कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
(१२६)
कवीरुपथी—
इंसो हितार्थाय वंदेगुरुर्णां, मे देहि मे देहि चरणं शरण्यं ॥ नमो नमो उग्रनामं प्रसिद्धं, दयापाल दृष्टो समग्रं समुद्धो । यथा भानु उदयतमोपुंजदहनं, तथास्तु प्रतापस्य चरणं प्रपद्ये ॥ नमोस्तुते वंशबयालिसं च, चरणाभृतं पानमहाप्रसादं । गुरोः कृपायस्य सदा शुभस्य, शरणागतं मुक्त भवेतहंसा ऋद्धिचसिद्धिचबुद्धिचदाता, विवर्धनं भक्त त्वमेव ज्ञाता । येभक्तिर्कुर्वन्ति तत्तत्पादपद्मे, प्रमुच्यते तस्य दुःखस्य राशिः ॥ सर्वाघदहनं च यो जीव मुक्तो, इदं च स्तोत्रं नित्यं भणंते । पुरुषस्य अंशं नमोहंसवंशं, प्रणम्यत्वं दास शीतलं शरण्यं ॥ नमः स्तुति स्वामि जानामि को वा, अकथं महत्त्वं परंपुराणं । सदा कृपा हंसदितार्थ रूपं, मे देहि मे देहि चरणं शरण्यं ॥
स्तोत्र ॥
नमामि कलातीत कामादि रहितं, वरिष्ठं बरीयान विज्ञान सहितं । रंकारमस्मी सदाकाल धन्यं, रमेतिकवीरं न भेदानभिन्नम् ॥ स्वयं शाश्वतं केवलं ज्ञेयरूपं, निजानंदमूर्ति अखंडं सरूपं । सुधाशब्दपुंजं चिदामर्कइंद्रुम्, सदोदित्यनुदैश तेजारबिंदं ॥ गुणं निर्गुणं वर्णाश्रमं धर्मरहितं, स्थितप्रज्ञगृह्यं समे चित्यसततं । महदादिमेको गुणातीतनित्यं, षष्ठं चतुष्ठादिशब्दादिव्यक्तम् ॥ पृथ्वी तेजआकाशतोयं समीरं, निजाकिंचिदंतव्यापककवीरं । अनामं अनादिं श्रुतियं वंदती, कवीरादिशब्दं गिरा न रंवदंती ॥ उदया- स्ततीतं परापारमीशं, तुरीयादिमेकं स्फुरंतं अशेषं । दयाआदिदे धर्मसंपन्नज्ञानं, लोभादिरागादितमनाशभानं ॥ अन्ययवलं निर्गुणं निर्विकारं, अनादिमव्यक्त गगनोपकारं । पक्षविपक्षं निजदेशकालं, नमामि कव्वीर गिरासुत्रमालं ॥ इदं सर्वं जगतं महा इंद्रजालं, मृगावारपश्यं प्रभो प्रभिवालं । प्रभु बरदयालं जनानंदकारी,
शब्दावली
(१२७)
पुरुषोत्तमोयं द्विजपादवारं ॥ महारौद्र घोरं नरेशान वंशा, तोयं च बारं च वहिनीद नीशा। मदो दम दमंतं मतंगं च दीशा, मृगादी च पश्यं करीशब्दचीशा ॥ महाभयं च सुलतान सजदापि जाई, कदमखाखकेवल्य खुदेतं खोदाई। सुरशिद मिहखान साहब दिगारभ। गुनहगार बन्दो तकसीर वारम् ॥ विनय वेश सततं च कहूणा निधानं। सदा सत्य संगदि ध्येयं च ज्ञानम् ॥ रागस्थादि बन्दीछोरं नमामि, सदानन्द रूपं कवीरं भजामि ॥ इति ॥
स्तोत्र ॥
भो कवीर हरन पीर धीर बुद्धि धारणं। सत्यनाम परमधाम सर्वकरण कारणं ॥ हंसभूप परमरूप वेद विद्य छेदक। न्याय नीत अति अजीत ज्ञानवृद्ध धारणं ॥ संतरक्ष साधुपक्ष भक्तमुक्त तारणं। गुणातीत भयाभीत सर्वशिक्ष मंडनं ॥ निराधार सताधार परमपार पारणं। प्रणत पाल अतिदयाल कालजालटारणं ॥ दयासिंधु क्षिमाइंदु श्वेतबिंदु शोभितं। शब्दरूप अति अनूप अमीरूप सारणं। अकहनाम त्वं अकाममानहीन पालनं। पाप ताप दहनकृत्य तिहुँ ताप नाशनं ॥ भवातीत जोगजीत हंसरूप लक्षणं। सत्यरूप गुरुसरूप शरणागत तारणं ॥ प्रगट प्रतक्ष अक्षज्ञान रूप साक्षिनं। सत्यनाम आदिपुष्प सर्वघट भासनं ॥
सद्गुरु पदरत प्रीत अति, सारं सार विचार। सत्तनाम हंसा गहे, उतरे भौनिध पार ॥
कवीरचालीसा।
ॐ नमो आदि ब्रह्माय शब्दे सरूपं। नमोजीवजावद्व्रमय- विश्वरूपं ॥ गहु शरणप्रानी जो सुखसिंधु चहु रे। कबीर कबीर कबीर कहुरे ॥ १ ॥ का रूप करताय निरताय देखो। वा रूपविस्तार नहि आन पेशो ॥ रा रूप रमताहि सब माँहि रहुरे। कबीर
(१२८)
कवीरपंथी-
