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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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बोधसागर

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मुझको दो । तब नवनाथ चौरासी सिद्धोंने परामर्श किया कि, यह गुण तो हम लोगोमें नहीं कारण यह कि, हम लोगोको तो अपनी सिद्धि और जप तपका घमंड है । चलो ब्रह्मासे पाँच पैसे-भर दरिद्रता मांगें । तब ब्रह्मलोकमें गए और पाँच पैसेभर दरिद्रता ब्रह्मासे मांगी । ब्रह्माने शोच समझकर उत्तर दिया और कहा कि मेरे पास दरिद्रता कहाँ मैं तो इस बातका अहंकार करता हूँ कि, मैं सृष्टिका उत्पन्न करता हूँ यह अहंकार मुझमें है । तब नवनाथ और सब सिद्ध कैलासको शिवजीके पास गए और वही प्रश्न किया तब शिवजीने भी वही उत्तर दिया कि, मुझमें दरिद्रता तो नहीं, कारण यह कि, मुझमें तो यह अहंकार है कि, मैं नष्ट करता हूँ तब सब ओर ढूँढ़ते ढूँढ़ते थके परन्तु दरिद्रताको कहीं न पाया । अन्तमें विष्णुके पास गए और दरिद्रताके निमित्त प्रार्थना किया तब विष्णुने कहा कि, ऐ सिद्ध साधु पाँच पैसेभर दरिद्रता अथवा जो कुछ दरिद्रता है सो सब कुछ उसीके पास है जिसने तुमको भेजा है । मेरे पास तो केवल तीन पैसेभर दरिद्रता है, जिसके कारण मैं समस्त संसारका रचयिता कहलाता हूँ, दरिद्रताके समूह तो स्वयम् कबीर साहब हैं, और दूसरा कोई नहीं । तब समस्त सिद्ध साधु कबीर साहबके पास पलट आए-और आपको दण्डवत् तथा प्रणाम करके प्रदक्षिणा किया । और समस्त वृत्तांत प्रकट किया । तब कबीर साहबने कहा कि, क्या मैंने तुमसे इतः पूर्व ही न कहा था कि, तुम लोग तो दरिद्री हो तुमसे क्या मांगूँ ।

नानक बोध

कबीर साहब नानक साहबके निकट पञ्जाब देशमें आए तब नानक शाह अत्यंत आवभगत तथा सन्मान सहित उनसे

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कबीर चरित्रबोध

( १८३९ )

मिले और कहा कि, जिस सेवाके निमित्त आप आज्ञा देवें उसको मैं कहूँ। तब कबीर साहबने आज्ञा दिया कि, पाँच दिवसकी उत्पन्न हुई बछियाके स्तनसे दूध दुहकर मेरा कमण्डलु भर दो—तब नानक शाहने कहा कि, पाँच दिवसोंकी उत्पन्न हुई बछिया कैसे दूध दे सकती है? तब कबीर साहबने कहा कि, यही मेरी सेवा है तुम करो। तब नानकशाहने हूँद ढाँढ़ कर पाँच दिनसोंकी उत्पन्न हुई बछियाको उपस्थित किया, जब दूध लेनेको उसके समीप गए, तब वह बछिया लात चलाकर भाग गई। तब नानकशाहसे कबीर साहबने कहा कि, अब तुम जाओ और मेरे नामसे उस बछियासे दूध माँगो—और कमण्डलु उसके स्तनके नीचे रख दो। नानकशाहने बछियाके स्तनके नीचे कमण्डलु रखकर कबीर साहबके नामसे दूध माँगा और बछियाके स्तनसे आपसे आप इतना दूध निकला कि वह कमण्डलु भर गया। तब कबीर साहबने नानक साहबसे कहा कि, ऐ नानकजी! आपने वंदना तो बहुत की परन्तु अभीलों आपकी कगाईमें बुटि है। और आपका पंथ चलेगा और बहुत लोग आपकी आज्ञामें चलेंगे और भविष्यतमें ये रंग ढँग होंगे। और नानकशाहसे कबीर साहबने बहुत कुछ कहा—और इसी ग्रन्थमें नानक शाहके विषयमें भविष्य वाणी है। और नानक धर्मका विवरण किया जो भविष्यतमें होनेवाला है। और इसी स्थानपर यह साखी है। “तिल घोंटतारे लगे” इत्यादि है और इसी स्थानपर यह है।

ऐसो दाता सत्य कबीर, सूखी नदी बहावे नीर । भूखेको खिलावै खीर, नंगेको पहनावे चीर ॥

( १८४० )

बोधसागर

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इत्यादि महाराजा श्रीरामचन्द्रजीको कबीर साहब ( मुनी- न्द्रजी ) ने योगशक्ति सब कछु सिखलाया और सीताके चुराये जानेके समय अत्यंत कठिना उपस्थित हुई और समुद्रोच्छ्वन करना अत्यंत कठिन था—तब रामचन्द्रजीपर कबीर साहबकी दया हुई । और पत्थरोंपर सत्य नाम लिखा उसके कारण बहुतेरे पर्वत तथा पत्थर पैरने लगे । और पुल प्रस्तुत हो गया । और इसी साहबकी दयादृष्टिके कारण लंका पर विजय पाकर मंगलपूर्वक अपने घर पहुँचे । देखो ग्रन्थ ज्ञान संबोध तथा अन्यान्य ग्रंथोंमें ।

