कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
(४८०)
कबीरपंथी—
विद्या वेद पढे पुनि सोई । बचन कहत परतच्छे होई ॥ पहुँची बात विद्याकी वेता । वाहुके भर्म भयो संकेता ॥
सा०—खग खोजनको तुम परे, पीछे अगम अपार ।
बिन परचे किमि जानिहौ, झूठा है हंकार ॥६७॥
रमैनी अदृष्टावनी ५८ ॥
तै सुत मानु हमारी सेवा । तो कहैं राज देऊँ हो देवा ॥ अगम द्विगम गढ देहैं छुड़ाई । ओरो बात सुनहु कहु आई ॥ उत्पति परलै देउँ दिखाई । करहु राज सुख बिलसहु जाई ॥ एको बार होइहै बाँको । बहुरि जन्म न होइहै ताको ॥ जाय पाप हुइहैं सुख घाना । निश्चय बचन कबीरको माना ॥
सा०—साधु संत तेइ जना जिन, माना बचन हमार ।
आदि अंत उत्पति प्रलय, देखहु दृष्टि पसार ॥६८॥
रमैनी उनसठवी ५९ ॥
चढ़त चढावत भंडहर फोरी । मन नहिं जनिको करि चोरी ॥ चोर एक मूसल संसारा । विरला जाने कोइ बूझन हारा ॥ स्वर्ग पताल भूमि लै बारी । एके राम सकल रखवारी ॥
सा०—पाहन है है सब गये, अन भितियनके चित्त ।
जासो किये भिताइया, सो धन भया न हित्त ॥६९॥
रमैनी साठवी ७० ॥
छाड़हु पति छाड़हु लबराई । मन अभिमान टूटि तब जाई ॥ जिनहले चोरि जो भिच्छा खाई । सो विरवा पलुहावन जाई ॥ पुनि संपति औ पतिको धावै । सो विरवा संसार लै आवै ॥
सा०—झूठ झूठ कै डारहु, मिथ्या यह संसार ।
तेहि कारण मैं कहत हौं, जाते होय उबार ॥ ६० ॥
१ पंटी बात विद्याकी पंदा ।
शब्दावली
(४८१)
रमनी यकसठबी ॥ ६१ ॥
धर्म कथा जो कहते रहई । लबरी नित उठि प्राते कहई ॥ लबरि विहाने लबरी संझा । एक लाबरि वस द्विदया मांझा ॥ रामहु केर मर्म नहि जाना । ले मति ठानी वेद पुराना ॥ वेदहु केर कहा नहि करई । जरते रहे मुस्त नहि परई ॥
सा०-गुणातीतके गावते, आपुहि गये गमाय ।
माटी तन माटी मिलो, पवनहि पवन समाय ॥ ६१ ॥
रमनी वासठबी ॥ ६२ ॥
जो तोहि करता बरण विचारा । जनमत तीन दण्ड अनुसारा ॥ जनमत शूद्र सुये पुनि शूद्रा । कृत्रिम जनेउ घालि जग दुंद्रा ॥ जो तुम ब्राह्मण ब्राह्मणी जाये । और राह तुम काहे न आये ॥ जो तुम तुरुक तुरुकनी जाये । पेटै काहे न सुनति कराये ॥ कारी पीरी दूहौ गई । ताकर दूध देहु बिलगाई ॥ छाडु कपट नर अधिक सयानी । कहहि कवीर भजु शारंगपानी ॥ ६२ ॥
रमनी तिरसठबी ॥ ६३ ॥
नाना रूप बरण यक कीन्हा । चारि वरण वै काहु न चीन्हा ॥ नष्ट गये कर्ता नहि चीन्हा । नष्ट गये औरहि मन दीन्हा ॥ नष्ट गये जिन वेद बखाना । वेद पठै पै भेद न जाना ॥ विमल्लख करै नैन नहि सूझा । भौ अजान तब कछुव न बूझा ॥
सा०-नाना नाच नचाइके, नाचे नटके भेष ।
घटघटमें अविनाशी बसै, सुनहु तंकी तुम सेष ॥ ६३ ॥
रमनी चौसठबी ॥ ६४ ॥
काया कंचन जतन कराया । बहुत भांतिके मन पलटाया ॥ जो सौ बार कहौ समुझाई । तहिबो धरा छोडि नहि जाई ॥ जनके कहे जो जन रहि जाई । नव निधि सिधि तिन्ह पाई ॥ सदा धर्म तेहि द्विदया बसई । राम कसौटी कसते रहई ॥ जोरि कसावै अन्ते जाई । सो बाउर आपुहि बौराई ॥
कबीरपंथी शब्दावली १६
(४८२)
कवीरपंथी-
सा०-ताते परी कालकी फांसी, करहु आपनो सोच । जहां संत तहां संत सिधौवै, मिलिरहे पोचैपोच ॥६४॥
रमनी पैसठवीं ॥ ६५ ॥
अपने गुणके औगुण कहहू । इहै अभाग तुम न विचारहू ॥ तुम जियरा बहुते दुख पाया । जल बिनु मीन कवन सचुपाया ॥ चात्रिक जल हल भरे जो पासा । मेघ न बरसे चले उदासा ॥ स्वांग धरे भौसागर आसा । चात्रिक जल हल आसै पासा ॥ रामनाम अहै निज सारा । औरो झूठ सकल संसारा ॥ हरी उतंग तुम जात पतंगा । जम घर किये जीवको संगा ॥ किंचित है सपने निधि पाई । हिये न समाय कहैं धरे छिपाई ॥ हिय न समाय छोड़ि नहिं पारा । झूठा लोभ वै कछु न विचारा ॥ सप्ति किन्ह आपु नहीं माना । तरिवर छर छागर है जाना ॥ जिय दुर्मति डोलै संसारा । तेहि नहिं सूझे वार न पारा ॥