कक्वीर कक्वीर० ॥ २ ॥ का कृष्णरूपं सरूपं अरूपं । वा विष्णु धारी सबे देव भूपं ॥ रा रुद्ररमताहि दमताहि गहुरे । कक्वीर कक्वीर कक्वीर० ॥ ३ ॥ कहुरे का कुलकुला जो नहीं आन कोई । वा बेलबेली अकेली न दोई । रा रार मेटो समेटो न बहुरे, कक्वीर कक्वीर कक्वीर० ॥ ४ ॥ का काहि कैवल्य करताहि आपे । वा बीजविस्तार हरे तीन तापे । रा रोमरोमाहि नर ताहि गहुरे । कक्वीर कक्वीर कक्वीर० ॥ ५ ॥ का काल मरदम्य सो हरदम जपोरे । वा बीज जेठरान तप ना तपोरे ॥ रा राह निरबाह गुरुबाह गहुरे । कक्वीर कक्वीर कक्वीर० ॥ ६ ॥ का कहि डरपेजु अरपे सिंहको । वा बोलबोलै सो गहुरे गुरुको ॥ रा राह एही सो देही न दहुरे । कक्वीर कक्वीर कक्वीर० ॥ ७ ॥ का कोउ तेरी सो महिमा पढे है । वा कहय रूपे सरूपे गढे है ॥ रा रमताहि सबमाहि अहुरे । कक्वीर कक्वीर कक्वीर० ॥ ८ ॥ जिहि पाय इच्छाय सतलोककीन्हा । उप- जाय कंजाय तहां बासलीन्हा । बहुर्भाति सुखधाम तहां रास रहुरे । कक्वीर कक्वीर कक्वीर० ॥ ९ ॥ तहां एक अंडाय तेजा- सुभयेऊ । करि लोकन्यारा सु त्रैलोक दयेऊ ॥ तिहि आय जग- जीव जम दाह दहुरे । कक्वीर कक्वीर कक्वीर० ॥ १० ॥ जी त्रास जम फांस करुना उचारे । हे पुरुष हे पुरुष बानी पुकारे ॥ सुनी श्रवण झनकार रुस्कार बहुरे । कक्वीर कक्वीर कक्वीर० ॥ ११ ॥ नर रूपधर भूप गुरुरूप धाये । जिमि दाठ बाघेसे सुरभी छुडाये ॥ तिमि जगत जम जीव गजग्राह गहुरे । कक्वीर कक्वीर कक्वीर० ॥ १२ ॥ दे सत्यशन्दे विदारी विथा है । जुगन जुगन जीवकी बरनी कथा है ॥ कलजुग जिवकाज दुख आप सहुरे । कक्वीर कक्वीर कक्वीर० ॥ १३ ॥ हे ब्रह्म आपे सु लीला करी है, न तत्त्वपांचों न देही धरी है सुखदुःखन्यारे है कहवे में अहुरे । कक्वीर कक्वीर कक्वीर
शब्दावली
(१२९)
कहुरे ॥ १४ ॥ शाह सिकंदर सु अंदरमें लेखा । कैसा फकीरा य चहिये तो देखा ॥ कर बांध पग बांध बोरे सु दहुरे । कक्वीर कक्वीर कक्वीर कहुरे ॥१५॥ टूटे है जंजीर बैठे हैं तीरा ॥ बोला सो शाह यह सांचा फकीरा ॥ फिर बोल बोले कि गजमस्त अहुरे । कक्वीर कक्वीर कक्वीर० ॥ १६ ॥ मातंग माते न जाते ढिगे हैं । लख रूप सिंधे सु चिक्कार भगे हैं ॥ देशाह अजमत स्वामी सु बहुरे कक्वीर कक्वीरकक्वीर कहुरे ॥१७॥ देखो सबे काम करता खिजूका । भर तोप गोला सु रोपा बिजूका ॥ जिम देह गजतूल गोली न लहुरे । कक्वीर कक्वीर कक्वीर० ॥१८॥ है दीनबंधू दया देख अंदर । गत जौन जैसी सो नाचत सु बंदर ॥ तिय आप शाह सिकंदर जो चहुरे । कक्वीर कक्वीर कक्वीर० ॥ १९ ॥ फिर शाह बोला य गोला न डरपे । तेगे अनेगे चलाया है गरपे ॥ जल धार जिम सार मझि आय बहुरे । कक्वीर कक्वीर कक्वीर० ॥२०॥ कहांलो कहां और केतो कहानी । तजी स्वामि ऐसो भुलानोरे प्रानी ॥ निष्काम निष्कोध निरलोभ बहुरे । कक्वीर कक्वीर कक्वीर ॥२१॥ हारा है शाह सो दैऽनेक पीरा ॥ नाही फकीरा यह है आप पीरा ॥ जाना सो नरनाह सरनाह गहुरे । कक्वीर कक्वीर कक्वीर० ॥२२॥ खूने अनेक जो शाहूने कीन्हा । जानाजी अपने सु चितमें न दीन्हा ॥ जिमितात सुतकेर औगुण न गहुरे । कक्वीर कक्वीर कक्वीर० ॥२३॥ डारे सु सिरपेज ऐचे जु मूछे । का लेत । का लेत । बातें सो पूछे ॥ है स्वामि सबकेर सब माहीं बहुरे । कक्वीर कक्वीर कक्वीर० ॥२४॥ फिर एक औरि सुनोरे गुनोरे । तजि-स्वामि ऐसो न सीसे धुनोरे ॥ कहीं है पुरी आप काशीमें रहुरे । कक्वीर कक्वीर कक्वीर० ॥२५॥ गोपालपंडा सो अटका बनायो । फूटा है पटका सु चटका बुझायो ॥ काहू न ताको वो भेद लहुरे । कक्वीर कक्वीर
कवीरपंथी शब्दावली ५
(१३०)
कवीरपंथी-
कव्वीर० ॥२६॥ बोधे दोई दीन तहां कीन्ह ऐसो । समुझाय दर- साय जिहि जौन जैसो । तजि देह दोहु और हथियार गहुरे । कव्वीर कव्वीर कव्वीर० ॥२७॥ दोहु ओर क्रोधा सु जोधा बडे हैं । अपने जु अपने सु प्रनपे अडे हैं ॥ तक तास नियरान यह बानगहुरे । कव्वीर कव्वीर कव्वीर० ॥२८॥ देखो उघारी उहां है वो नाहीं । केहि काज लरते सु मरते वृथाही ॥ तब आय दोउ दीन देखा न अहुरे । कव्वीर कव्वीर कव्वीर० ॥२९॥ स्थूल घर फूल अघ्रान भारी हे ब्रह्म ! हे पीर ! रटना पुकारी ॥ सुनी दीन बानी सु तिहि दर्श बहुरे । कव्वीर कव्वीर कव्वीर० ॥३०॥ पुनि एक औरि सुनो रे सुनाऊं । लखि स्वामि ऐसो सु दिन रेन माऊं ॥ तत्ताव जीवा प्रण ऐसो गहुरे । कव्वीर कव्वीर कव्वीर० ॥३१॥ सूखो इतो एक लकडा पुरानो । हरिआय जिहि चरण चरनोद जानो ॥ गाडो है सो आय अगनाय बहुरे । कव्वीर कव्वीर कव्वीर० ॥३२॥ जुरि आय बहुभेष दग देख लीजे । पानी सो छानी औ गुरुजान कीजे ॥....