कबीर साहबका बाँसुरी बजाना

कृष्णचन्द्र बाँसुरी बजाते और गोपियोंका मन चुरा लिया करते थे जब कबीर साहबने बाँसुरी बजाया तब तीनों लोक मोह गये । और जड़ चैतन्य सभी मोहित हो गए । और यमुना नदीका जल स्थिर हो गया । और स्थावर जंगम सभीको आनन्द आया वह बाँसुरी ऐसी बजी कि, फिर कभी न बजी । लोगोंने जाना कि, कृष्णचन्द्रने बजाया था । गोप तथा गोपियोंकी बड़ी कामना थी कि, वैसी वंसी पुनः बजे, परन्तु वह फिर किस प्रकार बजे ? उस बाँसुरीके बजाने वाले तो कृष्ण नहीं थे उसके बजानेवाले तो कबीर साहब थे और इस बाँसुरीकी प्रशंसा हंस कबीर किया करते हैं, जिनको इसका ज्ञान है ।

गोरखको जीतना

जब प्रथम कबीर साहब और गोरखनाथका सामना हुआ और गोरखनाथ कबीर साहबकी श्रेष्ठता कीर्तिसे अन- भिन्न थे तब गोरखनाथने कबीर साहबसे कहा कि, आओ हम

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कबीर चरित्रबोध

( १८४१ )

तुम वादविवाद करें। उस समय गोरखनाथने अपना त्रिशूल गाड़ दिया और कहा कि, आओ कबीर साहब उस त्रिशूलकी एकशाखापर आप बैठो और एकपर मैं बैठता हूँ, तब वादविवाद करें। तब कबीर साहबने सूतके एक तारको अकाशकी ओर चलाया और शून्यमें उस सूतके ऊपर जा बैठे और कहा कि, नाथजी ! आओ हम और तुम इस सूतपर बैठकर वाद विवाद करेंगे, तुम्हारा त्रिशूल तो पृथ्वीसे लगा हुआ है कबीर साहबकी यह लीला देखकर गोरखनाथ दंग हो गये।

गोरखनाथजीने कबीर साहबसे कहा कि, मैं छिपता हूँ आप मुझको ढूँढ़ निकालो, तब गोरखनाथ मेंड़क होकर जलमें छिप रहे। तब कबीर साहब उस मेंड़कको पकड़ लाये और कहने लगे कि, अब किधर जाओगे ? तब गोरखनाथ पुनः अपने प्राकृतिक स्वरूपमें आयेगे ? तब कबीर साहबने कहा कि, अब मैं छिपता हूँ तुम ढूँढ़ लो। तब कबीर साहबने जलमें डुबकी मारी और जल होकर जलके साथ मिल गये और गोरखनाथ ढूँढ़ते २ थके और तीनों लोकमें ढूँढ़ते फिरे परन्तु कहीं पता नहीं लगा तब विश्वास हो बैठे। जब कबीर साहबने देखा कि, अब तो गोरखनाथ हारके बैठ गये तब कमण्डलुके जलमेंसे कबीर साहब प्रकट हो गये।

गोरखनाथने कबीर साहबके मारनेके निमित्त दो सर्प भेजे वे दोनों साँप कबीर साहबके पास आये और आपने उन दोनोंको अपने शरीरमें लगा लिया, जब बहुत विलंब हुआ और वे सर्प पलटकर नहीं गये तब स्वयं गोरखनाथ कबीर साहबके गृहपर पधारे और पुकारा कि, कबीर साहब ! बाहर आइये

( १८४२ )

बोधसागर

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तब कबीर साहबने भीतरसे उत्तर दिया कि, नाथजी मेरे गृह दो अतिथि आये हैं, मैं सेवा सत्कारमें लगा हुआ हूँ। तब गोरखनाथने जाना कि, कबीर साहब कैसे प्रतिष्ठित पुरुष हैं और आपमें कैसी क्षमा तथा संतोष है। प्रथम तो गोरखनाथने कबीर साहबसे बहुत वाद विवाद किया और बहुत कौतुक देखे जब भली प्रकार जान लिया कि, आप अद्वितीय हैं और मनुष्ययमात्रमें दूसरा ऐसा कोई नहीं और कबीर साहबने गोरखनाथका भली प्रकार संतोष किया और बहुत कुछ कहा और सब कौतुक दिखलाये और गोरखनाथको भलीप्रकार निश्चय कराया कि, कबीर साहब स्वयं अलख अविनाशी हैं तब सत्यगुरुके चरणोंपर गिरे और शिष्य होकर परम गतिको पहुंचे और योग युक्ति सबको व्यर्थ समझा।

सिद्ध बना देना

जब कबीर साहबने कमालीके मस्तकपर हाथ रक्खा तब उसका हृदय प्रकाशित हो गया और उसपर आरंभसे अन्त-पर्यंत समस्त समयोंका वृत्तान्त प्रकट होगया और उसकी जिह्वासे ज्ञानके फौन्वारे छूटे और सब वृत्तांतोंका विवरण करने लगे और जब कत्रसे बाहर आतेही उसका हृदय प्रकाशित हो गया तब वह यह शब्द बोली।

कमाली वचन शब्द

हंसा निकल गया मैं न लडीसी। पांच सहेली संग हैं मेली, पांचों मेंसे मैं अकेली खडीसी ॥ नौ दरवाजे बन्द करलीने, दशवीं मोरी खुली जो पडीसी ॥ न मैं बोली न मैं चाली, ओढ़े दोपट्टा किनारे खडीसी ॥ कहत कमाली कबीरकी बालकी, सादीसे मैं कुमारी भलीसी ॥

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कबीर चरित्रबोध

( १८४३ )

