों बंस बयालिस लीन्हा ॥ तुमको जानि बड़ाई दीन्हा । जक्तगुरु हम चूरामणि कीन्हा ॥ हमसों समरथ ऐसी कही । चूरामणि वंश जीवन निरवही ॥ वचन वंशको जो नहिं मानी । ताको काल करै जिवहानी ॥ तुमकूँ सेवै गुरु न्यवहारा । सो देखे समरथ दरबारा ॥ जो नहिं मानें कहा तुम्हारा । ताका सास्तीकरै वहिपारा ॥
चौपाई-तुम गुरु बयालिस वंशके, हम कह्यो वचन टकसार॥
तुम्हरे हाथ जीव सब पहुँचहि, तुम समर्थ कडिहार॥
साखी-गुरुन्याख्यानकी-धर्मदास उवाच ।
हो सतगुरु मैं तुम बलिहारी । हिममान्यो निजकह्यो तुम्हारी॥ तुम सतगुरु हम शिष्य अजाना । तुम सम हम पुरुष पुराना ॥ गुरुवाईका लेखा सुनाओ । बिन लेखा जीव कैसे सुत्तावो ॥
साखी-लेखा कहो तुम सद्गुरु, सब संशय निरधार ।
हम गुरुवाई करी हैं, मान्यो वचन तुम्हार ॥
( १४४ )
कबीरबानी
चौपाई-गुरुवाईको जुगति-सदगुरु कहै ।
सुनो धर्मदास कहों मैं बानी । बात हमारी तुम निश्चय मानी ॥ वचन वंश नहीं लगै भारा । लेखा देखि चले कडिहारा ॥ बिन लेखा गुरुवाई करहीं । आसाबन्ध कालमुख परहीं ॥
चौथा बिसथारकी जुगति
प्रथम लेखा जब चौका पोतावै । तब निकुत मंत्र ले नीर मँगावै ॥ दुसरे चौका पूरौ भाई । काया मूलको मन्त्र जगाई ॥ तिसरे आसन करौ विस्तारा । पुरुष शब्द निज करौ पुकारा ॥ चौथे कलश ले आगे राखौ । पंचतत्वको मन्त्र मुख भाखौ ॥ पाँचमो नारियर स्नान करावौ । सोहं शब्द ले भद्र करावौ ॥ छठवें स्वेत मिठाई आनौ । मानसरोवर मन्त्र बखानौ ॥ सातवें उत्तम पान मँगावो । पक्ष पालना मन्त्र गोहरावो ॥ आठवें दलकी जुगति सुधारी । दयाशब्द धोखौ अधिकारी ॥
सारखी-अरु कपूर लौंग इलायची, दल निरनेकी जुगति ।
विधि विल छानि केन्द्रहुँ, दीन्हा गुरु जिव मुक्ति ॥
चौपाई
नौमे नया वस्त्र ले आवो । अमर चीरको मन्त्र जपावो ॥ दसवें सोरा सुपारी धरहु । पाताल अंशको मन्त्र उचारहु ॥ ग्यारवें पाँच बरतन आनौ । आदि नामको मन्त्र-बखानौ ॥ बारहें आनि धरो परवाना । संधिकमन्त्र कहो परवाना ॥ तेरहें चँदवा छत्र बनाया । समरथ मन्त्र छत्रपति आया ॥ चौदहें आरति आनि बनाई । सोहँग मन्त्र निर्णय गोहराई ॥ पंद्रहें तिनका अर्पण कीन्हा । चौदा यमका मन्त्र तब चीन्हा ॥ सोरहें षोडश मन्त्र प्रवाना । कदली दल तहाँ उत्तम आना ॥ सत्रह सतगुरु करे निशानी । सो नरियर मों डारो पानी ॥
बोधसागर
( १४६ )
अठारवें अमिशब्द ले नरियर मोरे । नहीं तो काख सीस लै तोरे ॥ विना एकोत्री जो कडिहारा । ते सब बांधे यमके द्वारा ॥ विना लेखे जो गुरु कहावे । गुरु डूबै शिष्य पार न पावे ॥
साखी-इतना लेखा पावै, सो साँचो कडिहार ।
कहैं कबीर बिन लेखा जाने, छलइ काल बटपार ॥
साखी-कडिहारी भेदकी धर्मदास उवाच
