भारतकोश
संग्रह पर लौटें

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

( १५६ )

कबीरबानी

तिनमें फेरफार कछु नाईं । सो समर्थ कहिं दिखलाई ॥ सबही हंसलोकको जाई । तो काहेको पुनि करै कमाई ॥ सब कडिहार जहँ एक ठिकाना । सब हंसनको एकै स्थाना ॥ सबही हंसा एक सरीखा । अबगुरुमहिमाकोकौनविशेषा ॥ एक भौम्य एक है स्थाना । सब कडिहार एक करि जाना ॥ वचन वंश थापै कडिहारके बोधे । योग युक्ति काहेको सोधे ॥ काहेको एहि तन मन वारे । काहेको धन जोवन गारे ॥ काहेको चरणाभूत लेही । सीथ लियेकी महिमा केही ॥ सबही हंस हैं एक समाना । काहेको चौका आरतिठाना ॥

साखी-धर्मदास

भलौ नांव बाही कैलको, जिव सब एक न समान । जैसी कमाई जीवकी, ताको देवै सोउ स्थान ॥

चौपाई सद्गुरु कबीर उवाच

सुनो धर्मदास यह भेद नियारा । तुमकोखोलिकहों सोनिस्तारा ॥ सब रजधानी पुरुषहि कीन्हा । कैलकसिखावनपुरुषहिदीन्हा ॥ ऐसी शंक जिन पूछो भाई । कच्चा जीव बिचलिके जाई ॥ समुझे हंस बहुत सुख पाई । सर्वज्ञान कालमूल बताई ॥ द्वादश पंथ भेद ना पावो । सातों सुरति पुरुष निर्मावो ॥ सर्व सरीखे नहिं होय कडिहारा । कैसे रहे एक दरबारा ॥ केतिक सातों सुरति घर जैहैं । उन्हके दीपमो वासा लैहैं ॥ सोलहै अंश समर्थ बड़ कीन्हा । उन्हको दीप बड़े बड़े दीन्हा ॥ कितने रहैं उन्हे दीप मँझारा । आपन बोध लिये कडिहारा ॥ अवरदीप पुरुषके रहई । उन्हीं दीपमें वासा लहई ॥

बोधसागर

( १६७ )

सहस्र अठासी दीप सुधेरा ८८००० । तहाँ सब हँसा करै बसेरा ॥ सब दीपनमाँ शोभा पावैं । वहाँके गए बहुरि नहिं आवैं ॥

गुह्यभेद

एक बात है अन्य नियारी । सोइ मैं धर्मनि कहीं पुकारी ॥ सकल दीप थे दीप निन्यारा । तहवाँ अमरथको दरबारा ॥ कितने कडिहार वा घरकूँ जाई । गुप्त भेद तुम अच्छप छिपाई ॥

छन्द—तहाँ समर्थ आपबिराज है ताका महिमा को लहै । दीपउजियारी कहा बरनौ बास स्वासा सो रहै ॥ आन दीपके हंस हैं सो वाको जाने नहीं ॥ उहाँके वासी हंस सोहेला सो और दीप मानैं नहीं ॥ सदा हजूरी हंस विहँगम जिन देही उन बिसराइया ॥ गुरु शिष्य दोई एक होइकै सो वा दीपसिधाइया ॥

सोरठा—कदली केरे पात, पात पातमें पात है । ऐसे बात बातमें बात, जानेगा जन जोहरी ॥

चौपाई—धर्मदास उवाच

धर्मदास फिरि शीस नवावा । दोउ कर जोरिके विनतीलावा ॥ सोइ हंस रहै पुरुष हजूरी । उनकी रहनि कहौ गुरु थोरी ॥ कैसे रहै वे कैसे बोलैं । कैसे बैठैं वे कैसे डोलैं ॥ कौन ज्ञान कौन है करनी । सो सद्गुरु कहो मोहि बरनी ॥ जगमें रहै कौन सत्य भाऊ । कैसे काया केर सुभाऊ ॥ आन दीप रहै सत्य सुभाऊ । कहो उन्हकी कायाकेर प्रभाऊ ॥ दोउकी परचै मोहि सुनावो । ज्ञान दृष्टि करि मोहि दिखावो ॥

साखी—यह कछु अचरज बात है, कहि दिखावो मोहि । देखो ज्ञान बिचारिके, तबहि हृदय सुख होहि ॥

( १५८ )

कबीरबानी

सद्गुरु कबीर उवाच

सुनो धर्मदास मैं कहूँ समझुझाई । गुह्य भेद जिन बाहेर जाई ॥ द्वादश पंथ यह भेद न पावे । वेहे दोजकका पंथ चलावे ॥ बहुत होइहै अपनो कडिहारा । सो नहि जाने भेद हमारा ॥ पूर्ण दया सद्गुरुकी होई । वंश आपुमें लेहि समोई ॥ जिनकं देहि निर अक्षर पहिचानी । सो कडिहार लेअगमकीबानी ॥ सो निज पावे भेद टकसारा । सदा हुजूरी पलकनहि न्यारा ॥ देखा देखी करै कडिहारा । भेद न पूछे सूठ गँवारा ॥ देखा देखी बोध चलावै । फूलि फूलि साखी पढ़ गावै ॥ चौके बैठि ना करै निरुवारा । चौका जुगति ना जाने गँवारा ॥ पुरुष अंश पुरुष सम होई । अपने दीप ले जावे सोई ॥