इसी प्रकार माई आमीन जो धर्मदास साहबकी स्त्री थी उसके शिरपर जो कबीर साहबने हाथ रक्खा उसकी जिह्वासे ज्ञान-सोता बहने लगा और सब वृत्तांत कहने लगी ।

आमीन बचन शब्द

साधो नाम सबनसे न्यारा लखि पुरन गुप्त विस्तारा । जानेगा कोइ जानगहारा ॥

जब नहीं अंशवंश निर्मायो, नहीं कछु किया पसारा । चर औ अचर चराचर नाहीं, नहीं मनको विस्तारा ॥ जब नहीं पुरुष नहीं तब ज्ञानी, यह मत सबसे न्यारा । जब नहीं पांच अमी निर्माया, नहीं सोहंग विस्तारा ॥ धर औ अधरधराधर नाहीं, नहीं पुरुषकी काया । तब नहीं पूरम नहीं जल रंगी, नहीं तब जलकी छाया ॥ धूप दीपलीला दहजा हैं, नहीं अदली औ तारा । करमन कहै सुनो धर्मदासा, यह मत सबसे न्यारा ॥ इसी प्रकार रानी इन्द्रमती राजा चन्द्रविजयकी जो रानी थी मंदोदरी राजा रावणकी स्त्री माणिकमती राजा वीरसिंहकी स्त्री । लीलावती पुरती राजा योगधरकी पचास स्त्रियां, राजा अमरसिंहकी रानी, मीराबाई राजा उदयपुरकी रानी, क्षेम श्रीगवालिन, और वह अनगिनत स्त्रियां जिनके माथेपर कबीर साहबने हाथ रक्खा वे सब परमधामको गयीं ।

कबीर साहबका उपदेश

तीन कालके जितने धर्मके अगुवा हैं और हुए, तथा होंगे उन सबसे कबीर साहबकी शिक्षा पृथक् है-इस शिक्षाका मुख्य अभिप्राय यही है कि, गर्भका आवागमन बंद हो जावे । इस आवागमनका बड़ाभारी दुःख है । जिस शिक्षा तथा धर्मसे

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बोधसागर

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बारम्बार जन्म और मृत्युका दुःख दूर हो वही मनुष्यका धर्म है। और उसी गुरु तथा शास्त्रको धारण करना मानुषिक बुद्धिका कर्तव्य है। जो कोई मनुष्य देह पाकर मुक्तिमार्ग न ढूँढे वह महा अभाग है। कारण यह कि, वह पुनः ऐसा समय न पावेगा और सदैव भवसागरमें डुबकियाँ खावेगा। योगमुक्ति तथा समस्त तंत्र मंत्र बंधनके प्रधान कारण हैं। यदि योग समाधिसे योगी अमर होता तो फिर कदापि कोई योगी न मरता। संन्यासी जो ब्रह्मके ध्यानमें रहते हैं सो ब्रह्म उनका भ्रम है सो संन्यासी भ्रमरूप होकर आवागमनमें पड़ा रहता है, सो ब्रह्म उनका भ्रम होकर भ्रममें फँसे रखते हैं। ब्रह्मा विष्णु शिव सनकादिक इत्यादि सब भ्रम नदीमें पड़े डुबकियाँ खारहे हैं इस भ्रमकी कोई सीमा नहीं है।

स्वयम् वेदके विना पढ़े किसीकी मुक्ति नहीं होती जो कोई ध्यानपूर्वक पढ़े और उसके विषयोंपर विचार करे और स्वसम्वेदकी आज्ञाओंपर भली भाँति दृढ़ हो और समस्त मिथ्या ओंसे पृथक् हो सो मनुष्य है और वही कालपुरुषके पक्षेसे छुटकारा पावेगा। कंजूस, व्यभिचारी पुरुषको स्वसम्वेद पढ़नेसे किसी प्रकारका लाभ नहीं है।

अपने गुरुके स्वयम् सत्य पुरुष करके जानना और गुरुके मुँहसे स्वयम् सत्यपुरुष खाता पीता है और गुरुके शरीरसे वस्त्रादि पहनता है जिसको गुरुकी बातपर विश्वास न होवे और जिसके मनमें घमंड हो तथा जिसके मनमें नव्रता न हो तो वह नरकमें जावेगा। सेवा सब पुण्योंसे बढ़ा चढ़ा पुण्य है। सेवाका कर्तव्य सबके ऊपर है जो गुरुकी सेवाका कर्तव्य पूर्ण करेगा उसका हृदय प्रकाशित होगा और उस गुरुकी ही

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कबीर चरित्रबोध

(१८४५)

मूर्तिसे पारख गुरु निकलकर उसकी समस्त कामनाओंको पूर्ण करेगा और कोई अपने गुरुके प्रतिका कर्तव्य न पालन करे और उससे अपने प्रतिका कर्तव्य पालन करावे और उसकी दी हुई वस्तुओंको मांगे तो वह चोर और ठग है। एक अवस्थामें गुरुकी सेवा न मांगी जावेगी जब कि, मनुष्य भली भांति डुबा रहे और दिनरात वंदनामें संलग्न हो जावे और किसी अन्य ओर ध्यान न हो और अपने शरीरकी चिता भी न हो तब गुरुसेवा क्षमा होगी और गुरु उसकी वंदनाका भागी होगा। जबलें ऐसी अवस्था न हो तबलें गुरुसेवासे यदि अपनेको न बचायेगा तो उसके मनमें तेज न चमकेगा, इस कारण समस्त जीवन गुरुकी सेवा तथा उसकी आज्ञामें रहना उचित है। कारण यह कि, गुरुके प्रतिका कर्तव्य कभी किसीसे पूर्णरितिसे निबह नहीं सकता। केवल एक नामके प्रतिफलमें तीनों लोकोंमें कोई वस्तु नहीं हैं जो दी जावे। गुरु ही धर्मकी जड़ है और जड़के सींचनेसे डाल पात सब हरे होते हैं और निश्चयके वृक्षमें सब फल फूल लगते हैं।

