कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
आगमनिगमबोध
( ३१ )
अथ चारों भाईका धामक्षेत्र वर्णन-वार्ता
माता वरुणावती पिता अगस्त्य गुरु धर्मऋषि स्वर्ग नगरी अच्युत शुक्ल वर्ण अनंत शाखा सामवेद ॥ निष्काम भिक्षा धाम रंगनाथ सुखविलास कोटपाट हरिनाम आहार परम बदिकाश्रम क्षेत्र मठ वैकुण्ठलक्ष्मीदेवी नारायण ॥ देवता पूजा अक्षय बटकी श्रीरंग सम्प्रदाय ऊख खाडा शून्य स्थान सुमेर परिक्रमा बीजमंत्र ॥
इति
अथ चारों संप्रदायके तिलक स्वरूप-चौपाई
श्री संप्रदायके जो आचारी । चरणचिह्न प्रभु तिलक सँवारी ॥ दोय लकीर ऊर्ध्व गत हेरे । श्री अरु नारिबीच तिहि केरे ॥ हेठ तिलक हरिको सिंहासन । जोरी बनावै निछुलीलारन ॥ मध्यमें लाल वरन श्री करही । दीपशिखाजिहिविधिलखिपरही एता पीता वरन श्री होई । रामानन्द संप्रदा सोई ॥ द्वितिये विष्णुश्यामविधि जोहे । दोय लकीर लीलारमें सोहे ॥ हेठ सो सिंहासन शून्य है बीचे । जाति बरनते चित नहिं खींचे ॥ साधू होहि विरक्त न होहि । कह मरयाद पालना होहि ॥ तृतिये माधो संप्रदा कहिये । दोय लकीर ऊर्ध्वगत लहिये ॥ हेठ सिंहासन ताहि बनाई । चरणचिह्न प्रभु माथ सोहाई ॥ चौथे निम्बादित्य जो साजे । दोय लकीर लीलार विराजे ॥ हेठ सिंहासन बन्दु विचाला । ऊर्ध्व पुंड्र अरु वैष्णव चाला ॥
इति
अथ वैष्णवके द्वादश तिलक वर्णन
दोहा-ऊर्ध्वपुंड्र मस्तक प्रथम, ब्रह्मश्रुपुनि जोय ।
१ तिलकोंका चित्र देखो 'कबीर मानु प्रकाश' में ।
( ३२ )
बोधसागर
तृतीय नेत्र दोउ कंठपुनि, उर नाभी फिर होय ॥ उर दोहु दिश भुज दोय पुनि, तथा पूष्ट परमान । बरन बइणवके यही, द्वादश तिलक बखान ॥
इति द्वादश तिलक
अथ वैष्णवके दशचिन्ह वर्णन
दोहा-भद्र भेषतशोचकर पुनि, तुलसी गल माथ । रामकृष्णको मंत्र गह, गोपी मृतिका साथ ॥ शिखा सूत्र करमण्डलो, धौत वस्त्र गुरुवाक । चिह्न वैष्णवके दशो, चार संप्रदा साक ॥
इति
अथ बावनद्वारेके नाम
दोहा-प्रथम अनंता जी कहे, साहिब सत्य कबीर । पुनि सुरेश्वरानंदजी, सुखानन्द मति धीर ॥ अनभय नन्द सुरारजी, अग्रदासजी काल । दीपाजी रवि दासजी, नामदेव हृदशील ॥ खोजी जंग दिवाकर, वीरम त्यागी जान । परशराम नाभा टिला, भोला नैन बखान ॥ पूरन बैराटी कहे, बहुरि घमण्डी देव । ज्ञानिकुबा हरि बंशजी, राधावा वस्त्रभ येव ॥ गोकुल विटुल करम चँद, जोगानंदी जोय । धरनीदास मल्लकजी, असख देवनी होय ॥ माधौ कानी रामरावल, आत्माराम प्रकाश । लाल तरंगी देव भंडंग, भगवान तुलसीदास ॥ हठी नरायण राम रँगी, चतुरा नागा होय । नित्यानन्दी राम कबीर, श्यामानन्दी सोय ॥
आगमनिगम बोध
( ३३ )
हनुमान दास कमालजी, चेतन स्वामी नाम । दास चतुर्भुज राम जपु, मन पुनि कह दुंदराम ॥
इति बावनद्वार
अथ सात अखाडनके नाम
दोहा-टाटंबी निरालंबी कह, संतोषी विरुध्यात । निर्वानी दीगम्बरी, पोकी निरमोहि सात ॥
इति सात अखाडन
अथ तेरह परमभागवतके नाम-चौपाई
नारद पुंडरीक प्रहलादा । ग्यास वशिष्ठ पराशर वादा ॥ भीषम रुक्मांगद विभीषनौ । अर्जुन अम्बरीष शुक् सेनौ ॥
इति
अथ रामानन्दजी और सत्यकवीरकी कथा-चौपाई
सत्यकवीर मनुष तन लीने । जोलहाके घर बासा कीने ॥ अगम ज्ञान कथ साधुन पाही । सुनि आश्चर्य करे मनमाही ॥ निजु निजु मनमें करे बिचारा । बालक नहीं सिद्ध औतारा ॥
