कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
बोधसागर
( १११ )
साखी-कहै धर्मदास
तुमही करता आदि हो, जिन सब रचना कीन्ह । सत्य शब्द सार निर्मौलिके, सतगुरु साँचे दीन्ह ॥
कहै कबीर योग विधि बानी । जाते पुरुष सो हो पहिचानी ॥ प्रथम कमल कहूँ रे भाई । चारि पंखुरी तोहि बनाई ॥ सिद्ध पवन गनेस है सोई । छेसे जाप अखंडित होई ॥ दुतिय कमल नाभी तर होई । षष्ठ पंखुरी ताकर सोई ॥ ब्रह्मवास तेहि कमलमें होई । छे हजार जाप तहां सोई ॥ ६००० । २ तिसरे कमलकी आठ पंखुरी । लक्ष्मीनारायण मूर्ति तहां धरी ॥ छे हजार जप तहां प्रमाना । जो कोई साधू साधे प्राणा ॥ ६००० चौथे कमल शक्ति शिव रहिऊ ॥ षट सहस्र जप तहां कहिऊ ६००० ॥ बारा पँखुरी ताकर भाई । सोहैं तत्त्वमें ध्यान लगाई ॥ पांचे कमल अकाशको बासा । सोरा पँखुरी तहां निवासा ॥ अमी चन्द्र है ताकर नामा । सहस्र जाप ताको विश्रामा ॥ १००० ॥ तहांते कला अवतारकी आवै । चारि वेद ताके गुण गावै ॥ अबमें छठो कमल कहि भाखों । तीन पंखुरी ताकी पुनि राखों ॥ परमात्मा ताहि कमलमें रहई । एक सहस्र जाप तहँ करई ॥ १००० ॥ ६ सहस्र जाप दोए पँखुरी १००० षष्ठ ध्यान- तिहिभीतर धरी ॥ गम्य अगम्य अंश दो रहई । तीन देव तहँ लगि कहई ॥ आठेक मल दश पखुरी कहिये । अगिन वान ताके बल कहिये ॥ कामदहन ताको है नामा । जो लखेसो पावै विश्रामा प्रकाश
नामो कमलकी अविगत बानी । अन्त पाँखुरी ताकर प्रानी ॥ ता मैं पूर्ण ब्रह्म अखण्डा । निसवासर धरणी नहिँ चन्दा ॥ एक नाम सत्य है बानी । ताहि नाम सृष्टी उत्पानी ॥
( ११२ )
कबीरबानी
उनकी छाया सबको भाई । तौन छांह घटहि सब समाई ॥ दो सरूप आदि सहेदानी । दो सरूप काया बन्धानी ॥ तिसरा रूप रहित हैं आपै । भेद लखो तिहिगुरु प्रतापै ॥ तेहि प्रतिमा दोय हैं भाई । एक नारि एक पुरुष कहाई ॥ जिसका भेद कहो समुझाई । एक नाद एक बिंदु कहाई ॥ नाद सनेही सुरति हमारी । बिंदु सनेही शब्द बिचारी ॥ माया नारि सुरति है नादा । चार नाम है एक समादा ॥ नरमन शब्द और कहि बिंदा । चार नाम भये कहि बिंदा ॥ नरही नाम मनुष्य बिचारां । मन नाम काल अवतारां ॥ शब्द नाम सूर्यको दीन्हां । बिंदू नाम नीरको लीन्हां ॥ मेदी नाम इक्षीको चीन्हां । माया नाम भूतक जो कीन्हा ॥ सुरति नाम चन्द गहि दीन्हा । याहि सूरती मम करि लीन्हा ॥ रज्जु नाम श्वासाघट राज्यो । पुरुषहिं एक सुरतिको साज्यो ॥ शब्दको धातू जाही थापा । बनावन हारौ आपै आपा ॥
खुद होई कहैं कबीर
जहां तहां हमही है भाई । दुविधा छोड़े काल भगाई ॥ दुविधा काल बढ़ो अन्याई । तन छूटेते लेह धरि खाई ॥ पिंडका लेखा दीन्ह चिन्हाई । पिंड ब्रह्माण्ड लेहु अर्थाई ॥ अनंत पंखुरीका कमल है भाई । शुक्ल हंस तेहि माहि समाई ॥ आपै कमल उत्पत्ति पसारा । तेहिमें जीवकीन्ह विस्तारा ॥ दुसरो कमल सहज है स्थाना । तिन्हते सृष्टि भई बन्धाना ॥ तृतीय कमल इच्छा उत्पानी । चौथा मूल ले बोले बानी ॥ पांचये सुरति सोहंग बँधाना । आठ अंश तिनके परवाना ॥ छठो कमल आर्चन्यको बासा । निसवासर जहैं प्रेम विलासा ॥ ताते कमल अक्षर ठहराई । तिनकी तो अस्तुति वेदन गाई ॥
बोधसागर
( ११३ )
अठवें कमल कैल को वासा । नाम निरञ्जन तहाँ निवासा ॥ नौमे कमल तीन लोक बनाई । तीनि देव तहाँ रहे भुलाई ॥ पिंड ब्रह्मांडको लेखा सारा । ज्ञानी पंडित करौ विचारा ॥
साखी-कहै कबीर
पिंड ब्रह्माण्डको लेखा, हम दियो प्रकट बताय । कहै कबीर धर्मदाससों, तुम निर्भय लोक जाय ॥
धर्मदास वचन-चौपाई