विहंगमतिके हंसवर्णन

अब तुम सुनौ विहंगम बानी । विहंगमति हंस पहँचानी ॥ निरअक्षर निस्तत्त्व निवासा । निहंतत्त्व अगम्य है वासा ॥ चौका करै जानै वहिवारा । अंश बनीसै सबसो प्यारा ॥ सब अंशनको प्रमाण करिजानै । अपने अपने स्थान वे जानै ॥ सब अंशनकी लाग्य चुकावे । सुरति निरति सद्गुरुसों पावे ॥ नौतम सुरति संग सनेही । एको पलक दूर नहि होई ॥ ओ कहिये बोहोत कडिहारा । सदाहुजूरी पलक नहि न्यारा ॥ अस कडिहार ते साररसहोही । एक प्राण दोई है देही ॥

साखी-जैसी मति कडिहारकी, तैसी मति हंस होय ।

सदाहुजूरी पुरुषके, छिन छिन दर्शन जोय ॥

चौपाई-धर्मदास उवाच

सुने सद्गुरु कडिहार रहानी । सबहि स्थान परे मोहि जानी ॥ अब कहिये नूर हंसका भाऊ । सो समर्थ मोहि बानी सुनाऊ ॥

बोधसागर

( १५९ )

आन दीपमों करै रजधानी । प्रथम भाषौ उनकी सहिदानी ॥ सदा रहै वह पुरुष हजूरी । उन हंसनकी कहो मत पूरी ॥

साखी-जेहि तुम बानी कहत हौ, मोहि सुनि होत अनन्द । पूरा सदगुरु पाइया, मिटे कालके फन्द ॥

चौपाई-सदगुरु कबीर उवाच आनद्वीपके हंसनके वर्णनकी

अब सुनियो उन हंसनकी बानी । कुल करनीमें रहै लपटानी ॥ सहजभाव वोह भक्ति करैहीं । झूठ संसार सों रहै सनेहीं ॥ चौका आरति ज्ञान समाना । दोह दिशा वह रहै लपटाना ॥ इतनी वंश छाप अधिकाई । थोखे हंस नष्ट नहि जाई ॥ जिन्ह जैसी चाल प्रमाना । जो जस पहुंचे जाहि स्थाना ॥ जिन हंसन जैसो सुतन सवारा । जाहि दीपमें बास बसारा ॥ सब दीपनमें करै आनंदा । देहि कांत ऊगे रवि चन्दा ॥

विहंगमस्ती हंसके वर्णन

अब तुम सुनो उन हंसकी बानी । विहंग मताके हंस पहिचानी ॥ जगमें रहै कमल जस भाऊ । तन मन यौवन सब विसराऊ ॥ देहि इहां सुरती गुरुरचना । सूझै नहि सुखजीव न मरना ॥ जैसे सर्प कांचरी जानै । कायाको ऐसे करि मानै ॥ युक्ती युक्ती देह बनावै । जगका सुखनहि उनको भावै ॥ गुरु शिष्य एकै मत होही । एकै प्राण दाई है देही ॥ सो कडिहार गुह्य नहिं भाई । सोही जाने ताके ताई ॥ सोई हंस जानौ सब दूरी । जिन्हको कहिये पुरुषहजूरी ॥ नूतन सुरति है उनके पास । सो कडिहार रहत उरदासा ॥ ज्ञान ध्यान सदगुरु मन प्यारा । सदा हजर पलकनहि न्यारा ॥ युक्ति सांझि चरणामृत लेही । युक्तिहि युक्ति बनावै देही ॥ सदा रहे वह पुरुष हजूरा । छिन छिनदर्शपलक नहिं दूरा ॥

( १६० )

कबीरबानी

चार लाख छानवै हजारा । नवसै बावन निज कडिहारा ॥ इतने कडिहारनिजधरै सिधवै । छिन छिन दर्श पुरुषका पावै ॥ इतनेके शिर छत्र धराई । अर्थ सिंहासन बैठक पाई ॥ हंस सुहल जाइ हजुरी । छयानौं लाख औरतेराकरोरी ॥ बावन हजार पांचसे आवै । इतने हंस शिर चैवर करावै ॥ एक देही एकै हैं मूला । पुरुष हंस एकसम तूला ॥ पुरुष हंस एक सम भाई । सबके शीसपर छत्र तनाई ॥ इतना सुख है पुरुष हजुरा । पहुँचे हंस सदगुर मत पूरा ॥

साखी-निःतत्त्व भेद यह गुप्त है, पांच तीनसे न्यार ।

निःतत्त्वी जो हंस हैं, जैहैं पुरुष दरबार ॥

धर्मदास वचन चौपाई

सांचे सतगुरुकी बलिहारी । अपनाकरिजिन लीन्ह उबारी ॥ कठिन काल दारुन बड़ होई । यहि संसार लखै ना कोई ॥ विन सतगुरु कोई भेद ना पावै । सतगुरु मिले तो संधि लखावै ॥

साखी-मनका संसय सब मिटा, हम पाया गुरु पूर ।

विना परिचय जो गुरु करै, सो नर मूरख क्रूर ॥

चौपाई

सुनौ धर्मदास हम तुम्हैं बखानी । आदि अन्तकी सुधि तुम जानी ॥ सम्भवत पंद्रसै उनहतर आवै । सतगुरु चले उड़ीसा जावै ॥ जबलगि वंश करै गुरु आई । तब लगि धरनी धरौं न पाई ॥ जबलगि वंशब्यालिस संसारा । तबलगि नहिं आऊँ पिछारा ॥ वचनवंश हम ब्यालिस भाखा । जगकी मुक्ति वचनकी शाखा ॥