साधू सो है सूर प्रण पूर गहुरे कव्वीर कव्वीर कव्वीर० ॥ ३३ ॥ न्यारे सु न्यारे ले चरना पखारे । जिहिभांत जिहरीत करप्रीत ठारे ॥ हरियान नाही सो उरदाह दुहुरे । कव्वीर कव्वीर कव्वीर० ॥३४॥ तब जानजन प्रीत प्रण पूर आये। उर दाह लागी सो छिनमें बुझाये ॥ लै चरण चरनोद मनमोद बहुरे । कव्वीर कव्वीर कव्वीर० ॥३५॥ डारो है कर प्रीति परतीति आयी । हरियान निरजीव सरजीव भायी ॥ दोऊ बन्धु निरद्वंद सरना सु गहुरे । कव्वीर कव्वीर कव्वीर० ॥ ३६ ॥ सो टूट ना आय जी जगत केरे । जर भक्त अंकूर जमराज पेरे ॥ सो आप गुरुरूप निजरूप बहुरे । कव्वीर कव्वीर कव्वीर० ॥३७॥ चरना दह मृत्यु समरत्थ्य करो । करुनाशकी कोर फिर आप हेरो ॥
शब्दावली
(१३१)
हरियान सो पान नर ताहि गहुरे । कक्वीर कक्वीर कक्वीर० ३८ नर धाय पदकंज मनमंज कीजे । यह चैन वह चैन सुखवास लीजे ॥ दोऊ ओर कर पच्छ सो स्वच्छ गहुरे । कक्वीर कक्वीर कक्वीर० ॥३९॥ कही ताहिसुखलाल सुखलालबरने । मिटि जात जगतात जन्माद मरने ॥ यह जान मन मान मरना सु गहुरे । कक्वीर कक्वीर कक्वीर कहुरे ॥ ४० ॥
साखी ।
चालिस छंद प्रबंधये, बांचत डरपे काल । साधन प्रेम वढा- वहीं, जम दूतन को साल ॥
इति कबीरचालीस ।
अथ अरबी नाम ।
करतहों पुकार मेरो तुमही हो आधार, सुनु वेगही गोहार साहेब वार काहे लायेहो ॥ बडे बडे संकटमें संतन सहाय कीन्हों, राखो प्रण जनको निज पैजहू बढायेहो ॥ जनको दुःख दुखित देख संतनको कलाप मेट, दहन दुखदाप सुखसागर देन आयेहो ॥ सेतुबंद बांधवेको रामचन्द्र विकल भये, लिखे सतरेखा जलपा- हन उतरायेहो ॥ द्रापर पगुधारे निस्तारे नृपबधू ब्याल, विषम विडारे जमफंद ते छोडायेहो ॥ पांडोंके कुमार विकल यज्ञके प्रकार, बहे संसेकी धार हारि सीस भुमि लायेहो ॥ वाको यज्ञ सारो बिडारो दुखदारुणते, सकल भेष भूषन मिली जय जय उचरायही ॥ कलउ तन धारे सब भेषनके काज सारे, प्रथमें पुरुषोत्तम पुरि देवल थपाये हो ॥ सागर हटाय अम भौजल मिताय, परगटे अनंत रूप चकित द्विज कराय हो ॥ बलख सिधाये छुड़ाये बहु भेषन दिढाइ, सुलतान भक्ति मार्ग लगाये हो ॥ सिंधु वोहित बचाये दाह पंडन को बुझाये, आये नगर
(१३२)
कवीरपंथी—
काशी पुरबासी गुण गाये हो चर्चा भई भारे काजी पंडित पच्छि- हारे, इस्मकूँ फेर शाह सिकन्दर समुझाये हो ॥ शेख तकी बार बार कसनी लेके रह्यो हार, कुदरत कमाल सुत मृतक ज़िवाये हो ॥ गोरखपुर मगहर बोधे दोऊ दीन परबोधे, बांधो गढ बचेला रानाखाना सजुपाये हो ॥ कौतुक दिखाये नदी आमी बहाये तहाँ, धाये नर नारी मन वाँछित फल पाये हो ॥ जीवनके धनी हो गुनी प्रभुताके लायक, जेशी जाकी आशा तैसेही ताकोपुराये हो ॥ बट बीज बोवाये खोजि हटाये, संशय मिटाये, जन ज्ञानी समुझाये हो ॥ हेरि तको अपनी ओर कृपा करें चक्षुकोर, निर- खत हौं तुम्हारी ओर काहे न धाये हो ॥ हौं सपूत और कपूत दोऊ लाज पिता औ जननीको, अपने प्रण पक्ष जानि नाहीं बिलगाये हो ॥ जाको जन विकल कल कैसों ता साहब को, दास की हँसाई ठकुराई हँसी जाय हो ॥ बंदीछोर नाम तेरो बेग बंदी- छोर मेरो, हौं तो अधीन तेरो चेरो कहा अनेरो ठहरायहो ॥ तुम्हरो बल जान ठान जीवनको दीन्हो पान, सुनि लीजे बिनती मान धर्मनि गोहराये हो ॥ तब प्रगटे सत्यगुरु कवीर धर्मनि चित्त धारो धीर, तन पुलकी चक्षु नीर धाय पाय लागेहो ॥ निरखि बदन विकल बोले पग प्रकाश मन सुकुर डोले, हिय उमंग मन मुदित खोले हो ॥ पग पैकर गयो छूटि गुफादार गयो टूट, जमराज घर भयो लूट लखि दुर्जन सब जागे हो ॥ द्वारपाल कीन्हों शोर सबे धाये चहुँ ओर, करत कलाप हाय रोर पुत्र दुखित शाह भागेहो ॥ दंपति कहे करजोर पुत्र इन मारा मोर, हमहूँ कस करव दौर पुत्र बिना अनुरागेहो ॥ तब बोले सत्यनाम बैन शाह हृदय राखु चैन, तेरो सुत मिले ऐन तजु कुबुद्धि कागे- हो ॥ साजि आरति अनुमान शाहसुतको दीनो पान, तब बालक
शब्दावली
(१३३)
