भारतकोश
संग्रह पर लौटें

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

१३५

जीवधर्मबोध

( २०४३ )

जिंदा वचन

नाम पुरुष नौका इहां भाई । खेवट संत गुरु संत मिलाई ॥ पुरुष शब्द सुमिरो लौ लाई । पुरुष प्रताप उतारि चल भाई ॥

नानक वचन

धन्य कबीर परम गुरु ज्ञानी । अमरभेद भाषी निज बानी ॥

साखी-तिलघोटत तारी लगी, दिलदरियाके तीर ।

नानककी संशय मिटी, जो सतगुरु मिले कबीर ॥

चौपाई

बहुरि अर्ब यूनानके ज्ञानी । पिंड अण्ड सम तूल बखानी ॥ जो सबही ब्रह्मांडमें देखो । पिंड केर सोई है लेखो ॥ अस्थि पहाड़ है मेघ पसीना । शिर नभ इंद्री कर्म प्रवीना ॥ सुर नर सुनि ग्रंथव अरु देवा । पिंड अण्डमें एकै भेवा ॥ सकल भांतिके पशु खग नाना । कर्म करंत बसै परधाना ॥ भोजन पावक पौरुष जोई । सोई रसोईदार कहोई ॥ जो बल अंतमें भोजन धरई । गन्धी नामक तासुको परई ॥ जो बल रुधिरको श्वेत बनावै । नारि कुचनमें दूध कहावै ॥ अण्डकोष नर बीरज धोवै । धोबी नाम तासुको होवै ॥ भोजन अंगमें बाटनहारा । नाम बंधानी तासु उचारा ॥ जल जो पसीना रूप निकारी । सो कहिये सक्का पनिहारी ॥ जो भोजन मल बाहर डारे । नाम हलाहलखोर सो धारे ॥ बात पित्त जो अन्तर गहई । सोई न्याय करंता कहई ॥ यह विधि सब पशुखगतनमाही । कोध स्वरूपी बीग सो आही ॥ अंड पिंडकी अकथ कहानी । मैं कछु सूक्ष्म लिखा प्रमानी ॥ दोहा-बूँद समाना सिंधुमें, यह जाने सब कोय । सिंधु समाना बूँदमें, जाने बिरला सोय ॥

( २०४४ )

बोधसागर

१३६

कुंडलिया

जाते बिरला सोय होय जब सतगुरु दाय। मैंहि मैं सब ठौर और सबही भ्रम छाया ॥ भ्रम छाया सब और दौर मन ज्ञान कि टट्टी। टट्टी जब टुटि जाय आय नहिं पुनि या हट्टी ॥

इति ब्रह्मांड पिंड

अथ सर्वदेशभाषाकी एकता

दोहा-जेते मानुष जत्कमें, हिंदू सबकी आदि। भाषा सारे जत्ककी, संस्कृत पितु है बादि ॥

चौपाई

संस्कृत कह सोधित जनको। सोई पिता सर्व भाषनको ॥ संस्कृतके जो गुण औगाहा। ताकी नहिं कोई पावे थाहा ॥ वेदकि संस्कृत जो आहीं। अबके पंडित ससुझत नाहीं ॥ एक सूत्रके अर्थ अपारा। कह सब निजु निजु मति अनुसारा। मर्म न जाने अर्थको सोई। यथा बुद्धि भाषे बुध लोई ॥ गूढ अर्थ जाने ब्रह्म-ज्ञानी। गुप्त वस्तु जेहि कछु न दुरानी ॥ संस्कृतको वर्ण बिचारो। और न कहुँ अस युक्ति निहारो ॥ प्रथम संस्कृतको वर्ण माला। और न कोई भाषामें भाला ॥ आदिके अक्षर बारह स्वरको। ब्रह्मस्वरूप जानिये तिनको ॥ अ आ इ ई उ ऊ ए ऐ ओ कह। औ अं अः रामरमित सब यह ॥ बारह ब्रह्म वसै ब्रह्मंड। कथै कौन सब गुणमय मंडा ॥ एक अकारते बारह स्वर हैं। व्यंजन सकलको परम पितर हैं ॥ सबके आदि है एक अकार। ताते वृद्ध भये पुनि बारा ॥ बारह रूप अकार सो बनेऊ। न्यारे न्यारे कारज ठनेऊ ॥ एक थूल यक सूक्ष्म रूपा। थूल प्रकट सूक्ष्म रह गूपा ॥ थूल अकार जो सूक्ष्म भैऊ। सो सब बरणनमें रमि गैऊ ॥ वासुदेव सब माहि बिहारी। कोई साधुजन सकै निहारी ॥