साहेब इतना भेद न आवै । सो नाही कडिहार कहावै ॥ मूल भेद तुम कहो प्रमाना । तेहिते हंस होय निर्वाना ॥ मूल भेद है आदि निशानी । सो समरथके होय प्रमानी ॥ इतनी परचै हमकूँ दीजै । मूल भेदकी दया गुरु कीजै ॥ गुरु सोई जो ज्ञान बतावै । और गुरु को काम न आवै ॥ साखी-धर्मदास कीया करै छुऔ सतगुरुके पाँव ।
साहब जो मैं तुमते बिछुरो, तो मूलशब्द बारह होइ जाव ॥
साखी-मूल भेदकी सद्गुरु उवाच
धर्मदास कहो मैं सोई । मूल भेद घट राखौ गोई ॥ गुरु मर्याद काहू ना पाई । ताते शब्द तुम राखौ छिपाई ॥ मूल भेद है अगम अपारा । विरला हंस पावही पारा ॥ सुर नर मुनि गण गन्धर्व देवा । तिनहु मूल नहीं पायो भेवा ॥ काया मूल है आदि निशानी । सौ धर्मनि तुम सुनो प्रमानी ॥ जो निज योग समाधि लगावै । सो तो लाभ तिनहुँ नहीं पावै ॥ चार वेद जिस आगम बखाना । मूल भेद वेदो नहीं जाना ॥ अक्षर मूलकी उत्पति भाखी । अजर मूल लै बारह राखी ॥ अजर मूल है सबको मूला । तेहिते प्रथम काया है स्थूला ॥ लाखौ सैनमें देउ लखाई । अजर मूल लै लोक समाई ॥ भिन्न भिन्न सब मूल बताऊं । अजर मूल माया दिखलाऊं ॥
नं. ७ कबीरसागर - ६
( १४६ )
कबीरबानी
मूल भेद
प्रथम मूल आदि है भाई । जिन सब उत्पति अंकुर बनाई ॥ दूसर मूल वानी है व्यवहारा । तेहिंते सहज सुरति निरधारा ॥ तीसर मूल मर्मको पावै । मूल सुरति सब भेद बतावै ॥ चौथ मूल सोहंग बैधाना । तामैं सुरति ओहंग समाना ॥ पाँचवै है अर्चित पर बानी । प्रेम सुरति तिहि माँहि समानी ॥ छठै मूल अक्षरकी बानी । योगमाया अक्षर उत्पानी ॥ सातवै मूल अक्षरहीकी बानी । तेहिंते कैल निरंजन जानी ॥ अक्षर मूल है सातवै काला । त्रिगुण काल उत्पति प्रतिपाला ॥ चार काल अपरबल बीरा । जाते जीवको व्यापे पीरा ॥ इतनो मूल चारि काल बखानी । अजर मूल चारि माँहि समानी ॥ सद्गुरु मिले तो भेद लखावै । बिना सतगुरु कोइ पार न पावै ॥
साखी-बिनु सद्गुरु बाँचे नहीं, कोटिन करै उपाय ।
अजर मूलका खोज न पावै, बांधे यमपुर जाय ॥
साखी-मूल व्याख्यानकी धर्मदास उवाच
तुम सद्गुरु हो समरथ दाता । कैसे मिटे कालकी घाता ॥ तौन भेद गुरु देहु बताई । जेहिंते हंस लोकको जाई ॥ शब्द परीक्षा हमको दीजै । सब जीवनकी परचै कीजै ॥ कैसे सीख हम करै संसारा । तौन भेद मोहे कहो विचारा ॥ कैसे तरिहैं जगके हंसा । कैसे निर्भय तुम्हारे वंसा ॥
साखी-वंश अंशकी निर्णय, हमसों कहो समुझाय ।
केहि विधि हम जो निस्तरे, कैसे लोकहि जाय ॥
सद्गुरु उवाच
सुनो धर्मदास कहूं मैं तोही । वचन वंश प्रताप है सोही ॥ वंश बयालिस वचन हमारा । जिनको समरथ है रखवारा ॥
बोधसागर
( १४७ )