धर्मदास पूछे चित लाई । सदगुरुसे उठि विनती लाई ॥ सांचे साहबकी बलिहारी । कैल पुरुषकी जुगति विहारी ॥ पन्थ विकट कोइ भेद न पावै । जो नहिं सदगुरु आप लखावै ॥ प्रपंची है कैल अपारा । मोसो चलै न पन्थ तुम्हारा ॥ कैसे कै गुरुवाई करहुँ । कैल पुरुषसो मैं बहु डरहुँ ॥ जम्बुद्वीप है यम को देशा । कैसे चलिहै मुक्ति उपदेशा ॥ चार वेदमें सब जीव राचै । कैल फांसते कोइ न बांचै ॥ हम सेवक हैं आज्ञाकारी । सोइ करों मोहिं लेहु उबारी ॥
साखी-कहैं धर्मदास
हमसो पन्थ चलै नहीं, काल अपरबल बीर । घाट बाट सब रोक है, जिय कस लागे तीर ॥
चौपाई-सदगुरु कबीर उवाच
धर्मदास तुम्हें सांच न आवा । अन्तर खोली मैं तुम्हे बुझावा ॥ का पुनि करिहै काल तुम्हारा । सिरपर समरथ है रखवारा ॥ मारहु कैल रसातल जाई । केती कै हमही निर्माई ॥ केतिक कैल भये मम आगे । केति सृष्टि उत्पत्ति प्रलै भागे ॥ सत्य वचन सुनिये चितलाई । कैल जुगति मैं देहुँ लखाई ॥ सत् चल्ला है सबते न्यारी । तीनहि लोक प्रपंच पसारी ॥
नं. ७ कबीर सागर - ५
( ११४ )
कबीरबानी
कैल सकल युग डारो खाई । एकौ जीव लोक नहिं जाई ॥ ताते समरथ मोहिं फरमाई । सांचै जीव आतु मुक्ताई ॥ कर्म काल है बहुत अपारा । तुमसों धर्मनि कहौं विचारा ॥ तीन सुरतिका खेल नियारा । भिन्न भिन्न तिनको विस्तारा ॥
चार प्रकारके ज्ञान
अचित अंश समरथको भाई । बारा पलंग राज तिन पाई ॥ ताते ब्रह्म सृष्टि भई भाई । ब्रह्म ज्ञाति नहीं उपजाई ॥ ब्रह्महि लरनि ब्रह्मकी वानी । एके मारग एक रहानी ॥ तिनको चिह्न चले संसारा । अक्षर अतीत नाम है सारा ॥ जो कोई येहि मारगको ध्यावे । अचित लोकमें जाय समावे ॥ प्रेम सुरति उहाँ मंगलचारा । तिनके सँग सखि बार हजारा ॥ अब अक्षरको कहूँ विचारा । अक्षर कीन्हा अविगतिविस्तारा ॥ जीव सृष्टिको कीन्ह पसारा । अनभै ज्ञान कीन्ह विस्तारा ॥ अनभै करनी अनभै बानी । अनभै चाल है अनभै रानी ॥ तिनके चार अंश हैं भाई । आठहि सुरति नहीं ठहराई ॥ नी पवन दोउ गहो निसानी । सुरतियोग अनहद सहिदानी ॥ यह प्रकार जो ध्यान लगावै । अक्षर लोकमें जाय समावै ॥ सुरति योग है महा हितकारी । बीस हजारतिन जीव उबारी ॥ तिसरे कैल निरञ्जन गई । तिन पुनि माया सृष्टि उपजाई ॥ माया सृष्टि है तीस हजार । त्वचा ज्ञानको कीन्ह विचारा ॥ तीर्थ व्रत जप तप है करनी । क्रिया कर्म आचार है रहनी ॥ इच्छा वाञ्छित जो करनी कही । सो फललेहि जन्म जब धरही ॥ जोगहि दान यज्ञ मन लावै । चारिहुँ वेद साखी ससुझावै ॥ कोउ राजा कोउ पंडित भाई । कोउ सिद्ध कोउ साध कहाई ॥ चार अंश चारों फल पाई । माया सृष्टिको धरधर खाई ॥
बोधसागर
( ११६ )
ताके संग सखी बारा हजार । तहाँ महंमद गये सुखसारा ॥ तेहि सुखको उन्ह लहे भाना । आगे ओहं सोहंके स्थाना ॥ चौथी सृष्टि त्रिगुण परकासा । जो उपज्यो अक्षरकी श्वासा ॥ तिनके ज्ञान क्षुद्र है भाई । जन्त्र मन्त्र औ वेद भनाई ॥ राग रँग पूजा चतुराई । अहंकार मद गर्भ भुलाई ॥ जीव भोजते करे अहारा । नौलाखजीव सँग तिनके धारा ॥ तैंहिके ज्ञान जग रहे समाई । घर घर आये कुल बरन दड़ाई ॥ कोई उग्र कोइ क्षुद्र कहावै । कोइ जीवकोइ नारियर खावै ॥ कोई रोगी औषध भावै । कोई देवी कोई देव कहावै ॥ कोई प्रेत होय बोले आई । इह विधि सकल जीव भरमाई ॥ त्री देवा गुण रूप निवासा । इन सब भेद कीन्ह परकासा ॥ पाहन पूजा तिन ठहराई । कई विष्णु तहैं शम्भु कहाई ॥ ब्रह्मा तहाँ वेद धुन करहीं । विष्णु रूप तहैं पूजा धरहीं ॥ शम्भु भये फलके अधिकारी । तीन देव यह युक्ति विचारी ॥ इहि प्रपंच पांच मुख बानी । तेहि प्रपंचमें जीव भुलानी ॥ शुक्लहि पांच काल सहेदानी । जाये ले देह नर्ककी खानी ॥ धर्मदास तुम विन राचौ । सत्य चाल उहिकैलसों बांचौ ॥
चारि सुरतिका लेखा
