कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
( १०२ )
बोधसागर
सोरठा-नीचहि ऊँच सताव, ओल मोहिते पाय हो । द्वापर युग जब आव, तोहि पाँच भरतार हो ॥
चौपाई
शाप ओल जब सुने भवानी । मनमें गुने कहे नहि बानी ॥ ओल प्रभाव आपते पाई । अब कह करो निरंजन राई ॥ तुमरी वशय परी हम आई । जस चाहो तस करो उपाई ॥ आई माता विष्णु दुलारा । सुनहु विष्णु यक बचन हमारा ॥ अब तुम बेगि पिता लगि जाई । बेगि पिताको परसहु पाई ॥ आज्ञा पाय विष्णु तब चाला । पिता दरश कहै गये पताला ॥ अछत पुष्प लीने कर माहीं । चले पताल पंथ गम नाहीं ॥ पहुँचे शेष नाग पहुँ जाई । विषके तेज विष्णु अलसाई ॥ भयौ श्याम विष तेज समावा । निरंकार अस बचन सुनावा ॥ अहो विष्णु माता पहुँ जाई । कहियो सत् बचन ससुझाई ॥ सतयुग त्रेता जैहै जबही । द्वापर होय चौथा पद तबही ॥ जब तुम है हो कृष्ण शरीरा । लेहु ओल सो कहो बलवीरा ॥ जो जीव देय पीत जेहि काहूँ । हम पुनि ओल दिलावैं ताहूँ ॥ नाथहु नाग कालिंदी जाई । अब तुम जाहु विलंब न लाई ॥ बिल्लु पहुंचे जननी पास । कीनो सत् बचन परकाशा ॥ भेत्यौ नाहि मोहि पद ताता । विषके ज्वाल श्यामभो गाता ॥ व्याकुल भयौ तबहि फिरि आई । पितादरश नाहीं हम पाई ॥ सुनिकै हरषी आदि कुमारी । लीन विष्णु कहै निकटदुलारी ॥ चूम्पौ बदन शीश दियो हाथा । सत्य वचन बोल्यौ सुतगाथा ॥ देहुँ पुत्र तोहि पिता भेटाई । तोरे मनको धोख छुड़ाई ॥ प्रथमहि ज्ञान दृष्टि तुम देखो । बचन मोर हृदयेमें पेखो ॥ मनस्वरूप करि ताकर जानो । मनते दूजा और न मानो ॥
स्वसमवेदबोध
( १०३ )
स्वर्गं पताल दौर मन केरा । मन अस्थिर मन फिरै अनेरा ॥ छनमहँ कला अनंत देखावै । मनकहँ पेरि न कोई पावै ॥ निराकार मनहीको कहिये । मनके आस दौस निशि रहिये ॥ देखहु पलटि सुन्नमें ज्योती । जहाँ झिलिमिलि झलके मोती ॥ यहिविधिविष्णुदरसपितुपायौ । भांति भांतिको रंग दिखायो ॥ श्वेत पीत हरितो जंगाली । रूप अन्तूप गगनमें भाली ॥ सुनि बाजा हियमें हरपाना । पिता दरसते अति सुख माना ॥ बहुत अधीन मातुसे भैऊ । शीश नाय मृदु बानी कहेऊ ॥ तव प्रसाद मम मातु विशेषा । पिताको दरश दृष्टि देखा ॥ मातु गई पुनि रुद्रके पास । देखि रुद्र मनमाहँ हुलासा ॥ दौय पुत्र कह मता बतावा । माँग महेश्वर तोहि जो भावा ॥ हे जननी यह कीजै दाय । कबहुँ न विनसै हमरी काया ॥ कह जननी तुम ऐसे होही । साधो योग सत्य कहाँ तोही ॥ जबलों पृथ्वी अकाश सनेहा । कबहुँ न विनसे तुम्हरी देहा ॥ तिहुँ सुतनको मता बताई । आदि पुरुषको नाम छपाई ॥ आद्या ऐसो छल बल कीना । पुरुष छपाय प्रकट यम कीना ॥ निरंकारको भेद बतावा । पुरुषसँदेश न सुनत सुनावा ॥ पुरुषभेद विष्णुहू न जाने । निरंकारको करता माने ॥ जैसो छल बल आद्या कीन्हा । सोई चला जक्तमें चीन्हा ॥ देखो ऐसो नारि स्वभाऊ । मात पिता कह सो विसराऊ ॥ केतो प्रीति मातु पितु करही । कन्या एक न चितमें धरही ॥ गै पुत्री जब स्वामी गेहा । रातयौ रंग तासुके नेहा ॥ मातु पिता सबही विसरायौ । अपने पतिकी नारि कहायौ ॥ आदर मान खसमको होई । पिताको नाम लेय नहि कोई ॥ ताते आद्या भई बिगानी । काल अंग है रही भवानी ॥
( १०४ )
बोधसागर
ब्रह्मा निज मन कीन उदासा । तब चलि गये विष्णुके पास ॥ जाय विष्णुसे बिनती ठाना । तुम हो बुद्धिदेव परधाना ॥ तुमपर माता भई दयाला । हम तो आप बस भये बिहाला ॥ निज करनी फल पायों भाई । कैसे दोष लगावों माई ॥ अब सोयतन करो हो आता । चले परिवार वचन रहै माता ॥ कहैं विष्णु छोड़ो मन भंगा । मैं करि हौं सेवकाई संगा ॥ तुम जेठे हम लहुरे भाई । चित संशय सब देहु बहाई ॥ जो कोइ होवे भक्त हमारा । सो सब ही तुमरो परिवारा ॥ यज्ञ धर्म पूजा जो होई । विप्र बिना कछु होय न सोई ॥ जत्तमें ऐसो ज्ञान हटावै । पुन्यफलनकी आस लगावै ॥ जो कोइ करे द्विजनकी सेवा । हरषित हों तिहि विष्णुदेवा ॥
