कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
(८६)
कवीरपंथी-
ऐसे कौन ? मोर पातक हैं, जो तुम पांव पसारो । यह नहिं नई रीति प्रभु जो एक, मोहिं अधमको तारो । युगन २ से अधम उधारन, विदित है नाम तुम्हारो ॥ धर्मदास विनवें करजोरी, तुम निज विरंद विचारो । मेरे अवगुन त्यागि दयानिधि, अपनी ओर निहारो ॥ ३२ ॥
देश ताल त्योरा । (समय १० बजे रात्रि)
मायामोहनी मनहरन । भोगिया सब पीसंडारे योगिया वशकरन ॥ टे० ॥ चञ्चल चाल् विशाल लोचन, सबैल शायंक धरन । कामबान बिलोकि मारचो, रूप नाना वरन ॥ भृकुटि भेंङ्ग प्रसङ्गै चहुँदिश, अनल लागी झरन । ज्वाल झाल कँरालमें, सब जीव लागे जरन ॥ सुर असुर नरें नाग किञ्चर, त्रसित लागे डरन । मंझें धार झंकोर 'बोरे' देत नाहीं तरन ॥ काम क्रोध कठोर तृष्णा, शोक सागर भरन । कहैं कवीर कोइ भागि बाचे, अभय सतगुरु शरण ॥ ३३ ॥
गुरुसम और कौन ? कृपाल । परखपद परखाय मेटचो, सकल भव भ्रम जाल ॥ टे० ॥ जरत जेहि वश सुर असुर सब, प्रबल माया ज्वाल । वरषि अमृत ज्ञानघन प्रभु, शमन कीन्ही झाल ॥ द्रोह मोह अपार तृष्णा, धार अति विकराल । बहत जीवन पार कीन्हो, मेटि सब जंजाल ॥ दलन दल दारुण दुसह दुख, दीनबन्धु दयाल । चरण रज अज गुरुडध्वजहर, तिलक कीन्हो भाल ॥ ध्यान सुन्दर मृदुल मुदमय, अघहरण ततकाल । भवसमुद्र कवीर तारण, गुरु सेतु विशाल ॥ ३४ ॥
१ पारकरो, २ प्रार्थना करते हूँ, ३ कीरती, ४ अपराध, ५ देखो, ६ चूर्ण किया, ७ गति, ८ नेत्र ९ बलवान्, १० वान, ११ प्रकार, १२ प्रहार, १३ प्रभाव, १४ वर्षा होता, १५ भयंकर, १६ राक्षस १७ बल्ल भन्ष्य, १८ एक प्रकारके देवता, १९ बीच, २० हिलोरा देकर, २१ डुबोवे.
शब्दावली ।
( ८७ )
गौडमिथ्रत देश ।
मोरि मान कही मूरख गँवार । है मनुष जन्म नहिं बारबार ॥ तजु काम कोध तृष्णा अपार । भजु निर्विकार सतनामसार ॥ १० ॥
( १ ) अपारे संसारे कथमपि समसाद्य नृभवम् । न धर्म यः कुर्याद्विषयसुखतृष्णातरलितः ॥ व्रजन् पारावारे प्रवरमपहाय प्रवहणम् । स सुरुयो मूर्खाणामुपलमुपलब्धुं प्रयतते ॥ १ ॥ रे ! मूढ तोहि नहिं तनक लाज । गहे विषय उपल तजि गुरु जहाज ॥ तेहिपर चढि उतरन चहत पार । भजुनिर्वि० ( २ ) आयुर्वर्षशतं नृणां परिमितं रात्रौ तदर्थं गतं ।
तस्यार्धस्य पस्स्य चार्धमपरं बालत्ववृद्धत्वयोः ॥ शेषं व्या- धिवियोगदुःखसहितं सेवादिभिनीयते । जीवे वारितरङ्गचञ्चल- तरे सौरुयंकृतः प्राणिनाम् ॥ २ ॥ दुखरूप सकल यह है प्रपंच । नहिं तीन काल सुख जानु रञ्ज ॥ ताते तजु यह सब लखि असार । भजुनिर्विकार सतनामसार ॥ ( ३ ) आदित्यस्य गता- गतैरहरहः संक्षीयते जीवतं व्यापारैर्बहुकार्यभारगुरुभिः कालो न विज्ञायते । दृष्ट्वा जन्मजराविपत्तिमरणं त्रासश्च नोत्पद्यते पीत्वा मोहमयीं प्रमादमदिर्गं उन्मत्तभूतं जगत् ॥ ३ ॥ वरणाश्रमको अभिमान धार । नहिं करत आतमाको विचार ॥ यह मूल
१ विणु ( १ ) अर्थ-अपार संसार में किसी प्रकार से मनुष्यजन्मको पाकर, जो पुरुष धर्म नहीं करता और विषयसुखकी इच्छामें तत्पर है, वह पुरुष जैसे समुद्रके पार (किनारेपर) जानेवाले श्रेष्ठ नावको त्याग कर पत्थरको पकड़ने का प्रयत्न करता है तो महा मुर्ख है ॥
( २ ) अर्थ-प्रथम तो मनुष्यकी आयुष्काली प्रमाण सौ वर्षका है, सो-तिसमेंसे आधे पचास वर्ष रात्रिके सोनेमें व्यतीत होते हैं। अब शेष जो बचे पचास वर्ष, तिसके आधे पचीस वर्ष रहे, जिसमेंसे कुछ तो प्रथम बालपनके अज्ञानमें और कुछ पीछे वृद्धावस्थामें बीत जाते हैं, अब बाकी रहे पचीस वर्ष, तिसमें व्याधि वियोग, दुःख, पराई सेवामें लग जाते हैं, बस ! यह व्यवस्था तो यदि सौ वर्षका जीवन हो तिसको है किन्तु मनुष्यका जीवन तो केवल जलतरंगवत् अनियमित है, अब कहिये प्राणियोंको सुख कहाँ ? ॥
( ३ ) अर्थ-सूर्यके उदय अस्त होनेसे आयुष्य दिन प्रति दिन घटती जाती है, तथा अनेक बड़े र व्यापार समुदायके कार्यमें लगे रहनेसे, यह भी नहीं ज्ञात होता कि मेरे आयुष्यका कितना काल व्यतीत हो गया है और जन्म, वृद्धत्व, विपत्ति और मरणको भी देखकर नहीं डरता इससे यह निश्चय है कि, संसारमोहरूपी प्रमाद मंदिराको पीकर बासना हो रहा है ॥
(८८)
कवीरपंथो-
अविद्याको विकार । भजुनिर्विकार ॥ (४) स्नातं तेन समस्त- तीर्थसलिले दत्तापि सर्वावनिर्णयज्ञानाश्च कृतं सहस्रमखिलाः देवाश्च संपूजिताः ॥ संसाराश्च समुद्धृताः स्वपितरस्त्रैलोक्यपूज्योप्यसौ । यस्य ब्रह्मविचारणे क्षणमपि स्थैर्यं मनः प्राप्नुयात् ॥ ४ ॥ यह लोकलाज मर्याद फन्द । करि कर्म धर्म सब हो स्वछन्द ॥ एक नित्य अनित्यको करुविचार । भजुनिर्वि० (५) यावत् स्व- स्थमिदं शरीरमरुजं यावज्जरा दूरतो । यावच्चन्द्रियशक्तिप्रतिहता यावत्क्षयो नायुषः ॥ आत्मश्रेयसि तावदेव महतां कार्यः प्रयत्नो महान् ॥ संदीप्ति भवने तु कूपखनन प्रत्युद्यमस्तादृशः ॥ ५ ॥ जिमि रङ्ग पतङ्गको नाशमान । त्यों यौवनको मद झूठ जान ॥ नहि बिगरत लागत तनक वार । भजुनिर्वि० (६) वृक्षं क्षीण- फलं त्यजन्ति विहगाः शुष्कं सरः सारसाः । निर्द्वयं पुरुषं त्य- जन्ति गणिका भ्रष्टं नृपं मंत्रिणः ॥ पुरुषं पर्युपितं त्यजन्ति मधुपा दग्धं वनान्तं मृगाः । सर्वे कार्यवशाज्जनोऽभिरमते कस्यास्ति को वल्लभः ॥ सुत मात पिता तिरिया अनूप । अति होत सुखी लखि मूढ भूप ॥ ये स्वारथके हैं दिना चार । भजु निर्वि० ॥ (७) विदलयति कुबोधं बोधयत्यागमार्थम् । सुगतिकुगति- मार्गौ पुण्यपापं व्यनक्ति । अवगमयति कृत्याकृत्यभेदं गुरुयो ।