चार सुरतिका भेद निन्यारा । सो सब खोलि कहूं भण्डारा ॥ तिनकी सनद एक है भाई । तेहि सनद ले जाय लेवाई ॥ यह ज्ञान ताकी चारों बानी । पांचे समर्थक पांच प्रमानी ॥ चारों गुरु चारी हैं बानी । पांचे शब्द सुरति सहिदानी ॥ पांचों भेद हैं अगम अपारा । इह पांचों सर्वांग विचारा ॥ चार अंश चार अण्ड प्रमाना । एके सनद एक बन्धाना ॥ चारों गुरु है जगमें आवा । तिन भवसागर पंथ चलावा ॥
( ११६ )
कबीरबानी
चारों गुरुकी पेडी
प्रथम धर्मदास तुम्हैं भाई । वंश बयालिस है अधिकाई ॥ दुसरे सत्त्व बंकेजी राजा । सत्ताइस अंश तेहसंगबिराजा ॥ तिसरे गुरु चतुर्भुज हैं भाई । सोरा अंश तेहि संग समाई ॥ चौथे गुरु सहतेजी भाई । सात अंस मत तत्त्व बनाई ॥ चारहि गुरु मता अर्थावा । जीव सरूप है जगमें आवा ॥
चार बानी
चार बानि ले तुम्हें समुझावा । प्रथमहि कोटिज्ञान कहि आवा ॥ धर्मदास तुम करो विचारा । कोटिबान है ज्ञान पसारा ॥ दुसरे है टकसारकी बानी । रायबंके जैसे निरणय ठानी ॥ टकसार भेद चढ़ि हारी लेखा । जो पेखे सो सत्यलोकहि देखा ॥ नीर पवनको कीन्ह विवेका । तिसरे मूल ज्ञानका एका ॥ राय चतुर्भुज लीन्ह प्रमानी । चारों गुरु मुक्ति फलदानी ॥ चारि गुरु मुक्ति कडिहारा । बहु जीवनको करिहैं उबारा ॥ सारखी-कहे कबीर चारि बानि, खानी चार ज्ञान निधान । चारि पदारथ चारि वेद, चारि गुरु प्रमान ॥
धर्मदास उवाच
हम चारोंको गुरुकर थापै । पांचे अर्चित राजा है आपै ॥ तीन अंश वे कहाँ रहे छाई । तौन भेद गुरु कहो समुझाई ॥ तिन्हकी कला कहो गुरु सांचै । औ पुनि कौन खेलमें रांचै ॥ साखी-सत्य सत्य मोसो कहो, कछु ना राखै गोंय । सुर नर मुनि ऋषि सबही ठगे, रीते चले सब रोय ॥
चौपाई-सद्गुरु कबीर
धर्मदास घटभय उजियारा । ताते आगम्य मुर्ति विचारा ॥ आठ अंश सब जमा है भाई । चारि अंश सब ठाँव बनाई ॥ अविगति मोसन कहा न जाई । मैं जो कहों तुम धरौ समाई ॥
बोधसागर
( ११७ )
पाँचों सुत पाँचों अण्ड पाईं । दोईं अंश लै गुप्त बैठाईं ॥ अर्चित वृंद तब तिनहीं दियऊ । तिनको नाम अक्षर तिन ठयऊ ॥ पांच अंश नहीं पावत लेखा । और अंशको कहूँ विवेखा ॥ चार अंश अक्षर सेहेदानी । जिनते उपजी चारों खानी ॥ देखि अंश मोह तब आवा । दूसर अंश घट आय समावा ॥ त्रिगुण शक्ति घट गई समाईं । तब अक्षरको निद्रा आईं ॥ सोरा चौकड़ी सोये सिराईं । आठवो अंश जलमाँहि समाईं ॥ अंडजरूप जो जलमाँ दीन्ह। यह अविगति सब समरथ कीन्ह। अक्षर जग्यौ निद्रा गई भाई । देखि अंड व्याकुलता आईं ॥ तेहि अंडमें एक निशानी । सो अक्षर पाईं सहिदानी ॥ अक्षर दृष्टिसों अंड बिहराना । तिहिंते कैल भयो अभिमाना ॥ तिन्हके चार वेद भये बंशा । चौथे अंश कलानिधि तंसा ॥ मनमें अक्षर संख्या आईं । यह तो काल समर्थनिरमाईं ॥ तेहिंते शक्ति कीन्ह तिवाना । श्वाससुरति अन्तर बिलखाना ॥ आठों अंश घट रहे समाईं । स्वास संग घट बाहर आईं ॥ सोरा कला अष्टांगी अंगा । रूपकला वाही सब सुख संग। ॥ अक्षर कन्या दीन्ह पठाईं । तिनते तीन पुत्र भये भाईं ॥ अविगति गति काहु नहीं पावा । समरथ सत्य प्रपंच बनावा ॥
सारखी-कहे कबीर
इहविधि सब रचना करी, काहु न जाने भेद । जैसे है तैसे तब हती, अब कोकरै निखेद ॥
सारखी-अविगति निषेदकी-धर्मदास उवाच ।
धर्मदास बिनती अनुसारी । साहब बिनती सुनौ हमारी ॥ आठ अंशको भेद हम पावा । गति अवगति दूनों हम गावा ॥ चारि अंश एके मत ठाना । चारि अंश भिन्न भिन्न मत ठाना ॥
( ११८ )
कबीरबानी
तेहि कारण सबमोहि बतावहु । केहि कारण प्रपञ्च उर लावहु ॥
सारखी-चार सुरति सब मूल है, तुम समरथ परवान ।
तुमरे अंगते उपजि कहु, चारहुको अनुमान ॥
सारखी-बीजके कलसाकी-कीसा सतगुरु उवाच ।