सत्यकवीर वचन शब्द
साखी-तब हम साध सिद्धते, कथे गुष्ठि घन ज्ञान । सिद्ध साध मिलिमोकह, पूछै गुरुको नाम ॥
चौपाई
गुरु नहिं नाम कहौ क्यों ओही । तब वे दोष देहि सब मोही ॥ साकठ होई कथ्यो बहु ज्ञाना । गुरुविन मुक्ति नहोय निदाना ॥ तब अपने मन कीन बिचारा । तब गुरु उठो द्वंद संसारा ॥ हम गुरुमुक्ति हटावन आये । गुरुमारग जिवलोक पठाये ॥ गुरु धारनको मनहिं बिचारा । रामानंदसे वचन उचारा ॥ रामानन्द गुरु दिशा दीजै । गुरुपूजा कछु हमसे लीजै ॥
( ३४ )
बोधसागर
तब रामानन्द बचन सुनाई । शूद्रके कान न लागौ भाई ॥ रामानन्द न दिक्षा दीने । तब कबीर अस उद्यम कीने ॥ वीच पंथमें पौढे जाई । जिहि मारग रामानन्द आई ॥ पिछला पहर राति जब आवै । रामानन्द असनानको जावै ॥ चले जात मारगमें जबहीं । लगा खराऊँ ठोकर तबहीं ॥ तब पुकारिके रोवन लागे । रामानंद खड़े भे आगे ॥ बालक देखि दया उर आई । रामानंद कहे समुझाई ॥ मतिरोवो मति करो पुकारा । राम नाम किन कहु मेरे बारा ॥ तब कबीर सो शिक्षा पाई । गुरु शिष्यको भाव बनाई ॥ रामराम धुनि रटनि लगाया । रामानंदसे बचन सुनाया ॥
सत्यकबीर बचन
गुरुजी समुझि गहो मोरे बाहीं । औरनसो चेला हम नाहीं ॥ जो बालक घुनघुनवा खेले सो बालक हम नाही । चौदह सो चौरासी चेले तिनमध्ये हम नाहीं ॥ हम तो लेते सत्तको सौदा पाखंड पूजवै हम नाहीं । बांह गहो तो गहिके पकरो फेर छूटि ना जाहीं ॥ हाड चाम मेरे नहिं कोई जुलहा जाति हमनाहीं । तुमरी नावमें केवट नाहीं लहरि उठै बिकरारा ॥ गुरु समेत शिष्य जब बूड़े कौन उतारो पारा । जौं तुमरे कछु उद्यम नाही भीख मांगि किन खाहू ॥ मूरि सजीवन जानत नाहीं भूलि न बांधो काहू । सूखे काठमें ज्यों घुन लागे लोहे लागी काई ॥ बिन पगतीत गुरु जो कीजै तो काल घसीटे जाई ॥ कहे कबीर सुनौ रामानंद यह सिखलेव हमारी । निरखि परखिके चेला कीजै तागुरुकी बलिहारी ॥
आगमनिगमबोध
( ३५ )
चौपाई
रामानन्द गये असनाना । तब कबीर गृह कियौ पयाना ॥ भोरहि कण्ठी तिलक लगाये । नग्रलोग सब देखन आये ॥ पूछे किमि यह भेष बनाये । तब कबीर यह उत्तर सुनाये ॥ रामानन्दको गुरु हम धारा । ताते ऐसे भेष सँवारा ॥ रामानन्द खबर जब पाई । तब कबीरको टेरि बोलाई ॥ रामानन्द गुरु परदा धारा । सत्य कबीर से बचन उचारा ॥ रे जोलहा ते कहसि न मोही । कब मैं दीक्षा दीनों तोही ॥ गुरुजी राम कृष्ण तुम मेरे । रैन पन्थ प्रकटै कयों तोरे ॥ तुम तब रामनाम मोहि दीना । मैं निज जन्मसुफलकरिलीना ॥ कहै गुरु यह बालक रहेऊ । ठोकर लगा राम तिहि कहेऊ ॥ गुरुजी हंमही रहै सो बाला । राम राम सुनि भयेनिहाला ॥ कह गुरु तू वैश्य कि शूद्रा । वह तो इता बाल बुधि भोरा ॥ तिहि छिनबालरूप दिखलाओ । तब गुरु रामानंद पतियायो ॥ पै जोलहा ब्रह्मवादि कराही । अन्तर ओट सोदियौ बहाई ॥ कहै साधु गुरुसे समुझाई । कबीरहिजुलहानकहिये गुसाई ॥ अनंतानंद कहै परचाये । कबीर सो ब्रह्मरूपधरि आये ॥ दीजै दरशन इनको स्वामी । ये आहि ब्रह्मसोअन्तर्यामी ॥ तबहु न दर्शन दीन गुसाई । तब हम सन्मुख ठाढभे जाई ॥
साखी-गुफामाह गोपहुँचहौं, पूछे को तुम आहु ।
मैं कबीर सेवक अहौं, अजहुँ नहिं पतियाहु ॥
चौपाई
