कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
शब्दावली
(४६३)
वेद किताब कीन्ह विस्तारा । फैल गैल मन अगम अपारा ॥५॥ चहुँ जुग भगत बांधल बाटी । समुझि न परी मोटरी फाटी ॥६॥ भैभै पृथ्वी चहुँ दिसि धावै । अस्थिर होय न औषध पावै ॥७॥ होय भिस्त जो चित न डोलावै । खसमहि छोड़ि दोजखको धावै ॥८॥ पूरुब दिशा हंस गति होई । है समीप सँधि बूझै कोई ॥९॥ भगता भगतिन कीन सिगारा । बूड़ि गयल सब माँझहिं धारा ॥ ५ ॥
सा०-विन गुरु ज्ञाने दुन्द भो, खसम कही मिलि बात । जुग जुग कहवैया कहै, काहु न मानी जात ॥ ५ ॥
छठी रमैनी ६ ॥
वर्णहुँ कौन रूप औ रेखा । दूसर कौन आहि जो देखा ॥१॥ ओ ओंकार आदि नहि बेदा । ताकर कहौ कौन कुल भेदा ॥२॥ नहि तारागण नहि रवि चंदा । नहि कछु होत पिताके बिदा ॥३॥ नहि जल नहि थल नहि थिर पवना । को धरै नाम हुकुम को बरना ॥ ४ ॥ नहि कछु होत दिवस अरु राती । ताकर कहहु कौन कुल जाती ॥ ५ ॥
सा०-शून्य सहज मन स्मृतिते, प्रकट भई यक ज्योति । बलिहारी ता पुरुष छवि, निरालंब जो होति ॥ ६ ॥
सातवी रमैनी ७ ।
जहिया होत पवन नहि पानी । तहिया सृष्टि कौन उत्पानी ॥ १ ॥ तहिया होत कली नहि फूला । तहिया होत गर्भ नहि मूला ॥ २ ॥ तहिया होत न विद्या वेदा । तहिया होत शब्द नहि खेदा ॥ ३ ॥ तहिया होत पिंड नहि बासू । ना धर धरणि न गगन अकासू ॥ ४ ॥ तहिया होत गुरु नहि चेला । गम्य अगम्य न पंथ दुहेला ॥ ५ ॥
(४६४)
कवीरपंथी-
सा०-अविगतिकी गति का कहौं, जाके गाँव न ठाँव । गुण विहीना पेखना, का कहि लीजै नाँउ ॥ ७ ॥
आठवीं रसनी । (बेदांत विचार) ८ ।
तत्त्व मसी इनके उपदेशा । ई उपनिषद कहै संदेशा ॥ १ ॥ ऊ निश्चय उनके बड़ भारी । वाहिको वर्ण करे अधिकारी ॥२॥ परमतत्त्वका निज परमाना । सनकादिक नारद सुख माना ॥३॥ याज्ञवल्क्य औ जनक संवादा । दत्तात्रय वहे रसस्वादा ॥४॥ वहे वसिष्ठ राम मिलि गाई । वहे कृष्ण ऊधव ससुझाई ॥५॥ वहे बात जो जनक दिढाई । देहै धरे विदेह कहाई ॥ ८ ॥
सा०-कुल अभिमाना खोयकै, जियत सुवा नहि होय । देखत जो नहि देखिया, अदृष्ट कहावै सोय ॥ ८ ॥
नवीं रसनी ९ ।
बांधे अष्ट कष्ट नौ सुता । यम बांधे अंजनिके पूता ॥ १ ॥ यमके बाहन बांधिनि जनी । बांधे सृष्टि कहालौं गनी ॥२॥ बांधे व तेंतीस करोरी । सुमिरत बँदि लोह गौ तोरी ॥३॥ राजा सुमिरैदे तुरिया चढी । पंथी सुमिरि नाम ले बढी ॥ ४ ॥ अर्थ बिहीना सुमिरे नारी । परजा सुमिरे पुहुमी झारी ॥ ९ ॥
सा०-बँदि मनाय फल पावहीं, बँदि दिया सो देव ।
कह कवीर ते ऊबरे, निसि दिन नामहि लेव ॥ ९ ॥
रसनी दशवीं १० ।
राही ले पिपराही बही । करगी आवत काहु न कही ॥ आई करगी भो अजगूता । जन्म जन्म जम पहिरे बूता ॥ बूता पहिर जम करे पयाना । तीन लोकमें कीन्ह समाना ॥ बांधेउ ब्रह्मा विष्णु महेश्वर । सुर नर सुनि औ बांध गणेश्वर ॥ बांधे पवन पावक औ नीरू । चन्द्र सूर बांधे दोउ बीरू ॥ सांच मंत्र बांधे सब झारी । अमृत वस्तु न जाने नारी ॥
शब्दावली
(४६५)
सा०-अमृत वस्तु जाने नहीं, मगन भये कित लोय । कहहि कवीर कामो नहीं, जीवहिं मरण न होय ॥११॥
रत्नो ग्यारहवीं ११ ।
आंधरी गुष्ठि सृष्टि भई बौरी । तीन लोक महाँ लागि ठगौरी ॥ ब्रह्महिं ठग्यो नाग संहारी । देवन सहित ठग्यो त्रिपुरारी ॥ राज ठगौरी विष्णुहिं परी । चौदह भुवन केर चौधरी ॥ आदि अन्त जेहि काहु न जानी । ताको डर तुम काहेक मानी ॥ ऊ उतंग तुम जाति पतंगा । यम घर किहेउ जीवको संगा ॥ नीम कीट जस नीम पियारा । विषको अमृत (मान) कहत गवारा ॥ विषके संग कौन गुण होई । किंचित लाभ मूल गौ खोई ॥ विष अमृत गौ एकै सानी । जिन जाना तिन विष के मानी ॥ कंहा भये नर सुय बेसुद्धा । बिन परचय जग बूढ़ न बुद्धा ॥ मतिके हीन कौन गुण कहई । लालच लागे आशा रहई ॥