धर्मदास मैं कहु न छिपाऊँ । तुमको सकलहि भेद बताऊँ ॥ प्रथमहि समरथ आप हते, दूसरो कोई न हुए । तब समरथके मुखते, सहजहि सुरति भये ॥ सोह सुरति स्वरूप धरि सहजहि बुन्ददयो । तेहिते सहजहि सुरतिका सहज अंकूर भयो ॥ तेहि अंकुरते सप्त करि भए ॥ दूसरे समर्थके अंशते क्षमास्वरूप सुरति भये ॥ तब स्वाती सरूप बूँद दियो जौन कारन सुनो ॥ जैसो सांचो तैसो स्वरूप जैसो घात तैसो अनूप ॥ एतो ठेका बँधे जब भयऊ इच्छासात । ७ ) अंड पांच ( २ ) चारी अंड एक सिद्धके ॥ ४ ॥ १ ॥ चारों स्वरूप भिन्न भिन्न हैं ॥ पांचो अण्ड प्रचण्ड भयो । दोउ करीमें अण्ड ना भयो ॥
ताहिकरीमें दो अंशहते । एक करीमें अक्षर हतो एक करीमें माया हती । एहि मता अवगति हतो । आगे तिसरी सुरतिको लेखासु- नो अविवगति सुरत अशून्य । तीसरी सुरतिका लेखा सो सुरति सखन उपजाई । तेहिको नाम मूल सुरति है ताह सुरतिको अंगल बूँद दीन्हाँ तेहि पांच ब्रह्म भये तिनको आज्ञा दर्ई एक एक ब्रह्म एक एक अंडन में आए, एते ब्रह्मते पांच अंश भये । तेही तत्त्वके घर भये । अण्ड फूटो पांच तत्त्व प्रगट भये । ६ । चौथी सुरती श्वासाते भये । ४ । तेहिको नामसोहं दियो । तेहिसोहंके ओहं बुद कन्हहाँ तेहिमें आठ अंस भये । सो एती रचना चारिकीरति कियो
बोधसागर
( ११९ )
प्रथम अंगते भए आगे सब निकास कई । सात इच्छा सातहीं अंश । अनइच्छाते आठों अंश भए । आठवाँ अंश भए । ते लोक भयो सर्व सृष्टिका संहार करे ।
बीजक सारकी साखी-कहैं कबीर ।
सात इच्छाके सात अंश भए, अपने अपने भाव ।
आठवा अंश विन इच्छा उपजै, ताको धर्म लखाव ॥
धर्मदास उवाच-एह धर्मदास ने पूछी ।
आहो साहेब काहेते समर्थ कहत हैं ? काहेते अचिन्त कहत हैं ॥ काहेते अक्षर कहत हैं ? काहेते जोगमाया कहत हैं ॥ काहेते कल कहत हैं ? इतना भेद कहो समुझाई ॥ भिन्न गुरु देह बताई । एहिकी शास्त्र गुरु कहैं ॥ सुनो धर्मदास तखतके धनी । तासो समर्थ कहत हैं ॥ तिनते आठ अंश भए । आठमें जेठ अचिन्त भये ॥ तिनके चिन्ता नाहीं । ताहिते अचिन्त कहाये ॥ तिनके प्रेम सुरति भई । तेहि प्रेममें अक्षर आनिसमानो ॥ तब मोह तत्व उपज्यो । तेहि मोहते चार अंश भए ॥ तेहिते चौरासी लक्ष्य जोनी भई । ८४००००० । तेहिते अक्षर ॥ कहाये । अब कैलकी हकी कत सुनो । तब अक्षरके मोहतत्त्व ॥ उपज्यो तेहि कारणते कैल भयो । मनसाते बुन्द पैदा कियो ॥ सो जहाँ अक्षर बैठो हतो । तहाँ जल तत्त्व हतो ॥ तेहि जलमें एक बुन्द आनिपडो । तेहि बुन्दते एते एक अंड भयो ॥ तब अक्षरने देखा उठिके । तब अण्ड लंगि आयो ॥ एक हकीकत लिखी हती । अंडके मुख ऊपर छाप हतो ॥ कहैं सृष्टिकी रचना करौ । और एक अंश हम पठायो है ॥ सो तुमते दूसरी करी है । सो तुम जिन पतियावो । जहाँ लंगि
( १२० )
कबीरबानी
आवै तहां लगि जिन रोको । आवने दीजो जिन काहु भेद ॥ बतावो । आगे सत्रासौ तीस हजारा युग कैल युगका प्रमाण है ॥ युग सो भुगति लेहे तेहि पीछे । हमारी आठै सुरती आई है ॥ तब हमारो महातम होई है । तब कालसों जीव छुड़ाई है ॥ तब कैलको महातम घटि जैहै । एती सनद अक्षर भेदकी ॥
साखी-कहैं कबीर
सात इच्छाके सात अंश भए, सातहि सुरति प्रकार । अन इच्छाते कैल भए, जीवको करै अहार ॥
चौपाई-धर्मदास उवाच
धर्मदास जिव शंका आई । उठि सदगुरुसों विनती लाई ॥ धन्य भाग्य मोहि मिले गुसाई । अपना करि मोहि लीन्ह मुक्ताई ॥ इच्छा सातके समरथ कर्ता । अत इच्छा वहां कहांते बरता ॥ सो निजु भेद बतावो मोही । इह सनद गुरु पूछौ तोही ॥ सात करी अंकुर बन्धाना । सात इच्छा तेहि माँहि समाना ॥ सात सुरतिमें थांका राखा । सात अंश तहां बोली भाखा ॥ आठवाँ अंश वह कहाते आवा । कौन भाँति वो अंश निमाँवा ॥
साखी-अविगति भेदकी धर्मदास पूछे ॥
अविगतिकी गति सब कहो, मैं बलिहारी जाऊँ । मेटि अँदेशा जीवका, पल पल परसो पाऊँ ॥