सोरठा-ब्रह्मा भये अनंद, जबहि विष्णु अस भाषेऊ ।
मेलो मनको द्रंद, साख मोर सुखते रहै ॥
चौपाई
ब्रह्मा भाष्यौ झूठ संदेशा । ताते ताको भयो अंदेशा ॥ विष्णु जो सांचो वचन सुनाया । माता कीन ताहिपर दाया ॥ शिव लजायके चुप है रहेऊ । झूठ सांच एको नहिं कहेऊ ॥ दृढत पिता तिहुं गे हारी । पिताको रूप न कतहुं निहारी ॥ माता कही बिहँसि निज बानी । ब्रह्मा झूठ झूठकी खानी ॥ शिव कछु झूठसांच नहिं भाखो । ताते योग ध्यान चित राखो ॥ योग समाधि करो अब जाई । जटा रखाय बिभूति रमाई ॥ माता विष्णुसे बोलै बानी । तीन लोक करिहो रजधानी ॥ शिव ब्रह्मा करिहै तब सेवा । गन गंधर्व रचिहो मुनि देवा ॥ चार बरण ब्रह्मा निरमाई । चार वेद मत चार चलाई ॥ शिवके वरण भेद ना होई । कौध रूप धरि भेष बिगोई ॥
स्वसमवेदबोध
( १०५ )
मातु जो दया विष्णुपर कीने । पिता देखाय निकटही दीने ॥ माता पिता एक मिलि गेऊ । विष्णु देखिके हर्षित भैऊ ॥ माता पिता सुत एकै ठेऊ । विष्णुसमाधिज्योति मिलिगैऊ॥ तीनों मिलि जब एकै भयऊ । तिहि पीछे जग सिरजै लियऊ॥ तब माता अस बचन उचारा । रचो सृष्टि तुम तीनों बारा ॥ अंडज उत्पति कीनी साता । पिंडजको ब्रह्मा उत्पताता ॥ उखमज खानि विष्णु न्यौहारा । शिव थाबरको कीन पसार ॥ चौरासी लख जूनी कीना । आधा जल आधा थलदीना ॥ नौलख जलके जीव बखाना । चौदह लख पंछी परमाना ॥ कृमी कीट सत्ताइस लाख । तीस लक्ष अस्थावर भाषा ॥ चतुर लक्ष मानुष परमाना । मनुषदेह लह पद निर्वाना ॥ और योनि परचे नहीं पावै । तत्त्वहीन भव भटका खावै ॥ एक तत्त्व अस्थावर जाना । उखमज दोय तत्त्व परमाना ॥ अंडज तीन तत्त्वगुन जाना । पिंडज चार तत्त्व परमाना ॥ ताते होय ज्ञान अधिकारा । मानुष देह भक्ति अनुसारा ॥ अंडज खानि तीन तत्त्वव्यापा । वायू तेज तीसरो आपा ॥ थावर एक तत्त्व है पानी । उखमज वायु तेजते सानी ॥ पिंडज चार तत्त्वसे बरनी । पौनो पावक जल अरु धरनी ॥ पिंडज नरकी देह देह सँवारा । ताते पंच तत्त्व परमाना ॥ नर नारीमें तत्त्व समाना । ज्ञान विभेद ताहुमें जाना ॥ चारो खानि जीव भरमावा । तब मानुषकी देही पावा ॥ पांच तत्त्व मानुष विस्तारा । तीनों गुण तेहिमाहँ सँवारा ॥ देह धरे छोडे जस खानी । तैसो ज्ञान लहे सो प्रानी ॥ प्रथम कहो अंडजकी खानी । दारिद्री निद्रा अलसानी ॥ चोरी चुगली निंदा माया । घर बन झाड़ी आगिलगाया॥
(१०६)
बोधसागर
तृष्णा दूत भूत सेवकाई । रोवै कभीके मंगल गाई ॥ और को देत देखि पछिताई । गुरु सतगुरु चीन्है नहिं भाई ॥ वेद शास्त्र सब देत उठाई । आपन मन सब ही दरसाई ॥ जगमें और तुच्छ सब आही । मोहि समान बड़ को जगमाही ॥ मैले वस्त्र सो नहीं नहाई । आँखि चिपर मुख लार बहाई ॥ पासो जूवा खेल अरु दाऊ । कूबर मूंड अरु लामा पाऊ ॥ दूजी उखमज खानि कहावा । ताते जो नर देही पावा ॥ जाय सिकार जीव कहैं मारा । बहुत आनंद होय तिहि बारा ॥ बहुविधि मांसु राँधिके खाई । गुरुको मेटि करे अधिकार्ई ॥ निंदै नाम शब्द गुरु देवा । बहुत बात कथ ज्ञानको भेवा ॥ झूठी बचन सभामें लाई । टेढी पाग छोर ओरमाई ॥ दया धर्म मनमें नहिं आवै । करे पुन्य तिहि हाँसी लावै ॥ माला तिलक अरु चंदन करई । हाट बजार चिकन पट धरई ॥ अन्तर पापी ऊपर दया । सो जिव यमके हाथ बिकाया ॥ लम्बा दन्त रु वदन भयावन । पीरे नैन ऊँच अनपावन ॥ तीजे अचल स्वानिको लेखा । देह धरेते होय जो भेखा ॥ छिनक बुद्धि होवै जिव केरा । पलटत बुद्धि न लगै बेरा ॥ झगा फेटा शिरपर पागा । राजद्वारसे वामे लागा ॥ घोडेपर होवै असवारा । तीर खड्ग अरु कमर कटारा ॥ इत उत सैन चित्तसे लावा । परनारीको सैन बोलावा ॥ पर घर रति कर चोरी जाई । शरमभाव उपजै नहिं भाई ॥ छन यकमें कर पूजा सेवा । छन यकमें बिसरै सो देवा ॥ छन यक मनमें सूरा होई । छन यक मनमें कादर सोई ॥ छन यक मनमें करे सुधर्मा । छन यक माहँ करे अपकर्मा ॥ भोजन करत माथ खजुआवै । बाँह जाँघ पुनि मीजत जावै ॥