सा०-भुवा है मरी जाहुगे, भुये कि बाजी ढोल ।
स्वप्न सनेही जग भया, सहिदानी रहिगो बोल ॥ ११ ॥
रत्नो नारहवीं १२ ।
माटिक कोट पषानक ताला । सोई बन सोई रखवाला ॥ सो बन देखत जीव डेराना । ब्राह्मण वैष्णव एक करि जाना ॥ (जोरी) ज्यों किसान किसानी करई । उपजे खेत बीज नहिं परई ॥ छाड़ि देहु नर झोलिक झेला । बूड़े दोऊ गुरु औ चेला ॥ तीसर बूड़े पारथभाई । जिन बन दाहे दवा लगाई ॥ भूंकि भूंकि कूकर मरि गयऊ । काज न एक सियारसे भयऊ ॥
साखी-मूस विलारी एक संग, कहु कैसे रहि जाय ।
अचरज यक देखो हो सन्तो, हस्ती सिंहहि खाय ॥१२॥
१ कहां भये नल स्रक्ष बेस्रक्ष । बिन परिचय जग मूढ न बूझा ॥
(४६६)
कवीरपंथी—
रमनी तेरहवीं १३ ॥
नहिं परतीति जो यह संसारा । द्रव्यक चोट कठिन को मारा ॥ सो तो शेषै जाय लुकाई । काहूके परतीति न आई ॥ चले लोग सब मूल गँवाई । यमकी बाढ़ि काटि नहिं जाई ॥ आजु काज जिय काल्हि अकाजा । चले लादि दिरगंतर राजा ॥ सहज बिचारत मूल गँवाई । लाभ ते हानि होय रे भाई ॥ ओछी मती चन्द्र गो अथई । त्रिकुटी संगम स्वामी बसई ॥ तबहीं विष्णु कहा समुझाई । मैथुन अष्ट तुम जीतहु जाई ॥ तब सनकादिक तत्त्व बिचारा । जैसे रंक धन पाव अपारा ॥ भौ मय्यादि बहुत सुख लाग। यहि लेखे सब संशय भागा ॥ देखत उत्पति लागु न बारा । एक मरे यक करै विचारा ॥ सुये गयेकी काहु न कही । झूठी आश लागि जग रही ॥
सा०-जरत जरतसे बाचहू, काहे न करहु गोहार ।
विष विष्याकै खायहू, राति दिवस मिलि झारि ॥ १३ ॥
रमनी चौदहवीं १४ ।
बड सो पापी आहि गुमानी । पाखण्ड रूप छल्यो नर जानी ॥ बावन रूप छल्यो वलि राजा । ब्राह्मण कीन्ह कौनको काजा ॥ ब्राह्मणही सब कीन्हो चोरी । ब्राह्मणही को लागी खोरी ॥ ब्राह्मण कीन्हो वेद ( ग्रन्थ ) पुराना । कैसेहु कै मोहि मानुष जाना ॥ यकसे ब्रह्महि पंथ चलाया । यकसे हंस गोपालहिं गाया ॥ यकसे शम्भू पंथ चलाया । यकसे भूत प्रेत मन लाया ॥ यकसे पूजा जैन विचारा । एकसे निहुरि निमाज गुजारा ॥ कोइ काहुको हटा न माना । झूठा खसम कविर न जाना ॥ तन मन भजि रहू मोरे भगता । सत्य कवीर सत्य है वक्ता ॥ आपुहि देव आपुही पाती । आपुहि कुल आपुहि है जाती ॥ सर्व भूत संसार निवासी ।
शब्दावली
(४६७)
आपुहि खसम आप सुखरासो ॥ कहते मोहि भयल युगचारी । काके आगे कहौं पुकारी ॥
सा०-सांचे कोइ न मानई, झूठेके संग जाय ।
झूठे झूठा मिलि रहा, अहमक खेहा खाय ॥ १४ ॥
रमैनी फन्तहवीं १५ ॥
उनई बदरिया परिगौ सँझा । अगुवा भूले बन खंड मंझा ॥ पिय अन्ते धन अन्ते रहई । चौपरि कामरि माथे गहई ॥
सा०-कुलवा भार न ले सकै, कहै सखिनसों रोऽ ।
ज्यों २ भौजै कामरी, त्यों २ भारी होइ ॥ १५ ॥
रमैनी सोलहवीं १६ ॥
चलत चलत अति चरण पिराने । हारि परे तहँ अति खिसि- याने ॥ गण गन्धर्व मुनि अन्त न पाया । हरि अलोप जग धन्धे लाया ॥ गहनी बन्धन बंध न सूझा । थाकि परे तहँ कछुन न बूझा ॥ भूलि परे तब अधिक डेराई । रजनी अंध कूप है जाई ॥ माया मोह उहां भर भूरी । दादुर दामिनि पवनहु पूरी ॥ वरवै तपै अखंडित धारा । रौने भयावनि कछु न अधारा ॥
सा०-सबै लोग जहँ डाइया, अन्धा सबै भुलान ।
कहा कोइ नहि मानही, (सब) एकै माहि समान ॥ १६ ॥
रमैनी सत्रहवीं १७ ॥
जस जीव आपु मिलै अस कोई । बहुत धर्म सुख हृदया होई ॥ जासुं बात रामकी कही । प्रीति न काहुसों निर्वही ॥ एकै भाव सकल जग देखी । बाहर परे सो होय विवेखी ॥ विषय मोहके फंद छोड़ाई । जहां जाय तहँ काटु कसाई ॥ है कसाई छूरी हाथा । कैसेहु आवै काटों माथा ॥ मानुष बड़े बड़े है आये । एकै पंडित सबै पढाये ॥ पढ़ना पढ़उ धरहु जनि गोई । नहिं तो निश्चय जाहु विगोई ॥
(४६८)
कवीरपंथी—