चौपाई-सदगुरु कबीर उवाच
कहैं कबीर सुनो धर्मदासा । वहिसमर्थ गति अजब तमासा ॥ इतना तत्त्व जिन पूछौ भाई । और सकल शब्द देहों बताई ॥ इच्छा सात शक्ति उत्पानी । स्वाति सनेह भए परमानी ॥ एक अंकुरते सब कछु कीन्हां । सब भण्डार तिहि माहे दीन्हां ॥ तिहि अंकुरकी सात भै करी । सात इच्छा तेहि माँहि लै धरी ॥
बोधसागर
( १२१ )
सेहजंकर तिह नाम कहाई । सात सुरैति तिहि मांहि रहाई॥ टेकाज्ञान कहतहों भाई । जेहि सुनि हंमा लोके जाई ॥ धर्मदास सुनिये चितलाई । यहि कलसा सब ज्ञानके भाई ॥ बीजक ज्ञान सब कहूँ निशानी । तेहिपर बीजक निश्चय ठानी ॥ सात करीके निर्णय सुनिहौ । बिना भेद तुम कछु न गुनिहौ ॥ भेदमें भेद हम राखौ गोई । सो पर सून्य लखो ना कोई ॥ इच्छा सीप स्वरूप उतपानी । सोवाती स्नेह भये परसानी ॥ बुंद एक आनंद स्वरूपी । इच्छा सात भये भिन्न स्वरूपी ॥ इच्छा सात रुचि अपने भाई । तेहि प्रमान बुंद तिन्ह पाई ॥ तेहिते पाँच अंड निर्माई । दोए करी तहाँ गुप्त छिपाई ॥ तेहिमें गुप्त अंश रहे वासा । प्रथम करीने बुंद निवासा ॥ तेज अण्ड तहाँ भयो प्रकाशा । तेहिमें सब है जीव निवासा ॥
इच्छाके नाम
मुख्य इच्छा तेहि इच्छाको नामा । आदि बुंद तिहि बुन्दको धामा ॥ दूसरी इच्छा नेत्र भरी हरे । सुकृत अण्ड भए तेहि केरे ॥ नेत्र इच्छाते नेत्र बुन्द पावा । तेहिमें सुकृत अंश निरमावा ॥ तिसरी इच्छा अविगत बानी । श्रवण इच्छामें आनि समानी ॥ श्रवन बुन्द अंश तिन्ह लीन्हा । अबोलनाम तेहि बुन्दको दीन्हा ॥ चौथे अण्डमें सत्य पसारा । चौथी इच्छा सो वास उच्चार ॥ स्वाती इच्छा तेहि करिको नामा । स्वाती बुन्द स्वाति सब धामा ॥ स्वतिते क्षमा अण्ड निरमाई । अण्ड पाँचमों कहुँ समुझाई ॥ पाँचही इच्छा निमिष ठेहेराई । करा एकमें जीवन पराई ॥ स्वाति प्रसन इच्छा उपजाई । जलहि अंड तहाँ उपज्यो भाई ॥ पाँच इच्छाके पाँच अण्ड निरमाई । दोये इच्छा वेही गुप्त रहाई ॥ छठि इच्छा है करता भाई । करति बुन्द तेहि मांहि समाई ॥
( १२२ )
कबीरबानी
सातें इच्छा सर्वत्र रहाई । सात बुन्द सब कला है भाई ॥ सातों इच्छा के करता अंकूला । सात करी सब दृष्टिको मूला ॥ तिनके सोरा अंश प्रमाना । एक वचनके सबही बंधाना ॥ आनंद बुन्द है सदा समीपा । तेहि अंकुरको भिन्न है दीपा ॥ एक सुरति एक अंकुर कहाई । तिहिको नाम सहजश्रुति भाई ॥ सात करी मो थाका बनाई । ताकी गतिमति काहु न पाई ॥ दो सुरति इच्छांकुर निर्माई । आठ इच्छा तेहि माँहि उपजाई ॥ सात इच्छा करि सात समानी । आठमी इच्छा काल उत्पानी ॥ तिसरी सुरति मूल प्रकाशा । मूलकीर्ति मूलअंकुर निवासा ॥ सुरतिमूल तिहि माँहि समानी । पांच ब्रह्म तहाँ भये उत्पानी ॥ सहजब्रह्मके पांचतत्त्व भये भाई । तरव सनेही सर्व उत्पन्न आई ॥ दुसरी इच्छा ब्रह्मको चीन्हा । सुकृत चिन्ह उत्पन्न कीन्हा ॥ तिसरो ब्रह्म मूल परवानी । मूल सुरति सब सृष्टि उत्पानी ॥ चौथे सोहं ब्रह्म कहावा । तेहि अण्डमों सर्व समावा ॥ पाँचों ब्रह्म जलाहल भयऊ । चौदह अंश गुप्त निर्मयऊ ॥ तीनि सुरतिकी एती रचना । चौथे सोहं कठे अमृत बचना ॥ सुरति अभयबुन्द तिन्ह पावा । तेहमें आठ अंस निरमावा ॥ चार गुप्त चार प्रगट पसारा । आपसहूपमिल आठों अमी अपारा ॥ तिनके भिन्न भिन्न परमाना । चार अंश भये सृष्टि बंधाना ॥ चार अंश भये मुक्त प्रमाना । तिन्हको भेद न काहु जाना ॥ अंशाहि अंश काहु नहीं देखा । शब्द स्वरूपी सबको पेखा ॥ तेहिके सनद अब कहां समुझाई । जेष्ठो अंश अचित्त है भाई ॥ तिनके प्रेम सुरति घट आई । तेहि प्रेममें मोह समाई ॥ तेहि मोहमें अक्षर उत्पानी । अक्षर जारि वेद सहेदानी ॥ अक्षर तेहि ते चारे भये दीपा । चार अंशने रहे समीपा ॥