साखी-तीन लोक के बाहिरे, सात सुरतिके पार ।

तइवाँ हंस पहुँचावहुँ, समरथके दरबार ॥

इति ग्रन्थ कबीरबानी समाप्त

बोधसागर

( १६१ )

विवेचन

इस ग्रन्थकी एक ही प्रति सम्बत् १८४७ की लिखी हुई है इसकी दूसरी प्रति न होनेसे बहुत स्थानोंमें ज्योंका त्यों छोड़ना पड़ा है और अशुद्धियाँ रह गयी हैं । जब इतने वर्ष पीछेकी लिखी कबीरपंथी ग्रन्थोंकी यह दशा है तब नवीन कबीर पंथियोंकी लिखे ग्रन्थोंकी क्या गति होगी पाठक स्वयम् विचार कर लें ॥

इति

कर्मबोध (एकोनविंश तरंग)

सत्यसुकृत, आदि अदली, अजर, अचिन्त, पुरुष, मुनीन्द्र, कर्तुणामय, कबीर, सुरति योग, संतायन, धनी धर्मदास, चूरामणिनाम, सुदर्शन नाम, कुलपति नाम, प्रबोध गुरुबालापीर, केवलनाम, अमोल नाम, सुरतिसनेही नाम, हकनाम, पाकनाम, प्रकट नाम, धीरज नाम, उग्र नाम, दया नामकी वंश- व्यालीसकी दया

अथ श्रीबोधसागरे

एकोनविंशस्तरंगः

कर्मबोध

कर्म कथा अब कई बखानी । जौन फांस अटके नरप्रानी ॥ चारों खानि कर्म अधिकाई । चहूँ खानी मिलि कर्म हढ़ाई ॥ कर्महि धरती पवन अकाशा । कर्महि चन्द्र शूर प्रकाशा ॥ कर्महि ब्रह्मा विष्णु महेश । कर्महिते भयो गौरि गणेशा ॥

बोधसागर

( १६३ )

सात बार पन्द्रह तिथि साजा । नौ ग्रह ऊपर कर्म विराजा ॥ कर्महि राम कृष्ण अवतारा । कर्महि रावण कंस संहारा ॥ कर्महिते ले वसुदेव घर आवा । कर्म यशोदा गोद खिलावा ॥ कर्महिते वन गऊ चराई । कर्मते गोपी केलि कराई ॥ कौशलया तप कर्म जो करिया । कारण कर्म राम औतरिया ॥ कर्महि दशरथ कीन्ह उदासा । कर्महि राम दीन्ह बनवासा ॥ कर्म जाय जब धनुष चढ़ावा । कर्महिजनक सुता सिर नावा ॥ कर्म हरचो सीता कहैं आई । दुख सुख कर्मताहि भुगताई ॥ कर्म रेखते कोई न मुक्ता । लछिमन राम करम फल भुगता ॥ कर्मसागर बांधेउ बन्ध कहिया । कर्महिजल जीवन दुख सहिया ॥ रुद्र राम कर्म कीन्ह लड़ाई । भला मिलाप हनू भेट चढ़ाई ॥ कर्मरेख नहिं मिटे मिटाई । जीव पपील लंका होय आई ॥ कर्मरेख लंकापति गयो । लंकापति बिभीषण भयो ॥ कर्म रेख सबहीं पर छाजा । कहा राम कह रावण राजा ॥ कर्मरेख सबहीं पर होई । देखो शब्द बिलोय बिलोई ॥ कर्मरेख सागर बँध हीना । बिरला कोई चीन्हे चीन्हा ॥

साखी-कर्म रेख सागर बँध्यो, सौयोजन मर्याद । विन अक्षर कोई ना छुटे, अक्षर अगम अगाध ॥

रमैनी

सागर भव सागर धारा । नहिं कुछ सूझे वार न पारा ॥ तहवाँ बावन अक्षर लेखा । कर्म रेख सबहिन पर देखा ॥ कर्म रेख बंधा सब कोई । खानी बानी देखि बिलोई ॥ वेद कितेब कर्महीं गाया । कर्महिको निःकर्म बताया ॥ सद्गुरु मिले तो भेद बतावैं । कर्म अकर्म मध्य दिखलावैं ॥ कर्म अकर्म मध्य है सोई । सो निःकर्म अकर्म न होई ॥

( १६४ )

कर्मबोध

अक्षर सागर निर्भर बानी । अक्षर कर्म सबन पर जानी ॥ गोरख भरथरि गोपीचन्दा । कर्म फांस सबही पुनि फन्दा ॥ सौ औ सात चौदह इक्कीसा । ब्रह्माके चौरासी भेसा ॥ कर्म फांस तहवों लग राखा । जहाँ लगवेद व्यास कछु भाषा ॥ दश औ द्वादश कर्म बखाना । जिन जाना तिनही पहिचाना ॥ कर्म अकर्म मूल जो करई । गहे मूल सो कर्म न परई ॥ अक्षर सागर मूल भँडारा । अक्षर मूल भेद उजियारा ॥ अक्षर मूल भेद जो जाने । कर्मी होय निःकर्म बखाने ॥

साखी-कबीर-कर्म डोर चारों युग, सुनो सन्त सब दास । तत्त्वभेद निस्तत्त्व लहि, जगते रहो उदास ॥