सा०—सुमिरन करहु रामको, छाडहु दुखकी आस । तर ऊपर धरि चापि है, जस कोल्हू कोटि पचास ॥१७॥
रमैनी मठारहवीं १८ ॥
अद्वुत पंथ बरणि नहिं जाई । भूले राम भूली दुनिआई ॥ जो चेतहु तो चेतु रे भाई । नहिं तो जीव यमै ले जाई ॥ शब्द न माने कथै विज्ञाना । ताते यम दीन्हों है थाना ॥ संशय सावज बसै शरीरा । ते खायल अनवेधल हीरा ॥
सा०—संशय सावज शरीरमें, संगहि खेले जुहारि । ऐसा घायल बापुरा, जीवन मारे झारि ॥१८॥
रमैनी उन्नीसवीं १९ ॥
अनहद अनुभवकी करि आशा । देखो यह बिपरीति तमाशा ॥ इहै तमाशा देखहु भाई । जहाँ है शुन्य तहाँ चलि जाई ॥ शुन्यहि बाँछा शुन्यहिं गयऊ । हाथा छोड़ि बे हाथा भयऊ ॥ संशय सावज सब संसारा । काल अहेरी साँझ सकारा ॥
सा०—सुमिरण करहु रामको, काल गहे है केश । ना जानों कब मारिहै, क्या घर क्या परदेश ॥१९॥
रमैनी बीसवीं २० ॥
अब कहु राम नाम अविनासी । हरि तजि जियरा कतहु न जासी ॥ जहाँ जाहु तहैं होहु पतंगा । अब जनि जरहु समुझि बिष संग ॥ राम नाम लौलाय सो लीन्हा । भुङ्गी कीट समुझि मन दीन्हा ॥ भौ अति गुरुवा दुख के भारी । करु जिय जतन सो देखु विचारी ॥ मनकी बात है लहरि विकारा । तोहि नहिं सूझे वार न पारा ॥
सा०—इच्छाके भव सागरे, वोहित राम अधार । कहैं कवीर हरि शरण गहु, गो बछ सुर विस्तार ॥२०॥
रमैनी इक्कीसवीं २१ ॥
(७५२)
बहुत दुखै है दुखकी खानी । तब बचिहौ जब रामहि जानी ॥ रामहि जान युक्ति जो चलई । युक्तिहिं ते फंदा नहिं परई ॥ युक्तिहि युक्ति चलत संसारा । निश्चै कहा न मानु हमारा ॥ कनक कामिनी घोर पटोरा । संपति बहुत रहै दिन थोरा ॥ थोरी संपति गौ बौराई । धर्म रामकी खबरि न पाई ॥ देखि त्रास सुख गौ कुम्हिलाई । अमृत धोखे गो विष खाई ॥
सा०- मैं सिरजों मैं मारहुं, मैं जारी मैं खाँव ।
जल थल मैही रमि रहौं, मोर निरंजन नाँव ॥ २१ ॥
रमैनी बाईसवीं २२ ॥
अलख निरंजन लखै न कोई । जेहि बंधे बंधा सब लोई ॥ जेहि झूठे सब बाँधु अयाना । झूठी बात साँचकै माना ॥ धंधा बंधा कीन व्यवहारा । कर्म विर्वर्जत बसे निनारा ॥ षट आश्रम षट दर्शन कीन्हा । षटरस वस्तु खोट सब चीन्हा ॥ चारि वृक्ष छौ शाख बखाने । विद्या अगणित गने न जाने ॥ औरो आगम करे बिचारा । तेहि नहिं सुझे वार न पारा ॥ जप तीरथ व्रत कीजै पूजा । दान पुण्य कीजै बहु दूजा ॥
सा०-मन्दिर तो है नेहका, मत कोइ पैठे धाय ।
जो कोइ पैठे धायके, बिन शिर सेती जाय ॥ २२ ॥
रमैनी तेईसवीं २३ ॥
अरुप सुख दुख आदिहु अंता । मन भुलान मैगर मैं मंता ॥ सुख विसराय मुक्ति कहैं पावै । परिहरि साँच झूठ निज धावै ॥ अनल ज्योति डाहे यक संगा । नयन नेह जस जरे पतंगा ॥ करहु विचार जेहि दुख जाई । परि हरि झूठा केर सगाई ॥ लालच लागे जन्म सिराई । जग मरन नियरायल आई ॥
१ जप तीरथ पूजे व्रत भूता । दान औ पुण्य किये बहूता ॥
(४७०)
कबीररंथी-
सा०-भरमकी बांधा ई जगत, यहि विधि आवे जाय । मानुष जन्महिं पाय नर, काहेको जहँडाय ॥२३॥
रमैनी चौबीसवीं २४ ॥
चन्द चकोर अस बात जनाई । मानुष बुद्धि दीन पलटाई ॥ चारि अवस्था सपना कहई । झूठो फुरे जानत रहई ॥ मिथ्या बात न जाने कोई । यही विधि सिगरे गैल विगोई ॥ आगे दैदै सबन गँवाया । मानुष बुद्धि न स्वपनेहु पाया ॥ चौतिस अक्षर सो निकले जोई । पाप पुण्य जानेगा सोई ॥
सा०-सोइ कहंते सोइ होहुगे, निकरि न बाहर आव । हो हजूर ठाढे कहौं, कयों धोखे जन्म गवाव ॥२४॥
रमैनी पचीसवीं २५ ॥
चौतिस अक्षरका यही विशेषा । सहसरो नाम यहीमें देखा ॥ भूलि भटक नर फिर घट आयो । होय अजान सो सभन गँवायो ॥ खोजहिं ब्रह्मा विष्णु शिव शक्ती । अनंत लोक खोजहिं शिव भगती ॥ खोजहिं गण गंधर्व सुनि देवा । अनंत लोक खोजहिं बहु भेवा ॥