गोहरान लोक सोभा अनुरागेहो ॥ धर्मनि चित्त भये अनंद, मिले सकल काल द्रंद्र, छोरैठ सतनाम बन्द, चूक बखशाये हो ॥ धर्मनि दासानुदास, सतनाम गह्यो विश्वास, सत्य कवीर आये हुलास प्रेम उमंग पागेहौ ॥
इति श्री अर्जनामा गुरु धर्मदासजीका ।
अथ अर्जनामा ॥ २ ॥
गोरखासी भरीबदासजीका ।
सतगुरु मिहरबान् कीजे सहाय । जल थल सकल संग मौले मलाय ॥ जलबुंदसे साज कीन्हा निशान । जठरा अग्नि विच राखे अमान ॥ १ ॥ जठरा अग्नि विच राखे सही । अमृत अग्नि खीर प्याया मही ॥ नापैदसे पैद कीन्हा है पिण्ड । जामे भँवर अशें कुर्सी है अंड ॥ २ ॥ स्वासा सहस धुनि शरीकत सरार । वह कौल बिसरा जो कीन्हे करार ॥ कुर्बान कुर्बान कुर्बान जाँह । भयकी दरिया बीच पकड़ी है बाँह ॥ ३ ॥ निश्चल निराकार निर्गुन अनूप । स्थिर अनाहद सलाहद सरूप ॥ रहता है अशें पै जो पदें अदेख । है बेचगूँ नमूँन अलेख ॥ ४ ॥ खालिक खलक बीच हाजिर हुजूर । बाजे सुहगम विहंगम जो तूर ॥ मौले मुरारी अटारी जलाल । ता बीच साहब सुबहाँ विशाल ॥ ५ ॥ खाने चरवादार बाँदीका जाम । लटका कई मेरी लीजो सलाम ॥ मौला साहब मेरी मटो न शंख । मोसे पतित तैं उधारे असंख ॥ ६ ॥ साहिब चितानंद सतगुरु अलेख । मोसे पतित तैं उधारे अशेख ॥ अगह अगम दीप ऊँचा सुमेर । कैसे चटौं जु फिर्गंगी है फेर ॥ ७ ॥ तुही है तुही है तुही है सुभान । नापैदसे पैद कीन्हा जहान ॥ तुही है तुही है तुही है अखोज । नापैदसे पैद कीन्हा है लोक ॥ ८ ॥ तुही है तुही है तुही है हकीम । नापैदसे पैद कीन्हा मुकीम ॥ दुनिया दिवानी बिगानी बिकार । समझे न बूझे
(१३४)
कवीरपंथी-
अनारी गवॉर ॥ ९ ॥ साहब दयावंत अविगत अपार । सोऽहं सोऽहं भँवर गुँजार ॥ दुनिया विलोमान होती हनोज । कीजो बे यारो परम हंस खोज ॥ १० ॥ फना है फना है फना है लगार । माटी मिलेगा जो करता सिगॉर ॥ हस्ती रु घोडे रु जोडा जहान । फना दीन दुनिया जमीं आसमान ॥ ११ ॥ राजा न रैयत रहेगा न कोय । रहेगा चिदानंद उपजा न सोय ॥ भाई भतीजे रु जोरू जमाल । देखैंगे लडके जो होगा हवाल ॥ १२ ॥ दादीरू फूफी बहिन रोवैंगी रुह । जम आनि पकड़ेगा जब दू बटूह ॥ मौसी रु मामा अलामा जहान । शुकदेको पूछो जो विरक्त परवान ॥ १३ ॥ हजार बार तोबा जो खैंचे हदीस । कहो कौन मेटेगा जमकी कशीस ॥ काफिर करद बाँधि खाते बकरीद । जमकी । तलब कैसे होगी रसीद ॥ १४ ॥ सुरगी रु बकरी टँढा रु ढोर । खूनी भखैहैं शरअ के जो चोर ॥ चाकर चरवाहा रु देखै खवास । जब आन बीतैंगी जमकी त्रास ॥ १५ ॥ करियो बे यारो कुछ चलनेका मूल । दरगह न पहुँचे नबी ओ रमूल ॥ मुहम्मद नबीकूँ न पाया है राह । अर्श पंथ बाँका है अगमो अगाह ॥ १६ ॥ शरेकी शरीकत तजा है न दीन । उलटा अपूठा परा है जमीन ॥ दोजख विहिशतका जो देखा है अंत । जा बीच जमराय तोडे है दंत ॥ १७ ॥ दोजख विहिशतको देखा जो उनमा न । जा बिच जमराय काटे जुवान ॥ दोजख विहि- शत हैं जो बाँकी उजाड । जा बिच जमराय तोडे है जाड ॥ १८ ॥ करियो बे यारो खजाना खरीद । संग ना चलै देखो दीद बर- दीद ॥ संग ना चलेगा सूरई रु सुमेर । काफ़र कुटन करते घेराहि घेर ॥ १९ ॥ झूठा करम क्रूर काफिर कूँ जान । अह- रनकी चोरी सूरईका जु दान । मूजी मुजावर व पापी प्रेत ।
शब्दावली
(१३५)
सुमका ससुरा न साईसे हेत ॥ २० ॥ सदगुरु चिदानन्द अवि- गत अपार । पाजी खानेजाद तुम्हरे अघार ॥ सतगुरुनका सामां जमैयत जमाल । देखे तमाशः सब कुदरत कमाल ॥ २१ ॥ शीलके सरोवरमें नहाना हमेश । प्रेमपद पारसका दीजे उपदेश॥ बुद्धिका बखतर औ पाखर प्रतीत । सोहं जपमाला भज अवि- गत अतीत ॥ २२ ॥ बुद्धिकी बन्दुक और हठकी दे ढाल । चित्तका चकमक भर दारू दर हाल ॥ पवनका पलीता व गोला गुलजार । दोदलकी खिडकीसे उतरोगे पार ॥ २३ ॥ ज्ञानकी गादी समाधी गलतान । दयाकी हुलीचेपे धरमका निशान ॥ द्वादश दल जीतनको तत्तकी तलवार । अर्ध उर्ध तकिय बिच दुर्जनको मार ॥ २४ ॥ नामकी नवकी कर मनकूँ मलाह । चित्तका चंपु ले सुरतसे चलाह ॥ अर्शमें आसन सिंहासन समोय । उदित भानु चन्द्र ओ कला संख जोय ॥ २५ ॥ तत्त्वका तिलक करले गायत्री लाप । शून्य सिखर गढमें जप अजपा तु जप ॥ अरसठका नहाना त्रिवेणीके तीर । सर्वज्ञ साहब भज कायम कवीर ॥ २६ ॥ मानसरवर दरिया जहाँ चुगते हैं हंस । लगे गैबगोता जहाँ भेटे परमहंस ॥ अछय वृछ अर्श बीच फूला गुल- जार । अर्थ धर्म काम मोक्ष पाये दीदार ॥ २७ ॥ पात पात विष्णु बैठे शिव विरंचि शेष । सतगुरु कुर्बान जाऊं ऐसे उप- देश ॥ सदगुरु चिदानन्द माया न मोह । निर्गुन निरालम्ब जाना है तोह ॥ २८ ॥ कासे कहूँ भेव परवरदिगार । जाना हम जाना है अविगत अपार ॥ अर्श बीच बैठा जो मारे गिलोल । देखो वे यारों कुछ नहीं तोल मोल ॥ २९ ॥ पीताम्बर पटमें हैं सूक्ष्म सा रूप । सुरति नाल चलती है छाया अनुरूप । सत- गुरु आवाजी निवाजीलिलाट । सुनो अर्ज नामा पढनके जो
(१३६)
कवीरपंथी—
घाट ॥ ३० ॥ ब्रह्म तेजताली हमाली हुजूर । अग्रपंथ पाया समाया जहूर ॥ सतगुरु शरीकत हकीकत जवाब । कहो कौन लेगा शरमें हिसाब ॥ ३१ ॥ मौले मिहरवान मालिक सुरारि । हीरा हिरम्बर तुही वारपार ॥ सतगुरु दिगम्बर विश्वम्बर दयाल। पलमें निवाजे जो नजरे निहाल ॥ ३२ ॥ अगम ज्ञान लासा खुलासा जो सैल । पपीली न पहुँचे जो लादे है बैल ॥ गरीब- दास छाना है नीर खीर । कुर्बान कुर्बान कायम कवीर ॥ ३३ ॥
इति अर्जनामा गरीबदासजीका ।
अथ अर्ज नामा ॥ ३ ॥
सतगुरु मिहरवान कीजे करम । गाफिल खुदी हूर दिलका भरम ॥ १ ॥ बहुत रोज बीते मैं तेरी शरण । स्याही गई अब सफेदी बरन ॥ २ ॥ सुझे बहुत अंदेशा किया मैं जो फेल । बदी बहुत कीता ओ नेकी निसेल ॥ ३ ॥ क्या मैं कहूं संगी बुरे सोहबती । किया चाहते ये सुझे बे डुरमती ॥ ४ ॥ आजिज मैं तनहा दुसमन जबर । अर्जी कहूं मैं मेरी लीजे खबर ॥ ५ ॥ सतोगुनकी चौकी व अपनी भगत । इतनी नाथ कीजे सो मेरी मदत ॥ ६ ॥ काया कोट माहिं मैं निशिदिन लहुँ । दुशमनकी लशकरसे नाहीं डरूं ॥ ७ ॥ नवे मोरचा खूब कायम कहूं । देशमें जमैयतसे लगाकर रहूं ॥ ८ ॥ तुम्हारी तबजुहसे दुशमन डरे । हटा अपना माने न मुशिकल करे ॥ ९ ॥ निर्भय हरष होय संशय मिटे । सबे रोज दिल बीच रटना रटे ॥ १० ॥ अन्तः करन प्रेम नैना पगे । जगत कर सब स्वाद फीका लगे ॥ ११ ॥ तुम्हारी विरह अग्रिममें निशिदिन जहूं । चौथी अवस्थाको हासिल कहूं ॥ १२ ॥ मेरी अरज होवे दरगह कबूल । दिलकी सुराद
शब्दावली ।
(१३७)
दाद कीजे रसूल ॥ १३ ॥ सदगार सकल सन्त रोशन जमीर सेवक तलबदार दाय़ा कवीर ॥ १४ ॥
इति अर्जनामा गरीबदासजीका ॥ ३ ॥
विनय अष्टपदी ।
प्रभुजी तुम विनु कौन छुडावे ।
महा कठिन यम जाल फाँस है, तासो कौन बचावे ॥ १ ॥ नाना फाँस फँसाय जीवको, आपन रूप छिपावे । पंच कोश होय प्रगट आसे, तेहिको कौन लखावे ॥ २ ॥ आपहि एक अनेक कहाई, त्रिविधि रूप बनावे । सन्निपात होय दुष्ट नष्ट सो, परलय अंत दिखावे ॥ ३ ॥ विषय विकार जगत् अरुझावे, जहाँ तहाँ भटक़ावे । योग ध्यान विगुर्चन भारी, ताहि सुरति अटकावे ॥ ४ ॥ आशा नाम नौका बैठावे, भौकी धार बहावे । तत्त्वमसि कहि ताहि डुबावे, अन्त कोइ नहि पावे ॥ ५ ॥ चारि मुक्ति योनि चौरासी, तेहि मिलि हेतु बढावे । नेम धर्म पूजा औ संयम, बहु विधि लाग लगावे ॥ ६ ॥ भेष अलेख करे को पावे, जीवहिँ चैन न आवे । चारि नेद षट अष्टदशोले, शून्यहिँ शून्य समावे ॥ ७ ॥ काल चक्र बसि उत्पति परलय, जीव दुसह दुख पावे । साहब दया कीन्ह परखाये, रामरहस गुण गावे ॥ ८ ॥
दशाष्टक स्तोत्र ।
नमामि सर्व संत जिनको मनाऊं । चरण रेणु जिनकी मैं शिर- पर चढाऊं ॥ चरण रेणु प्रताप भ्रम नाश जालं सुसंतन कृपाते मिले गुरु दयालं ॥ १ ॥
गुरु चरण शोभा सकेको वर्ण । तरेडनन्त जीवा गुरु चर्ण शरणं ॥ गुरु चर्ण रेणु धरो मोर भालं । नमो गुरु दयालं कवीरं कृपालं ॥ २ ॥
(१३८)
कवीरपंथी—
रविचन्द्रऽनंतं गुरु अंगरूपं । गुरु देव देवं शिरो भूप भूषं ॥ कृतं पार भव सिन्धु यमधार तालं । नमो गुरु दयालं कवीरं कृपालं ॥ ३ ॥