१३७

जीवधर्मबोध

( २०४५ )

निर्गुणते सरगुण जब भैऊ । ताहीको ककार जग कहेऊ ॥ जब अकार निज रूप गहाया । है ककार दशमें दरसाया ॥ पुत्र पौत्र सही तथा न कर । क ख ग घ ङ दशमें दर ॥ पञ्च ब्रह्म रह दशमें द्वारा । तिनके पुत्र अग्र पग धारा ॥ तालूपर सो कीन बसेरा । च छ ज झ ज सोई टेरा ॥ तिनते पुनि ट ठ ड ढ ण भैऊ । तालू अग्रवास तिन लैऊ ॥ त थ द ध न फिर आगे आये । दंतमूल सो बैठक पाये ॥ प फ ब भ म अधरनपै बैठारी । मुख कपाट सो दीन उचारी ॥ य र ल व श ष स ह क्ष त्र झ अगाहा । बाहरको कर चले उछाहा ॥ खोलि कपाट सो बाहर बिचरे । ब्रह्मवेत्ता बुध बानी उचरे ॥ संस्कृतके हैं अक्षर जोई । सबके पिता जानिये सोई ॥ बारह ब्रह्म सकल व्यंजनमें । धरि लघुरूप रमे सब तनमें ॥ जड़ चेतन सब माह बिहारी । जो चीन्है सो ब्रह्माचारी ॥ वासुदेव है आदि अकारा । सो रमिरहा सकल संसारा ॥ आदि ब्रह्म अकार कहाये । जहँ तहँ सोइ रहा जग छाये ॥ लखोन जाये अलख अविनाशी । सर्व खानिमें स्वतह प्रकाशी ॥ सोई अकार जो भयौ विकारी । रचनासरिसो जक्त पसारी ॥

दोहा-जब अकार ब्रह्मांडसे, भूत मंडलमें आये ।

दशमें दर परथान कर, सोई ककार कहलाये ॥

सो ककार काया रचे, जनक जगत करतार ।

तारण कारण जीवके, गुरु है सो तनधार ॥

चौपाई

अब दुतिये बिधि कहो बखानी । आदि संस्कृत जावे जानी ॥

सर्व वेदकी भाषा जोई । एक मिलान बखानो सोई ॥

सब यूनानके देवी देवा । हिंदूको पूजा अरु सेवा ॥

हिन्दू जाको श्रीकह गाये । सीरिज यूनानी बतलाये ॥

( २०४६ )