सा०-यती सती सब खोजहीं, मनै न मानै हार । बड़े बड़े बीर बाँचे नहीं, कहहिं कवीर पुकार ॥२५॥
रमैनी छब्बीसवीं ॥ २६ ॥
आपुहि कर्तारा भय करतारा । ( कुलाला ) बहु विधि वासन गढे कुम्हारा ॥ विधिना सबै कीन यक ठाऊँ । अनेक यतनके बनक बनाऊँ ॥ जठर अग्नि मह दिये प्रजाली । तामहँ आपु भये प्रतिपाली ॥ बहुत यतनके बाहर आया । तब शिवशक्ती नाम घराया ॥ घरका सुत जो होय अयाना । ताके संग न जाहि सयाना ॥ साँची बात कहौं मैं अपनी । भया दिवाना औरकी सपनी ॥ गुप्त प्रगट है एके सुदरा । काको कहिये ब्राह्मण सुदरा ॥ झूठे गर्व भूलौ मति कोई । हिन्दू तुरुक झूठ कुल दोई ॥
शब्दावली
(४७१)
सा०-जिन्ह यह चित्र बनाइया, साँचा सो सूत्रधार । कह कवीर ते जन भले, चित्रवंतहि लेहि विचार ॥ २६ ॥
रमनी सताईसवीं २७ ॥
ब्रह्माको दीन्हो ब्रह्मण्डा । सात द्वीप पुहुमी नौ खण्डा ॥ सत्य सत्य कहि विष्णु दृढाई । तीन लोक मई राखिनि जाई ॥ लिंग रूप तब शंकर कीन्हहा । धरती कील रसातल दीन्हहा ॥ तब अष्टंगी रची कुमारी । तीन लोक मोहा सब झारी ॥ दुतिया नाम पार्वती भयऊ । तप करता शंकरको दयऊ ॥ एकै पुरुष एक है नारी । ताते रचनि खानि भौ चारी ॥ शर्मन वर्मन देवो दासा । रज सत तम गुण धरणि अकाशा ॥ २७ ॥
सा०-एक अण्ड ओंकार ते, सब जग भयो पसार ।
कहहि कवीर सब नारिरामकी, अविचल पुरुष भतार ॥ २७ ॥
रमनी अठ्ठाईसवीं २८ ॥
अस जोलहाका मर्म न जाना । जिन जग आइ पसारल ताना ॥ धरति अकाश दोऊ गाड बनाई । चंद्र सूर दुइ नरा भराई ॥ सहस तार लै पूरिन पूरी । अजहू विनय कठिन है दूरी ॥ कहहि कवीर करम सों जोरी । सूत कुसूत बिने भल कोरी ॥ २८ ॥
रमनी उन्तौसवीं २९ ॥
वज्रहुते त्रिन छनमें होई । त्रिने वज्र करै पुनि सोई ॥ निझरू नरू जानि परिहरई । कर्मक बांधा लालच करई ॥ कर्म धर्म बुद्धि मति परिहरिया । झूठा नाम साँचलै धरिया ॥ रजगति त्रिविधि कीन्ह परगासा । कर्म धर्म बुधिकेर विनाशा ॥ रविके उदय तारा भौ छीना । चर बेहर दोनोमें लीना ॥ विषके खाये विष नहिं जावै । गारुड सो जो मरत जिआवै ॥
सा०-अलख जो लागी पलकमें, पलकहिमें ढसि जाय ।
विषहर मंत्र न मानई, गारुड काह कराय ॥ २९ ॥
(४७२)
कवीरपंथी—
रमैनी तीसवीं ॥ ३० ॥
औ भूले षष्ठ दरशन भाई । पाखण्ड भेष रहा लपटाई ॥ जीव शीवका आयन सोना । चांरिउ वेद चतुर्गुण मौना ॥ जैनी धर्मक मर्म न जाना । पाती तोरि देव घर आना ॥ दवना मरूआ चम्पा फूला । मानो जीव कोटि समतूला ॥ औ पृथ्वीको रोम उचारे । देखत जन्म आपनो हारे ॥ मनमथ बिंदु करे असरारा । कलपे बिन्दु खसैं नहिं द्वारा ॥ ताका हाल होय अघकूचा । छौ दरसनमें जैन विगूचा ॥
सा०—ज्ञान अमर पद बाहिरे, नियरे ते है दूरि । जो जाने तेहि निकट है, रह्यो सकल घट पूरि ॥३०॥
रमैनी इकतीसवीं ३१ ॥
सुम्रिति आहि गुणनको चीन्हा । पाप पुण्यको मारग लीन्हा ॥ सुम्रिति वेद पढै असरारा । पाखण्ड रूप करै हंकारा ॥ पढै वेद ओ करै बड़ाई । संशय गांठि अजहुं नहिं जाई ॥ पढिकै शास्त्र जीव बध करई । मूढ़ि काटि अगमनकै धरई ॥
सा०—कहहि कवीर पाखण्डते, बहुतक जीव सताय ।
अनुभव भाव न दर्शई, जियत न आपु लखाय ॥३१॥
रमैनी बत्तीसवीं ॥ ३२ ॥
अंध सो दर्पण वेद पुराना । दरबी कहा महारस जाना ॥ जस खर चंदन लादे भारा । परिमल बास न जानु गँवारा ॥ कहहि कवीर खोजै अस्माना । सो न मिला जो जाय अभिमाना ॥३२॥
रमैनी तैतीसवीं ॥ ३३ ॥
वेदकी पुत्री स्मृति भाई । सो जेवरि करि लेतै आई ॥ आपुहि बरी आपु गर बन्धा । झूठी मोह कालको धंधा ॥ बंधवत बंधा छोरि नहिं जाई । विषय स्वरूप भूलि दुनियाई ॥ हमरे लखत
१ चारोबद्ध चतुर्गुण मौना ।
शब्दावली
(४७३)
सकल जग लूटा । दास कवीर राम कहि छूटा ॥
सा०-रामहि राम पुकारते, जिभ्या परिगौ रौम ।