सा०-अन्ध भया सब डोलई, कोइ न करै विचार । कहौ हमार माने नहीं, किमि छूटै भर्म जार ॥६६॥
रमनी छाछठवीं ॥ ६६ ॥
सोई हीतु बंधु मोहि भावै । जात कुमारग मारग लावै ॥ सो सयान मारग रहि जाई । करे खोज कबहुँ न भुलाई ॥ सो झूँठा जो सुतके तजई । गुरुकी दया राम ( को ) भजई ॥ किंचित है यह जगत भुलाना । धन सुत देखि भया अभिमाना ॥
सा०-जियँ जो नेक पयान किय, मन्दिर भया उजार । मरे जे जियते मरि गये, बांचे बाचन हार ॥६६॥
रमनी सद्दसठवीं ॥ ६७ ॥
देह हलाय भक्ति न होई । स्वांग धरे बहुतै नर जोई ॥ धोंगा धींगी भलो न माना । जो काहू मोहि द्विदय न जाना ॥ सुख
१ हरिको भक्ति जाने बिना, भव बुदि मुग्धा संसार । २ किंचित है एक तेज भुलाना ।
३ दीन नख्ता किया पयाना, मंदिर भया उजार । मरि गया सो मरि गया, बांचे बाचन हार ॥
शब्दावली
(४८३)
किछु और हिदय कछु आना । सपनेहुँ कबहुँ मोहि न जाना ॥ ते दुख पावै यहि संसारा । जो चेतहु तो होय उबारा ॥ जो नर गुरुकी निंदा करई । सूकर स्वान जन्म सो धरई ॥
सा०-लख चौरासी जिव जंतुमें, भटकि भटकि दुख पाव । कहहि कवीर जो रामहि जाने, सो मोहिनीके भाव ॥६७॥
रमैनी वडसठवीं ६८ ॥
तेहि वियोगते भयउ अनाथा । परि निकुंज बन पाव न पाथा । वेदो नकल कहै जो जाने । जो सखुझै सो भलो न मानै ॥ नटैवत विद्या खेले जो जाने । तेहि गुणके ठाकुर भल मानै ॥ उहै जो खेले सब घट माहीं । दूसरको कछु लेखा नाही ॥ भलो पोच जो अवसर आवै । कैसंहुके जन पूरा पावै ॥
सा०-जेकरे शर लागे हिय, सो जानेगा पीर । लागे तो भागे नहीं, सुखसिंधु निहारु कवीर ॥६८॥
रमैनी उनहतरवीं ६९ ॥
ऐसा योग न देखा भाई । भूला फिरे लिये गाफिलाई ॥ महादेवको पंथ चलावै । ऐसो बडो महंत कहावै ॥ हाट बजारै लावै तारी । कबेसिधन माया प्यारी ॥ कब दत्ते मावासी तोरी । कब सुकदेव तोपची जोरी ॥ कब नारद बन्दूक चलाया । व्यास- देव कब बंब बजाया ॥ करहिं लड़ाई मतिके मंदा । ये है अतिथि कि तरकस बंदा ॥ भये बिरक्त लोभ मन ठाना । सोना पहिरि लजावै बाना ॥ घोरा घोरी कीन्ह बटोरा । गाव पाय जस चले करोरा ॥
१ लख चौरासी योनि जिव, भटकि २ दुख पावै ।
२ नटवर बन्द खेल जो जानै । ताकर गुण जो ठाकुर मानै ॥
३ कैसे कै जन पूरा पावै ।
(४८४)
कबीरपंथी—
सा०-तिय सुन्दरी न सोहई, सनकादिकके साथ । कबहुक दाग लगावई, कारी हांडी हाथ ॥ ६९ ॥
रमनी सत्तरवीं ७० ॥
बोलना कासो बोलिय रे भाई । बोलतही सब तत्व नशाई ॥ बोलत बोलत बाढु बिकारा । सो बोलिय जो परै विचारा ॥ मिलै जो संत वचन दुइ कहिये । मिलै असंत मौन है रहिये ॥ पंडित सो बोलिय हितकारी । मूरख सो रहिये झखमारी ॥ कहहि कबीर अथ घट डोलै । पूरा होय विचार लै बोले ॥७०॥
रमनी इकहत्तरवीं ७१ ॥
शोक बधावा सब करि माना । ताकी बात इन्द्र नहि जाना ॥ जटा तोरि पहिरावै सेली । योग युक्तिको गर्भ दुहेली ॥ उड़ाये कौन बड़ाई । जैसे काग चीन्ह मड़राई ॥ जैसे भिस्ति तैसी है नारी । राज पाट सब गने उजारी ॥ जस नर्क तस चंदन जाना । जस वाउर तस रहै स्याना ॥ लपसी लौंग गने यक सारा । खांडें छांडि मुख फांकै छारा ॥
सा०-यही विचार विचारते, गये बुद्धि बल चित ।
दुई मिलि एकै होय रहा, काहि लगाऊं हित ॥ ७१ ॥
रमनी बहत्तरवीं ७२ ॥
नारी एक संसारहि आई । माय न वाके बापहि जाई (बाप न जाई) ॥ गोड न मूंड़ न प्राण अधारा । जामै भरमि रहा संसारा ॥ दिना सात लो वाकी सही । बुध अथ बुध अचरज यक कही ॥ वाहिकि वंदन कर सब कोई । बुध अथबुध अचरज बड़ होई ॥
सा०-मूस बिलाई एक संग, कहु कैसे रहि जाय ।
अचरज एक देखो सन्तो, हस्ती सिंहहि खाय ॥७२॥
१ खांडोपरी हरि फांकै छारा ।
शब्दावली
(४८५)
रमनी तिहत्तरवीं ७३ ॥