बोधसागर

१३८

इत जो देव गणेश बखानी । सो गम्मस रूमी यूनानी ॥ इंद्रको हिन्दू कह देव पितर । उत जु पितर कह लाववप्रधर ॥ हिन्दू अनपूर्णा कह भाषी । अनपूर्णा यूनानी साषी ॥ संस्कृतमें जो पित्र कहावै । सोई पारसी पितर बतावै ॥ अंग्रेजीमें फादर सोई । मातर मादर कहिये जोई ॥ आता प्रादर नाम कहीजै । कृतकार कृतगार भनीजै ॥ अंग्रेजी कृयटार कहावै । हिन्दू सो करताहि बतावै ॥ मिह संस्कृत सूरज भाषा । अरबी मिह नाम सोइ राखा ॥ अब्र संस्कृत बादल बोले । अब्र पारसीमें सोइ खोले ॥ पुत्र संस्कृत सुअन कहावै । अंग्रेजीमें सन बतलावै ॥ पृष्ठ पारसी पुस्त प्रमाना । नैन सो अबीऐन बखाना ॥ सृष्टि संस्कृत कीन बखाना । सो पारसी सरिस्त प्रमाना ॥ दुहिता संस्कृत बेटी होई । सो पारसी दुखतर कह सोई ॥ सो डाटर अंगरेजी माहीं । अस्व अस्य लो हार्स कहाहीं ॥ शब्द अनेक बकी यक ताई । बुधवन्तो सो लेहु मिलाई ॥ भाषा बहुत पढ़े जो कोई । बोलके मेल मिलावै सोई ॥ अब तृतिये दृष्टांत निरेखे । संस्कृत व्याकरण परेखे ॥ जो व्याकरण संस्कृत माहीं । ऐसो शुद्ध और कई नाहीं ॥ संस्कृतसे है अरबी बानी । मिश्री यूनानी अलेनानी ॥ संस्कृतसे सब गुण महि सारी । उक्ति युक्ति कछु भिन्नसवारी ॥ अब चौथे यह भाषो भेदा । सर्व शास्त्रके प्रथमहि वेदा ॥ चारो महा बाल है जोई । संस्कृतमें पुनि उजरी सोई ॥ पुनि पञ्चम अस कहो बखानी । ताते आदि संस्कृत जानी ॥ मुख्य नाम परमेश्वर केरा । संस्कृत की बोलीमें हेरा ॥ और बोलमें आवत नाहीं । संस्कृतमें शुद्ध गहाहीं ॥ अब छठये यहि विधिते सुनिये । ताते आदि संस्कृत गुणिये ॥

१३९

जीवधर्मबोध

( २०४७ )

सत्य कबीरके नाम जो चारो । चहुँयुगमें भिन्न भिन्न उचारो ॥ सत्य सुकृत सुनींद्र कहाये । करूनामय स्वामी बतलाये ॥ कलियुग माह कबीर उचारो । चारों युगके नाम हैं चारो ॥ नाम संस्कृतमें युग तीनी । कलियुग मिश्रीत करि दीनी ॥ अरबी संस्कृत मिश्रीत कबीरा । हिन्दू सुसलमान गुरु पीरा ॥ जेते और कबीरके नाऊ । सबही संस्कृत माह कहाऊ ॥ सतये स्वसंवेद कह येही । अज हरि हर मथुरा धर देही ॥ तीनों देव पिता सब नरके । तीन लोक ब्रह्मा हरि हरके ॥ ब्रह्म श्वासते वेद उपानी । उचरे तीन देव सुख बानी ॥ संस्कृत सुर बानी होई । ताते श्रेष्ठ और नहिं कोई ॥ इति देश

अथ ब्रह्मा और आदमकी एकता—चौपाई

ब्रह्मा आदम एकै अहई । सत्यकबीर बचन अस कहई ॥ ब्रह्मा सावित्री नर नारी । आदम होवा ताहि पुकारी ॥ ब्रह्माको काशीमें वासा । अदनवाग सो नाम प्रकाशा ॥ काशी सम कोइ पुरी न आना । देखो काशी खंड प्रमाना ॥ बन अनंद पथमें कहलाया । वाराणसी बहुरि बतलाया ॥ नाम तासु कहिये पुनि वासी । सब अनंद सब सुखकी रासी ॥ वाराणसी सो भयो बनारस । सुखसे सावित्री ब्रह्मावस ॥ आदिमें कहे जो वन आनंदा । अरबी अदनबाग सुखकंदा ॥ वन है बाग अरबकी भाषा । नाम अनंद अदवसों राखा ॥ उलटि आनंद अदन हो सोई । कहे अरब पारसके लोई ॥ संस्कृतकी बोली बहुतेरी । अरब लोग उलटा कहि टेरी ॥ वन अनंद बाग अदन जो भैऊ । वाराणसी बनारस कहेऊ ॥ अरब न संस्कृत सके उचारी । उलटा सुलटा सो करि डारी ॥ इति आदमब्रह्मा

( २०४८ )