स्वसमवेदबोध
( १०७ )
भोजन करे सोय पुनि जाई । जो जगाव तिहि मारन धाई ॥ आँखी लाल होय पुनि वाको । और अनेक न लक्षण ताको ॥ चौथे पिंडज खानि सुनावों । गुन औगुनको भेद बतावों ॥ वैरागी उन मुनि मत धारी । धर्म पुण्य कर वेद विचारी ॥ तीरथ पुण्य अरु योग समाधी । गुरुके चरण चित बल बाँधी ॥ पढे पुराण कथे भल ज्ञाना । सभामें बैठि बात भल ठाना ॥ राजभोग कामिनि सुख माने । मनशंका कबहुँ नहि आने ॥ धन संपत्ति सुख बहुत सोहाई । लौंग सोपारी बीरा खाई ॥ खरचै दाम पुण्यमें सोई । हृदये सुख पुनि ताके होई ॥ चक्षु तेज ताकर अति मानी । परा कर्म देही बल ठानी ॥ देखो खड्ग सदा ता हाथा । प्रतिमा निरखि नवावै माथा ॥
सोरठा-छूटे नरकी देह, जन्म धरो फिरि आय जब ।
ताको कह्यो सनेह, धर्मदास सुन कान दे ॥
चौपाई
आयू आछत जिव मरिजाई । जन्म धरे मानुषको आई ॥ शूरा होय सो रणके माहीं । भै डर ताहि निकट न जाहीं ॥ माया मोह ममता नहि व्यापे । दुरमति ताहि देखि डर कांपे ॥ सत्यशब्द परतीत कै आने । निंदारूप कबहुँ ना जानै ॥ सतगुरु चरण सदा चित राखे । प्रेम रु प्रीति दोनता भाखे ॥ यहिविधि चारों खानि बनाया । सबमें रमे निरंजन राया ॥ कर्मजाल महाँ सबै फँसाई । रेखाकर्म प्रत्यक्ष देखाई ॥ कर्मकी रेख लिखे सबमाही । ताते जीव भवमें भरमाही ॥ लिखे निरञ्जन कर्मको रेखा । ताते जीव धरे बहु भेषा ॥ कर्मरेख कबहुँ नहि छूटे । फिर फिर जीव निरंजन लूटे ॥ चारि खानि रचिकियो पसारा । चार बरन पाखेंड व्यौहारा ॥
( १०८ )
बोधसागर
चौरासी लख योनी कीन्हहा । चार खानि जिव एकै चीन्हहा ॥ चौरासी लख बचन बखाना । चारखान जिव एक समाना ॥ रचना रचे सृष्टि बहु रंगा । कामदेवकी कला अनंगा ॥ सुर नर मुनि गण काम तरंगा । पशु पक्षी सबहीके संगा ॥ कर्म काल सबही भरमावा । शिवशक्ती सँग कला नचावा ॥ कनक कामिनी फंद बनाया । तिहि फन्दे सबही अरुझाया ॥ जाति पांति कुल मान बढ़ाई । ब्रह्मा यह यम फंद बनाई ॥ शिव शक्ती द्वै रूप बनाया । नारि पुरुष सो नाम धराया ॥ भगद्वारे है सब जग आया । भग भोगनको पुरुष कहाया ॥ नखशिख रची काल फुलवारी । फूल कुवास सुवास सँवारी ॥ कनक कामिनी काल बनाई । चार खानिमें रही समाई ॥ कामिनि काम सँवारा ज्ञानी । चारो खानि रहा विष सानी ॥ काल कर्मकी खानि बनाई । सब संगतमें रहा समाई ॥ सुर नर मुनि सबहीको डहके । चारखानि सबही घटमहके ॥ तीनों देव निरंजन रूपा । येई भवसागरके भूपा ॥ चारो मिलि सब सृष्टि सँवारी । पञ्चम कहिये आदि कुमारी ॥ जहाँ तहाँ तीरथ व्रत दाना । देवल देव पूजा पाषाना ॥ मथुरा तीनि देव औतारा । ब्रह्मा पुनि काशी पग धारा ॥ यहिविधि आया साज्यौसाजू । तिहुँ पुत्रनकहँ दीनो राजू ॥ मथुराते चलि आदि भवानी । कोटकगंडे पहुची आनी ॥ कोटकगंडे करि निज थाना । हींगलाज पुनि कीन पयाना ॥ आदि भवानी रही तहाँई । तिहुँ पुत्र जग राज कराई ॥ नाना भांति कर्म बिस्तारा । वेद कितेब प्रपंच अपारा ॥ भर्मजाल जगमें फैलाई । नर नारी तामें अरुझाई ॥ जहतहँ तीन देवकी सेवा । कोइ न जान पुरातन देवा ॥
स्वसमवेदबोध
( १०९ )
तीन देव निज हुकम चलाईं । अध्याहूको नाम छपाई ॥ तीन देव सेवैं संसारी । पूछै नहिं कोइ आदि कुमारी ॥ तब अध्या मनमाहिं बिचारा । मम सुत मेरो महातम टारा ॥ कीनो तब असि युक्ति भवानी । ऐसो कलारूप गुनखानी ॥ तीन शक्ति निज तन प्रकटावा । महामोहनी रूप बनावा ॥ दोहा-रंभा सूची रेनुका, तीन रूप निज कीन । गंधर्बनको मोहि मन, वश अपने कर लीन ॥