मुधाजल पीवे नहीं, खोद पियनकी होस ॥ ३३ ॥
रमैनी चौतीसवीं ३४ ॥
पढि पढि पंडित करहु चतुराई । निज सुक्तिहि मोहि कहु समुझाई ॥ कहां बसे पुरुष कवन सो गाऊँ । सो मोहि पण्डित सुनावहु नाऊँ ॥ चारि वेद ब्रह्मे निज ठाना । सुक्तिक मर्म उन्हीं नहि जाना ॥ दान पुत्र उन बहुत बखाना । अपने मरनकी खबरि न जाना ॥ एक नाम है अगम गँभीरा । तहवाँ अस्थिर दास कवीरा ॥
सा०-चिउटी जहां न चढि सके, राई नहि ठहराय ।
आवागमनकी गम नहीं, तहँ सकलो जग जाय ॥ ३४ ॥
रमैनी पैंतीसवीं ३५ ॥
पंडित भूले पढि गुणि वेदा । आपु अपनपौ जानु न भेदा ॥ संध्या तर्पण औ षट कर्मा । ई बहु रूप करहि अस धर्मा ॥ गायत्री युग चारि पढाई । पूछहु जाय सुक्ति किन पाई ॥ औरके छुये लेतहौ सींचा । तुमते कहहु कौन है नीचा ॥ ई गुण गर्व करो अधिकाई । अतिके गर्ब न होय भलाई ॥ जासु नाम है गर्व प्रहारी । सो कस गर्वहि सके संहारी ॥
सा०-कुल मर्यादा खोइकै, खोजिनि पद निर्वान ।
अंकुर बीज नशाइकै, भये विदेही थान ॥ ३६ ॥
रमैनी छत्तीसवीं ३६ ॥
ज्ञानी चतुर विचच्छण लोई । एक स्यान स्यान न होई ॥ दूसर स्यानको मर्म न जाना । उत्पति परलय रैनि विहाना ॥ बानिज एक सबन मिलि ठाना । नेम धर्म संजम भगवाना ॥ हरि अस ठाकुर तज्यो न जाई । बालन भिस्ति गांव दुलहाई ॥
( ४७४ )
कवीरपंथी-
सा०-ते नर मरिके कहाँ गये, जिन दिन्हा गुर घोटि । राम नाम निज जानिकै, छाडहु बस्तू खोटि ॥३६॥
रमनी संतोषवी ३७ ॥
एक सयान सयान न होई । दूसर स्यान न जाने कोई ॥ तीसर सयान सयाने खाई । चौथ सयान तहाँ ले जाई ॥ पँचये सयान न जाने कोई । छठये महाँ सब गये विगोई ॥ सतये सयान जो जानहु भाई । लोक वेदमें देहु देखाई ॥
सा०-बीजक बतावै बितको, जो बित गुता होय । शब्द बतावै जीवको, बूझे विरला होय ॥३७॥
रमनी अदतीसवी ३८ ॥
यहि विधि कहाँ कहा नहि माना । मार्ग मांहि पसारिनि ताना ॥ राति दिवस मिलि जोरिनि तागा । ओटत कातत भर्म न भागा ॥ भर्म सब घट रह्यो समाई । भर्म छाडि कतहुँ नहिं जाई ॥ परै न पूरि दिनौ दिन छीना । तहाँ जाय जहाँ अंग विहीना ॥ जो मति आदि अन्त चलि आया । सो मति उन सब प्रगट सुनाया ॥
सा०-वहै संदेश फुर मानिकै, लीन्हो सीस चढाय । संतो है संतोष सुख, रहहु हृदय जुडाय ॥३८॥
रमनी उत्तालीसवी ३९ ॥
जिन्ह कलमां कलि माह पढाया । कुदरत खोज तिन्हुँ नहिं पाया ॥ करमत कर्म करै करतूती । वेद किताब भया सब रीती ॥ करमत सो जो गर्भ औतरिया । करंमत सो निमाज गुजरिया ॥ करमत सुन्नति और जनेऊ । हिन्दू तुरुक न जाने भेऊ ॥
सा०-पानी पवन संजोयकै, राचयाई उत्पात । शून्यहि सुरति समानिया, कासों कहिये जात ॥३९॥
१ करमत सो जो नामहि धरिया ।
शब्दावली
(४७५)
रमैनी चालीसवीं ४० ॥
आदम आदि सुद्धि नहिं पाईं । मामा हउआ कहांते आईं ॥ तब नहिं होते तुरुक औ हिन्दू । मायाके रुधिर पिताके बिन्दू ॥ तब नहिं होते गाय कसाई । तब विस मिल्लाः किन फरमाईं ॥ तब नहिं रह्यो कुल औ जाती । दोजरव भिस्त कहां उतपाती ॥ मन मसलेकी खबरि न जाने । मति मुलान दोइ दीन बखाने ॥
सा०-संयोगेका गुण रवे, विन योगे गुण जाय ।
जिभ्या स्वादके कारणे, कीन्हे बहुत उपाय ॥ ४० ॥
रमैनी इकतालीसवीं ४१ ॥
अम्की रासि ससुद्रकी खाई । रवि मसि कोटि तैंतीसौ भाई ॥ भैवर जालमें आसन माडा । चाहत सुख दुख संग न छाडा ॥ दुखको मर्म काहु नहिं पाया । बहुत भांतिके जग भर्माया ॥ ( बौराया ) ॥ आपुहि बाउर आपु सयाना । हृदय बसत राम नहिं जाना ॥
सा०-तेई हरि तेइ ठाकुरा, तेई हरिके दास ।
न जम भया न जामनी, भामिनी चली निरास ॥ ४१ ॥
रमैनी बयालीसवीं ४२ ॥