बोधसागर

१४०

अथ मनुशतव्रता और नूहकी एकता-चौपाई

मनुशतव्रता नूहको जानी । पल्लय पयोध जो राख्यौ प्राणी ॥ नाव बहेतरा मनु नृपाला । रच्यौ बचावनजिव तेहिकाला ॥ ताही बहेत्रा सकल चढ़ाई । तेहि औसर जल परलय आई ॥ तब हरि लियौ मीन औतारा । दौय सींग निजु शीशमें धारा ॥ मीन रूप जो विष्णु बनाई । ताहि बहेत्रा शृंग लगाई ॥ भलिबिधि बांधे बहेत्रा ताही । निजु बलते गहि राख्यौ वाही ॥ नाव बाँधि हरि आन्हा दैऊ । मनुजाये तह आसन गहेऊ ॥ लीने सप्तऋषी निजु संगा । आठ जीव बैठे यहि ढंगा ॥ चहुँ दिश तबहि जलामय होई । भे संहार बचा नहिं कोई ॥ तरे बहेत्रा जलके माही । आठो जीव तहां बचि जाही ॥ प्रलैय कीन फिर सृष्टि बसाये । धर्म महम्मद अस बतलाये ॥ प्रलय पिछारी नूह पुकारा । प्रथमें नाम और कछु धारा ॥ आदिको नाम नूह ना होई । बदलि गयौ पीछे ते सोई ॥

इति मनुशतव्रत।

अथ महादेव और महम्मदकी एकता-चौपाई

श्रीमुख सत्यकबीर बखानी । महम्मद महादेव सो जानी ॥ महादेव क्षत्री रन वाके । सोह महम्मदकी है साके ॥ धर्म जासुको शस्त्र प्रहारा । सोई करे सृष्टि संहारा ॥ तमगुण आदिमें वेद बखाना । रुह महम्मद प्रथम उपाना ॥ तमगुण आदि सृष्टिको करता । भवसागर ताते थिर धरता ॥ भव है नाम महादेव केरा । ताते यह भवसागर टेरा ॥ भव भवानी द्वै रूप बनाया । भवसागर सरदारी पाया ॥ शिवके संग नारि द्वै जानी । शीश गंग कटि गौरि भवानी ॥ महम्मदमें मकार द्वै देखो । दोहू नारि तेहि संग विशेषो ॥ दोउ मकार महम्मद नामा । गंग गौरि बरणो वर बामा ॥

१४१

जीवधर्मबोध

( २०४९ )

आप भिखारी अनधन देही । महम्मद महादेव है येही ॥ धन अरु दर्ब चाकरन पाही । आप अलोनो साग जो खाही ॥ महा उदार महम्मद दाता । जत्तमाह सो शिव विख्याता ॥ योग भोग दोनों गुण भीजा । साबर मन्त्रो दोवा तवीजा ॥ योग युक्ति शिववर्त बताया । उत नमाजा रोज ठहराया ॥ ये ऊँकार शब्द गोहरावै । वे भोरे उठि बाग उठावै ॥ खड़ी एक नस महम्मद माथे । दंडाकार तिलक तेहि साथे ॥ प्रकट दोऊ भृकुटीके बीचे । मस्तक अंत प्रजंतलों खींचे ॥ जस कबीरमुनि तिलक कराही । सोई महम्मद मस्तक माही ॥ कोधवंत जब महम्मद बोले । तेहि औसर सोई नस डोले ॥ रोमधार यक उर बिच धारी । सोऊ दंडाकार सँवारी ॥ नाभिते कंठप्रजंतलो सोही । जन कबीर मुनि रूप है ओही ॥ शिवके संग रहे बहु देवी । तिमि बहु तारि महम्मद सेवी ॥ चीन्ह चक्र सब ताके साथ । आदिभक्ति सोई पशुनाथा ॥

इति श्रीमहादेव और भहम्मदकी एकता

अथ हनुमान और अलीकी एकता

छन्द—मूलना

हंक हनुमानते लंकमें शंकभ अलीके हंक गढ बंक टूटे । अली हनुमान दोऊ बांहके बली अरि अनी दलमली ज्यौ सनी कूटे ॥ १ ॥ शूद्र जेहि शत्रुगण वीर्य सामुद्रधन रुद्र शिव देखि दल दैत फूटे ॥ शूर संग्राममें गुणनके धाम दोऊ अली हनुमान गुणमाहँ जूटे ॥ २ ॥

इति हनुमान

अथ परशुराम और मूसाकी एकता—चौपाई

परशुराम मूसा यकताई । ऐसे दोहुको मेल मिलाई ॥

( २०५० )