बोधसागर
( १२३ )
चार अंश अक्षरते भयञ्ज । सर्वं सृष्टि भंडार ते ठयञ्ज ॥ प्रथम अंशते माया भयञ्ज । शुद्ध बीज पृथ्वी महँ ठयञ्ज ॥ दूसरे अदल अंश निर्माए । रसना सहस्र तिनते निरमाए ॥ तिसरे कुर्म भये अवतारा । जिनसर्वं पृथ्वीको लीनो भारा ॥ चौथे अंश भये धर्मराई । जिन्हें पाप पुण्यको लेखा पाई ॥ चार अंशको देखि भुलाना । तब अक्षर घटमाहिँ समाना ॥ तब समर्थ एक युक्ति बनाई । सातवाँ अंश तब आनि समाई ॥ तेहिंते निद्रा उपजी भाई । सत्तर निमिष युग गयो सिराई ॥ जब लगि निद्रा अक्षरकूँ आई । तब कछु दृश्य रहै ना भाई ॥ सब समर्थ मन शब्द उचारा । तेहिंमो कैल अण्ड भयो भारा ॥ तेहि अण्डमें उत्पति भूपा । नाम निरञ्जन ज्योति सरूपा ॥ तिनते तीन देव भए भाई । यहाँ सब लेहु लखि भाई ॥ सर्वं सृष्टि काल धरि खाई । काल देवको कोई न पाई ॥
साखी-टीकाका
सात सुरति तब मूल हैं, उत्पत्ति सकल पसार । अक्षरते सब सृष्टि भई, कालते भये तिछार ॥
चौपाई-धर्मदास उवाच
सांचे सदगुरुकी बलिहारी । धर्मदास विनती अनुसारी ॥ और भेद सर्व हम पावा । आठमी इच्छा कीन्ह निर्मावा ॥ केहि कारणते इच्छा कहाई । अनइच्छा किमि कारण आई ॥ किमिकारणस्वरूपजोकालबनाई । यहाँ अविगति गति कहो समुझाई साखी-सत्य पुरुष तुम आदि हो, बोलो शब्द रसाल । अन इछाको मर्म कहां, जेहिंते उपज्यो काल ॥
( १२४ )
कबीरबानी
चौपाई-सदगुरु उवाच
कहे कबीरसुनो धर्मदासा । सत्य शब्द है हमरे पास॥ जेहिते बुद्ध होय सो इच्छा कहावै । जेहिते नास्ति होय ऐसी अनइच्छा कहावै॥ इच्छा अंकुरकी तन इच्छा हमारी । ते गुणकाल अंश अवतारी॥ बिना कालजीव नहीं डराई । तेहि वर काल रचाहम भाई॥ इच्छामें दया अंश है भाई । अनइच्छा निर्दया कहाई ॥ जीवन सुक्ति कहौ समुझाई । वचन न माने ताहि काल धरिखाई ॥
साखी-कालअंश क्या जन करौ, ताते जीव कालको खेले । ऐसेका खेले समान है, ज्यों तिछीमें तेल ॥
चौपाई-धर्मदास वचन
धर्मदास बहुते सुख पावा । उठि सतगुरुसों बिनती लावा॥ उत्पति कारण हम सब देखा । पांजी भेदका कहौ विवेका ॥ पांजी सुरति गुरु देहो लखाई । जेहि मारग हंसा चलि आई ॥ नामप्रताप कहौ समुझाई । जेहिके बल हंसा घर जाई ॥
साखी-धर्मदास विनती करै, जिवरा भयो अनंद ।
आप अपुनको लखि परचो, जब कटे कालको फन्द॥
चौपाई-सतगुरु कहै पांजी भेद
सुनो धर्मदास पांजी भेद प्रकासा॥ जिनसे सुनै है हंस निशवासा॥ पांजी तीन आश है ओगाहा । जो कोई जीव पहुँचे वाँहा ॥ प्रथम पांजी आश है भाई । तहाँ अग्रशब्द चढ़िलोक जाई ॥ सात शून्य दश लोक प्रमाना । अंश जो लोक लोकको शाना॥ नौ स्थान दशमो घर साँचा । तेहि चढ़ि गए जीव सब बाँचा॥ सोरा असंख्यपर लागी तारा । तेहि चढ़ि हंस गए लोक दरबारा॥ दूसरी पांजी लोक कहै भाई । तेहि पांजी त्री देव रहाई ॥ अष्टम दीप बावीसमें अकाशा । तहाँ विष्णु चलिगए तेहि पास॥
बोधसागर
( १२६ )
तिसरी पांजीका भेद अपारा । तुमसो धर्मनि कहों विचारा ॥ पाताल पांजी है जीव उबारा । भजन प्रतापसों उधरे दूबारा ॥ वाचा बंधको द्वार बनावा । तेहि पांजी गुरु भेद बतावा ॥ पांच भेद पाताल विनाशी । ताते काल करै नहिं हाशी ॥ तेहि पांजी जलरंग गुसाई । चौदह मुनि है तिनके ठाई ॥ जलरंग पासको भेजदो पावै । लोकै जात बार नहिं लावै ॥ सोरा लोक सोरा दरवाजा । सोरा अंश तेहि माँहि बिराजा ॥ सोरा अंश चिह्न जो पावै । जाके सद्गुरुनिज भेद लखावै ॥
साखी-तीनि पांजीके निर्णय, तुमसों कहो समुझाय ।
सार शब्द जो पाए तो, छिनमें हंस घर जाय ॥
धर्मदास पूछे मंत्र जो शुद्धा