(४) अर्थ-जिसका मन क्षणमात्रमें आत्मविचारमें स्थिरताको प्राप्त हुआ है, उसने मानों संपूर्ण तीर्थोंमें स्नान कर लिया, समस्त पृथ्वीका वान कर चुका, अनेक यज्ञकर चुका, तथा सर्वदेवन(ओंका पूजन कर चुका, अपने माता पिताओंको संसारसे उद्धार कर चुका और बहो त्रैलोक्यके पुजने योग्य हैं ॥
(५) अर्थ-जबतक यह शरीर पुष्ट और आरोग्य है, तथा वृद्धावस्था दूर है और इन्द्रियोंकी शक्ति न्यून नहीं हुई, तथा जबतक आयुष्य क्षीण नहीं हुआ तबतक बुद्धिमान् पुरुषको उचित है कि अपने कल्याणका यत्न अच्छी-तरह कर ले, नहीं तो जब घर चलने लगे तब कूप खोदनेके उद्योगसे क्या होता है ? ॥
(६) अर्थ-वृक्षको फलहीन होनेसे पक्षी त्याग देते हैं, सरोवर सूख जानेसे सारस, निर्द्वय पुरुषको बंश्या क्षष्ट राजाको मंत्री, फूल झड जानेपर भ्रमर और बनको भस्म हो जानेसे मृग त्याग देते हैं, अतएव क्षव प्राणी अपने २ स्वार्थके कारणसे पास आते हैं, नहीं तो कौन किसका मित्र है ? ॥
(७) अर्थ-जो अज्ञानका नाश करि शास्त्रके अर्थका ज्ञान करता है सद्-असद् मार्ग तथा पुण्य पापको
शब्दावली
(८९)
भवजलनिधिपोतस्तं विना नास्ति कश्चित् ॥
सतगुरु कवीर गुणगण गँभीर । दुखहरण हेतु धारचो शरीर अति धीर वीर मति गति उदार । भजु निर्विकार सतनाम सार ॥ ७ ॥
सौरठ-सवय १२ बजे रात्रि
बनंढो भलो रिझोंयोरी । मोरि सुरैति सोहांगिन नवलें बनी, साँहिब वर पायोरी । टे० ॥ लख चौरासी भटकत २ यह दिन आयोरी । ऐसो अवसर पाय गँमायो, तिन पछितायोरी ॥ ज्ञान को मंडप छाय युक्तिसे, श्रद्धा कलश भरायोरी । सार शब्द अनबेधे मोतियन, चौक पुरायोरी ॥ सत्यनामको मोर बँधायो, पडेलो प्रेम लगायोरी । पांचपचीस सहेली हिलमिल, मङ्गल गायोरी ॥ सतगुरुसे हँथलेवो जोडचो, भक्तिकी भाँवर खायोरी । सुर तैतिस बराती, ब्रह्मा वेद सुनायोरी ॥ भवसागरको फेरो मेटचो; परनिर्पाति घर लायोरी ॥ प्रेमसहित एकचित हो, दुविधा दूरि बहायोरी । सत्यलोकमें अद्भुत मन्दिर, तामें पलंग बिछायोरी । धर्मिनको सतगुरु कवीर मिलि; तपन बुझायोरी ३६॥
ननदी ! जावोरी महलमें, आपनो विरन जगाव ॥ टेक० ॥ बिरन जगायो ना जगे, करौ मैं कौन ? उपाव । घट औधियारो हो रह्यो, लागि सकत नहि दाव ॥ भरमके तालेमें सखी कुञ्जी सुमति लगाव । कपट किवीरैया खोलिकै, ज्ञानको दियैना जराव । ततको तेल लगायकै, तृष्णा केश गुथाव । भूषण पहिरि विवे- कके, निज शृङ्गार बनाव ॥ शीलके रँग रँगवायकै, अँगियाँ अङ्क
बताता है, करने योग्य कर्म और नहीं करने योग्य बर्त्मको सम्झाता है सो गुह है तिस गुह बिना संसार सागरसे पार करनेवाली कोई दूसरी नवका नहीं है।
१ त्रुहा. २ बरा किया. ३ सुन्दर प्रीति. ४ सघवा. ५ सुन्दर बुलहन. ६ प्रभु.
१ विवाहके समय जो वस्त्र लाडी (बुलहन) को उड़ाया जाता है २ सखी ३ पाणि ग्रहण ४ फेरा.
५ विवाह करके. ६ माईको । ७ कुँची, ८ फिवाठ. ९ दीपक, दीवा. १० बोली.
(९०)
कवीरपंथी—
कसाव । भक्ति चुनरिया ओढ़िकै यहि विध पियको रिझाव ॥ हृदय महलबिच सुन्दरी, प्रीतिको पल्लंग बिछाव । श्रद्धा सेज सँवारिकै, प्रियतमको बैठाव ॥ विनय बीजना हाथलै, सनमुख पियके ढुराव । एकचित होय अभिमान तजि, चरणन शीश नवाव ॥ भलो बन्यो संयोग है, अवसर मती गँवाव । कहै कवीर कमालसे उठि मेरे ढिगँ आव ॥
बिहाग । (समय २ बजे रात्रि)
देखो डुरमति यह संसारकी । हरिसो हीरा त्यागि हाथसे, बांधत मोट विकारकी ॥ टे० ॥ कोइ खेती कोइ बनिज करत है, कहूँ हौसँ हथियारकी । बहु धन्धेमँ जन्म गमायो, सुधि बिसारि करतारकी । देवी देव आराधत डोलै, सुनि २ विप्र लबारकी । निज आतमको चीन्हत नाही, फूटी आँखि गँवारकी ॥ चलत कुमारग लाज न आवे, कहँ गयि बुद्धि विचारकी । अपने करसे निज गल फांसी, डारत मायाजारकी ॥ वारम्बार पुकार कहत हों, मोहिँ सौ शिरजनहारकी कहै कवीर यह विनश जायगी, क्षणमँ काया क्षारकी ॥ ३ ॥
कालिगढ़ा । (समय ४ बजे रात्रि)
सन्तकी मंहिमा अपरम्पार । सन्त और भगैवन्तमें अन्तैर, तनिक न देखु विचार ॥ टे० ॥ वेद पुराण भागवत गीता, कहत सकल निरधारै । सन्तसमान और कोइ नाही, अधम उधारन- हार ॥ सन्तसमाँगम सम कोइ तीरथ, और नहीं संसार । मज्जन करत जन्मके पातक, कटत न लगै वार ॥ काम कोध मद मोह द्रोह तजि, गुरुपदके आधारै । रहत सदा सन्तोष धारि उर, परखिकै सार असार । महामलीन हीन मति पामर, अघ अव-
१ पंखा. २ पास. निकट. ३ प्रपंचकी गठरी. ४ उत्साह. ५ स्मृति. ६ मूठा. ७ परमात्मा. ८ घूल, मूतका. ९ माहात्म्य. १० अपार. ११ परमात्मा. १२ बीच. १३ निश्चय. १४ सतसंग. १५ स्नान. १६ आश्रय.