जब हम रहल रहा नहिं कोई । हमरे माँहिं रहल सब कोई ॥ कहहु हो राम कौन तोरि सेवा । सो ससुझाय कहौ मोहि देवा ॥ फुर फुर कहउँ मारु सब कोई । झूठेहि झूठा संगति होई ॥ आंधर कहे सबै हम देखा । तहें दिठियार बैठि सुख पेखा ॥ यहि विधि कहौ मालु जो कोई । जस सुख तस जो हृदया होई ॥ कहहि कवीर हंस मुसकाई । हँमरे कहल दुष्ट बहु भाई ॥ ४२ ॥
रमैनी तैंतालसीवीं ॥ ४३ ॥
जिन्ह जिव कीन्ह आपु विश्वासा । नरक गये ते नरकहिं बासा ॥ आवत जात न लागहि बारा । काल अहेरी साँझ सकारा ॥
१ मुस्ताई । २ हमरे कहल छुठिही भाई ।
( ४७६ )
कवीरपंथी—
चौदह विद्या पढि समुझावै । अपने मरनकी खबर न पावै ॥ जाने जिवको परा अंदेसा । झूठहि आनिकै कहा संदेसा ॥ संगति छोडि करै अस रागा । उब है मोट नरक कर भारा ॥ ४३ ॥
सा०—गुरु द्रोही औ मन सुखी, नारि पुरुष विचार ।
ते नर चौरासी अप्रि है, जौलौ शशि दिनकार ॥ ४३ ॥
रमैनी चौवालीसवी ॥ ४४ ॥
कबहुँ न भये संग औ साथा । ऐसो जन्म गँवाये हाथा ॥ बहुरि न पैहौ ऐसो थाना । साधु संग तुम नहिं पहिचाना ॥ अब तोर होइ नरकमें बासा । निस्त्र दिन बसे लबारके पास ॥ ४४ ॥
सा०—जात सबन कहैं देखिया, कहहिं कवीर पुकार ।
चेतवाहोहु तो चेतिले, दिवस परत है धार ॥ ४४ ॥
रमैनी पैतालीसवी ॥ ४५ ॥
हिरण्यकुश रावण गौ कंसा । कृष्ण गये सुर नर मुनि बंसा ॥ ब्रह्मा गये मरम नहिं जाना । बड सब गये जो रहे सयाना ॥ समुझि परी नहिं राम कहानी । निरबक दूध कि सरबक पानी ॥ रहिगौ पंथ थकित भौ पवना । दशो दिशा उजारि भौ गवना ॥ मीन जाल भौ इ संसारा । लोहकि नाव पषानको भारा ॥ खेवे सबै मरम नहिं जाना । तहिबो कहै रहै उतराना ॥ ४५ ॥
सा०—मछरी मुख जस केंचुवा, मुखवन मुँह गिरदान ।
सर्पन मुँह गहेजुवा, जात सबनको जान ॥ ४५ ॥
रमैनी छयालीसवी ॥ ४६ ॥
विनसै नाग गरुड गलि जाई । विनसै कपटी औ सतभाई ॥ विनसे पाप पुण्य जिन्ह कीन्हा । विनसे गुन निर्गुन जिन चीन्हा ॥ विनसे अग्नि पवन औ पानी । विनसे सूछि कहाँ लौ गानी ॥ विष्णु लोक विनसे छन माहीं । हौ देखा परलैकी छाँही ॥ ४६ ॥
सा०—मछ रूप माया भई, यमरा खेलै अहेर ।
इहिर ब्रह्म न उबरे, सर नर मुनि केहि केर ॥ ४६ ॥
शब्दावली
(४७७)
रमैनी संतालीसर्वो ॥ ४७ ॥
जरासिंधु शिशुपाल संहारा । सहस्राञ्जै छल सो मारा ॥ बड छल रावन सो गौ वीती । लंका रही कंचनकी भीती ॥ दुयोंधन अभिमानहिं गयऊ । पांडव केर मरम नहिं पयऊ ॥ मायाके दम्भ गैल सब राजा । उत्तम मध्यम बाजन बाजा ॥ छौ चकवे सब धरनि समाना । एको जीव परतीति न माना ॥ कहाँ लौ कहौ अचेते गयऊ । चेत अचेत झगर एक भयऊ ॥ ४७ ॥
सा०-ई माया जग मोहिनी, मोहिंसि सब जग धाय ।
हरिचंद्र सतके कारने, घर घर गये बिकाय ॥४७॥
रमैनी अडतालीसर्वो ॥ ४८ ॥
मानिक पुरहि कवीर बसेरी । महति सुनी शेख तक्रि केरी ॥ ऊजे सुनी जमन पुर धामा । झूसी सुनी पिरनको नामा ॥ इकइस पीर लिखै तेहि ठामा । खतमा पढै पैगम्बर नामा ॥ सुनी बोल मोहि रहा न जाई । देखि सुकरवा रहे भुलाई ॥ हवीव औ नबीको कामा । जहांलों अमल सो सबै हरामा ॥ ४८ ॥
सा०-शेख अकरदी शेख सकरदी, मानो बचन हमार ।
आदि अन्त औ जुगहि जुग देखहु दृष्टि पसार ॥४८॥
रमैनी उन्चासर्वो ॥ ४९ ॥
दूरकी बात कहौ दवैसा । बादसाह है कौने भेसा ॥ कहाँ कूच कहां करे सुकामा । कौन सुरतिको करो सलामा ॥ मैं तोहि पूछों सुसलमाना । लाल जूद की नाना बाना ॥ काजी काज करो तुम कैसा । घर घर जवह करावौ भैसा ॥ बकरी मुर्गी किन फुरमाया । किसके कहे तुम छूरी चलाया ॥ दर्द न जानै पीर कहावै । बैता पठि पठि जग भर्मावै ॥ कह कवीर यक सय्यद कहावै । आप सरीखा जग कबुलावै ॥ ४९ ॥
सा०-दिनभर रोजा रहत है, रात हनत है गाय ।
यह खून वह बन्दगी, क्यों कर खुशी खोदाय ॥ ४९ ॥
(४७८)
कबीरपंथी—
रमैनी पद्मासवी ५० ॥