बोधसागर

१४२

विप्र अवज्ञा कीनो हरिकी । क्रोधवन्त कमला तबसरकी ॥ विष्णुकि छाती चरण प्रहारा । सब दुःख द्रन्द्व घेर तिहि बारा ॥ रहे बेहाल काल बहु तेरे । तब प्रभु तिनिहि दयाद्वग हेरे ॥ परशुराम लीनों औतारा । ब्राह्मण कुलको पा ८नहारा ॥ विद्या बुद्धि तपोधन धारी । रूप शील बल वीरज भारी ॥ सो द्विजराज काज चित दीने । क्षत्री मारि निछत्तर कीने ॥ तथा यहूदिन विकल विचारा । तब मूसा लीनो औतारा ॥ सो फिर उनको मारि नसाया । इवरानिनको प्राण बचाया ॥ विद्या बुद्धि निपुण गुणखानी । बल वीरज शोभा सरसानी ॥ परशुराम कर फरसा जोटा । तैसे मूसाके कर सोटा ॥ जैसे ब्राह्मण तथा यहूदी । दोनों माह देखिये खूदी ॥ कुल अभिगान दोहुनमें भारी । अबिरहाम वंश तन धारी ॥ परशुराम मूसा यक सारा । दोनों विष्णु केर औतारा ॥

इति परशुराम और मूसा

अथ कृष्ण और कृष्णकी एकता—चौपाई

कृष्ण कैष्ट दोउ एक समाना । हरि औतार धरे नर बाना ॥ कैष्ट नाम ईसाको आही । अंग्रेजी बोलीके माही ॥ हिंदू कहे कृष्ण जगदीसा । ईसा इनके ईस हैं ईशा ॥ कृष्ण आगमन जबहि जनायौ । सो सुनि कंसराय भय पायौ ॥ इसा जन्म भव्य सुनि काना । तबहि रोद भूपति भय माना ॥ कृष्ण जोजन्म भयौ जेहि बारा । चहुँदिस फैल गयौ उजियारा ॥ कंसकी डर वसुदेव डेराये । मथुरासे गोकुलमें ल्याये ॥ यथा कृष्ण मथुराको त्यागे । तैसे ईसाको ले भागे ॥ गर्भसे जब ईसा प्रकटाने । चहुँदिश तबहि तेज चमकाने ॥ यूसुफ नृप हिरौद भय पाई । ले मसीहको मिश्र सिधार्ई ॥ कृष्ण जन्म सुनि कंस डेरायो । केते बालक मारि नशायो ॥

१४३

जीवधर्मबोध

( २०५१ )

ईसा भय हिरोद भूपाला । हने बहुत बालक तेहि काला ॥ रोग अनेकन कृष्ण घटाये । जीव केर दुःखद्वन्द्व हटाये ॥ मृतकहूको फेरि जिलाये । गुण अनेक कहलों बतलाये ॥ सा सबही गुण ईसा माहीं । देखि द्वैतदल दूर पराहीं ॥ इन असुरनको मारि नशाया । उन भूतन अरु प्रेत भजाया ॥ कुबरी कूबर कृष्ण सुधारा । तिमि ईसा कुबरी सुखसारा ॥ साठि हजार शिष्य संग लयऊ । दुर्वासा ऋषि आवत भयऊ ॥ चावल एक कृष्ण भंडारा । सबको तृप्त कीन तेहि वारा ॥ रोटी पांच मीन द्वै रहई । सो मसीह निज करमें गहई ॥ पांच हजार भीर नरदीसा । सबको पेट भन्यौ तेहि ईसा ॥ ज्वाला कठिन कृष्णकर घाटा । ईसा अंधकारको डाटा ॥ अर्जुन पर हरि कीनी दाय। तिहि निजरूप विराट देखाया ॥ तिमि ईसा शोभा सरसाई । निजशिष्यन निजरूप दिखाई ॥ कृष्णमें केते गुण सरसाई । तिमि कोइ गुण ईसा अधिकाई ॥ कृष्ण किष्ट दूनों यक रूपा । उभय भये भवसागर भूपा ॥ कृष्णमृत्यु जिमिप्रथम बताया । भील तीरते प्राण नसाया ॥ जगमें जगन्नाथ जग मगही । कृष्ण अस्थि हरिमेला लगही ॥ ईसा को तिमि क्रूस चढाये । जिये बहुरि निज पंथ चलाये ॥ इन गीता उत कथा इञ्जीला । दोनों विष्णु स्वरूप सुशीला ॥