रमैनी

सतयुग तप कीन्हे रघुराजा । कारन कर्म नन्द घर गाजा ॥ एक नारि रघुवर दुख पावा । सोलह सहस गोपी निरमावा ॥ कारन कर्म केलि भवकीन्हा । कुञ्ज कुञ्ज गोपिन सुख दीन्हा ॥ जहँ तहँ गोरस जाय चुरावा । जहँ तहँ कर्म तहाँ ले खावा ॥ कर्म कंस ठीका आयो जबहीं । मारन कृष्ण विचान्यो तबहीं ॥ कर्म पूतना भेष बनायो । कर्म पयोधर कृष्ण लगायो ॥ कर्म कारण जो तहाँ सिधारा । कारण कर्म पीव विषधारा ॥ मारि तासु कीन्हीं गति चारा । कर्म फांस बोन्यो संसारा ॥ कर्म इन्द्र बरस्यो दिन साता । कर्म कृष्ण गिरि लीन्यो हाथा ॥ कर्महि मारि विध्वंस जो कीन्हा । कर्म फांस सबही आधीना ॥ कुञ्जा कछू कर्म जो कीन्हा । कारन कर्म कृष्णगति दीन्हा ॥ कर्मपताल कालेश्वर नाथा । सांवर अङ्ग भयो तेहि साथा ॥ यज्ञ अश्वमेध करत बलिराजा । कर्मते जाय पताल विराजा ॥ कर्मही वामन रूप बनाया । बलिराजापै दान दिवाया ॥

बोधसागर

( १६५ )

कर्म अहूठ नापी पग लीन्हा । तीनै पुग तीनों पुर कीन्हा ॥ आधा पांव कर्म अधिकारी । बाँ नृपति पातालहिं डारी ॥ जहँ लगि जीव जन्तु उत्पानी । तहँ लगि कर्म राय परवानी ॥ कर्म फाँस ते कोई न छूटे । कर्म फाँस सबहिन घर लूटे ॥

सारखी-कर्म फाँस छूटे नहीं, केतौ करो उपाय । सद्गुरु मिले तौ ऊबरे, नहीं तो परलय जाय ॥

रमैनी

जो कुछ कर्म जगतमें करई । करि करि कर्मबहुरि भवपरई ॥ एक न होय यज्ञ व्रत ठाना । एक न पाप पुण्य पहुँचाना ॥ एक कर्म कुल लीन्ह उठाई । कर्म अकर्म न जाने भाई ॥ एक छापा और तिलक बनावै । पहिरि मेखला साधु कहावै ॥ वैष्णव होय करै षट कर्मा । वेद विचार सदा शुचि धर्मा ॥ कथा पुराण सुनै चितलाई । कर्महिं सुमिरै बहुबिधि भाई ॥ विष्णुसुमरितपबहु विधि कियो । सो निष्कर्मबिष्णु नहिं भयो ॥ कर्मकी डोरि बँधा संसारा । क्यों छूटे उतरे भवपारा ॥ एक अभंग एकादशि करई । तन छूटे वैकुण्ठहि तरई ॥ यह वैकुण्ठ न स्थिर होई । अन्त कर्मगति परलय सोई ॥ करै कर्म वैकुण्ठहि जाई । कर्म घटे भवजलफिरि आई ॥ योगी योग कर्मको साधे । किरिया कर्म यवन आराधे ॥ योगी कर्म पवनकी किरिया । भुगतै कर्म देहपुनि धरिया ॥ संन्यासी जो बन बन फिरहीं । होय निष्कर्मकर्म फिर परहीं ॥ जीयत दग्ध देहको करई । जटा बढ़ाय व्यसन परिहरई ॥ कोई नग्र कोई वज्र कछोटा । भरमत फिरि सहे पग ढोटा ॥ राजद्वार पावै अवतारा । भुगतै कर्म अकर्म व्यवहारा ॥ पण्डित जन सब कर्म बखानी । नख शिखकर्म फाँस अरुज्ञानी ॥

( १६६ )

कर्मबोध

कर्म धर्मकी युक्ति बतावे । दान पुण्य बहुविधि अर्थावे ॥ वज्र दान लै जन्म गँवाँवे । होय ऊंट बहु भार लदावे ॥ एक जो करै बरत अवतारा । होई है सूकर श्वान सियारा ॥ सूकर श्वान होकर्मजो भुगता । विन निष्कर्म न होइहे सुकता ॥

सारखी

कबीर-बहु बन्धनसे बाँधिया, एक विचारा जीव । जीव बेचारा क्या करे, जो न छुड़ावे पीव ॥

रमैनी

शब्द भेद निःशब्द बताओं । करि निःकर्म हंस सुकताओं ॥ निरालम्ब अवलम्ब न जानै । शब्द निरन्तर आप बखानै ॥ पाप पुण्यकी छोड़े आशा । कर्म धर्मते रहे उदासा ॥ रहे उदास नाम लौ लाई । तत्त्व भेद निस्तत्त्व समाई ॥ तीर्थ व्रतके निकट न जाई । भरम भूतको दई बताई ॥ सुखसम्पत्तिनिहिं बिपत्ति विसारे । काम क्रोध तृष्णा परचारे ॥ क्रिया कर्म आचार विचारे । होय निःकर्म कर्म निर बारै ॥ सो ग्रहै जो नियह काया । अभिअन्तरकी मेटे माया ॥ शील स्वभाव शरीर बसावे । अन्तर स्थिर ध्यान लगावे ॥ ब्रह्म अग्नि मनमें परजाले । ताको विष्णु चरण परछाले ॥ गहे तत्त्व निस्तत्त्व बिचारा । काम क्रोधका करे अहारा ॥ सहज योग सो योगी करई । कर्म योग कबहुँ नहिं परई ॥ धन यौवनकी करै न आशा । कामिनि कनकसे रहे उदासा ॥ चहुँ दिशि मंसा पवन ककोले । ज्ञान लहर अभ्यन्तर डोले ॥ उनमुनि रहे भेद नहिं कहई । तत्त्व भेद निस्तत्त्वहिं लहई ॥ ना कोई आय अग्नि होय दहई । आप नीर होय नीचा बहई ॥ मन गयन्द गुरुमतसे मारा । गुरु मन लूटे ज्ञान भँडारा ॥