कह इत मोहिं भयल जुग चारी । समझत नाहीं मोहि सुत नारी ॥ बंस आग लगी बंसै जरिया । अम भुलाय नर धंघे परि्या ॥ हस्तीके फन्दे हस्ती रहई । मृगीके फन्दे मृगा परई ॥ लोहै लोह काटु जस आना । तियाके तत्व तिया पहिचाना ॥५०॥
सा०—नारि रचंते पुरुष है, पुरुष रचंते नारि ।
पुरुषहि पुरुषा जो रचे, ते बिरले संसार ॥ ५० ॥
रमैनी इत्यावनवी ॥ ५१ ॥
जाकर नाम अकहुआ भाई । ताकर कहा रमैनी गाई ॥ कहैको तातपर्य है ऐसा । जस पंथी वोहित चढि वैसा ॥ है कछु रहनि गहनिकी बाता । बैठा रहै चला पुनि जाता ॥ रहै बदन नहिं स्वांग सुभाऊ । मन अस्थिर नहिं बीलै काऊ ॥ ५१ ॥
सा०—तन रहते मन जात है, मन रहते तन जाय ।
तन मन एकै है रहै, हंस कवीर कहाय ॥ ५१ ॥
रमैनी वावनवी ५२ ॥
जेहि कारन शिव अजहुँ वियोगी । अंग बिभूति लायभै जोगी ॥ सेष सहस मुख पार न पावै । सो अब खसम सहित समुझावै ॥ ऐसी विधि जो मो कहँ धावै । छठयें मास दरस जो पावै ॥ कौनेहु भांति दिखाई देऊँ । गुप्तहि रहौं सुभाव सब लेऊँ ॥५२॥
सा०—कहहिं कवीर पुकारिके, सबका उहै हवाल ।
कहा हमार मानै नहीं, किमि छूटै भ्रमजाल ॥ ५२ ॥
रमैनी तिरपनवी ५३ ॥
महादेव मुनि अन्त न पाया । उमा सहित उन जन्म गंवाया ॥ उनहुते सिद्ध साधक होई । मन निश्चै कहु कैसे कोई ॥ जब लग तनयै आहै सोई । तब लग चेत न देखो कोई ॥ तब चेतिहो जब तजिहो प्राना । भया अन्त तब मन पछताना ॥ इतना सुनत निकट चलि आई । मनके विकार न छूटे भाई ॥
१ उनसे सिद्ध साधक नहिं कोई । मन निश्चय कहु कैसे होई ।
शब्दावली
(४७९)
सा०-तीनलोक मुआ कौआयके, छुटि न काहुकी आस । यक अंधरे जग खाइया, सब जग भया विनास ॥५३॥
रमनी चौवनवी ५४ ॥
मरिगो ब्रह्मा काशीके वासी । शिव सहित मुये अविनाशी ॥ मथुरा मरिगो कृष्ण गुवारा । मरि मरि गये दसो अवतारा ॥ मरि मरि गये भगति जिन ठानी । सर्गुण मां जिन दुर्गुण आनी ॥
सा०-नाथ मछंदर बांचे नहीं, गोरखदत्त औ व्यास ।
कहहि कवीर पुकारिके, परे कालके फांस ॥५४॥
रमनी पचपनवी ५५ ॥
गये राम औ गये लछमना । संग न गई सीता असधना ॥ जात कौरवन लागु न वारा । गये भोज जिन्ह साजल धारा ॥ गये पांडव कुंतीसी रानी । गये सहदेव जिन्ह बुद्धि मति ठानी ॥ सर्व सोनकी लंक बनाई (उठाई) । चलत बार कछु संग न लाई ॥ कुरिया जासु अंतरिक्ष छाई । सो हरिश्चन्द्र देखि नहीं जाई ॥ मूरख मानुष अधिक सँजोवै । अपने सुवल और लगि रोवै ॥ ई न जाने अपनो मरि जैवे । टकादश विठै और ले खेवै ॥
सा०-अपनी अपनी करिगये, लगी न काहुकी साथ ।
अपनी करिगये रावणा, अपनी दशरथ नाथ ॥५५॥
रमनी छप्पनवी ५६ ॥
दिन दिन जै जरलके पाऊ । गाड़े जाइ न उमगे काऊ ॥ कंध न देई मसखरी करई । करहु धौँ कौनि भांति निस्तरई ॥ अकरम करै करमको धावै । पठि गुनि वेद जगत समुझावै ॥ छूछे परे अकारथ जाई । कहैं कवीर चित चेतहु भाई ॥ ५६ ॥
रमनी सत्तावनवी ५७ ॥
कृतियासूत्र लोक यक अहई । लाख पचासकी आगे कहई ॥
१-तीन लोक मो आइके, छूटी न काहुकी आश ।
यक अंधार जग खाइया, सब जग भया निराश ॥
(४८०)
कबीरपंथी—
विद्या वेद पढे पुनि सोई । बचन कहत परतच्छे होई ॥ पहुँची बात विद्याकी वेता । वाहुके भर्म भयो संकेता ॥
सा०—खग खोजनको तुम परे, पीछे अगम अपार ।
बिन परचे किमि जानिहौ, झूठा है हंकार ॥६७॥
रमैनी अदृष्टावनी ५८ ॥
तै सुत मानु हमारी सेवा । तो कहैं राज देऊँ हो देवा ॥ अगम द्विगम गढ देहैं छुड़ाई । ओरो बात सुनहु कहु आई ॥ उत्पति परलै देउँ दिखाई । करहु राज सुख बिलसहु जाई ॥ एको बार होइहै बाँको । बहुरि जन्म न होइहै ताको ॥ जाय पाप हुइहैं सुख घाना । निश्चय बचन कबीरको माना ॥
सा०—साधु संत तेइ जना जिन, माना बचन हमार ।
आदि अंत उत्पति प्रलय, देखहु दृष्टि पसार ॥६८॥
रमैनी उनसठवी ५९ ॥
चढ़त चढावत भंडहर फोरी । मन नहिं जनिको करि चोरी ॥ चोर एक मूसल संसारा । विरला जाने कोइ बूझन हारा ॥ स्वर्ग पताल भूमि लै बारी । एके राम सकल रखवारी ॥