शब्दावली ।
(११)
गुन आगाँर। होत प्रवीन नीतियुत तिनके, सुनि उपदेश उदार ॥ जाघर सन्त दया करि जनि पर, आवत लेन अहार। ताघर दुख दारिद्र नाश होय, भरत अटँलभण्डार ॥ जो नहिँ होते सन्त जगत्में, को अस करि उपकार ॥ हूवत आय करत जीव- नको, भवसागरके पार ॥ कहि न सकत कवि कोविंद कोऊ, सन्तनको व्यवहार। निशि वासर गुण गावत मान्यो, शेष सहस मुखहार ॥ रवि नहिँ होत मँलीन दुष्टके, लाय उड़ाये छार। कहैं कवीर सन्तकी निन्दा, करै ताहि धिक्कार ॥ ३९ ॥
जपु मन सत्य नाम सुखदाई। जो तूं चाहे आय जगत्में अपनी सूठ भलाई ॥ ८० ॥ गर्भवासमें भक्ति कबूल्यो, सो सब सुधि विसराई। आय परचो मायाके फन्दे, मोह जाल अरुझाई। मानुषिता सुत भाइ बन्धु तिय, बहिन भुवा भौजाई। अपने २ स्वारथ कारण प्रीति करत सब आई ॥ भवसागरमें भटकत २, यह मानुष तन पाई। खोवे बूथा भक्ति बिन प्रभुकी, धिक ऐसी चतुराई ॥ कहैं कवीर चेतु अबहूँ नहिं, फिरि चौरासी जाई। पाय जन्म शूकर कूकरको भोगेगा दुख भाई ॥ ४० ॥
प्रभातो (समय-प्रातः-काल)
(श्री १०८ युवत महंत शम्भूदास साहेब विरचित)
जयति जय धर्मधुर धीर कव्वीरगुरु, जयति जय वीर वर ब्रह्मचारी। दहनर्वनमोह गुणगहेन भूषितं विभो, भक्त भवैशूल निमूँलैकारी ॥ ८० ॥ अच्युतानन्द सुदकैन्द स्वच्छेद दलिं, दोषदुखद्वैन्द लीलाऽवतारी। कम्बुकैर्पूर मदचैर अतिधवलैवपु,
१ घर. २ अक्षय कोठार. ३ पण्डित. ४ मँला. ५ धर्मके चलानेवाले. ६ धैर्यवान्. ७ अष्टबलवान्. ८ मोहरूपी बनको भस्स करानेवाले. ९ अनन्त गुण. १० शोषित. ११ प्रभु. १२ भक्तोंका जन्मरणादिक दुःख १३ नाशकर्ता. १४ अखण्डसुख. १५ आनन्दमूल १६ बन्धनरहित. १७ नाश करके. १८ उत्पात. १९ कौतुके प्रगट भये. २० शंख और कपूर. २१ निरादर करके २२ परम शुद्धरूप.
(१२)
कवीरपथी—
सकलेंसुखगेह नरदेहधोरी ॥ अभितंसौन्दर्य सुखधाम अभिराम अति कोटिशतकामंगर्वापहारी । तरुणकंझारुणं हरण, शोभा- चरण, दीनविश्राम परमोपकारी ॥ सत्यपदपुष्ट दलि दुष्ट दुर्वा- संना सदा संतुष्ट सन्तोषधारी । अंमल अनेवद्य अय्येत्क अवि- चलें अजितें अनेघ अद्वैत अजें निर्विकारी ॥ जगद्विरुंयात तव चरित सुंरसरितसम पतितंपावन परमंपापहारी । साधुजन वृन्दं अरविन्द दिनकैरनिकर, उदय जय जयति सर्वैरुंचारी ॥ येन चरणामृतं पाँनकृत सर्वदा तस्य परिचारिका मुक्तिकारी । सर्वसत्रांस नाशक धर्मदास प्रभो, राजराजेन्द्र पारख विहारी ॥
जयति जय कञ्चपण्ज परीक्षक प्रभो, प्रौढगूढार्थविद वेदासां- रम् । भक्तवत्सल दयासिन्धु करुणायतन, राजराजेन्द्र लीलाऽ- वतारम् । पतिततारणतरण दीन अशौरण शरण, मोदें मङ्गल- करण अतिउदारम् । क्षमा वैराग्य सन्तोष समता दया, आदि- युत शील धीरज विचारम् ॥ परम कल्योणमय ध्यान निर्वाण- प्रद, रहित अनुमान मायाविकारम् । विगतें अज्ञान प्रज्ञान विज्ञान घन, मोह मद मान कौनन कुठोरम् ॥ लोभवन दह्नन अति- प्रबलदावानलं कामक्रोधादि केरवतुषारम् । मर्वतोभेद्वर प्रखेर
१ संपूर्ण सुखके स्थान. २ मनुष्यशरीर धारण किये. ३ अपार सुखरता. ४ अति रमणीय. ५ अनेक कामदेवके बानको नाश करनेवाले. ६ नवीन लाल कमल. ७ दुःखी जीवोंके आरामका स्थान. ८ अत्यंत उपकारी. ९ त्रिकालबाध्य पदपूर्ण प्राप्त. १० दुःखाशा. ११ स्वच्छ. १२ अजिज. १३ गृह. १४ स्थिररूप. १५ नहीं जीतने योग्य. १६ पापरहित. १७ एक. १८ जन्मरहित. १९ दुःखमुखावि शिकाररहित. २० संसारप्रसिद्ध. २१ आपके गंगाक्षमानचरित्र. २२ पापियोंको चबित करनेवाले. २३ महान् पातक करने वाले. २४ समूह. २५ कमल. २६ सूर्यपुंज. २७ पान किया. २८ उसकी वासी. २९ सालीक्य सामीप्य और सायुज्य. ३० दुःख. ३१ स्वामी. ३२ सार्वभौम प्रभु. ३३ कमलपत्रसे उत्पन्न. ३४ पारखी. ३५ मूर्गारुप्यतात. ३६ ज्ञानके सार परमात्म. ३७ शक्तोंको रक्षा करनेवाले ३८ दयासागर ३९ कृपास्वरूप. ४० पापियोंको पार उतारनेकी नौका. ४१ तरणरहित. ४२ आनंद. ४३ कल्याण. ४४ अत्यंत बानी. ४५ मंडलरूप. ४६ आकार. ४७ मोक्षदायक. ४८ प्रपंच. ४९ अज्ञान रहित ५० उत्कृष्टबोध सहित विशेष विज्ञानस्वरूप. ५१ वन, जंगल. ५२ कुल्हाडी. ५३ अत्यन्त बलवान् बावामिन. ५४ रानविकाशी कमल. ५५ हिम्न. ५६ बड़ा भवन. ५७ तेज.