इति श्रीकृष्ण और कृष्णकी एकता

अथ राजा और पण्डितकी एकता चौपाई

राजा पंडित एक समाना । जगमें श्रेष्ठ दोहूका जाना ॥ राज पाये इनके मद भारी । विद्या मद उनके अधिकारी ॥ ये बस करे सेन ले लोहा । अमृत वचन ते मेमन मोहा ॥ ये धन हरबे मनको हरते । हुकुम दोहूको जगमें बरते ॥ इन धन अरु दर्प घनेरा । उनके विद्या धन बहुतेरा ॥

( २०५२ )

बोधसागर

१४४

दिग विजयी दोनों तन धारी । विषयानंद अहै संसारी ॥ इनकी तृष्णा न धनते हटई । वह दिन दिन विद्यामें डटई ॥ धन विद्या बन माह भुलाने । ताते नहीं सतपदको जाने ॥ दोना जो विषयनको तजई । है निरद्वंद जो हरि पद भजई ॥ जत्कमें उत्तम देखो जैसे । भक्तमें श्रेष्ठ होहि सो तैसे ॥ विद्या भक्तिको अंग विचारी । तासु दृष्टि पांडितको भारी ॥ ताते बुध नृपते बड़ अहई । वेद प्रमान शास्त्र अस कहई ॥ विद्याधन सब धनन बड़ेरा । अंग सद्ग ताको नित हेरा ॥ राजकर्म पंडित आधीना । बिन पंडित हो महीप मलीना ॥

इति एकता

अथ भवसागर वर्णन

दोहा-भवसागर वर्षा न करो, सुनो सयाने सन्त । जामें गोता खात जिव, लहै न कोई अन्त ॥ सोरठा-भाँति भाँतिके जीव, चौरासी लख योनि जग । विलग विलग कर पीव, खानि-खानि बिलगायके ॥

चौपाई

यह भव उदधि अपार बखाना । गोता खाहि जीव विधि नाना ॥ चौरासी लख योनि भ्रमावै । बूढ़े उछले पार न पावै ॥ जेते जीव भवनधि तन धारी । मानुष देह मुक्ति अधिकारी ॥ सो मानुष तन दुर्लभ कैसे । जैन धर्म वर्णन कर ऐसे ॥ यह दृष्टांत सुनाये सोई । अस चौड़ा सागर जो होई ॥ कोटिन योजनकी चौड़ाई । भवनधि थूल कहा कहिजाई ॥ बैल केर जूवा गहि लीजै । जूवा डंडा अलग करीजै ॥ तेहि समुद्रके एक किनारे । जूवाको डंडा गहि डारे ॥ जूवा डारे दूजे छोरा । मारे वायूको झकझोरा ॥ बहुत फिरे डंडा अरु जूवा । बहै सदा इत उत सो हूवा ॥

१४५

जीवधर्मबोध

( २०५३ )