कंजूसकी मुक्ति कभी नहीं होती यह कंजूस बहुत बड़ा शैतान है यह जिसके मनमें प्रवेशित होता है वह जीवित श्मशानीभूत है। यह एक घृणा उत्पादक लत है और इससे स्वयम् परमेश्वरको घृणा होती है और समस्त पीर पैगम्बर तथा सिद्ध साधु इसको बुरा जानते हैं। किसी प्रकारकी वंदना तथा सेवा मनुष्य करे परन्तु एक कृपणता ऐसी वस्तु है जिससे वह सब विनाश हो जाती है। और कंजूससिद्धकी समस्त सिद्धि धूलमें मिल जाती है।

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बोधसागर

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साखी-कामी तो बहुतै तरे, क्रोधी तरे अनन्त । लोभी जिवडा ना तरे, कहैं कबीर सिधन्त ॥

साधुओंकी सेवा बहुत बड़ी पूजा है और भक्ति तथा मुक्तिकी देनेवाली है । और जो कोई साधुओंको भोजन इत्यादि देता है और उनकी आवश्यकताकी वस्तुओंको एकत्रित कर देता है उसकी समस्त कठिनाइयाँ और पाप दूर होते हैं और साधुओंकी कृपासे समस्त पदार्थ प्राप्त होते हैं और साधु समस्त युक्तियाँ बतलाते तथा समस्त अच्छे कार्योंको सिखलाते हैं और साधु नरकसे बचाते और वैकुण्ठको स्वीचकर ले जाते हैं और ज्ञान तथा मुक्तिकी समस्त युक्तियाँ समझाते हैं और समस्त भ्रम और धोखेको पृथक् कर देते हैं और साधु सत्यपदमें लगाते हैं और साधु समस्त संसारके पदार्थपर आज्ञा करते हैं । और साधु समस्त दुःख संतापका अपहरण करते और साधु समस्त पातकसे पृथक् हो जाते हैं और साधु तो अनेक हैं परंतु वह साधु जो समस्त भ्रम तथा धोखेको दूर कर दे और सत्यपदसे लगावे उस साधुसे विशेष प्रेम करना और उसीकी वंदना तथा सेवासे उसकी हार्दिक मना पूर्ण होगी । रोटी कपड़ा इत्यादि आवश्यकीय वस्तुओंका देना और मानसंभ्रम तो समस्त साधुओंका करना चाहिये परंतु विशेषतः वह साधु जो अपने स्वरूपमें मिलनेका भाग्य बतलावे वही साधुशिरोमणि है । साधुके विवरणसे बाहर है । साधुओंकी सेवा तथा आज्ञापालन सौभाग्यके लक्षण हैं, वे बड़े बड़ाभी हैं सो जो साधुओंकी संगत करते हैं साधुओंको भोजन देना बड़े पुण्यकारक कार्य हैं उसके समान अन्य कार्य जगत्में नहीं हैं । और साधुओंको वस्त्र देनेसे समस्त दुःख निवारण होते हैं । और जबतक साधुओंके शरीरपर

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कबीर चरित्रबोध

( १८४७ )

वस्त्र रहता है तबतक देनेवालेकी समस्त आपत्तियाँ उससे दूर रहती हैं। साधुकी सेवासे समस्त बंधनोंसे मुक्ति होती है। यदि साधुकी दया न हो तो कोई मनुष्य गतिको प्राप्त न होगा। साधुओंकी दयासे मनुष्य धर्म तथा संसारकी समस्त विद्या और बुद्धि प्राप्त करता है। कितनेक साधु ऐसे भी हैं जो सत्य पुरुषकी भक्तिसे भटकाते हैं और काल पुरुषकी भक्तिमें लगा देते हैं। सो उनकी शिक्षा और बातोंसे पहचान लेना चाहिये। ऐसा न हो कि, उनके धोकेमें आ जावें। वे साधु कालपुरुषके दूत हैं उनसे सावधान रहना और जिस साधुमें अपने गुरुका ज्ञान और उसकी शिक्षा देखना उसकी मर्यादा तथा सेवा अपने गुरुके समान करना और धोखा धड़ी देनेवाले साधु अपनी वार्तालापसे पहचाने जाते हैं।

सत्य पुरुषकी भक्तिके अतिरिक्त और समस्त भक्तियाँ जाल तथा बंधनमें डालनेवाली हैं। कालपुरुषका विष ब्रह्मा विष्णु और शिव सनकादिकसे लेकर समस्त जीवोंमें समाया हुआ है। बिना सत्यगुरुकी दयासे कोई सत्य पदमें लग नहीं सकता है, समस्त शरीर तथा नक्षत्रोंमें काल पुरुषका विष छिपा हुआ है। जिसको सत्यगुरु अपनी ओर दया करके खींचे वह आवे और दूसरेमें क्या सामर्थ्य है कि, यमके नीचेसे निकल सके धर्मरायके मंत्रने समस्त मनुष्योंकी बुद्धिको अंधी कर रक्खा है और किसीको इस विषयका ध्यान तथा सोच नहीं कि, मैं जान बूझकर क्यों कुएँमें पड़ता हूँ मेरे पुरुषा तो सब इसी धोकेमें पड़कर मरे, मैं इस अंधकारमय पथपर क्यों चलूँ। इनकी बुद्धि डुबकियाँ खारही है और सत्यको मिथ्या तथा मिथ्याको सत्य मान रही है। और छुटकारेको बंधन तथा बंधनको