शब्दावली ।
(९३)
दिनकरनिकर; उदय हरणांय जगदन्धकारम् । यस्यं प्रत्यक्षित योग जप यजंन मुनि, यत्न कुर्वन्ति नानाप्रकारम् । तस्य विग्रह विदितं साधुगुरुरूपधृतं; अखिल अघओर्वेहृत निर्विकारम् ॥ विविधैगुण गणैत श्रुति शारैदा शेष, निशिदिवसै यदि तदपि नहि लहत पारंम् । नो'मि कव्वीरगुरु नोमि कव्वीरगुरु, वदंति धर्मदास ईति वारवारम् ॥ २ ॥
जयति गुरुज्ञान रक्षक परीक्षक प्रभो, छेन्नचूर्णार्थ पूर्णाऽव- तारम् । अखिल पाखण्डगर्वघ्र बीजकैतिकल, निर्मितं हरण जगदन्धकारम् ॥ टे० ॥ शुद्धं सर्वेश सर्वज्ञ सेवक सुखैद, सर्वदा शौन्त सन्तोषधारी । नित्यं निर्वाणं निर्मोह मत्सररहित, निर्भ- रानन्द स्वच्छेदचारी ॥ दोष दुर्वासना मान दम्भापहर्न, धर्म व्रतं शीलरतं निर्विकारी । ब्रह्मगुरुं जीवमायोकि परस्वैमर्तगति भ्रमित सिद्धान्त सुखचाँरुचारी ॥ विगत मैल आवरणं सहित अव्यग्रचित, अभितमोयादितत्वात्मज्ञानी । परम पांवन प्रवैर मोदप्रैद यस्य पद, परस्व प्रत्यक्ष निज राजधानी ॥ जीव निज- कर्मवश भ्रमत भवचैक अति, सहत दुख दुसहैदारुण अनेकम् ॥
१ हरण करनेके लिये. २ जिसके. ३ दर्शके लिये. ४ यज्ञ. ५ उपाय करते हैं. ६ बहुत प्रकारके ७ उसकी. ८ मूर्ति. ९ प्रसिद्ध १० धारण की हुई. ११ पापसमूहके नाशक. १२ अनेक प्रकारके गुण १३ गणना करते हैं. १४ वेद. १५ सरस्वती १६ तन्त्रिदिन. १७ तीमो १८ पूर्णताको प्राप्त होना. १९ नमस्कार करता हैं. २० कहते हैं. २१ हठप्रकारसे २२ सहायक. २३ कपट, जाल. २४ नास्तिकोंका माननाशक. २५ बीजककी टीका. २६ रचा, बनाया २७ निर्विकार सर्वके प्रभु. २८ संपूर्ण जाननेवाले. २९ आनन्ददायक ३० सदकाल. ३१ सुखी. ३२ आनन्द धारण किये. ३३ अखण्ड. ३४ मोक्ष रूप. ३५ अभिमान रहित. ३६ अतिशुखरूप. ३७ स्वच्छाते विचरनेवाले. ३८ पाखण्डनाशक ३९ नियम, ४० सचरित्रधारी. ४१ ब्रह्मसुख गुरुमुख जीवमुख और मायामुख. ४२ निज और अन्यका. ४३ ज्ञान. ४४ कहा हुआ निर्णय. ४५ सुन्दर बहुमूल्य. ४६ पाप. ४७ अज्ञान. ४८ शांतचित्त. ५१ अनेक प्रकारके भायादि तत्त्व (जड़ पदार्थ) और चेतनके ज्ञाता ५० अत्यन्त पवित्र. ५१ उत्कृष्ट ५२ सुबदायक. ५३ दृष्टिगोचर ५४ चौरासी. ५५ कठिन असह्य.
(१४)
कवीरपंथी—
व्याथां अवलोकि करुणांअयन ज्ञानघन, वदति बाधाशंमन यत्नंमेकम् ॥ हेतु कैवल्यंप्रद साधुगुरु २, श्रद्धया मूढ भर्जु वार- वारम् । निखिलं निर्णीतं सिद्धान्तमिति निश्चितं, नीरनिधि निगमनिर्मथितसंसारम् ॥ आदिमध्यान्त नहि दुःख त्रेकालं इति वदति वेदान्तंविद् ब्रह्मवादी । सकल तंत्रार्थ उद्धृतंपरीक्षाकृतं, आत्मौनात्म सुख दुख अनौदी ॥ जनित अज्ञान त्रेतापदौवास- नलम् शमन गुरुबोधैवर मेधैमाला ॥ शोक सन्तापं भवदौप नाशकं कवच, विश्ववैरीश सेतुं विशाला ॥ सामवेदादिगो तीत यं गीयं ते, शम्भु अज अमल अर्द्धय अनुपमम् ॥ तज्जैगद्विदित सुरवृन्दं वन्दितंपदम्, वेष मङ्गल धृतं साधुरूपम् ॥ ३ ॥
जय धीर वीर कवीर, भवजैल पीरं भीरं विनाशनम् । सूरै- तीर मनुजशरीर धृत गमैभीर ज्ञान प्रकाशनम् ॥ टे० ॥ झाँई सन्धिं विकार करि, निरंवार भार विदारणम् । विविध विधि टकसार, गुरुमुख द्वार सार विचारणम् ॥ मारतैण्ड प्रचण्ड तर्म् पाखण्ड खण्डेन कारणम् योगदण्ड अखण्डताप, प्रताप पाप प्रहारणम् ॥ जय कल्पपादप पौर्ण सम भैट्टु चरण हरण भर्वाण- वम् प्रद मोद मङ्गल करण अशरण शरण दीन उधारणम् ॥ आनन्दकन्द स्वच्छन्द दलि, दुख द्रुद्ध फन्द निकेन्दनम् । इति
१ दुःख. २ देखकर. ३ दयाके स्थान. ४ दुःखनाशक. ५ उपाय. ६ मोक्षदायक कारण. ७ विश्वाससे ८ मज्जन कर. ९ सर्व. १० निर्णय किया हुआ. ११ शास्त्ररूप समुद्रको मंथनकर सार निकाला हुआ. १२ सूत, शब्द और वर्तमान. १३ अद्वैतवादी १४ सर्व सिद्धान्तसंमत. १५ जड चेतन. १६ आविर्भूत १७ अज्ञानसे उत्पन्न. १८ आध्यात्मिक, आधिभौतिक और आधिदैविक ऐसे तीन प्रकारके दुःखरूप नावानि १९ गुरुका ज्ञान २० बादलोंको पारित. २१ दुःख २२ जन्म, मरण. २३ बखतर. २४ संसारसागर. २५ पुनः २६ अगोचर. २७ गान करते हैं. २८ एक. २९ उपमारहित. ३० संसारसे प्रसिद्ध. ३१ देव समूह ३२ वनतिबिम्ब. ३३ संसारसागर. ३४ दुःख. ३५ समूह. ३६ सरोवरके किनारे. ३७ अबाहू. ३८ प्रतिबिम्ब. ३९ माया ४० निर्णय करके. ४१ समूह ४२ नष्ट करना. ४३ यथाशास्त्र. ४४ सिद्धान्त. ४५ तन्त्र. ४६ सूर्य. ४७ तेजवान्. ४८ अन्धकार. ४९ तोडना. ५० हेतु. ५१ आसा. ५२ अवाधित तेज. ५३ प्रभाव. ५४ नाशकर्ता. ५५ कल्पवृक्ष. ५६ पत्र. ५७ कोमल. ५८ संसारसागर. ५९ निर्मूल.