चली जात देखी यक नारी । तर गागरि ऊपर पनिहारी ॥ चली जात वह बाटहिं बाटा । सोवन हारके ऊपर खाटा ॥ जाइन मरे सुपेदी सौरी । खसम न चीन्है धरनि भई बौरी ॥ सांझ सकारै दिया ले बारे । खसमहिं छाडि सुमिरे लगवारै ॥ वाहिके संग निशिदिन रांची । पियासो बात कहै नहिं सांची ॥ सोवत छांड़ि चली पिय अपना । ई दुख अवधौं कहीं केहि सना ॥ सा०-आपनी जांच उधारिके अपनी कही न जाय ।
कि जाने चित आपना, की मेरो जन गाय ॥ ७३ ॥
रमनी चौहत्तरवीं ७४ ॥
तहिया गुप्त थूल नहिं काया । ताके सोग न ताके माया ॥ कमल पत्र तरंग यक माहीं । संगहि रहै लिप्त पै नाही ॥ आशा ओस अंडन महँ रहई । अगनित अंडन कोई कहई ॥ निराधार आधार लै जानी । रामनाम लै उचरी बानी ॥ धर्म कहै सब पानी अहई । जाती के मन बानी रहई ॥ ढोर पतंग सरे घरियारा । तेहि पानी सब करै अचारा ॥ फन्द छोडि जो बाहर होई । बहुरि पंथ नहिं जोहै सोई ॥
सा०-भर्मक बांधल ई जगत, कोई न करे विचार ।
हरिकी भगति जाने बिना, बूड़ि मुआ संसार ॥ ७४ ॥
रमनी पचहत्तरवीं ७५ ॥
तेहि साहबके लागहु साथ । दुइ दुख मेटिके होहु सनाथा ॥ दशरथ कुल अवतारि नहिं आया । नहिं लंकाके राव सताया ॥ नहिं देवकीके गर्भहिं आया । नहिं यशोदा गोद खेलाया ॥ पृथ्वी रमन दमन नहिं करिया । पैठि पताल नहिं बलि छलिया ॥ नहिं बलि राय सो माडी रारी । नहिं हिरण्यकुश बधल पछारी ॥ बाराह रूप धरणी नहिं धरिया । क्षत्री मारि निक्षत्र न करिया ॥
(४८६)
कवीरपंथी—
नहिं गोवर्धन कर गहि धरिया । नहिं ग्वाल संग वन २ फिरिया ॥ गंडकी सालिग्राम नहिं सीला । मत्स्य कच्छ होय नहिं जल हीला ॥ द्वारावती सरीर नहिं छाडा । लै जगन्नाथ पिंड नहिं गाडा ॥ सा०—कहहि कवीर पुकारिके, वा पन्यै मति भूल । जेहि राखे अनुमान करि, शूल नहीं अस्थूल ॥७५॥
रमैनी छिहत्तरवीं ७६ ॥
माया मोह कठिन संसारा । यहै विचार न काहु विचारा ॥ माया मोह कठिन है फन्दा । होय विवेकी सो जन बन्दा ॥ राम नाम लै बेरा धारा । सो तो लै संसारहि पारा ॥ सा०—राम नाम अति दुर्लभै, औरै ते नहिं काम । आदि अंत और जुग जुगै, रामहिसे संग्राम ॥७६॥
रमैनी सतहत्तरवीं ७७ ॥
एकै काल सकल संसारा । एकै नाम है जगत् पियारा ॥ तिया पुरुष कछु कथो न जाई । सर्व रूप जग रहा समाई ॥ रूप अरूप जाय नहिं बोली । हलका गरुआ जाय न तोली ॥ भूख न त्रिषा धूप नहिं छाहीं । दुख सुख रहित रहै तेहि माहीं ॥ सा०—अपरम परम रूप मगुरंगी, रूप निहपन ताहि । बहुत ध्यानके खोजिया, नहिं तेहि संख्या आहि ॥७७॥ अपरम परम रूप मगु रंगी, नहिं तेहि संख्या आहि । कहहि कवीर पुकारि के, अदभुत कहिये ताहि ॥
रमैनी अठहत्तरवीं ७८ ॥
मानुष जन्म चूके अपराधी । यही तन केर बहुत है उपाधी ॥ तात जननि कहै हमरो बाला । स्वारथ जानि कीन्ह प्रतिपाला ॥ कामिनी कहै मोर पिय आही । बाचिनि रूप ग्रासे चाही ॥ पुत्र कलत्र रहै लव लाई । जम्बुक नाई रहै सैह बाई ॥ काग गीध दोउ मरन विचारै । सूकर स्वान दोउ पंथ निहारै ॥ अग्नि कहै मैं
शब्दावली
(४८७)
ई तन जारों ॥ सो न कहै जो जरत उबारौ । धरती कहै मोहिं मिलि जाई । पवन कहै मैं लेउं उड़ाई ॥ जेहि घरको घर कहैं गंवारे । सो वैरी है गले तुम्हारे ॥ सो तन तुम आपन के जानी । विषय स्वरूप भूले अज्ञानी ॥
सा०-इतने तनके साझिया, जन्मो भरि दुख पाय ।
चेतत नाहीं बावरे, मोर मोर गोहराय ॥ ७८ ॥
रसैनी उमासिनी ७९ ॥
बढवत बाढ़ि घटावत छोटी । परखत खरी परखावत खोटी ॥ केतिक कहौ कहाँ लों कही । औरो कहौं परे जो सही । कहे बिना मोहिं रहो न जाई । विरहिनि ले ले क्रूर खाई ॥ साखी-खाते खाते जुग गया, अजहूँ न चेतो आय ।
कहहि कवीर पुकारिकै, जीव अचेतै जाय ॥ ७९ ॥
रसैनी अस्तिनी ८० ॥