चौपाई
तिहुँ रूप मोहनी बनाई । सब गंधर्व निज संग गहाई ॥ भाँति भाँतिके बल्ल अन्तूपा । भूषन भूषित अद्वुत रूपा ॥ छतिस भाँतिके बाजा लेई । चली त्रिदेवपाहिं तब येई ॥ राग रागिनी यकसठ जाती । महा मधुर सुर गाव सुभाँती ॥ तीन देव सुर नर मुनि झारी । निज बस करि लीने तिहुँ नारी ॥ जगमें अपनो अदल चलाई । जहँ तहँ शक्तीसेव थपाई ॥ तीनो देव निरंजन शक्ती । इन पांचोंकी सब कर भक्ती ॥ मन ऊँकार निरंजन राई । अलख शून्य अविकार कहाई ॥ कैलकाल निर्गुन निरंकारा । धर्मराय यम ब्रह्म पुकारा ॥ इत्यादिक बहु यमके नामा । रमै सर्वमें सोई रामा ॥ जैसे तिलमें तेल समाया । तिमि सबमाहिं निरंजन राया ॥ मनसे और नहीं बरिबंडा । गाजै तीन लोक नौ खंडा ॥ सुर नरमुनिसब छलि छलि मारा । कोई जीव नहिं बचा कड़ारा ॥ रचना रुचिर अपार बनाई । सकल जीवको सो भरमाई ॥ कबहुँके हेठ कबहुँके ऊपर । कबहुँके डारि देय जिव भूपर ॥
पंजाबी भाषा-छंब झूलना
इत्थते उत्थ कर उत्थते इत्थ धर जित्थेही जाय जिव नाहिं छुट्टे ॥
( ११० )
बोधसागर
भट् तिहुँ लोक है नट्ट जित जाइये तित्थही तित्थही काल कुट्टै ॥
सत्यकबीर बचन
तीन लोकमें लागी आग । कहैं कबीरा कहँ जैहो भाग ॥
चौपाई
पूर्व प्रसंग करो पुनि वर्णन । कूर्मपाहिं जिमि गये निरंजन ॥ तीन माथ जब ताको छीना । बहुरि शून्यमें बासा कीना ॥ कूर्म भये तिहि काल दुखारी । ध्यानमें पुरुषते बचन उचारी ॥ अहो पुरुष दया भल कीना । मोकहँ धर्मराय दुख दीना ॥ यहि विधि पुरुषपै कूर्म पुकारी । तब सतपुरुष दया उर धारी ॥ बोले तब अस पुरुष पुराना । सुनो कूर्म मम बचन प्रमाना ॥ यह तौ काल भयो अन्याई । जो मैं ताहि देब बिनसाई ॥ तौ सबही रचना मिटि जैहै । सोलह पुत्र सबहि बिनसैं है ॥ सोलह पुत्र एक ही नारा । ताही सूत मध्य यह कारा ॥ विषयते रचित निरंजन देही । मम दरसन अब पाव न येही ॥ लक्ष जीव नित करे अहारा । सवालक्ष नित प्रति बिस्तारा ॥ यहि विधि आप दीन प्रभु तेही । परमपुरुष ढिग जाय न येही ॥ रचना करि पुनि भोजन करई । सबमें रमै न सो लखि परई ॥ षट दरसन छानवे पाखंडा । धर्म कर्म जहँलों महि मंडा ॥ सो सब आहि निरंजन खेला । गह जिव त्रिगुन शक्तिके मेला ॥ नाना भौतिके धर्म चलाई । जक्त जीवको सो भरमाई ॥ एक विरुद्ध पंथ कर दूजा । नानाविधिको थापे पूजा ॥ सबहि भरमायके भोजन करई । कालकलानहिं जिव लखि परई ॥ चार मुक्ति जो वेद बखाना । सो सब देव निरंजन थाना ॥ योग युक्ति सब तासु पसारा । पुरुषद्वार ते परदा डारा ॥ मुक्तिपंथ नहिं पावै कोई । काल भ्रमावै सब नर लोई ॥
स्वसमवेदबोध
( १११ )
तस शिला यक नाम पुकारा । सब जिव पकरि ताहिपरजारा ॥ तस शिलापर जो जिव परही । हाय हाय करि चटपट करही ॥ तलफि तलफि जिव तहँरहिजाही । भूनि भूनि सब यमधरिखाही ॥ केते युग जीवन धरि खायौ । जारि वारिके योनि भ्रमायौ ॥ जरत जीव जब कीन पुकारा । काल देत है कष्ट अपारा ॥ यमको कष्ट सहो नहि जाई । हो साहिब दुःख टारो आई ॥ यहि बिधि जिव जब कीन पुकारा । पुरुष दयाल दया उरधारा ॥ तब पुरुष ज्ञानीको टेरो । ज्ञानी सुनिये आज्ञा मेरो ॥
सत्यकबीर वचन
छंद—जब देखि जीवन कहैं बिकल तब दया पुरुष जनाइया ॥ दया विधि सतपुरुष साहिब तबै मोहि बोलाइया ॥ कह्यौ मोहि समुझाय बहुविधि जीव जाय चितावहो ॥ तुव दरशते जिव होय शीतल जाय तपत बुझावहो ॥ सोरठा—आपा लीनो मानि, पुरुष सिखावन शिर धरचो ॥ तत्क्षण कीन पयान, शीस नाय सतपुरुषको ॥
चौपाई
आयो जहँ जहँ जीव सतावै । काल निरंजन जीव नचावै ॥ चटपट करे जीव तहँ भाई । ठाढ़ भयो मैं तहँ पुनि जाई ॥ मोहि देखि जिव कीन पुकारा । हो साहिब मोहि लेव उबारा ॥ तब हम सत्य शब्द गोहरावा । पुरुष शब्द ते जीव बुझावा ॥ सब जीवनमिलि अस्तुति लाई । धन्य पुरुष यह तपन बुझाई ॥ यमते छोरि लेहु मोहि स्वामी । दया करो उर अंतर्यामी ॥