शब्दावली
(१५)
अन्तरहित अनन्त सन्त महन्त तन गुण वन्दनम् ॥ धर्मदास जास विलास त्रास, कराँल जाल विभञ्जनम् । दलिहाँल दीन दयाल कीन्ह, निहाल सुनि मन रञ्जनम् ॥ ४ ॥
जय उग्रनाम अकाँम, मङ्गल धाम नित्य निर्गामयम् । भव श्रमित शुभविश्राम अति अभिराम पदप्रद निर्भयम् ॥ ५ ॥ मोह माया मान दम्भ मदादि मत्सर दूषणम् । रहित नानारोंग परम विरोंगसहित विभूषणम् ॥ साँनुरोध विरोध हरण, प्रबोधमय कारण परम् । विगत द्वन्द्व स्वच्छन्द, परमानन्दकन्द विनिर्भरम् ॥ कालशेषै खैगेश भवद्वैपदेश, भो ! कर्हणाकरम् । भव्यैवर वरदेश अखिल, अंशेष श्रेयै सुदाँवरम् ॥ भुक्तकञ्चदिनेशै ज्ञान धनेशै, कलेशजगद्भवम् ॥ शमन सकल अहेतु प्रभु, वृषैकेतु सेतुभवाणवम् शंभु यस्य पदाँरविन्द, पर्राग सञ्चितकैर्मजम् । व्याधिप्रबलभूत, अति अनुभूत पावन भैषजम् ॥ ६ ॥
भज सुखद परम प्रबोधैप्रद, प्रत्युह हरण कुपालके । पारिजातैकपर्णनवसम, चरण साहिबलालके ॥ ७ ॥ अरुण नखै बुति दिपैति, दिव्य दिगन्तै तमदलैमालके । ज्ञित विविध विकार कीन प्रहार भवभ्रम जालके ॥ मृदुलै मँजु पराग पावन, तिलक कृत निजैमालके । नशत सकल कुअकै विधिकैरलिखित कर्म कपौलके ॥ प्रगट मन्त्र प्रत्यक्ष शामक, दक्षै विष अहि
१ खेल. २ डर. ३ मयकर. ४ नष्टकर्ता. ५ दुःखनाशकारि ६ आनंदित करना. ७ कामनारहित ८ रोगरहित. ९ थके हुए. १० दोष. ११ अनेक प्रकारको शक्ति. १२ त्याग. १३ विशेष मूर्खत. १४ हठ करके. १५ अत्यंत. १६ सर्प. १७ गडपक्षी. १८ आपका उपदेश. १९ कृपालु. २० बल्लूकल. बरदायक प्रभु. २१ संपूर्ण. २२ कल्याण. २३ उत्तम सुखरूप. भक्त २४ कमल सूर्य २५ कुबेर. २६ महादेव. २७ चरणकमल. २८ धूलि. २९ पूर्वकृतकर्मजन्म. ३० अत्यन्त बहादुरा रोग. ३१ अनुभव की हुई ३२ पवित्र औषधी. ३३ ज्ञानदायक. ३४ विघ्न. ३५ कल्प वृक्षके नवीन पत्रसमान. ३६ काति. ३७ प्रकाशित. ३८ दिशाओंके अन्तपर्यंत. ३९ अन्धकार समूहमाता. ४० उत्पन्न हुआ. ४१ कोमल. ४२ सुन्दर. ४३ किये. ४४ अपने मस्तक. ४५ दुःखको रेखा. ४६ ब्रह्मदेवके हाथको लिखी. ४७ मस्तक. ४८ प्रतिद. ४९ योग्य. कुशल. ५० सर्प.
(१६)
कबीरपंथी-
कालके नहिं । अन्यं रक्षक पक्षं तजि पदलंक्ष दीनदयालके ॥ जेहि हेतु शंभु शुकादि निशदिन, ध्यान धरत त्रिकालके । सोई प्रवरपद परखाय मेटयो, शाल जगजंजालके ॥ ६ ॥
जय कवीर धीर वीर हरण पीपरे । देखि काम कोध आदि प्रबल रिपुं डरे ॥ टे० ॥ अति अपार भवविकार धारमें परे । हीनं दीनं छीनं जीव पार बहु करे । जासु वचन ज्ञानभानु लखि विकोशरे । उदय भोर जानि चोर मानमद टरे ॥ जागे शम दम विराग आदि योगरे । परम धरम जानि जाहि साधु आंदरे ॥ दीनबन्धु दयासिन्धु जासु नाम रे । मोदधाम विगत काम सन्त वदैंतरे ॥ धर्मदास जास त्रास काल विकल रे । ऐसो श्रीगुरु प्रताप मंगलैंाचरे ॥ ७ ॥
जय जय सतगुरु कवीर, सन्तन सुखकारी ॥ टे० ॥ कमल- पत्रपर अनूप, लीला करि धारि रूप, प्रगटे जग हँसभूप, अजर निर्विकारी ॥ मङ्गलमय सिद्धिसैदन, दिव्य शर्वरीशैं वदैंन, वारैं लखि कोटि मदन, बाल ब्रह्मचारी ॥ शोभित सुद्धा विशाल, शुभ्र सरल तिलक भाल, भूषित उर रत्नमाल, शीश मुकुटधारी ॥ गावत गुणसुर अशेष, नारद शारैंद गणेश, कमलासँन अरु महेशैं, दै दै कर तारी ॥ पारिजात तरुण परण, के समान अरुण चरण, शरण आय धर्मदास, तन मन धन वारी ॥ ८ ॥
जय जय साहिब कवीर, काशीपुरवासी ॥ टे० ॥ बूढत भवसिन्धु धार, भक्तन कीन्हौं पुकार कीजे सत गुरु उँवार, अखिल स्वप्रकाशी ॥ दुखित जीवलखि दयाल, सर्वेश्वर प्रभु
१ दूसरा रक्षा करनेवाला. २ सहा. ३ चरण कमल का ध्यान. ४ दुःख. ५ शत्रु ६ त्यागा हुआ. ७ दरिद्री. ८ दुर्बल. ९ प्रकाश. १० सत्कार किया. ११ कहते हैं. १२ कल्याण करे. १३ सिद्धिका स्थान. १४ चन्द्र. १५ मुख. १६ निछावर करना. १७ श्वेत. १८ सीधा. १९ सरस्वति. २० ब्रह्मा. २१ महादेव २२ बच्चा
शब्दावली ।
(१७)
कृपाल, दलन निखिल कालजाल, प्रगटे अविनाशी ॥ कुन्दु इन्दुके समान, विमल वपु प्रकाशमान, मंगलमय सुभगध्यान, तेजपुञ्जराशी ॥ लीला एक करी नाथ, गनिकांको पकरि हाथ, फिरे लिये साथसाथ, कीन्ही जगहाँसी ॥ माया मन धारि टेक, कीन्हों छल बल अनेक, हारी नहिं चलयो एक, कम्पित है त्रासी ॥ प्रवर पूज्य परमपितृ, दयासिन्धु दीनमित्र, पतितन कीन्हों पवित्र, परखपद प्रकाशी ॥ कुपथ कुटिल कर्म कोहै, दम्भदोष मान द्रोह, काम कोष लोभ मोह अखिल शत्रुनाशी ॥ जाप जपत नसत पाप, जामु नामके प्रताप, शरण सुखद हरण ताप, अमरपुरंनिवासी ॥ गावत गुण धरि विश्वास, नित्यंप्रति वसिष्ठ व्यास, धर्मनि तज सकल आस, चरणनकी दाँसी ॥९॥
मिथ्या मायाजाल जगत मन, क्यों तू देख भुलाया है ? ॥ टेक ॥ सुमनैं सुहावन सुन्दर फल लखि, सेमर सुवा लुभाया है । मारी चोंच रुई निकरी जब, तब मनमें पछताया है ॥ धूमसैमूह जानि घँन चाँत्रिक, तृषां विवश हो धाया है । मिटी न प्यास भयो दुख दारुण, नयनहीन अकुलैलाया है ॥ सुँत वनितौं इत्यादि सकल निज, स्वारथ प्रीति लगाया है । यह मन मूढ मूढैताके वश, मोहजाल उरझाया है । प्रबल अविद्यैके प्रताप शठ; फिरि चौरासी आया है । कहैं कवीर चेत नर अजहू, मानुष योनी पाया है ॥ १० ॥
१ नारायित. २ चन्द्रमा. ३ शरीर. ४ प्रकाशका समूह. ५ वेश्या. ६ पिता. ७ कुमार्ग. ८ देहा. ९ कल्पना. १० सत्यलोकके रहनेवाले. ११ चरित्र १२ श्रद्धा धारण करि १३ सदाकाल. १४ परिचारिका. १५ फूल. १६ धुआँका पुंज. १७ बादर. १८ पपीहा. १९ प्यास. २० बौडा. २१ मयंकर. २२ व्याकुल हुआ. २३ पुत्र. २४ स्त्री. २५ मूर्खता. २६ अज्ञान. २७ खानि.