बोधसागर

( १६७ )

शरा होय सो सम्मुख जूझै । भोंदू शब्द भेद नहि बूझै ॥ दुखिया होय रैन दिन रोई । भोगी भोग करै सुख सोई ॥ दुख सुख भोग सोगसम जाने । भली बुरी कछु मन नहि आने ॥ भली बुरीका करे सो त्यागा । निश्चय पावै वह वैरागा ॥ सोंगी अछय रैन दिन बाजै । सिद्ध साधु तहँ आसन छाजै ॥

सारखी-आसन साधे आपमें, आपा डारै खोय ।

कहैं कबीर सो योगी, सहजै निर्मल होय ॥

काल पुरुषने जब सृष्टिकी उत्पत्ति की तब कर्मका जाल बनाया । वे कर्म दो प्रकारके हैं । एक शुभ दूसरा अशुभ । ये दोनों कर्म बड़ी बेड़ी हैं । इन दोनों कर्मोंकी बेड़ीने समस्त सृष्टिको बाँध लिया । जो कोई शुभ कर्म करता है सो सांसारिक धन स्वर्ग वैकुण्ठ इत्यादि सब सुखकी सामग्री पाता है और इस पुण्यका अंतिम फल चार प्रकारकी मुक्ति है, इससे अधिक नहीं । सो सब बनावटी हैं ऋषीश्वरोंने कठिन तपस्या की और योग समाधी तथा पूजादिको उच्च श्रेणीपर पहुँचाया । दाससे स्वामी बन गये तो भी उनका बन्धन न छूटा और आवागमनमें फँसे रहे । काल पुरुषने समस्त वेद और किताबवालों को इन्हीं दोनों कर्मोंमें बाँध लिया । इस कर्मके तीन भेद हुए । कर्म-अकर्म विकर्म । कर्म तो मनुष्यको करना उचित है । अकर्मसे दूर भागना और विकर्मसे मनुष्य अपनेको मुक्त और भाग्यवान बनाता है जो शास्त्रानुसार कर्म ईश्वर निमित्त किया जाता है वह विधि है । दूसरा अकर्म जिससे लोक परलोकमें कहीं सुखकी प्राप्ति नहीं होती है, उसे शास्त्रसे निषेध कहते हैं, यह अकर्म ईश्वरके विरुद्ध है विकर्म उसको कहते हैं जिसके करनेसे कर्मसे छूटे और बन्धनकी पाश टूटे और ज्ञान लाभ हो । पहिले स्वर्ग आदिककी लालच

( १६८ )

कर्मबोध

दिखाकर कर्म करवाते हैं इसके उपरान्त स्वर्ग इत्यादि सुख सबका त्याग है । जिस प्रकार पिता रोगी लड़केको लड़ू दिखाकर औषध देता है, उसी प्रकार स्वर्ग तथा वैकुण्ठादिकी लालच मनुष्योंको दिखाई गई है । फिर भी एक कर्म तीन नामोंसे प्रख्यात हुआ संचित-प्रारब्ध-क्रियमाण । सञ्चित उस कर्मको कहते हैं जो रक्षापूर्वक रखा हुआ हो-अर्थात् सहस्रों जन्मसे बराबर उसके साथ लगा चला आता है। ऋण अदा करनेका समय नहीं मिला और वह ऋण माथे चढ़ा रहा । दूसरा प्रारब्ध कर्म वह है जिसे भाग्य कहते हैं । इसी प्रारब्ध कर्म अनुसार मानुषिक शरीर प्रस्तुत हुआ है । अर्थात् अपने पूर्वकर्मानुसार शरीर बना है । जब यह जीव अपने पूर्व शरीरको छोड़ता है तब अहम् बोलता है । अहम् का अर्थ मैं हूँ । अहं बोलकर दूसरे शरीरमें प्रवेश करता है । चारों खानिके जीवोंकी यही रीति है । जैसे एक प्रकारका कीड़ा होता है । जो वृक्षोंके पत्तोंपर रहता है जब वह एक पत्तेको छोड़कर दूसरेपर जाया चाहता है तब पहले वह अपने अगले पैरोंको पत्तेपर जमा लेता है । जब उसके अगले पैर दूसरे पत्तेपर भली प्रकार जम जाते हैं । तब वह अपने पिछले पैरोंको भी खींचकर दूसरे पत्तेपर जमा लेता है और अगले पत्तेपर भली प्रकार जम कर बैठ जाता है । और पिछले पत्तेसे संबन्ध छोड़ देता है इसी प्रकार सदैव ही इस ( जीव ) का आवागमन हुआ करता है । ब्रह्मासे लेकर सर्वजीवोंमें अहङ्कार भरा हुआ है जिसमें अहङ्कार नहीं उसका आवागमन नहीं अहम् बोलनेसे उसके आवागमन सम्बन्ध बराबर जारी रहता है । वह ब्रह्मा जो पहले अहम् बोला वही ब्रह्मा अनन्त स्वरूप और स्वभावोंमें चारों खानमें समा रहा है । अहम् कर्मोंका आकर्षण है ।