( १८४८ )

बोधसागर

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छुटकारा मान रही है। इनकी बुद्धि तथा इनका चित्त ठिकाने नहीं है। इनकी बुद्धि तथा पाशविक बुद्धिमें मनुष्यताका लेश-मात्र नहीं है।

चार वेद तथा चार पुस्तकें ये आठों काल पुरुषके जाल हैं। इस जालमें फँसाकर उसने समस्त मनुष्योंको मार लिया और मनुष्योंको उसने ऐसा धोखा दिया कि, जितने नाम सत्य पुरुषके थे वे सब अपने नाम प्रकट किये। और सत्य पुरुषके धोखेमें समस्त मनुष्य कालपुरुषकी बंदनामें लगे और काल-पुरुषने सत्यपुरुषका नाम छिपाया और यह भेद ब्रह्मा विष्णु और शिवसे भी नहीं कहा इस धोखेसे समस्त मनुष्य इस शिकारीके शिकार हो गये। जो कोई चार वेद तथा चार पुस्तकों से पृथक् होगा उसको सूक्ष्म वेदकी ज्ञान प्राप्ति होगी। जिनका प्रेम पुरुषम वेदसे है वे स्वसम्वेदसे कैसे प्रेम कर सकते हैं।

विष्णुको तीनों लोकोंकी सरदारी तथा अधिकार मिला है उसीके अधीन सब हैं। निर्गुण निरञ्जन और सगुण विष्णु यही समस्त लोकोंके रचयिता तथा कर्ता धर्ता हैं, तीनों लोकोंमें विष्णु सम्यक् रूपसे उपस्थित रहते हैं। दोनों रूपसे निरंजन तीनों लोककी ठकुराई करता है।

तीनों लोक भवसागरका ठीकादार निरंजन है। और सत्रह असंख्य चौकड़ी युगका उसका ठीका है इतने समयपर्यन्त तो बिना पारख गुरुके कोई मुक्ति नहीं पावेगा। जब ठीकाकी यह सीमा बीत जायगी तब अक्षर पुरुषके राज्यका समय आवेगा। इस राज्यमें समस्त जीवोंके छुटकाराकी आशा होगी।

प्रथम स्वसम्वेद ब्रह्मसृष्टिमें था। जब कालपुरुषने भरमाया सृष्टिकी रचना की तब उसमेंकी निकृष्ट बातोंको निकालकर

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कबीर चरित्रबोध

( १८४९ )

पुरुषमवेद बनाया और इस पुरुषम वेदमें अपनी मत्यनुसार समस्त सृष्टिको उपदेश दिया और अज्ञानी लोग इस पुरुषम अर्थात् पराकृत वेदको अपने धर्मका मार्ग और मोक्षकी निसेनी समझने लगे । तब निरंजनने अपनी सन्तानको पृथ्वीपर भेजना आरंभ किया और सहस्रों ऋषि मुनि पीर पैगम्बर पृथ्वीपर आए । और काल पुरुष निर्गुण तथा सगुणकी भक्ति सिखलाते चले आए और इन ऋषी-श्वरोंमें सहस्रोंने अपना नवीन ढंग निकाला और वेदकी शिक्षाको अरुचिकर समझकर दूसरा पंथ बतलाया । वह भी काल पुरुषके फन्देमें फँस मरे और किसीने बिना पारख गुरुके सत्य लोकके पथको नहीं पाया ।

जो कोई किसी जीवका रक्तपान करेगा उसका प्रतिशोध अवश्य देना पड़ेगा । जो कोई किसीको दुःख देवे अथवा मांसाहारी हो वह भी निश्चय दुख पावेगा और अपना मांस उसको खिलावेगा किसीका प्रतिशोध कदापि नहीं छोड़ेगा ।

मांसाहारी तथा मद्यप कदापि मुक्ति नहीं पावेगा जो पुरुष मुक्तिके इच्छुक हैं उनको सम्यक् प्रकारसे स्वच्छ तथा पवित्र होना चाहिये ।

गृहस्थके निमित्त अपनी स्त्रीके अतिरिक्त समस्त दूसरी स्त्रियोंके साथ संभोग करना महापापकी गणनामें है और साधुके निमित्त विवाहिता अथवा विनविवाही दोनोंसे संभोग निषेध है ।

गुरुकी आज्ञोच्छेदनके समान मनुष्यके निमित्त और कोई महापाप नहीं है ।

सत्यगुरुकी शरण सब जीवोंके निमित्त सुखदायी है । उसीकी शरणमें समस्त पातक क्षमा हो जावेंगे । इस कलियुगमें गुरुके

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बोधसागर

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प्रतिका कर्तव्य कौन पूर्ण कर सकता है । परन्तु सत्यपुरुषको अपने शरणकी लज्जा है उसकी शरण आकर धर्मपर स्थिर रहो । जो धर्मविमुख हुवा वह निर्दयी तथा घातक शैतानके जालमें फँसा । सत्यगुरुके शरणपर पूर्णतया निर्भर रहना और यह समझे कि, सत्यगुरु मेरे अपराधोंको क्षमा करेगा मेरी और नहीं वरन् अपनी दयाकी ओर दृष्टिपात करेगा कारण यह कि उसका नाम पतितपावन है ।