कवीरपंथी-शब्दावली ४
(१८)
कबीरपंथी—
मानुषको तन पाय जन्म क्यों, मूरख वृथा गमाँवै है ॥८०॥ अति अमोल कंचनघटमें शंठ, हठ करि विष भरवावै है । पाय पियूष पखारन पद हित, मन्दमंती ढरकावै है ॥ ऐरावत गजराजपै मूरख, ईधनभार लदावै है । बहुश्रमकैरि लैहि चिन्तामणि तेहि फेंकिकै काग उडावै है ॥ आक रुईके हेत खेत कंचन के हर जोतवावै है ॥ कल्पंतहूको काट धतुरा, आँगन माहि लगावै है ॥ कहै कबीर सूढता कहाँलग कहैं, कही नहि जावै है । तजि गुरुज्ञान वारि सूरसरिता, मृगजलै प्यास बुझावै है ॥ ११ ॥
रागिनी औरबी समय सूर्योदय ।
अब मोहिं दरशन दीजे कबीर । तुम्हरे दरशसे पाप कटत हैं, निरंमल होत शरीर ॥ ८० ॥ त्रिविधताप भोगत चौरासी, अति जिव भयो अँधीर । अब तो कृपासिन्धु दुख मेटो, यमसे कागदचीर ॥ भवसागरमें नैया अटकी, वशपरि विषय सँमीर । डूबत आय उबारो प्रभुजी, खेय लगावो तीरै ॥ कोई ध्यावत गौरी शंकर, कोइ सिया रघुवीर । मेरे तो एक तुमही धनी हो, क्यों न हरो यह पीर ॥ धर्मदास विनवे करजोरी, प्रभु तुम गुण गंभीर । मैं अति हीन दीन शठ पामैर, क्षमा करो तर्कसैर ॥ १२ ॥
सत गुरु हो ! मोहिं उतारो भवपार । तुमबिन और सुनैको मेरी, औरतनाद पुकार ॥ ८० ॥ गहरी नदिया नाव पुरानी- आय परी मैंझें धार । विषय बयँर प्रबल चहुँदिशसे, तापर करत प्रहँर ॥ ताँत मात सुत भाई बन्धु तिय, लोक कुटुम परि- वार । अपने अपने स्वारथके हित, राखत सब व्यवहार ॥ नेम
१ निरफल. २ सुवर्णका घटा. ३ मूर्ख. ४ आग्रह. ५ अमृत. ६ पावघोनेके लिये. ७ मूर्ख. ८ घडेमेंसे बाहर बाहर निरता है. ९ इन्द्रका हाथी. १० जलानेकी लकड़ीका बोझा. ११ बडे परिभ्रमसे. १२ पाया. १३ रत्न विशेष. जो चिन्त मात्रसे सब कुछ दे देता है. १४ कल्पवृक्ष. १५ गंगाजल. १६ मृगतृष्णाका जल. १७ मुह १८ केंच रहित. कायर. १९ वायु. २० किनारे. २१ अधम. २२ अपराध. २३ दुःखित चिलाहट. २४ बीछ. २५ वायु. २६ ताडना. २७ पिता.
शब्दावली
(१९)
धर्म व्रत यज्ञ दान तप, संयम नेम अचार । इनके फलसे स्वर्ग भोगकरी, फिर जन्मे संसार ॥ कृमी कीट पशु पक्षी आदिक, योनिनमें बहुवार । अमि अमि भटकयो चौरासी, दुख सहि अगम अपार ॥ धर्मदास विनवे करंजोरी है अति निरआंधार । शरणा; गतकी लाज तुम्हे प्रभु, अधम उधारन हार ॥ १३ ॥
गुरुसम और कहो को दानी । अति मतिहीन दीन शठ तारे विरदंलाज उर आनी ॥ १४ ॥ वालमीक नारद अगस्तमुनि, आदि और बहुज्ञानी । गुरुप्रसादसे नीच उंचमये, वेदपुराण बखानी ॥ जप तप आदि करें संयम व्रत; मुनि मुनि नाना बानी । तदपि न भिटै बिना सतगुरुके, चौरासीकी खानी ॥ लोकवेदकी कर्मधारमें बहे जात अभिमानी । त्रिविध दुसह दुख देखि दयानिधि, प्रेच्यो परख निशानी ॥ को कवीर गुरु इव करुणालय वेद वदति इति जानी । तद्विज्ञान हेतु शरणागत, गच्छ सकल अम भानी ॥ १४ ॥
गुरुसम को जगमें हितकारी । कलिमैलप्रसित अधम शठ पापर, बहु तारे नर नारी ॥ १५ ॥ हरिमाया करि त्रिभुवैन फैल्यो, भवदुख महाविकारी । रविकरनिकैर समान ज्ञानघन, गुरु अज्ञान प्रहारी ॥ हरिके कृत जिव जात रंसातल; गुरु तेहि लेत उंवारी । हरिसे गुणहैं अधिक गुरुके, देखो हृदय विचारी ॥ नारदमुख गुरुनिन्दा मुनि हरि, कोपें कियो अति भारी । गुरु करुणानिधान एक पलमें, चौराशी भंय टारी ॥ कहि न जात उपकार अनेकन,
१ हाथ जोड़ प्रार्थना करते हैं. २ अवलम्बरहित. ३ पापियोंको तारनेवाले. ४ महात्म्यको कृत्वा. ५ गुरुकी प्रसन्नतासे. ६ साधन. ७ तीन प्रकारके. ८ परीक्षाके लक्षणको. योजना की. ९ दयाके भवन. १० मूषक उपनिषदके खण्ड २ के मंत्र २१ में कहा है कि “तद्विज्ञानार्थ स गृहमेवाभिगच्छेत्, सत्कृत्पाणिः क्षत्रियं बह्मनिष्ठम्” अर्थात् जिस परमात्माके विशेष ज्ञानके अर्थ पूजनकी सामग्री हाथमेंलेकर जानी और खलिष्ठ गुरुकी शरण जावे ११ अर्थात् छोड़कर. १२ पापमें फंसे. १३ तीनों लोकमें १४ सूर्यसमूह. १५ नायकता. १६ पाताल १७ बचालेना. १८ कोष १९ दयाल २० डरभेदना.
(१००)
कबीरपंथी—
श्रुति गावत गुणहारी । हँरिविराश्रिशंकर सुख वरणत, गुरुपदकी अधिकारी ॥ झाई सन्धिकालको चहुँ दिश, फेल्यो फन्दामारी । सारशब्दसे सब परखायो, गुरु कबीर बलिहारी ॥ १५ ॥
रागिनी आसावरी. (समय १० बजे दिन.)