बोधसागर

( १६९ )

जो एक योनिसे स्त्रीचकर दूसरीमें डाल देता है । जैसे चुम्बक लोहेको स्त्रीच लेता है ।

तीसरा क्रियमाण कर्म वह है जो अब कर रहे हैं । यदि यह क्रियमाण कर्म बलवान् होकर शुभ वा अशुभकी ओर झुका तो वह अपना रङ्ग ढङ्ग दिखला देता है । यदि वह सुकर्मकी ओर झुक जावे और सुकर्मकी पूर्णता करले तो वह अपने स्वरूपको प्राप्त करा देता है । यदि अशुभकी ओर झुका तो जड़ योनिमें जा समाता है और नरकके समस्त दुःखों तथा अत्यन्त कष्टोंमें अपनेको डालकर कंकड़ पत्थरकी तरह बेकाम कर देता है, फिर उसको सुपथ नहीं मिलता ।

महाकर्ता-महाभोगी-महात्यागी । महाकर्ता उसको कहते हैं कि, जो कर्म करता है और अपनेको कर्ता नहीं मानता ।

महाभोगी उसको कहते हैं कि, जो सर्व भोग भोगता है और अपनेको भोगता नहीं मानता ।

महात्यागी उसको कहते हैं जो अहंकारको त्याग दे । इस त्यागका गुण तब जाना जाता है जब उसको अन्तर-दृष्टि होती है जबल्लों इन तीनों बातोंका गुण भलीप्रकार जाना न जावे तबल्लों वेद और पुस्तक पाठसे कोई लाभ नहीं होगा । अन्तरदृष्टिसे जाना जाता है कि, यह तीनों क्या बात है ।

महाकर्ता तो यह तब होता है कि जब यह अन्तरदृष्टिसे भली भाँति देखता है, कि मैं कुछ करही नहीं सकता और मैं किसी कार्यका कर्ता नहीं हूँ केवल मैं अपनी मूर्खतावश आपको अपने कार्यका कर्ता समझ रहा हूँ । मैं और यह समस्त संसार कलके सहश चल रहा है । मेरा और किसीका कोई वश ही नहीं कि कोई काम करे । न मालूम वह कौन है जो मुझको तथा समस्तसंसारको

( १७० )

कर्मबोध

चला रहा है। जब मैं कुछ करता ही नहीं और न मेरा किया कुछ हो सकता है, ऐसी अवस्थामें यह अपनेको कर्मोंका कर्ता नहीं मानता। जब यह अपनी अन्तरदृष्टिसे भली प्रकार देख लेता है तब फिर यह अन्यान्य ओर ध्यान नहीं देता और जानता है कि जब मैं किसी कार्यका कर्ता ही नहीं तो मैं व्यर्थही अपनेको कर्ता क्यों ठहराऊँ ? तब वह अज्ञानतासे पृथक् होता है। संसारी इसी अज्ञानतामें फँसा रहता है और आपको अपने कर्मका कर्ता समझकर दुःख सुखमें धक्के खाता है। मैं क्यों अहम् बोलता हूँ नहीं जाने मुझे कौन अहम् बोलता है और कौन बोलता है। अतः इससे जाना गया और प्रमाणित हुआ कि मुझको मेरे कार्योंके बन्धन अहम् बोलाते हैं और दूसरा कोई नहीं। जब मैं अपने कर्मोंके बन्धनसे छूट जाऊँगा तब मेरा अहम् बोलना भी छूट जावेगा। जबलें यह आपको करनेवाला मानता है तब-तक यह क्रियामें आपको स्वतन्त्र समझता है। तब यह अन्तर दृष्टिसे भली भांति निगाह कर लेता है कि, मैं अपने कर्मोंका कर्ता नहीं, तब अपने शुभ अशुभ कर्मोंको परमेश्वरको सौंपके और उसके शरणमें होकर उससे सहायता मांगता है और जान लेता है कि, मेरे कार्य मुझको बचाने योग्य नहीं। मैं सत्यगुरुकी शरण हूँ, इसके अतिरिक्त और छुटकारेका कोई उपाय नहीं है। अपनी अज्ञानताके कारण मैं अपने कार्योंका कर्ता आपको जानता था; परंतु आगे अब ऐसा कदापि न कहूँगा।

यदि यह स्वतन्त्र होता तो सब कुछ करलेता। फिर अपनेको दीनता तथा दुर्दशामें कदापि नहीं फँसाता।

एक दिनका वृत्तांत है कि, एक पादरी साहब आकर मेरे पास बैठे और वाद विवाद पर प्रस्तुत हुए। उसने कहा कि

बोधसागर

( १७१ )