रामानंद कहाव गुरु मेरा । सत् कबीर मैं सेवक तोरा ॥ गुरु सोई जो शिष्य चितावै । शिष्य सोई गुरुसेवा लावै ॥ कहौ गुरु गुरुज्ञान विचारी । को है पुरुष कौन है नारी ॥
( ३६ )
बोधसागर
कौन पुरुषको सुमिरो नामा । कहौ कहाँ अबिचलनिजुधामा ॥ कहौ ध्यान कीजै किहि केरा । तन छूटे कह होय बसेरा ॥ रामानंद कहै सुनु पूता । गुरुसुख ज्ञान रहो संयुक्ता ॥ आपै पुरुष आप है नारी । कहो ज्ञान चित्तराख संभारी ॥ सुमिरहु दशरथ सुत श्रीरामा । अवधपुरी अविचलनिजधामा ॥ श्याम स्वरूप ध्यानमन धारो । तन छूटे बैकुण्ठ सिधारो ॥ कहै कबीर सुनो गुरुदेवा । यह समुझाय कहो मोहिभेवा ॥ रामचन्द्र त्रेतामें भयऊ । काहुहुखाय काहु सुख दयऊ ॥ लोभमोह जुत वन वन डोला । तत्त्वप्रकृत संगतितिहि बोला ॥ जौन बाटते रघुपति आये । सूत कौशल्याको कहलाये ॥ जब त्रेता तब राम भुवारा । कौन पुरुषको सकलपसारा ॥
सारखी-अहो गुरु समुझाइये, कोहै सिरजन हार ।
रामचन्द्र गुरु बंदेउ, कौन नाम आधार ॥
चौपाई.
कहत निगम अस करे विचारा । पूर्व अवर्न जन्मसो न्यारा ॥ तात मात बंधु सो नहिं ताही । ना वह आवै ना वह जाही ॥ श्याम श्वेत नहिं कहिये ताही । इन्द्रासन बैकुण्ठ न जाही ॥ तीन लोक सब परलय होई । निजु धाम कहो कहाँ है सोई ॥ स्वर्ग लोक तुम राखी आशा । फिरि फिरि होय गर्भमें वासा ॥
सारखी-स्वर्गनरक न्यारा, सो मोहि देहु चिह्नाय ।
कहवाते जीव आयेऊ, कहोगुरु समुझाय ॥
चौपाई
सुनहु कबीर कहो सो गहहु । करिये योग अमर है रहहु ॥ आसन साधहु बांधहु मूला । अष्टकमलदल निरखहु फूला ॥
आगमनियमबोध
( ३७ )
चन्द सूर गहि कीजै मेला । मन पौना शुभ निधर खेला ॥ चढ़ि अकाश अमृत रसपीवो । तब कबीर तुम युग युग जीवो ॥
साखी-स्वर्ग नरकते न्यारा, ज्योतिपुरुष निर्वाण ।
तहवाँसे जीव आइया, कहो गुरु सहिदान ॥
चौपाई
कहै कबीर सुनो हो स्वामी । तुम हो उत्तगुरु अन्तरजामी ॥ योगके किये अमर जो होई । तौ पुनि योगी मरे न कोई ॥ का भो साथे आसन मूला । जौं नहिं मेटे संशय झूला ॥ का भो अष्टकमलके पेखे । जौं नहिं आप रूप निजु देखे ॥ का भो चन्द सूरके मेला । जौं नहिं शब्दसुरति गहि खेला ॥ का भो सुष्मनि जाय समाये । जौं नाहीं अक्षर लखि पाये ॥ क्याअकाश चढ़ि अमृत पीये । जौं नहिं नाम अभी चित दीये ॥ ज्योति स्वरूपी पुरुष बतायहु । ज्योति काल तीनों पुरुषायहु ॥ यहिजिव नाहिं ज्योतिसे आवा । परम ज्योतिसे अंश उपावा ॥ जो जिव ज्योति पुरुषते होई । नौ काहे जिव जाय विगोई ॥ ज्योति निरंजन काल अन्याई । सिद्धि तपी सब धीरधरिखाई ॥
साखी-ब्रह्मा विष्णु महेश्वर, सुर नर मुनि सब झार ।
ज्योति निरंजन सब कहे, खायो बारंबार ॥
चौपाई
जाहि कहत हो पुरुष निर्वाण । वही आहि तौ काल देवाना ॥
साखी-योग यज्ञ जपतीरथ, यह सब यमके जाल ।
कहै कबीर सतनामबिन, कबहु न छोड़ै काल ॥
पाँच तीन जहवां नहिं, नहीं प्रकृत प्रवेश ।
रविशशिपानीपौननहिं, तहँको कहो सँदेश ॥
( ३८ )
बोधसागर
चौपाई
कहै गुरु तुम शिष्य भये मोरे । यह सब बुद्धिको दीनेहु तेरे ॥ कहै कबीर सब तुम परतापा । हमरे तुमहि माया अरु बापा ॥ तब गुरु हमपर भये दयाला । निजकरदियौ सुमिरिनी माला ॥ कहै गुरु सुन साधु कबीरा । तुम तो सेवक हो मतिधीरा ॥ सर्वांनंद विप्र यक आये । तिन पुनि गुरुते गोष्ठि कराये ॥ ताहि जीत गुरु शिष्य करावा । तब गुरु हम कह तिलककरावा ॥ सब पर श्रेष्ठ हमें गुरु कीना । हम पुनि सबते रहै अधीना ॥