तीर्थ सर्वे गंगापि गुरु चर्ण माहीं । गुरु कामधेनु कल्पवृक्ष छाहीं ॥ भक्ति ज्ञान वैराग्य फलफूल डालं । नमो गुरु दयालं कवीरं कृपालं ॥ ४ ॥
गुरु चर्ण तोयं कटे पाप घोरं । लिये गुरु प्रसादं हटे यन्म जोरं ॥ मिटे ताप भवसिन्धु अमृतं रसालं । नमो गुरु दयालं कवीरं कृपालं ॥ ५ ॥
गुरु शम्भु ब्रह्मा गुरु विष्णु रूपं । गुरु आदि ब्रह्म अनादी अनूपं ॥ गुरुकी कृपा होय व्यापे न कालं । नमो गुरु दयालं कवीरं कृपालं ॥ ६ ॥
सत्यलोकवासी गुरु मुखविलासी । सो परगटे काशी निर्गुण उपासी ॥ नहीं गर्भ जन्म भये चन्द्रतालं । नमो गुरु दयालं कवीरं कृपालं ॥ ७ ॥
गुरु काशी सिधायै पंडित हरायै । भक्ति भाव बोध पथ जगमें चलायै ॥ नरपति पाय लागे खुले अनेक भालं । नमो गुरु दयालं कवीरं कृपालं ॥ ८ ॥
बादशाह पीर परचा लेन काजे । जडे गुरु जंजीरा सो तीरा विराजे ॥ मृतक सुत जिलायै कमाली कमालं । नमो गुरु दयालं कवीरं कृपालं ॥ ९ ॥
गुरुषोत्तम पुरीमें जलत पण्डा बुझायै । सुने सिद्ध बन्धासो फन्दा छुडायै ॥ बलख ज्ञान करके चितायै नृपालं । नमो गुरु दयालं कवीरं कृपालं ॥ १० ॥
थीर किये आसा सिन्धु नीरं हटायै । गुरु दरस दे ज्ञान
शब्दावली
(१३९)
संशय मिटाये ॥ वृक्ष बट प्रगट कर दिखाये विशालं । नमो गुरु दयालं कवीरं कृपालं ॥ ११ ॥
सुरनर सुनि नाग सबही गुरु मनावें । नारद सुनि शुक्रदेव गुरुहीकी ध्यावें ॥ गुरु वोइ मित्रं पिता रक्षपालं । नमो गुरु दयालं कवीरं कृपालं ॥ १२ ॥
गुरु योग योग्यं तपस्यासुरवतं । सो भवं रोग भग्यं गुरु ध्यान धरतं ॥ गुरुकी कृपा होय व्यापे न कालं । नमो गुरु दयालं कवीरं कृपालं ॥ १३ ॥
गुरु लोक प्रकाशं शसि कोटि भानं । पुरुष रूप कांति कहो को बखानं ॥ गुरु लोक पहुँचे हंस चालं । नमो गुरु दयालं कवीरं कृपालं ॥ १४ ॥
गुरु मोरि कर्म बहु हंस कीन्हें । सुनो तोहि जाने तबही शर्ण- लीन्हें । दीजे मोहि दीदार लेहु सँभालं । नमो गुरु दयालं कवीरं कृपालं ॥ १५ ॥
गुरुऽनन्त तारे सकेको बखानी । समावे चिटी पेट सागरको पानी ॥ निगमनेति भाषे तो मैं कौन वालं । नमो गुरु दयालं कवीरं कृपालं ॥ १६ ॥
अहो गुरु मैं हूँ सदा दास तेरे । हृदय वास कीजे गुरु आन मेरे ॥ भक्ति ज्ञान दीजे सुनो प्रणतपालं । नमो गुरु दयालं कवीरं कृपालं ॥ १७ ॥
गुरुकी जो महिमा पढे नित्यनेमा । गुरु है कवीरं सो ताहि सो प्रेमा ॥ हरे पाप सब कहे शास्त्र मालं । नमो गुरु दयालं कवीरं कृपालं ॥ १८ ॥
१ लं माला-समूह अर्थात् सब शास्त्र ।
(१४०)
कवीरपंथी-
स्तोत्रदशक ।
नमस्कार बार बार सुन हमार सतगुरुं । तिभिर हरण तमसू दलत शरन पाल सुरवरं ॥ प्रकाशवान् तेज भानु भक्त भूप सरुयतं । युगन युगन हो कवीर चरण शरण ररुयतं ॥ १ ॥
अमर लोक अरु अशोक सर्व दुःख नाशतं । तुव निवास सुख विलास, बहु प्रकाश शास्वतं ॥ आदि पुरुष आप हैं, जहाँ अलेख अक्षतं । युगन युगन हो कवीर चरण शरण ररुयतं ॥ २ ॥
सर्व गुननिधान कृपासिन्धु नागरं । सो प्रगटे अवनि आय ज्ञान गम्य उजागरं ॥ अनंत रूप ऊपमा सके सो कौन अरुयतं । युगन युगन हो कवीर जरण शरण ररुयतं ॥ ३ ॥
सर्वाजित विद्या रीति सर्व देश जीतियं । तोहि निहार गयो हार गात इंकार वीतियं ॥ काशी वासी पंडित भये निराश झरुयतं । युगन युगन हो कवीर चरण शरण ॥ ४ ॥
पादशाद दगा चाह गयन्द लाय गर्जनं । तुम दयाल हो विलास सिंहनाद तर्जनं । तोरि जझौर भये तीर रहे सर्व थकयतं । युगन युगन हो कवीर चरण शरण ररुयतं ॥ ५ ॥
रंक राव बलख आदि सकल जीव तारनं । तजि अमीर हो फकीर ज्ञान गम्य धारनं ॥ भक्ति पक्ष शुद्ध लक्ष थके जो स्वाद थकयतं । युगन युगन हो कवीर चरण शरण ररुयतं ॥ ६ ॥
पतित बहु परे पाय शरण भक्त वत्सलं । जानि दास भेटि त्रास दीन बास अविचलं ॥ सदा सुख नाहिं दुःख हंस शब्द परसि छकयतं । युगन युगन हो कवीर चरण शरण ररुयतं ॥ ७ ॥
विरद रावरो संभारु हो दयाल दुखहरं । ले उबार विघ्न टार अघ निवार सुख करं ॥ भेटो त्रास करत काल सब जिव भरुयतं । युगन युगन हो कवीर चरण शरण ररुयतं ॥ ८ ॥