सत्य सत्य मुख दयाजो कीजै । अपनोके मोहि निज कर लीजै ॥ तुम समर्थ गुरु जत्त के कर्ता । सकल भेद जो निर्णय वार्ता ॥ हम चीन्हा तुम बरन छिपाए । बरन छिपाये तुम जगमां आए ॥ आए तुम समर्थ हो अंतर्जानी । सत्य कहौ हम निश्चय मानी ॥ जो अपना कर जानो मोहीं । तो अपना तत्व बताओ सोहीं ॥ अब तुम कहो कैसे जग आये । कैसे तुम जोलहा कहाये ॥
साखी-एहि सब कारन भाखिहो, सब संशय मिटिजाय ।
अपनो कै प्रतिपाल हो, हंस लियो मुकताय ॥
चौपाई-सतगुरु खुदा होय प्रकटे साखी-खुदबानीकी सतगुरु बचन बिहँसिके बोले । सत्य सत्य तुम अन्तर खोले ॥ तुमसो अंतर कछू न राखों । सकल भेदकी निर्णय भाखों ॥ कहत बचन प्रतीत न आवै । तजत देह जीव ठौर न पावै ॥ तुम युग बंध होए कोई सेवकाई । तेहि पीछे हम भेद लखाई ॥ धर्मदास करनी निज करिहो । सीस उतार निज आगे धरिहो ॥
( १२६ )
कबीरबानी
बातो साटे वस्तु जो आई । तौ एको जीव विनशि नाजाई॥ चौका करिहो लेहो प्रवाना । तब पुनि कहूँ आप बंधाना ॥ तब नहीं हते खंड ब्रह्मंडा । तब नहीं नदी अठारह गण्डा ॥ तब नहीं सात सुरत उतपानी । तब नहीं कीन्ह सकल सहिदानी॥ तब नहीं कहते अंश और बंसा । तब नहिं कालत्रिगुणको संशा ॥ तब नहिं पांच अण्ड निर्माण । तब नहिं लोकहिं दीप बनाए ॥ अविगतिकी गति काहु न पाई । आप बरन हम रहे छिपाई ॥ तब हम हते हैता नहिं कोई । हमरे मांहे रहे सब सोई ॥ इस पारस सब सुर्त वट दीन्हा । एक बुन्दते सब कछु कीन्हा ॥ नाम बड़ाई अंशको दीन्हा । शुक्ल प्रकार रची हम लीन्हा॥ चारि सुरति हम प्रगट पसारा । पाँचवीं सुरतिहम गुप्त विचारा॥ तुम जिन शंका मानो भाई । हमते करता दूसरे न आई ॥ बरन छिपाय हम जगमें आये । युगन युगन हम जीव मुक्ताये ॥ चारों युग हम पंथ चलावा । सात सुरति काहु भेद न पावा॥ अब हम कीन्हा प्रगट पसारा । सातों सुरती पाय टकसारा ॥ आठे सुरति सुकृत अवसारा । ताते तुमते ज्ञान पसारा ॥ नौतम तरति घरमें राखी । तिनके भेद हम कबहूँ न भाखी॥ तुम बोधन हम जगमें आये । जाते काल तुम्हें भरमाये ॥ तब हम लोकते दीन्ह पियाना । तुमकारनहमअक्षय अछिपाना॥
मारग भेद सदगुरु कहे
प्रथम सहज सुरति लगि आए । नौतम सुरति हम नाम धराये॥ उन्हसों कहयोहमसत्य संदेशा । सहज अंकुर मानो उपदेशा ॥
सहज पूछ
तब उन पूछा तुमको आज । सत्य वचन तुम कहों कहाऊ ॥
बोधसागर
( १२७ )
सद्गुरु कहैं
तब मैं कह्यो मोर नाम कबीर । मैं समर्थ श्रुति नौतम शरीर ॥ पौन प्रवाना तुम लेहो भाई । समरथ हुकम लेहो शिर नाई ॥ प्रथम चौका सहज दीपमें कीन्हा । सहज सुरतिका अंकपर लीन्हा ॥ तब हम चले इच्छा सुरतिलाए । सत्य शब्द उन्हहीं समुझाए ॥ तौन अंकपर जीव चढ़ावा । मूल सुरतिके दीप चलि आवा ॥ सत्य शब्द तहाँ बोले बानी । मूल सुरतिसों निर्णय ठानी ॥
मूलसुरति पूछै
कहो तुम अस कहाँते आए । के तुम समरथ बरण छिपाए ॥
सद्गुरु कहैं
नाहम समरथसमरथनिशानी । नौतम सुरति पुरुषकी बानी ॥ जीवकाज संसार पठावा । तुमकोसिखाबनपुरुषकोआवा ॥ लेहु पान तुम तजो बड़ाई । पान लेख गुरु होवै सहाई ॥ मूल सुरति का चौका कीन्हा । चले सोहंग दीप पग दीन्हा ॥ तहाँ शब्द बोले निर्वाना । सत्य सन्देशै पुरुष प्रमाना ॥ चौथे चौका सोहंको कीन्हा । सोहं सुरत अंकेपर लीन्हा ॥ चौका चारि अधरपर कीन्हा । चले अचित दीप पग दीन्हा ॥ अचित अंश है रूप उजागर । मानि दीपमणिके आगर ॥ कंचन चरण भूमि उजियारी । मणि आगर मणीन विस्तारी ॥ वहाँ सत्य हम बोले बानी । अंश अचित करो पहिचानी ॥
अचित पूछो
पूछै अचित कहाँ आये । कौन चितावर इहाँ सिधाये ॥
सद्गुरु कहैं
तब हम कह्यो समर्थ पठावा । जीवकाजवरइहाँहमचलिआवा ॥ तुमते समरथ कह्यो सन्देशा । ज्ञान गम्य अरुवच उपदेशा ॥
( १२८ )
कबीरबानी
कौल पान दीन होए लेहौ । तन मन चित समर्थकूँ देहौ ॥ तब अचित लीन्हा परवाना । सत्य शब्द हिरदे हित माना ॥ तब आए अक्षर अस्थाना । महा शून्य माहे होत ठिकाना ॥