ताको खोजि परमपद पावै । भवसागर में बहुरि न आवै ॥ जिनके ब्यालिस वंश तुम्हारा । जिनके वचन अंश है कडिहारा ॥ वचन वंशको अंश न दावै । तुम्हरो वंश नहिं बोध चलावै ॥ एहि विधि वंश अंश जो होई । दूत भूत यम कंपन सोई ॥ जाति न जै और मोह न आवै । सोई वंश अंश जो कहलावै ॥ कलकी दशा जानिके खावै । निश्चय राज वंश गुरु होवै ॥ जिनके पारस चले संसारा । देखत काल होय जरि छारा ॥
कडिहारी लेखा
अब सुनो कडिहारी लेखा । वंश अंशको जानि विवेका ॥ वंश अंशको करै बिचारा । सो कहिये वोहित कडिहारा ॥ वंश अंश नहिं अक्षर पावै । सो कडिहार बोधकं ध्यावै ॥ वंश वचन कडिहारी करहीं । सो कडिहार फाँस नहीं परहीं ॥ कडिहारका किनहोय कडिहारा । लक्ष चौरासी अटकै सो बारा ॥ जाति पांतिकी दासी न राखै । सद्गुरु परिचय निशिदिन भाखै ॥ वंश अंशको पान चलावै । सो साँचै कडिहार कहावै ॥
हंसकी चाल
अब सुनियो जग हंस विचारा । प्रथमहि चौका करै हमारा ॥ चौका अंश समर्थके भाई । तिन्ह अपनी युग अदल चलाई ॥ चौका अंश कालकी हानी । तेहि ते पुरुषकी सुरति समानी ॥ तितुका तोए लेहि प्रमाना । यम भाजे छोड़ै अभिमाना ॥ चरणामृत हि तत्त्वसों लेही । यमके हाथ चुनौती देही ॥ प्रेम पतीत सो सेवा लावै । नाम पान गुरु अक्षर पावै ॥ हंस वरन हो तहवों जाई । जब सतगुरु सतशब्द लखाई ॥ एहि विधि वंस हंसकी करनी । ताते तुमसों कहुं वचन प्रमानी ॥
साखी—एहि वचन सत्य है, तुम वंश अंशको पान ।
कडिहारी लेखा सार है, हंसहि भाव भक्ति परवान ॥
( १४८ )
कबीरबानी
साखी-वंशअंशकी-धर्मदास उवाच
साँचे सतगुरु हम भल पावा । जमको धोखा सबहि मिटावा॥ गुरुशिष्यको भेद हम पावा । वंश अंश ले सबै परखावा ॥ अब वंश अंशका कहो प्रमाना । केते वंश केते अंश ठिकाना ॥ वंश अंश केते कडिहारा । तेहिकी परिचै देहो विचारा ॥ केतिक वंश कडिहारा समुझाई । केतिक संग हंस ले जाई ॥ केतिक प्रमानवंश हंसचलिजाई । सो समर्थ मोहे देहो चिन्हाई ॥
साखी-वंश अंशके प्रमान कहो, लेखा देहो बताय । एती सन्धि मोसों कहौ, सब संशय मिटजाय ॥
साखी-सब वंश प्रमानकी-सदगुरु कबीर उवाच
धर्मदास तुम बड़े विवेकी । तुम्हरे घट बुद्धी बड़ि देखी ॥ वचन वंश ब्यालिस ठीका । तिन्हको सत्रथ दीनो टीका ॥ वंश अंश वचन एक सोई । दीर्घ वंश अंश लघु होई ॥ जेठी अंश वचन मोरो जागै । और वंश जगके पीछे लागै ॥ तिन्हकी छाप चले संसारा । और वंश जगके कडिहारा ॥ बीस दिन और वर्ण पचीसा । इतना कुलमें चले सँदीसा ॥ साठि वरण अंशा प्रमाना । चारवंश तेहि माँहि समाना ॥ नामवंशकी पारख देऊ । तिनसे ब्यालिस वंश कहिदेऊ ॥ तिनसे ब्यालिस वंश कडिहारा । वचन वंश ब्यालिस पसारा ॥ चाल चले और पन्थ हटावै । भुले जिवन घर घर समुझावै ॥ वंश छत्रपतिसिद्ध सुधारी । नाम अंश करे कडिहारी ॥ धर्मदास एक वंशकी हानी । पावै वचन वंश सो समानी ॥ हमरो वचन सुरामनि सारा । वंशअंश ब्यालिस है अधिकारा ॥ सोह वंश जे वचन विचारे । विना वचन नहिं वंश हमारे ॥