सा०—पाहन है है सब गये, अन भितियनके चित्त ।
जासो किये भिताइया, सो धन भया न हित्त ॥६९॥
रमैनी साठवी ७० ॥
छाड़हु पति छाड़हु लबराई । मन अभिमान टूटि तब जाई ॥ जिनहले चोरि जो भिच्छा खाई । सो विरवा पलुहावन जाई ॥ पुनि संपति औ पतिको धावै । सो विरवा संसार लै आवै ॥
सा०—झूठ झूठ कै डारहु, मिथ्या यह संसार ।
तेहि कारण मैं कहत हौं, जाते होय उबार ॥ ६० ॥
१ पंटी बात विद्याकी पंदा ।
शब्दावली
(४८१)
रमनी यकसठबी ॥ ६१ ॥
धर्म कथा जो कहते रहई । लबरी नित उठि प्राते कहई ॥ लबरि विहाने लबरी संझा । एक लाबरि वस द्विदया मांझा ॥ रामहु केर मर्म नहि जाना । ले मति ठानी वेद पुराना ॥ वेदहु केर कहा नहि करई । जरते रहे मुस्त नहि परई ॥
सा०-गुणातीतके गावते, आपुहि गये गमाय ।
माटी तन माटी मिलो, पवनहि पवन समाय ॥ ६१ ॥
रमनी वासठबी ॥ ६२ ॥
जो तोहि करता बरण विचारा । जनमत तीन दण्ड अनुसारा ॥ जनमत शूद्र सुये पुनि शूद्रा । कृत्रिम जनेउ घालि जग दुंद्रा ॥ जो तुम ब्राह्मण ब्राह्मणी जाये । और राह तुम काहे न आये ॥ जो तुम तुरुक तुरुकनी जाये । पेटै काहे न सुनति कराये ॥ कारी पीरी दूहौ गई । ताकर दूध देहु बिलगाई ॥ छाडु कपट नर अधिक सयानी । कहहि कवीर भजु शारंगपानी ॥ ६२ ॥
रमनी तिरसठबी ॥ ६३ ॥
नाना रूप बरण यक कीन्हा । चारि वरण वै काहु न चीन्हा ॥ नष्ट गये कर्ता नहि चीन्हा । नष्ट गये औरहि मन दीन्हा ॥ नष्ट गये जिन वेद बखाना । वेद पठै पै भेद न जाना ॥ विमल्लख करै नैन नहि सूझा । भौ अजान तब कछुव न बूझा ॥
सा०-नाना नाच नचाइके, नाचे नटके भेष ।
घटघटमें अविनाशी बसै, सुनहु तंकी तुम सेष ॥ ६३ ॥
रमनी चौसठबी ॥ ६४ ॥
काया कंचन जतन कराया । बहुत भांतिके मन पलटाया ॥ जो सौ बार कहौ समुझाई । तहिबो धरा छोडि नहि जाई ॥ जनके कहे जो जन रहि जाई । नव निधि सिधि तिन्ह पाई ॥ सदा धर्म तेहि द्विदया बसई । राम कसौटी कसते रहई ॥ जोरि कसावै अन्ते जाई । सो बाउर आपुहि बौराई ॥
कबीरपंथी शब्दावली १६
(४८२)
कवीरपंथी-
सा०-ताते परी कालकी फांसी, करहु आपनो सोच । जहां संत तहां संत सिधौवै, मिलिरहे पोचैपोच ॥६४॥
रमनी पैसठवीं ॥ ६५ ॥
अपने गुणके औगुण कहहू । इहै अभाग तुम न विचारहू ॥ तुम जियरा बहुते दुख पाया । जल बिनु मीन कवन सचुपाया ॥ चात्रिक जल हल भरे जो पासा । मेघ न बरसे चले उदासा ॥ स्वांग धरे भौसागर आसा । चात्रिक जल हल आसै पासा ॥ रामनाम अहै निज सारा । औरो झूठ सकल संसारा ॥ हरी उतंग तुम जात पतंगा । जम घर किये जीवको संगा ॥ किंचित है सपने निधि पाई । हिये न समाय कहैं धरे छिपाई ॥ हिय न समाय छोड़ि नहिं पारा । झूठा लोभ वै कछु न विचारा ॥ सप्ति किन्ह आपु नहीं माना । तरिवर छर छागर है जाना ॥ जिय दुर्मति डोलै संसारा । तेहि नहिं सूझे वार न पारा ॥
सा०-अन्ध भया सब डोलई, कोइ न करै विचार । कहौ हमार माने नहीं, किमि छूटै भर्म जार ॥६६॥
रमनी छाछठवीं ॥ ६६ ॥
सोई हीतु बंधु मोहि भावै । जात कुमारग मारग लावै ॥ सो सयान मारग रहि जाई । करे खोज कबहुँ न भुलाई ॥ सो झूँठा जो सुतके तजई । गुरुकी दया राम ( को ) भजई ॥ किंचित है यह जगत भुलाना । धन सुत देखि भया अभिमाना ॥
सा०-जियँ जो नेक पयान किय, मन्दिर भया उजार । मरे जे जियते मरि गये, बांचे बाचन हार ॥६६॥
रमनी सद्दसठवीं ॥ ६७ ॥
देह हलाय भक्ति न होई । स्वांग धरे बहुतै नर जोई ॥ धोंगा धींगी भलो न माना । जो काहू मोहि द्विदय न जाना ॥ सुख
१ हरिको भक्ति जाने बिना, भव बुदि मुग्धा संसार । २ किंचित है एक तेज भुलाना ।
३ दीन नख्ता किया पयाना, मंदिर भया उजार । मरि गया सो मरि गया, बांचे बाचन हार ॥