बहुतक साहस करि जिय अपना । सो साहेबसे भेट न सपना ॥ खरा खोट जिन नहिं परखाया । चाहत लाभ सो मूर गवांया ॥ समुझि न परै पातरी मोटी । आछी गाढी सब भौ खोटी ॥ कहहि कवीर केहि देहौ खोरी । जब चलिहौ झिन आशा तोरी ॥ ८० ॥
रसैनी इत्यासिनी ८१ ॥
देव चरित्र सुनौ रे भाई । सो तो ब्रह्मा धिया नसाई ॥ दूजे सुनी मंदोदरि तारा । जेहि घर जेठ सदा लगवारा ॥ सुरपति जाय अहिल्यहिं छलिया । सुर गुरु धरनि चन्द्रमा हरिया ॥ कहैं कवीर हरिके गुण गाया । कुंती कारण कुंवारिहि जाया ॥ ८१ ॥
रसैनी व्यासवी ८२ ॥
सुखके वृक्ष एक जगत उपाया । समुझि न परी विषय कछु माया ॥ छौ छत्री पत्री जुग चारी । फल द्वै पाप पुत्र अधिकारी ॥ स्वाद अनन्त कछु बरनि न जाई । करि चरित्र सो ताहि समाई ॥ नट वट साज साजिया साजी । सो खेलै सो देखै वाजी ॥ मोहा
(४८८)
कवीरपंथी—
वपुरा जुगति न देखा । शिव शक्ती विरंचि नहिं पेखा ॥ सा०-परदे परदे चलिया, समुझि परी नहिं बानि । जो जाने सो बांचिहै, होत सकलकी हानि ॥ ८२ ॥
रमैनी निरासीवी ८३ ॥
छत्री करै छत्रिया धर्मा । वाके बढै सवाई कर्मा ॥ जिन अवधू गुरु ज्ञान लखाया । ताकर मन तहैंदैं लै धाया ॥ छत्री सो जो कुटुम्ब सो जूझै । पांचो मेटि एक करि बूझै ॥ जीवहि मारि जीव प्रतिपालै । देखत जन्म आपनो घालै ॥ हालै करै निशाने धाऊ । जूझि परे तहां मनमत राऊ ॥
सा०-मनमत मरे न जीवई, जीवहि मरन न होय । शून्य सनेही राम बिन, चले अपन पौ खोय ॥ ८३ ॥
रमैनी चौरासिनी ८४ ॥
ऐ जिय आपन दुखहि संभार । जेहि दुख व्यापिरहो संसार ॥ माया मोह बंधा सब लोई । अल्पै लाभ मूल गो खोई ॥ मोर तोर में सबै विगुता । जननि उदर गर्भ मई सूता ॥ ई बहु रूप खेलै बहु बूता । जन भौरा अस गये बहुता ॥ उपजि विनसि फिर जोनी आवै । सुखको लेश सपनेहुं नहिं पावै ॥ दुख संताप कष्ट बहु पावै । सो न मिला जो जरत बुझावै ॥ मोर तोरमें जर जग सारा । ध्रिंग स्वारथ झूठा हंकारा ॥ झूठो आश रहा जग लागी । इन्हते भागि बहुरि पुनि आगी ॥ जे हितकै राखे सब लोई । सो सयान वाचा नहिं कोई ॥
सा०-आपु आपु चेतै नहीं, कहो तो रूसावा होय ।
कहै कवीर जो आपु न जागे, निरास्ति अस्ति न कोय ॥ ८४ ॥
इति रमैनी मूल बीजकको संपूर्ण ॥
१ धृग जीवन झूठी संसारा ।
२ आपु आप चेतै नहीं कहो तो रिसहा होय ।
कहै कबीर सपने जगें निरास्ति अस्ति नहिं कोय ॥
शब्दावली
(४८९)
निरख परमोधकी ।
रमैनी १ ।
अमर लोकते हम चलि आवा । तीन लोक जम लूटत पावा ॥ जम लूटे जिवको नासे । दसौ दिसा सबहुनको फाँसे ॥ १ ॥ सुर- नर असुर कोई नहिं बाँचे । बहु विधि भेष धरे धर नाचे ॥ जने तीन परपंची देवा । उनहु न जान्यो जमको भेवा ॥ २ ॥ गरभ वासमें रहे भुलाई । अगम पन्थ जानो नहिं जाई ॥ ब्रह्मा वेद पढै अधिकाई । वरण चारि मिलि बांध दिढाई ॥ ३ ॥ विरन्त आपन पंथ चलावा । अविगत मरम काहु नहिं पावा ॥ त्रिपु- रारी आसन आरंभा । तीनों मिलकर आसन थंभा ॥ ४ ॥ सो पारखंड षटदर्शन भूले । फिर फिर जोइनि संकट झूले ॥ करै डिंभ जो मूल गमावे । धोखेई धोखे डहकावे ॥ ५ ॥ एक न पूजे देई देवा । बोल झूठ बूढे यह खेवा ॥ एक न चण्डी मन चित लावा । स्वारथ काजे जीव हतावा ॥ ६ ॥ एक न तीरथ वरत फल ताका । कहैं विराने आगम भाखा ॥ एक बरतकी आशा लाई । औसर हमको होइ सहाई ॥ ७ ॥ एक दान पुन सर्वस देहीं । जीवन जन्म सुफल करि लेहीं ॥ ऐसे करि करि सब जग बन्धा । जस संपुटमें लै कुछ रन्धा ॥ ८ ॥ कहा हमार न कोई मानै । मनुष एक हमहूँको जानै ॥ मनुष रूप होय हम दिखलावा । बहुत भाँति कर नर समुझावा ॥ तऊं न अन्ध मोहि पतियावा । धाई धाई जस उन विष खावा ॥ ९ ॥ खसम न चीन्हे मूढ गवाँरा । हारे ठोकै माथ लिलारा ॥ १० ॥ झूठ नात सबही मन माना । साँच बातकी निन्दा आना ॥ हंस होइ सो मुहि पतिआई । और न मुहि पतिआवे भाई ॥ ११ ॥ तज कुल कानि करे उजियारा । यह तो मता कालको मारा ॥ जुग जुग आजं कह समझाऊं ।