घमंडी तथा द्वेषीको सत्यपुरुषकी भक्ति कदापि नहीं प्राप्त होगी जो मनुष्य बड़ाई और उग्र श्रेणी पाकर नम्र हो गए तथा अपना शीश नवा दिया और धन पाकर दान तथा साधु सेवाको ग्रहण किया, उनके निमित्त भक्ति और मुक्तिका द्वार खोला जावेगा । वह मनुष्य जिसने ऐसा ध्यान किया कि, मैं तुच्छ सेवक हूँ और जितनी मूर्तियाँ हैं, सब मेरे अधीन और सत्य गुरु हैं । और सब जीवोंमें उसकी कान्ति जाने तो मुक्तिका अधिकारी है ।

मैं अपने कार्योंका अधिकारी नहीं वरन् सत्यगुरुसे सहायता माँगते रहना कि, वह मेरी मनकामना पूर्ण करें और भले कार्योंमें सदैव उद्योग करते रहना ।

मैं नहीं जानता कि, मैं क्या हूँ और मेरा परमेश्वर क्या है, इस कारण सत्यगुरुपर पूर्णतया निर्भर रहना कि, जब वह मुझको दृष्टिप्रदान करेगा तब मैं जानूँगा ।

कालपुरुषके जितने धर्म पृथ्वीपर प्रचलित हैं, सबमें वैष्णव धर्म श्रेष्ठ—और सबका सरदार है । यह सतोषुणी धर्म है । इस धर्मके नियम तथा इसकी आज्ञाएँ सत्यपथकी सीढ़ी हैं और सत्यपथ परम धामकी सोपान है ।

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कबीर चरित्रवोध

( १८५१ )

सत्यगुरु कबीरका नाम बंदीछोर है । और वह सर्वाधिकारी है जिसको चाहे मुक्ति प्रदान करै, जिसको इस बातका पूर्णतया विश्वास हो गया उसका बेड़ा पार हुआ ।

सत्यपुरुष और कबीर साहबको जिसने एक जाना उसका बंधन टूट गया और कालके पक्षेसे छूट गया । तन मन धन गुरुके अर्पण करना तो भलाईका निचोड़ है, परन्तु अपनी कमाईसे दशवाँ भाग देना गुरुका हक है । बुद्धिमान् पुरुषही मुक्तिका भागी होता है ।

जो कोई मनुष्यताकी श्रेणी प्राप्त करने योग्य है, उसीमें बुद्धि होती है । पशु सुन्दर मनुष्य हैं-उनमें बुद्धि नहीं होती है ।

पारख गुरु प्रत्येक स्थानोंपर उपस्थित है, परन्तु जबल्लों उसके पथमें अपनेको मैं न्योछावर न कहूँ तबल्लों उसका दर्शन न होगा ।

सब झूठे झूठोंके साथ मिलते हैं-जो कोई सत्यका प्रेमी होगा वह झूठेके साथ कभी योग नहीं देगा ।

यह तीनों लोक विषवृक्षका फल है । और प्रत्येक वस्तु प्रत्येक खाना तथा मकानमें विष भरा हुआ है बिना सत्यगुरुकी भक्तिसे वह विषयोंसे बहिर्गत नहीं होगा और न किसी अन्य युक्तिसे पृथक् हो सकता है ।

जान बूझकर विष खाना मनुष्यताके विरुद्ध है । आप सत्य पुरुषकी भक्ति करना और दूसरोंसे करवाना और करते देखकर प्रसन्न होना-वंदना है ।

प्रत्येक मनुष्य बिना जाने बूझे अपने २ धर्मकी ओर खींचता और द्वेष करता है । परन्तु मनुष्य वह है कि, जो द्वेषरहित होकर वह धर्म हूँदे जिससे उसके आवागमनका मार्ग एकबारगी ही बंद हो जावे ।

( १८५२ )

बोधसागर

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मनुष्यके चार चक्षु हैं परन्तु पशु चारों चक्षुसे अंधे हैं, यद्यपि उनकी आँखें प्रत्यक्षमें खुली हुई हैं, तो भी वे अन्धे माने जाते हैं। इस कारण कि वे देखकर भी घातक मार्गसे नहीं टलते। इस कारण वस्तुतः वे पशु मनुष्यके स्वरूपमें हैं।

पशुओंकी मानवी शिक्षा रुचिकर नहीं होती—जैसे चोर, डाकू, व्यभिचारी इत्यादि सत्संग तथा सत्य पथसे भागता है।

सत्यपुरुषके जो अंकुरी जीव हैं वे सत्यगुरुकी शिक्षा सुनकर ऐसे दौड़कर मिलते हैं—जैसे लोहेसे चुम्बक चिपट जाता है। और जो काल पुरुषके जीव हैं उनपर सत्यपथकी शिक्षाका कुछ प्रभाव नहीं पड़ता है।

दान, वीरता, न्याय और धर्म इन चारों गुणोंकी शिक्षा सब लोग करते हैं, परंतु सत्यगुरुके साथ नहीं करते, इस कारण उनकी कामना पूर्ण नहीं होती।

यह कलियुग अत्यन्त कठिन समय है। इसमें पापीकी ओर तो तुरत मनुष्योंकी रुचि होती है और पुण्यसे दूर भागती है, ऐसी अवस्थामें सत्यगुरुके शरणके अतिरिक्त और कोई दूसरा उपाय नहीं है।