मनुष्य अपने कार्योंमें स्वतंत्र हैं इसपर मैंने उत्तर दिया कि यह बात कदापि नहीं, कर्म स्वतंत्रता किसीको प्राप्त नहीं। सब कलके समान गतिमान् हैं। सुतरां तौरीतमें उत्पत्तिकी पुस्तक देखो जब आदम उत्पन्न हुआ। खुदाने उसको मना किया कि तू यह कार्य कदापि न करना और इस वृक्षके फलको न खाना। आदमने न माना और खाया जिससे वह दुर्दशाग्रस्त हुआ। यदि आदम कर्म करनेमें स्वतंत्र होता तो ऐसा कदापि न होता। फिर आदमके पुत्र काबील और हाबील हुए वे भी ऐसे ही थे। कारण यह है कि, दोनोंने एक दिवस परमेश्वरके समक्ष भेंट चढ़ाई छोटे भाईकी भेंट तो स्वीकृत हुई और काबीलकी अस्वीकृत हुई, इस कारण काबील अत्यन्त क्रुद्ध हुआ, तब परमेश्वरने कहा कि ऐ काबील ? तू काहेको कोथ करता है यदि तू अच्छे मनसे देता तो क्या तेरी भेंट स्वीकार न की जाती ? परंतु तू अपने भाईपर जय पावेगा। काबीलने अपने भाईपर जय पाई और उसको मार डाला। जब परमेश्वरने उसको पूछा कि तेरा भाई हाबील कहाँ है। तब उसने उत्तर दिया कि मैं नहीं जानता क्या मैं अपने भाईका रखवाला हूँ। इस पर खुदाने उत्तर दिया कि तेरे भाईका खून मुझे पुकारता है। अब तू हत्यारा तथा दोषी हुआ यह कहकर खुदाने उसको शाप दिया। भलाजी ! यह न्यायकी बात थी कि खुदाने तो स्वयम् कहा कि तू अपने भाईपर जय पावेगा उससे जय पाई और उसको मार डाला। फिर वह दोषी कैसे ठहरा ? यदि अपने भाईको न मारता तो खुदा झूठा होता और मारा तो दोषी हुआ और वह हजूरसे दूर किया गया तथा उसकी सन्तान पापिष्टी ठहरी।

( १७२ )

कर्मबोध

ऐसा ही त्रहके विषयमें जानना चाहिये कि त्रह सिखाते-सिखाते विवश हो गया, किसीने उसका कहना न माना अन्तको बाढ़ आई और समस्त मनुष्य डूब मरे। कोई जीव सिवा उनके कि जो त्रहकी नावपर था नहीं बचा। फिर त्रहकी शिक्षा तथा खुदा की चौकसी किसी कामकी आयी। वह भी कर्ममें स्वतंत्र ठहरा जब बाढ़से सबको सत्यानाश कर चुका और त्रहकी ओर खुदाने ध्यान दिया तब खेद करने और पछ्ताने लगा कि मैंने सबको बाढ़से क्यों नष्ट किया। कारण यह कि मनुष्यों के ध्यान तो बचपनसे ही बुरे हैं अब भविष्यमें मैं बाढ़से लोगोंको न मिटाऊँगा। इससे प्रमाणित हुआ कि इस खुदाको भी स्वतंत्रकार्याधिकार प्राप्त नहीं यदि ऐसा होता तो जब वह आदमका पुतला बनाने लगा फिरिश्तोंने मना किया कि आदमका पुतला न बनाओ वे पाप करेंगे फिर पृथ्वी रोई और कहा कि मुझसे मिट्टी मत लो और मनुष्यका पुतला न बनाओ, मनुष्य बड़ा पाप करेंगे पर खुदा साहबने किसीका कहना न माना। अपनी इच्छासे मनुष्यका पुतला बनाया। आगे मनुष्योंके पापोंसे रुष्ट होकर बाढ़ लाकर पछताया आगे फिर मैं कैसे कहूँ कि खुदा साहबको कार्यस्वतंत्रता प्राप्त थी।

हजरत त्रहकी उपरांत हजरत इबराहीम अच्छे और पवित्र-खुदा के पैगम्बर हुए। वे भी स्वतंत्र नहीं थे कारण यह कि उनकी शिक्षासे नमरुद बादशाह इत्यादि सभी विरुद्ध होगये।

इबराहीमके उपरांत इसहाकको पैगम्बरी मिली और इसहाककी स्त्री रबका जब गर्भवती हुई उसके पेटमें दो बालक थे और वे दोनों पेटके भीतर परस्पर लड़ते थे-तब रबकाने खुदाके निकट जाकर निवेदन किया कि मेरे पेटके दोनों लड़के आपसमें क्यों

बोधसागर

( १७३ )

फिसाद करते हैं तब खुदाने कहा कि, बड़ा छोटेकी सेवा करके बड़ाई पावेगा । फिर इसहाकने ज्येष्ठपुत्र ईसूको बरकत देनी चाही पर उस बरकतको छोटा पुत्र याकूब ले गया । इसहाक-कीयुक्तिने काम नहीं दिया ।

देखो मूसाकी पहली पुस्तक २५ बाबका २१-२२-२३ आयत ।

इनके उपरान्त हजरत मूसा थे वह भी अपने कार्यमें स्वतंत्र नहीं थे । कारण यह कि परमेश्वरने मूसाको मिस्रमें फिर्हूनके सिखलानेके लिये भेजा और यह भी कह दिया था कि फिर्हूनके मनको मैं कड़ा करूँगा । वह तेरा कहना न मानेगा । मूसाकी शिक्षा किसी काम न आई ।

मूसाके उपरान्त हजरत ईसाने खुदासे बहुत प्रार्थनाकी कि सलीबसे बच जाऊं पर नहीं बचे ।