(४९०)
कवीरपंथी-
जो मानै तिहिं लोक पठाऊं ॥१२॥ अजहुं कहुं जो कोई माने । अच्छर माहिं मोहि पहिचाने ॥ जिहि घट अच्छर होय हमारा । सो ठठ खोजै आप विचारा ॥१३॥ अच्छर यहैमें कहुं विचारा । जो कोई बूझे आन सवारा ॥ अच्छर की प्रतीत कराई । आन उपाय छाडिदे भाई ॥१४॥ अच्छर मध्ये बास हमारा । जो कोई बूझे आन सवारा ॥ आन उपाय विज्ञानी होई । अच्छर विना न छूटे कोई ॥१५॥
सा०-कहैं कवीर सब हंस से, कुल टूटे ते हंस ।
तिनसे हमसे भेद नहीं, काटे जमके फंस ॥ १ ॥
रवैनी २ ।
मोर कहा कोई विरले माना । सत्य लोकको दीन पयाना । सत्यलोक सत्यहिते भयउ । जुरा मरण कागज गल गयउ ॥१६॥ जुरा मरण रहित घर पावा । जिन माना मोर ससुझावा ॥ और न कोई समझावन हारा । और न कोई राखन हारा ॥१७॥ सो का राखे आपुहि भूले । आपुहि बानी संकट झूले ॥ आपुहि झूले और झुलावे । आपा माड़ सबन डहकावे ॥ १८ ॥ हमहुं से जो आपा माड़े । उलट चोर कोतवाले ढाँड़े ॥ जस नट विद्या नटवे चीन्हा । रात दिवस जिव पालन कीन्हा ॥ १९ ॥ बहुतक बृक्ष जो लाय दिखाये । तिसके फल सब तोड चखाये ॥ काहूको सन्तोष न भयउ । खाली दिखाय और कछु लयउ ॥२०॥ अस लालच जुग जुग चलआवा । लालच आगे जीव गवाँया ॥ अम्सर घर को कोई न धावे । करामतकी सेवा लावे ॥२१॥ एक कहे संपत मैं पाई । मान बढ़ाई बहुत दिटाई । एक कहे फुर शब्द हमारा । जोरे कहैं सो होय सवारा ॥ २२ ॥ इन बातन बूझे बड़ ज्ञानी । एक कहे जो सिद्ध कहानी ॥ सिद्ध कहानी अंजुली पानी । घट
शब्दावली
(४९१)
छूटे की काहु न जानी ॥ २३ ॥ घटकी किया रहनि रहाई । कालहुते तिनहु डहकाई ॥
सा०-बन्दिछोर मम शब्द है, काटे जमके बन्द ॥ लैराखे सतलोकमें, चले काल कटि फन्द ॥ २ ॥ ऐसे कारजको शब्द है, जो तोड़े कुलकान ॥ लै राखे सतलोकमें, करै शब्द पहि- चान ॥ ३ ॥ शब्द हमारा जो लहै, चले न जमका जोर ॥ काले मारे छय करै, हंसा पहुँचै ओर ॥ ४ ॥ सतलोकमें पहुँ- चिया, अमरित भोजन पाइ ॥ जोग जुगंतर रम रहै, कहैं कवीर समझाइ ॥ ५ ॥
रमैनी-यह दुनिया झूठे रंगराची । झूठौ उपाई करे कर नाची ॥ २४ ॥ झूठेसे परतीत कराई । ताते सृष्टी काल सुख जाई ॥ कालक काहु मरम न पावा । काल सबन मिल खसम दिठावा ॥ २५ ॥ काल रूप बरते घट मांही । काल लगन नर आवै जाहीं ॥ काल सबनपै भेष धरावै । कालक दीन सिमरफल पावै ॥ २६ ॥ सो फल चाखै हुआ उड़ावे । हाथ पिछौरै शीश डुलावै ॥ सेवा कर पंछी पछताई । ऐसे जीव काल सुख जाई ॥ २७ ॥ अस जिन जानौ पंछि भुलाना । जनम हार जग जिय पछताना ॥ शब्द हमारे जो फल होई । सो फल कालसु माँगौ लौई ॥ २८ ॥ कहौ काल कहाँते देई । नंगक आस धोवि का लेई ॥ ऐसे कर कर जग डहकावा । जैसे आगी वनधौं लावा ॥ २९ ॥ अस इन लोगन घर मत कीना । घरके मते अपन पौं लीना ॥ जैसे नाद सो भ्रिग भुलाई । समुझे नहीं पारधि दुखदाई ॥ ३० ॥ नाद सुनाइ प्रान हत कीनौ । ऐसे काल जीव हत कीनौ ॥ ज्यों जल मध्ये मीन रहाई । निसवासर आपनौ भछ खाई ॥ ३१ ॥ तहाँ पारधी बंशी लाई । गेंडुआ चार तहाँ लटकाई ॥ मीन न
(४९२)
कबीरपंथी—
जाने कहाँ ते आवा । लालच लागे जीव गवाँवा ॥३२॥ पतंग न चीन्है जोत की अहाँ । यहाँ न जान यह मोहिँ दहाँ ॥ जो तो जाने तऊ न डरई । बिन जाने वह नाश जो करई ॥ ३३ ॥ स्वानको स्वान कहाँते आवा । भूसि भूसि उन जीव गवाँवा ॥ अपनो प्रतिमा देखि डराना । ऐसे भरम भरमि पछताना ॥३४॥ कहा केहरिको केहर कीनौ । केहर जाइ रूप जिय दीनौ ॥ ताको किनहु विचार न कीनौ । यह विचार कोइ ज्ञानी चीनौ ॥ ३५ ॥ यह अच्छर चीन्हहु रे भाई । हिन्दू तुरुकसे कई समुझाई ॥ छाडे नहीं तीरथ वरत आसा ॥ पाप पुत्रको कीनी नासा ॥३६॥ छोडे नहीं गृह दार सुयारी । शबद छाड़ भये अलप अहारी ॥ छाड़ राज पाहन सिर नायो । छाड़िनि तोशः हम कछु न चलायो ॥ ३७ ॥ औँधूको सतगुरु कर जाना ॥ अंधाके मन औँधू माना ॥ प्रथम कहैं सुत आसन कीजे । मन पवनाको बस कर लीजे ॥ अनहद नाद रहै भरपूरी । अब हमते शंसै गो दूरी ॥ इंगला पिंगला सुषमन जागी । दसौ द्वार तब तारी लागी ॥ दीपक रूप निरंजन देखा । जोत सरूप निरंजन पेखा ॥ घटही मांहि निरंजन पाया । कहैं जु आवागमन मिटाया ॥ ३८ ॥ एक कहैं हम अम्बर भयऊ । एक कहैं हम पच्छहि लयेऊ ॥ ऐसी बाजी काल दिखावे । प्रान पयान काम नहीं आवे ॥ ३९ ॥ यह मिल औँधू सबहन सीका । अगम पंथको कहैं जो फीका ॥ कालके फंद पडे सब लोई । साची कहौँ न माने कोई ॥ ४० ॥ सांचे मरन न काहू पावा । कालक फंदा जग डहकावा ॥ वेद कितेब फंद यक कीना । जैसे कीर जाल बुन लीना ॥ ४१ ॥ तेहि फंद अटके सब कोई । हम चीन्है बिन बड दुख होई ॥ ऐसो फंद जुग जुग चलि आवा । सेवक स्वामी सब
शब्दावली
(४९३)
डहकावा ॥ ४२ ॥ कालै धौ परपंच बनाये । ये परपंच न काहु पाये ॥ तेहिंते बचिके बाहिर आये । हुए निनार सो हंस कहहाये ॥ ४३ ॥ हंस होइ बहुते सुख पावा । जोनी संकट बहुरि न आवा ॥ हंस चाल चले जो कोई । ताको आवागमन न होई ॥ ४४ ॥ चाल बिना लागै बड बारा । तहवां नाही दोष हमारा ॥ यही बात कहै समझाई । तेई हंसको धोख छुडाई ॥ ४५ ॥
सा०-कहत कवीर हंसनते, धरमराइको लूट ।
अमरको निहचल करौं, भवजल जाई छूट ॥ ६ ॥
रमैनी-जीव काजको हम चलि आये । आइ देसको मंझा पाये ॥ मंझा लीना देस हम आई । राजा खोट अनीत तहांई ॥ ४६ ॥ रइयत कर कर मार उजारी । ऊंचेते नीचे ले डारी ॥ नीचे डारे सब संसारा । हमरे शब्द बिनु नाहि सहारा ॥ ४७ ॥ सेवा करै जस मोलक लीनौ । सहस आस उन विनती कीनौ ॥ उहिको पच्छ करै जो कोई ॥ सोच विचार रहै पुन सोई ॥ ४८ ॥ रहै दुचित वह चैन न लेई । जस घरही मार घरही बध देई ॥ हाथक दीना खाइ अधीना । बाकी अटक रहै लौलीना ॥ ४९ ॥ अस जिव काम किये मन ऐई । जस पकड बहलिया दुख देई ॥ जो भावे सो करै विचारा । ऐसे काल जगत यह मारा ॥ ५० ॥ तेई कालको मरम न पावा । सेवा संजम बहुत दिढावा ॥ छोडे गिरह परिवार घनेरा । कह सो गुरु भला कर मेरा ॥ ५१ ॥ कहौ गुरु कहवाँते आवा । कहो गुरु कौनै समझावा ॥ इतनी बुझ न करै अधीना । फटी आँख न कहैं हम चीन्हा ॥ ५२ ॥ घरे गुरु घरही घर चेला । जैसे उठरू चले अपेला ॥ कान न करै कहौ नहीं मानै ॥ जहँ जहँ रुचै तहँ तहँ तानै ॥ ५३ ॥ अस विचार इन सब मिल कीना । झूठे खसमहि सरबस दीना ॥
(४९४)
कवीरपंथी-
कोई कहै राम कोइ रहमाना । ब्रह्मज्ञानी एककै जाना ॥ ५४ ॥ ब्रह्मज्ञान बाँचे नहीं कोई । पानी मिलै कौन सिंधि होई ॥ वाको सुख यह कैसे पावै । यह बैठे वह खाइ उडावै ॥ ५५ ॥
साखी०—ऐसे डूबे षट् दर्शन, और सकल संसार ।
कविरा हमरे शब्द विनु, कोइ न पावै पार ॥ ७ ॥
रमैनी-लोग कहैं हमही होय स्याना । साँच कहौं कोई नहीं माना ॥ काम झरै कन्दूप नित झरई । ताको कोइ विचार न करई ॥ ५६ ॥ कंदरप यह निकस उपजाना । ताको विरही छटी बखाना ॥ जेहि पिता पुत्रको पालै । जीवन जनम सुफल कर जाने ॥ कहैं हमारो आगो चलिहै । चीन्है नहीं कालको बलि है ॥ ५७ ॥
साखी—तैसहि सुता दिढावै, अपने वसीठ चलान ।
दान दहेज दे कर जोरै, कहूं कि उन सरमान ॥ ८ ॥
रमैनी—कहु कौनसी कर यहु आवै । ताको सब मिल माथ नवावै ॥ रहौ पछताई काल धर खावा । जनम जनम पाछे पछतावा ॥ ५८ ॥
सा०—मानै शब्द बंदि जम छूटै, बातै सुनत भयान ।
कहैं कवीर नर भोइ, लोके वेद भुलान ॥ ९ ॥
रमैनी—छाड़हु लाज और छाड़हु बडाई । छाड़हु झूठ जो कथा चलाई ॥ छाड़हु पाखंड छाड़हु भेषा । छाड़हु सब पापन- को लेषा ॥ ५९ ॥ छाड़हु तीरथ वरत फल भाई । तजौ जोग आतम समझाई ॥ तजौ आसन जो बैठक दीना । छाड़हु सुन्न सिखर मन चीना ॥ ६० ॥ चीन्हो जस हम जो चिन्हावै । अपर करै सतलोक पठावै । सुन्न सिखरमैं धरम अन्याई । तिह डहकेको शक्ति पठाई ॥ ६१ ॥ माता बहनी भनजी होई ॥