इति
अथ जीवनकी स्तुति—छंद तोटक
जय सत्य कबीर कृपाल घनं, दल दुष्टहनं पय पुष्ट जनं ॥
नं. ९ कबीरसागर - ५
( ११२ )
बोधसागर
योग जीत अतीत पुनीत प्रभू, वपु धारण कारन तारन भू ॥ सत सुवकृत सत्यस्वरूप सदा, जन ध्यावत पावत मुक्तिपदा ॥ मुक्ता मनिते जिव जो जुगता, मृतलोक सशोकन भौ भुगता ॥ हम दीन दुखी किमि त्याग चहो, करूणामय हो करूणामयहो ॥ करूणातन धार करी करूणा, करूणामयधौ करूणा वरूणा ॥ सुर सिद्ध बखानत खान दया, जिव देखि अनाथ सनाथ भया ॥ यहि ज्वाल जला यम भक्ष करे, बिन देव दयालको रक्ष करे ॥ यम जालिम जीवन जेर कियौ, सुधि लेत दयादधि देर कियौ ॥ सुख लेशन के तक लेश भरे, जगदीश परे जगदीश परे ॥ जिव काल करालके ज्वाल दहे, तर ऊपर भूपर धाय गहे ॥ हम जानि दयाल जो काल भजे, गुणश्राम प्रनाम सो नामतजे ॥ घटवाह मलाह सलाह कहो, फिर कैलकि गेलको सैल न हो ॥ वह सिंह समान शिकार करे, प्रिय पीव बिना कह जीव तरे ॥ हरि केहरि देहरि पार करौ, सरकार बडे बरकार करौ ॥ भयभंजन रंजन दासनको, खल डाटत काटत फांसनको ॥ भवसागर झागर काल बली, तह जीवकि उक्ति न युक्ति चली ॥ नहि एक उपाय बनाय बनी, करू काज गरीब निवाज गनी ॥ प्रभु पेखतही जिव शीतल है, श्रुति वेद पुराण बखानत है ॥ करूणा दृग कोटिन काल हने, खुगसिंधु कणा गिर बंधु बनै ॥ मतिधीर कबीर कबीर भजो, हितनाम प्रिया बिन नाम तजो ॥ तपखान कृशान शिला दहके, जरते प्रभु मारगते बहके ॥ तलफै तप तीख सभी तलते, बिन नाथ किने हन सोपलते ॥ निजु सुधि निवाज मुदधि लखो, सिरपै समरत्थ जो हत्थ रखो ॥ नरबाल बेहाल निहाल मही, दुखद्वंद्व दवारिन देह दही ॥ मनभौ मदमोचन लाचन है, जनरक्षक भक्षक पोचन है ॥
स्वसमवेदबोध
( ११३ )
सबलायक नायक हंसनके, जिवमोषक पोषक अंशनके ॥ सर्वोपर साहिब जीवनके, तुम जीवननाथ हो जीवनके ॥ प्रभुके भ्रमते यमते बजरे, यहि तस शिला पर आनि जरे ॥ तपिया जपिया न पिया परखे, विधि वेद लवेदन ते हरखे ॥ जिवकाज चले शिरताज सभी, महाराज मयासुख साज सभी ॥ भवभार हरो करतार धनी, भ्रमराय न पय दुखाय दुनी ॥ करि नेह बिदेह जो देह घृतं, शबदाभूत जीव भे कृतकृतं ॥ मृत नायक सायक तीख हते, पद प्रीत प्रतीत सहीत गते ॥ परमारथि भारथि नाथ सदा, गहते लहते भव पाथ हदा ॥ जनजाय समाय अमाय पदा, शुभज्ञान फुरानन सान मदा ॥ सुनि मानस हंस सुनीन्द्रमता, समता लह पाय पता रमता ॥ तब नाम सुधा वसुधा जो पिया, न खुधा युगही युग जीव जिया ॥ दुखिया हितआय महा सुखिया, लखि पीवहि जीव भये सुखिया ॥ कहँ और न दौर तो पौर परे, सरनी परनी करनी नखरे ॥ पद तीर कबीर शरीर जिते, लह सारभे ब्रह्म अकार तिते ॥ जग योनि जहान महान महा, गुरुदेवको भेव नते बलहा ॥ कमलापति क्यों कमलापति हो, पदकीरति कीरति कीरति हो ॥ मृगब्याध समाध अगाध गहे, कलपानसिरान न ध्यान लहे ॥ गुन गाय फनी गणराय निती, नहिं पावत पार अपार गती ॥ लवलीन प्रवीन नवीन जसै, कलिपंक कलंक निशंक नसै ॥ विषया बनराय भुलाय परे, दुखदौन बिनाकर कौन धरे ॥ कह कौन सँदेश अँदेश बड़ा, भग भूलि गई ठग आनि अडा ॥ शिव शोक कि झोकमें झुलि रहा, करता भरता भ्रम भूलि रहा ॥ तिहुँ लोक बिलोक लगीअगिनी, यह जामिन है यमकी भगिनी ॥ तब सूरको नूर जहूर हुआ, ममता रजनी दुख दूर हुआ ॥
बो० सा० ९
( ११४ )
बोधसागर