हलाकके भोजनसे हृदयकी स्वच्छता होती है।

जो कोई न्यायी बादशाहके सामने पाप करेगा और अत्याचारपर बद्धपरिकर होगा तो उसका सत्यानाश होगा। ऐसेही जो कोई कबीरपंथमें प्रवेशित होकर पापकी ओर चित्त लगावेगा, तो उसकी दशा बड़ीही दीन होगी।

जिसको अपने गुरुपर सच्ची श्रद्धा है उसकी बुद्धिपर पिशाची बल काम नहीं करता है। उसकी बुद्धि बदल नहीं

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कबीर चरित्रबोध

( १८५३ )

सकती है और न काल किसी प्रकारकी बाधा उपस्थित कर सकता है ।

जो कोई अपने गुरुसे सच्ची प्रीति करेगा उसका विश्वास अचल रहेगा और उसकी बुद्धि स्वच्छ रहेगी । विना गुरुके मनुष्यके हाथका जलपान पर्यंत उचित नहीं है ।

कबीर साहबका रेखाता

खलक है रैनका सपना । समझ दिल कोई नहीं अपना ॥ कहीं है लोभकी धारा । बहा जग जात है सारा ॥ घड़ा ज्यों नीरका फूटा । पतर जैसे डारसे दूटा ॥ ऐसी निर्जान जिदगानी । अजौं क्यों न चेत अभिमानी ॥ सजन परवार सुतदारा । सभी उस रोज हों न्यारा ॥ निकल जब प्राण जावेंगे । कोई नहीं काम आवेंगे ॥ निरख मतभूल तन गोरा । जगतमें जीवना थोरा ॥ तजो मद लोभ चतुराई । रहो निस्संग जगमाहीं ॥ सदा जिन जान यह देही । लगाओ सतनामसे नेही ॥ कटे यम कालकी फाँसी । कहें कबीर अविनाशी ॥

यथा

साँई यादमें रहना, नहीं यह जिन्द जावेगा । करो उस पीरकी बन्दगी, तुझे यारां लखाऊंगा ॥ बना है खाकका खेला, इसीमें खोज पावेगा । मुझे मुर्शिद मेहर मनशाल, गो दीदार पाया है ॥ मुझीको देखले परकट, किसी से न छिपाया है । कबीरा पीर है साचा, सकलमें आप छाया है ॥

यथा

समझ दिलसोच अबकीना । मुर्शिदसे पूछ नालीना ॥

(१८५४)

बोधसागर

७०

कहाँसे रंग यह आया । न काहूँ मोहिं बतलाया ॥ सुरति बहि रंगकी प्यारी । पपरा भये हैं वनवासी ॥ न आवे हाथ वह करनी । सिधारो जाय गुरु शरनी ॥ मुझे मुर्शिद मेहर करके । मुरीदी मन सिखाया है ॥ किताबें खोल दिल अन्दर । हकीकत निज बताया है ॥ कि है कोई गैबका वासी । दिखावे खेल परकासी ॥ बसावैं गैबका खोरा । मिटावे भर्मका फेरा ॥ अचम्भौ देश है न्यारा । लखे कोई नामका प्यारा ॥ दिया जिन प्रेमका प्याला । सोई हैं संत मतवाला ॥ कि निशिदिन मोह ना भूले । विरहकी झोंकमें झूले ॥ चरण कबीरको ध्यावे । इलाही ज्ञान भर पावे ॥

पद

हैली तीरथ जाय बुलाए । रे हरदम परब नहाये ॥ तीरथ कोटि अनन्त हैं रे गंग यमुन जहाँ दुई । मध्य सरस्वती बहत है रे नहाय निर्मल होवे ॥ ब्रह्म अग्निके घाटमें रे आगे शिवके लिंग । ताहुपे दछिना दीजिये रे बहुत सहसमुख गंग ॥ आगे कलालीकी हाट है रे चोखा फूल चुनन्त । बिन सदगुरु पावे नहीं रे कोई साधू जन पीवन्त ॥ शीश उतार धरणी धरे रे ऊपर धरले पाए । ब्रह्म अग्निके घाटपे रे इस विधिपर बेनहाए ॥ ऋग यजुर साम अर्थनवारे चारों वेदका ज्ञान । उनके वहां कहो कौन गति रे बांधे गांठ पखान ॥ चारों वेदको पिता है रे सूक्ष्म वेद संगीत । साहब कबीरजूके मुकद्दमेरे अविगतब्रह्म अतीत ॥

७१

कबीर चरित्रबोध

( १८५५ )

यथा

पण्डित सतपद भाजो रे भाई । जाते आवागमन नशाई ॥ ज्ञान न उपजा ब्रह्म नहीं चीना आप कहाँते आए । एक योनिसे चार बरन भए ब्रह्मदेह कहा पाए ॥ बारह वेदी ब्रह्म बखान् स्वर औ शक्ति समानी । संध्या तर्पन तहां करलीना जहां कुशा नहीं पानी ॥ ऋग यजुरज्ञानको बुद्धी साम अर्थवेन सोई । सूक्ष्म वेदको भेद न जाने कयोंकर ब्रह्मन होई ॥ शूद्र शरीर ब्रह्म तेहि भीतर भिन्न भेद कछु नाहीं । लखचौरासी जिया जन्तुमें बरत रहो सब ठाई ॥ नौगुण सूतसंयोग बखान् तिरगुण गाँठ दयानी । तासु जनेउ कबहुँ ना टूटे दिन दिन बारह वानी ॥ कहैं कबीर गुरुब्रह्म चीन्हले जगत जनेऊ सोई । पाखण्डकी गति सबही मिटावे तब निज ब्राह्मण होई ॥