शब्दावली
(४९५)
मिहरी सुता हुइ बैठी सोई ॥ औरो कुल बहु भांत बनाई। वरन चारमें सब डहकाई ॥ ६२ ॥ जोगियन तपियन अपडर कीना। भाज भाज उन बनखंड लीना ॥ तिनको खनि खनि कंद खवावे। गिरह दारा सुख सबै छुटावे ॥ ६३ ॥ एक जनम भर मिथ्या खोवै। एक जो गुफाके माहीं सोवै ॥ एक जोग जग उदासी फिरई। मन मथ जोग प्रान हत करई ॥ ६४ ॥ एक नगन हुइ आपु दिखावै। चौहटे नट जस पसू नचावै ॥ ऐसे तीनों लोक नचावे। धरम रायको मरम न पावै ॥ ६५ ॥ धरम अहै परपंची देवा। उनहू कीन अमलको भेवा ॥ सकती लै परपंच बनाये। जुग जुग जीव सबै डहकाये ॥ ६६ ॥ वेद कितेब फंद एक कीनौ। मन बच करम सबै जुग लीनौ ॥ वेदहि रच रच ग्रंथि जु दीना। वेद विचारै पेर न चीन्हा ॥ ६७ ॥ तिन ग्रंथिन अटके सब कोई। तिनते छुटत बडो दुख होई ॥ तिन ग्रंथिन जोरे छुटाऊँ। करि अमर सतलोक पठाऊँ ॥ ६८ ॥ अक्षर कहै सो कीजै भाई। हंस होइ सतलोकै जाई ॥ पांच दूत यहि तनमें जाना। यह तो धरम राइका बाना ॥ ६९ ॥ परधन त्रिया क्रोध विकारो। लोभ मोह तिशानाको जारो ॥ पांच पचीसको संग्रह छूटे। धरम राइको जम कुल लूटे ॥ ७० ॥ सत शब्दमें डोर समावै। रहनि गहनि सतलोकै पावै ॥ विनु रहनी कछु काज न होई विनु गहनी सतलोक न कोई ॥ ७१ ॥
साखी-कह कवीर निरमल होय, काट करमके फंद ।
अमरलोक निहचल भये, जुग जुग करे अनन्द ॥१०॥
इति निरख प्रबोधकी रमैनी सम्पूर्ण शुभम् ।
(४९६)
कवीरपंथी-
अथ ज्ञानचौतीसा प्रारंभः ।
कक्का-केता कहे कवीर कहा कोई नहि मानै । कायामैं कर- तार, नाहिं कोई पहिचानै । कर्म बन्ध संसार, काल सों नहिं बचन है । अरे हाँ अवधू ! काम कोध हंकार, कल्पना कठिन है ॥ १ ॥
खरुखा-खारी सो कह खाँड; खाँड खारी विधि लेखै । खरे खोटको न्याव, नहीं हिरदय विवेखै ॥ खोरिन खोरिन फिरे, खाक मुख लायके । अरे हाँ अवधू ! खसम परो न चीन्हि, रहे खिसियायके ॥ २ ॥
गगगा-ग्यान सोई निज सार, जाही सो थिर भया । कर्मको टूटयो फन्द, द्रन्द्व सब खिरगया ॥ ग्यानी कथै अगाध, रहै हिया फेर फारके । अरे हाँ अवधू ! गाडि रक्यो बातनको, लेगौ चोर उखारिके ॥ ३ ॥
घच्छा-घटमें आतम राम, मिलो साहब सना । घरमें प्रेम निधान, चेत मेरे मना ॥ जहाँ नहीं घाम नहिं छाहैं, तहाँ इन घर करा । अरे हाँ अवधू ! घरकी सुरत बिसार, घसीटनमें परा ॥ ४ ॥
डडा-( नन्ना ) नयन विना नर अंध, द्रन्द्व धोखा धरा । सूझे वार न पार, प्रान परबस परा ॥ नितकै संशय झूल, मूल विसराइया । अरे हाँ अवधू ! नहीं भयो निरशंक, मुक्ति किन पाइया ॥ ५ ॥
चच्चा-चले जात नर नष्ट, चौरासी धारमें । बिन चीन्हे यहि चले, परे भौभारमें ॥ चतुर बिचच्छन होइ कहो कहँवाँ लगे । अरे हाँ अवधू ! पडे चोरके हाथ, चीन्हि नाहीं भगे ॥ ६ ॥
छच्छा-छल व्यवहारके धोखा छाडहू । काम कोध अहंकार
शब्दावली
(४९७)
कि, लोभ निवारहू । क्षमा शील सन्तोष, सत्य हियमा धरो । अरे हाँ अवधू ! परख, बोलता ब्रह्म चीन्ह ताके करो ॥ ७ ॥
जन्मा-जग जीवन जगदीस, जगत गुरु जीव है । जाने जान सुजान, सोई निज पीव है ॥ खोजो जो नव खण्ड, भेद निज कहि दिया । अरे हाँ अवधू ! जुग जुग अविचल जीव, कवीर गुरु कहि दिया ॥ ८ ॥
झइझा-झूठ झगरा छोड़, इन्द्रमें कहा परो । झलक मनी उजियार, निकट हियमें धरो ॥ झाड़ पातको छोड़, सार निज ताय ले । अरे हाँ अवधू ! कहा झखे मतिहीन, परम गुन गायले ॥ ९ ॥
नन्ना-नाह छोड़ि नरा, नार चली है जारपै । पियाकी सुरत बिसार, तो आशिक यारपै ॥ नीच बुद्धि मतिहीन, नहीं स्वारथ भयो । अरे हाँ अवधू ! जार बसे हिय माँहि, नरक ताते गयो ॥ १० ॥