सगरे झगरे रगरे बगरे, पशुज्ञान गहे डगरे डगरे ॥ बकचाल सभी न मरालमती, बिन एक रतीबन एकरती ॥ जब गर्भमें अर्भक अर्ज करे, तिहि गाढते साहिब गाढि धरे ॥ इत औरहि ढालको ख्याल खिला, बुधि खप्त मरे यहि तप्त शिला ॥ वह औध अचेत सुखोपति सो, कह पाय पराग बनारसको ॥ निज धामते राम पथाम लिया, जगती भगती पद पाय पिया ॥ कित हो झलकी मनसा मलकी, अरु अंध अचेतकिभयटलकी ॥ दुगदानी कि वानि विहानि इतै, मकरंदके फंदको जीव जितै ॥ मृतभृंगन बिंग बिहार करे, क्रम रेख विशेष न देख परे ॥ नहिं कोधित अंध कि गंध मिले, जिव दंडक भंडक भीर हिले ॥ गुरुपीर कबीर उजागर है, भव बोहित सोहित सागर है ॥ जगबंदन भर्म निकंदन है, सरनी सतलोककि संदन है ॥ सतनाम सनेह सुधाम चढे, कलिमा कलिमा कलिमाह पढे ॥ गुणग्राम निकास कबीर कबी, जस गावत पावत कोटि छबी ॥ धुरधर्म धराधर धार कहो, भवतारक पंथ प्रचार कहो ॥ नर पामर घामर बुद्धि बिना, यमज्योति पतंगके ढंग बना ॥ जग व्याधि रु आध असाध करे, चरणाम्बुज चरण चारु हरे ॥ भवतारन हेत निकेत कृपा, पयगाम लियो सुखधाम नृपा ॥ सुरभूप स्वरूप अनूप छिपा, रवि सोम जो कोटि करो मदिपा ॥ गुरुगुप्त कियो धुरको बरनं, भव और भयावन तौ शरनं ॥ हमरे उरके पुर बास करो, निज दासनको अब दास करो ॥ बिन कंतकै भौ जलजंत घने, दुखद्वंद कफंद कफंद फने ॥ जगमाह कि बाह निबाह लहे, भ्रम भो डरभे डरभीर बहे ॥ दनुजात बलात निपात भये, रणधीर बहीर गहीर गये ॥ जिहि जानत जान सुधाम धरे, मुनिके मन मंदिरमें बिहरे ॥
स्वसमवेदबोध
( ११५ )
मनमत्त मतंग मते यहि गौं, तुहि रावत होय महा उतजौं ॥ चित्तचञ्चर बञ्चर बञ्चक है, समसञ्च विरञ्च न रञ्चक है ॥ यम बंकट संकट जीव महा, दमको गमको रमको न रहा ॥ भवसेत अभय पद देत तुही, कलिकंटक कोटिन कर्म दही ॥ चटि सेत पपीलन ढील तहाँ, लैचि दीन पयोनिधि पीन महाँ ॥ नहिं वञ्चको हाड न चाड रहो, मन वाक शरीर कबीर कहो ॥ गुरु नेह न दीसन दीस जिन्हैं, सुखवासन आस है त्रास तिन्हैं ॥ तुम दीनन बन्धु न पीननके, नित पास हो दास अधीननके ॥ मद मान मलान हिये अरभौ, नर नागर सागर भौ गरभौ ॥ करि पाप कलाप करे दुनिया, विष बीज अर्माफल को लुनिया ॥ हरिमें हरिमें हमही वरषे, लहरी भवभक्ति हरी हरषे ॥ दुखदारिद वारिद ज्ञानघनं, निरभय करि भय शमनं शमनं ॥ जिव कालके जाल परे बपुरे, सतनाम निकास सदा जपु रे ॥ गुरुभक्ति निनार किनार गहे, चतुरे लुतरे भवधार बहै ॥ भ्रमभूलते मूलते जात भगे, बुध बालन डालन पात लगे ॥ मन बाचक याचक हौं दरको, तुम छोड अजोड सभी घरको ॥ प्रभु नामको दान निदान चहो, कोई आसरुवास बिकाश न हो ॥ तरनी बरनी तब नाम जहाँ, गहिये लहिये विशराम तहाँ ॥ रसना रसरास रसै रससो, जसतौ बस और सबै कस हो ॥ चढ नाम रथा गइ बीत विथा, रसना रसना बिन कीर्त कथा ॥ पदपंकज प्यार जो छूटि गया, अरु सूत सनेहको टूटि गया ॥ ठग ठाकुर आनिके जूटि गया, जगजीवनकी बुधि छूटि गया ॥ रहगी रमते बड़ि भीर भई, सतपंथ विहाय कुपंथ लई ॥ गुरुभक्ति बिना भव भूलि परे, शरणागत पाहि कबीर हरे ॥
( ११६ )
बोधसागर
दोहा—यह कबीर पंचाशिका, पढ़ै सप्तीति प्रतीत ।
परम पुरुष पद पावही, काल कष्ट जा बीत ॥
इति श्रीकबीर पंचाशिका
सत्यकबीर वचन—चौपाई
तब हम कहा जीव समुझाई । जोर करो तो वचन नसाई ॥
जब तुम जाय धरो नर देहा । तब तुम करिहो शब्द सनेहा ॥
पुरुष नाम सुमिरन सहिदानी । बीरा सार करो परमानी ॥
देह धरे सत शब्द समाई । तब हंसा सतलोकहि जाई ॥
देह धरे कीने जहँ आसा । अन्तकाल लीनो तहँ बासा ॥
अब तोहि कष्टभयौ जिव आनी । ताते यहि बिधि बोलो बानी ॥
जब तुम देह धरो जग जाई । बिसरे पुरुष काल धरि खाई ॥
जीव वचन—चौपाई
कहै जीव सुन पुरुष पुराना । देह धरे बिसरो नहिं ज्ञाना ॥
पुरुष जानि सुमिरौं यमराई । वेद पुरान कहैं समुझाई ॥
वेद पुरान कहै मत येहा । निराकारसे कीजै नेहा ॥
सुर नर मुनि तैंतीस कोरी । बंधे सबहि निरंजन डोरी ॥
ताके मत कीने हम आसा । अब यह जानि परा यमफांसा ॥
ज्ञानी वचन—चौपाई
सुनो जीव यह छल यमकेरा । यह यमफन्दा कीन घनेरा ॥