जो संयोग कबहु गह सोई । जूवा दंड यकठे होई ॥ आपै आप मिले जो आई । पैठे ताहि छिद्रमें जाई ॥ बिन सहाय जूवामें पैठे । पहिली ठौर ठेकाने बैठे ॥ ऐसी दुर्लभ मानुष देही । चौरासी भ्रम पावै येही ॥ धर्म महम्मद बहुरि बतावै । एक बार मानुष तन पावै ॥ सूसा ईसा मतमें सोई । फेर नहीं मानुष तन होई ॥ वेद करे पुनि ऐसे वर्णन । पुनि पुनि जीव लहै मानुष तन ॥ आठ लक्ष योनी भ्रमि आवै । पुनि गह जीव मनुष तन पावै ॥ सत्यकबीर जो बचन उचारा । अति दुर्लभ मानुष औतारा ॥ नरतनु पाये न भक्ति विचारा । सो पापी आतम हत्यारा ॥ सुरदुर्लभ यह मानुष देही । सो तन लहै भजु परम सनेही ॥ चार खानिके जीव अपारा । जो थावर जंगम तन धारा ॥ कोइ दीर्घ कोइ सूक्ष्म देखो । भारी थूल हरु लघु लेखो ॥ नाना वर्ण और गुणधारी । पूरि रहे भवसागर झारी ॥ युगन प्रजंत काहु थित गाई । अतिसै लघु आयू कोइ पाई ॥ स्वर्ग नर्क चौरासी लाखा । सो सब अंड पिंडकी साखा ॥ भवसागर त्रिदेव भे राजा । सब जिव तिनके देठ विराजा ॥ सोई सुर सुरपति शिरताजा । तिनके हाथ है काज अकाजा ॥ भवसागरमें द्वै तट जानो । एक लोक यक वेद बखानो ॥ वेद कूलपर मन आसीना । लोकछोर माया गहि लीना ॥ मध्यमें तीन देव गुणधारी । महा अपर्बल पाँच शिकारी ॥ भ्रमसागर कहिये भवसागर । दश दिश काल मचायौ झागर ॥ भव पुनि भगको नाम कहावै । तामें सब जिव आवै जावै ॥ भव शिव नाम भवानी पतिको । जीव लखै को ताकी गतिको ॥ तीनों लोक वसै भग माही । बिन गुरु कृपा न बाहर जाही ॥ कोटिन योग युक्ति जो करिये । भग मारग पुनि पुनि पग धरिये ॥

( २०५४ )

बोधसागर

१४६

चौरासी लख मीन बनाये । मन मछुवा सब तिनहि फसाये॥

सत्यकबीर वचन-शब्द

तन झौपडी मन बसै महरवा ।

नान्हेनान्हे डोभवन बीनै महजरवाडारि दिये नियक भरमसगरवा ।

गहिरैमें महरा पैठि न सकै विन बूड़े नहि मिलत सिकरवा ॥

यक ओर महरा यक ओर महरी मारि लिहे नियक मोहमछरवा ।

कहै कबीर सुनो भाई साधो ताकि लिहे नियक अमर सहरवा ॥

चौपाई

तीन देवमें विष्णु बड़ेरे । तिनको हुकुम फिरे चहुँ फेरे ॥

तीन लोक भवसागर माही । तीन देव तहाँ राज कराही ॥

तीन लोकको सूत्र बखानो । जामें सकल जीव भरमानो ॥

प्रथमहि विष्णु सर्व शिरमौरा । तासु हेठ सुरगण सब औरा ॥

दुतिये पौरी विद्याधर है । नहीं देवता नहिं सो नर है ॥

सुर नर माह जान यह सीढी । भाषो बहुरि तीसरी पीढी ॥

नर वानर यक लेखे कहिये । यक व्यौहार दोहमें लहिये ॥

दोनों बीच भेद अति थोरा । पशु अरु मानुषमें यह डोरा ॥

विन दुम नर कपि पूछ समेता । नर वानर यक गुण कह केता ॥

औरैंग औटैंग वानर जोई । नर आकार सर्व सो होई ॥

अंगरेजीके ग्रंथन माहीं । विना पूछ वानर यह आहीं ॥

दोनों पगते नर ज्यों चाले । दोनों हाथ काममें डाले ॥

वानर इतर जाति बहु तेरे । भिन्नभेद क्रम क्रमसे हेरे ॥

अंगरेजी अखबार बखाने । द्वै मानुष दुमदार लखाने ॥

हवशदेशको जंगल जहँवा । द्वै मानुष दुम युत रह तहँवा ॥

डेढ़ हाथकी पूछ सो गहई । मादमें पशु समान सो रहई ॥

एक जाति मानुषको आही । रहे हिमालय पर्वत माही ॥

ऐसो निकट छोड़ तनधारी । पंछिन संग मचावै रारी ॥

१४७

जीवधर्मबोध

( २०५५ )