साखी-गुरुके सब शिष्य मोहिको, बोलैं गुरुसमान ।
हम गुरु साधु अधीन हैं, भाषै निर्भय ज्ञान ॥
शब्द
लख कोई विरलापद निर्बान । बिन रसना सूर धरै ध्यान ॥ तामें दरसे पुरुष पुरान । कर्म छोड़ि सब भर्म नसान ॥ डुरमति छोड़ि कमल धरु ध्यान । तीन लोकमें काल समान ॥ चौथे लोकमें नाम निसान । रामानन्द गुरु करै बखान ॥ दास कबीरको निरमल ज्ञान ।
इति
मेरो नाम कबीरा हो जगत गुरु जाहिरा । तीन लोकमें मागा मेरा त्रिकुटी है अस्थान ॥ पानीपौन समेरसमाना इस विधि रच्यौ जहाना । गगन मन्दिरमें वासा मेरा मंजनि है अस्थाना ॥ ब्रह्मबीज हमहीसे आया हमरै सकल जहाना । अनहद लहर गगन गढ उपजै बाजै सोहं तारा ॥ गुप्त भेद वाहीसे कहिये जो निज होय हमारा । भवबंधनसे लेहु छोड़ाई निरमल करो शरीरा ॥
आगमनिगमबोध
( ३९ )
सुर नर सुनि कोई भेद न पावै पावै संतगंभीरा ॥ वेद कदापि पार नहिं पावै ऐसे मतिके धीरा । कहै कबीर सुनो रामानन्द दोनों दीनके पीरा ॥
चौपाई
रामानन्द कबीर कहानी । जक्तमाह बहु विधि विहरानी ॥ कछु मैं सूक्ष्म लिख्यौ बनाई । कीरति जासु जक्तमें छाई ॥ सत् कबीरको चरित अनेका । सो कछु इहां लिखौ नहिं एका ॥ केते परचा गुरुहि देखाई । तब ताके हिय निश्चय आई ॥ मैं घनघोर गुष्ठि गुरु पाही । अगम ज्ञान सुनि बोले ताही ॥
रामानंद वचन
दोहा-मैं जाना तुम जोलहा, मोहि पडा बड घोष । मूल दिशा मोहि देव कबीर, जीवत आवै संतोष ॥ करता तुम हो साधू हो, सत्य कबीर है देव । तनमन तुमको अपिहों, करह दीक्षा मोहि देव ॥
सत्यकबीर वचन-शब्द
सारखी-काल करन्ते आज कर, आज करंते अब । औसर बीता जात है; व्यौहार करोगे कब ॥ काल करंते काल है, मोहि भरोसा नाहिं । यह तनं काचा कुम्भ है, विनशि जाय छनमाहिं ॥ घडी पलकको सुधि नहीं, करो कालको साज । काल अचानक मारि है, ज्यों तीतरको बाज ॥
चौपाई
योगी गोरख नाथ प्रतापी । तासुतेज पृथ्वी पर व्यापी ॥ काशी नग्रमें सो पग परही । रामानन्दसे चर्चा करही ॥ चरचामैं गोरख जय पावै । कंठी तोरे तिलक छुडावै ॥
( ४० )
बोधसागर
सत्य कबीर शिष्य जब भयऊ । यह वृत्तांत तब सो सुनि लयऊ ॥ गोरखनाथके डरके मारे । बैरागी नहीं वेष सँवारे ॥ तब कबीर आज्ञा अनुसार । वैष्णव सकल स्वरूप सँवारा ॥ सो सुधि गोरखनाथ जो पायौ । काशीनथ शीघ्र चलि आयौ ॥ रामानन्दको खबरि पठाई । चर्चा करो मेरे सँग आई ॥ रामानन्दकी पहिली पौरी । सत्य कबीर बैठे तिहि ठौरी ॥ कह कबीर सुन गोरखनाथा । चर्चा करो हमारे साथा ॥ प्रथम करो चर्चा सँग मेरे । पीछे मेरे गुरुको टेरे ॥ बालक रूप कबीर निहारी । तब गोरख ताहि बचन उचारी ॥
सत्यकबीर वचन--शब्द
कबके भये वैरागी कबीरजी कबके भये वैरागी । नाथजी हम जवसे भये वैरागी मेरी आदि अन्त सुधिलागी ॥ धुधूकार आदिको मेला नहीं गुरु नहीं चेला । जबका तो हम योग उपासा तबका फिरों अकेला ॥ धरती नहीं जदकी टोपी दीना ब्रह्मा नहीं जदका टीका । शिवशंकरसो योगी नहीं जदका झोली शिवका ॥ द्रापरकी हम करी फावडी त्रेताको हम दंडा । सतयुग मेरी फिरी दुहाई कलियुग फिरौ नौखण्डा ॥ गुरुके वचन साधुकी संगत अजर अमर घर पाया । कहैं कबीर सुनोहो गोरख जब हम तत्त्व लखाया ॥ जो बूझे सो बावरा क्या उमर हमारी । असंख्य युग परलय गई तबके ब्रह्मचारी ॥ कोटि निरंजन हो गये परलोक सिधारी । हम तो सदा महबूब हैं सोहं ब्रह्मचारी ॥ दश कोटि ब्रह्मा भये नौ कोटि कन्हैया ।