अवधू ! देखो ज्ञान विचारी । यह कौन पुरुषकी है नारी ॥ टे० ॥ कहति न व्याही ना मैं कुमारी, पुत्रजनत मैं हारी । कारी मुड़ीको एक न छोड़यो, तोहूपति वरतारी ॥ पिताकी कही एक नहीं मानी, ससुझायो मैंहतारी । पारपरोसिन पठवन आई तहुँ न गई ससुरारी ॥ ससुर हमारा है अति भोरा, सासु हमारी बारी । पीव हमारा झूले पालने, हमहीं झुलावनहारी ॥ मेरो रूप देखि मुनि मोहे, बड़े बड़े तपधारी । मैं वशमें नहीं काहुके आई रहगये सबझखमारी ॥ कोईकोइ सन्त निकट मोहि आवत, दूरहिसे ललकारी । कहैं कबीर जिन झूठी जानी, तिनको है बलिहारी ॥ १६ ॥
सन्तो ! सन्त बिलंग किन कीन्हा । लोकलाज कुलकी मरयादा, सबहि त्यागि जिन दीन्हा ॥ टे० ॥ जाति पांतिके भर्म भुलाने, सो नर काल अधीना । निजस्वरूप चीन्हो नहीं मूरख ताते दुविधा कीन्हा ॥ तुलसी ब्राह्मण अति कुलीन जग, सब कोई कहे प्रवीना । नाभाजी भङ्गीके बालक, तासु प्रसादी लीना ॥ ना मानो तो साक्षि बताऊँ, और सुनहु मतिहीना । सुपच भक्त रैदाससे अन्तर, प्रभुने कन्यौ कवीना ॥ शिवरी कौन कुलीन हती जिन, चाखि चाखि फल बीना ॥ सो प्रसाद पावन हरि मनमें, शंका तनक करीना ॥ कहैं कबीर (अवधू) सोई उत्तम जो भूले भक्ति घरीना । जिनके भाव भक्ति उरमें नहीं, सो नर नीच मलीना ॥ १७ ॥
सन्तो ! निरअंन जाल पसारा । स्वर्ग पताल मर्त्यु मण्डल
१ ब्रह्मा, विष्णु औरमहादेव २ श्रेष्ठता । ३ जाल । ४ विरक्त । ५ माता । ६ भजनेको ।
७ सासरा । ८ बालक । ९ न्यारा । १० काल ईश्वर ।
शब्दावली ।
(१०१)
रचि, तीन लोक विस्तारा ॥ टे० ॥ हरिहरब्रह्माको प्रगटायो, तिन्है दियो शिरभारा । ठाँव ठाँव तीरथ रचि रोप्यो, ठगवेको संसारा ॥ चौराशी बिच जीव फँसावे, कबहु न होय उँवारा । जारि बाँरि भँसमी करि डारे, फिरि देवे औतारा ॥ आवाँगमन रहे उरझावे, बाँरे भवकी धारा । सतगुरु शब्द विना नर चीन्है, कैसे उतरे पारा । मायाफाँस फँसाय जीव सब, आप बने करतारा । सत्य पुरुषका अमरलोक है, ताको मूँढो द्वारा ॥ नेम धर्म आचार यज्ञ तप, ये उँरले व्यवहारा । जासे मिले अखण्ड मोक्ष सुख, सो मारगँ है न्यारा ॥ कालजालसे बाँचा चाहो, गँहा शब्द ततसारा (टकसारा) * । कहै कवीर अमर करि राखों, जो निज होय हमारा ॥ १८ ॥
सन्तो ! सतगुरु अलैंख लखाया । परम प्रकाशक पुच्छें ज्ञान घन; घट भीतर दर्शोया ॥ टे० ॥ मन बुधि बानी जाहि न जानत, वेद कहत सकुँचाया । अगम अपार अथाहँ अगोचर, नेतिँ नेति जेहि गाया ॥ शिव सनकादि आदि ब्रह्माके, वह प्रभु हाथ न आया । व्यास वशिष्ठ विचारत हारे, कोई पार न पाया ॥ तिलमै तेल काष्ठमै अग्नि घृतै पयँ माँहि समाया । शब्दमै अर्थ पदार्थ पदमै, स्वरमै राग सुनाया ॥ बीजमाँहि अंकुर तँरु शाखों, पत्रै फूल फल छाया । त्यों आत्ममै है परमात्म, ब्रह्मजीव अरु माया । कहै कवीर कृपाल कृपा करि, निज स्वरूप परखाया । जपतप योगयज्ञ व्रत पूजा, सब जञ्जाल छुड़ाया ॥ १९ ॥
सन्तो ! सो निज देश हमारा । जहाँ जाय फिर हँसै न आवे,
१ वनाके स्थिर किया. २ नित्सार. ३ जालकर. ४ राख. ५ जन्म. ६ आना जाना ७ दुबावे. ८ कण्टका जाल. ९ दरवाजा. १० धधरके जगतके. ११ पन्थ. रस्ता. १२ धारणकरो. १३ अगोचर. १४ समूह. १५ दिखाया. १६ संकोच किया. * कहीं कहीं ऐसा भी आया और इससे भी शुद्ध ही भाव निकलता है। १७ गहरा. १८ ऐसा नहीं ऐसा नहीं मान किया. १९ घों २० दूध. २१ वस्तु. २२ पदका अर्थ. वृक्ष. २३ डाली २४ पत्ते. २५ आत्मा.
(१०२)
कवीरपंथी—
भवसागर की धारा ॥ टे० ॥ सूर्य चन्द्र नहिं तहाँ प्रकाशत, नहिं नभें मंडल तारा । उदयं न अस्त दिवस नहिं रजनी, विना ज्योति उजियारा ॥ पाँचतत्त्व गुणतीन तहाँ नहिं, नहिं तहैं सृष्टि पसारा । तहाँ न मायाकृत प्रपंच यह, लोक कुटुम्ब परिवारा ॥ क्षुधा तृषा नहिं शीत उष्ण तहाँ, सुखदुखको संचारों । आँधि न व्योंधि उ्योंधि कछु तहाँ, पाप पुण्य विस्तारा ॥ ऊँच नीच कुलकी मर्यादा, आश्रम वैर्ण विचारा । धर्म अधर्म तहाँ कछु नाहीं, संयम नियम अचारा ॥ अति अभिराम धाम सर्वोपर, शोभा जासु अपारा ॥ कहैं कबीर सुनो भाई साधो, तीन लोक से न्यारा ॥ २० ॥
सन्तो ! माया तनी न जाई । सदा एकसंग रहत है जैसे, वेल वृक्ष लपटाई ॥ टे० ॥ काम तजे तो क्रोधु न छूटै, क्रोध तजे तो लोभा । लोभ तजे उर आशा बाढै, मान बढाई शोभा ॥ गृह त्यागे फिरि मँठी बनावे, उदय अस्त दै फेरी । कुटुम्ब छोड़ शिष साखा मूड़ै, ममता बढे घनेरी ॥ देखनको पैसा नहिं छूवे, कौड़ी मिली न छोड़े । गुरुभंडारा हेतु नाम लै, मांगि २ धन जोड़े ॥ कर्म संयोग मिलै नहिं जबलों, तबलों महा विरांगी । मिले न करि सन्तोष रहै मन, तृष्णा पीछे लागी ॥ शिष्य समीप पुजावनके हित, सौ योजना चलि जावे हमे छोड़ मति औरको मानो, यह उपदेश ददावे ॥ सोइ त्यागी जो करे न इच्छा, मिले द्वेष नहिं मानै । कहैं कबीर सुनो भाई साधो, माया झूठी जाने ॥ २१ ॥
सन्तो ! समुझेकी मति न्यारी । निज दुख सुख सम सबको जाने, आतम तत्त्व विचारी ॥ टे० ॥ औरनको उपदेश दँदावे,
१ आकाश. २ प्रभात. ३ संध्या. ४ दिन. ५ रात्रि. ६ पृथ्वी. जल. अग्नि वायु, और आकाश. ७ सत्व, रज और तम. ८ मूख । ९ प्रवेश १० मानसिक दुःख. ११ शारीरिक रोग १२ उपद्रव. १३ बह्मचारी गृहस्थ, वानप्रस्थ. सन्यासी. १४ ब्राह्मण. क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र । १५ १ कुटी. १६ त्यागी । १७ निरन्तर कराने ।
शब्दावली ।
(१०३)
आप स्वतः नहीं मानें । सुख कुछ और हृदय कुछ औरहि, कैसे रामहि जाने ॥ औरसे कहे मोह नहीं कीजे, जो चाहो सुख भाई । माया मोह आप उरझाने, धिक् ऐसी चतुराई ॥ जग-प्रपञ्च है अति दुखदाई, कहि औरहीं समुझावे । आप रहत निशदिन प्रपञ्चमें, मिथ्या साधु कहावे ॥ बैरागी बनि पर वैभंवलखि; हँसिके नाक सिकोडे ॥ परी अपावन फूटी कौडी, तेहि देखी नहीं छोडे ॥ निज स्वारथको कथा सुनावे, बहुविध करि बकवादा । सो जगमें पण्डित कहवावे, है मूरखके दादा ॥ राग द्वेष जबलग घटभीतर, क्या भयो वेष बनाये । खर नहीं होत केश्रौरी कबहूँ, सिंहकी खाल्ल उढाये ॥ जो चेतन तेरे उर अन्दर, सोई सब घटमाहीं । कहैं कवीर राम किमि दर्शै, मैं तू छूटत नाहीं ॥ २२ ॥
सन्तो ! सहजसमाधि भली है । जबसे कृपा भई सतगुरुकी कितहुँ न वृत्ति चली है ॥ टे० ॥ जहँ २ जाऊं सोइ परिकरमा, जो कुछ कहूँ सो पूजा । गृह उद्यौन एकसम लेखों, भौव मेटि उरदूजा ॥ सोहँ हंसः से मनराता, मलिन वासैना त्यागी । सोवत जागत ऊठत बैठत, निशदिन तौरी लागी ॥ श्रवैण नाशिकै मुख निरोधैकरि हँठसे स्वास न रोकों । खुले नयन प्रत्यक्ष निरन्तरै, परमात्म अवलोकों ॥ कहैं कवीर योगकी रहनी, सुगमै प्रगट करि गार्ई । आसन प्राणायाम धारणाध्यानरहित सुखदाई ॥ २३ ॥
सन्तो ! मोहिँ कौन समुझावे । जीव ब्रह्म दोऊ एक कि न्यारे, याको भेद बतावे ॥ टे० ॥ एक कहे बहु शंका होवै, दो कहते सकुचावै । कहुँ २ एक कहुँ दो वँगैय, शास्त्र उभैय विधि गावे ॥
१ एश्वर्य. २ अपवित्र. ३ सिंह. ४ चर्म. ५ शीतर. ६ शरीर. ७ चित्तकी एकाग्रता. ८ अंतःकरणका परिणाम, सुरति. ९ परिक्रमा. १० वन, जंगल. ११ भावना. १२ इच्छा. १३. ध्यान. १४ कान. १५ नाक, १६ बंदकर. १७ बलकरके सदा. १८ सर्वदा. १९ देखूँ. २० सहज २१ वर्णन करता है. २२ दोनों.