इसके उपरान्त मुहम्मद मुस्तफाने बहुत कुछ बललगाया और रक्तपात किया तो भी सबको मुसलमान कर नहीं सके यह बात सब कहकर और नहीं दिखाकर फिर मैंने पादरी साहबसे कहा कि इन महाशयोंमें तो कोई स्वतन्त्र नहीं ठहरा । कदाचित् आपके नाम अब खुदाई परमाना कार्य स्वतन्त्रताका उतर पड़ा हो तो क्या आश्चर्य है? मेरी बातें सुनकर पादरी महाशय चुप हो रहे और फेर मुखतारीका दावा छोड़ दिया ।

केवल कबीर साहबको ही स्वतन्त्रता है दूसरेको नहीं । कारण यह है कि, जब वे मनसे छुटकारा दिलाया चाहते हैं उसको अवश्य छुटाही लेते हैं और जो कुछ करना चाहते हैं करही लेते हैं उनका रोकनेवाला दूसरा नहीं ।

( १७४ )

कर्मबोध

जैसा कुल कार्य यह मनुष्य जाग्रत अवस्थामें करता है वैसेही कार्य स्वप्नावस्थामें किया करता है। परन्तु स्वप्नावस्थाके कर्मोंको कोई नहीं कहता कि मैंने किया। यद्यपि जाग्रत अवस्थाके कर्मोंका कर्ता यह स्वयम् बनता है कि यह कर्म मेरे हैं, यद्यपि जाग्रत तथा स्वप्नावस्था दोनों समान हैं। केवल उतनी ही विभिन्नता है कि, जाग्रत देरलों उसके साथ रहती है और स्वप्न थोड़ी देरमें बीत जाता है। यदि स्वप्नके कर्म उसके नहीं तो जाग्रतके कर्म भी उसके नहीं, इस कारण आपको स्वकर्ममें स्वतन्त्र समझना अज्ञानता है। यह स्वतन्त्र कदापि नहीं। ज्ञान की दृष्टिसे यह अहंकार जाता रहता है। इस जीवकी चारों दशा स्वप्नके समान हैं।

दूसरे महाभोगी वह है कि जो समस्त भोगोंको भोगता है और आपको भोगनेवाला नहीं मानता। यह भी बिना अन्तरप्रकाशके जाना नहीं जा सकता कि, भोगनेवाला कौन है और मैं कौन हूँ। यदि मैं भोगनेवाला होता तो मैं जो चाहता सो भोग भोग लेते और भोगोंसे कभी न भागता। कोई भोग ऐसा नहीं है कि जो भोगोंसे अलग जानता है उसके सामने अच्छा और बुरासमस्त भोग समान हैं कारण यह है कि, जब रानी द्रौपदीने श्वपच सुदर्शनके सामने भांति भांतिके स्वादिष्ठ भोजनोंके थाल धरे तब उन्होंने सब खट्टा मीठा और नमकीन एकमे मिलाकर खाना आरम्भ किया। कारण यह कि उनको स्वादोंकी कामना नहीं थी एक साधुको एक मनुष्यने कड़ई तुम्बेकी तरकारी बनाकर खिला दिया। वह साधु कड़ई तरकारी बिना कुछ कहे सुने खा गया जब पीछे गृहस्वामी खाने लगा तब उसको वह तरकारी विषसम मालूम हुई। वह अपनी स्त्रीको डाटने लगा कि तूने यह विषसमान तरकारी साधूको खिला दी साधूको कितना दुःख हुआ होगा।

बोधसागर

( १७६ )

उनके मनमें बड़ा भय समाया और वह साधुके पास जाकर उससे क्षमा प्रार्थना करने लगा ।

एक साधुको एक गृहस्थ ने खीर खिलाई और चीनीके बदले भूलसे नमक डाल दिया । कारण यह कि, वह नमक चीनीके सहसा था। वह साधु बिना कुछ कहे खा गया उसके भीतर जब नमककी आग लगी तब उस गृहस्थके घरमें आगलगी जब घरमें देखने लगे तब जान पड़ा कि साधुको चीनीके भ्रमसे नमक दे दिया गया । लोगोंने कहा कि, उस साधुके हृदयमें ठण्ठक आवे तब घर की आग भी बुझे। थलीमें कोई सरदार था उसके पास एक वैष्णव साधु आया और उसने नहा थोकर ठाकुरजी की पूजा की । उस समय उस सरदारने दूध और चीनी साधुके निमित्त मँगवा दी, उस वैष्णवने ठाकुरजीको भोग लगाया । इसके उपरांत जब आप वह दूध पीने लगा तब उस सरदारको याद आया कि, जहाँ चीनी थी वहाँ घोड़ेकी दवाईके लिये संखिया भी पीसा था ऐसा न हो कि साधुको संखिया दिया गया हो दौड़के देखा तो संखिया दिया गया था । उस सरदारने पुकारके कहा महाराज ! यह दूध मत पीओ इसमें संखिया पड़ गया । तब उस वैष्णवने कहा कि अब तो यह संखिया ठाकुरके भोग लगाया जानुका है मेरे ठाकुर संखिया पीवें और मैं चीनी पीऊँ ? वह वैष्णव दूध तथा संखिया सब कुछ पीगया और चंगारहा संखियाने उसको किसी प्रकारकी क्षति नहीं पहुँचाई । उसके भीतर भोगता विष्णु था विष्णु उसको देखता था और वह विष्णुको देखता था । आप उस भोगसे अलग रहा ।

तिसरे महात्यागी-तब होता है जब देहके अभिमानको छोड़े जबलों देहका अभिमान न छूटे तबलों त्यागी नहीं । अभिमानही करके यह देह मिलती है और इसीसे स्थित हो रही है । सहस्रों त्यागी हो गये परन्तु देहका अभिमान न छोड़ने से