छंद—कला कला अनेक कीनो जीव कारन ठाट हो ।
वेद पुरानो शास्त्र स्मृती याते हूँध्यौ बाट हो ॥
आप तनधरि प्रकट है यम सिफत आपन कीनहो ।
नाना गुन मन कर्म फाटो जीव बंधन दीन हो ॥
सोरठा—कला कला परचण्ड, जीव परे बस कालके ।
जन्म जन्म सह दण्ड, सत्यनाम चीन्हे बिना ॥
कबीर पंचाशिका एवं अन्य बोध
स्वसमवेवबोध
( ११७ )
चौपाई
छन यक जीवनको सुख दैऊ । जिव बँध मेटि पुरुषपहँ गेऊ ॥
अथ जीवमुक्तावन हेत सत्य कबीरको संसारमें आगमन कथा—चौपाई
यहि विधि काल जक्त धरि खायौ । जिव नहिं कोई मुक्तिपद पायौ ॥
तीनों पुर पसरा यमजाला । सकल जीव कहँ कीन बिहाला ॥
कालके करते जीव न छूटे । बहुविधि योगयुक्तिमें जूटे ॥
विनशत शब्द न जीव उवारा । तब समरथ अस वचन उचारा ॥
सत्य पुरुष वचन—चौपाई
कैल सकल जग बारचौ खाई । एको जीव लोक नहिं आई ॥
तातै समरथ मोहि फरमाई । साँचे जीव आन मुक्ताई ॥
पुरुष वचन कीने तिहि बारा । ज्ञानी बेगि जाहु संसारा ॥
प्रथमहि चलयौ जीवके काजा । पुरुष प्रताप शीस पर छाजा ॥
सतयुग सत्य सुकृत मोर नाऊँ । आज्ञा पुरुष जीव बर आऊँ ॥
करि परनाम तब पगधारा । पहुँच्यौ आय धर्म दरबारा ॥
द्रीप झांझरी नाम बखानी । कैल पुरुषकी सो रजधानी ॥
पगके देत झांझरी गाजा । कैल पुरुष बैठा तहँ राजा ॥
गये झांझरी द्रीप मँजारा । गर्बित काल न बुद्धि विचारा ॥
मोकहँ देखि धर्म ढिग आई । महाक्रोध बोले अतुराई ॥
योगजीत इहवाँ कस आवो । सो तुम हमसे वचन सुनावो ॥
योगजीत वचन—चौपाई
तासो कह्यौ सुनो धर्मराई । जीवकाज संसार सिधाई ॥
तुम तो कष्ट जिवनको दीना । तबहि पुरुष मोहि आज्ञा कीना ॥
जीव चिताय लोक ले आवो । काल कष्टते जीव छोड़ावो ॥
ताते मैं संसारहि आवो । देय परवाना लोक पठावो ॥
अथ कालपुरुष और सत्यकबीरका युद्धवर्णन—चौपाई
काल क्रोध करि वचन उचारा । भवसागरमें राज हमारा ॥
( ११८ )
बोधसागर
तुम कस जिव मुक्तावन आवा । मारो तोहि अबहि भलदावा ॥ काल अनंत रूप तब धारा । योगजीत कह आनि प्रचारा ॥ महाभयंकर रूप बनावा । गज स्वरूप है सम्मुख धावा ॥ सत्तरयुग हम सेवा कीना । पुरुष मोहि भवसागर दीना ॥ परमपुरुष सेवा वस भैऊ । राज तिहुँ पुरको मोहि दैऊ ॥ तब तुम नारि निकारौ मोही । योगजीत नहि छोडो तोही ॥ अस कहि धाय सुंड फटकारा । दंतसो योगजीत पर मारा ॥ योगजीत कै लहि ललकारा । गहि कर सुंड दूर तिहि डारा ॥ पुरुषप्रताप सुमिर मन माहीं । मारचो सत्य शब्द से ताहीं ॥ ततछन ताहि दृष्टि पर हेरा । श्यामलिलार भयौ तिहिकेरा ॥ पंख घात जिमि होय पखेरू । तैसे कैल मोहि प्रति हेरू ॥ जब फटकार कर गहे डाला । भागा काल पैठ पाताला ॥ गयौ पाताल कूर्मके आगे । योगजीत गये पीछे लागे ॥ बिनती करे कूर्मसे जाई । राखो कूर्म शरन हम आई ॥ योगजीत मोहि मारि निकारा । जिव ले जाय पुरुष दरबारा ॥ युगन युगन हम सेवा कीना । पुरुष मोहि भवसागर दीना ॥ एक पायँ हम ठाढे रहेऊ । तबहि पुरुष सेवा सब भैऊ ॥ तीन लोक दीना मोहि हारी । अब कस मोकहँ मारि निकारी ॥ जाय कूर्मकी शरन जो परेऊ । तब ताने दाय़ा उर धरेऊ ॥
कूर्मवचन--चोपाई
तबै कूर्म उठि बिनती लाई । को तुम आहु कहाँ ते आई ॥ अपनो नाम कहो मोहि स्वामी । पुरुष अंश तुम अंतरयामी ॥
योगजीत वचन--चोपाई
तब हम कहा नाम मोर ज्ञानी । योगजीत हम अंश बखानी ॥ समरथ वचन जीव बर आवा । काल फौंस जीवन मुक्तावा ॥
स्वसमवेदबोध
( ११९ )
कैलवचन
सुन ज्ञानी मोर वचन अलेखा । अपने मनमें करो बिवेका ॥ सत्तर युग हम सेवा कीना । पुरुष बकसि भवसागर दीना ॥ समरथ वचन दीन मोहि हारी । तीन लोक पायौ संसारी ॥ तबकी बात रहित भै भाई । अब कस उलटी अदल चलाई ॥ सबै अंश भुक्तै रजधानी । हमपर कोप भयौ तुम ज्ञानी ॥ अब जस निरणय हमै सुनावो । तस सीषा पन जानि चलाओ ॥
कूर्मवचन