(१०४)
कवीरपंथी—
ब्रह्म अखण्ड अनादि निरन्तर, इमि श्रुति कहि गोहरावै । जीव सदा उपजै पुनि विनशै, सो किमि ब्रह्म कहावै ॥ सर्वे शक्तियुत वह अरु यह जिव, अलैपसे काम चलावै । वह सर्वज्ञ त्रिकालको दर्शी, यह कछु लखि नहि पावै ॥ अस वितर्क सतगुरु विन दूजा, को करि कृपा मिटावै । ब्रह्म स्वच्छन्द जीव माया वश, प्रगट कवा दिखावै ॥ २४ ॥
सन्तो ! को जगको समुझावै । तजि प्रत्यक्ष सतगुरु परमेश्वर, जडको पूजन जावै ॥ टे० ॥ जडपूजाके फल अदृष्ट है, कालान्तरसे पावै । दृष्ट अदृष्ट उभय फलदायक, सो पूजा नहि भावै ॥ ले पार्षाण मूर्ति करसे गठि, बहुविधि रूप बनावै । विष्णु शंकर सूर्य गणपती, जो कुछ मनमें आवै ॥ दधि घृत पय मधु ले प्रमाणसे, तामें खांड मिलावै । यहि विधिसे करि पश्चामृत तेहि, मूरतिपर ढरकावै । पुनि ले विमल वारि सुरसरिको, शुद्ध स्नान करावै । धोय पोछि चन्दन लगायकै, पटें भूषण पहिरावै ॥ करी प्रतिष्ठा वेदमंत्रसे, तामें प्राण बुलावै । जो वहि मन्त्र सत्य करि मानै, निज पितु क्यों न जिवावै ॥ भोग थार धरि ताके सन्मुख, घण्टा नाद बजावै । भोजन कौन करें बिन चेतन, उलटि आपही खावै ॥ यहि विधि करत करत जड पूजा, आपहु जड बनि जावै । कहै कवीर ज्ञान सतगुरुका, कैसे हृदय समावै ॥ २५ ॥
बनि पिलु (समय ३-३॥ बजे दिन)
विवेकी, सन्त बसैं जेहि देश । ऋद्धि सिद्धि तहँ टहल करत हैं, धरि दासी का वेष ॥ टे० ॥ मन्दैकिनी गोदावरी गंगा, सरस्वति बहत हमेस । धन्य सो ग्रामैं रुचिरें अति पावन, अघ न रहत लवलैसैं ॥ दख दारिद्र दूर सब भागै, नाश होत भव क्लेश । अर्थ
१ पुकारे. २ उत्पन्न होवे. ३ नाश होवे, ४ योजा. ५ विविध प्रकार की तर्कना. ६ पत्थर. ७ दही. ८ मधु, सहद. ९ पवित्र. १० बहव. कपडा. ११ गहना. १२ समृद्धि. १३ जाणिमायिक अष्ट प्रकारकी. १४ मांगोरची गंगा. १५ नगर. १६ सोमावान. १७ किञ्चित्.
शब्दावली ।
(१०५)
धर्म अरु काम मोक्ष जन, पावत सुनि उपदेस ॥ काम क्रोध मद मोह द्रोह तहँ, कबहुँ न होत प्रवेस । सदा अनन्द बधावा घर २, मँगलाचार विशेष ॥ दुर्गत दोष अज्ञान अँधेरो, लखि शुचि ज्ञान दिनेश । कहैं कवीर सन्तकी महिमा, कहि न सकत श्रुतिशेष ॥ २७ ॥
यहि तन धनकी कौन बड़ाई । देखत नयन चलो जग जाई ॥ २८ ॥ कङ्कर चुनि २ महल बनाया, गहरी नीव खुदाय भराई । तासे तोहि निकारि धरैंगे, जड़ल बिच परिवारके आई ॥ मात पिता सुत नारि कुटुंबके, मोहजाल फन्दे डरझाई । बहु धन्धेमैं जन्म गँमायो, प्रभुकी सुधि मूरख विसराई ॥ कबहुँ न कियो एक क्षण संगति, साधु सन्तसे प्रीति लगाई । रह्यो अधीन सदा डुरमतिके, अपने मनमें करि चतुराई ॥ कहैं कवीर चेतु नर अजहूँ, कहीं तोहि बहु विधि समुझाई । गहु गुरु शरण हरण भवसंकट, जाँमें मिले मुक्ति सुखदाई ॥ २८ ॥
अथ प्रातःसन्ध्या - साखी ।
नमोनमो गुरुदेवजू, सत्य स्वरूपी देव । आदिअन्त गुणकालके, मेटनहारे भेव ॥ १ ॥ नमो नमो तुव चरणको, सतगुरु दीन दयाल । तुम्हरी कृपा कटाक्षसे, कटें सकल भ्रमजाल ॥ २ ॥ प्रणमों श्रीगुरुदेवको, सोहै सदा दयाल । काम क्रोध मद लोभको, क्षणमें देवे टाल ॥ ३ ॥ प्रकट वाणी निर्मल करी, बुद्धि निर्मल करिदेउ । मैं मूरख अज्ञान हूँ, नहिँ आवत कछु भेउ ॥ ४ ॥ मैं अधीन बन्दन करूँ, सुनियो श्रीगुरुराय । मार्ग सिर्जनहारका, दीजै मोहिँ बताय ॥ ५ ॥ भवसागर भारी भया, गहरा अगम अथाह । तुम दयाल दया करो, तब पाऊँ कछु थाह ॥ ६ ॥
ठाढेहौं कर जोरिके, अरज करौं गुरु देव । तुमहीं दीनदयाल
१ छिपतें हँ. २ अब भी.