यथा

हिरवा गँवाए सास चली वारी धनियां ।

कौन सौतिन है कौन सुमन है कौन वेद तुम जानियां ॥ कौन पुरुषको ध्यान धरत हो कौन है नाम निशानियां ॥ एही तनु ओंकार सुमन है सूक्ष्म वेद हम जानियां ॥ सत्य पुरुष तो ध्यान धरत हैं सत्य है नाम निशानियां ॥ यह मत जानो हिरवा जरवा बनियां दूकान बेगानिया ॥ अलख मूलक हिरवा मोरा अगम देशते अनियां ॥ एक है चोर सकल जगमोंसे राजा रैयत रनियां ॥ कहैं कबीर सुनो भाई साधो अलख है नाम निशानियां ॥

( १८५६ )

बोधसागर

७२

कबीरपन्थका प्राकट्य

जब कबीर साहबने अपना धर्म पृथ्वीपर प्रचलित किया और सत्य पुरुषकी भक्ति प्रकट की और सत्यलोका समाचार दिया तब किसीको निश्चय नहीं हुआ । और वेद तथा पुस्तकोंकी लिखावटोंको सत्य माना और चार प्रकारकी मुक्तिको मोक्षमार्ग जाना तथा कबीर साहब इन चारों प्रकारकी मुक्तिको बंधन और कालपुरुषका महाजाल बतलाते और लोगोंको वह पथ छोड़ना तथा इस पंथको ग्रहण करना दुष्कर हुआ, इस कारण सब आपके वैरी हो गये और आपके साथ ऐसा व्यवहार करने लगे इस कारण मैं उन स्थानोंको परिलक्षित किया चाहता हूँ जिनसे संसार नितांत ही अनभिन्न तथा अज्ञ है और केवल चार मुक्तिको सत्य मानते हैं जो वस्तुतः बंधन है । निम्नलिखित विवरणको देखो ।

दश सोहंगका वृत्तांत

कबीर साहबने ग्रन्थ मुहम्मदबोधमें जिन दश स्थानों का विवरण किया है वह यही दश सोहंग हैं । १-सत्यपुरुष सोहंग २-सहज सोहंग । ३-अंकुर सोहंग । ४-इच्छा सोहंग । ५-सोहंग सोहंग । ६-अचिन्त्य सोहंग । ७-अक्षर सोहंग । ८-निरञ्जन और माया सोहंग । ९-ब्रह्मा विष्णु और शिव सोहंग । १०-समस्त जीव सोहंग ।

यह दश सोहङ्ग हैं और समस्त संसार सोहङ्ग है । जिसका गुरु जहांकी सूचना देगा वह उसी स्थानको पहुँचेगा और समस्त जीवोंमें वह प्रवेशित हो रहा है और समस्त शरीरसे यही शब्द निकल रहा है और समस्तका निचोड़ तथा सिद्धांत यह है कि इसके ध्यानसे ज्ञान है और उससेही शान्ति है ।

७३

कबीर चरित्रबोध

( १८५७ )

जितने पृथ्वीके मनुष्य हैं सो सब इस विषयसे एकबार-गीही अनभिज्ञ हैं, उन लोगोंको केवल चार प्रकारकी मुक्तिकी सुध है और जितने अवतार पीर पैगम्बर पृथ्वीपर प्रकट हुए सो सब निर्गुण तथा सगुणका समाचार देते रहे । वेद तथा अन्यान्य पुस्तकोंमें इस बातका तनिक भी विवरण नहीं है कि, सत्यपुरुष कौन है । सब अचेत निद्रा तथा धोखेमें पड़े और कालपुरुषो अपना पथदर्शक और मुक्तिदाता समझने लगे और जितने पीर पैगम्बर हुए किसीने भी सत्यपुरुषका स्थान स्वप्नमें भी नहीं देखा और न जाना । सब निर्गुण तथा सगुणका समाचार देते चले आये । यदि उनसे कहा जावे कि, तुम भूलकर यमके फंदेमें न पड़ो तो उनको कदापि निश्चय नहीं होता । अनुग्रहीत होनेके स्थान वैर तथा विरोध करनेपर बद्धपरिकर हैं और कबीर साहबके धर्म प्रचलित करनेके समयसे आज पर्यंत कबीरपंथियोंके मतको सुनकर लोग अप्रसन्न होते हैं और तीर्थ व्रत मूर्तिपूजा आदिको भला समझते हैं और लोक तथा वेदकी आज्ञाओंको सर्वोत्तम समझते हैं और सत्य पुरुषकी भक्तिसे भागते हैं । कोई बड़ाभागी इस भक्तिमें लगता है इस भक्तिबिना किसीको पथ नहीं मिलेगा

कबीर साहबने दश स्थान प्रकट किये हैं उन दश स्थानोंके निमित्त इस प्रकारकी विद्याएँ कही हैं । १-शरीअत । २-तरी कत । ३-हकीकत । ४-मारफत । ५-तरोवहत । ६-ध्यान दोर हियत । ७ जुलकार चन्द्रगी । ८-हुकम सुरतिद । ९-दण-नाका । १०-शब्दसार ।

यह दश प्रकारकी विद्याएँ हैं । जिस किसीको जहाँका ज्ञान देता है उसी स्थानको पहुँचता है बिना विद्याके कोई