तबै कूर्म बोले अस वानी । बिनती एक सुनो हो ज्ञानी ॥ जो तुम बिनती मानो मोरा । तौ हम तुमसे करे निहोरा ॥ तुमहू कैल वचन जौ मानो । तौ हम ज्ञानी निर्णय ठानो ॥ ज्ञानी सुनौ पुरुष कै अंशा । धर्मरायको मेटो संसा ॥ चौका पान कजाव तुमारा । लोक वेदको काल पसारा ॥ जो कोइ करे जोर बरियाई । तौ हम ताके संग न भाई ॥ कूर्म जबै अस बिनती ठानी । ज्ञानी कैल दोहू सुख मानी ॥ फिरके कैल झांझरी आनो । ज्ञानी कैलको वचन सुनावो ॥
ज्ञानी और कालपुरुषको वार्ता--चौपाई
बिना शीसके यमकी देही । काल पुरुषको चीन्ह है येही ॥ सत्य कबीरसे बिनय उचारी । सुनिये ज्ञानी अरज हमारी ॥ अपनी देह नाथ मोहि दीजै । ऐसी मोपर दाय़ा कीजै ॥ ताको वचन मानि हम लीना । अपनी देहको कैलको दीना ॥ शीश समेत और बिन माथा । दोनों देह निरंजन साथा ॥ जब चाहे तब शीस देखाई । निज इच्छा पुनि ताहि लोपाई ॥ जो साधू बैराट निरेखे । सो यह कौतुक नैनन दीखे ॥ रूप विराट शून्यमें निरखे । निजु आगूको लेखा परखे ॥ जब षट्मास मरन रहि जावै । काल कबीर कि देह छपावै ॥
( १२० )
बोधसागर
अपनी देह देखावै काला । तब साधू जाने जंजाला ॥ बिना शीस जब दरसै देहा । काल पुरुष तब जाने येहा ॥ मरन काल निज साधु निहारी । होहि सचेत लगावै तारी ॥
निरंजन वचन
सोरठा-तुमहुँ करो बखशीश, पुरुष जो दीनो राज मोहि । षोडशमें तुम ईश, ज्ञानी पुरुष एक सम ॥
ज्ञानी वचन--चौपाई
ज्ञानी कहै सुनो धर्मराई । जीवनकहँ मैं आन बचाई ॥ पुरुष आज्ञाते मैं चलि आवों । भवसागरते जीव मुक्तावों ॥ पुरुष अवाज टार यहि बारी । तौ मैं तोकहँ देब निकारी ॥
शब्द
अपने नामकी सोंकर गह मैं पाटि डरी हो । तना तनतकै बेटवा मारे निधिया गई बौराई ॥ देहरि चढ़िके मेहरि मारे निर्ई देखो गुरुवाई । परवा फोरि द्वैचोखा निकसे बीचमें मिलि गई हस्ती ॥ सोटा चार कमरमें मारेनि निकर गई अलमस्ती । आसन लूटेनि वासन लूटेनि लूटे तिनपाई पौवा ॥ ताल अस मोर सनहक लूटी हांडी चलावन डौवा । हँसियाको बेट कोदोकै भूसी ईमोर न्यामत लूटी ॥ कहैं कबीर सुनो भाई साधो दुविधा गै अब छूटी ।
निरंजन वचन--चौपाई
धर्मराय अस बिनती ठानी । मैं सेवक दुतिया नहिं मानी ॥ ज्ञानी बिनती एक हमारा । सो न करो मोर होय बिगारा ॥ पुरुष मोकहँ दीनो राजू । तुमहू देव होय तब काजू ॥ बिनती एक करो हो ताता । दृढ़ करि जान्यौ हमरी बाता ॥
स्वसमवेदबोध
( १२१ )
कहा तुमार जीव नहीं माने । हमरी दिशभै वाद बखानै ॥ मैं हठ फंदा रच्यौ बनाई । जामें जीव परा अरुझाई ॥ वेद शास्त्र सुमिरन गुन नाना । पुत्र हैं तीन देव परधाना ॥ देवल देव पखान पुजार्ह । तीरथ व्रत जप तप मन लाई ॥ यज्ञ होम अरु नियम अचारा । और अनेक फंद हम डारा ॥ जौ ज्ञानी जैहो संसारा । जीव न माने कहा तुमारा ॥
ज्ञानी वचन-चौपाई
ज्ञानी कहै सुनो धर्मराई । काटो फंद जीव ले जाई ॥ जेतो फंद रची तुम बारी । सत्यशब्द ले सकल विडारी ॥ जिहि जिवको हम शब्द हटै हैं । फंद तुम्हार सबै सुतैहैं ॥
निरंजन वचन चौपाई
सतयुग त्रेता द्वापर माहीं । तीनों युग जिव थोरे रहिजाही ॥ चौथा युग जब कलऊ आई । तब तुव शरण जीव बहु जाई ॥ ऐसे वचन हारि मोहि दीजै । तब संसार गौन तुम कीजै ॥
ज्ञानी वचन चौपाई
अरे काल परंपंच पसारा । तीनो युग जीवन दुख डारा ॥ बिनती तोरि लीन मैं मानी । मोकहैं ठगे काल अभिमानी ॥ चौथा युग जब कलऊ आई । तब हम अपनो अंश पठाई ॥ काल फन्द छूटे नर लोई । सकल सृष्टि परवानिक होई ॥ घर घर देखो बोध विचारा । सत्य नाम सब ठोर उचारा ॥ पांच हजार पांचसौ पांचा । तब यह वचन होयगा सांचा ॥ कलियुग बीत जाय जब येता । सब जिव परम पुरुषपद चेता ॥
निरंजन वचन चौपाई
ज्ञानी बिनती सुनो हमारी । द्वापर अंत होय जिहि बारी ॥ बोध शरीर धरब हम जाई । जगन्नाथको नाम धराई ॥