आगमनिगमबोध
( ४१ )
सात कोटि शंभू भये मोरी एक पलैया ॥ कोटिन नारद होगये महम्मदसे चारी । देवतनकी गिनती नहीं है क्या सृष्टि विचारी ॥ नहीं बूढ़ा नहीं बालक नहीं भाट भिखारी । कहै कबीर सुन गोरख यह उमर हमारी ॥ अविध्व अविगतसे चलि आये कोई भेद सरम नहीं पाया । ना मेरो जन्म न गर्भवसेरा बालक है देखलाया ॥ काशीनथ जङ्गल विचडेरा तहाँ जोलाहे पाया । माता पिता मोरे कछु नाहीं न मेरो गृहदासी ॥ जुलाहाको सुत आनिकहाया जगत करत है हाँसी । धड नहीं मेरे गगन कछु नाहीं सूझै अगम अपारा ॥ सत्य स्वरूपी नाम साहेबको सौहै नाम हमारा । अधरद्दीप नहीं गगन गुफामें तहँनिजु वस्तु हमारा ॥ ज्योतिषरूपी अलख निरञ्जन सो जपै नाम हमारा । हाड चाम लोहू नहीं मोरे हौ सतनाम उपासी ॥ तारन तरन अभै पददाता कहै कबीर अविनाशी ।
गोरखवचन
कौन छुरा कौन पानी गुरु मूँडै कौन बानी ॥
सत्यकबीर वचन
शब्द छुरा निरञ्जन पानी गुरु मूँडै निरबानबानी ।
गोरखवचन
कौन दर कौन दरवेश कौन गुरुने मूँडै केश ॥
कौन पुरुको सुमिरी नांव मांगो भिक्षा भांडो गांव ॥
सत्यकबीर वचन
मन दर पौन दरवेश गुरु गोविंदने मूँडै केश ॥
अलख पुरुषको सुमिरो नांव मांगो भिक्षा तारो गांव ॥
( ४२ )
बोधसागर
गोरख वचन—चौपाई
कौन तुमारी उत्पत्ति कीनी । किसने तुमको माला दीनी ॥ कौन गुरु दीनो उपदेश । उतारो माला करो आदेश ॥
कबीर वचन
आदि पुरुषने उत्पत्ति कीनी । सिरजन हारने माला दीनी ॥ गुरु गोविंद दीनो उपदेश । न उतारों माला नाकरों आदेश ॥
गोरख वचन
क्या लै उठो क्या लै बैठो रहो कौनकी छाया । कौन माह निरञ्जन पेखे कैसे त्यागी माया ॥
कबीर वचन
एकले उठ एकले बैठे रहै एककी छाया ॥ एकै माह निरञ्जन पेखा सहजे त्यागी माया ॥
गोरख वचन
कौन तुमारी डिब्बी बोलिये कौन तुमारा चावल ॥ कौनसो तुममें सिद्ध बोलिये कौनसो तुमरो रावल ॥
कबीर वचन
काया हमारी डिब्बी बोलिये कर्म हमारे चावल ॥ एक हमसे सिद्ध बोलिये और सकल है रावल ॥
गोरख वचन
कौन तुमारी गुदरी बोलिये कौन तुमारा धागा ॥ कौन तुमारी टोपी बोलिये काहेते मन लगा ॥
कबीर वचन
काया हमारी गुदरी बोलिये पौन हमारा धागा ॥ गगन हमारी टोपी बोलिये अलख पुरु मन लगा ॥
आगमनिगमबोध
( ४३ )
गोरखवचन
कौन तुमारी तिलक बोलिये कौन तुमारा छापा ॥ कौन तुमारी जाति बोलिये कहा तुमारी आसा ॥
कबीरवचन
तत्त्व हमारी तिलक बोलिये राम नाम है छापा ॥ वैष्णव हमारी जाति बोलिये शब्द मंडलमें आसा ॥
गोरखवचन
शब्द कहाँसे आया कहो शब्दको विचार ॥ नहीं तो तिलक माला धरो उतार ॥
कबीरवचन
शब्दै धरती शब्दै अकाश । शब्दै पांच तत्त्वके बास ॥ कहैं कबीर हम शब्द सनेही । शब्द न बिनसै बिनसै देही ॥
गोरखवचन
अंडान मंडान चार खुरो द्वै कान ॥ जान तो जान नातो झोली माला उरे आन ॥
कबीरवचन
अण्डान धरती मंडान आकाश चारों खूट चारोंखूरी चंद्रसूर्यद्वै कान ना जानो मात्रा तो गुरु रामानंदकी आन ॥ शेर्ली सिंगी और खटपटी । फिर बोलो तोरों कनपटी ॥
गोरखवचन