अक्षर पूछै
तब अक्षर पूछै विहसाई । कौन अंश तुम कहाँ सिधार्द ॥
सद्गुरु कहैं
तब हम कह्यो मोहे समरथपठावा । जीवकाज इहाँ हम चलि आवा ॥ तुमते समरथ कह्यो संदेशा । ग्यानगम्य गुरु वचन उपदेशा ॥ कौल पान दीन होए लेहौ । तन मन चित समर्थकूँ देहौ ॥ तब अक्षर लीन्हा प्रमाना । सत्य शब्द हिरदे हित माना ॥
अक्षर पूछै
तब आए अक्षर अस्थाना । महाशून्यमाहे ताहि ठिकाना ॥ तब अक्षर पूछै विहसाई । कौन अंश तुम कहाँ सिधार्द ॥
सद्गुरु कहैं
तब हम कही कहाँते आए । जिन एहि सब उत्पानि रचाये ॥ जिन इच्छापर मृष्टिरचि दीन्हा । छाप वचन कौल जिन्ह कीन्हा ॥
अक्षर उवाच
तब अक्षर घट कीन्ह विचारा । तुमतौ आपै सिरजन हारा ॥ इतना भेद हमीं पुनि जान्हा । सोइ निज भेद तुम कहेउ बखाना ॥ सोई छापकी कहाँ निशानी । तब हम जाने सत्तकी बानी ॥
सद्गुरु उवाच
सुनो अक्षर मैं कहूँ समुझाई । वस्तु सिखापन तुमको आई ॥ प्रथममें सृष्टि रचौ फुरमाई । दुसरे कालको लीन्ह बचाई ॥ तिसरे बचन दर्शनको कीन्हा । इतना वचन समर्थ तुम्हें दीन्हा ॥
बोधसागर
( १२९ )
अक्षर उवाच
तब अक्षर दोनों कर जोरी । तुम निश्चय जीवन बंध छोरी ॥ एक वचन मैं पूछो अर्थाई । तुम समर्थको अंश हो भाई ॥
सद्गुरु उवाच
तब अक्षरते कहो ससुझाई । कौल तुम्हारे देन हम आई ॥ तब दिलदया जीवनकी आई । वरणबोधकर छिपि जग आई ॥ समर्थस्वरूपसवजग शिर जाए । गुरुसरूप मुक्ता बनि आए ॥ बचन गहे सो उतरे पारा । बिना वचन डूबै संसारा ॥
अक्षर विनती करै
तब अक्षर निज विनती ठानी । समरथ देहो पान परवानी ॥ हम चीन्हा तुम पुरुषपुराना । जब आए तुम एहि ठिकाना ॥
सद्गुरु कहें
तब अक्षरका चौका कीन्हा । अक्षर सुरत अंकपर लीन्हा ॥ तब चलि दीप झंझरी आए । सत्य शब्द तहाँ बोल सुनाये ॥ गरजै झंझरी पग धरत न जाई । कैल पुरुष बैठो तिहिं ठाई ॥ दोह पालँग सुन्य है अंधारा । चारि कोटि ज्योति उजियारा ॥ झंझरी दीप हम गए मझारी । गर्भित कैल नहीं बिदै बिचारी ॥
निर्जर कहें
को तुम अज धरहोवरियारा । क्यों हम झंझरीमहँ पगधारा ॥ कौन हो अंश कहाँते आए । अपुनो नाम कहो ससुझाये ॥
सद्गुरु कहें
तब हम कही सुनोतुम बानी । योग जीत नाम मोर ज्ञानी ॥ समरथ मांग जीव मुक्तार्ई । तेहि कारण आए तुम्हरे ठाई ॥ इतना कहत कैल दुख पावा । कोधवंत होइ सन्मुख धावा ॥
( १३० )
कबीरबानी
कैल अनन्त भेष धरि लीन्हा । हम सन्मुख बहुयुद्धते कीन्हा ॥ गजसरूप होइ सन्मुख धावा । गही दंत चहुँ बाजु फिरावा ॥ तट फटकार लै पड़े सुंड डारा । भागे कैल तब पैठ पताला ॥ गयो पताल जहाँ कूर्म अवतारा । तब हम चाल तहाँ पग धारा ॥
कैल कहे
विनती करै कूर्म सों जाई । राखो कूर्म मैं तुम शरणाई ॥
कूर्म कहें
तबै कूर्म उठि विनती लाई । को तुम्ह आहु कहाँते आई ॥
सद्गुरु कहें
तब हम कह्यो नाम मोरा ज्ञानी । योग जीत हम अंश प्रमानी ॥ समरथ हुकम जीव उबरण आये । काल फांसते जीव सुत्ताये ॥ झँझरीमाहैं बहुयुद्ध हमसों कीन्हा । भागिके शरण तुम्हारी लीन्हा ॥ जो सिखवन समरथका लेहो । तो कैल हमार आगेकरि देहो ॥
कैल कहे
तबही कैल पुनिसन्मुख आये । आइ ज्ञानी सों वचन सुनाये ॥ सुनो ज्ञानी मोर वचन कोलेखा । अपने हृदय तुम करौ विवेका ॥ समरथ वचन दीन्ह मोहे हारी । मैं पायो लोक संसारी ॥ तबकी बात रहित भइ भाई । अब कसउटी अदल चलाई ॥ सबै अंश भुगते मध्यानी । हम पर कोप भये तुम ज्ञानी ॥ सत्तर युग हम सेवा कीन्हाँ । चौदह भवन बकस मोहिँ दीन्हाँ ॥ जैसी निर्णय हम सुनावो । तैसी सिखावन जानि चलावो ॥
कूर्म उवाच
कूर्म अंश तब बोले बानी । अपनी अपनी करो रजधानी ॥ इतना वचन सुनि लेहु हमारा । माहिँ माहिँ मतिकरो विगारा ॥