शब्दावली
(१४९)
गंग बारि करे पुकार सुन हमार समरतं ॥ त्राहि त्राहि शरण पाहि सखमाया अत्रतं ॥ अगाध महिमा साधु जाने सुनि देव यरुयतं । युगन युगन हो कवीर चरण शरण ररुयतं ॥ ९ ॥
सांझ सवार नेम धार गुण तुम्हार उच्चरं । तुम कवीर हरण पीर करण तीर भव परं ॥ मैं अज्ञान शरण आयो, राख शर्म सरुयतं । युगन युगन हो कवीर चरण शरण ररुयतं ॥ १० ॥
स्तोत्र ।
जय दीन दयाल कृपाल हितं । मद लोभ रू मोह सदा रहितं ॥ अनवद्य अखण्ड अनादि अजं । सुर सन्त कविन्द्र मुनिन्द्र भजं ॥ १ ॥
वगियान वरेष्ट सु ब्रह्म वरं । छर अच्छर आतम पारपरं ॥ सत्यनाम कवीर गंभीर धयं । अणिमा महिमालघिमा सिधयं ॥ २ ॥
शिव सिद्ध सुरेश मुनीश अबे । मिलि माधव संत बंदे जो सबे ॥ गुण ज्ञान निधान विज्ञान अयं । निर्भय निर्मल सुख ब्रह्म स्वयं ॥ ३ ॥
उद्याचल ऊपर सूर दसा । वचनामृत पोषन चन्द्र जसा ॥ अक्ष-पाल कृपाल हमेश वर । हनुमन्त सुधारन काज परं ॥ ४ ॥
सनकादित ज्ञान जैसे गहिरे । सर्वलोकमें नारद ज्यों बिहरे । सर्व योगिन गोरख भीर यती । सत्य धारणसो हरिचन्द्र सती ॥ ५ ॥
गिरजापति नित ज्यों ध्यान धरं । अचलं गिरि सिंधु समं समरं ॥ शुक्रदेव जैसे गुरु ज्ञान गनं । सब दासन पार परं समनं ॥ ६ ॥
वचनं किरनं जन कञ्छ खिलोतव नाम लिये सत्तलोक मिले । वर्णाश्रम गायन वेद धुनी । सबके पर आप बिराज मुनी ॥ ७ ॥
नव खण्ड विहंडन काल कले । ब्रह्मण्ड इकीस जु आप गले ॥ भय टारन हारसो आप आजै । तेहि कारन आतम राम भजै ॥ ८ ॥
उस कारण आप सदा अजयं । जग काम रू क्रोध सबै तजयं ॥ गजराज प्रचण्ड मतंग गजा । जहैं केहरि सावक आप सजा ॥ ९ ॥
(१४२)
कवीरपंथी—
असुरं मद मत्सर जो गजिहैं। तुव सींह आवाज सुनी भजिहैं॥ मन लोलुपता बहु दादुर जे। तेहि भक्षक पत्रग हो अँकजे १०॥
अब दीन दयाल कवीर गुरु। नित्य दीजिये प्रेम जो प्रीति करूं ॥ गुरु सागर नागर आप असे। परकाशक सो जग सूर जसे ॥ ११ ॥
गत रोग न दोष न मान मदं। अचलं अमलं सुखदं शुभदं। सिद्ध साधक हार रहे सगरे। पक्ष धुन्द धरे चकरार गरे ॥ १२ ॥
सुलतान नरेश अडे चरचा। बहुवार अनेक दिये परचा ॥ त्रिय रूप भये हग देखतही। उघरचो हियरा गुरु पेखतही १३॥
नृप साधु गये जग जानत हैं। गुरु ब्रह्म कवीरहि मानत हैं ॥ पवनं नभ तेज पृथ्वी रु जलं। सब खंडि आप सदा अचलं १४
शब्दादिक पंच विषय सबही। तेहि व्यापत नाहिं कदी कबही ॥ शरणागत पालक आप सुनो। अदमाँ पद दायन मान गुनो ॥ १५ ॥
महिमा बहु एक रसाय समं। वरणो कहि बात गुनी बचनं॥ कविता शुद्ध आप कृपा चरणं। जन आतमराम सो है शरणं १६
स्तोत्र सप्तक।
जै जै भवतारण भर्म निवारण हंस उबारण तव शरणं। शब्द विलासी अकह अविनाशी सत्य प्रकाशी भय हरणं ॥ १ ॥
निर्मल दयालं सार कृपालं आप विशालं अभय करणं। सतचित भावन रूप अजावन आतम पावन तेहि शरणं ॥ २ ॥
यह जिव अविनाशी ब्रह्म विलासी जगत प्रकाशी आप भये। आपहिं कीन्हा मति नहिं चीन्हा पंचमभिन्न सुरूप लगे ॥ ३ ॥
गुण आकर संगे चित मन रंगे चाल विहंगे भूल परे। विन रूप गुसाई अदल चलाई शून्य बसाई न्यार भये ॥ ४ ॥
शब्दावली
(१४३)
ते पहुचारी निगम पुकारी गाफिल धारी खार परे निराधार चहचलना वाके शरना भारजु धरनाभार परे ॥ ५ ॥
विनु निज पहिचाने हठ मत ठाने श्वान समाने मुदित फिरे । गुरु दीनो मति थीरा पायो चित थीरा आशा रतधीरा असर सरे ॥ ६ ॥
जो हंस पद न्यारा है निर्धारा अपरुपारा आप रहे ॥ सोई दीजै स्वामी निरभय नामी अनुभव गामी सुरतलहे ॥ ७ ॥
स्तोत्र अष्टक ।
भो कवीर हरण पीर धीर बुद्धि धारणं । सत्य नाम परम धाम सर्वं कर्न कारणं ॥१॥ हंस रूप परम भूप वेद विद्या सारनं । ज्ञान नीति अति अजीत ज्ञान बुद्धि धारणं ॥ २ ॥ सन्त रक्ष साधु पक्ष भक्ति मुक्ति तारनं । गुणातीत भयाभीत सर्वं सृष्टि पारणं ॥३॥ निराधार सत्याधार परम पार पारणं । प्रणतपाल अति दयाल काल जाल टारणं ॥ ४ ॥ दया सिन्धु क्षमा इन्दु श्वेत विन्दु शोभितं । शब्द रूप अति अनूप अमितरूप सारणं ॥ ५ ॥ अकह नाम त्वं अकाम मान हीन पालनं । पाप ताप दहन कृत तिहुँ ताप नाशनं ॥६॥ भावअतीत योग जीत हंसरूप कारणं । सत्यरूप गुरु स्वरूप शरणआगत तारणं ॥ ७ ॥ प्रगट प्रत्यक्ष अक्ष ज्ञानरूप साखिनं । सत्यनाम आदि पुरुष सर्वघट भाखिनं ॥ ८ ॥