बोधसागर
( १४९ )
कडिहार ओ हंस
वंश अंश मोहित कडिहारा । सदा हजुरी पलक न न्यारा ॥ वैसी चाल हंसकी होई । सदा हजुरी पलक दूरि न होई ॥
वंश अंश हंस प्रमाना
पीढी १
प्रथम वंश अंशकी बानी । बचन कडिहार एके प्रमानी ॥ दो सित्तर हंस तिन्ह तारै । अपने कर सब जीव उबारै ॥
पीढी २
दुसरे वंश अंश चलि आवै । पांच कडिहार निशानी लावै ॥ दूसरे वंश अंश अधिकारा । सातसौ तेरे जीव उबारा ॥
पीढी ३
तीसर वंश अंश जब दोई । नख कडिहार ताळुके होई ॥ हंस सोरासे लोक प्रमाना । १६०० । तिनके हाथ मुचन बन्धाना ॥
पीढी ४
चौथे वंश अंश जग आवै । भवसागरमो पीर कहावै ॥ तेरह सोहंस तीन कडिहारा । १३०३ । तिनके सङ्ग उत्तरि गयो पारा ॥
पीढी ५
तेहि पीछे काल अचरज होई । अंशाहि वंश विरोधे सोइ ॥ पांचवे वंश अंश परवाना । सात कडिहारा तिनके बन्धाना ॥ तीन हजार चारसै सोई । ३४०० । इतना हंस लोकको होई ॥
पीढी ६
छठे वंश अंश अधिकारा । ताते काल आनि पेठारा ॥ पुनि आवै पुरुषहि सहदानी । तरे कडिहार तिन्हके परवानी ॥ छःसै सत्तर सात हजार ७६७० । वंश अंश सङ्ग उत्तरे पारा ॥
( १५० )
कबीरबानी
पीढी ७
सातवें वंश अंश परवानी । द्वादश ताके कडिहार बखानी॥ तीन हजार पांचसै बावन । ३५५२ । इतने हंस पहुँचे मन भावन॥
पीढी ८
अठवें वंश बचन परकासा । सत्रा कडिहार तिनके रहे बासा॥ पांच हजार चारिसै बारह । ५४१२ । पहुँचे लोक पुरुष दरबारा॥
पीढी ९
नौमें वंश अंश जब आवै । पचीस कडिहार सङ्ग तब पावै॥ सात हजार आठसै छत्तीसा । ७८३६ । प्रगटे वंश अंश जगदीसा॥
पीढी १०
दशे वंश अंश अधिकारी । बत्तिस कडिहार भेद जग भारी॥ तीनसे पांच और आठ हजार । ८३०५ । तबही पंथ चढ़े असरारा॥
पीढी ११
ग्यारह वंश तेतीस कडिहारा । नवसै पांच और नव हजार ॥
पीढी १२
द्वादशवें वंश छत्तीस कडिहारा । ३६ दोसै सत्तर सात हजार ॥
पीढी १३
तेरहा वंश अंशकी बानी । चालिस कडिहार तिनके परमानी॥ सोरासहस्र चारिसै पन्द्रा । १६४१५ । पहुँचे लोक मिठै यम निद्रा॥
पीढी १४
चौदह वंश अंश निर्बाना । बावन ५२ कडिहार बोहित परवाना॥ तीससहस्र और नवसे तेरा । ३०९१३ सब पंथका न होय निबेरा॥
पीढी १५
पन्द्र वंश अंश चलि आवै । पंथ मेठि आप पंथ चलावै ॥ साठि कडिहार मिलि बोध चलावै । साठि हजार हंस मुक्तावै ॥ चालिस मण्डल भयो पसारा । तबहि पंथ चले असरारा ॥
बोधसागर
( १५१ )
पीठी १६
सोरह वंश कला अधिकारी। सत्तर ७० कडिहार शब्द उजियारी॥ चौंसठ हजार पांचसै बारा। ६४५१२। इतने हंस सब उतरे पारा॥
पीठी १७
सत्रह वंश अंशकी बानी। असी कडिहार तिन्हकी परमानी ॥ छिहत्तर सहस्र पांचसै तीसा। ७६५३०। धर्मदास कुल आदिसदीसा