आसन बांधो बासन बांधो अरु बांधो नौद्वारा ॥ तोहि बांधों तेरे गुरुको बांधों निकसे कौने द्वारा ॥
कबीरवचन
आसन मुक्ता वासन मुक्ता मुक्ता है नौ द्वारा ॥ मैं मुक्ता मेरो गुरुभी मुक्ता निकसै दशमें द्वारा ॥
( ४४ )
बोधसागर
चौपाई
गोरखनाथ कबीर समाजा । विविध ज्ञान विज्ञान विराजा ॥ चर्चा पर्चा बहुविधि ठानो । विदित जत्तमें लोगन जानो ॥ इहांसो कथा लिखो नहिं कोई । अन्त बाद जिहि औसर होई ॥ गोरख नर्म भये तिहि बारा । विनयसहित निजबचनउचारा ॥
गोरखबचन
नवो नाथ चौरासी सिद्ध, इनको अनहद ज्ञान । अविचल घर कबीरको, यह गति विरलाजान ॥ झोरी झण्डा कूबरी, शेली टोपी साथ । दाय़ा भई कबीर की, चढ़ाई गोरखनाथ ॥
धर्मदास बचन
दोहा-बाजा बाजा रहितका, परा नगरमें शोर । सतगुरु खसम कबीर है, नजर न आवै और ॥
नानकशाह बचन
शब्द-वाह वाह कबीर गुरु पूरा है । पूरे गुरुनकी मैं बलि जैहौं जाको सकल जहूरा है ॥ अधर दुलैच परै है गुरुनके शिव ब्रह्मा जह शूला है ॥ श्वेत ध्वजा फहरात गुरुनके बाजत अनहद तूरा है ॥ पूर्ण कबीर सकल घट दरशै हरदम हाल जहूरा है ॥ नाम कबीर जपै बडभागी नानक चरणको धूरा है ॥
सत्य कबीरबचन नानकशाहप्रति
शब्द-वाह वाह लडके जीतारहु । मंड़येकी रोटी बथुयेकी भाजी ठंडा पानी पीतारहु ॥ प्रेमकि मुई सुरतिको धागा ज्ञानगूदरी सीतारहु ॥
आगमनिगमबोध
( ४५ )
यहि लडकेकी बड बड अँखियां नितप्रति दरशन करतारहु ॥ कहैं कबीर सुनो भाई लडके रामरसिक रस पीतारहु ॥
मल्लुकदास वचन
शब्द-जपो रे भाई साहिब नाम कबीर ॥
एक समय गुरुवंशी बजाई कार्लिंदीके तीर ।
सुरनरसुनि सब चकित भये हैं अरु यमुनाजीको नीर ॥
काशी तजि गुरु मगहर आये दोऊदीनके पीर ।
कोइ गाड़ै कोइ अभ्रजलावै नेक न धरते धीर ॥
चार दागते सतगुरु न्यारा अजर अमरो शरीर ।
जगन्नाथको मंदिर थापे हटि गये सायर नीर ॥
आसा रोपि ससुद्ध हटाये ऐसे गुरु गँभीर ।
दास मल्लुक श्लोक कहत हैं खोजहु खसम कबीर ॥
दाबूराम वचन
साखी-अधर चाल कबीरकी, मोसे कही न जाय ।
दाढ़ कूदै मिरग ज्यों, पर धरनि पर आय ॥
हिन्दूको सतगुरु सही, सुसलमानको पीर ।
दाढ़ दोनों दीनमें, अदली नाम कबीर ॥
हिन्दू अपनी हृद चले, सुसलमान हृद माह ।
दाढ़ चाल कबीरकी, दोऊ दीनमें नाह ॥
दाढ़ बैठे जहाजपर, जो दरियाके तीर ।
जलकी जेती माछरी, रटै कबीर कबीर ॥
नाभाञ्च वचन
दोहा-वानी अरबो खरबो, ग्रन्था कोटि हजार ।
करता पुरुष कबीर, रहै नामे विचार ॥
नं. १० बोधसागर - ८
( ४६ )
बोधसागर
गरीबदास वचन
सारखी-गरीबपंजा दस्त, कबीरकासिरपर धारो हंस । जम किंकर चपै नहीं, अथर जात है वंश ॥
श्रीमहादेव उवाच
श्लोक-यः सुखसागरो दाता बीजज्ञानं तथैव च । आद्यन्तरहितो लोके यः कबीर इहोच्यते ॥ कलांशेन गतो भूम्यां विलासा सत्य संज्ञकः । दीनोद्धारतिदक्षः कबीरसंज्ञः इहोच्यते ॥ कर्ताकोन्यायकारी च व्यक्ताव्यक्तःसनातनः । रमते सत्यलोके यः स कबीर इहोच्यते ॥
पारवतीजीने पूछा कि कबीर किसको कहते हैं ? उनके उत्तरमें शिवजीने कबीर साहिबकी स्तुतिमें सौ एक श्लोक कहे हैं उस ग्रन्थको कबीर एकोत्तर कहते हैं जो सामवेद और पाताल खण्डमें हैं उसमेंसे यह तीन श्लोक लिखे हैं ।
इति
अथ वैष्णव आचार वर्णन-चौपाई