टट्टा-टीडी भया जहान, उडा आसमान कूँ । हटा नेह निदान, चला घमसामकूँ ॥ टाराही नहिं टरे, भरम धोखा परा । अरे हाँ अवधू ! कठिन, टेक मनमें धरी, तार टूटिया मरा ॥ ११ ॥
ठट्टा-है ठोरेके ठोरे, दूर धोखा भया । ठोकै सबहिं कपाल, गुसैयां कित गया ॥ ठठके बेडा बांधि, पार कोई ना तरा । अरे हाँ अवधू ! ठाकुर, बिसराय, काम ठगसों परा ॥ १२ ॥
डड्डा-डसे भुवंगम चोर, विरह विष बाढिया । डसे जो चतुर सुजान, विरहमें ढारिया ॥ डार पातकूँ छोड़ि, सिपत सबहिं किया । अरे हाँ अवधू ! डंड बाजके हाथ, प्रान अपना दिया ॥ १३ ॥
ढट्टा-ढोल मारि गुरु कहै, सबन सों टेरिके । ढूँढे सरग पताल, थके सब हेरिके ॥ कहूँ ढूँढे मतिहीन, कहाँ भटकत फिरे अरे हाँ अवधू ! ढिगही परमानन्द, चीन्हि नहीं परे ॥ १४ ॥
(४९८)
कवीरपंथी-
णणा-नन्ना निरगुन निरंकार, निरञ्जन सब जपे । नहि रूप नहि रेख, ताहीको सब थपे ॥ जहाँ नहीं तहाँ सही, सही तहाँ नहि किया । अरे हों अवधू ! नर अज्ञानी असल भिटाय, नकल सिर पर लिया ॥ १६ ॥
तत्ता-तत्त्व यही निज सार, और कहु ना मिले । तुही तुही निज तुही, हिरदामें देखले ॥ तिरखावन्त पुनि साधु, तलफ जाकी धरे । अरे हों अवधू ! सो बोले घट माहिं, और ले क्या करे ॥ १६ ॥
थथथा-थकित भये नर नारि, सो ढूँढे ना मिले । थिर होय लखै न आप, अहमें सब गले ॥ जहाँ अति अगम अथाह, तहाँ थाह नहीं चले । अरे हों अवधू ! थित विन थैमें कौन, बहे भौमें भले ॥ १७ ॥
दहा-दूसर कोई नाहिं, द्रन्द्रमें कहाँ परो । दया धर्म सत शील, साधु सेवा करो ॥ दिलकी दुबिधा छाड़ि, काम एता किया । अरे हों अवधू ! दिग्य दृष्टिसे देख, दरस दिलमें लिया ॥ १८ ॥
धधधा-धन्य धन्य सो भाग, जाही परतीत है । यही ध्यान धनसार, और विपरीत है ॥ धावे सकल जहान, धोखामें सब परे । अरे हों अवधू ! चहुँ दिस ढुंद बहाल, सूत्रकूँ सब चले ॥ १९ ॥
नन्ना-निरख देख निज नैन, आपमें आप है । निरभय धजा निशान, अगर फहरात है ॥ निसा मान भरपूर, परम सुख पाइहो ॥ अरे हों अवधू ! निसि वासरको सोग, सबे विसराइ हो ॥ २० ॥
पप्पा-पप्पा पूर्ण ब्रह्म है, प्रेमते और न कोई । काया बीर कवीर, परम गुरु निहचे सोई ॥ पत्थर पूजे प्रेत, पार किन पाइया । अरे हों अवधू ! पैडा परो न चीन्ह, मूल जहँडाइया ॥ २१ ॥
फफ्फा-फल लागे बड दूर, बीज बकला विना । कौन खवावे तोर,
शब्दावली
(४९९)
फहम अकला विना ॥ फिरते रहे खुलान, फिकर दिलमें रही । अरे अवधू ! फिकर मिटे दिल माहिं, फकीरी तब सही ॥२२॥
बब्बा-बिबि अक्षर ठहराय, वृछ जो राखि हों। वेद शास्त्र बहु ग्रन्थ, अदभुत भाखिहों ॥ बकता बकत विस्तार, बहु विधि ले बढा। अरे हों अवधू ! भीतर भरी भंगार, कनक ऊपर मढी ॥२३॥
भम्भा-भरमें सकल जहान, कहे यहाँ कछु नहीं। आपहिं फन्द बनाय, भरम कीन्हों सही ॥ डार भगमकी मोट, भरमना करम है। अरे हों अवधू ! भीतर है भरपूर, तो बाहर भरम है ॥२४॥
यव्या-(जजा) जो तुम चतुर सुजान, जगत गुरु जानले । जिन सिरजी सकल जहान, ताहि पहिंचान ले ॥ एक ज्योति जगमाहिं, जगामग होय रही । अरे हों अवधू ! उन थापी निनार, तहाँ कछु है नहीं ॥ २५ ॥
ररा-राम राम सब जपे, राम सो ना मिले । आतम राम विसार, सूत्रकूँ सब चले ॥ सूत्र सनेहो राम, कहो किन पाइया । अरे हों अवधू ! जुग जुग आतम राम, कवीर गोहराइया ॥२६॥
लछा-लाज बीज पत खोय, भांड मूरख भये । लाधा विष निज मूल, लालसों ना लिये ॥ लगी दवा चहुँ ओर, लपटमें सब परे । अरे हों अवधू ! कदहिं न गयो भम, सकल सरबस बरे ॥ २७ ॥
बब्बा-वाही की परतीत, वाहि विन और न कोई । वो सबके सिरताज, काज वासे सहि होई ॥ वह नहिं आवे जाय, सबन सो भिन्न है । अरे हों अवधू ! ऐसी अकल विवेक, सबन किन्ह है ॥ २८ ॥
सस्सा-संसय भयो अथाह, सासत जिवको भई । इहाँ मिल- नको नाहिं, सिपत सबदिन कही ॥ सिद्ध साधु संसार, सबै