पीठी १८
वंश अठरहे नवे कडिहारा। असी हजार हंस लै उतरे पारा ॥ ८००००० तब कलियुगकी दसी मिटाई। वंश अंश प्रगटे अधिकाई ॥
पीठी १९
उन्निस वंश अंश अधिकारा। एकसै सात तिन्हके कडिहारा ॥ छानवे हजार सातसै दोई। ९६७०२। इतने हंस लोकको होई ॥
पीठी २०
बीसो वंश अंशकी बानी। एकसौ तेरह कडिहार बखानी ॥ लाख एक औ बीस हजार। पांचसै हंस ज्योति निर्धारा ॥ ॥ १२०५०० ॥
पीठी २१
वंश एकसौ जग चलि आई। एकसौ तीस कडिहार अधिकाई ॥ १३० लाख दोय और तीस हजार। छःसे अंश जो पांच अधिकारा ॥ ॥ २३०६०५ ॥
पीठी २२
वंश बावीसे दोय सौ कडिहारा २००। तीन लाख और चालिस हजारा। सातसौ अंस जो बीस अधिकारा ॥ ३४०७२० ॥ जाग्रत बंस करे कडिहारा ॥
( १५२ )
कबीरबानी
पीढी २३
तेहस वंश अंशका बानी । दोईसै तेरा कडिहारा जो जानी २१३॥ तीन लाख और तीस हजार । इतने हंस जो पांच अधिकारा ॥ ३३०००५ ॥
पीढी २४
चौवीसे वंश अंश जग आवै । तीनसे कडिहार बीसते पावै ॥
पीढी २५
लाख चारि जो तीस हजार । चालिस हंस पहुँचे दरबारा ॥ वंश पचीसे तीनसे छप्पन कडिहारा । लाख पांच हंस भयो पारा ॥
पीढी २६
छबीसौ वंश चारसौ कडिहारा । लाख पांच और तीन हजार ॥ नबसै सत्तर हंस उबारा ॥ ५०३९७० ॥ इतना मर्म हंसको जानी । सब मंडल अटले रजधानी ॥
पीढी २७
सत्ताविस वंश अंश अधिकारी । छःसो हंस करै कडिहारी ॥ ६०० ॥ सात लाख छानवै हजार । सातसै पैसठ हंसनिर्धारा ॥ ७९६७६५
पीढी २८
वंश अठाविस जाग्रत होई । पांचसौ कडिहार जो पंद्ररा सोई ॥ ५१५ ॥ लाख चारि जो बीस करोरी । पैतिस हजार तीन सौ कोरी ॥ ॥ २००४३५३०० ॥
पीढी २९
उनतिस वंश मंडल उनचासा ॥ सातसै तीस कडिहार प्रकाशा ॥ ७३० ॥ तीस करोर लाख है सोरा । साठ हजार सात सौ तेरा ॥ ॥ ३०१६६०७१३ ॥
बोधसागर
( १५३ )
पीढ़ी ३०
वंश तीस नौसों कडिहारा ९०० बयालीस करोड़ लाख है सत्रा ॥ बारा हजार आठसों सत्रा ॥ ४२१७१२८१७ ॥ इतना हंस कीन्ह पवित्रा ॥
पीढ़ी ३१
एकतिस वंश त्रेपन हजारा । चारिसौ बावन भये कडिहारा ४५२ सत्तर करोड़ और पैंसठ लाख । सैंतालिस हजार और नौसे बावन हंस उबारा ॥ ७०६५४७९५२ ॥
पीढ़ी ३२
बतीसे वंश सतावन हजारा । नौसौ सैंतालिस तिनके कडिहारा ५७९४७ ॥ एक पदम दोय नील बखानी । छहत्र करोड़ लाख बाविस जानी । नौ हजार सातसे तेरे । इतने हंस पहुँचे निजमेरे १०२००००७६२२०९७१३ ॥
पीढ़ी ३३
तेतिस वंश ओनसठि हजारा । छेत्तीस हंस अधिकारी कडिहारा । ५९०३६ । चारी शंख पदम दस सोई । तीस खर्व नील ब्यालिस होई ॥ सित्तर लाख और पचीस हजारा । सातसे हंस चार अधिकारा ॥ ४१०४२३०००००७०२५७०४
पीढ़ी ३४
चौतीसौ वंश और बासठि हजारा । सातसों चौपन तिन्हके कडिहारा ॥ ६२७५४ ॥ छतिस शंख खर्व उनहत्तर ॥ चारि पदम अर्व छेहत्तर ॥ बत्तीस करोड़ लाख नव आवै । ब्यालिस हजार तीनसे आवै ३६०४००६९७६३२०९४२३०० ॥