सहित बिचार आचार घनरे । उज्वल क्रिया तासुकी हेरे ॥ नित दातन मज्जन तन करही । शौच क्रिया भली भाँतिसे धरही ॥ मांस मद्य आदिक हैं जेते । जानि अभक्ष न संग्रह तेते ॥ जप तप ध्यान धुन्दधते धारे । ठाकुरकी पूजा विस्तारे ॥ मूरति होय कि मानस ध्याना । उभय भाँति हरि सेवा ठाना ॥
अथ मूर्तिपूजा आठ प्रकार वर्णन
दोहा-मनोमयी परतक्ष कही, चित्र बखानो काठ । माटी धात ध्यानमय, प्रतिमा पूजा आठ ॥
आगमनिगमबोध
( ४७ )
चौपाई
प्रथमहि पानी विद्या जानो । विनविद्या किमिहरि पहिचानो॥ द्वितिये पुष्पको अर्थ कहीजै । एक देवकी टेक कहीजै ॥ तृतिये चावल अर्थ सुनाओ । भोग अशुचिपरधान्यन खाओ॥ चौथे चन्दनते इमि जानी । काम क्रोधकी कीजै हानी ॥ कीना डाह द्वेष सब जोई । उरते दूर बहाओ सोई ॥ पंचम धूप अर्थ इमि कहिये । प्रीति देव गरमीते गहिये ॥ छठये दीपको अर्थ बताओ । बुद्धिदीप निजहृदय जगाओ ॥
अथ मुक्तिस्वरूप वर्णन—चौपाई
जीवते ब्रह्म होय जो कोई । मुक्तनाम भाषे श्रुति सोई ॥ चार भांतिकी मुक्ति प्रमाना । सालोको सामीप बखाना ॥ सारूपो सायुज्य कहीजै । ऐसो तिनको अर्थ गहीजै ॥ सालोकहिं प्रभु लोक निवासा । सामीपा हरिके ढिग वासा ॥ सारूपा प्रभु रूप हो भाषा । सायुज्यौ हरिमें मिल दासा ॥ जस वासना दास उर होई । तैसी मुक्ती पावै सोई ॥ जब उपासना पूर्ण भैऊ । जीवनमुक्त ताहि तब कहेऊ ॥ परम धामको जब सो जावै । हरिपारषद तासु ढिग आवै ॥ जब हरिधामको चालन लागे । थूल देहको तब सो त्यागे ॥ लिंगदेह तब धारण करई । पांचो तत्त्व देह परिहरई ॥ जब भूलोकते आगे चाला । पृथ्वी तत्त्व देह तब डाला ॥ बहुरि देह पानी की धारा । तब जसतत्त्व लंघिहो पारा ॥ बहुरि अग्निदेही गह सोई । पार अग्नि घेरा तब होई ॥ फेर वायुकी देहको धारी । पौन घेर बाहर पग धारी ॥ इमि तन त्यागत गहनव्रीना । सकल घेर बाहर पग दीना ॥ चलि ब्रह्मांड पार जब कीता । मायापार भो त्रिगुणातीता ॥
( ४८ )
बोधसागर
पुनि परमात्म प्रकाश बखाना । तामें जाय करे असनाना ॥ करि असनान लिंगतन छोडा । दिव्य देह अबिकारी जोडा ॥ ज्ञानानंद ब्रह्म तन पाई । निज स्वामी के द्वारे जाई ॥ आदरयुत प्रभुके ढिग आवै । हरिगुण विविधि मांतिसे गावै ॥ प्रभु दायामाया ते छूटा । कठिन दुःखते प्रभुपद जूटा ॥ ब्रह्मानंद मगन मन होई । यद्यपि ऐसो समरथ सोई ॥ रचे अमित ब्रह्मांड जो चाहे । पालपोषिके पुनि तिहि ढाहे ॥ तदपि ब्रह्म सुख ऐसो लहई । और दिशा नहीं तो चितबहई ॥ याहूमें व्यौरा बहु तेरा । कथा कछुक लिखिये तिनकेरा ॥ व्यौरा वेद कहे यहि भाये । जो कोई सुक्त स्वरूप समाये ॥ सागरमें जस बुंद समाना । पै वह बुंद आपको जाना ॥ बढ़ुरि कहै श्रुति ऐसो लेखो । ऐसी मुक्ति जीवको देखो ॥ पुष्पमाल जैसे हरि केलो । अथवा जैसे भूषन हेरो ॥ यहिविधिजिवहरि अंगमें जूटा । जिहि औसर मायाते छूटा ॥
इतिमुक्त
अथ परलोकमें पुण्यात्मा और परमात्माको वर्णन दोहा-कथा कहौ परलोककी, जब जिव त्यागे प्रान । मुरछा मृतके गत भये, पुनि तिहि जक्त फुरान ॥
चौपाई
जीवकी जब मूरछा गत होई । इंद्रिन सहित आप तन जोई ॥ पिछली स्मृतिहि दियो बिसराई । जन्म धरंत आपको पाई ॥ बाल युवा बृद्धादिक माना । जाति पांति कुलमें लपटाना ॥ भ्रम करिके जित जगको देखा । जैसे कछु स्वपनेको लेखा ॥ जाग्रत स्वप्न भेद नहीं कोई । स्वप्नहुमें स्वपनांतर होई ॥ भ्रमही करि पितु माता जाना । मिथ्या भास गहे अज्ञाना ॥