चील्ह गीध गहि गगन उड़ाही । तेहि मानुषको धरि धरि खाही॥ तब सो नर गण जोरि सहाई । पंछिके संग करे लड़ाई ॥ ऐसे विविधि भांति नरजाती । तिनकी कथा न कथे सिराती ॥ नानारूप बरण गुणधारी । जहाँ तहाँ पृथ्वी माह विहारी ॥ चार लक्ष मानुषकी जाती । तिनकी कथा कथे बहु भांती ॥ जलमानुष थलमानुष देखो । वनमानुष आदिक बहु लेखो ॥ पशुमानुष कहु मिश्रित होई । अकथकथा कहि जात न कोई ॥ बहुरि कहो मानुष पशु ख्याला । सब परिवार जो करे उगाला ॥ भोजन पीछे पागुर करही । बिन उगाल तिनको दुःखधरही ॥ पशु नर नरपशु एक सो हेरी । देखहु कुदरत करता केरी ॥ छायारूपी नर कहु सरसै । चेष्टा दीख रूप नहिं दुरसै ॥ रचना विविधि भांति कहि गार्ई । ताको लेख लिखो नहिं गार्ई ॥ चौथो सूत्र बहुरि कहि गावो । जलचर मानुष मेल मिलावो ॥ रह समुद्रमें गर्गन मच्छी । अर्थ है मीन अर्थ तिय अच्छी ॥ कटिके ऊपर सुन्दर नारी । अर्थहेट मच्छी तनधारी ॥ कबहुके सागर तीर सुरखारी । कबहुके जलमें गोता मारी ॥ भुंगी ऋषि शिर सींग बताई । मुखमें सुण्ड गणेश गोसाई ॥ पंचम पौरी करो बखाना । पशुपंछीको मेल मिलाना ॥ चाम सुन्दरी वाको कहई । दोनों रंग ढंग गुण गहई ॥ सो नहिं खग अंडजकी जाती । चाम गूदरी है बहु भांती ॥ नहिं पशु नहिं खग मध्यम थापू । सुरगी एकसै परसे टापू ॥ वृद्ध नारि सो सुख है जाको । जब कोइ दुःख देत है वाको ॥ रुदन विलाप करे जस नारी । केते पशु खग नरगुण धारी ॥ दाडुर एक अमेरिका देश ! रुदन करे जब लहे कलेशा ॥ छठी पौरी बरणो सोई । जो चेतन रूप जड़ होई ॥

( २०५६ )

बोधसागर

१४८

लजवंयक पौधा चेतन । पशु पंछी सम चेत तासु तन ॥ जड़ चेतन गुण दोहू गहावै । पशु पौधाको मेल मिलावै ॥ सतई पौरीको अर्थावो । जो चेतन जड़ सम स्थिलावो ॥ पलपी तारा दोनों मछरी । सो सम चेतनते अति पछरी ॥ जड़ समान यक ठौर गहाई । हले न चले गहे थिरताई ॥ पलपी देह दाग बहुताई । जो कोइ ताको काटै जाई ॥ जैसे माली कलम लगावै । फूल बेलको काटि बनावै ॥ जेतनो टूक करें कोइ ताको । होहि पालपी सबही वाको ॥ जेतनी दाग रहे तब माही । सो सबही पलपी है जाही ॥ जड़ चेतन दोऊ ता ढंगा । जड़समान चेतनको अंगा ॥ अष्टम पौरी कहो बखानी । जड़मय योनि गोदजिव जानी ॥ नर नारकी लोक जिव पौरी । जड़सम सदा रहै एक ठौरी ॥ नर्कहेत नारकसो नाही । जैन मते दुख देखो नाही ॥ तीन लोकको सत जो भाषा । काया तरुकी पह सब साषा ॥ जैसो कर्म जीव जो कर्ता । तैसो तनधरि जगमें वर्ता ॥ सब जिव पुण्य पापकी आसा । पुनि पुनि कर योगिनमें वासा ॥ इति जीवधर्मबोध समाप्त

This image shows a blank, aged page with a light beige or cream color. The surface has a subtle texture and slight discoloration, characteristic of old paper. There are no markings, text, or illustrations on the page.

The emblem is centered on a red background. It consists of a golden teardrop-shaped frame containing the Devanagari word 'प्रेमी' (Premi). Below this frame is a golden ribbon or banner with the text 'खेमराज श्रीकृष्णदास' (Khemraj Shri Kunnadas) written in Devanagari script. The entire emblem is surrounded by a wide, ornate golden border with a repeating pattern of stylized floral and geometric motifs.

खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई.