कादम्बरी (पूर्वार्ध - चन्द्रकला-विद्योतिनी संस्कृत-हिन्दी टीका)
Kadambari (Purvardha) with Sanskrit-Hindi Commentary
बाणभट्ट / पं. कृष्णमोहन शास्त्री द्वारा
३२ प्रस्तावना
एवमेव यत्र तत्र प्रूफसंशोधनादिसाहाय्ये मिथिलाग्रन्थमालासम्पादकाहर्निशमस्मच्छुभचिन्तक-सोदरकल्प-व्याकरणाचार्य-पं० श्रीरामचन्द्रझाजी-महोदयान्मिथिलेशलब्धधौतप्रतिष्ठ-न्याय-व्याकरणाचार्य-पं० श्रीशोभितामिश्रजी महोदयाच्च महानुपकारः सञ्जातस्तदर्थं तयोरानृण्यं सततं शिरसा सहर्षं धारयामि।
सर्वथा दुःस्थितिसङ्कुलेऽपि काले कृतपरिश्रमैः चौखम्बा-संस्कृतपुस्तकालयाध्यक्षैः गोलोकवासि-श्रेष्ठि-श्रीहरिदासगुप्तात्मज-श्रीजयकृष्णदासगुप्तमहोदयैः विस्तृतकलेवरं ग्रन्थमेनं संस्कृत-हिन्दीयुतमिदानीन्तनं यावत् क्वाप्यमुद्रितं प्रकाशयित्वा राष्ट्रस्य महानुपकारः कृतोऽतस्ते सर्वथा धन्यवादार्हाः।
यद्यपि 'आत्मनः प्रियतया तनुभाजां नात्मनः कृतिषु दूषणदृष्टिः' इति न्यायान्मत्सदृशसरागाणां स्वविरचितसन्दर्भे दोषदृष्टिर्नैव जायते, तथापि स्वप्रेमपूर्णनयनावलोकनमात्रेण कस्यचित्सद्गुणत्वं न सम्भवितुमर्हतीत्येतत्प्रबन्धसमीचीनत्वासमीचीनत्वविचारणायां निष्पक्षन्यायभाजः सहृदया विद्वद्वर्ग एव प्रमाणम्। अपि च—
'मर्त्यैरसर्वविदुरैर्विहिते क्व नाम ग्रन्थेऽस्ति दोषविरहः सुचिरन्तनेऽपि।'
इति न्यायाद् भ्रमप्रमादयोः स्वाभाविकत्वात् सीसकाक्षरदोषाद्वा यदत्र स्खलनं सञ्जातं तत् क्षमासारा विद्वद्वरा दयोदयमधुरदृशा निरीक्षमाणाः संशोध्य संसूचनं क्षमिष्यन्ते मामिति सप्रश्रयं निवेदयति—
'तद्विद्वांसोऽनुगृह्णन्तु चित्तश्रोत्रैः प्रसादिभिः।
सन्तः प्रणयवाक्यानि गृह्णन्ति ह्यनसूयवः॥
न चात्रातीव कर्त्तव्यं दोषदृष्टिपरं मनः।
दोषो ह्यविद्यमानोऽपि तच्चित्तानां प्रकाशते॥
निर्दोषत्वैकवाक्यत्वं क्व वा लोकस्य दृश्यते।
सापवादा यतः केचिन्मोक्षस्वर्गावपि क्वचित्॥'
इत्यादिमूक्तयो ह्यत्र स्मरणीयाः सुधीवरैः।
न्याय्यादयं समादाय विपन्नश्चापि चेतसि॥
| रामनवमी<br>वि० सं० २०१८<br>२/९ धर्मकूप, काशी | भावकः—<br>कृष्णमोहनठाकुरः |
संक्षिप्त-कथासार
कथासरित्सागर्गीय-मकरन्दिकोपाख्यान
काञ्चनपुरमें 'सुमन' नामक एक बड़ा प्रतापी राजा राज्य करता था। किसी समय वह अपने दरबारमें बैठा था कि मातङ्गकन्या 'मुक्तालता' एक शुक (तोते) को पिंजड़े में रखकर अपने भाई 'वीरप्रभ'के साथ राजा से मिलने आई। द्वारपाल द्वारा अनुमति प्राप्त होने पर मुक्तालताने सभामें उपस्थित हो राजाका अभिवादन कर निवेदन किया—
महाराज ! यह 'शास्त्रार्थ' नामका शुक समस्त कलाओं और विद्याओं में निपुण है तथा वेदोंका मार्मिक अभिज्ञ है। आप इसे स्वीकार कीजिए, यों कह कर उसने द्वारपाल को वह शुक दे दिया। द्वारपाल उसे राजा के समीप ले गया। शुकने वहीं निम्नलिखित श्लोक पढ़ा—
'राजन् ! युक्तमिदं सदैव वपुषं देवस्य संदृश्यते वृन्दारण्यमुखे द्विजाङ्घ्रिजटिलश्वासावतोऽद्भूयैः। पूतावद्वसुनेव यत्प्रतिभवाद्ब्राम्हन्मुहुर्भगवती प्रावर्त्ततीह दिङ् दृक्षु प्रायः प्रजापालने ॥'
पुनः उसने कहा—'राजन् ! आदेश दीजिए किस शास्त्रका कौनसा प्रमेय कहूँ।'
राजा अत्यन्त आश्चर्यचकित हुआ। मन्त्रीने कहा—'पृथिवीनाथ ! प्रतीत होता है कि पूर्व जन्मके किसी शापवश तिर्यग्योनिमें ये कोई मुनि हैं, स्वभाववश इन्हें पूर्वजन्मके समस्त शास्त्रों का स्मरण है।'
राजाने शुकसे पूछा—'तुम्हारा जन्म कहाँ हुआ ? तिर्यग्योनिमें तुम्हें शास्त्रज्ञान कैसे हुआ ? आखिर तुम कौन हो ? अपना पूरा वृत्तान्त सुनाओ।'
शुकको कोई संकोच नहीं। उसने कहा—'महाराज ! यद्यपि मेरी कथा कहनेके योग्य नहीं, तथापि आपका आदेश शिरोधार्य कर कहता हूँ। सुनिए :
'विन्ध्यके निकट अतिविशाल वृक्ष पर एक शुक अपनी स्त्री के साथ कोटर बनाकर रहता था। मैं उसीका पुत्र हूँ। उत्पन्न होते ही मेरी माता चल बसी। वृद्ध पिता अत्यधिक खिन्न हुए। वे आस-पास रहने वाले शुकों के झूठे फलों को स्वयं खाते और मुझे भी खिलाते। अपने पंखों को ओढ़े रख वे मेरा पालन-पोषण करते।
एक समय वहाँ बहुत से शबर (भील) शिकार खेलने आए। दिन भर अनेक पशुपक्षियोंको मारते रहे। सायंकाल एक वृद्धशबर किसी पशुपक्षीको न पाकर ऐसे वृक्षके समीप आया। पक्षियोंका शब्द सुन कर वह वृक्ष पर चढ़ा और शुकों तथा अन्य पक्षियोंको कोटरोंमें से निकाल मार-मार कर पृथिवी पर पटकने लगा। इसे समीप आता देख मैं भयभीत हो पिताके पंखोंमें छिप गया। इतनेमें उसने मेरे कोटरमें भी हाथ डाल मेरे पिता को निकाल लिया और उन्हें मारकर पृथिवी पर पटक दिया। पिताके पंखोंमें लिपटा मैं भी उनके साथ ही पृथिवी पर गिर पड़ा और पंख से निकल कर वहीं गिरे सूखे पत्तोंमें अन्तर्धान होगया।
शबर समस्त पक्षियों को मार वृक्ष से नीचे उतरा। वहीं उसने कुछ पक्षियोंको अग्नि में भून कर खाया और शेष पक्षियों को लेकर अपने साथियोंके साथ चला गया।
उसके चले जाने पर मैं निर्जीव तो अवश्य हो गया किन्तु वह रात्रि अत्यधिक कष्टमें बीती। प्रातः सूर्योदय होने पर प्याससे व्यग्र होनेके कारण अपने पंखोंकी पैल में समीपवर्ती पद्मसर नामक सरोवरके निकट धीरे-धीरे गया। वहाँ मरीचि मुनि स्नान करने के लिए आए थे। दृष्टिन देख उन्होंने मेरे मुँहमें जल की बूँदें डालीं और मुझे दोनेमें रखकर अपने आश्रम ले गये। वहाँ मुझे देख महर्षि पुलस्त्यजी के मुख पर मुस्कुराहट छा गई। उपस्थित अन्य तपस्वियोंने उनसे पूछा—'भगवन् ! इस शुक को देख आप क्यों मुस्कराये ?'
५ का० सू०
३४ कथासार
महर्षिने उत्तर दिया—'यह शापवश शुकके रूपमें आया है । नित्य-कृत्य से निवृत्त होनेपर इसकी पूरी कथा आप लोगों से कहूँगा, जिसे सुनते ही इसे अपने पूर्व जन्मका स्मरण हो जायगा ।'
यह कह कर वे नित्य-कृत्यके लिए चले गये । समस्त कृत्य समाप्त होने के बाद तपस्वियोंने उनसे मेरी कथा सुनानेकी प्रार्थना की । तब उन्होंने इस प्रकार वर्णन किया ॰
'रत्नाकर नामक नगरमें ज्योतिष्प्रभ नामका अत्यन्त प्रतापी चक्रवर्ती राजा था । उसके उग्र तपसे भगवान् आशुतोष प्रसन्न हो गए । उनकी कृपासे उसकी रानी हर्षवती के गर्भसे एक पुत्र उत्पन्न हुआ । गर्भिणी रानीने स्वप्नमें चन्द्रमाको अपने मुखमें घुसते हुए देखा था, इसलिए राजाने उसका नाम सोमप्रभ रक्खा ।
सोमप्रभ जब समस्त विद्याओं और कलाओंमें निपुण हो युवा हो गया तो पिताने उसे युवराज पद पर अभिषिक्त कर प्रभाकर नामक अपने मन्त्रीके पुत्र प्रियङ्कर को उसका मन्त्री बना दिया । उसी समय मातलि एक अश्व लेकर आकाशसे उतरा । उसने समीप आकर सोमप्रभसे कहा—'आप पूर्वजन्ममें इन्द्रके मित्र विद्याधर थे । उसी प्रेमके कारण इन्द्रने 'उच्चैःश्रवा' का पुत्र यह अश्वश्रवा घोडा आपके लिए भेजा है । इस पर आरूढ़ होनेपर आपको कोई भी शत्रु जीत नहीं सकेगा ।'
उस अश्वको देकर मातलि चला गया । दूसरे दिन सोमप्रभ ने अपने पितासे निवेदन किया—'पिताजी ! क्षत्रियों का यह धर्म नहीं कि विजय की अभिलाषा न करें और स्वस्थ हो अपने स्थान पर ही बैठे रहें, इसलिए मुझे दिग्विजययात्रा के लिए आदेश दीजिये ।'
पिताने प्रसन्न होकर दिग्विजय की सारी तैयारी करनेका आदेश दिया और और शुभ मुहूर्त्तमें उसे प्रस्थान कराया ।
सोमप्रभ ने उस दिव्य घोड़ेके प्रभावसे समस्त दिशाओंके समस्त राजाओं को जीत उनसे अनेक प्रकार के रत्न उपहार में पाये । लौटते समय उसने हिमालयके निकट सैन्यसमेत डेरा डाल दिया । वह उसी दिव्य घोड़े पर चढ़ कर वनमें शिकार खेलनेके लिए निकल पड़ा । मार्ग में एक मणिमय-किन्नर को देख कौतुकवश उसे पकडनेके लिए उसने शीघ्रतासे अपने घोड़े को दौड़ाया । किन्नर तो पर्वत की गुफामें तिरोहित हो गया, किन्तु सोमप्रभ को वह घोड़ा बहुत दूर तक ले गया । इतने में भगवान् सूर्यनारायण भी अस्त हो गये ।
सोमप्रभ अत्यधिक श्रान्त हो गया और लौटने का विचार कर ही रहा था कि उसे एक विशाल सरोवर दिखाई पढ़ा । उसीके तट पर रात्रि बितानेके विचारसे वह घोड़ेसे उतरा और उसे घास और जलसे सन्तुष्ट किया । स्वयं भी मधुर फल खाकर और जल पीकर वहीं कोमल पत्ते बिछा उसने विश्राम किया । उसी समय उसे अकस्मात् सुमधुर गीतों की ध्वनि सुनाई पटी । वह तत्काल उठा और जिस ओरसे ध्वनि आ रही थी, उसी ओर कुछ दूर चल गया । उसने देखा—एक देवालयमें भगवान् शङ्करके लिङ्गके समक्ष एक दिव्य कन्या गान कर रही है । उसने विस्मय-पूर्वक मनमें विचार किया कि यह रूपवती कौन है ? गीत समाप्त होनेपर कन्याने सत्कार-पूर्वक उससे पूछा—'आप कौन हैं ? किस प्रकार और किस प्रयोजनसे इस दुर्गम स्थानमें पधारे हैं ?'
सोमप्रभने अपना सारा वृत्तान्त कह सुनाया और पूछा—'आप कौन हैं ? इस निर्जन वनमें अकेली क्यों रहती हैं ?'
कन्याने आंसुओं की झटी लगाते हुए कहा—'महाभाग ? मुझ अभागिनीका वृत्तान्त सुननेसे क्या लाभ ? फिर भी यदि आपको कुतूहल है तो सुनिए :
'हिमालय पर काञ्चनाभ नामक नगरमें विद्याधरों का राजा पद्मकूट है । उसकी हेमप्रभा-नामक रानी, के गर्भसे मैं उत्पन्न हुई हूँ । मेरा नाम मनोरथप्रभा है । मैं अपनी सखियोंके साथ आश्रमों, द्वीपों, पर्वतों, जङ्गलों और उपवनोंमें क्रीड़ा कर भोजनके समय पिताके निकट आ जाया करती थी । एक बार जब मैं इस सरोवर में तट पर विहार करने के लिए आई तो एक मुनिपुत्र अपने मित्र सहित मुझे यहीं दिखाई पड़े । उनके सौन्दर्य की शोभा देख वशीभूत हो मैं धीरे-धीरे उनके समीप चली गई । उन्होंने भी मुझे प्रेममय दृष्टिसे देखा । मेरी सखीने हम दोनों का अभिप्राय जान मुनिपुत्रके मित्रसे पूछा—'महाभाग ! आप कौन हैं ?' उन्होंने कहा—'सुमुखि ! यहाँ से थोड़ी दूर तपोवनमें दीधिति नामक मुनि रहते हैं । एक समय वे इसी सरोवर में स्नानार्थ आए । उसी समय लक्ष्मी देवी भी उपस्थित हो गई । देवीने उन्हें देख कर मनमें सङ्गम की अभिलाषा की, इसलिए उन्हें तत्काल मानस-पुत्र उत्पन्न हुआ । देवीने
कथासार ३५
बालक को मुनिके कर-कमलोंमें समर्पित करते हुए कहा—'यह आप के ही दर्शनसे उत्पन्न है, इसलिए आपका पुत्र है।' वह अलक्षित हो गई। मुनिने भी अनायास मिले इस पुत्र का नाम रश्मिमान् रखा और चूड़ाकरण, यज्ञोपवीत आदि संस्कारों को विधिवत् सम्पादन करके उसे समस्त विद्याओं की शिक्षा दी ये वही मुनि-पुत्र 'रश्मिमान्' हैं, मेरे साथ यहाँ भ्रमण करने आये हैं।'
उन्होंने मेरी सखीसे मेरा नाम और वंश पूछा। जब मैं उस मुनिपुत्रके निकट बैठी थी तो घरसे एक सखीने आकर मुझसे कहा-'शीघ्र चलो, पिता भोजनके लिए तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहे हैं।' उस मुनिपुत्र को वहीं छोड़ मैं भयभीत हो पिताके समीप चली गई। भोजन कर ज्यों ही बाहर निकली त्यों ही मेरी पहली सखीने कहा—'मुनि-पुत्र का मित्र बाहर उपस्थित है। वह कहता है कि मुझे रश्मिमान्ने अपने पिता द्वारा उपदिष्ट हुई आकाशगामिनी-विद्या देकर 'मनोरथप्रभा' के निकट भेजा है और यह सन्देश बतलाया है कि 'कामदेवने ऐसी भीषणदशा उपस्थित कर दी है कि अब मैं तुम्हारे बिना क्षण भर भी जीवित नहीं रह सकता।' सुनते ही मैं सखीको साथ लेकर यहाँ आई, किन्तु मेरे पहुँचनेके पहले ही चन्द्रोदय होने पर मेरे वियोग से मुनिपुत्र यह असार संसार छोड़ परलोक सिधार गये थे। उन्हें मृत देख कर मैंने उनके साथ अपने को भी भस्म करना चाहा, किन्तु उसी समय एक अत्यन्त तेजस्वी पुरुष आकाशसे उतरा और उस शरीर को लेकर चला गया। मैं अकेली ही अग्निमें भस्म होनेके लिए उद्यत हुई, तो आकाशवाणी हुई कि 'वत्से ! इस प्रकार साहस न करो, कुछ ही काल बाद इस मुनिपुत्रसे पुनः तुम्हारा अवश्य समागम होगा।' आकाशवाणी सुन कर मैंने अनुगमनका विचार छोड़ दिया और समागम की प्रतीक्षामें मैं वही रहने लगी। तभीसे यहाँ भगवान् शङ्करके भजन-पूजनमें सर्वदा लगी हूँ। मुनिपुत्र का वह मित्र भी कहाँ गया, इसे अबतक न जान सकी हूँ।'
यह वृत्तान्त सुन 'सोमप्रभ'ने पूछा—'तुम्हें अकेली छोड़कर तुम्हारी वह सखी कहाँ चली गई !' प्रत्युत्तरमें मनोरथप्रभा ने कहा—'विद्याधरोंके अधिपति महाराज सिंहविक्रम की एक बड़ी सौन्दर्यवती कन्या है। उसका नाम मकरन्दिका है। वह मेरी प्राणसे भी अधिक प्रियतमा सखी है। मेरे ही दुःखसे दुःखित होकर उसने अब तक अपना पाणिग्रहण नहीं किया है। उसने अपनी सखीको मेरे समीप कुशल पूछनेके लिए भेजा था। इसलिए मैंने भी उसीकी सखीके साथ उसे देखनेके लिए अपनी सखीको भेजा है अतएव आज यहाँ मैं अकेली हूँ।'
मनोरथप्रभा यों कह ही रही थी कि इतनेमें उसे आकाशसे उतरती उसकी सखी दिखाई पड़ी। समक्ष उपस्थित होने पर उसने मकरन्दिकाका सब समाचार पूछ सोमप्रभ के लिए कोमल पत्तों की शय्या बिछवायी और उसके घोड़ेके खानेके लिए घास डलवा दिया। उन लोगों ने उसी देवालय में वह रात्रि बितायी। प्रातःकाल देवजय नामक विद्याधर राजाका सन्देश लेकर उपस्थित हुआ। प्रणाम करके उसने मनोरथप्रभा से कहा—'राजकुमारी, राजा सिंहविक्रम ने यह सन्देश भेजा है कि जब तक तुम्हारा पाणिग्रहण नहीं होगा, तब तक तुम्हारी प्रियसखी मकरन्दिका भी अपना पाणिग्रहण नहीं करना चाहती। इसलिए तुम यहाँ आकर उसे समझाओ कि आपना पाणिग्रहण कर ले।' मनोरथप्रभा वहाँ जानेके लिए उद्यत हुई। सोमप्रभ ने कहा—'शुभे ! मैं विद्याधरोंका लोक देखना चाहता हूँ, जाने योग्य समझिये तो मुझे भी साथ ले चलिए। मेरा घोड़ा जब तक मैं लौट नहीं आता तब तक यहीं बँधा रहेगा, इसके आगे खानेके लिए घास डाल देता हूँ।' मनोरप्रभा ने सोमप्रभ को देवजयकी गोदमें बिठा कर अपने साथ ले लिया और दिव्यशक्ति द्वारा विद्याधरोंके लोकमें पहुँच गई। वहाँ मकरन्दिकाने प्रियसखी का उचित सत्कार किया। साथमें सोमप्रभको देख वह उसका समाचार पूछने लगी। मनोरथप्रभाने उसका समस्त वृत्तान्त यथावत् सुना दिया। सुन कर मकरन्दिका उसे पर आसक्त हो गयी, सोमप्रभ भी लक्ष्मी समान अतिसौन्दर्यवती मकरन्दिकाको देखकर आसक्त हो गया। वह आश्चर्य के साथ विचार करने लगा कि यह लावण्यवती किस धन्य युवाके साथ पाणिग्रहण करेगी।
तदनन्तर एकान्तमें मनोरथप्रभाने मकरन्दिकासे विवाह न करने का कारण पूछा। प्रत्युत्तरमें उसने कहा—'सखि ! अभी तो तुमने भी अपने लिए वर स्वीकार नहीं किया है, फिर मैं कैसे अपना विवाह कर सकती हूँ ? तुम मुझे प्राणों से भी अधिक प्यारी हो।' मकरन्दिकाके प्रेम-युक्त वचन सुन मनोरथप्रमाने कहा—
२६ प्रस्तावना
ङ्किता भवति। शुकनासेन हि चन्द्रापीडाय याः शिक्षाः प्रदत्ताः तासां रचनायान्तु कविः स्वलेखनीमन्या- दृतरूपेण प्रावर्त्तयत्। तास्तथाविधा रहस्यपूर्णास्तथा मार्मिकाः सन्ति या मन्ये प्रत्येकदेशस्थप्रत्येक- राजहिताय सर्वथैवोपयोगिन्यो भविष्यन्ति।
प्रकृतिनिरीक्षणम्
कादम्बर्याः प्रकृतिवर्णनमतीव सुन्दरं सजीवं च सञ्जातम्। केचन महाकवयो यदि प्रकृतेर्मङ्गल- रूपस्य चित्रण एव चतुरा अवलोक्यन्ते तर्हि केचन महाकवयः प्रकृतेर्भयावहस्य तथा रोमाञ्चकारिणः स्वरूपस्य वर्णने कृतकार्याः प्रतीयन्ते, परन्तु महाकवेर्बाणभट्टस्य भूयसीमेव विशेषता वर्त्तते यत्तस्य लेखनी समभावेन मधुरभयावहोभट्विधदृश्यवर्णने पूर्णं साफल्यमुपगतवती। एतद्दृश्यस्वरूपहृदयङ्ग- मविधानाय महाकविर्विविधालङ्काराणां साहाय्यं गृहीतवान्। उपमोत्प्रेक्षा-परिसंख्याविरोधाभासालङ्का- राणां स्तूपानैव स्थापयित्वा कविरयं पाठकानां पुरतः स्ववर्ण्यविषयस्य मञ्जुलाभिव्यञ्जनं कृतवान्। विन्ध्याटव्या भीषणरूपस्य चित्रणं कविर्यादृशेन साफल्येन कृतवान् तद्धि महादाश्चर्यं जनयति।
तथाहि—
'गिरितनयेव स्थाणुसङ्गता मृगपतिसेविता च, जानकीव प्रसूतकुशलवा निशाचर- परिगृहीता च, कामिनीव चन्दनमृगमदपरिमलवाहिनी रुचिरागुरुतिलकभूषिता च, सोत्कण्ठेव विविधपल्लवानिलवीजिता समदना च।'
(कादम्बरी-कथामुखम्-५७ पृ.)
महर्षिजावालेराश्रमस्य कीदृशं सात्त्विकं मनोरममतिहृद्यं वर्णनम् ?, यस्य पठनेन कस्य सचेतसः पुरुषस्य चित्तं तपोवनभव्यमूर्त्त्या प्रभावितं न भवति ?।
तथाहि—
'यत्र च महाभारते शकुनिवधः, पुराणे वायुप्रलपितम्, वयःपरिणामे द्विजपतनम्, उपवनचन्दनेषु जाड्यम्,, अग्नीनां भूतिमत्त्वम्, एणकानां गीतश्रवणव्यसनम्, शिखण्डिनां नृत्यपक्षपातः, भुजङ्गमानां भोगः, श्रीफलाभिलाषः मूलानामधोगतिः ॥'
(कादम्बरी कथामुखम्-१२४, १२५ पृ.)
न पर्यत्यजत्। चन्द्रापीडस्यापि ततःप्रभृति तस्यां प्रतिक्षणमुपचीयमाना महती प्रीतिरजायत। स्थितस्तस्यामस्य प्रतिदिन प्रसादः। कृता चासौ सर्वथैव विस्रम्भव्यापारेष्वभिन्ना सहृदयता। सोऽयमपूर्वः सम्बन्धः सुमधुरश्च। चन्द्रा- पीडेन सार्धं पत्रलेखाया नैकट्यमसामान्यं दिग्विजययात्रायामेकस्मिन्नेव गजपृष्ठे पत्रलेखा चन्द्रापीडेन सार्धमा- सनमधितिष्ठति। निशाया शिबिरस्थचन्द्रापीडः यदा अनतिदूरशयाननिपुणेन वैशम्पायनेन सह संलपति, तदा, सन्निधौ क्षितितलविन्यस्तकुथ्योपरि प्रस्वपिति पत्रलेखा। यदा कादम्बर्या हृदये महामहोत्सवसमारम्भः सन्निकृष्टस्तदा पत्रलेखायास्तस्मादतिथुद्रादधिकारादपसारणं नावश्यकनममन्यत लोकः। पत्रलेखां प्रति कादम्बर्या नारीजनसुलभो नासीदीषदपि द्वेषः। चन्द्रापीडेन पत्रलेखायाः सम्बन्ध इति हि सा प्रियसखीति कादम्बर्या परमाद्रियत।
कादम्बरीकाव्ये पत्रलेखा यद्भूखण्डमधिकृतवती, न तत्र द्वेषसन्देहादीना सद्भावः। तत्स्थानं स्वर्गादपि निष्कण्ट- कम्, परन्तु क नु खलु तत्रामृतविन्दुः चलति तस्याः पुरतः एव प्रवलं प्रणयामृतपानम्। किन्तु कदाचिद् एतद्- घागेनास्या एकत्र्यामपि शिरायानेकोऽपि रक्तविन्दुर्न चाञ्चल्यमापेदे। अपि सा चन्द्रापीडस्य च्छायेवानुवर्तिनी, तथापि राजपुत्रस्य तस्तारुण्यस्येषदपि तापस्तां कदाचिन्नासृजत्।
यदा पत्रलेखा कति कालान् कादम्बर्या सहावस्थाय तद्वार्त्तया प्रत्यावृत्ता, एवमपि यदा ललितस्मितेन दूरत एव प्रीतिरासं प्रकाशयन्ती चन्द्रापीडं प्राणमत्, तदा सा प्रकृतिलह्वमापि कादम्बर्याः प्रसादलब्धं सौभाग्यमिव वह्नम- तरतामगच्छत्। युवराजश्चादरातिशय प्रदर्शयेन्नासनादुत्थाय तामालिङ्गत्। तस्माद्वाङ्मनसयोरगोचरोऽपूर्व एवा- नयोः संमन्य इत्यवगम्यते। परमार्थिकरूपे त्वियं रोहिणीति कादम्बरी-प्रश्नोत्तरे चन्द्रापीडः स्वयमेवोक्तवान्। अतो युक्त एवानयोः सहवास इत्यवधेयम्। इतोऽधिकजिज्ञासुभिः प्रबन्धकल्पलतिकादाववलोकनीयम्।
प्रस्तावना
२७
तपोवनस्य वर्णने यावन्तः प्रभावोत्पादकविषया अपेक्षितास्तावतामेकत्र वर्णनं विधाय कविः सत्यमस्माकं सम्मवेऽतीवानुपमं दृश्यं प्रस्तुतवान् । अस्माभिस्तादृशं कथमपि लङ्घितुं न शक्यते यत्र कविराश्रमस्थवृद्धान्धतापसानां परिचितवानरद्वारेण यष्टिमवलम्ब्याभ्यन्तरे आगमनस्य वहिर्गमनस्य च वर्णनं कृतवान् ।
तथाहि—
‘परिचित शाखामृग-कराकृष्टयष्टि-निष्क्राम्यमान-प्रवेश्यमान-जरदन्धतापसम् ।’
( कादम्बरी कथामुखम् - १९८ पृ. )
ऋतूनां चित्रणमपि नितान्तमार्किकतया कृतवान् । प्रभातचन्द्रयोरन्धकारचन्द्रोदययोस्तथान्येषां प्रकृतिविविधदृश्यानां वर्णनमत्यधिकसहृदयतया तथा यथार्थतया सहाङ्कितवान् कविः ।
प्रेमवर्णनम्
महाकविना यादृशप्रणयस्थेयं मनोरमा कथा प्रस्तुता, प्रणयोऽपि वाह्यचाकचिक्येनोत्पन्नरूपे-च्छाया उपरि केवलमनुरक्तिमेव न प्रकटयति, प्रत्युत स द्वयोः सहृदययोरन्तरस्तलस्य परस्परवन्धन-विधायकोऽनेकजन्मपर्यन्तं स्वस्याभिव्यक्तिकारकोऽलौकिकानन्दोत्पादको विकारोऽस्ति । कादम्बर्याः प्रणयलीला हि केवलमेकजन्मत एव सम्बन्धं न स्थापयति, किन्तु स जन्मत्रयस्य परिवर्तने जातेऽप्यनेक-माधुर्यं कथङ्कारमपि हासानुभवं नोपस्थापयति । वरं शरीरस्य परिवर्तनं भवतु, कर्मवशेन प्राणिनो विविधयोनिषु वरं परिभ्रमन्तु किन्तु तेषां दृढप्रेम सर्वदैव तदनुगमनं करोति । अस्याः कथेव ह्येतन्म-हत्त्वस्य सत्यतामस्मान् प्रति यथार्थतः प्रतिपादयति ।
शैली
गद्यकवीनां कृते बाणभट्टस्य शैली चादर्शभूता । अयं हि महाकविः प्रभावशालिगद्यस्य लेखने निता-न्तप्रवीण इति सहृदयानां भावः । ये केचनालोचकाः वाणगद्यं भारतीयसघनविपिनमिव भयावहं हिंसकपशुमिवाप्रसिद्धं तथा कठिनशब्दैर्मण्डितमिति प्रतिपादयन्ति, ते खलु सत्यमेव यथार्थतायाः सुदूरे विद्यन्ते । चित्रणस्य सजीवतायै तथा प्रभावशालिताया उत्पत्तये महाकविना स्थाने स्थाने ओजोगुण-मण्डितायाः समासबहुलायाः शैल्या आश्रयणमवश्यं गृहीतम्, किन्तु यत्र तत्र लघुवाक्यानां प्रयोगं विधाय तेन हि सशक्ता प्रभावोत्पादिका स्वशैली प्रदर्शिता । कयाचिदेकया शैल्या क्रीतदासस्तु न भवति कविः । स हि विषयानुसारेण स्वकीयां शैलीं परिवर्त्तितां करोति । येन महाकविना अटव्याः सन्ध्यायाश्च वर्णने दीर्घसमासानां छटा प्रदर्शिता, तेनैव विरहवर्णनावसरे लघुकलेवरप्रासादिकवाक्यानां शोभा प्रस्तुतीकृता । कपिञ्जलद्वारा विहिता या पुण्डरीकभर्त्सना सा कियती प्रभावशालिनी ?
तथाहि—
‘यदेतदारब्धं भवता किमिदं गुरुभिरुपदिष्टम्, उत धर्मशास्त्रेषु पठितम्, उत धर्मार्जनोपायोऽयम् ॰ ॰ ॰ ॰ । ॰ ॰ ॰का वा सुखाशा साधुजननिन्दितेष्वेवंविधेषु प्राकृतजनबहुमतेषु भवतः ? स खलु धर्मबुद्ध्या विपलतावनं सिञ्चति, कुवलयमालेति निस्त्रिंशलतामालिङ्गति, कृष्णागुरुधूमलेभेति कृष्णसर्पमवगाहते रत्नमिति ज्वलन्तमङ्गारमभिसंपृशति, मृणालमिति दुष्टवारणदन्तमुपलमुन्मूलयति, मूढो विषयोपभोगेष्वनिष्टानुवन्धिषु यः सुखबुद्धिमारोपयति । अधिगतविपमतत्त्वोऽपि कस्मात् खद्योत इव ज्योतिर्निर्वाणमिदं ज्ञानमुद्वहति, यतो न निवारयसि प्रवलरजःप्रसरकलुषितानि स्रोतांसीवोन्मार्गप्रस्थितानीन्द्रियाणि, न नियम-यसि वा क्षुभितं मनः । कोऽयमनङ्गो नाम धैर्यमवलम्ब्य निर्भर्त्स्यतामयं दुराचारः ।’ इति
( कादम्बरी-पूर्वार्धकथा ४५९,४६० पृ० )
२८ प्रस्तावना
परमार्थतस्त्विदमेव प्रतीयते यद् बाणगद्येषु सूक्ष्मनिरीक्षणशक्तिः चमत्कृतवर्णनप्रणाली, आश्चर्य-शब्दशालिस्तथा कल्पनाप्रसूतालौकिकार्थानामुद्भावना विशेषरूपेणोपलब्धा भवतीति। एतन्महानुभाव-गद्ये चैतादृशः प्रभावस्तथा प्रवाहो विद्यते यत्तदनुकरणकर्तृकविद्वारा भूरिशः कृतेऽपि गरीयसि प्रयत्ने तद्गद्ये तादृशश्चमत्कारो नोत्पन्नः। अत एव स्वेतरद्रसभावयुक्तायाः कवितायाः समक्षेऽन्यकवीनां रचना केवलं चापल्यमेव जनयतीति त्रिलोचनकवेः स्पष्टं समुद्घोषः—
'हृदि लग्नेन वाणेन यन्मन्दोऽपि पदक्रमः।
भवेत्कविकुरङ्गाणां चापलं तत्र कारणम्॥'
सामाजिकी स्थितिः
कादम्बर्यां वेशविन्यासो विचित्र एव लभ्यते। अत्र भूपतेः शूद्रकस्य वर्णनेनावगम्यते यत् राजापि केवलं विमंस्थूलप्रायं शुभ्रवस्त्रं मूर्ध्नि वेष्टयति। अङ्गे च केवलमुत्तरीयं स्कन्धयोर्धारयति। यतोऽङ्गरागः शरीरे विलिप्यमानः स्पष्टं प्रतीयते। समस्तानामेव पात्राणां वर्णनेऽङ्गरागस्यात्याधिक्यम्, वसनस्य च वैरल्पम्। कादम्बरीप्रेषितः केयूरकाभिधानो वीणावाहकः केवलमधोवस्त्रमेव धारयति नोत्तरीयमपि।*** 'अधरवास एव केवलं वसानिन' इत्यनेन (कादम्बरी-पूर्वार्धम्)
वेशविन्यासादिषु वैचित्र्येऽपि भूयस्यः सामाजिकप्रथा इदानीन्तन इव तदानीमप्यासन्। होलिकायां विविधोपद्रवाः विरूपरूपक (स्वाँग) निःसरणादिप्रथा यथा वर्त्तमानकाले तथा बाणकालेऽप्यासीदिति चित्रम्।
द्रविडधार्मिकपरिचये यथा—
'सर्वदा वसन्तक्रीडिना जनेनोत्क्षिप्तखण्डखट्वारोपितवृद्धदासीविवाहप्राप्तविडम्बनेन।
(कादम्बरी-पूर्वार्धम्-६४५ पृ०)
एवमादयस्तत्सामयिक्यो बह्वयो घटनाः संसूचिता ह्यस्मिन् ग्रन्थे, यासामनुसन्धानेनाधिकतरमैतिहासिकं सामाजिकं च तथ्यमवगतं भवति। परन्तु प्रस्तावनायां निरतिशयो विस्तरः स्यादिति वर्णिका ('बानगी') मात्रमिहोपन्यस्तमिति सुधीभिराकलनीयम्।
नायकादिनिरूपणम्
इह हि अनुकूलो धीरोदात्तश्चन्द्रापीडो नायकः। तथा च लक्षणम्—
'अनुकूल एकनिरतः।'
'अविकत्थनः क्षमावानतिगम्भीरो महासत्त्वः।
स्थेयान्निगूढमानो धीरोदात्तो दृढव्रतः कथितः॥' (सा० द० ३ प०)
नायिका कन्या (परकीया) मुग्धा कादम्बरी। यथा—
'कन्या त्वजातोपयमा सलज्जा नवयौवना।'
'परकीया द्विधा प्रोक्ता परोढा कन्यका तथा॥'
'प्रथमावतीर्णयौवनमदनविकारा रतौ वामा।
कथिता मृदुश्च माने समधिकलज्जावती मुग्धा॥' (सा० द० ३ प०)
प्रस्तावना
२९
परिणयानन्तरं स्वकीया मध्यापि च नायिका, किन्तु (उत्तरार्द्धे) तत्प्रसङ्गोऽप्यल्प एव। एतावेव नायिकानायकावालम्बनविभावौ। इन्दु-चन्दनान्योऽन्योक्त्यादय उद्दीपनविभावाः, परस्परचक्षुरादिक्रिया अनुभावाः, निर्वेदप्रभृतयो व्यभिचारिभावाः, रतिः स्थायी।
विप्रलम्भशृङ्गारो मुख्योऽङ्गी रसः। तत्र पूर्वार्धे, उत्तरार्धस्य कियदंशे च पूर्वरागाभिधः। उत्तरार्धशेषे तु करुणविप्रलम्भाभिधः। सम्भोगशृङ्गारोऽप्यस्ति रसः, किन्तु परिणयानन्तरं केवलं तस्य सूचनमेव। एषां साहित्यदर्पण ३ परिच्छेदगतलक्षणानि यथा—
'आलम्बनं नायकादिस्तमालम्ब्य रसोद्गमात्।' 'उद्दीपनविभावास्ते रसमुद्दीपयन्ति ये। आलम्बनस्य चेष्टाद्या देशकालादयस्तथा॥' 'उद्बुद्धं कारणैः स्वैः स्वैर्बहिर्भावं प्रकाशयन्। लोके यः कार्यरूपः सोऽनुभावः काव्यनाट्ययोः॥' 'विशेषेणाभिमुख्येन चरणाद् व्यभिचारिणः। स्थायिन्युन्मग्ननिर्मग्नाः..........................।' 'रतिर्मनोऽनुकूलेऽर्थे मनसः प्रवणायितम्।' 'यत्र तु रतिः प्रकृष्टा नाभीष्टमुपैति विप्रलम्भोऽसौ।' 'श्रवणाद्दर्शनाद्वापि मिथः संरूढरागयोः। दशाविशेषो योऽप्राप्तौ पूर्वरागः स उच्यते॥' 'यूनोरेकतरस्मिन् गतवति लोकान्तरं पुनर्लभ्ये। विमनायते यदैकस्तदा भवेत् करुणविप्रलम्भाख्यः॥'
अङ्गतया हास्यादयोऽन्येऽपि रसाः सन्ति।
आधिक्येनात्र माधुर्यं गुणाः। यथा—
'चित्तद्रवीभावमयो ह्लादो माधुर्यमुच्यते।
सम्भोगे करुणे विप्रलम्भे शान्तेऽधिकं क्रमात्॥'
प्रसादगुणोऽप्यधिकस्थले। रीतिरत्र पाञ्चाली बाहुल्येन। यथा—
'...............................वर्णैः शेषैः पुनर्द्वयो।'
(वैदर्भीगौडीययोः परिगृहीतेभ्यो वर्णैः शेषैरित्यभिप्रायः)।
'समस्तपञ्चषपदो बन्धः पाञ्चालिका मता।'
अन्या अपि रीतयोऽल्पाधिकभावेन यथास्थानमुपलभ्यन्ते, किन्तु मुख्यं ताः। गद्यस्वरूपादिकं तु पूर्वमेव विवेचितं १, २ पृष्ठप्रस्तावनायाम्।
एतेषां यथासम्भवमेकत्र सौकर्याय श्लोकसंग्रहो यथा—
'चन्द्रापीडोऽनुकूलः सकलगुणधरो नायकोऽस्मिन्नुदात्तो-
नेत्री कन्याऽन्यदीया मृदुलललिततनुर्मुग्धकादम्बरी च।
पाञ्चाली नाम रीतिर्विलसति बहुला विप्रलम्भो रसोऽङ्गी
माधुर्याख्यो गुणो वा कविमुकुटमणेः काव्ययोरन्त्यमेतत्'॥१
१. छन्द सोऽयं महामहोपाध्याय-हरिदाससिद्धान्तवागीशभट्टाचार्यटीकाभूमिकाया उद्धृतः।
२० प्रस्तावना
कादम्बरीटीका
अस्य ग्रन्थरत्नस्य प्राचीना अर्वाचीनाश्च बह्वयष्टीकाः साम्प्रतं विलसन्ति तत्र—
(१) श्री भानुचन्द्रगणि-तच्छिष्य-सिद्धचन्द्रगणियमहोदयाभ्यां निर्मिता टीका मोगेलसम्राजोऽकबरस्य समये निरमीयत । यतो हीमौ अकबरसम्राजा सम्मानिताविति ताभ्यामेव पुष्पिकायां निजकरकमलेन लिखितम् । गुरवे भानुचन्द्रगणिने सम्राजा महोपाध्यायपदमर्पितम् । अनेन महाभागेन हि 'शत्रुञ्जय'-करो मोचितः शिष्याय सिद्धचन्द्रगणिने सम्राजा 'पुण्यदमा' इत्युपपदेन विभूषितः । सेयं टीका प्रतिपदपर्यायप्रकटिताऽपि विद्वद्भ्यो न रोचते, प्रत्युत यत्र तत्रारुन्तुदा । मूलपदार्थस्फोरणायैव या समर्था सैव सर्वमान्या विद्वत्समाजे, परमत्र 'इन्द्रगोपैः ( वर्षाकीटैः )' इत्यस्य टीका 'अग्निरजोभिः' इति । एवं निगहः = सन्दुकः, 'मदनः जराभीरुः' इत्यादिरूपेण विहिता टीका नोपकारायेति धीधना गवेषकाः प्रतिपादयन्ति ।
(२) 'वदूदेश्वर रामचन्द्रकाले' महाशयेन विरचिता टीका । इयं हि मूलार्थस्फोरणेऽतिविशदा विस्तृता च । अन्ते आङ्गलभाषायां टिप्पणीसंयुता, तेनास्य ग्रन्थस्य महत्त्वमत्यधिकं सञ्जातम् ।
(३) 'जीवानन्दविद्यासागर'-महाशयनिर्मिता सरला भावानुकूला टीका, अनयाऽपि सहायता जाता मन्दमतीनामित्यत्र न सन्देहः । परं सर्वथा छात्रमनोऽनुकूला नैवेति तद्विदो जानन्ति।
(४) महामहोपाध्याय-'हरिदास-सिद्धान्त-वागीश' विहिता 'कल्पलता'भिधाना सर्वतोऽभिनवा छात्रहितैषिणी विद्वन्मनोहारिणी विवृतिः स्वल्पेनैव समयेन परां कीर्तिराशिं प्रतिदिशं विस्तारयामास ।
अनुवादः
(१) मिसिरिडिहकृतोऽनुवादः आङ्गलभाषायाम् । यद्यप्यत्र बहूनि वर्णनानि परित्यक्तानि, कानिचिच्चातिसंक्षिप्तीकृतानि सन्ति, तथापि महता परिश्रमेणायमनुवादो विहितः । तत्र कियतामेव वाक्यानां शब्दानाञ्चातिरमणीयोऽर्थः प्रतिपादितः, एवं सत्यपि कियन्ति स्थलानि तथैव सन्ति येषां विस्तृतं व्याख्यानमत्यावश्यकं प्रतीयते ।
(२) म० म० 'हरिदाससिद्धान्तवागीश' कृतो भाषानुवादो वङ्गभाषायाम् । अनेन चैतद्ग्रन्थेऽतिसौलभ्यं सञ्जातम् ।
(३) श्रीऋषीश्वरनाथभट्टकृतोऽनुवादो महता परिश्रमेण सञ्जातः ।
अन्यसंस्करणम्
(१) नोहम्वोस्थराजकीयसंस्कृतग्रन्थमालायां-डाक्टर-'पिटर्सन' महाशयेन संशोधिताङ्गलभाषा-टिप्पणीयुता चावृत्तिः । तत्रत्यातिविस्तृता टिप्पणी गवेषणापूर्णा । विद्वांसो ह्येतत्कृतपाठभेदं भूरिभूरिशः प्रशंसयामासुः । पाठभेदोपरि विशिष्टं ध्यानमाकृष्टमेतन्महानुभावस्य ।
(२) पुण्यपत्तन ( पूनानंगर ) स्थग्रन्थमालातश्चायं ग्रन्थः 'काने'महाशयद्वारा विशेषरूपेण परिच्छेद-विभागसहितोऽतिस्पष्टरूपेण संस्कृतः । एतेनावधार्यते यत्तदावृत्तिप्रकाशनानन्तरं कादम्बर्याः यावन्ति संस्करणानि निःसृतानि तेषां सम्पादका नूनमेव ततः सहायतामवापुरिति ।
प्रस्तुतसंस्करणम्
तत्र 'काने'-'पिटर्सन' महोदयद्वारा संस्कृते यावन्तः परिच्छेदा विलसन्ति तान् यथामति विविच्यान्यांशैस्तदुपयोगिग्रन्थानाकलय्य समुचितो ग्रन्थांशः पाठभेदश्च संस्थापितः । विरामचिह्नादिसंयोजनं यावच्छक्यं विहितम्, तथा सामासिकशब्दानां पङ्क्त्यन्ते विश्लेषपद्धतिश्च यथा वचनसौकर्यमर्थावबोधसौ-लभ्यञ्च भवेत्तथा विहिता । सम्पादितेऽपि 'चन्द्रकला' संस्कृतव्याख्यया विषयस्य शब्दस्य चातिकाठिन्य-
प्रस्तावना
३१
मनुभूय ‘विद्योतिनी' नामिकया राष्ट्रपदनियुक्तया हिन्दीभाषयाऽप्यनूदितः। प्रस्तावनान्ते च सौकर्येणार्या-वबोधनाय हिन्दीभाषयैव कादम्बरीसमीक्षोपनिबद्धा तथा तत्सारोऽप्युपनिबद्धः।
अत्रेदमवधेयम्—कस्याप्यनुवादस्य भागत्रयं भवितुमर्हति । यथा—उपाख्यानानुवादः, भावानुवादः, भाषानुवादश्चेति । तत्रोपाख्यानानुवादे ह्यनुवादको मूलाक्षरमगणयित्वैव स्वान्वयेण प्रचलतीति सर्वापेक्षया सुगमः सः, किन्तु तथाविधेनानुवादेन ग्रन्थार्थकरणे चोपकारस्तादृशो न भवति यादृशोऽभिलषितः। एतदपेक्षया मौलिकभावमादाय प्रवृत्तो भावानुवादो मूलार्थवोधने किञ्चित्साहाय्यं सम्पादयति । भाषानुवादो हि मूलभावस्य भाषायाश्च द्वयोरपि पूर्णरूपेणाधीनीभूय एव मूलार्थसाधुस्फोरकोऽनुवादककृते निरतिशयकाठिन्यं जनयति । तत्राप्येतद्ग्रन्थस्यात्यधिकक्लिष्टत्वस्य सर्वानुभवसिद्धत्वेन तस्य भाषानुवादविधानं न तादृशं सरलमिति विवेचकानां पुरतोऽतिरोहितमेव । अतोऽत्र केवलं साहसं विधायैवैतत्सम्पादयितुं प्रवृत्तोऽहम्, परन्तु कियत्साफल्यं सञ्जातं तत्र प्रेक्षकाः सहृदया एव प्रमाणम् ।
विशेषतो वक्तव्यमिदमेव यत्—'एकानुपूर्वीकवाचकवाच्यत्वरूपं'-सामान्यधर्ममादाय ग्रन्थकारेण सर्वत्र पूर्णोपमाः सुसज्जीकृताः। यासां संस्कृतव्याख्यानं तु विशदरूपेण कथञ्चिद् भवत्यपि, किन्तु तादृशस्थले भाषानुवादकरणे महाक्लेशः सञ्जायते । दिङ्मात्रं यथा—'उषानिरुद्धसमागममिव । चित्रलेखादर्शित-विचित्र-सकल-त्रिभुवनाकारम्' (का० पू० २७६ पृ०) एतस्यानुवादो ह्येवमपि भवितुमर्हति यत्—
'उषा और अनिरुद्धके समागमके समान चित्रलेखोंने दिखलाया गया है विचित्र समस्त त्रिभुवनका स्वरूप जहाँ पर ऐसा वह राजभवन था।'
किन्त्वेतादृशानुवादकरणे सादृश्यं न तिष्ठति तथानुवादोऽप्यसम्पूर्ण एव तिष्ठति, अतोऽगत्यैवमनुवादो विधीयते यत्—
'उषा अनिरुद्ध के समागममें जिस प्रकार उषाकी सखी चित्रलेखाने समस्त त्रिभुवनके युवक पुरुषोंकी आकृतिका चित्र खींचकर उषाको दिखाया था, उस राजभवनमें भी उसी प्रकार चित्रकारों द्वारा समस्त त्रिभुवनका सभी पदार्थोंके अनेक प्रकारकी आकृतिका चित्र दीवार पर खींचकर लोगोंको दिखलाया गया था।'
अत्र ह्येवंविधानुवादं विलोक्य साधारणपुरुष एवानुवादकं दूषयिष्यति, किन्तु विवेचकपाठका हृदयेन सानन्दं नूनं जिघृक्षिष्यन्तीति द्रढीयान् मे विश्वासः । कादम्बर्यां पूर्णोपमाया अनेकस्थलेषु विद्यमानत्वात् तत्र अत्रैवंविधा एवानुवादाः सञ्जाताः। बहुषु स्थलेषु संस्कृतटीकया साधुस्फोरणे कृतेऽपि यत्र भाषानुवादे कोऽप्युपायो न लक्षितस्तत्र भावानुवाद एव गृहीतः। एतद्ग्रन्थकृतपूर्वव्याख्यातॄणामनुवादकर्तॄणाञ्च साहाय्येनैतत्सम्पादनं मया कृतमिति तेषामानृण्यं शिरसा धारयामि।
एतत्सर्वं गीर्वाणवाग्वल्लिललितालवालकल्पानां धर्मनयविनयमनस्वितादिगुणविभूषितानां देशकुलजातिशास्त्राचारादिसमस्तसनातनधर्ममर्यादापालनतत्पराणां देशप्रसिद्धवङ्गकुलकमलदिवाकराणां दिगंतयशसां काव्यकाननपञ्चाननानामस्मत्साहित्यशास्त्रगुरुवराणां कविचक्रवर्त्ति-श्री १००८ ताराचरणभट्टाचार्य-महाशयानां स्वदेशीय—व्या० सा० तीर्थ-विद्यालङ्कारानेकशिष्योपशिष्ययुतपण्डितप्रवर-बेगूसरायस्थ-'श्रीसरस्वती विद्यालय'-प्रधानाध्यापक-श्रीगेनालालझाजी-गुरुवराणाञ्च द्वयोदयमधुरदृशा सम्पन्नम् ।
ग्रन्थस्यास्य यत्र तत्र मूलपाठसंशोधने पाठान्तरविधाने चाहं प्रियसृहद्वर-काशीस्थ-'राजकीय संस्कृतमहाविद्यालय'-न्यायाध्यापक-न्याय-वेदान्ताचार्य-काव्य-दर्शनतीर्थ-श्रीसुरेन्द्रनाथद्विवेदि महाभागमत्रत्यनेपालदेशीय 'हरिहर-संस्कृत-विद्यालय' प्रधानाध्यापक-व्या० सा० सां० पुराणाचार्य-श्रीकृष्णमणित्रिपाठि महाभागं च मुहुर्मुहुः स्मरामि, अभिनन्दामि च तदुपकारसहस्रमजस्रम् ।
सम्पादने चास्मिन् परोपकारबद्धपरिकर सुरभारती संरक्षणतत्परनिजपितृस्मारक-'श्रीभवानीशङ्कर-संस्कृतमहाविद्यालय'सञ्चालक-काशीविश्वनाथमन्दिराध्यक्ष-श्रीरामशङ्करत्रिपाठिमहाभागानाम्, भूमिकालेखनकार्ये विविधसहायकपुस्तकप्रापकाणां विविधानवद्यविद्याविभूषित-विद्याभास्कर-शास्त्राचार्य-श्रीदेवीनारायणप्राड्विवाक (एडवोकेट) महाभागानाञ्चोपकृतिसहस्रमजस्रमभिनन्दामि।
३२
प्रस्तावना
एवमेव यत्र तत्र मूलसंशोधनादिसाहाय्ये मिथिलास्थताराचन्द्राङ्काहर्तिङ्गलकुलचन्द्रिक-सोदरेश्वरव्याकरणाचार्य-पं० श्रीरामचन्द्रझा-महोदयैरखिललक्ष्यसम्मतनिरुक्ताद्यलङ्कार-चार्य-पं० श्रीरत्नेश्वरझा महोदयैश्च महानुपकारः कृतस्तदर्थं मयैताभ्यं सर्वथा नितरां महर्णं धार्यानि ।
सर्वथा दुर्भिक्षनिन्दितेऽपि काले कृतपरिश्रमैः चौखम्बा-संस्कृतपुस्तकालयाध्यक्षैः गोलोकवासि-श्रेष्ठि-श्रीहरिदासगुप्तारमज-श्रीजयकृष्णदासगुप्तमहोदयैः विस्तृतकलेवरं ग्रन्थरत्नं संस्कृत-हिन्दीपुस्तकनिर्मा-णार्थ यावत् साध्यमुद्रितं प्रकाशयित्वा राष्ट्रस्य महानुपकारः कृतोऽतस्ते सर्वथा धन्यवादार्हाः ।
यद्यपि 'आत्मनः स्निग्धेषु चक्षुषां नान्तः कुण्ठेषु दृष्टयः' इति न्यायात्स्वहस्तलिखितपुस्तकानां स्ववि-रचितग्रन्थानां दोषद्दष्टिनैव जायते, तथापि स्वनेत्रदूषणेनान्यलोचनरूपेण कस्यचिद्गुणवत्तां न मन्तव्यितु-मर्हतीत्येतद्बृहत्पुस्तकस्थीनवाग्मयीचीदन्तादिषारणानां विमृश्यन्वाचकाः सहृदया विद्वांस एव प्रमा-णम् । अपि च—
'भर्तृस्नेहविदुर्दर्शनेहिने नन नामेऽस्मि दोषैर्हरः दुर्हिशन्तेऽपि ।'
इति न्यायात् प्रमादादणोः स्वाभाविकत्वाद् नीरक्षारदोषोद्वाद् यदत्र स्खलनं सञ्जातं तत् दयावान् विद्वद्गण दूयोद्दयसमुद्धत्या निरीक्षमाणाः संशोध्य सद्ग्रन्थं गनिष्यन्ते नास्तिति मत्वाऽग्रयं निवेदयति—
'तद्विद्वांसोऽनुगृह्णन्तु चित्तदोषैः प्रसादिनिः सन्तः प्रणयवाक्यानि गृह्णन्ति ह्यनसूयवः ॥ न चात्रातीव कर्त्तव्यं दोषद्दष्टिपरं मनः । दोषो ह्यविद्यमानोऽपि तच्चित्तानां प्रकाशते ॥ निर्दोषत्वैकवाक्यत्वं क वा लोकस्य दृश्यते । सापवादा यतः केचिन्मोक्षस्वर्गादपि क्वचित् ॥'
इत्यभियुक्तोक्तं सदा स्मरणीयं सुधीवृन्दैः । व्याख्यद्ऋचे समोदार टिप्यद्रापि केनचित् ।
मातृनवमी
वि० सं० २०१०
२९ धर्मकूप, काशी
सम्पादक—
कृष्णमोहनठाकुरः
संक्षिप्त-कथासार
कथासरित्सागरीय-मकरन्दिकोपाख्यान
काञ्चनपुरीमें 'सुमना' नामक एक बड़ा प्रतापी राजा राज्य करता था। किसी समय वह अपने दरबारमें बैठा था कि चाण्डालाधिपकी कन्या 'मुक्तालता' एक शुक (तोते) को पिजड़े में रखकर अपने भाई 'वीरप्रभ'के साथ राजा से मिलने आई । द्वारपाल द्वारा अनुमति प्राप्त होने पर मुक्तालताने सभामें उपस्थित हो राजाका अभिवादन कर निवेदन किया—
महाराज ! यह 'शास्त्रगञ्ज' नामका शुक समस्त कलाओं और विद्याओं में निपुण है तथा वेदोंका मार्मिक अभिज्ञ है। आप इसे स्वीकार कीजिए, यों कह कर उसने द्वारपाल को वह शुक दे दिया । द्वारपाल उसे राजा के समीप ले गया । शुकने वहाँ निम्नलिखित श्लोक पढ़ा—
'राजन् ! युष्मदिदं सदैव यदयं देवस्य संधुक्ष्यते धूमश्याममुखो द्विषद्विरहिणीनिःश्वासवातोद्गमैः । एतत्त्वद्भुतमेव यत्परिमवाहाष्पाम्बुपूर्णाक्षैरासां प्रज्वलतीह दिक्षु दशसु प्राज्यः प्रतापानलः॥'
पुनः उसने कहा—'राजन् ! आदेश दीजिए किस शास्त्रका कौनसा प्रमेय कहूँ।'
राजा अत्यन्त आश्चर्यचकित हुआ । मन्त्रीने कहा—'पृथिवीनाथ ! प्रतीत होता है कि पूर्व जन्मके किसी शापवश तिर्यग्योनिमें ये कोई मुनि हैं, तपःप्रभावसे इन्हें पूर्वजन्मके समस्त शास्त्रों का स्मरण है।'
राजाने शुकसे पूछा—तुम्हारा जन्म कहाँ हुआ ? तिर्यग्योनिमें तुम्हें शास्त्रज्ञान कैसे हुआ ? आखिर तुम कौन हो ? अपना पूरा वृत्तान्त सुनाओ ।'
शुककी आँखें डबडबा गयीं। उसने कहा—'महाराज ! यद्यपि मेरी दशा कहनेके योग्य नहीं, तथापि आपका आदेश शिरोधार्य कर कहता हूँ। सुनिए :
'हिमालयके निकट अतिविशाल वृक्ष पर एक शुक अपनी स्त्री के साथ कोटर बनाकर रहता था। मैं उसीका पुत्र हूँ। उत्पन्न होते ही मेरी माता चल बसी। वृद्ध पिता अत्यधिक खिन्न हुए। वे आस-पास रहते वाले शुकों के जूठे फलों को स्वयं खाते और मुझे भी खिलाते। अपने पंखों की ओटमें रख वे मेरा पालन-पोषण करते।
एक समय वहाँ बहुत से शवर (भील) शिकार खेलने आए। दिन भर अनेक पशुपक्षियोंको मारते रहे। सायङ्काल एक वृद्धशबर किसी पशु-पक्षीको न पाकर मेरे वृक्षके समीप आया। पक्षियोंका शब्द सुन कर वह उस पर चढ़ा और शुकों तथा अन्य पक्षियोंको कोटरोंमें से निकल मार-मार कर पृथिवी पर पटकने लगा। उसे समीप आता देख मैं भयभीत हो पिताके पंखोंमें छिप गया । इतनेमें उसने मेरे कोटरमें भी हाथ डाल मेरे पिता को निकाल लिया और उन्हें मारकर पृथिवी पर पटक दिया। पिताके पंखोंमें चिपका मैं भी उनके साथ ही पृथिवी पर गिर पड़ा और पंख से निकल कर वहीं गिरे सूखे पत्तोंमें आत्मरक्षार्थ घुस गया ।
शबर समस्त पक्षियों को मार वृक्ष से नीचे उतरा। वहीं उसने कुछ पक्षियोंको अग्नि में भून खा डाला और शेष पक्षियों को लेकर अपने साथियोंके साथ चला गया ।
उसके चले जाने पर मैं निर्भीक तो अवश्य हो गया किन्तु वह रात्रि अत्यधिक कष्टमें बीती । प्रातः सूर्योदय होने पर प्याससे व्यग्र होनेके कारण अपने पंखोंको फैला मैं समीपवर्ती पद्मसर नामक सरोवरके निकट धीरे-धीरे गया। वहाँ मरीचि मुनि स्नान करने के लिए आए थे। तृषित देख उन्होंने मेरे मुंहमें जल की बूँदें डालीं और मुझे दोनेमें रखकर अपने आश्रम ले गये । वहाँ मुझे देख महर्षि पुलस्त्यजी के मुख पर मुस्कुराहट छा गई। उपस्थित अन्य तपस्वियोंने उनसे पूछा—'भगवन् ! इस शुक को देख आप क्यों मुस्कराये ?'
५ का० भू०
कथामुखम् : राजा शूद्रक वर्णन व चाण्डालकन्या-शुक समागम
६ कादम्बरी- [ कथामुखे-
कविवंशवर्णनम्
बभूव वात्स्यायनवंशसम्भवो द्विजो जगद्गीतगुणोऽग्रणीः सताम् । अनेकगुप्ताचितपादपङ्कजः कुबेरनामांश इव स्वयम्भुवः ॥ १० ॥ उवास यस्य श्रुतिशान्तकल्मषे सदा पुरोडाशपवित्रिताधरे । सरस्वती सोमकषायितोदरे समस्तशास्त्रस्मृतिबन्धुरे मुखे ॥ ११ ॥ जगुर्गुहेऽभ्यस्तसमस्तवाङ्मयैः ससारिकैः पञ्जरवर्त्तिभिः शुकैः । निगृह्यमाणा बटवः पदे पदे यजूंषि सामानि च यस्य शङ्किताः ॥ १२ ॥
इत्थं कथां स्तुत्वा कीर्त्यनुवृत्त्यर्थः स्वकुलजातिङ्किंशति—बभूवेत्यादिना । वत्सस्यापत्यं पुमान् वात्स्यः सः अपने कुलप्रवर्त्तकत्वेन साश्रयः यस्य स तथोक्तो यो वंशः कुलं तत्र सम्भवः समुद्भवः वात्स्यवंशीय इत्यर्थः । जयति संसारे गीता जनैः गानविषयीकृताः गुणाः दयादाक्षिण्यादयो यस्य सः तथोक्तः सतां सज्जनानाम् अग्रणीः अग्रेसरः तन्मध्ये उत्तम इत्यर्थः । अनेकैः लधिकैः गुप्तैः गुप्तनामङ्कितैः वैश्यैः तदु-क्तम्—'शर्मान्तं ब्राह्मणस्योक्तं वर्मान्तं क्षत्रियस्य तु । गुप्तदासनात्मकं नाम प्रशस्तं वैश्यशूद्रयोः ॥'
यद्वा गुप्तैः ईशवीयपल्लवपद्मशक्तमध्यवर्त्तिप्राचीनराजवंशभिरित्यर्थः । अर्चिते पूजिते पादपङ्कजे चरणकमलयुगले यस्य सः । तथा स्वयम्भुवः प्रजापतेः अंशः अंशावतार इव अतिवैदिकत्वादित्याशयः, कुबेर-नामा कुबेराभिधेयः द्विजो विप्रो बभूव आसीत् 'दन्तविप्राण्डजा द्विजाः' इत्यमरः । अत्रोत्कृष्टद्विजत्वद्योत-नाय द्विजपदोपादानम्, हस्तिनात्रस्य दन्तवत्त्वेऽपि उत्कृष्टदन्ते इन्तीतिवदस्य यथा प्रयोगस्तद्वदिह द्वह भावाभिमानिनी द्वच्योत्प्रेक्षा, सा च स्वयम्भुवोऽश इव इत्यनेन वाच्या ॥ १० ॥
उवासेति । श्रुतिभिः वेदैः तदध्ययनैरित्यर्थः । 'श्रुतिस्तु वेद आम्नायः' इत्यमरः शान्तं विलीनं कल्मषं पापं यस्य तस्मिन्, नित्यवेदाध्ययनेन वाचनिकपापरहित इत्यर्थः । पुरोडाशेन साग्निहोत्रादौ देवेभ्यो हुतहविरावशिष्टेन हविषा 'पुरोडाशो हविर्भेद हुतशेषे च कीर्त्तितः' इति विश्वः, पवित्रितौ सङ्क-समये सम्बन्धेन पावतीकृतौ सधरौ वोष्ठौ यस्य तस्मिंस्तथोक्ते । सोमेन सोमयागे सोमनामकलतारस-पानेन कृषायितं पुष्टन् उदरन् अभ्यन्तरं यस्य तस्मिन् यथोक्ते । तथा समस्तानि सकलानि यानि शास्त्राणि व्यासादिरचितब्रह्मसूत्रादीनि स्मृतयश्च मन्वादिरचितनिबन्धाः तैः तदध्ययनैः बन्धुरं मनोहरं तस्मिंस्तथोक्ते । यस्य कुबेरद्विजस्य मुखे वदने सरस्वती वाग्देवी सदा सर्वस्मिन् काले उवास वासं करोतिस्म । अनेनास्य महात्मनः प्रत्यहं वेदाध्ययनशोलत्वं नित्याग्निहोत्रादिकर्मानुष्ठातृत्वं समग्रशास्त्रा-ज्ञातृत्वञ्च स्पष्टीकृतम् ।
जगुरिति । यस्य कुबेरद्विजस्य गृहे भवने बटवः छात्रभूता ब्रह्मचारिणो ब्राह्मणशिशवः, अभ्यस्तं बहुधा श्रवणाजिह्वाप्रवर्ति समस्तं सम्पूर्ण वाङ्मयं चतुर्दशविचारमकं शास्त्रं यैस्तैः तथोक्तैः, पञ्जरवर्त्तिभिः लोहशालाकानिर्मितपञ्जरगृहे विद्यमानैः, सारिकाभिः सहिता ससारिकैः शुकैः कीरपक्षिभिः पदे पदे प्रति-पदाम्यासे निगृह्यमाजाः 'भवद्भिरशुद्धमभ्यस्यते न्वैवं भवितव्यम्' इत्यं निर्भर्त्स्यमाना, अत एव शङ्किताः यद्यशुद्धं स्यात्तदा पुनरपि मम दोषप्राकट्यं नूनं शुका करिष्यन्तीतिभययुताः सन्तः, यजूंषि यजुर्वेदान् सामानि सामवेदांश्च जगुः अपठन् । तिर्यग्योनीनां शुकानानपि समस्तविद्यापारङ्गतत्वमिति दर्शनादद्भुत-मेतन्माहात्म्यमिति द्योतितम् । इह तथाविधशुकैः तादृशपरमादालन्दन्येऽपि तत्सम्बन्धप्रतिपादनादति-शयोक्त्यलङ्कारः ॥ १२ ॥
अपने गुणों से संसार में विख्यात, सज्जनों में सर्वश्रेष्ठ, अनेक गुप्तवंशी राजाओं से पूजित चरणकमलोंवाले तथा ब्रह्मा के अंश के समान तेजस्वी कुबेर नाम के एक ब्राह्मण वात्स्यायन वंश में उत्पन्न हुए थे ॥ १० ॥
निरन्तर वेद-पाठ से निष्कलुष, यज्ञ के हविष्प्राशसङ्गम से पवित्र, अन्तर भाग में सोमपान से कषैले तथा समस्त शास्त्रों और स्मृतियों से सुशोभित, इसके मुख में भगवती सरस्वती सदैव निवास करती थी ॥ ११ ॥
जिसके घर मैनाओं के साथ पिंजरों में पले हुए (निरन्तर शास्त्र-चर्चा सुनते-सुनाते) सभी शास्त्रों में अभ्यस्त शुकों द्वारा पद-पद पर टोके जाने के भय से सशंकित हुए (ब्रह्मचारी बालक) यजुः और सामवेद का निरन्तर पाठ किया करते थे ॥ १२ ॥
१. ग्रस्त ॰॰॰ ।
८ | कादम्बरी- | [ कथामुखे-
स चित्रभानुं तनयं महात्मनां सुतोत्तमानां श्रुतिशास्त्रशालिनाम् ।
अवाप मध्ये स्फटिकोपेलामलं क्रमेण कैलासमिव क्ष्माभृताम् ॥ १६ ॥
महात्मनो यस्य सुदूरनिर्गताः कलङ्कमुक्तेन्दुकलामलत्विषः ।
द्विषन्मनः प्राविविशुः कृतान्तरा गुणान्नृसिंहस्य नखाङ्कुशा इव ॥ १७ ॥
दिशामलीकालकभङ्गतां गतस्त्रयीवधूकणॆतमालपल्लवः ।
चकार यस्याध्वरधूमसञ्चयोः मलीमसः शुक्लतरं निजं यशः ॥ १८ ॥
प्राप्तोच्छया विहितानेकयज्ञैरनायासेन तत्प्राप्तिमवश्यंभाविनीं कृतवानिति निष्कर्षः। इह कार्येण हस्ति-सैन्यैरन्यदेशविजयिनः कस्यचिद्राज्ञो व्यवहारसमारोपात् समासोक्त्यलङ्कारः, स च पूर्णोपमयाऽनुप्राणि-तेति भावुकः ॥ १५ ॥
स इति। सः अर्थपतिः क्रमेण सुतोत्पत्तिपरम्परया क्ष्माभृतां पर्वतानां मध्ये स्फटिकोपलैः स्फटिकमणिभिः अमलं स्वच्छं कलङ्करहितमित्यर्थः। कैलासमिव क्ष्माभृतां क्षान्तिगुणयुक्तानां महात्मनां जितेन्द्रियाणां महामनीषिणां श्रुतिशास्त्रशालिनां वेदशास्त्राध्यापकानां सुतोत्तमानाम् उत्कृष्टारमजानां मध्ये चित्रभानुं चित्रभानुनामानं तनयम् आत्मजम् अवाप लब्धवान्। ‘क्षितिक्षान्त्योः क्ष्मा’, ‘आत्मज-स्तनयः सूनु’ इति चामरः। इहोपमा।
अर्थपतेरेकादश पुत्रा आसन्निति हर्षचरिते ग्रन्थकृता स्वयमेवोल्लिखितम्, तथाहि—‘सोऽजनयद् १. भृगं २. हंसं ३. शुचिं ४. कविं ५. महीदत्तं ६. धर्मं ७. जातवेदसं ८. चित्रभानुं ९. लघम १०. अहिदत्तं ११. विश्वरूपञ्चेत्येकादशरुद्रानिव सोमामृतरसशीकरच्छुरितमुखान् पवित्रान्’ इति। एवञ्चास्मिंश्चित्रभानु-रिति स्फुटमवगम्यते ॥ १६ ॥
महात्मन इति। सुदूरनिर्गता अधिकदूरदेशव्याप्ताः, पक्षे आधिक्येन नखराग्राद्बहिर्भूताः, कलङ्केन मृगलाञ्छनेन मुक्ता वर्जिता या इन्दुकला चन्द्रषोडशांशः तद्वत् अमला स्वच्छा स्विट् छविर्येषां ते, पक्षा-न्तरेऽप्येवमेव। तथा कृतं स्वप्रभावात्रिष्पादितम् अन्तरं प्रवेशावकाशो यैस्ते, पक्षे तु कृतम् अन्तरं भेदः यैस्ते; ‘अन्तरमवकाशावधिपरिधानान्तर्भेदातदर्थ्ये’ इत्यमरः। यस्य महात्मनः महान्बुद्धिमत्तः चित्रभानो-र्गुणाः दयादाक्षिण्यादयः अपिपदाध्याहारेण पितुस्तुल्या अपि नृसिंहस्य नृसिंहस्वरूपधारिणो विष्णो नखा-ङ्कुशाः सूनिवद्विस्तृताः ‘अङ्कुशोऽस्त्री सृणिः स्त्रियाम्’ इत्यमरः, नखारः पुनर्भवा इव द्विषतां शत्रूणां मनोऽपि पक्षे द्विषतो वैरिणो हिरण्यकशिपोः मनोऽन्तः करणं वक्षश्च प्राविविशुः प्रवेशं विदधुः यद्गुणा वैरिणामपि चित्ताकर्षकाः, तत्प्रभावः कथं वर्णनीयः ? इत्याशयः। साधारणधर्मादिसद्भावात्पूर्णोपमालङ्कारः ॥ १७ ॥
दिशामिति। दिशां पूर्वांदीनां वधूस्वरूपाणामिति यावत्, अलीकेषु ललाटदेशेषु ‘अलीकमप्रिये भाले’ इति हैमः, ये अलकाश्चूर्णकुन्तलाः तेषां भङ्गतां रचनाविशेषत्वं गतः। त्रयी वेदत्रयी ऋग्यजुःसामरूपे-त्यर्थः सैव वधूः स्नुषा तस्याः कर्णे श्रवणे तमालपल्लवः तापिच्छद्रुमकिसलयरूपः, स्थलद्वयेऽपि प्राकृतिक श्यामस्वरूपत्वादित्याशयः ‘तापिच्छोऽपि तमालः स्यात्’ इत्यमरः। मलीमसः प्राकृतिकमलिनोयस्य चित्रभानोः
अन्त में उनके क्षमाशील, महानुभाव तथा वेदशास्त्रों में पारंगत कई पुत्ररत्नों में पर्वतों के बीच स्फटिक मणियों से अत्यन्त निर्मल कैलास पर्वत के समान चमकते हुए गुणों से अत्यन्त उत्कृष्ट चित्रभानु नाम के पुत्र उत्पन्न हुए ॥ १६ ॥
चन्द्रकलाओं जैसी अपनी कोरों से दूर तक निर्मल कान्ति बिखेरते हुए शत्रु के हृदय को फाड़कर उसमें प्रविष्ट हो जानेवाले भगवान् नृसिंह के नखरूपी अंकुशों के समान उस महानुभाव के दूरतक विस्तृत, निष्कलंक तथा चन्द्रकलाओं जैसे उज्ज्वल कान्तिवाले गुणों ने विरोधियों के हृदयों को भी खोजकर उसमें अपना स्थान बना लिया था ॥ १७ ॥
जैसे कामिनियों के ललाट पर रची हुई घुँघराली केशरचना तथा नवोढ़ा के कान में लगी हुई तमालपल्लवों की रेखा स्वभावतः साँवली होती हुई भी शोभा में अत्यन्त निखर उठती है, उसी प्रकार दिशाओं की छोरों पर इधर-उधर बिखरी हुई एवं आकाश में लगी हुई यश के धुँओं की टेढ़ी-मेढ़ी रेखाओं ने स्वभावतः काली होकर भी अपनी शोभा को अत्यन्त उज्ज्वल बना दिया था ॥ १८ ॥
१. स्फटिकोपलोपमम् । २. नखाङ्कुरा । ३. मलीमसम् ।
| कविवंशवर्णनम् ] | चन्द्रकला-विद्योतिनीसहिता । |
|---|
सरस्वतीपाणि-सरोजसम्पुट-प्रमृष्टहोमश्रमशीकराम्भसः । यशोऽंशुशुक्लीकृतसप्तविष्टपात्ततः सुतो बाण इति व्यजायत ॥ १९ ॥
द्विजेन तेनाक्षतकण्ठकौण्ठ्यया महामनोमोहमलीमसान्धया । अलब्धवैदग्ध्यविलासमुग्धया धिया निबद्ध्येयमतिद्वयी कथा ॥ २० ॥
अध्वरधूममञ्जयेति. यज्ञधूमराशिः निजं स्वीयं यशः प्राकृतिकस्वच्छां सुकीर्तिं शुक्लरम् अतिशयेनोज्ज्वलं चकार विदधे । इह प्रथमचरणेनाजस्रं यज्ञसमूहसम्पादनेन धूमस्य दिगन्तव्यापित्वं ध्वनितम् । एवञ्च नियतक्रतुविधानात् धर्माचारतत्परताया अपि द्योतने गुणजनिता सुकीर्तिराधिका सञ्जातेति निष्कर्षः ।
इह दिशासु वधूत्वारोप आर्यः, अध्वरधूममञ्जर्ये केश रचनाविशेषत्वारोपस्तु शाब्द इत्येकदेशविवर्तिरूपकम्, धूममञ्जर्ये तमालपत्रत्वारोपः श्रौत्यां वधूत्वारोपे निमित्तमिति परम्परितरूपकम्, तथा मलिनधूममञ्जर्येण शुक्लनरयशो जननात् कारणगुणविपरीतकार्यगुणोत्पत्तेर्विषमालङ्कारश्च इति परस्परमेतेषामङ्गाङ्गिभावेन सङ्करालङ्कार इति तत्वविदः ॥ १८ ॥
सरस्वतीति । सरस्वत्या भारत्यादेव्याः पाणिसरोजसम्पुटेन करकमलयुगेन सृष्टानि प्रमार्जितानि होमश्रमस्य होमादिकर्मसम्बन्धिक्लेशस्य शीकराम्भांसि प्रस्वेदजलानि यस्य तस्मात्, तथा यशसः सुकीर्तेः अंशुभिः मयूखैः शुक्लीकृतानि शुभ्रीकृतानि सप्त विष्टपानि भूसप्तनीनि मत भुवनानि येन तस्मात् 'विष्टपं भुवनं जगत' इत्यमरः, ततः चित्रभानोः सकाशात् 'बाण' इति बाणनामधेयः सुतः पुत्रः व्यजायत अभवत् । इह भारत्याः करकमलयुगलेन स्वेदजलबिन्दूनां प्रोञ्छनामम्बन्धेऽपि तत्सम्बन्धप्रतिपादनात् प्रथमातिशयोक्त्यलङ्कारः, तथा कीर्तिराशिभिः सप्तभुवनानां शुभ्रीकरणसम्बन्धेऽपि तत्सम्बन्धप्रतिपादनाद् द्वितीयातिशयोक्त्यलङ्कारश्चेत्युभयोः परस्परनपेक्षाभावेन संसृष्टयलङ्कार इत्यवधेयम् ॥ १९ ॥
सम्प्रति स्वाहङ्कारं परिहरति—द्विजेनेति । तेन द्विजेन ब्राह्मणेन बाणेन, अक्षतम् अविनष्टं कण्ठकौण्ठ्यं वचनस्यापारं गलस्य मान्द्यं यस्याः सा तया, महान् उत्कृष्टो यो मनोमोहः शिशुत्वेन चित्तवैकक्ष्यं तेन मलीमसा मलिना प्रकाशितुमयोग्या अत एव अन्धा मदुत्थप्रतिपादनास समर्था तया, तथा अलब्धोऽप्राप्तो यो वैदग्ध्यविलासः वैदग्ध्यचातुर्यं तेन हेतुना मुग्धा मूढा नया वैदुष्यचातुर्यासमवेनार्यन्तकोमलयेत्यर्थः, 'मुग्धः सुन्दरमृद्वयोः' इत्यमरः, धिया प्रज्ञया इयं मदुदुदिस्त्या कादम्बरीरूपा, गर्हितत्वे द्वयी वृहत्कथां वासवदत्तां च अतिक्रान्तेति अतिद्वयी अधमम्ये अद्वितीयथा (अत्यादयः क्रान्ताद्यर्थे द्वितीया) इत्यनेन समासः, व्युच्चार्यन्न्-उत्तरत्रे अद्वितीयता कथा गद्यपद्यादिप्रबन्धः निबद्धा ग्रथिता; पूर्वमपरिणतबुद्ध्या विषयीकृत्य पश्चाद्विनिर्मितेत्यर्थः, एतेन शैशवचापल्याजातदोषा धीधनैर्मनीषिभिः शोधनीया इत्यभिप्रायः ।
इह—
‘छेको व्यञ्जनसङ्घस्य सकृत्साम्यमनेकधा । अनेकस्यैकधा साम्यमसकृद्वाऽप्यनेकधा । एकस्य सकृदप्येष वृत्त्यनुप्रास उच्यते ॥'
इति साहित्यदर्पणोक्तदिशा प्रथमचरणे छेकानुप्रासः, शेषे तु वृत्यनुप्रास इत्यनयोर्मियोऽनपेक्ष्य स्थित्यत्वाद् संसृष्टिरलङ्कारः ॥ २० ॥
निरन्तर यज्ञों में हवन करने के परिश्रम से आयी हुई, जिनके पसीने की बूंदों को भगवती सरस्वती स्वयं अपने सम्पुटित करकमलों से पोंछा करतीं थीं तथा जिनकी कीर्ति ने सातों लोकों को अपनी निर्मलता से अत्यन्त उज्ज्वल बना दिया था उन चित्रभानु से बाण नाम का पुत्र उत्पन्न हुआ ॥ १९ ॥
जिनके कंठ की तुतलाहट अभी तक नहीं मिट पायी है अर्थात् जिनका कंठस्वर अभी भी वर्णों के स्पष्ट उच्चारण में तेज नहीं पाया है, जिनका हृदय अज्ञानरूपी अन्धकार से अभी तक ढका हुआ है तथा जिसकी बुद्धि अभी भी विद्वानों की वचनवक्रता सीख न पाने के कारण अत्यन्त मूढ़ है अर्थात् जिसकी बुद्धि का अभी तक विकास नहीं हो पाया है उसी बाण ने अपने से पूर्व रची गयी दो कथाओं (बृहत्कथा तथा वासवदत्ता) के अतिरिक्त अथवा दुष्टकथाओं में अद्वितीय या उन दोनों से अत्यन्त उत्कृष्ट इस कथा की रचना की है ।
२ का० कथा०
कथा-मुखम्
शूद्रकवर्णनम्
आसीदशेष-नरपति-शिरः-समभ्यर्चित-शासनः पाकशासन इवापरः, चतुरुदधि-मालामेखलाया भुवो भर्त्ता, प्रतापालुरागावनत-समस्त-सामन्त-चक्रः, चक्रवर्तिलक्षणोपेतः, चक्रधर इव करकमलोपलक्ष्यमाण-शङ्ख-चक्र-लाञ्छनः, हर इव जितमन्मथः, गुह इवाप्रति-
अथ सम्प्रति कथां प्रस्तौति—आसीदिति। आसीदिति भूतक्रियापदस्य 'राजा शूद्रको नाम' इति दूरस्थेन कर्तृपदेनसम्बन्धः। राजानं विशिनष्टि-अशेषेति। अशेषैः समग्रैः नरपतिभिर्महीपतिभिः (कर्तृभिः) शिरोभिरुत्तमाङ्गै (करणैः) समभ्यर्चितं सादरं गृहीतं शासनम् आदेशो यस्य स तादृशः। समस्तजनाज्ञापको न स्वाज्ञाकर इत्याशयः, अत एव अपरः सुरराजाद्भिन्नो द्वितीयः पाकशासन इन्द्र इव। इन्द्रो हि पाकनामानं दैत्यं हतवानिति पुराणी वार्त्ता। पाकं शासितवानिति पाकशासनः 'बिडौजा पाकशासनः' इत्यमरः। इह शासनपदावृत्त्या यमकालङ्कारः, भावाभिमानिनी वाच्या द्रव्योत्प्रेक्षा चेत्युभयोः शब्दार्थालङ्कारयोरेकाश्रयानुप्रवेशरूपः सङ्करः। अत्र हि शासनपदावृत्त्या लाटानुप्रासो नाशङ्कनीयः, शब्दार्थामिन्नात्वे केवलतात्पर्य्यतो व्यतिरेक एव तदभ्युपगमेन प्रकृते शक्यार्थस्यापि व्यतिरेकात्।
चतुरिति। चत्वारश्च भूमण्डलचतुर्दिक्षु विद्यमानास्त उदधयश्च समुद्राश्च चतुरुदधयस्तेषां माला श्रेणिः सैव मेखला काञ्ची अवधिरिति यावत् यस्यास्तथाभूतायाः भुवो वसुधायाः भर्त्ता नायकः।
इह वसुधाशूद्रकयोर्नायकनायिकाव्यवहारसमारोपात् समासोक्तिरलङ्कारः।
प्रतापेति। प्रतापः कोशाण्डजस्तेजः अनुरागः प्रेम ताभ्याम् अवनतं वशीभूतं समस्तं कृत्स्नं सामन्त-चक्रं स्वाधीनतृपतिसमूहो यस्य स तादृशः। अन्यदपि लोहचक्रमग्निप्रतापादातपादवनतं जायते। तया च न केवलं तत्प्रभाववशाद्वशीभूताः सामन्तनृपतयः किन्तु तदीयप्रेमवशादपीति ध्वनितम्।
चक्रवर्ती। चक्रवर्ती सार्वभौमस्तस्य लक्षणैश्चिह्नः सामुद्रिकशास्त्रोक्तकरतललौहित्यादिभिः उपेतो युक्तः। तथा चोक्तं सामुद्रिकरहस्ये—
'अतिरिक्तः करो यस्य प्रथितङ्गुलिको मृदुः। चापाङ्कुशाङ्कितः सोऽपि चक्रवर्ती भवेद् ध्रुवम्॥'
पुनरपि तमेव विशिनष्टि—चक्रधर इति। चक्रमलातं धरतीत चक्रधरो विष्णुरिव करकमले
शूद्रक नाम का एक राजा था। वह मानों दूसरा इन्द्र था। सभी राजा श्रद्धा से सिर झुका कर उसका आदेश ग्रहण करते थे। वह चार समुद्रों से घिरी हुई मानों चौलड़ी करधनी पहनी हुई पृथ्वीरूपी नायिका का पालन-पोषण करनेवाला (दक्षिण) नायक था। उसके प्रताप अथवा अपनी अनुरक्ति से सभी सामन्त-गण उसके अधीन थे। वह चक्रवर्ती सम्राटों के सभी लक्षणों से युक्त था। भगवान् विष्णु के हाथों में चक्र और शंख है, उसके करकमलों में शंख और चक्र के चिह्न थे। भगवान शंकर ने कामदेव को जीता था, उसने काम-
१. कपालक्षणं साहित्यदर्पणे—
'कथायां सरसं वस्तु गद्यैरेव विनिर्मितम्। क्वचिदत्र भवेदार्या क्वचिद्वक्त्रापवक्त्रके।
आदौ पद्यैर्नमस्कारः खलादेवृत्तकीर्त्तनम्॥'
२६ चतुर्विधान्येव मुक्तकादीनि गद्यानि सन्ति, किन्त्विहोत्कलिकाप्रायनेव बहुत्वम्। तथा च तत्रैव—
'वृत्तगन्धोज्झितं गद्यं मुक्तकं वृत्तगन्धि च। भवेदुत्कलिकाप्रायं चूर्णकं च चतुर्विधम्॥
आद्यं समासरहितं वृत्तभागयुतं परन्। अन्यद्दीर्घसमासाढ्यं तुर्य्यमल्पसमासकन्॥'
एतेन—'गद्यपद्यमयी चम्वूर्दिग्धा श्लेषवती च या। राजवर्णनमादौ स्यान्नगरोद्वर्णनं ततः।
तदा चामुकमन्यस्मिन् तु तन्नृपु कुत्रचिद्॥'
यथा—'शलसम्बन्धो देवतायतनेषु न नृपु' इति नलचम्पूवान्, तथात्रैवाग्रे 'चित्रकर्मसु वर्णसङ्करो न ननुष्येषु' इत्यादि चम्पूलक्षणर्तुसुकामिनां वदन्तः परास्ताः।
शूद्रकवर्णनम् ] चन्द्रकला-विद्योतिनीसहिता । ११
हतशक्तिः, कमलयोनिरिव विमानीकृतराजहंसमण्डलः, जलधिरिव लक्ष्मीप्रसूतिः, गङ्गाप्रवाह इव भगीरथपथप्रवृत्तः, रविरिव प्रतिदिवसोपजायमानोदयः मेरुरिव सकलोपजीव्यमान-
पाणिपद्मतले उपलक्ष्यमाणम् अवलोक्यमानं शङ्खचक्रलाञ्छनं शङ्खचक्राकाररेखोपरेखास्वरूपं चिह्नं पक्षे वस्तुतः शङ्खचक्रस्वरूपं चिह्नं यस्य स तादृशः। 'चिह्नं लक्ष्म च लक्षणम्' इत्यमरः।
इहोपमानोपमेयभावस्य साधारणधर्मस्य चोपादानात् पूर्णोपमा, चक्रपदस्यासकृदुक्तत्वाद् वृत्त्यनुप्रासश्चेत्युभयोः परस्परमनपेक्षत्वात्तितलण्डुलवत्संसृष्टिः।
हर इवेति। हरति पापं यः स हरो महेश्वरः तद्वदिव जितः पराभूतः मन्मथः कन्दर्पः येन स तथोक्तः एकत्र भाललोचनाग्निना नामशेषकरणात्, अपरत्रात्यन्तलावण्यवत्त्वादित्याशयः। उभयोः पूर्णसाम्यात्पूर्णोपमालंकारः।
गुह इवेति। गुहः कार्तिकेय इव 'सेनानीरग्निभूर्गुहः' इत्यमरः, अप्रतिहता केनाप्यकुण्ठिता शक्तिः प्रभावोत्साहमन्त्रजनितं सामर्थ्यम् आयुधविशेषश्च यस्य स तथोक्तः। उभयोः साम्यात् पूर्णोपमालङ्कारः।
कमलेति। कमलं भगवतः श्रीमहानारायणाभिषेवं योनिरुद्गमस्थानं यस्य स कमलयोनिर्विधातेव, विमानं देवयानं तत्स्वरूपीकृतं नभसि वाहनीकृतमित्यर्थः राजहंसानां चञ्चुचरणैरतिलोहितानां पक्षिविशेषाणां मण्डलं समूहो येन स तादृशः, 'व्योमयानं विमानोऽस्त्री' इति, राजहंसास्तु ते चंचुचरणैरतिलोहिताः' इति चामरः। राजपक्षे—विगतः पराजयेन विनष्टः मानोऽहङ्कारो यस्य तद्विमानं तथाभूतं कृतं राजहंसानाम् अभ्युच्चमहीपतीनां मण्डलं गणो येन स तादृशः। अस्मिन् पक्षे राजहंसपदे राजानो हंसा इवेति 'उपमितं व्याघ्रादिभिः सामान्याप्रयोगे' इत्युपमितसमासः। 'स्युरुत्तरपदे व्याघ्र' इत्याद्यमरात्तस्याद्युच्चराजवाचकत्वमिति बोध्यम्। उभयोः साम्यात् पूर्णोपमालङ्कारः।
जलधिरिवेति। जलानि धीयन्तेऽस्मिन्निति जलधिः समुद्र इव लक्ष्म्या रमायाः शोभाया वा प्रसूतिर्निर्गमस्थानं देवासुरैः समुद्रमन्थने चतुर्दशरत्नेष्वस्या अपि तस्मादेव निर्गमात् तथा च जगदलङ्कृतमिति शोभाजनकत्वमित्याशयः। राजपक्षेऽपि लक्ष्मीर्धनसम्पत्तिः शोभा वा 'लक्ष्मीश्छाया च शोभायाम्' इति हैमः, तस्याः प्रसूतिरुद्भवस्थानम्, नीतिचातुर्यादित्याशयः। उभयोः साम्यात्पूर्णोपमालङ्कारः।
गङ्गेति। गङ्गायाः स्वर्धुन्द्याः प्रवाह ओघ इव भगीरथस्य तन्नामकसूर्यवंशीयभूपतिविशेषस्य पन्थाः स्वपितॄणामुद्धाराय रथचक्रकृतमार्गः तदाचारसरणिञ्च तत्र प्रवृत्तो लग्नः। उभयोः साम्यात्पूर्णोपमालंकारः।
पुरा किल सगरो नाम राजाश्वमेधेन यष्टुमश्वं मुमोच तञ्च सुरराजोऽपहृत्य पाताले कपिलाश्रमे बबन्ध। ततश्च तमन्विष्यन्तः सगरसुताश्चतुर्दिक्ष्वनवलोक्य नखेन भुवो मृद उत्खन्य पातालं प्रविश्य तमृषिं भर्त्सयितवन्तः। कुपितेन तेन मुनिनाऽमिशहस्तस्ते भस्मीभूतः अभूवन्। तत्प्रपौत्रो भगीरथो हि तानुद्दिधीर्षुः गङ्गामानेतुं तपस्तप्तवान्। तेन तुष्टा हि सा हिमालयान्निर्गत्य भूमण्डले तद्रथचक्रनिर्मितमार्गे च प्रसरन्ती पाताल प्रविश्य तांस्तारयामास। राजा भगीरथो हि परमस्सदाचारवानासीदिति च पौराणिकी कथानुसन्धेया।
रविरिवेति। रविर्दिवाकर इव प्रतिदिवसं प्रतिदिनम् उपजायमान उत्पद्यमान उदयगिरिसम्बन्धः सम्पत्तेरुद्रेकश्च यस्य स तथोक्तः। पूर्णोपमालंकारः।
मेरुरिवेति। मेरुः सुमेरुगिरिरिव, सकलैः समस्तैश्चर्याद्देवैश्च उपजीव्यमाना सेव्यमाना पादानां प्रत्यन्तपर्वतानां छाया आतपाभावाः, पादयोश्छाया कान्तिश्च यस्य स तथोक्तः। 'पादाः प्रत्यन्तपर्वताः' 'छाया सूर्यप्रिया कान्तिः प्रतिबिम्बमनातपः' इति चामरः।
वासनाओं को जीत लिया था। ब्रह्मा ने भोले-भाले हंसों को अपना वाहन बनाया था, उसने बड़े-बड़े राजाओं का अभिमान चूर-चूर करके उनके हृदयरूपी हंसों पर अपना आसन जमा लिया था। समुद्र से भगवती लक्ष्मी पैदा हुई थी, उससे राजलक्ष्मी का जन्म हुआ था। गंगा का प्रवाह राजा भगीरथ के रथ की लीकों का अनुगामी था, वह राजा भगीरथ के कठोर सदाचारों और प्रयत्नों की परिपाटी का अनुगामी था। सूर्य के समान उसकी भी श्रीसम्पत्ति दिनोदिन नये-नये रूपों में उगती रहती थी। देवलोक सुमेरु पर्वत के वृक्षों
१. ***उच्चीयमानोदयः । २. सकलभुवनो, सकलभुवनतलो*** । 'बृहस्पतिरिव सकलशास्त्रार्थतत्त्वज्ञः' इत्यधिकः पाठः क्वचित्
| १२ | कादम्बरी- | [कथामुखे- |
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पादच्छायः, दिग्गज इवानवरतप्रवृत्तदानाद्रीकृतकरः कर्त्ता महाश्चर्याणाम्, आहर्त्ता क्रतूनाम्, आदर्शः सर्वशास्त्राणाम्, उत्पत्तिः कलानाम्, कुलभवनं गुणानाम्, आगमः काव्यामृतरसानाम्, उदयशैलो मित्रमण्डलस्य, उत्पातकेतुरहितजनस्य, प्रवर्त्तयिता गोष्ठीबन्धानाम्, आश्रयो रसिकानाम्, प्रत्यादेशो धनुष्मताम्, धौरेयः साहसिकानाम्, अग्रणी-
'एकविंशत्यमी स्वर्गा निर्मित मेरुमूर्धनि'
इति साम्बपुराणात् मेरुसन्निकटगिरीणां छायासु सुराः सञ्चरन्तीति पौराणिकी वार्ता। पूर्णोपमालङ्कारः।
दिग्गज इति। दिग्गज ऐरावतप्रभृतिको दिङ्नाग इव 'ऐरावतः पुण्डरीको वामनः कुमुदोऽञ्जनः। पुष्पदन्तः सार्वभौमः सुप्रतीकश्च दिग्गज. ॥' इत्यमरः।
अनवरतं सततं प्रवृत्तं जातं यद्दानं मदजलं जलसहितं धनादिदानञ्च तेनाद्रीकृतः क्लिन्नीकृतः करः शुण्डो हस्तश्च यस्य सः। 'मदो दानं प्रवृत्तिक्ष', 'आर्द्रे सार्द्रं क्लिन्नं तिमितं स्तिमितं समुन्नमृत्तं च' इति चामरः। पूर्णोपमालङ्कारः।
कर्त्तेति। महाश्चर्याणाम् अतिप्रबलरिपुपराजयधृष्टतावहनानन्यकृतकार्याणां कर्त्ता निष्पादकः। क्रतूनां यज्ञानाम् आहर्त्ता अनुष्ठाता। सर्वशास्त्राणां सकलवाङ्मयवेदादीनाम् आदर्शो दर्पणः, 'दर्पणे मुकुरादर्शौ' इत्यमरः, यथा हि दर्पणे संक्रान्ताः पदार्थाः समवलोक्यन्ते तथा तस्मिन्नपि राजनि सर्वेषां सच्छास्त्राणां छाया निरन्तराभ्यासवशाज्जैनैः समवलोक्यन्ते स्मेश्याशयः। कलानां^१ नृत्यगीतादिचतुःषष्टिकलाविद्यानाम् उत्पत्तिः शिक्षाप्रदानाज्जन्मस्थानम् कलापदेन द्विशततीनां ग्रहणमिति व्याख्यानं हेयमेव। गुणानां दायादाक्षिण्यगाम्भीर्यादीनां कुलभवनं वंशपरम्परागताश्रयस्थानम्, तस्मिन्नेव तेषां स्थिरभावेन विद्यमानत्वादित्यभिप्रायः। काव्यानां दृश्यश्रव्यादीनां ये अमृतरसाः सुधातुल्यशृङ्गारादिरसास्तेषाम् आगम उद्भवस्थानम्, कविराजत्वेनोत्कृष्टकाव्यसम्पादनादित्याशयः। इह एकस्य महीपतेर्विषयभेदेन बहुविधोल्लेखालङ्कारः।
उदयेति। मित्राणि सखायस्तेषां मण्डलं समूहस्तस्य उदयशैलोऽभ्युन्नतेः स्थानम्। अन्यत्र मित्रमण्डलस्य सूर्य्यबिम्बस्य उदयशैलः पूर्वाद्रिः। दिवाकरो यथा पूर्वाद्रौ उदयं प्राप्नोति तथा मित्रगणस्तदाश्रितोऽभ्युन्नतिं प्रापेति भावः। इह श्लेषालङ्कारः।
उत्पातेति। अहितजनस्य वैरिजनस्य उत्पातकेतुः विनाशव्यञ्जको धूमकेतुः। तत्राक्रमण्य एव तेषां समारम्भादित्याशयः। इह नृपतौ केवलोत्पातकेतुत्वारोपात् केवलं निरङ्गं रूपकमलंकारः।
प्रवर्त्तयितेति। गोष्ठीबन्धानां मधुरकथापरिषत्स्थापनानां प्रवर्त्तयिता प्रवर्द्धकः। प्रतिस्थानं मधुरकथापरिस्थापकः इत्यर्थः। रसिकानां विदग्धजनानां रसज्ञानामित्यर्थः, आश्रयः अवलम्बनस्थानम्।
प्रत्यादेश इति। धनुष्मतां धनुर्द्धारिणां प्रत्यादेशो निराकृतिः प्रशस्तधनुर्द्धरश्रेष्ठ इत्यर्थः। 'प्रत्यादेशो निराकृतिः' इत्यमरः।
धौरेय इति। साहसिकानां संग्रामादौ हठविधायिनां मध्ये धौरेयो धुरन्धरो मुख्य इति यावत्। 'धुरो यत्तढकौ' इति ढकि धौरेय इति रूपम्।
अग्रेति। विदग्धानां पण्डितानां मध्ये अग्रणीरग्रगण्यः। वैनतेयो गरुड इव विनतेभ्यः कृतप्रणामेभ्य आनन्दस्य हर्षस्य जननः सम्पादकः। सोऽपि विनतायाः स्वमातुः आनन्दजननः हर्षकारकः। वैन्यो
की छाया का सेवन करता था, मृत्युलोक उसके चरणों की छाया में जीवित रहता था। दिग्गजों के सूंड निरन्तर बहने वाले मद-जल से भीगे रहते हैं, उसके हाथ निरन्तर दिए जाने वाले दान के जल से भीगे रहते थे। वह आश्चर्यपूर्ण कार्यों में लगा रहता तथा निरन्तर यज्ञों का अनुष्ठान किया करता था। शीशे के समान उसके निर्मल हृदय में सभी शास्त्र झलक उठे थे। वह ललित कलाओं का उद्गम और काव्य के अमृततुल्य रसों का संगम था। उदयाचल सूर्यमण्डल के उदय का स्थान है, वह अपने मित्रमण्डल की उन्नति का स्थान था। धूमकेतु संसार के विनाश का सूचक है, वह शत्रुओं के विनाश का चिह्न था। वह निरन्तर विद्वत्परिषद् बुलाया करता था। वह काव्यरसिकों का एक मात्र आश्रयस्थान था, धनुर्धारियों के मानभंग की मूर्ति था,
१. नृत्यगीतादिचतुःषष्टिकलानां नामानि अस्मत्सम्पादितसाहित्यदर्पण-'लक्ष्मौ' टीकायाः प्रथमसंस्करणस्य प्रथमपरिच्छेदेऽवगन्तव्यानि; विस्तरभयाच्च नेहोपन्यस्तानि।
शूद्रकवर्णनम् ] चन्द्रकला-विद्योतिनीसहिता । १३
विद्ग्धानाम्, वैनतेय इव विनतानन्दजननः, वैन्य इव चापकोटिसमुत्सारित^२सकलाराति-कुलाचलो राजा शूद्रको नाम ।
नाम्नैव यो निर्भिन्नास्रतिहृदयो विरचितनरसिंह^३-रूपाडम्बरम्, एकविक्रमाक्रान्तस-कलभुवनतलो विक्रमत्रयायासितं^४ भुवनत्रयं जहासेव^५ वासुदेवम् ।
अतिचिरकाललग्नमतिक्रान्तनृपतिसहस्रसम्पर्ककलङ्कमिव क्षालयन्ती यस्य विमले^६ कृपाणधाराजले चिरमुवास राजलक्ष्मीः^७ ।
वैनराजात्मजः पृथुरिव चापकोट्या कोटिसंख्यककार्मुकैः अगणितधनुर्धरसैनिकैरित्यर्थः, पक्षे-चापो धनुस्तस्य कोटिरग्रभागस्तेन समुत्सारिता विनाशिताः स्थानान्तरं प्रापिताश्च सकलारातयः समग्ररिपवः कुलाचलाः महेन्द्रादयः कुलपर्वता इव येन स तथोक्तः । कुलपर्वताश्च-‘महेन्द्रो मलयः सह्यः शुक्तिमानृक्षपर्वतः । विन्ध्यश्च पारियात्रश्च सप्तैते कुलपर्वताः ॥’ उभयोः साम्यात्पूर्णोपमालङ्कारः । पुरा किल पृथुः पर्वताकीर्णां वासानर्हां पृथिवीं समवलोक्य तत्समतलीकरणप्रवृत्तो धनुष्कोट्या पर्वतानुत्सारयामासेति पौराणिकी वार्त्तानुसन्धेया ।
नाम्नैवेति । यः शूद्रकः नाम्नैव निजनामश्रावणमात्रेणैव निर्भिन्नानि भयोत्पादनेन विदारितानि अरातीनां शत्रूणां हृदयानि वक्षांसि येन स तादृशः । विरचितः हिरण्यकशिपुहृदयभेदनाय विहितो नरसिंहस्वरूपधारणस्य आडम्बर आटोपो दीर्घव्यापार इति यावत्, येन स तं तादृशम् । एकेनाद्वितीय्रेन विक्रमेण, पराक्रमेण आक्रान्तम् अधीनीकृतं सकलं समस्तं भुवनतलं विष्टपतलं येन स तादृशः ‘विष्टपं भुवनत्रयम्’ इत्यमरः । विक्रमः पादन्यासः तस्य त्रयं त्रितयं तेन आयासितं खिन्नीकृतं भुवनत्रयं विष्टपं येन तं तथोक्तं वासुदेवं श्रीपतिं जहासेव हसति स्मेव । अयमाशयः—महीपतिरयं निजनामश्रावणमात्रेणैव शत्रूणां वक्षो भेदितवान्, वासुदेवस्तु शत्रुवक्षोभेदनाय नृसिंहावताराडम्बरं कृतवान्, तथा महीपतिना चानेनानायासेन केनैव पराक्रमेण चतुर्दशभुवनानि स्वाधीनीकृतानि, वासुदेवेन तु त्रिभिरेव विक्रमैः केवलानि त्रीण्येव भुवनान्याक्रान्तानीति योऽयं महीपतिकृतो वासुदेवोपहासः स न्याय्य एवेति ।
विष्णुः बलिं विजेतुं वामनरूपमङ्गीकृत्य छलना तं भुवनत्रयं विक्रमत्रयेणासादितवानिति पौराणिकी वार्त्ता । इहोपमानाद्वासुदेवादुपमेयस्य महीपतेराधिक्यवर्णनाद्व्यतिरेकालङ्कारः । जहासेवेति क्रियोत्प्रेक्षा चेति उभयोरङ्गाङ्गिभावेन सङ्करः ।
अतिचिरकालेति । अतिचिरकालो भूयान् समयः तेन लग्नम् आत्मनि संयुक्तम्, अतिक्रान्तं व्यतीतं यत् नृपतिसहस्रं कदर्यनरपतिसमूहः तस्य सम्पर्केण सम्बन्धेन यः कलङ्को दूषितचिह्नं प्राप्तं तं तथोक्तम्, क्षालयन्तीव प्रक्षालनेन प्रमार्ज्यन्तीव यस्य महीपतेः ( शूद्रकस्य ) विमले स्वच्छे कृपाणधाराजले खड्ग-धारारूपे जले चिरं बहुसमयं यावत् लक्ष्मीः राज्यश्रीः उवास वसति चक्रे, अन्योऽपि लोकः पङ्कादिलग्नं शरीरं जलेन क्षालयति । खड्गबलेनैव राजा राज्यलक्ष्मीं स्वाधीनीकृतवानित्याशयः । इह क्षालयन्तीवेति क्रियोत्प्रेक्षणात् क्रियोत्प्रेक्षालङ्कारः, ‘कृपाणधाराजल’ इत्यत्र निरङ्गं रूपकञ्चेत्युभयोरङ्गाङ्गिभावेन सङ्करः ।
पराक्रमियों का प्रधान था और चतुर पण्डितों का अगुआ था। गरुड़ ने अपनी माता विनता को आनन्दित किया था, उसने अपने अधीनों को आनन्दित किया था। राजा पृथु ने अपने धनुष की कोटि से पर्वतों को हटाकर पृथ्वी को समतल किया था, उसने अपने अगणित धनुर्धारी सैनिकों से शत्रुओं का विनाश करके शासन को निष्कंटक बना दिया था।
उसने अपने नाम के प्रताप से ही शत्रुओं के हृदय को विदीर्ण कर दिया था और अद्वितीय पराक्रम से सारी पृथ्वी को अपने अधीन कर लिया था। इसी नाते वह शत्रु-वध के लिए नृसिंह रूप का आडम्बर रचनेवाले तथा तीन पगों से तीनों लोकों को नाप लेने के लिए वामन रूप धारण करने का कष्ट उठाने वाले भगवान् वासुदेव की हँसी सी उड़ाया करता था।
युगों से दुष्ट राजाओं के सहवास में रहने के कारण राज्यलक्ष्मी में जो कलंक लग चुके थे उन्हें ही मानो धोती हुई वह उसके कृपाण की जल-धारा में बहुत दिनों तक निवास करती रहती रही !
१. वैन्यः, पृथुः ।
२. समुत्सारिताराति० ।
३. नारसिंह० ।
४. आयासितम् आयास्यमानम् ।
५. हसति स्मेव ।
६. 'विमले' इति पाठः क्वचिन्न विद्यते ।
७. लक्ष्मीः ।