आगमनिगमबोध
( ४९ )
मृतक होय जीव जिहि बारा । देह अन्त बाहक तब धारा ॥ बहुरि बासना प्रेरि लै आवै । अधि भौतिक देही दिखलावै ॥ अधि भौतिक देहि जब पाया । दुखसुखको कारन यह आया ॥ हृदय कमल अंगुष्ठ प्रमाना । जीव अकाश जौ नाम बखाना ॥ ताहि कमलमें भर्मत रहई । लोक अनन्त दृष्टिमें गहई ॥ तहैं कोटिन ब्रह्मांड निहारी । हृदय कमल निज माह विचारी ॥ तीन प्रकार पुण्य जन राशी । मूरख पुनि धानां अभ्याशी ॥ तृतिये सर्व शिरो सुनि ज्ञानी । भिन्न २ गति निर्णय ठानी ॥ धानां भ्यासीकी यह बाता । तन तजि इष्ट देव दिग जाता ॥ अपने इष्ट देव पुर जाई । नाना विधि सुख भोग कराई ॥ नहिं मूरख नहिं ज्ञानी जोई । सुखसे निज तन त्यागे सोई ॥ बहुरि जन्म जगमें सो पाई । पुनि सो आतम लाभ लहाई ॥ अब ज्ञानीकी कथा बखानी । तजत देह सब सुखकी खानी ॥ मुक्ति विदेह तासुको ठीका । जिनके हृदय ज्ञानको ठीका ॥ पापीको अब मरण बतावो । महा दुःख ताके उर छावो ॥ जिनको अज्ञानिनको सङ्ग । उत्तम बुद्धि होय जिहि भंगा ॥ पापी चार कर्म जो करही । श्रुति विरुद्ध मग माह बिचरही ॥ तजै देह जब ऐसे लोगा । तिनको घेर शूल सौ सोगा ॥ विषय बुद्धि जासु लपटानी । दुसह दुःख पावै सो प्रानी ॥ हो पदार्थसे तिनहि वियोगा । रुंधित कंठ स्मृत सुख भोगा ॥ नैन तासु दोउ तब फटि जाही । कांति विरूप अंग हो ताही ॥ अंग उपांग टूटै तिहि बारी । प्रान निकसिगहि मारग नारी ॥ होय पदार्थ वियोग दुखारी । अस अनुमान करे दुख भारी ॥ अग्नि कुंडमें डारे जैसे । दुःसह पावै दुखजिव जैसे ॥ सर्व द्रव्य तिहि भ्रमयुत भासा । नभ पृथ्वी पृथ्वी आकाशा ॥
( ५० )
बोधसागर
परम कष्ट पावै तिहि काला । नभते जनु कोइ महिमें डाला ॥ पाथर में धरि मनहु पिसाना । जिमि तून भोडरमें भरमाना ॥ अंध कूपमें जैसे गेरा । मानहु कोल्हूमें धरि पेरा ॥ रथते गिरे जीव जिमि नीचे । रस्सी ज्यों गलडारिके खींचे ॥ दुःख अनंत परकार बखानो । कह लो ताकी निर्णय ठानो ॥ मूर्छित होय गहै जडताई । ताके कर्म जुरहि सब आई ॥ जिमि किशान बीजनको बोवे । समय पाय ताको फल होवे ॥ प्रान अपान कला दोउ टूटे । विषय वियोग महा दुख जूटे ॥ मृत्यु समय जब जिव सुरछाना । गगन लीन हो पौन अरु प्राना ॥ ताहि प्रानमें चेतन ताई । चेतनता बासना गहाई ॥ सहित बासना चेतन प्राना । गगन रूप है गगन समाना ॥ यथा गंधको पौन गहाई । ताहि सहित नभ स्थित कराई ॥ तिमि चेतन बासन सहिते । जाय अकाश माह सो थीते ॥ तिहि अनुसार बहुरि जगफुरता । तब कालते सो तिहि जुरता ॥ दोय प्रकारके जीव दुखानी । पापी अरु पुण्यातम प्रानी ॥ पुनि तिनमें कर तीन विधाना । एक महा पापी करि जाना ॥ द्वितिय मध्य तृतिये लघु होई । तीन प्रकार पुण्य जन सोई ॥ एक महा पुण्यातम लोई । पुनि मध्यम लघुको मतिजोई ॥ प्रथम महा पापी दुख हेरे । धन पखान सो ताको टेरे ॥ जड समान सुरछामें रहई । वर्ष सहस्र न चेतन गहई ॥ ताहु सुरछामें दुख भूरी । बहुरि ताहि चेतनता फूरी ॥ जब ताके तनमें सुधि आवै । आको देह सहित लखि पावै ॥ तब सो जायके नरकमें परता । अमित काल तामें दुख भरता ॥ नाना भांति परम दुख पाई । बहुरि नरकते बाहर आई ॥ देह अनंत धरे पशु केरा । बहुरि सो मानुष को तन हेरा ॥