पीढ़ी ३५
वंश पैंतिससत्तर हजारा । पांचसै उनचास तिनके कडिहारा ॥ ७०६४९ ॥ पदम असी सात खर्व अर्व है बारे । छत्तीस
( १५४ )
कबीरबानी
कोड़ लाख है तेरे । बारे हजार नवसै साता । पहुँचे हंस निज इतने साथ ८००००७१२३६१३१२९०७ ॥
पीढ़ी ३६
छत्तीस बंस और साठ हजारा । तीनसै चौसठ तिन्हके कडि- हारा ॥ ६०३६४ ॥ पचहत्तर पदम खरब उनचासा । अर्बुद सात करोड़ पचासा ॥ लाख चार तेरा हजारा सातसै बावन । इतने हंस पहुँचे मनभावन ॥ ७५००४९०७५०००४१३७५२ ॥
पीढ़ी ३७
सतीससै वंश और चौसठ हजारा । सातसै पैतालीस हैं कडि- हारा ॥ ६४७४५ ॥ सत्तर शंख पदम नव होई । छचासी खर्व नील बावन सोई ॥ नव अर्बुद हैं चौदह करोड़ी । ग्यारे लाखा बारे हजारा नौसै तेरे जोड़ी । मंडल अठानवें फिरे दोहार्द । सत्य थापि असत्य उठार्द ॥ ७००९५२८६०९१४१ ११२९१३ ॥
पीढ़ी ३८
अडतीसौ वंश बहत्तर हजारा । छहसै तेरा हंस कडिहारा ॥ ७२६१३ ॥ शंख तीस और खरब है सोरा । नव अर्बुद करोर है तेरा ॥ छप्पन लाख हजार चौबीसा । नवसै बहत्तर पहुँचे हंसा ॥ ३०००००१६०९१३५६२४९७२ ॥
पीढ़ी ३९
उनतालीस वंश और असी हजारा । सातसौ तिहत्तर तिनके कडिहारा ॥ ८०७७३ ॥ पांच अशंख शंख पंचवीसा । चालिस पदम नील एक बीसा । सात खरब अरब है बारे । नव करोड़ लाख है छचालु । पंचवीस हजार सातसौ बानी । बानी उत्तम जानि बखानी । इतने हंस लोक भल जानी ।
बोधसागर
( १६६ )
पीढी ४०
चालिस वंश छ्यासी हजार । नवसै बहत्तर तिनके कडिहार॥ ४६९७२ ॥ नव शंख नीले हैं । बाबन । पचहत्तरि खरब ॥ अर्ब दोय भावन ॥ सात करोड़ और बत्तिस लाख ॥ त्रेसठ हजार पांचसै तेरा साथ । इतने हंस लोक लै राखा ॥ ९००५२७५०२०७३२६३५१३ ॥
पीढी ४१
व्यालीसवै वंश विस्तारा । लाख एक चौसठ हजार कडिहारा ॥ गणित हंस लहै को पारा । १६४००० ॥ तीस अंश शंख परदा सोई । आठ नील नौ खर्ब तहां होई॥ अर्ब बयालिस तेरा करोड़ी । ग्यारा लाख सहस्र दश जोरी॥ इतनो वंश अंश हंसको लेखा । जो पहुँचे सो करै विवेका ॥ ३०१५०००८०९४२१३१११००० ॥
एते बचन वंश परमाना । सो पावै निज वंशको पाना ॥ चारि गुरुके बाहर राखो । उन्हके प्रमान उन्हीसो भाखो॥
साखी-कहै कबीर
वंश अंश हंसकी निर्णय, और कडिहारी लेख । कहैं कबीर धर्मदास सों तुम हिरदै करो विवेक ॥ लिखेत कबीर बाकीके कलसा । धर्मदास पूछेव ।
चौपाई
धर्मदास बिनती अनुसारी । धनि सतगुरु तुम्हरी बलिहारी॥ संशय एक मोरे दिल आई । सो समर्थ मोहे कहा समुझाई ॥ इतना आगम ठानी तुम राखा । सो समर्थ तुम आगम भाखा ॥ वंश संग चलै कडिहारा । सो तुम खोलि कहो विस्तारा॥ कडिहार संग जो हंस पियाना । ताका तोतुल्लकीन्हा बन्धाना॥