साखी ।
सदगुरु पर जु प्रीति अति, सारासार विचार । सत्यनाम हंसा गहे, उतरे भवनिधि पार ॥
स्तोत्र । छन्द शिखरणी ।
विभुं सिन्धुं बुद्धेर्विमलवचसां शान्ति वरदं । निजानंदं स्वा- मिनं भवभयहरं स्वस्तिपददम् ॥ कवीरज्ञानां भू सुखदचरणं
(१४४)
कवीरपंथी-
भ्रातिदलनं । समीडेऽजं त्वाहं बहुजडमतिस्सर्वमुखदम् ॥ १ ॥ प्रभुं निष्ठं शोकं कठिनजनुषो मोहवहता । जनानां मृत्योश्च प्रचुर- रसुगुणं नष्टकुहकम् ॥ मनोमायादूरं सरल हृदयं भक्ति सुलभं । सतां कूर्तं प्रीतिं धूतनरतनुं मूर्तिं सदयम् ॥ २ ॥ स्वयं सिन्धुं नित्यं कलहरहितं मानप्रददं । प्रभो द्वे कंजाक्षं जलजवदनं वारि- जपदम् ॥ कृपासिन्धुं श्रीदे मुनिवरवरं निर्बलबलं । सदा शिष्यै- रुभैर्जगति बहुभिः सेवित इह ॥ ३ ॥ बुधैर्वन्धानिन्धं कुजन- पुरुषैश्चातिविमुखं । गुरुं गभातीतं प्रतिपुगभवं भक्तिसरम् ॥ महामोहं हर्तुं रविमिव भवे धर्मवपुषां । बहुग्रन्थैस्तीव्रैः परिहुत- मनस्संशयरिपुम् ॥ ४ ॥ त्रयस्तापं हन्तुं विधुमिव जनानां च सबलं । निरीहं गंभीरं सदयपुरुषस्थानपरमम् ॥ शुभासक्त्या युक्तं प्रकटयशसे सत्यसुकृतं । महातेजःपुंजं प्रसुलभपदं शुद्ध- मनसैः ॥ ५ ॥ चिदाकारं शुद्धं मुचिसुचिदुखपारखविभो।अजा- काशं शांतं किल भवजयं निर्भयपदम् ॥ महाकायं धीरं कलुष- दहनं चारुवचनं । मनश्चिंतायास्तत्तव पदगतानां च सुमते ॥ ६ ॥ परं शुद्धं धीरं स्वचित्तमहतां पादरजसो । मुद्रामेत्यं रम्यां परम- पदवीलब्धिकरणम् ॥ सुनीन्द्रं त्वं त्रातुं चरण सुगतान् वन्द्य- सकलं । समर्थः सर्वज्ञो भवजलनिधेहीनमनसः ॥ ७ ॥ स्तुति- दिव्या साध्वी भवतु महतां चित्तरमणी । सदेयं वा प्रीत्यै कलुष- दहिनी मोहदमनी ॥ कवीराख्या वाताहतकलिमलानाहिविमला । खलूत्कृष्णा रम्या जनहितकरी कण्ठमधुरा ॥ ८ ॥
नारायण छन्द ।
नमामि सर्वं लायकं, सुभक्तिं मुक्तिं दायकं । गुरुजी सन्त भायकं, सुशुद्धं ज्ञान नायकं ॥ १ ॥ निःकाम आप सुन्दरं, अकाम नाम मन्दरं । विभुं प्रकाश मासिकं, कामादि दुःखनाशिकं ॥ २ ॥
शब्दावली
(१४५)
भय प्रवाह वारणं, आपर पार तारणं । पुरान वेद गावितं, सो पार नाहि पावितं ॥ ३ ॥ सुज्ञान सन्त रूपही, परख प्रकाश भूपही । सुनीश ईश ईशही, हटाये काल पीसही ॥ ४ ॥ यही हमार वीनती, करिये आप गीनती । हुआ बहान जालही, कराल कालकालही ॥५॥ जन्मादि दुःखते अति, अधीर मोर चित्तही । सह्यो न जात मोहिसो, हिये जू पीर होतही ॥६॥ न कोई मोह जक्त मैं, न आश धन्यते कही । सुआश एक आपके, न दूसरी सहाइके ॥७॥ तूही सुजान आपही, मिटाइ देहु तापही । प्रभुजी तोहि छाड़िकै, दुजा न कोइ साथही ॥८॥ गुरु कवीर रंजनं, नमाभि दुःख भंजनं । करो सनाथ मोह आजु, शिशु तुम्हार जानिकै ॥९॥
स्तोत्र ।
कृपालं चित्त नंदनं, अज्ञान भेद खंडनं । सुश्रेष्ठ धर्म मण्डनं, दुःखीत जीव देखिकै ॥ १ ॥ अपार ज्ञान सागरं, प्रशांत चित्त आगरं । न राग द्वेष पासही, सुमुक्ति रूप राजही ॥ २ ॥ अना- थसा विचारिकै, कृपा जु मोहि कीजिये । अज्ञान मोह दाहिकै, चरण वास दीजिये ॥ ३ ॥ अनन्त बन्धनों करि, संयुक्त मोर चित्तही । छूटच्यो न जात मोहिसो, अनेक दुःख देतही ॥ ४ ॥ महा भवान्धि धारमें, विवै तरङ्ग मध्यमें । झकोरि मोरि चित्तको, बूडत हौं ना शुद्धमें ॥५॥ महान मोहि वेगमें, बहतहों जू नाथ मैं । स्वशिष्य बाल जानिकै, जू बाँह झालि लीजिये ॥६॥ आपै जू ऐसी कीजिये, सो पीर मोरि छीजिये । ना आप त्यागि और मैं, शरण चाहि लीजिये ॥७॥ दयाल गुरु आपही, परवाय भवतापही । करो निहाल पालि, तव दास दीन जनही ॥ ८ ॥
स्तोत्र—छन्द तोटक ।
परमं सदयं भवताप हरं, जन पीन महासुख बुन्द ददं । शरणागत पारंपार प्रभुं, गुरुदेवमंजं विमलं च भजे ॥ १ ॥